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मंगलवार, 7 मार्च 2017

ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूंंदर दास)--प्रवचन-20



ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-बीसवां

प्रश्‍नसार: रीते घर पाहुन पग धारे

1--जीवंत गुरु सामने होते हुए भी हमारे देश में मुर्दों की पूजा होती है। क्या यह हमारा दुर्भाग्य है या नासमझी या अधोगति?

2--मैं स्वयं परमात्मा पर श्रद्धा नहीं कर पाता हूं। फिर मेरे लिए क्या उपाय है?  

3--आप नित नयी-नयी बातें कहे चले जाते हैं। इससे बड़ी उलझन होती है--क्या मानें और क्या न मानें?

4--भगवान्, ऐसी कौन-सी शक्ति या प्रेरणा है जो मनुष्य को भगवान् के करीब लाने में सहायक होती है?


पहला प्रश्नः जीवंत गुरु सामने होते हुए भी हमारे देश में मुर्दों की पूजा होती है। क्या यह हमारा दुर्भाग्य है या नासमझी या अधोगति?

सत्य प्रेम! न तो दुर्भाग्य, न नासमझी, न अधोगति। ऐसा ही सदा से हुआ है। मनुष्य का यही व्यवहार रहा है। मनुष्य के होने के ढंग में ही यह व्यवहार छिपा है। यह मनुष्य के मूर्च्छा का अनिवार्य हिस्सा है। मुर्दे की ही पूजा हो सकती है, जीवंत के साथ तो रूपांतरित होना पड़ता है। पूजा तो राजनीति है। जिससे बचना हो, उससे बचने का सबसे सुसंस्कृत उपाय है उसकी पूजा। चढ़ा दिए दो फूल चरणों में और मुक्त हुए। और तुम जैसे थे वैसे के वैसे रहे। और तुमने मन में यह मजा भी ले लिया कि कुछ किया। कुछ किया भी नहीं। फूल वृक्षों के थे। फूल परमात्मा पर चढ़े ही थे। वे तोड़ लिए और पत्थर की एक मूर्ति पर चढ़ा दिए या एक शास्त्र पर चढ़ा दिए।
सारे फूल परमात्मा के चरणों में समर्पित हैं। सारे पक्षियों के गीत उसी की प्रार्थनाएं हैं। सूरज उगता है, उसी की आरती उतारता है। लेकिन तुम्हारे मन में एक बेचैनी है, एक अपराध-भाव है। तुम्हें पता है कि तुम जैसे होने चाहिए वैसे नहीं हो। कुछ करना जरूरी है। लेकिन अगर असली कुछ करो तो महंगा काम है, लंबी यात्रा है, दुर्गम मार्ग है। असली कुछ करो तो तुम्हारे न्यस्त स्वार्थों को चोट पड़ती है। असली कुछ करो तो तुम जैसे हो वैसे ही न रह सकोगे। तुम्हारा क्रोध बदलना होगा, तुम्हारा लोभ बदलना होगा, तुम्हारी वासना रूपांतरित होगी। तुम्हें अपने चित्त के रवैए बदलने होंगे। जीवन की शैली बदलनी होगी।
इतना महंगा काम तुम करना नहीं चाहते। इतनी झंझट तुम लेना नहीं चाहते। लेकिन तुम यह भी नहीं चाहते कि अपनी आंखों में अपराधी रहो। तुम अपने को यह भी समझाना चाहते हो--मैंने कुछ किया तो! नहीं हुआ तो मेरा दुर्भाग्य; लेकिन मैंने नहीं किया तो ऐसा नहीं--मैंने कुछ किया तो!
तो तुम सस्ते उपाय खोजते हो। मंदिर में जाकर दीया जला आते हो। अब मंदिर में जलाया दीया कैसे काम आएगा? दीया भीतर जलना चाहिए। भीतर दीया जलाना लंबी साधना मांगता है। मंदिर में दीया जलाना ज़रा भी अड़चन की बात नहीं। फूल चढ़ा आए. . . वृक्षों में लगे फूल चढ़ाओगे? अपने भीतर फूल उगाओ! तुम फूल बनो! तुम्हारा कमल खिले, उसे ले जाओ चढ़ाने परमात्मा को, तो कुछ लाए, कुछ भेंट लाए।
लेकिन तुम्हारा कमल खिले, उसके लिए तो काम को राम तक की यात्रा करनी पड़ेगी, तब तुम्हारा कमल खिलेगा। उतनी यात्रा की तैयारी नहीं। और यह भी मानने की तैयारी नहीं है कि मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूं। तो आदमी कुछ-कुछ करने का उपाय करता है। लेकिन उपाय ऐसे हैं कि भ्रांति भी बनी रहे कि मैं कुछ कर रहा हूं और कुछ करना भी न पड़े। ऐसे एक मिथ्या धर्म का जन्म होता है--पूजा का, आराधना का, अर्चना का।
धर्म है साधना; न तो पूजा, न अर्चना, न उपासना। धर्म है साधना। और धर्म की प्रयोगशाला भीतर है। न तो काशी जाओ, न काबा--जाना हो कहीं तो अपने भीतर जाओ। तीर्थ वहां है। डुबकी कहीं मारनी हो तो गंगाओं को बाहर मत खोजो। बाहर की गंगा आदमी की ईज़ाद है। भीतर की गंगा परमात्मा ने बहायी है। उसमें ही उतरो!
लेकिन भीतर जाने में बहुत डर लगते हैं। पहला तो डर, कि भीतर जाते ही आदमी अकेला होने लगता है। न पत्नी होगी साथ, न पुत्र होगा, न मित्र होंगे--कोई भी नहीं होगा। अकेले हो जाओगे। अकेले में भय लगता है। और भीतर जब उतरोगे तो पहले भयंकर अंधकार पाओगे। अंधेरे में डर लगता है। जब तुम बहुत दिन तक भीतर नहीं गए हो, तो तुम्हारी आंखें भीतर की रोशनी को पहचानने में असमर्थ हो गई हैं।
तुमने कभी खयाल किया, भरी-दुपहरी में मीलों चलकर तुम घर आए हो, तो घर में प्रवेश करते ही अंधकार मालूम होता है। आंखें धूप की आदी हो गई हैं। फिर थोड़े सुसताते हो, आराम कर लेते हो और घर का अंधकार मिटने लगता है। अंधकार था नहीं, तुम्हारी आंखें बहुत प्रकाश की आदी हो गई थीं। इस धीमे-से प्रकाश को नहीं देख पाती थीं। इस मंदिम प्रकाश को नहीं देख पाती थीं। अब देखने लगीं। अब इस प्रकाश के लिए राजी हो गई। तुम्हारी आंखों ने समायोजन कर लिया।
ठीक ऐसी ही घटना भीतर घटती है। तुम बाहर और बाहर और बाहर चलते रहे। बाहर की रोशनी से तुम्हारी पहचान है। भीतर की रोशनी बड़ी मंदिम है। बाहर की रोशनी उत्तप्त है। भीतर की रोशनी बड़ी शीतल है। बाहर की रोशनी ऐसी है जैसी भर-दुपहरी। भीतर की रोशनी? भीतर की रोशनी ऐसी है जैसे सूरज डूब जाए और रात न हो--बीच का अंतराल, संध्या। या सुबह सूरज न उगा हो और रात जा चुकी हो, आखिरी तारा डूबता हो--अंतराल। भीतर की रोशनी मंदिम है, शीतल है, उत्तप्त नहीं। और तुम जन्मों-जन्मों से भीतर नहीं गए हो, तो तुम्हारी आंख भीतर से समायोजित होने में समय मांगेगी।
तो जब पहली दफा भीतर जाओगे, अंधकार पाओगे। अंधकार से डर लगता है। और अंधकार देखकर तुम्हें लगेगा कि सब संत व्यर्थ की बातें करते रहे, झूठी ही बातें करते रहे। क्योंकि वे तो सब कहते हैं कि भीतर प्रकाशों का प्रकाश है। जैसे हजार सूरज एक साथ उगे हों! और तुम जब भी भीतर जाओगे, अंधकार पाओगे। तुम घबड़ाकर वापिस लौट आओगे। बाहर कम-से-कम रोशनी तो है!
तुम्हें में याद दिलाऊं, सूफी फकीर राबिया की कहानी, जो मैंने बहुत बार कही है, और मुझे बहुत प्यारी है। राबिया को एक सांझ लोगों ने देखा कि अपने झोंपड़े के बाहर कुछ खोजती है। बूढ़ी औरत। उसका लोग समादर भी करते थे। थोड़ा झक्की भी मानते थे। पूछा लोगों ने, पड़ोस के लोगों ने--क्या खो गया? उसने कहा--मेरी सुई खो गई है। सीती थी, गिर गई। वे भी खोजने लगे। तभी एक बुद्धिमान ने पूछा कि सुई गिरी कहां है? रास्ता तो बहुत बड़ा है। हम खोजते रहें, खोजते रहें, रात हो जाएगी। सुई गिरी कहां है? ठीक-ठीक जगह का पता हो तो खोजना आसान होगा। वहीं हम तलाश लेंगे।
राबिया हंसने लगी। राबिया ने कहाः सुई कहां गिरी, यह तो पूछो ही मत। सुई मेरे घर के भीतर गिरी है। लेकिन वहां अंधेरा है और अंधेरे में कोई खोजे तो कैसे खोजे? बाहर रोशनी है इसलिए बाहर मैं खोजती हूं।
वे लोग ठहर गए। उन्होंने कहा, तू तो पागल है, अपने साथ हमें भी पागल बनाया।
राबिया बोली कि नहीं, मैं तो तुम्हारे ही तर्क का अनुसरण कर रही हूं। तुम आनंद को बाहर खोजते हो और तुमने खोया भीतर है। परमात्मा को बाहर खोजते हो और परमात्मा भीतर है। तुम्हारे ही तर्क का अनुसरण कर रही हूं। और तुम्हारा भी कारण यही है, जो मेरा कारण है। भीतर अंधेरा है, बाहर रोशनी मालूम होती है।
जब तुम पहली बार भीतर जाओगे, अंधेरा पाओगे। उससे डर लगता है। और जीवंत गुरु के पास और क्या होगा, अगर भीतर जाना न होगा? जीवंत गुरु के संस्पर्श में एक ही तो घटना घटनी है--अंतर्यात्रा शुरू होगी। भयंकर अंधकार होगा।
अमावस की रात से शुरू होती है साधक की यात्रा और पूर्णिमा पर पूरी होती है। लेकिन प्रथम तो अमावस से साक्षात्कार करना होगा।
दूसरी बात--जैसे ही तुम भीतर जाओगे. . . बुद्धपुरुषों ने कहा है, आत्मा का दर्शन होगा, परमात्मा का साक्षात्कार होगा। लेकिन तुम्हें नहीं हो जाएगा। तुम तो भीतर जाओगे, तुम्हें सिर्फ वासना का साक्षात्कार होगा; किसी परमात्मा का नहीं। तुम तो न मालूम वासना के कितने कीड़े कुलबुलाते पाओगे। हजार-हजार तरह के सांप-बिच्छू तुम्हारे भीतर सरकते हुए तुम्हें मिलेंगे--क्रोध के, वैमनस्य के,र् ईष्या के, विध्वंस के, द्वेष के, घृणा के। तुम घबड़ा जाओगे। तुम तो कहोगे, यह किस मवाद-भरी दुनिया में आ गया! चले थे परमात्मा को अनुभव करने। चले थे मोक्ष की तलाश में, यह तो नरक का पता चल रहा है।
तुम्हें पहले नरक से ही गुजरना होगा, क्योंकि यही नरक तुमने अब तक निर्मित किया है। परमात्मा भी भीतर है। जिन्होंने कहा है, गलत नहीं कहा है, जानकर कहा है। मैं तुमसे कहता हूं, परमात्मा भीतर है। जानकर कहता हूं, गवाह की तरह कहता हूं। चश्मदीद गवाह की तरह। लेकिन केंद्र पर परमात्मा है। केंद्र तक पहुंचने में समय लगेगा। तुम्हारी और केंद्र परिधि के बीच में लंबा अंतराल है, लंबा फासला है। उस लंबे फासले में तुमने नरक ठूस-ठूसकर भर दिया है। तुमने ही बनाया है। जब क्रोध उठा है, तुमने दबा लिया। जब घृणा उठी, तुमने दबा ली। जब वासना जगी, तुमने दबा ली। वे सब दबे हुए सांप-बिच्छू तुम्हारे भीतर पड़े सरक रहे हैं। तुम जब भीतर जाओगे, उनसे मुलाकात न करोगे? उनसे मुलाकात लेनी ही होगी।
पश्चिम के बड़े विचारक डेविड ह्युम ने लिखा है कि "साक्रेटीज़ की यह बात मानकर कि अपने को जानो, मैं भी अपने भीतर गया। लेकिन मैंने सिवाय इच्छाओं के, कामनाओं के, स्मृतियों के, कल्पनाओं के, व्यर्थ के कूड़े-कबाड़ के, और कुछ भी नहीं पाया, मुझे कोई आत्मा नहीं मिली।' इतनी जल्दी मिलेगी भी नहीं।
जैसे कोई आदमी कुआं खोदता है, तो तुम सोचते हो एकदम से जलधार मिल जाती है? और जलधार न मिले फीट-दो-फीट की खुदाई के बाद और तुम लौट जाओ और कहो कि भीतर जलधार नहीं है--ऐसी ही भूल ह्युम ने की। कितना ही बड़ा विचारक रहा होगा, मेरे हिसाब से बड़ी जल्दीबाजी की। धीरज नहीं था।
जब कोई जमीन में कुआं खोदता है. . . और जमीन में हर जगह पानी है। यह बात दूसरी है कि कहीं पचास फीट पर होगा, कहीं पांच फीट पर होगा, कहीं पांच सौ फीट पर होगा, यह बात दूसरी है। मगर ऐसा कोई स्थल नहीं पृथ्वी पर, जहां खोदते ही जाओ तो पानी न मिले। पानी तो है ही। लेकिन खुदाई हर आदमी की अलग-अलग होगी; गहराई अलग-अलग होगी। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अनूठा है। अपने ढंग से जीए हो तुम जन्मों-जन्मों में। तुमने जो भी इकट्ठा कर लिया है, उसी में से खुदाई करनी पड़ेगी। दूसरे ने कुछ और इकट्ठा किया है। तीसरे ने कुछ और इकट्ठा किया है। सबका संग्रह अलग-अलग है। सबकी पर्तें अलग-अलग हैं।
और आदमी तो ऐसे हैं जैसे प्याज! छीलना पड़ेगा, पर्त-पर-पर्त निकालनी होगी, तब कहीं भीतर का शून्य हाथ लगेगा। उसी शून्य में पूर्ण विराजमान है। कुआं तुम खोदते हो तो पहले तो कूड़ा-करकट हाथ लगता है। डालडा के डिब्बे, कनस्तर, टूटे-फूटे. . . लोगों के घर का कूड़ा-करकट, चीथड़े। पांच-सात फीट तक तो इसी तरह की चीजें, हाथ लगेंगी। इससे लौट मत आना--कि ये डालडा के डिब्बे, कनस्तर और चीथड़े. . . कहां जल-स्रोत यहां? फिर और खोदोगे तो कंकड़-पत्थर मिलेंगे। फिर आदमी का कचरा समाप्त हुआ तो कंकड़-पत्थर भी समाप्त हो जाएंगे, तो सूखी जमीन मिलेगी मत सोचना कि अब लौट चलूं, बहुत हो गई खुदाई। खोदे जाना। फिर गीली जमीन मिलेगी। और जब गीली जमीन मिले तो समझ लेना कि जल-स्रोत अब करीब है। मगर अभी भी पीने-योग्य जल मिल नहीं जाएगा। अभी गीली जमीन ही मिली है, सिर्फ पानी की हल्की झलकें मिली हैं।
ऐसा ही ध्यान की खुदाई में होता है, अंतर्यात्रा में होता है। और खोदो। फिर गंदा जल मिलेगा--कीचड़ से भरा। कीचड़ मिलेगी। मगर अब तुम करीब आने लगे। घबड़ा मत जाना कि कीचड़ का क्या करेंगे; हम तो जल-स्रोत के लिए निकले हैं, कीचड़ थोड़े ही पीएंगे! घबड़ा मत जाना। और खोदना, और खोदना। तुम करीब आते जा रहे हो। जल्दी ही स्वच्छ जल-स्रोत मिल जाएंगे।
और फिर, जब तक तुम खुदाई जारी रखोगे, तब तक तो कीचड़ मचती ही रहेगी। यह ध्यान और समाधि का फर्क है। ध्यान का अर्थ है--खुदाई। जब तक तुम ध्यान ही करते रहोगे, करते ही रहोगे, तब तक तो कीचड़ मचती ही रहेगी। जब तुम पाओ कि अब गले-गले कीचड़ में खड़े हो गए हैं, जल तो मिल गया है, अब कीचड़ ही कीचड़ जल में भरी है, जब गले-गले कीचड़ में आ जाओ--तो निकल आना बाहर कुएं के। अब प्रतीक्षा करना, बैठ जाना। राह देखना, ताकि कीचड़ धीरे-धीरे बैठ जाए। बैठ जाती है। कीचड़ के कण भारी हैं, जल से, अपने-आप बैठ जाएंगे। मगर तुम यह मत सोचना कि तुम वहां खुदाई जारी रखो, अंदर जाकर कीचड़ को हटाने का उपाय करो तो कीचड़ मिटेगी। तुम्हारी मौजूदगी कीचड़ को बढ़ाती रहेगी। खुदाई तक तुम्हारी जरूरत है, फिर तुम बाहर आ जाओ।
इसलिए ध्यान और प्रतीक्षा, दोनों का जब जोड़ हो जाता है, तब समाधि ही फलती है।
तुम पूछते होः जीवंत गुरु सामने होते हुए भी हमारे देश में मुर्दों की पूजा होती है।
तुम्हारे ही देश में ऐसा होता है, ऐसा नहीं; सब देशों में ऐसा होता है। मुर्दों की पूजा में सुविधा है।
ऐसा समझो, अगर दो हजार साल पहले तुम क्राइस्ट के साथ चले होते तो खतरा था। अब क्रिश्चियन होने में कोई खतरा नहीं है। तब तो फांसी लग सकती थी। जिस रात क्राइस्ट पकड़े गए, उनके सारे शिष्यों ने उन्हें छोड़ दिया, भाग गए! कौन इतना खतरा मोल लेगा? सिर्फ एक शिष्य पीछे हो लिया। जीसस ने कहा भी उससे कि तू भी भाग जा। उसने कहा, मेरे चाहे प्राण जाएं, लेकिन आपको कभी नहीं छोडूंगा। और जीसस हंसने लगे। उन्होंने कहाः कहना आसान है, करना मुश्किल है। मैं तुझसे कहता हूं कि मुर्गा बांग दे, उसके पहले तीन बार तू इनकार कर चुका होगा।
फिर जीसस को दुश्मन पकड़कर ले चले। रात अंधेरी है और मशालें उन्होंने जला रखी हैं और जीसस को बांध रखा है। भीड़ में उन्होंने अपनी देखा कि एक अजनबी-सा आदमी है। वही जीसस का शिष्य। उन्होंने पूछा, तू कौन है? हम तुम्हें पहचानते नहीं। तू जीसस का शिष्य तो नहीं?
और उस शिष्य ने कहा कि नहीं, कौन जीसस? मैं तो जानता भी नहीं।
और जीसस ने लौटकर पीछे की तरफ देखा और कहा, अभी मुर्गे ने बांग नहीं दी है। और ऐसा तीन बार हुआ। मुर्गे के बांग देने के पहले उन थोड़ी-सी घड़ियों में शिष्य ने तीन बार इनकार किया कि नहीं, कौन जीसस? मैं तो एक अजनबी आदमी हूं। इस गांव में आया। आप मशालें लिए हैं, इसलिए साथ हो लिया। सिर्फ देखने के लिए. . . तमाशबीन हूं कि क्या हो रहा है।
जीसस के साथ चलना तो सूली कंधे पर लेकर रख चलना पड़ेगा। लेकिन, फिर जीसस गए, फिर चर्च बने, मूर्तियां बनीं, क्रॉस खड़े हुए। अब जीसस को मानने में क्या अड़चन है? अब पूजा करनी तो बहुत आसान है। पूजा करनेवाला मानता नहीं है। जीसस की एक भी शिक्षा मानी नहीं गई है। जीसस ने कहाः जो तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे, दूसरा गाल उसके सामने कर देना। कौन करता है? जीसस ने कहा हैः प्रेम परमात्मा है। लेकिन ईसाइयों ने जितने युद्ध जमीन पर किए, किसने किए? जितनी हिंसा उन्होंने की, किसने की? कौन सुनता है? कौन मानता है? लेकिन पूजा जारी रहती है।
बुद्ध के साथ चलते, मुश्किल में पड़ते। आग के साथ खेलना है बुद्ध के साथ चलना। बुद्ध के साथ उठना-बैठना खतरे से खाली नहीं। लेकिन बुद्ध की मूर्ति की पूजा करने में क्या खतरा हो सकता है? मूर्ति तुम्हारी खरीदी हुई, बाजार से लाई हुई; चाहो तो पूजो, चाहो तो न पूजो। कुछ दिन के लिए दरवाजा बंद कर दो, तो भी मूर्ति कुछ नहीं कर सकती। यह भी नहीं कह सकती कि मैं प्यासी हूं। भूखी हूं। मूर्ति के साथ जैसा व्यवहार तुम्हें करना हो, करो। लेकिन बुद्ध के साथ तुम्हें रूपांतरित होना होगा। बुद्ध तुम्हारी मुट्ठी में नहीं होंगे। तुम्हें अपने को बुद्ध की मुट्ठी में छोड़ना होगा। मूर्ति तुम्हारी मुट्ठी में होगी, जैसी मर्जी हो करो।
देखते नहीं हिंदुओं को? बना लेते हैं गणेशजी को। पूजन कर लिया, बड़ा शोरगुल मचा लिया, फिर चले समुद्र में जाकर विसर्जन भी कर आते हैं। गणेशजी कुछ नहीं कर पाते। पूजन करना हो पूजन करो, नदी में डुबाना हो नदी में डुबा दो, जैसी तुम्हारी मर्जी! गणेशजी क्या करें? गणेशजी वहां हैं ही नहीं; तुम्हारा खिलौना हैं। असली गणेशजी को सागर में डुबाओगे, सूंड में फंसा लेंगे। चारों खाने चित्त कर देंगे। फिर भूलकर कभी असली गणेशजी के पास न जाओगे। मगर अपने ही बनाए गणेशजी मिट्टी के हैं, रंगे-पुते हैं। जहां बिठाओ बैठे हैं; जहां चलाओ चलते हैं; शोरगुल मचाओ, शोरगुल सुनते हैं।
मुर्दे की पूजा आसान है। मुर्दे की ही पूजा आसान है। और इस देश में ही नहीं, सभी देशों में वैसा है। आदमी सब जगह एक-सा है। इस भ्रांति को छोड़ो कि आदमी अलग-अलग है। राजनीति ने तुम्हें बड़ी मूढ़ताएं सिखाई हैं कि तुम भारतीय हो, फलां आदमी चीनी है, फलां आदमी जर्मन है। ये मूढ़ताएं छोड़ो! कौन जर्मन, कौन चीनी, कौन भारतीय? आदमी बस आदमी है। थोड़ा रंग का फर्क होगा। रंग के फर्क से क्या होता है? तुम्हें पता है? गोरे आदमी में और काले आदमी में चार आने के रंग का फर्क होता है। क्या शोरगुल मचा रखा है? चार आने का रंग! पोतकर काला कर दे। और चार आने के रंग का ही फर्क है। भीतर जो पिगमैंट होते हैं, जिनसे आदमी काला होता है, उनकी कीमत चार आना है। और तुम यह जानकर हैरान होओगे कि काला आदमी चार आना ज्यादा मूल्यवान है; गोरा नहीं। गोरा तो खाली है। चार आने की वह जो कीमती चीज है, वह उसमें नहीं है। अगर नुकसान में है तो गोरा है। काला धनी है। चवन्नी ज्यादा!
इन छोटे-छोटे तर्कों का क्या हिसाब लगा बैठे हो? मगर ये सारे फर्क हमें बड़े महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। छोड़ो यह पागलपन! यहां मेरे पास लोग आ जाते हैं। वे पूछते हैं, यहां इतने विदेशी क्यों? कौन विदेशी है? किसको विदेशी कह रहे हो? मैं तुम्हारी राजनीति की परिभाषा मानने को राजी नहीं। किसको विदेशी कहते हो? यह सारी पृथ्वी एक है। क्या तुम सोचते हो तुमने हिंदुस्तान-पाकिस्तान की रेखा खींच दी, नक्शे पर, तो पृथ्वी बंट गयी? पृथ्वी तो अखंड है। अब यह बड़ा मजा है कि थोड़े ही साल पहले, तीस साल पहले, जो पाकिस्तान में रहता था वह देशी था; अब वह विदेशी हो गया। वही का वही आदमी. . .।
मैंने एक कहानी सुनी है। जब हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी का बंटवारा हुआ तो एक पागलखाना था। वह दोनों देशों की सीमाओं पर पड़ता था, वह कहां जाए? और पागलखाने को लेने को वैसे भी कोई उत्सुक नहीं था। न हिंदुओं को फिकर थी, न मुसलमानों को फिकर थी। न गांधी को चिंता थी, न जिन्ना को चिंता थी। लेकिन कहीं तो जाना ही चाहिए, पागलखाना है तो कहीं तो जाना पड़ेगा। फिर यही तय हुआ कि पागलों से ही पूछ लिया जाए कि तुम कहां जाना चाहते हो। पागल तो पागल हैं। उनसे पूछा, तो वे कहने लगे, हमें कहीं जाना नहीं है, हम तो यहीं रहना चाहते हैं। उनको लाख समझाया कि तुम यहीं रहोगे, जाना कहीं नहीं है, मगर तुम जाना कहां चाहते हो, हिंदुस्तान में कि पाकिस्तान में? उन पागलों ने सिर पीट लिया। वे बोले कि हम सोचते थे हम पागल हैं, पागल आप हो! अगर जाना कहीं नहीं है, यहीं रहना है, तो हम जाएं क्यों हिंदुस्तान या पाकिस्तान? तो हम यहीं रहेंगे।
उनको लाख समझाया कि भाई! तुम यहीं रहोगे। बिल्कुल जहां हो, जिस कमरे में हो, जैसे हो वैसे ही रहोगे; मगर जाना कहां है? अब तुम सोचते हो, कभी-कभी तुम्हारी राजनीति की भाषा पागलों से भी ज्यादा पागल होती है।. . . जाना कहां है? पहुंच गए होंगे राजनेता--चूड़ीदार पाजामा पहनकर, गांधी टोपी पहनकर। पूछने लगे होंगे कि जाना कहां है? आखिर पागलों ने कहा कि हमें कहीं नहीं जाना है। और हमें यह बात नहीं समझ में आती कि रहना भी यहीं और जाना कहां है! ये दोनों बातों में विरोध है। हमें कहीं नहीं जाना है। इस बकवास में हमें पड़ना ही नहीं है। हम मजे में हैं।
आखिर एक ही उपाय समझ में आया कि पागलखाने के बीच में एक दीवार खींच दी जाए--आधा पागलखाना पाकिस्तान में चला जाए, आधा पागलखाना हिंदुस्तान में चला जाए। तो उन्होंने बीच में दीवार खींच दी। अभी भी पागलखाना वहीं है और पागल कभी-कभी दीवार पर चढ़ जाते हैं और दूसरी तरफ के मित्रों से पूछते हैं कि भाई, बड़ा मजा है, तुम भी वहीं हम भी यहीं, तुम पाकिस्तान में चले गए, हम हिंदुस्तान में चले गए! कुछ भी न हुआ, सिर्फ एक दीवार बीच में खड़ी हो गई। अब तुम्हें इस तरफ आना हो तो पासपोर्ट चाहिए। हमें उस तरफ आना हो तो पासपोर्ट चाहिए। दीवार के बिना सब मजा था, क्यों दीवार खड़ी की है?**त्र्!)ध्****त्र्!)इ१४)१०**
आज अगर पाकिस्तान में कोई रहता है, तो वह तुम्हारा मित्र नहीं रहा। कल तक मित्र था, आज मित्र नहीं है।
ज़मीन एक है। यहां कोई विदेशी नहीं है। ये टुच्ची धारणाएं हैं, ये ओछे ख़याल हैं। छोड़ो! आदमी बस आदमी जैसा है। उसमें जो फर्क है, बहुत ऊपरी-ऊपरी है। उसकी बुनियाद में कोई फर्क नहीं है। वही घृणा, वही वैमनस्य, वही द्वेष। और जिस दिन जीवन बदले, तो वही आनंद, वही सच्चिदानंद! अंधेरे में रहो, अज्ञानी रहो, तो जीवन में वैमनस्य है, घृणा है, नरक है। जागो तो जीवन में आनंद ही आनंद है।
क्या तुम सोचते हो कि धर्म पर किसी की बपौती है? इस देश में ऐसा कई लोगों को ख़याल है। मेरे पास लोग आकर कहते हैं कि यह देश तो पुण्य-भूमि है। जैसे और सारे देश पाप-भूमि तो एक हैं! भूमि तो एक है; कैसी पुण्य-भूमि, कैसी पाप-भूमि! भूमियां थोड़े ही पुण्य और पाप की होती हैं; व्यक्तियों के चित्त पाप और पुण्य के होते हैं।
मनुष्य को एक कर के देखना शुरू करो, तो ही मनुष्य की समस्याएं हल की जा सकती हैं, नहीं तो समस्या तो हल होती ही नहीं।
ऐसा ही समझो... ज़रा सोचो एक ऐसी दुनिया... और ऐसी दुनिया भी हो सकती है, आदमी इतना पागल है इसलिए मैं कल्पना की बात नहीं कर रहा हूं... तुम गए डॉक्टर के पास, उसने तुम्हारी जांच की और कहा कि तुमको मुसलमान कैंसर हो गया है, या तुमको हिंदू कैंसर हुआ है, या तुमको ईसाई कैंसर हुआ है। ज़रा सोचो, ऐसा अगर डॉक्टर कहे कि तुमको हिंदुस्तानी कैंसर हुआ है, तुमको हिंदुस्तानी दवा लगेगी; कि तुमको पाकिस्तानी कैंसर हुआ है, तुमको पाकिस्तानी दवा लगेगी-- तो तुम उस डॉक्टर को पागल समझोगे न! और अगर ऐसा हो जाए कि कैंसर भी देशों में विभाजित हो जाए, देशी-विदेशी हो जाए, औषधियां भी विभाजित हो जाएं, तो फिर मनुष्य की दुनिया से बीमारी का मिटना असंभव है। हम जानते हैं कि कैंसर सिर्फ कैंसर है और द्वेष केवल द्वेष है, घृणा केवल घृणा है, अज्ञान केवल अज्ञान है, उसके कोई विशेषण नहीं हैं। बीमारी-बीमारी है। और इलाज एक ही है। मगर पहले तुम बीमारी को एक समझो तो इलाज एक हो पाए। अगर तुमने बीमारी को अलग-अलग बांट लिया तो इलाज भी अलग-अलग हो जाएंगे। और वहीं से गड़बड़ शुरू हो जाती है।
ज़रा देखो, विज्ञान एक है सारी दुनिया का। तुम यह नहीं कह सकते कि यह पुण्य-भूमि है, तो यहां सौ डिग्री पर पानी गर्म क्यों हो, यहां अठान्नवे पर होगा! सारी दुनिया में सौ डिग्री पर होता है, पुण्य-भूमि पर इतनी तो कृपा परमात्मा की होनी चाहिए कि दो डिग्री कम पर हो जाए। इतने भक्त यहां हो चुके हैं, इतने ज्ञानी, इतने अवतार... इतनी कृपा न होगी, इतनी विशेष रियायत नहीं होगी?
नहीं, पानी सौ डिग्री पर ही गर्म होगा और स्वर्ग में भी --और पुण्यात्मा करेगा तो भी और पानी करेगा तो भी। विज्ञान एक है। और ठीक से समझो, अगर बाहर का विज्ञान एक है और भीतर का विज्ञान अलग-अलग कैसे हो सकता है? जब बाहर का विज्ञान एक है तो भीतर का विज्ञान अलग-अलग कैसे हो सकता है? जब बाहर तक का विज्ञान एक है जहां कि अनेक का साम्राज्य है, तो भीतर का विज्ञान तो एक होगा ही, अनिवार्यतया एक होगा, क्योंकि वहां तो एक का ही विस्तार है।
जिस दिन पृथ्वी से संकीर्ण परिभाषाएं गिर जाएंगी--हिंदू की, मुसलमान की, ईसाई की, भारतीय की, पाकिस्तानी की, जापानी की--उस दिन जीवन का परम धन्यभाग होगा। उस दिन हम समस्याओं को सीधा-सीधा हल कर पाएंगे। उस दिन समस्या को हम उसकी जड़ में पकड़ जाएंगे। अभी तो हम पत्तों पर उलझे रहते हैं। और पत्तों पर ही विवाद हो जाता है,जड़ पर पहुंच ही नहीं पाते।
मेरी घोषणा है कि आदमी एक है। और यह तुम्हारी नासमझी नहीं, दुर्भाग्य नहीं, अधोगति नहीं। यह भी धारणा है लोगों की, कि पहले का आदमी बहुत ऊंचा था, पहुंचा हुआ था, पवित्र था, धार्मिक था; आज का आदमी पापी, कलयुगी! तुम्हें पहले के आदमी के संबंध में कुछ पता नहीं। तुम्हारे पास कुछ कहानियां आ गई हैं, उन्हीं कहानियों के आधार पर तुम पुराने आदमी का हिसाब लगा लेते हो। जैसे, तुम बुद्ध को जानते हो और बुद्ध के हिसाब से तुम सोचते हो कि सारे लोग बुद्ध जैसे थे! तुम राम को जानते हो, तुम सोचते हो राम जैसे सारे लोग थे! तो फिर रावण कहां से आया? और अगर बुद्ध जैसे ही सब लोग थे तो बुद्ध पर पत्थर किसने मारे? बुद्ध पर पागल हाथी किसने छोड़े? बुद्ध पर चट्टानें किसने सरकाईं? बुद्ध को ज़हर किसने दिया?
आदमी सदा ऐसा रहा है, लेकिन कठिनाई यह है कि जैसे ही यह बीसवीं सदी समाप्त हो जाएगी--दो हजार साल के बाद, अ ब स का तो कुछ पता नहीं रहेगा, लेकिन कुछ नाम रह जाएंगे--रामकृष्ण का, रमण का, कृष्णमूर्ति का--नाम रह जाएंगे। और लोग सोचेंगेः आहा... कैसा सतयुग था! बस ऐसा ही आदमी सदा रहा है। पीछे तो कुछ स्वर्ण नाम याद रह जाते हैं। लेकिन वे स्वर्ण नाम तो इक्के-दुक्के हैं; उनसे समाज नहीं बनता। अभी तक बुद्धों का कोई समाज दुनिया में नहीं पैदा हुआ है। सच तो यह है कि हम हजारों साल बुद्ध की याद ही इसलिए करते हैं कि वे अनूठे थे, अकेले थे। अगर बहुत बुद्ध होते तो कौन याद करता? उनकी याद्दाश्त ही यह बताती है कि वे बिल्कुल अनूठे थे और सारे लोग उनसे विपरीत रहे होंगे।
अंधेरी रात में तारे खूब चमक के दिखाई पड़ते हैं; उजाली रात में उतने नहीं चमकते। तारे वहीं के वहीं हैं। और दिन में भी तारे आकाश में होते हैं, कहीं जाते नहीं। कहां जाएंगे? पाकिस्तान जाएंगे कि हिंदुस्तान जाएंगे? वहीं के वहीं। लेकिन सूरज की रोशनी में खो जाते हैं। रात बड़ी अंधेरी रही होगी, जिसमें बुद्ध का तारा चमका। अगर ऐसा समाज रहा होता, जहां सभी लोग पुण्यात्मा थे, बुद्ध का तारा कैसे चमकता? दिन की तरह होती बात। बुद्ध खो गए होते।
पांच हजार साल हो गए हैं, हम कृष्ण को भूले नहीं हैं। क्यों? इसलिए कि कृष्ण ऐसे होंगे जैसे हजारों-हजारों कांटों में एक गुलाब का फूल खिले। उसे भूला नहीं जा सकता। लेकिन अगर हजारों गुलाब के फूल हों, गुलाब के फूलों की खेती हो रही हो, अगर सबके होठों पर बांसुरी हो जीवन की और सबके पैरों में घुंघरू बंधे हों आनंद के और सबके कंठ से गीत फूट रहा हो--कौन कृष्ण को याद रखेगा? अगर हरेक के पास जीवन नृत्य कर रहा हो, रास रचा हो, कौन कृष्ण को याद करेगा? उनकी याद ही इसीलिए हर गई है! इसलिए यह भूलकर मत सोचना कि तुम कलियुग में रह रहे हो।
एक बड़े मज़े की बात है कि दुनिया की पुरानी से पुरानी किताब भी यही कहती है कि पहले के लोग अच्छे थे। दुनिया में एक भी किताब ऐसी नहीं है जो कहती हो, आज के लोग अच्छे हैं। वेद भी यही कहते हैं, पुरखों की याद करते हैं। लाओत्सु ने ढाई हजार साल पहले अपनी किताब में यही लिखा है कि कैसे थे वे दिन, जब पृथ्वी पर धर्म का राज्य था!
रामराज्य सदा अतीत में रहा है। आदमी सदा ही अतीत में देखता रहा है कि सब सुंदर था, क्योंकि विकृत तो खो जाता है, सुंदर चमकता रह जाता है। फूल-फूल बच जाते हैं, उनकी सुगंध बच जाती है; कांटे मर जाते हैं, मिट्टी में खो जाते हैं। मगर कांटों की भीड़ है। तुम जब आज को देखते हो तो जलता हुआ दीया तो कभी एक-आध दिखाई पड़ता है, बाकी तो सब बुझे दीए हैं, कतारों पर कतारें बुझे दीयों की हैं। इन बुझे दीयों में एक जलता हुआ दीया पता भी नहीं चलता। लेकिन बाद में उसी जलते दीए की याद रह जाएगी, बुझे दीए तो खो जाएंगे। इसलिए मनुष्य को बड़ा गलत गणित बैठ गया है। आदमी ऐसा का ही ऐसा है।
आदमी दुनिया में दो तरह के होते हैं--या तो सोए हुए आदमी या जागे हुए आदमी। सोए हुए आदमी हमेशा कलियुग में हैं, जागे हुए आदमी हमेशा सतयुग में होते हैं। तुम जब भी जाग जाओ, तभी सतयुग। जब तक तुम सोए रहे, तब एक कलियुग। तुम्हारे पास बैठा आदमी सतयुग में हो सकता है--अगर जागा हो, अगर होशपूर्वक जी रहा हो। तुम्हारी एकत्तरफ सतयुगी बैठा हो सकता है, दूसरी तरफ कलियुग बैठा हो सकता है। और ऐसा ही नहीं, यह भी हो जाता है कि सुबह जब तुम उठते हो तो हो सकता है सतयुग में होओ, सांझ होते-होते कलियुग में पहुंच जाओ। एक क्षण सतयुग, दूसरे क्षण कलियुग हो जाता है। जब तुम क्रोध से भर जाते हो, कलियुग हो गया। जब तुम करुणा से भर जाते हो, सतयुग हो गया।
एक झेन फकीर के पास एक सम्राट् मिलने गया। सम्राट् ने कहा कि मैंने स्वर्ग-नरक की बहुत चर्चा सुनी है; मैं पूछने आया हूं--यह स्वर्ग क्या, यह नरक क्या? और मैं सिर्फ बात सुनने नहीं आया। बातें तो मैंने बहुत सुनी हैं, मैं कुछ प्रमाण चाहता हूं।
वह फकीर भी मस्त फकीर था। उसने कहा, प्रमाण! ज़रा अपनी शक्ल भी देखी है आइने में? ऐसी गंदी शक्ल का मैंने आदमी नहीं देखा।
सम्राट् से बोलाः मक्खियां भिनभिना रही हैं, स्नान किए हो?
सम्राट् तो आगबबूला हो गया। भूल ही गया कि दार्शनिक जिज्ञासा करने आया था। तलवार खींच ली म्यान से बाहर, उठ गई तलवार। बस गिरने ही वाली थी फकीर से सिर पर, कि फकीर ने कहा, देख, यह रहा नरक! तलवार वहीं की वहीं रुक गई। आग से जलती हुई आंखें, क्रोध, अपमान, बदला लेने का भाव...और फकीर ने कहा, देख, आंख बंदकर, देख, यही नरक है! एक क्षण में हाथ शिथिल हो गया। तलवार वापिस म्यान में चली गई। सम्राट् को होश आया--यह मैं क्या कर रहा हूं! चेहरे से क्रोध विदा हो गया। और फकीर ने हंस कर कहा, देख यही स्वर्ग है! स्वर्ग और नरक समय में बंटे हुए नहीं होते--हमारी मनोदशाएं हैं, हमारी मनः स्थितियां हैं। तुम दिन में कई बार स्वर्ग से नरक तक की यात्रा करते हो। जैसे मालगाड़ी के डब्बे शंटिंग करते रहते हैं न, ऐसे तुम अकसर स्वर्ग और नरक के बीच डोलते रहते हो। मगर यह आदत हो गई है। तुम्हें खयाल में नहीं आता।
आदमी सदा से ऐसा है। बस, अगर भेद ही करने हों तो एक ही भेद करने जैसा है, वह है--होश का भेद। और सब भेद व्यर्थ हैं। होश से भर जाओ, तो ही तुम जीवंत गुरु के निकट हो सकते हो। अगर बेहोश रहे तो मुर्दा की पूजा जारी ही रहेगी। और जो मुर्दे को पूजता है वह मुर्दा है। और जो जीवंत के पास सत्संग इकट्ठा होता है, वही जीवित है।

दूसरा प्रश्नः मैं स्वयं परमात्मा पर श्रद्धा नहीं कर पाता हूं। फिर मेरे लिए क्या उपाय है?
फिर उपाय किसलिए पूछ रहे हो? जब मंजिल की श्रद्धा नहीं है तो मार्ग क्यों पूछ रहो हो? श्रद्धा होगी...कहीं छिपी होगी अंतस्तल में, कहीं बीज की तरह पड़ी होगी। वही बीज रास्ता खोज रहा है फूटने का।

तुम्हारी बुद्धि श्रद्धा नहीं कर पाती, सच; लेकिन तुम्हारा हृदय श्रद्धा करना चाहता है। इसलिए तुम्हारे प्रश्न में एक विरोधाभास है। पहले तो कहते होः मैं स्वयं परमात्मा पर श्रद्धा नहीं कर पाता हूं। यह कौन है, जो बोल रहा है? यह तुम्हारा सिर बोला। फिर दूसरी बात तुम पूछते हो कि फिर मेरे लिए उपाय क्या है? यह तुम्हारे हृदय ने पूछा। इस एक छोटे-से प्रश्न में तुम्हारे दोहरे ढंग, तुम्हारा द्वंद्व, तुम्हारा द्वैत प्रकट है। अगर ईश्वर है ही नहीं तो उपाय की जरूरत क्या? बात ही समाप्त हो गई। नहीं, लेकिन ऐसा मैंने आदमी ही नहीं पाया है अपने जीवन में, जिसे ईश्वर पर किसी न किसी तल पर भरोसा न हो। नास्तिक से नास्तिक को भी हृदय में श्रद्धा होती है। असल में उसी श्रद्धा को झुठलाने के लिए वह नास्तिक हो जाता है। हजार तर्क इकट्ठा करता है कि परमात्मा नहीं है। अगर परमात्मा नहीं है तो तर्क भी क्यों इकट्ठे करने?
जैसे मेरे कमरे में टेबल नहीं है, तो मैं इसके लिए तर्क इकट्ठे करने नहीं बैठता कि मेरे कमरे में टेबल नहीं है, इसके लिए किताब लिखूं। नहीं है तो नहीं है, बात खत्म हो गई। आज सूरज नहीं उगा, बात खत्म हो गई। अब इसके लिए तर्क क्या इकट्ठा करना है? आज वर्षा हो रही है, हो रही है।
लेकिन नास्तिक जिंदगीभर लगा देता है। अकसर तो ऐसा होता है, आस्तिक तो थोड़ा-बहुत समय देता है, वह तो गया भागा, जल्दी से सिर पटका मंदिर में, लौटा। उसने सस्ती तरकीब निकाल ली है परमात्मा से बचने की...कि देखो, याद रखना, आए थे मंदिर, सिर पटका था, फूल चढ़ाए थे। भागा...भूल-भाल गया। नास्तिक तो उलझा ही रहता है। चौबीस घंटे! नास्तिक जितनी ऊर्जा परमात्मा पर व्यय करता है उतनी आस्तिक नहीं करते। मामला क्या है? जिंदगीभर एक ही बात सोचता है।
एक नास्तिक मेरे पास आया। उसने कहा, मैं तीस साल से निरंतर इस कोशिश में लगा हूं कि ईश्वर नहीं है। मैंने कहा, यह भी हद हो गई! तीस साल तो अगर सिद्ध करने में लगते कि ईश्वर है, तो न भी होता तो सिद्ध हो जाता। तीस साल में न होता तो बना लेते, पैदा कर लेते। तीस साल! आधा जीवन, ईश्वर नहीं है, यह सिद्ध करने में लगा दिया। फिर जियोगे कब?
जब वह आदमी आया तो उसकी उम्र ही कोई साठ वर्ष की रही होगी।...तो जीवन तुम्हारा ऐसे ही गया। ज़रा सोचो तो कैसी मूढ़ता कर ली है। "नहीं' के ऊपर जीवन को निछावर कर दिया! नहीं था तो बात खत्म हो गई थी, इस पर एक क्षण भी व्यय करने जैसा नहीं था। लेकिन तीस साल व्यय किए हैं तो तुम्हारे मनोविज्ञान की खबर मिलती हैः तुम्हारे गहरे अंतस्तल में श्रद्धा का बीज है। तुम चाहते हो कि हो ईश्वर, लेकिन तुम्हारी बुद्धि स्वीकार नहीं करना चाहती, क्योंकि ईश्वर को स्वीकार करना हो तो अपनी बुद्धि को इनकार करना पड़ता है।
ईश्वर को स्वीकार करने में एक ही अड़चन हैः अहंकार मरता है। अगर ईश्वर है तो मैं नहीं हूं। यह है अड़चन। अगर ईश्वर है तो मुझे मिटना होगा। अगर ईश्वर नहीं है तो फिर मैं हूं। ये दोनों एक साथ नहीं हो सकते।
ईश्वर का अर्थ होता हैः समग्रता, सागर! अहंकार का अर्थ होता हैः सागर में उठी छोटी-सी लहर। लहर चाहती है कि सिद्ध कर दे सागर नहीं है, मैं ही हूं। क्योंकि अगर सागर है तो फिर लहर तो क्षणभंगुर है; अभी उठी अभी गिर जाएगी।
अपने को बचाने की आकांक्षा में नास्तिकता पैदा होती है। नास्तिकता का कोई संबंध ईश्वर से नहीं है; अहंकार की सुरक्षा है नास्तिकता। अहंकार के लिए कवच है। अहंकार के लिए ढाल है। अगर ईश्वर नहीं है तो फिर अहंकार निश्चिंत भाव से पल सकता है। अगर ईश्वर है तो मुझे झुकना पड़ेगा। अगर ईश्वर है तो किन्हीं चरणों में मुझे झुकना पड़ेगा। इसलिए तो हम ईश्वर को स्वीकार करने को राजी नहीं होते। कौन झुकना चाहता है! कोई झुकना नहीं चाहता। तुम्हारे झुकने की जिस दिन तैयारी हो जाएगी, उसी दिन ईश्वर है।
अब तुम पूछते हो कि मुझे तो श्रद्धा नहीं है, फिर मेरे लिए क्या उपाय है? तुम्हें तो श्रद्धा नहीं; जिनको श्रद्धा हो उनके पास उठो-बैठो। बस, इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है। तुम्हें तो खबर नहीं है; जिनको खबर हो, उनके पास उठो-बैठो। और एक बात का खयाल रखना, यदि तुम्हें पता भी नहीं है कि ईश्वर है या नहीं, तो "नहीं' को मत पकड़ लेना, क्योंकि वह भी तुम्हें पता नहीं है। अपने को खुला रखना। श्रद्धा नहीं है, ठीक; लेकिन अश्रद्धा मत बना लेना। इन दोनों बातों में भेद है।
जो आदमी कहता है ईश्वर है--यह श्रद्धा। जो आदमी कहता है ईश्वर नहीं है--यह अश्रद्धा। और हो सकता है दोनों झूठ हों। अकसर दोनों झूठ होते हैं। न तो आस्तिक को पता है उसके होने का न नास्तिक को पता है उसके न होने का। जिज्ञासु रहना! कहना, मुझे पता नहीं है। लेकिन मैं राजी हूं; अगर हो, तो जानने को राजी हूं; अगर हो तो खोजने को राजी हूं। आंखें खुली रखूंगा। आंखें बंद नहीं करूंगा।
शुतुरमुर्ग मत बन जाना, जो आंखें बंद करके रेत में अपना सिर गड़ा लेता है। आंखें खुली रखना और मैं तुमसे कहता हूं आंखें खुली रहें तो श्रद्धा निर्मित अपने-आप हो जाएगी। क्योंकि खुली आंख रहे तो श्रद्धा से बचने का उपाय ही नहीं है। अगर आंख खोलकर देखते रहो, देखते रहो, तो तुम हैरान हो जाओगे--चारों तरफ परमात्मा मौजूद है। वृक्षों में वही हरा है, नदियों में वही तरंगित है। तारों में वही चमकता है। लोगों में वही बोल रहा है। तुम में भी वही है, तुम्हारे पड़ोसी में भी वही है। और आंखें खुली रखने के लिए सबसे ज्यादा सुगम उपाय हैः जिसकी आंखे खुली हों उससे दोस्ती बना लो। इसे संत सुंदरदास ने सत्संग कहा है, संत-समागम कहा है।
          वृक्ष की अंधेरी-घनी छाया में
          छोटा-सा मंदिर है,
          मंदिर में छोटी-सी प्रतिमा है,
          प्रतिमा के समक्ष एक
          छोटा-सा दीया जलता है,
          अनजाने ही बहुत भला लगता है;
          देश-काल, जाने किन दूरियों का
          संस्कार जगता है!
          मूढ़ मन, कर नमन!
          यदि भगवान् नहीं,
          यहां पड़े पत्थर को, मानकर,
          किसी अनजान की
          यहां जगी
          मूक चढ़ी श्रद्धा को ध्यानकर!
कोई आकर मंदिर में एक दीया जला गया है। तुम्हें भगवान् पर भरोसा नहीं है। दीया तो भला लगता है? दीए का अंधेरे में जलना तो भला लगता है। तुम्हें भगवान् पर भरोसा नहीं, मंदिर का यह सन्नाटा तो भला लगता है? मंदिर की यह शांति तो भली लगती है? यह स्वच्छता तो भली लगती है? इस पर तो भरोसा आता है? और फिर कोई इस दीए को चढ़ा गया है, उसमें श्रद्धा नहीं होगी। उसकी श्रद्धा को ही नमन कर लो। इस दीए के जलते हुए प्रकाश को नमन कर लो। इस मंदिर के सन्नाटे और शांति को नमन कर लो। छोड़ो भगवान् को!
मैंने तुमसे कहाः जो लोग नहीं नमन करना चाहते वे लोग भगवान् को इनकार करते हैं। जो लोग नमन करने को राजी हैं, उनके सामने भगवान् प्रकट हो जाता है। तुम किसी भी भांति नमन तो सीखो! कहीं भी झुकने की कला सीखो। जहां भी तुम्हें कुछ विराट दिखाई पड़े, झुको! हिमालय के उत्तुंग शिखरों को देखकर हिमाच्छादित...झुको! अगर हिमालय के हिमाच्छादित शिखरों को देखकर भी तुम्हारे भीतर घुटनों पर झुक जाने का भाव नहीं उठा तो तुम आदमी नहीं हो। गए हो दूर जंगल में, वृक्षों की हरियाली, जमीन की सौंधी-सौंधी सुगंध, अगर तुम्हारे मन में यह भाव नहीं उठा कि झुक जाऊं घुटनों पर, तो तुम मनुष्य नहीं हो; तो तुम्हारे जीवन में काव्य नहीं है; तो तुम्हारे पास हृदय नहीं है जो धड़कता हो। तुम एक मशीन हो, एक यंत्र हो।
आकाश तारों से भरा देखकर कभी हाथ जोड़ लेने का मन नहीं होता? तो फिर तुम्हारे भीतर होश ही नहीं है। तुम्हें सौंदर्य का बोध नहीं है। कभी नाचो, जब वृक्ष नाचते हों हवाओं में! देखते...अभी वर्षा हो रही है। कभी हो जाओ खड़े वस्त्र-विहीन, आकाश के तले। गिरने दो वर्षा को। नाचो! मत परमात्मा की बात उठाओ। परमात्मा से क्या लेना-देना है? वर्षा की गिरती बूंदें अपने में परम आनंद हैं। छोड़ो परमात्मा को। मगर उसी नाच में तुम्हें परमात्मा की झलक मिलनी शुरू हो जाएगी।
मैं तुमसे यह नहीं कहता कि परमात्मा हो तभी नाचा जा सकता है। नाचा जा सकता है, उसके और हजार बहाने खोजे जा सकते हैं। प्रेम में नाचो। किसी सुंदर व्यक्ति को देखकर नाचो। किसी की गहरी झील जैसी आंखों को देखकर नाचो। अवाक् होना सीखो। चकित होना सीखो। जो चकित होना जानता है, परमात्मा से ज्यादा देर दूर नहीं रह सकेगा। आश्चर्य-विमुग्ध होना सीखो। जिसके जीवन में आश्चर्य जिंदा है उसके जीवन में अपने-आप परमात्मा चला आएगा। कब चला आएगा, पग-ध्वनि भी नहीं सुनाई पड़ेगी।
मैं भी परमात्मा की मानकर नहीं चला था, इसलिए तुमसे आश्वस्त होकर कहता हूं कि परमात्मा को मानने की कोई जरूरत नहीं है। मैं नास्तिक की तरह चला था। परमात्मा नहीं है, ऐसा मुझे ज्यादा अहसास होता था, बजाय इसके कि परमात्मा है। लेकिन मैंने आंखें खुली रखीं। और एक बात मुझे पहले से साफ रही--कि नहीं हो तो उसकी चिंता क्या करनी है? उस पर विचार ही क्यों करना? उस दिशा में जाना ही क्यों?
परमात्मा नहीं है...छोड़ो धर्म को, काव्य तो है! कोई कविता तुम्हारे हृदय को गुदगुदाती है। संगीत तो है! वीणा के तार जब छेड़ दिए जाते हैं, तुम्हारे भीतर कोई मल्हार उठती या नहीं? कोई बांसुरी बजाता है, तुम्हारे भीतर कुछ हूक उठती है या नहीं? कोयल बोलने लगती है, तुम्हारे भीतर कुछ हिलता-डुलता या नहीं? ईश्वर नहीं है, बात खत्म हो गई; मंदिर-मस्जिद तुम्हारे लिए नहीं है। लेकिन यह प्रकृति उसका मंदिर है।
मेरे लेखे आश्चर्य परमात्मा की दिशा में सबसे पहला कदम है, श्रद्धा नहीं। क्योंकि श्रद्धा तो तब होगी जब अनुभव होगा। बिना अनुभव के करोगे, झूठी होगी, दो कौड़ी की होगी--विश्वास होगी, श्रद्धा नहीं होगी। और विश्वास का कोई मूल्य नहीं है। श्रद्धा बहुमूल्य है, विश्वास उधार है। तुम्हारे पिता मानते हैं, सो तुमने मान लिया। विश्वास के पीछे डर है, कि कहीं नरक में न सड़ना पड़े। विश्वास के पीछे लोभ है कि मानेंगे तो स्वर्ग में वैकुंठ में जगह मिलेगी। विश्वास चालबाजी है। विश्वास आदमी की राजनीति है। श्रद्धा बड़ी और बात है। विश्वास से श्रद्धा का कोई भी संबंध नहीं। विपरीत हैं दोनों।
अकसर ऐसा होता है, विश्वासी कभी श्रद्धालु नहीं हो पाता। खोज ही नहीं करता। मानकर ही बैठ रहा। फिर श्रद्धालु कौन होता है? जिसके भीतर आश्चर्यविमुग्ध होने की क्षमता शेष रहती है; जो छोटे बच्चों की भांति विस्मय में डूब जाता है।
छोटे बच्चों को फिर से गौर से देखना। एक तितली उड़ जाती है और बच्चा दौड़ पड़ा। भूल गया सब काम-धाम। तुम लाख चिल्लाओ कि होम-वर्क पड़ा है, बच्चे को तितली ने मोहित कर लिया। चला तितली के पीछे। तितली के रंगों ने बच्चे को घेर लिया। एक फूल खिला है और बच्चा ठिठक जाता है। एक पक्षी बोलने लगता है और बच्चे के कान तत्पर हो जाते हैं। शिक्षक कहता है स्कूल मेंः "क्या बाहर ध्यान लगा रहे हो? यहां ब्लैकबोर्ड की तरफ देखो।' और बाहर कोयल बोल रही है!
मेरे खुद के दिन स्कूल के दिनों में अकसर बाहर बीते। क्योंकि शिक्षक मुझे नाराज होकर बाहर ही कर दे। बाहर ही खड़े रहो। लेकिन मैं  प्रसन्न था बाहर खड़े होने में। क्योंकि बाहर सच में बहुत सुंदर था। मैंने उसे दंड नहीं माना। मैंने उसे पुरस्कार ही माना। एक शिक्षक मुझे निरंतर बाहर कर देते थे तो मैं कक्षा में आने के पहले ही उनसे पूछ लेता, अगर बाहर ही करना है तो मैं बाहर ही रहूं।
बच्चे जैसी विस्मय-विमुग्धता चाहिए, श्रद्धा अपने-आप पक जाएगी। श्रद्धा विस्मय-भाव का ही अंतिम परिणाम है; उसका ही फल है। विस्मय रहे तो जीवन में प्रेम बहता रहता है। सब तरफ बहता रहता है! आकाश में उठे मेघ उस प्रेम को पुकार लेते हैं। सागर में उठी लहरें उस प्रेम को पुकार लेती हैं। उस प्रेम को निरंतर निमंत्रण मिलते रहते हैं परमात्मा के द्वारा। अनेक-अनेक ढंग से परमात्मा चिट्ठियां लिखता है तुम्हें, प्रेम-पाती लिखता है। मगर उनको ही मिलती हैं वे पातियां जिनका विस्मय-भाव जीवित रहता है। जिनका विस्मय मर गया, उनके हृदय जड़ हो जाते हैं। फिर उनकी जिंदगी दो कौड़ी की है। फिर वे धन इकट्ठा करते हैं, पद इकट्ठा करते हैं, और कुछ भी नहीं पाते। खाली के खाली मर जाते हैं। उनके भीतर वे बिल्कुल खोखले होते हैं। डालडा के खाली डब्बे...डालडा भी नहीं और डब्बे भी पिचक गए। क्योंकि जब खाली हों तो कितनी देर तक बिना पिचके रह सकते हैं।
एक लघु अणु है,
कि जो साधो उसे--सधता नहीं है;
शक्ति का उद्दाम निर्झर है
कि जो बांधो उसे--बंधता नहीं है
कहां है विश्राम?--श्रम भर है।
एक लघु पल है
कि जो रोको उसे --रुकता नहीं है
छूटता है तीर पीछे तीर
पर वह काल का तूणीर है--चुकता नहीं है।
एक गति अविराम क्रम भर है।
किंतु श्रम की श्रृंखला के
और क्रम की अर्गला के बीच
हैं कुछ प्यार के क्षण भी--
कि जो बीते नहीं होते
अश्रु के ये बिंदु ऐसे सिंधु हैं
रीते नहीं होते
बीतना चुकना कि भ्रम भर है।
कहां है विश्राम?--श्रम भर है।
एक गति अविराम क्रम भर है।
बीतना चुकना कि भ्रम भर है।
जिसके जीवन में प्रेम नहीं है उसके जीवन में बस बीतना और चुकना, आना और जाना, जन्मना और मरना...। जीवन नहीं घटता। जीवन तो केवल उनके जीवन में घटता है, जहां प्रेम है, जहां विस्मय-विमुग्ध आंखें हैं, जहां चकित हृदय है। चौंका! बच्चे जैसा!
घास के ऊपर जमी हुई ओस को सरकती हुई बूंद पर्याप्त है--श्रद्धा से भर जाने के लिए।
ज़मीन से फूटता हुआ नया-नया अंकुर पर्याप्त है--श्रद्धा से भरने के लिए।
श्रद्धा के लिए कमियां नहीं हैं आधारों की। अगर कमी कहीं होगी तो तुम्हारे विस्मय-विमुग्ध भाव में होगी। और मनुष्य की सबसे बड़ी मूढ़ता है कि वह ज्ञानी बन जाता है। और जितना ज्ञानी बन जाता है उतना विस्मय मर जाता है। फिर वह हर चीज को जानता है। फिर उससे कुछ भी पूछो उसके पास उत्तर है।
ऐसी कुछ जगह खोजो, जहां तुम निरुत्तर हो जाते हो। बस वहीं से श्रद्धा आएगी। वे ही द्वार हैं श्रद्धा के।
प्रेम ऐसी जगह है, जहां से श्रद्धा उमगती है, आती है। क्योंकि प्रेम ज्ञान में नहीं समाता। प्रेम को अब तक जाना नहीं जा सका है। लोग जीए, लोगों ने अनुभव किया; लेकिन जाना नहीं जा सका है। प्रेम की कोई परिभाषा भी नहीं कर सका है कि प्रेम क्या है। अगर तुम्हारी जिंदगी में गणित ही गणित है, तो कहां विश्राम?--श्रम भर है। और अगर तुम्हारी जिंदगी में दौड़ ही दौड़ है...
          एक लघु पल है
          कि जो रोको उसे--रुकता नहीं है
          छूटता है तीर पीछे तीर
          पर वह काल का तूणीर है--चुकता नहीं है
          एक गति अविराम क्रम भर है।
फिर तुम एक श्रृंखला हो पलों की। एक पल गया, दूसरा पल आया। एक जन्म गया, दूसरा जन्म आया। फिर तुम एक कड़ी मात्र हो पलों की। फिर तुम समय मात्र हो। समय की एक धार मात्र हो। लेकिन तुम्हारे जीवन में कोई अर्थ नहीं। एक अर्थहीन क्रम...।
          किंतु श्रम की श्रृंखला के
          और क्रम की अर्गला के बीच
          हैं कुछ प्यार के क्षण भी--
          कि जो बीते नहीं होते
          अश्रु के ये बिंदु ऐसे सिंधु हैं
          रीते नहीं होते
          बीतना चुकना कि भ्रम भर है।
प्रेम के क्षणों में ही परमात्मा का प्रमाण मिलता है। तर्क प्रमाण नहीं देता, प्रेम प्रमाण देता है। प्रेम करो। किसी को भी प्रेम करो। पत्नी को करो, पति को करो। बच्चों को करो, पर प्रेम करो!
यहां लोग मेरे पास आ जाते हैं। वे कहते हैं, यह कैसा आश्रम है, कि यहां लोग एक-दूसरे को गले भेंटते दिखाई पड़ते हैं, आलिंगन करते दिखाई पड़ते हैं! उनकी दृष्टि में आश्रम का अर्थ होता है--रूखे-सूखे, मुर्दा लोग झाड़ों के नीचे बैठे हुए हैं। मर ही गए हैं। कुछ नहीं बचा है उनके भीतर। बस बैठे हैं, राह देख रहे हैं, कब परमात्मा वैकुंठ में बुला ले। और इनको क्या करेगा वैकुंठ में? थोड़ा सोचो तो! कोई वैकुंठ खराब करना है? वैकुंठ की रौनक मिटानी है? तुम्हारे सब महात्मा अगर वैकुंठ में पहुंच जाएं तो वैकुंठ की दुर्दशा हो जाएगी। कोई बिछा लेगा कांटे वहां और लेट जाएगा; कोई जमा लेगा धूनी, कोई लपेट लेगा राख; कोई सिर के बल शीर्षासन करने लगेगा; कोई योगासन करने लगेंगे; कोई उपवास करने लगेंगे; कोई देह को सुखा लेंगे।
तुम्हारे ज़रा सब महात्माओं को इकट्ठा तो करलो, शिव जी की बारात होगी। वह शिव जी भी इनको बर्दाश्त कर जाते हैं गांजे में, नहीं तो वह भी नहीं कर सकते।...दम मारो दम! वह पिए बैठे रहते हैं। वह शायद इसीलिए पीते हों कि यह बारात से कौन...इसमें एक से एक महात्मा हैं बारात में। जितने इरछे-तिरछे आदमी हो सकते हैं, अस्वस्थ, रुग्ण, विक्षिप्त...।
यहां लोग आ जाते हैं तो उनको बहुत हैरानी होती है। यहां प्रेम प्रार्थना है। यहां विस्मय-विमुग्ध छोटे-छोटे बच्चों की भांति जीना, साधना है। और मैं किसी भी प्रेम के विपरीत नहीं हूं, क्योंकि मेरी दृष्टि में सारे प्रेम एक ही इंद्रधनुष के हिस्से हैं। देह का जो प्रेम है वह भी परमात्मा के प्रेम की तरफ ले जाने का एक उपाय है। पहली सीढ़ी, पहला सोपान।
प्रेम की बहुत ऊंचाइयां हैं, लेकिन शुरू तो वहां से करना पड़ेगा जहां तुम हो। पति हो, पत्नी को प्रेम करो। पत्नी हो, पति को प्रेम करो। मित्र को प्रेम करो। बेटे को प्रेम करो। मां को प्रेम करो। प्रेम करो! और ऐसा गहन प्रेम करो, इतना उद्दाम प्रेम करो, कि जब तुम अपने बेटे को प्रेम करो, तुम्हारा प्रेम बेटे की देह को पार कर के उसकी आत्मा को देखने लगे। पारदर्शी हो, इतना गहरा हो कि प्रवेश कर जाए उसके अंतर्तम में। तुम्हारे बेटे में तुम्हें परमात्मा मिल जाएगा। तुम्हारी पत्नी में तुम्हें परमात्मा मिल जाएगा। तुम्हारे पति में तुम्हें परमात्मा मिल जाएगा। और जब तक प्रेम में न मिलेगा, तब तक पत्थरों में मिलनेवाला नहीं है। और जिसको प्रेम में मिल जाएगा, उसे पत्थरों में मिल जाएगा। जब देह में मिल सकता है, तो देह पत्थर ही तो है, मृत्तिका है, मिट्टी है।
तुम पूछते होः मैं स्वयं परमात्मा पर श्रद्धा नहीं कर पाता हूं।
छोड़ो भी परमात्मा को! "फिर मेरे लिए उपाय क्या?' तुम विस्मय करो! तुम ज्ञान को झड़ा दो!
डी० एच० लारेंस एक बगीचे में घूमता था। एक छोटा बच्चा साथ था। लारेंस महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक था इस सदी में। उन थोड़े-से लोगों में, जो कभी भी नहीं समझे जाते! उन थोड़े-से लोगों में, जिन्हें हमेशा लोग गलत समझते हैं। उस बच्चे ने...जैसे बच्चों की आदतें होती हैं, बच्चे ही ऐसे अद्भुत प्रश्न पूछ सकते हैं। बूढ़े तो कचरा प्रश्न पूछते हैं। उनके प्रश्न भी झूठे होते हैं, किसी किताब में से होते हैं। उस बच्चे ने चकित भाव से चारों तरफ देखा, हरियाली और हरियाली! उसने लारेंस से पूछा कि सुनिए, आप बड़े कवि हैं न! एक बात का उत्तर देंगे? वृक्ष हरे क्यों हैं? व्हाय दि ट्रीज़ आर ग्रीन?
अब क्या उत्तर दोगे? अच्छा हुआ, लारेंस कवि था। अच्छा हुआ कि लारेंस कोई वैज्ञानिक नहीं था। अच्छा हुआ कि लारेंस कोई प्रोफेसर नहीं था, अच्छा हुआ कि पंडित नहीं था; नहीं तो पंडित तो छोड़ते ही नहीं। वह कहता है कि क्लोरोफिल के कारण वृक्ष हरे हैं। बात खत्म हो जाती है। किस बुरी तरह मर जाती है! और अगर बच्चा रुक जाता वहीं तो बात खत्म हो गई थी। बच्चे आमतौर से रुकते नहीं। अगर तुम कहो कि क्लोरोफिल के कारण वृक्ष हरे हैं, तो बच्चा पूछेगा क्लोरोफिल हरा क्यों है? अगर बच्चा सच में बच्चा है, तो इतनी जल्दी रुकने वाला नहीं है।
लारेंस थोड़ी देर खड़ा रहा; उसने वृक्ष देखे, बच्चे को देखा और उसने कहा कि भाई वृक्ष हरे हैं, क्योंकि हरे हैं। बच्चे ने कहाः यह बात ठीक है। बिल्कुल ठीक है। वृक्ष हरे हैं क्योंकि हरे हैं। ट्रीज़ आर ग्रीन, बीकाज़ दे आर ग्रीन।
यह कोई उत्तर तो नहीं है। मगर यही उत्तर है! इसमें एक विस्मय-विमुग्ध भाव है। इसमें एक अस्वीकार है रहस्य का। वृक्ष हरे हैं क्योंकि हरे हैं!
जिस दिन तुम विस्मय-विमुग्ध भाव से देखोगे जगत् को, धीरे-धीरे कब किस अनजान क्षण में बिना द्वार पर दस्तक दिए श्रद्धा हृदय तुम्हारे हृदय में आ जाएगी, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।

तीसरा प्रश्नः आप नित नयी-नयी बातें कहे चले जाते हैं। इससे बड़ी उलझन होती है--क्या मानें और क्या न मानें?

उलझन तो होगी ही। कसूर मेरा नहीं। कसूर तुम्हारा है। तुम मानने के पीछे पड़े हो। तुम कहते होः क्या मानें, क्या न मानें? जो मानने के पीछे पड़ा है, वह तो बहुत मुश्किल में पड़ जाएगा, मेरे पास। क्योंकि मैं मानने के तुम्हें आधार ही नहीं दे रहा हूं। मैं तो मानने के सब आधार छीने ले रहा हूं, ताकि जानना घट सके। मैं तो विश्वास खंडित कर रहा हूं, ताकि श्रद्धा जन्मे।
मानना! तो अर्थ हुआ--आप कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे, माने लेते हैं। लेकिन इस मानने से तुम्हारा हृदय-कमल कैसे खिलेगा? यह तो जबर्दस्ती हुई। यह तो पाखंड हुआ। माननेवाले सब पाखंडी हो जाते हैं। इसलिए तथाकथित विश्वासी--वे हिंदू हों, कि मुसलमान कि ईसाई--सब पाखंडी होते हैं। सिर्फ जाननेवाले पाखंडी नहीं होते।
मैं तो जानकर ऐसी बातें कहता रहता हूं, ताकि तुम मान न सको। इसलिए मैं असंगत हूं--जान-बूझकर। एक दिन कहूंगा कुछ, दूसरे दिन ठीक उससे उलटी बात कहूंगा। क्योंकि मैं जानता हूं तुम्हारी मनोदशा। तुम जानने में उत्सुक नहीं हो, तुम मानने में उत्सुक हो। मानना सस्ता है, उधार है।
मेरे पास लोग आ जाते हैं। वे कहते हैंः "हम ध्यान क्यों करें? अब आप तो पहुंच गए। अब आप जो कहते हैं, ठीक ही कहते होंगे।' लेकिन मेरा देखा तुम्हारा देखा तो नहीं है! और ये वे ही लोग हैं, अगर मैं इनसे कहूं "तो फिर ठीक, प्यास जब मुझे लगती है, मैं पानी पी लेता हूं, अब तुम मत पीना'--तो राजी नहीं होते! कहते हैं, यह कैसे होगा? मैं पियूंगा तो मेरे कंठ की प्यास  बुझती है; तुम जानोगे तो तुम्हारे हृदय की प्यास बुझेगी। तुम इसको ही तो मानकर न रुक जाओगे, मुझे क्या जरूरत है भोजन की! किसी ने भोजन कर लिया है, इससे क्या होगा? तुम पेट को ऐसे धोखा तो न दे पाओगे! मैं स्नान करूंगा, तो मैं ताजा होऊंगा। और वह तो ताजगी का अंतस में अनुभव होता है, वह तुम मुझे स्नान करते हुए भी देखकर नहीं कर पाओगे। कैसे? वह तो भीतर का अनुभव है। मैं नाचूंगा तो मैं जानूंगा कि भीतर क्या घटता है।
लेकिन यह हमारी सदी, बहुत कुछ दर्शकों की सदी हो गयी है। लोग देख रहे हैं। लोग बड़ी अजीब स्थिति में हैं। बस लोग दर्शक हो गए हैं। दो आदमी कुश्ती लड़ते हैं--लाखों लोग देखने पहुंच जाते हैं! कुश्ती का मजा करना हो तो कुश्ती करो, देखने में क्या जाना है! दो आदमी कुश्ती करेंगे, उनके भीतर क्या फलित होगा--तुम्हें तो पता चलेगा नहीं बाहर से। फुटबाल का मैच हो रहा है, लाखों लोग इकट्ठे हैं। क्रिकेट का मैच हो रहा है, बस चले लोग। लोग दर्शक हो गए हैं। टेलिविजन के सामने बैठे हैं घंटों, जैसे गोंद से चिपका दिए गए हों, उठ ही नहीं सकते। अटके हैं वहीं। आंखें, टकटकी लगी हुईं। फिल्म में बैठे हुए हैं जाकर। कोई अभिनेता प्रेम कर रहा है, वे देख रहे हैं। तुम प्रेम कब करोगे? देखते ही रहोगे? और यह अभिनेता भी झूठा प्रेम कर रहा है, इसको भी पैसे मिले हैं। यह भी कोई सच्चा प्रेम नहीं कर रहा है। यह भी दिखावा कर रहा है। यह मजा तो देखो, कैसा खेल हो रहा है! एक दिखावा कर रहा है। कुछ लेना-देना नहीं है उसे प्रेम से। और तुम देखकर बड़े आनंदित हो रहे हो।
ज्यांपाल सार्त्र के एक उपन्यास में एक आदमी कहता है कि जल्दी ही वे दिन आएंगे, जब लोग प्रेम भी अपने नौकरों से करवा लेंगे। कौन झंझट करेगा! जिनके पास सुविधा है, वे खुद ही प्रेम करने की झंझट उठाएंगे? रख लिया एक निजी सचिव। वह रहा साथ-साथ। मिली पत्नी, उसने जल्दी से आलिंगन कर लिया--तुम्हारी तरफ से गरीब आदमी खुद करते हैं, अमीर आदमी नौकर रख सकता है। वही चल रहा है। ज्यांपाल सार्त्र का पात्र झूठी बात नहीं कह रहा है। वही हो रहा है। लोग फिल्म देखकर रस ले लेते हैं। लोग दर्शक हो गए हैं।
बुद्ध को ज्ञान हुआ, तुमने कहाः अहा! देख आए, दर्शन कर आए बुद्ध के--हो गया। ऐसे नहीं होगा।
जीवन को जियो। जीवन को उसकी समग्रता में जियो। मैं नहीं चाहता कि तुम मेरी बातें मानो। तुम्हारी बड़ी उत्सुकता है। मुझसे लोग आकर कहते हैं कि एक छोटी-सी गुटिका लिख दें। जैसी ईसाइयों की होती है न, छोटी-सी गुटिका। उसमें सब सार की बातें आयी होती हैं--क्या मानो, क्या करो, कितनी आज्ञाएं हैं? सब उसमें, छोटी-सी गुटिका में आ जाती है। छोटी-सी गुटिका लिख दें, जिससे कि सब साफ-साफ पता हो जाए कि आपकी धारणा क्या है।
मेरी कोई गुटिका नहीं हो सकती। गुटिकाएं सब झूठी हो जाती हैं, क्योंकि लोग उनको मानने लगते हैं। मैं तुम्हें मानने के लिए अवसर नहीं देना चाहता। तुम मानोगे,जैसा ही मैं देखूंगा तुमने कोई बात मानी, मैं तुम्हारे पैर के नीचे की जमीन खींच लूंगा। मैं फिर तुम्हें छोड़ दूंगा अधर में।
मैं चाहता हूं ऐसी घड़ी आए, जिस दिन तुम जानो। इसलिए रोज नयी बात कहता हूं। रोज बदलता हूं। संगति की मुझे चिंता नहीं है। मैं कोई दार्शनिक नहीं हूं। यह तुम मेरे पास बैठे हो तो तुम किसी विचारक के पास नहीं बैठे हो। यहां एक प्रयोग चल रहा है। यह एक प्रयोगशाला है।
मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि "आपके आश्रम में जगह-जगह गार्ड क्यों खड़े हैं? मुक्तानंद के आश्रम में तो गार्ड नहीं हैं।' वहां कुछ हो ही नहीं रहा है, गार्ड की जरूरत ही नहीं है। यह प्रयोगशाला है। यहां जीवन बनाए और बदले जा रहे हैं। यहां बाजार नहीं है कि हर कोई चला आए। जितनी बहुमूल्य बात हो रही है, उतने ही गार्ड बढ़ते जाएंगे। जैसे-जैसे यह प्रयोग गहरा होगा, गार्ड बढ़ते जाएंगे। क्योंकि तमाशबीनों की यहां कोई जगह नहीं रह जाएगी। तमाशबीन उपद्रव हैं। उनकी मौजूदगी खलल बनती है। कुछ लोग ध्यान कर रहे हैं और पचास आदमी आकर तमाशबीन की तरह खड़े हो गए। ये उनको ध्यान नहीं करने देंगे। इनकी मौजूदगी, इनकी बातें, इनका व्यवहार; उनके ध्यान में बाधा बन जाएगा। गार्ड तो यहां बढ़ते जाएंगे, क्योंकि जैसे-जैसे यह प्रयोग गहरा होगा, और जैसे-जैसे तुम और अंतर्यात्रा पर जाओगे, वैसे-वैसे मैं दुनिया से तुम्हें बिल्कुल तोड़ दूंगा। जब तक तुम प्रयोग के भीतर हो, तब तक दुनिया अलग, तुम अलग, ताकि कोई व्यवधान न हो।
मुक्तानंद के आश्रम में हो क्या रहा है? वहां गार्ड की जरूरत क्या है? वहां तो इस बात की फिक्र है कि कोई भी आ जाए ऐरा-गैरा-नत्थूखैरा, आओ! यहां ऐरे गैरे-नत्थूखैरों से बचने का उपाय है। उनको नहीं आने दिया जाएगा। यहां तो जो जीवन को रूपांतरित करने के लिए आतुर हैं, उसको भी बामुश्किल प्रवेश है! उसके लिए भी हर तरह की कठिनाई है। क्योंकि उतनी परीक्षा देने को जो राजी नहीं है, आगे की परीक्षाओं में बहुत मुश्किल हो जाएगी।
पुराने दिनों में तिब्बत के आश्रम में जब कोई प्रवेश होता था तो प्रवेश के पहले ही सारी परीक्षाएं उसे देनी पड़ती थीं।
एक छोटा बच्चा एक आश्रम में प्रवेश होने को गया। उसके पिता चाहते थे--बचपन से ही उसमें एक प्रतिभा थी, अनूठी प्रतिभा थी, ज्योति थी, चमक थी--कि वह संसार में खो न जाए, उसकी ज्योति बढ़े, उसकी चमक बढ़े, उसकी प्रतिभा निखरे। उसे आश्रम भेजा। उसे आश्रम के द्वार पर बिठा दिया गया और कहा गया, आंख बंद रखो। उसकी उम्र ज्यादा से ज्यादा दस साल है। आंख बंद रखो। आंख खोलना मत, चाहे कुछ भी हो जाए। अगर आंख खोली, तो प्रवेश नहीं मिलेगा। और कितने देर बाद तुम बुलाए जाओगे, कुछ कहा नहीं जा सकता। घंटे लग सकते हैं, दिन भी लग सकते हैं। मगर यह तुम्हारी परीक्षा है--धैर्य की, संतोष की, स्वीकार की।
वह बच्चा आंख बंद करे बैठा है। अब छोटे बच्चे को आंख बंद करके बैठना बड़ी कठिन बात है, बहुत कठिन बात है! सबसे कठिन बात यही है। जैसे बड़े आदमियों को आंख खोलकर बैठना कठिन बात है। हजार चीजें बुलाती हैं। एक कुत्ता निकल गया भौंकता हुआ। अब उसका दिल होता है कि देख तो लें, किसका कुत्ता है! क्या मामला है! कैसा कुत्ता है! सड़क पर झगड़ा होने लगा, पास से लोग गुजर रहे हैं, लोग अंदर-बाहर आ-जा रहे हैं, पर वह आंख बंद किए बैठा है दरवाजे पर। वह हिलता-डुलता नहीं, वह पत्थर की तरह बैठा है। अट्ठारह घंटे बाद बुलाया गया। भूखा-प्यासा वह बैठा है आंख बंद किए। कोई उसको देख रहा है कि वह आंख खोलता नहीं। अट्ठारह घंटे उस बच्चे ने आंख बंद रखी! गहन प्रमाण दे दिया कि कोई साधारण बच्चा नहीं है। फौलाद का बना है। जरूरत पड़ेगी तो आग से गुजर सकेगा। गुरु स्वयं आया और उस बच्चे को हाथों में उठाकर लेकर भीतर गया। स्वीकार हो गया।
यहां तो गार्ड होंगे। यहां कोई बाजार नहीं है, नुमायश नहीं है। यहां हर किसी के लिए निमंत्रण नहीं है। यहां जीवन की प्रयोगशाला है। क्या तुम सोचते हो, जहां अणुबम बनाए जाते हैं वहां मुक्तानंद के आश्रम जैसी हालत होगी, कि जिसकी मरजी हो भीतर चला जाए, और आ जाए और जिसको जो करना हो करे।...कि लोग घूम रहे हैं तमाशबीन की तरह कैमरे लिए, उतार रहे हैं फोटुएं। जहां अणुबम बनाए जाते हैं वहां मीलों तक किसी का प्रवेश नहीं हो सकेगा। क्या तुम सोचते हो, आत्मा की कीमत अणु से कम है? क्या तुम सोचते हो आत्मा का विस्फोट अणु के विस्फोट से छोटा विस्फोट है?
मुक्तानंद इत्यादि के आश्रमों में जो रहा है, कूड़ा-करकट है। उसका कोई मूल्य नहीं है। जहां मूल्य की कोई बात घट रही हो, जहां हीरों पर चमक लायी जा रही हो, वहां तो पहरेदार होंगे। वहां हर किसी का प्रवेश नहीं होगा। वहां तो अड़चन होगी।
मैं यहां एक प्रयोग करने को उत्सुक हूं। जो मुझे हुआ है चाहता हूं तुम्हें भी हो जाए। हो सकता है। तुम्हारे भीतर पड़े बीज को देखता हूं। तुम्हारी क्षमता को देखता हूं। तुम्हारी गरिमा को देखता हूं। और यह भी देखता हूं कि तुम्हें इसका कुछ पता नहीं है। तुम मानने को उत्सुक हो। तुम कहते होः आप जल्दी से हमें बता दें कि क्या सत्य है, हम मानेंगे। तुम लकीर के फकीर होना चाहते हो। मेरी उत्सुकता तुम्हें लकीर के फकीर बनाने की नहीं है। मैं तुम्हें अपने अनुयायी नहीं बनाना चाहता। मैं तुम्हें अपने जैसा बनाना चाहता हूं। भेद को तुम ठीक से समझ लेना। मैं नहीं चाहता कि बौद्ध हो जाओ--मैं चाहता हूं तुम बुद्ध हो जाओ। मैं नहीं चाहता कि तुम जैन हो जाओ--मैं चाहता हूं तुम जिन हो जाओ। मैं नहीं चाहता हूं तुम जीसस हो जाओ--मैं चाहता हूं तुम क्राइस्ट हो जाओ।
सिद्ध क्या करना है फिर मुझे? फिर मुझे कुछ सिद्ध भी नहीं करना है। मैं कुछ सिद्ध नहीं कर रहा हूं यहां--कि ईश्वर है या नहीं है, कि आत्मा है या नहीं है? यह सब बातचीत की बातचीत है, हवाओं का खेल है।
सिद्ध क्या करना है मुझेः
          जो आज गाता हूं, कल नहीं गाता
          आज का गीत कल
          कंठ में ही नहीं आता
          ज़िद भी नहीं है कोई
          कि दोहराऊंगा नहीं
          आज की कही बात या
          कल नहीं बैठूंगा आज से ठीक
          उल्टा ही कुछ कल के दिन
          आज की बात कही बात या
          कल नहीं कह बैठूंगा आज से ठीक
          उल्टा ही कुछ कल दिन के लिए।
          सिद्ध कुछ करना नहीं है मुझे
          इसलिए सहज है कह देना
          अपनी कही हुई किस-किस बात पर अड़ूं
          कितनी उल्टी-सीधी बातें कर चुका हूं
          जब से बातें की हैं
          मैंने दिनों तक की रातें की रातें की हैं
          रातें की हैं मैंने दिनों तक की
          इसलिए युगों को तो छोड़ो,
          छिनों तक की गांठें मैं नहीं बांधता
          खुश हैं मेरी इस मसलहत से
          रात और दिन और सपने
          और मैं भी इसीलिए मुक्त हूं
          दिन और रात और सपने
          रोज नए होकर आते हैं
          कल नहीं सुना पाए थे जो वे गाकर
          उसे आज गाकर सुनाते हैं!**त्र्!)ध्****त्र्!)इ१४)१०**
तुम चिंता ही मत करो कि मैंने कल क्या कहा था। तुम कल से मेरे आज को तौलो मत। तुम मेरा प्रयोजन समझो। ये वक्तव्य तुम्हें कुछ सिद्धांत देने को नहीं हैं। ये वक्तव्य तुम्हारी साधना का अंग हैं। ये तुम पर चोटें हैं। इस तरह तुम्हारे ज्ञान को गिराया जा रहा है, ताकि विस्मय मुक्त हो जाए।
तो कभी मैं आस्तिक के खिलाफ बोलता हूं, क्योंकि आस्तिक हैं यहां लोग। कभी मैं नास्तिक के खिलाफ बोलता हूं, क्योंकि कुछ नास्तिक भी आ जाते हैं। तब तुमको लगेगा, मैं एक-दूसरे के विपरीत बातें कह रहा हूं। लेकिन मैं एक ही काम कर रहा हूं।
बुद्ध एक सुबह एक गांव में प्रवेश किए। एक आदमी ने पूछाः क्या ईश्वर है? बुद्ध ने कहा कि नहीं, बिल्कुल नहीं! उसी दिन दोपहर एक दूसरे आदमी ने पूछाः ईश्वर है या नहीं? बुद्ध ने कहाः है, और सिर्फ ईश्वर है! और उसी सांझ एक तीसरे आदमी ने पूछा कि ईश्वर के संबंध में कुछ कहेंगे? और बुद्ध चुप रहे, कुछ न बोले। बोले ही नहीं। आंख बंद कर ली। वह आदमी भी आंख बंद करके थोड़ी देर बैठा रहा फिर चरण छूकर चला गया।
आनंद--बुद्ध का शिष्य--इन तीनों घटनाओं को देखा। उसके भीतर तो धमाचौकड़ी मच गयी, जैसी तुम्हारे भीतर मची है। उसने कहाः यह तो हद हो गयी कि एक ही दिन में, सुबह कहा "नहीं', दुपहर कहा "है' और सांझ बोले ही नहीं, चुप ही रह गए, न "हां' कहा न "ना' कहा, वक्तव्य नहीं दिया! वक्तव्य न देने का अर्थ है कि अवक्तव्य है। मौन से उत्तर दिया। ये तो तीन बातें हो गयीं--बड़ी विपरीत हो गयीं! इससे ज्यादा विपरीत और क्या होगा! उसको रात नींद न आए। वह करवट बदले। बुद्ध ने कहाः आनंद! आज तू बड़ी करवट बदलता है, बात क्या है? वह उठकर बैठ गया। उसने कहाः आप बदलवा रहे हैं। धमाचौकड़ी मची है। मेरे चित्त में बड़ा विभ्रम पैदा हो गया है। फिर ईश्वर है या नहीं?
बुद्ध ने कहाः आनंद! तीनों उत्तरों से कोई भी उत्तर तेरे लिए दिया नहीं गया था, तूने लिया क्यों? वे तीनों प्रश्नों में से कोई भी तेरा प्रश्न था नहीं, तो उत्तर तूने क्यों लिया? बीच से, हाथ से चीजें नहीं झपटनी चाहिए। जिसको दिया गया हो, जिसके लिए दिया हो, उसके लिए है।
मगर आनंद ने कहा कि मैं बहरा नहीं हूं। मैंने कुछ लिया-करा नहीं, लेकिन सुनाई तो मुझे पड़ा ही। मैं मौजूद था। दुर्भाग्य मेरा कि मैं मौजूद था। सुबह भी सुन लिया, दोपहर भी सुन लिया, शाम भी सुन लिया। अब मेरे भीतर यह मुश्किल खड़ी हो गयी है कि मामला क्या है? सच्चाई क्या है? वस्तुतः यथार्थ क्या है?
बुद्ध ने कहाः मैंने एक ही उत्तर दिया तीनों को। तेरे समझने में भूल है।
आनंद ने कहाः अब और आप उलझा रहे हैं। एक ही उत्तर दिया था। क्योंकि सुबह जिसने पूछा था, वह आस्तिक था--झूठा आस्तिक, जैसे आस्तिक होते हैं। वह चाहता था मेरी गवाही। वह चाहता था मैं भी स्वीकृति दे दूं उसकी मान्यता को, ताकि अपनी मान्यता पर एक और हीरा जड़ दे, एक और। मोहर लगा दे; जाकर घोषणा करने लगे कि मैं जो कहता हूं वह ठीक है, बुद्ध भी यही कहते हैं। वह अपने अहंकार के लिए समर्थन चाहता था। और मैं उसका दुश्मन नहीं हूं; उसके अहंकार को समर्थन नहीं दे सकता। वह अपने अज्ञान का समर्थन चाहता था। उसे ईश्वर का कोई पता नहीं है, लेकिन मानता है। वह अपनी मान्यता का समर्थन चाहता था। मैं किसी की मान्यता का समर्थन नहीं कर सकता हूं। मान्यता का तो अंत करना है। जहां मानने का अंत होता है वहां जानने का प्रारंभ है। इसलिए मैंने जोर देकर कहा कि ईश्वर? नहीं है! बिल्कुल नहीं है! और दोपहर जो आदमी आया था वह उससे उलटा, आदमी था, वह मानता था कि ईश्वर नहीं है। वह उसकी मान्यता थी कि ईश्वर नहीं है। मैंने उसकी भी मान्यता छीनी। कहा कि ईश्वर है--और ईश्वर ही है! और सांझ जो आदमी आया था, उसकी कोई भी मान्यता नहीं थी। इसलिए उसे उत्तर देने की कोई जरूरत न थी। सत्संग में बैठ गया। वह उत्तर मांगने आया ही नहीं था। वह तो मेरा स्वाद लेने आया था। वह मेरे शून्य का संगीत सुनने आया था। वह चाहता था घड़ीभर को मुझसे जुड़ जाए, तार से तार मिल जाए। उससे मैंने अपने तार मिलाए इसलिए वह पैर छूकर गया। वह अहोभाव से भरा हुआ गया। मैंने उसे यही उत्तर दिया है कि मौन ही उत्तर है। मौन ही परमात्मा है। पूछनेत्ताछने की बात नहीं, मान्यता की बात नहीं, सिद्धांत की बात नहीं।
मैं जो भी वक्तव्य दे रहा हूं, वे कुछ सिद्ध करने के लिए नहीं हैं--सिर्फ तुम्हारे भीतर से मान्यताओं को छीन लेने के लिए हैं। मेरे वक्तव्य फावड़ों की तरह हैं, तुम्हारे भीतर से ज्ञान के कचरे को हटाने में लगे हैं। मैं चाहता हूं तुम्हें शून्य कर दूं, तुम्हारा ज्ञान सब छिन जाए।
रमण महर्षि से एक जर्मन विचारक ने पूछाः मैं आपके पास कुछ सीखने आया हूं। रमण ने कहाः फिर तुम गलत जगह आ गए। कहीं और जाओ। क्योंकि यहां सिखाते नहीं, सीखे को भुलाते हैं। हम तो सीखे हुए जो आते हैं, उनकी सिखावन छीन लेते हैं, ताकि वे खाली हो जाएं, कोरे हो जाएं, बच्चों जैसे निर्दोष हो जाएं। उसी निर्दोषता में अनुभव होता है।
रीते हो जाओ, तो पाहुना आ जाए। घर खाली करो ज्ञान से तो सत्य का अवतरण हो।
          अपने जी की बात क्या कहूं!
          रीते घर पाहुन पग धारे।
          अपनी आज बिसात क्या कहूं!
          रीते घर पाहुन पग धारे।
जब तुम्हारा घर बिल्कुल रीता होता है--ज्ञान से, त्याग से--सब से रीता होता है, जब तुम निपट रीतापन होते हो--इसको बुद्ध ने शून्यता कहा है, या पतंजलि ने समाधि कहा है; जब तुम्हारे भीतर कोई विचार की तरंग नहीं होती--न आस्तिक न नास्तिक; जब तुम निस्तरंग होते हो...
          अपने जी की बात क्या कहूं!
          रीते घर पाहुन पग धारे।
          अपनी आज बिसात क्या कहूं!
          आतप बीते आंगन में जब
          पहिले शीत समीरण आए
          मदिर गंध माटी की बिखरी
          अंग-अंग अंकुर उकसाए
          प्रीतम के इस प्रथम परस को
          कहो सखी, मैं बात क्या कहूं?

          सूरज डूबा, किरन सिधारी
          तिमिर घिरा, तारे भरमाए
          मेघरथी, आकाश-पथी तुम
          तड़ित-मुकुट माथे धर आए
          इस उजियारी अंधियारी को
          रात कहूं? री, रात क्या कहूं!

          मनभावन उपवन में आए
          बरसाए पावन करुना-कण
          मैं अपने में रह न सकी री
          उमड़ पड़े नैनों में सावन
          दृग-कोरों की रस-रिमझिम को
          यदि न कहूं बरसात, क्या कहूं!
मैं बरस रहा हूं। इसमें न कोई तर्क है न कोई संगति है।
          उमड़ पड़े नैनों में सावन
          दृग-कोरों की रस-रिमझिम को
          यदि न कहूं बरसात क्या कहूं!
          अपने जी की बात क्या कहूं!
          रीते घर पाहुन पग धारे
          अपनी आज बिसात क्या कहूं!
मैं नहीं हूं अब, अब वही है। तुम बीच में मुझे लो ही मत। जितना मेरे करीब आओगे उतना ही पाओगे--मैं नहीं हूं, वही है। और जितने उसको देखोगे, उतना ही पाओगे--तुम भी वही हो। तत्त्वमसि श्वेतकेतु! श्वेतकेतु, तू भी वही है!
छीनना है लेकिन बहुत कुछ कूड़ा-कचरा। तुम खूब भरे हो। यही भराव तुम्हारी बाधा है। तुम रीते हो जाओ, धन्यभाग का दिन आ जाए! वह परम चाहत का दिन आ जाए!
मानने-न-मानने की चिंता ही न करो। मुझे जब सुनते हो, तो ऐसे सुनो जैसे संगीत को सुनते हो। मानने-न-मानने की तो बात नहीं उठती न! तुम वीणा-वादक से यह तो नहीं कहते कि कल कुछ बजाया, आज कुछ बजाया--अब मैं क्या मानूं, क्या न मानूं? तुम वीणा-वाद से यह तो नहीं कहते। तुम कहते होः कल भी बजाया, आज भी बजाया। कल भी रस आया, आज भी रस आया। रसधार बह रही है, रसधार सघन हो रही है।
तुम मुझे ऐसे सुनो, जैसे संगीत को सुनते हो।
तुम मुझे ऐसे सुनो, जैसे जल-प्रपात की ध्वनि को सुनते हो, निर्झर को सुनते हो। तुम मुझे ऐसे सुनो जैसे आकाश में बादलों की गड़गड़ाहट को सुनते हो। तुम मुझे शब्दों की भांति मत सुनो। धीरे-धीरे तुम्हें शब्द के भीतर निःशब्द का संगीत अनुभव में आने लगेगा। धीरे-धीरे बोलने में तुम्हें अबोल दिखायी पड़ने लगेगा, दृश्य में अदृश्य का अनुभव होने लगेगा। और वही अनुभव प्रयोजन है। उसके लिए ही यह प्रयोगशाला है।

आखिरी प्रश्न ः भगवान्! ऐसी कौन-सी शक्ति या प्रेरणा है जो मनुष्य को भगवान् के करीब लाने में सहायक होती है?

राजेंद भाटिया! जीवन पर्याप्त है।
और जीवन के दो ढंग हैं और दोनों परमात्मा के करीब लाते हैं। जीवन का दुःख भी आदमी को परमात्मा के करीब लाता है और जीवन का सुख भी। और जो होशियार हैं वे दोनों पंखों का उपयोग कर लेते हैं। उन्हें दुःख भी पास लाता है, सुख भी पास लाता है। जीवन का दुःख बताता है कि हम परमात्मा से दूर हैं, इसलिए दुःखी हैं।
उसमें कैसा दुःख? हम अकड़ गए हैं। हम अहंकारी हो गए हैं। हमने अपने को पृथक् मान लिया है। वही हमारे दुःख का कारण है। हमारे सारे दुःख के मूल में अहंकार है, अस्मिता है। जीवन का दुःख बताता है कि हम परमात्मा से छिटक गए हैं दूर हो गए हैं। बीमारी बताती है कि हम प्रकृति से दूर हट गए हैं। स्वास्थ्य बताता है कि हम प्रकृति के पास आ गए।
सुख-दुःख मापदंड हैं, संकेत हैं। दुःख बताता है कि तुम जो कर रहे हो वह कुछ ऐसा है जो तुम्हें परम प्रकृति से दूर ले जा रहा है। दुःख इस बात की सूचना दे रहा है कि तुम दूर हट रहे हो प्रकृति से। धर्म से दूर हट रहे हो। धर्म से दूर हटने वाले को दंड नहीं दिया जाता--दूर हटने में ही दंड मिल जाता है। और जब जीवन में सुख होता है तो जानना कि तुम जाने-अनजाने परम प्रकृति के करीब आ गए हो। परम प्रकृति यानी परम धर्म, या कहो परमात्मा। ये सब नामों के भेद हैं। जो तुम्हें रुचिकर हो, वही कहो। अगर वैज्ञानिक बुद्धि के आदमी हो, कहो परम प्रकृति! अगर धार्मिक बुद्धि के आदमी हो, भत्ति-भाव से भरे, कहो परमात्मा! अगर गणित पर बहुत भरोसा है तो कहो--धर्म, नियम, ताओ! ये सब उसी एक की तरफ इशारे हैं अलग-अलग तरह के लोगों के, अलग-अलग ढंग के लोगों के।
तो पहली तो बात, दुःख उसके करीब लाता है।

यह जिंदगी है या कोई तूफान है।

हम तो इस जीने के हाथों मर चले।।
ज़रा अपनी जिंदगी को गौर से तो देखो! हम तो इस जीने के हाथों मर चले।
तुम्हें दिखाई पड़ता या नहीं दिखाई पड़ता? यहां तुम मर ही रहे हो। तो जरूर यह असली जिंदगी नहीं हो सकती। असली जिंदगी की तलाश करनी होगी। यहां कांटों के सिवा तुम्हें मिला क्या?

है ये दुनिया एक ही अफ़साना-ए-नाकामे-शौक़।

जिसने जो चाहा अलग तजवीज़ उंवां कर दिया।।
यह जिंदगी आकांक्षाओं और विफलताओं की एक लंबी कहानी है, और कुछ भी नहीं।

है यह दुनिया एक ही अफसाना-ए-नाकामे-शौक।
यहां सब की आकांक्षाएं भ्रष्ट होती हैं, नष्ट होती हैं, खंडित होती हैं। यहां सभी हारते हैं। यहां जीतता कोई भी नहीं। सिकंदर भी यहां हारते हैं। मौत खबर दे देती है आखिरी हार की। मौत के आने के पहले कितने उछलो-कूदो, जीत के बहाने कर लो, झंडे फहरा लो, मौत आती है सब झंडे गिर जाते हैं।

है यह दुनिया एक ही अफसाना-ए-नाकामे-शौक।

जिसने जो चाहा अलग तजवीज़ उन्वां कर दिया।।
फिर तुम शीर्षक कुछ भी दे दो इस जिंदगी को, मगर इस जिंदगी में सिवाय हार के और क्या है? इस जिंदगी में सिवाय दुःख के और क्या है? यह जिंदगी का एक पहलू है।

हां खाइयो मत फरेबे-हस्ती।

हरचंद कहें कि है, नहीं है।।
कितना ही भरोसा आंखें दिलवाएं कि है, धोखा मत खा जाना। आंखों से जो दिखाई पड़ता है वह अकसर सपना है। मन जो कहता है, दौड़ो इसके पीछे--मृगमरीचिका है।

हयात इक मुस्तक़िल ग़म के सिवा कुछ भी नहीं।

खुशी भी याद आती है तो आंसू बनके आती है।।
यहां तो सब दुःख से भरा हुआ है, सब आंसुओं से सना हुआ है।
है "सैफ' बस इतना ही तो अफ़साना-ए-हस्ती
आए थे परेशान, परेशान गए हम।।
और कहानी क्या है जिंदगी की?--आए थे परेशान, परेशान गए हम।।
जिंदगी का यह दुःख देखो। जिंदगी के इस दुःख के घाव को गहन होने दो। यह छाती में भाले की तरह चुभे तो तुम्हें परमात्मा की याद आनी शुरू हो जाएगी। तुम्हें खोजना ही पड़ेगा असली जीवन को, क्योंकि यह नकली है। नकली नकली की तरह दिखाई पड़ जाए, असली की खोज शुरू होती है। असार असार की तरह समझ में आ जाए, सार की खोज शुरू होती है।

क़ैदे हस्ती से कब निजात "जिगर'

मौत आई अगर हयात गई।।
यहां तो छुटकारा ही नहीं उपद्रव से, कारागृह से छूट ही नहीं मिलती।

क़ैदे-हस्ती से कब निजात "जिगर'
यहां अस्तित्व का कारागृह कभी छोड़ता ही नहीं तुम्हें। मौत आई अगर हयात गई। अगर जीवन गया तो मौत आई। मौत गई तो फिर जीवन आया। जीवन गया तो फिर मौत आई। तुम जीवन और मौत के इस चक्कर में घूम रहे हो--जन्म और मरण के चक्कर में, आवागमन में।
तो पहली तो बात यह है कि जिंदगी की व्यर्थता देखो। अभी परमात्मा की बात मत उठाओ। अभी तो तुम जहां हो वहां से ही विचार शुरू करो, जिंदगी का नरक देखो। तुम्हारी जिंदगी में कांटे ही कांटे हैं।

वो चीज़ ऐ ग़म गुसार जिसने हर एक इंसां को फूंक डाला।

तुझे शिकायत है मौत थी वो मुझे गुमां है हयात होगी।।
 जिंदगी है जिसने लोगों को बर्बाद किया, मौत नहीं। मौत भी तो जिंदगी का आखिरी कदम है, और क्या?
एक तो यह उपाय है, जिससे परमात्मा की तलाश शुरू होती है। एक दूसरा उपाय हैः जीवन का आनंद देखो, जीवन की खुशियां देखो, जीवन का रस देखो। दोनों यहां मिश्रित हैं। कांटे ही कांटे नही हैं, फूल भी खिले हैं।

कोई कली जहां खिल रही है

वहीं एक फूल भी मुर्झा रहा है।
मुर्झाते फूल को देखो, यह भी परमात्मा की याद दिलाएगा, कि मौत जल्दी आनेवाली है; उसके पहले कुछ शाश्वत पर पैर जमा लो। जल्दी ही यहां का सब छिन जाएगा।...कुछ और धन कमा लो।
और दूसरी तरफ कलियां भी खिल रही हैं, तारे जगमगा रहे हैं, बच्चे किलकारी मार रहे हैं, कोयल की कूक है, वृक्षों में आनंद-मग्न हवाएं घूम रही हैं। ऐसे क्षण भी हैं। इन क्षणों को भी देखो। ये क्षण इस बात की खबर देते हैं कि जब भी तुम परमात्मा के करीब होते हो तब इन क्षणों का आविर्भाव होता है। सुबह उगते सूरज को देखकर अवाक् तुम खड़े रह गए...विस्मय-विमुग्ध...ऐसा सौंदर्य! ऐसा अपार सौंदर्य! विचार थम गए। आंखों ने झपकना बंद कर दिया। खुशी फैल गई। आकाश पर ही लाली नहीं फैली, अंतराकाश पर भी खुशी फैल गई।
ये घड़ियां परमात्मा के करीब होने की घड़ियों में झुक जाओ, याद करो, धन्यवाद दो। नाम भी लेने की कोई जरूरत नहीं कि किसको धन्यवाद दे रहे हैं। सिर्फ धन्यवाद दो। भेंट तो मिली है सुबह की सुंदर! यह ताजी हवा, ये पक्षियों के गीत, यह उगता सूरज...धन्यवाद दो! किसी अज्ञात हाथ की भेंट है। नहीं उस हाथ का हमें पता है, लेकिन भेंट तो मिल रही है! तो भी तुम परमात्मा के निकट पहुंचने लगो।
और जो होशियार है, जो समझदार है, वह दोनों पंखों का उपयोग कर लेता है। वह दुःख से भी परमात्मा के पास पहुंचता है, वह सुख से भी परमात्मा के पास पहुंचता है। सुख से अनुगृहीत होता है, दुःख से समझदार होता है। दुःख से अपने को संभालता है, जागरूक होता है, कि अब और दुःख में नहीं पड़ना है; अब ऐसी गैल नहीं चलनी है कि जिस पर दुःख होता है। अब ऐसे मार्ग नहीं जाना जिस पर दुःख मिलता। अब क्रोध से अपने को उठाऊंगा ऊपर। अब लोभ से अपने को जगाऊंगा। अब वासना से अपने को मुक्त करना है। इससे भी लाभ ले लेता है।
और जब कभी जीवन में प्रार्थना की घड़ी आती है, कृतज्ञता की, सौंदर्य की रस बहता है...तो झुक जाता है धन्यवाद में। इसका भी लाभ ले लेता है। कहता है कि तेरी कृपा! जब भूल होती है तो कहता है मेरी भूल। और जब आनंद होता है तो कहता है, तेरी कृपा!
समझदार दोनों पंखों का उपयोग कर लेता है, उड़ चलता है उस अनंत की तरफ। तुम भी उड़ो। दोनों का उपयोग करो। प्रेरणाएं तो बहुत हैं। ज़रा आंख खोलकर देखना शुरू करो। परमात्मा बहुत ढंगों से बुला रहा है। सब इशारे उसी के हैं। सब तरफ से तुम्हें खींच रहा है। मगर तुम हो कि पत्थर और जड़ बनकर बैठे हो। तुम हिलते ही नहीं। हमने कसम खा ली है कि हिलेंगे नहीं। फिर हिलोगे नहीं तो अनंत की धार से चूकते रहोगे, उसके साथ बहो। बहाव बनो! रुको मत। अटको मत। जड़ मत बनो। बर्फ की तरह मत बनो, पिघलो!
जो चीज भी पिघला जाए, वही परमात्मा की तरफ ले जाने का उपाय है। पिघलो। हृदय तरल हो। आंखों से आंसू झरें। देह में मस्ती छाए। मन मगन हो! नाचो! गाओ! गुनगुनाओ! पहुंच जाओगे। दूर नहीं है, पास ही बैठा है। बस, प्रेम की कला आनी चाहिए।
जिसको प्रेम आ गया उसको प्रार्थना आ गई। जिसको प्रार्थना आ गई उसके पास परमात्मा अपने-आप आ जाता है।
यहूदियों की पुरानी किताब तालमुद एक अपूर्व वचन उद्घोषित करती है कि तुम यह मत सोचना कि तुम्हीं परमात्मा को खोज रहे हो, परमात्मा भी तुम्हें खोज रहा है। यह आग दोनों तरफ से लगी हुई है। इसलिए घबराओ मत, कुछ-न-कुछ होकर रहेगा। चल पड़ो, तलाशने लगो। उसका हाथ तलाशता हुआ आ ही रहा है। तुम भी तलाशने लगो तो आज नहीं कल, कल नहीं परसों, देर-अबेर दोनों हाथों का मिलन हो जाएगा। वह मिलन अपूर्व सौभाग्य का मिलन है।

अपने जी की बात क्या कहूं

रीते घर पाहुन पग धारे

अपनी आज बिसात क्या कहूं।
उस दिन तुम पाओगे, तुम कितने विस्तीर्ण हो गए! उस दिन तुम पाओगे, तुम्हारा सूनापन पूर्ण से भर गया। उस दिन तुम पाओगे, तुम्हारी गागर सागर को समा ली है। तुम्हारी बूंद में समुद्र आ गया है। फिर बूंद सागर में गिरे कि सागर बूंद में गिरे, एक ही बात है।

हेरत हेरत हे सखी रह्या कबीर हिराई।

बूंद समानी समुंद में सो कत हेरी जाई।।
बूंद गिर गई सागर में, अब उसे कैसे खोजें? मैं ऐसे ही परमात्मा में खो गया। यह पहला अनुभव था समाधि का। जब समाधि और गहरी हुई तो कबीर ने उसके बीस साल बाद दूसरा सूत्र लिखा--

हेरत हेरत है सखी, रह्या कबीर हिराइ।

समुंद समाना बुंद में सो कत हेरी जाइ।।
बीस साल बाद दूसरी बात लिखी है कि हे सखि, खोजते-खोजते मैं खो गया और सागर बूंद में समा गया है। अब उसको कैसे खोजा जाए? पहले तो बूंद सागर में गिरती है, ऐसा अनुभव होता है; फिर अनुभव होता है सागर बूंद में गिर गया। पहले तो लगता है मैं परमात्मा में गया, लीन हुआ। फिर पता चलता है परमात्मा मुझमें आ गया और लीन हो गया। ऐसे भक्त और भगवान् एक हो जाते हैं। वही घड़ी सौभाग्य की घड़ी है। वही दिन है जिसको सुंदरदास ने कहा--भला दिन!

अपने जी की बात क्या कहूं

रीते घर पाहुन पग धारे

अपनी आज बिसात क्या कहूं

आतप बीते आंगन में जब

पहले शीत समीरण आए

मदिर गंध माटी की बिखरी

अंग-अंग अंकुर उकसाए

प्रियतम के इस प्रथम परस को

कहो सखी, मैं बात क्या कहूं!

सूरज डूबा, किरण सिधारी

तिमिर घिरा, तारे भरमाए

मेघरथी, आकाश-पथी तुम

तड़ित-मुकुट माथे धर आए

इस उजियारी अंधियारी को

रात कहूं? री, रात क्या कहूं!

मनभावन उपवन में आए

बरसाए पावन करुना-कन

मैं अपने में रह न सकी, री,

उमड़ पड़े नयनों में सावन

दृग-कोरों की रस-रिमझिम को

यदि न कहूं बरसात, क्या कहूं!


अपने जी की बात क्या कहूं

रीते घर पाहुन पग धारे

अपनी आज बिसात क्या कहूं!

आज इतना ही।