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रविवार, 5 मार्च 2017

ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-12



ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-बाहरवां
प्रश्‍नसार:

1-प्रेम जादू है

2-मैं न सत्य को देखता हूं न सौंदर्य को।
प्रभु का भी मुझे कुछ आभास नहीं होता
है। आपकी बातें न समझ पाता हूं, न पचा
पाता हूं। मैं क्या करूं?

3-आप हमें अकसर समझाते हैं कि मन
की बजाय हृदय की सुनो। लेकिन कोई
कैसे जाने कि उसके मन की आवाज कौन
है और उसके हृदय की आवाज कौन 
है? कुछ समझाने की अनुकंपा करें।
जगत् में सर्वाधिक मूल्यवान क्या है?

4-भगवान्! अब दुल्हन हूं अपने पिया की! आपका आशीर्वाद!


पहला प्रश्न : मैं न सत्य को देखता हूं न सौंदर्य को। प्रभु का भी मुझे कुछ आभास नहीं होता है। आपकी बातें न समझ पाता हूं न पचा पाता हूं। मैं क्या करूं?

प्रभु को देखने का प्रश्न नहीं है, आंख खोलने का प्रश्न है। सौंदर्य को अनुभव करने की बात ऐसी नहीं है कि सौंदर्य वहां पड़ा है और अनुभव हो जाए। सौंदर्य को अनुभव करनेवाला संवेदनशील हृदय जगाना पड़ता है। भीतर संवेदनशील हृदय हो तो बाहर सौंदर्य है। अंधा आदमी प्रकाश को तलाशे और प्रकाश उसे न मिले, तो प्रकाश का कोई कसूर है? अंधे आदमी को आंख का इलाज खोजना चाहिए, आंख की औषधि खोजनी चाहिए। अंधे आदमी को सूरज की खोज में नहीं जाना चाहिए, वैद्य की खोज में जाना चाहिए।
इसलिए संतों ने निरंतर कहा है कि परमात्मा को मत खोजो, गुरु को खोजो। परमात्मा को कैसे खोजोगे? परमात्मा को खोजने में तुम सीधे समर्थ होते तो तुमने कभी का खोज लिया होता।
एक अंधे आदमी को बुद्ध के पास लाया गया था। वह अंधा आदमी बड़ा तार्किक था। अंधे अकसर तार्किक हो जाते हैं। अंधों को तार्किक होना पड़ता है। तार्किकता अंधेपन के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी है। कारण है। अंधा आदमी अगर यह चुपचाप मान ले कि प्रकाश है तो उसने यह भी मान लिया कि मैं अंधा हूं। और कौन मानना चाहता है  कि मैं अंधा हूं! मन को पीड़ा होती है। अहंकार को चोट पड़ती है। छाती में घाव हो जाता है। प्रकाश को मानो तो यह मानना पड़ेगा कि मैं अंधा हूं, क्योंकि मुझे दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए उचित यही है कि प्रकाश को ही न मानो। जड़ से ही काट दो बात, प्रकाश है ही नहीं। और जब प्रकाश नहीं है तो मुझे क्यों दिखाई पड़ेगा, कैसे दिखाई पड़ेगा? प्रकाश को इनकार करके अंधे आदमी ने अपने अंधेपन को इनकार कर दिया। उसने अपने घाव से बचा लिया। वह जो पीड़ा होती है, वह जो अवमानना होती है, वह जो अपने ही सामने दीनता हो जाती कि मैं अंधा हूं, अभागा हूं, उससे बचने का उपाय क्या है? उससे बचने का एक ही उपाय है कि प्रकाश है ही नहीं। इसलिए अंधा तार्किक हो जाता है।
नास्तिक का इतना ही अर्थ होता है कि वह आदमी आत्मरक्षा में लगा है। कह रहा है : ईश्वर नहीं है। क्योंकि अगर ईश्वर है, तो फिर मैं दीन हूं। अगर ईश्वर है, तो फिर मैंने अपने जीवन का कोई सदुपयोग नहीं किया। अगर ईश्वर है, तो मैंने ऐसे ही कूड़े-कांकर को इकट्ठा करने में जीवन गंवा दिया। मैं व्यर्थ गया।
कौन मानना चाहता है कि मैं व्यर्थ गया! मैं सार्थक हूं, तो एक ही उपाय है कि ईश्वर नहीं है। होता तो मुझे भी मिल गया होता, मुझमें क्या कमी थी? मेरी पात्रता में कौन-सी कमी है? होता तो मुझे भी मिल गया होता। नहीं मिला, तो इसके दो ही कारण हो सकते हैं : या तो मैं अपात्र हूं या वह नहीं है। दूसरी ही बात माननी आसान मालूम पड़ती है, अहंकार के विपरीत नहीं जाती । इसलिए मैंने कहा कि अंधे तार्किक हो जाते हैं। साधारण अंधों की बात नहीं कर रहा हूं, आध्यात्मिक अंधों की बात कर रहा हूं।
उस अंधे आदमी को बुद्ध के पास ले जाया गया। बड़ा तार्किक था! जो भी सिद्ध करना चाहते कि प्रकाश है, वह असिद्ध कर देता।
और भी एक बात खयाल में ले लेना, जिसको प्रकाश दिखाई नहीं पड़ा है, तुम उसके सामने प्रकाश को सिद्ध करना भी चाहोगे तो कर न पाओगे। वह तुम्हें असिद्ध कर देगा। यद्यपि तुम जानते हो कि प्रकाश है, मगर जानना एक बात है और जनाना दूसरी बात है। जानने से क्या होता है? कैसे सिद्ध करोगे अंधे आदमी के सामने कि प्रकाश है? न तो प्रकाश को उसके हाथ में दे सकते हो कि वह छू ले, चख ले, गंध ले ले, प्रकाश को बजाकर ध्वनि सुन ले। ये चार इंद्रियां उसके पास हैं।
वह अंधा आदमी भी अपने मित्रों को कहता था कि तुम प्रकाश को मुझे दे दो, मैं ज़रा हाथ में प्रकाश लेकर स्पर्श कर लूं। और ऐसा भी नहीं है कि प्रकाश हाथ में नहीं पड़ता है, लेकिन प्रकाश का स्पर्श नहीं होता। खड़े हो धूप में तो हाथ पर प्रकाश बरस रहा है, लेकिन स्पर्श नहीं होता।
वह अंधा आदमी कहता था कि मुझे दे दो, ज़रा मैं चख लूं--मीठा है, कड़वा है, तिक्त है, स्वाद क्या है? कोई भी चीज हो तो उसका स्वाद तो होगा। उसे बजाकर, ठोक कर देख लूं, कुछ आवाज तो निकलेगी! ऐसे मैं मान लूंगा कि आज प्रकाश है।
वे थक गए थे, हार गए थे। उनका सारा अनुभव दो कौड़ी का कर दिया था उस अंधे आदमी ने। एक नास्तिक हजारों अनुभव से भरे हुए लोगों को हरा सकता है। नकार की वह बड़ी खूबी है। तुम कहो कि चांद सुंदर है और हजार लोग कहें कि चांद सुंदर है, लेकिन एक आदमी खड़ा हो जाए और कहे कि सिद्ध करो,क्या सौंदर्य है, कौन-सा सौंदर्य, कहां है सौंदर्य?--तो हजार व्यक्ति जो अनुभव कर रहे थे चांद का सौंदर्य, अपने भीतर सिकुड़ जाएंगे, कोई उपाय न पाएंगे। अनुभव को सिद्ध करने का कोई उपाय होता ही नहीं।
वे उस आदमी को बुद्ध के पास ले आए, सोचा कि बुद्ध तो सिद्ध कर सकेंगे! लेकिन बुद्ध अनूठे व्यक्ति थे। बुद्ध ने कहा, तुम इसे मेरे पास लाए क्यों, इसे किसी वैद्य के पास ले जाओ। मेरा अपना वैद्य है, जो कभी-कभी मेरी चिकित्सा करता है। जीवक उसका नाम है, तुम उसके पास ले जाओ। इसकी आंख पर जाली है, जाली कटनी चाहिए। जाली कट गई। छह महीने के बाद वह अंधा आदमी नाचता हुआ आया, बुद्ध के चरणों में गिरा और कहा : मुझे क्षमा कर दें। मैंने उस समय जो बातें कही थीं, मैं अज्ञानी था। मैंने जो दंभ दिखलाया था कि प्रकाश नहीं है, वह मेरी भ्रांति थी। मगर मैं और कर भी क्या सकता था? मुझे दिखाई नहीं पड़ता था, तो मुझे ऐसा ही लगता था कि जितने लोग कहते हैं प्रकाश है, वे सब मुझे अंधा सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे पीड़ा होती थी। प्रकाश शब्द ही मुझे कांटे की तरह चुभता था। आपने भला किया मुझे समझाया नहीं, समझाते तो मैं समझता नहीं। मैं आपसे भी जूझा होता, आपसे भी विवाद किया होता। और अब मैं जानता हूं, मैंने देख लिया। मैं भी किसी अंधे आदमी को समझा न सकूंगा। अब मैं आपकी तकलीफ भी समझता हूं। और मेरे मित्रों की तकलीफ भी समझता हूं; उनसे भी क्षमा मांग आया हूं।
तुम पूछो कि मैं न सत्य को देखता हूं न सौंदर्य को। प्रभु का भी मुझे कुछ आभास नहीं होता है, तो इसका एक ही अर्थ है कि तुम्हारे भीतर जो संवेदना के स्रोत होने चाहिए, वे सोए पड़े हैं। उन्हें जगाना होगा। तुम परमात्मा की बात ही छोड़ दो। तुम ध्यान करो।
मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि हम तो नास्तिक हैं, क्या हम ध्यान कर सकते हैं? मैं उनसे कहता हूं कि नास्तिक हो इसलिए ध्यान के अतिरिक्त और करोगे क्या? ध्यान में ईश्वर को मानना शर्त नहीं है। ईश्वर का अनुभव ध्यान का परिणाम है, शर्त नहीं है। इस बात को खयाल में ले लेना। ध्यान यह नहीं कहता कि पहले ईश्वर को मानो फिर ध्यान करो; मानोगे तो ही ध्यान हो सकेगा। नहीं, जो कोई ऐसा कहता हो कि मानो, फिर ध्यान हो सकेगा, वह झूठ कहता है। उसे ध्यान का स्वयं भी पता नहीं है।
अंधा आदमी प्रकाश को न माने तो क्या उसकी आंख की चिकित्सा नहीं हो सकती? क्या मानने के बाद चिकित्सा होगी? क्या मानना चिकित्सा की अनिवार्य शर्त हो सकती है? चिकित्सा से क्या लेना-देना है मानने न मानने का?
मानो या न मानो, जहर पियोगे तो मरोगे। मानो या न मानो, अमृत पियोगे तो शाश्वत जीवन मिलेगा। मानने न मानने की बात ही नहीं है।
ध्यान करो; और ध्यान की कोई भी शर्त नहीं है। ध्यान का सीधा सूत्र हैः धीरे-धीरे मन को निर्विचार करो। तुम ईश्वर की फिक्र ही छोड़ो, नहीं तो यह ईश्वर भी एक और विचार का बवंडर खड़ा कर देगा। ईश्वर से तुम्हें क्या लेना-देना है? ईश्वर शब्द भी तुम्हारे लिए व्यर्थ है। जो तुम्हारा अनुभव नहीं है वह शब्द कोरा होता है, खाली होता है। उसमें कोई अर्थ नहीं होता। हां, रामकृष्ण ने कहा होगा जब यह शब्द, उसमें अर्थ रहा होगा। रमण ने कहा होगा, उसमें अर्थ रहा होगा । तुम जब इस शब्द का उपयोग करते हो, इसमें कोई अर्थ नहीं होता। यह बिल्कुल व्यर्थ होता है। और व्यर्थ ही हो, इतना नहीं अकसर तो अनर्थ होता है।
तुम इन शब्दों को छोड़ो। तुम निर्विचार की थोड़ी तलाश करो। विचार तो तुम जानते हो न, विचार तो तुम्हें अनुभव में आते हैं न, विचारों से तो तुम घिरे हो, वहीं से यात्रा शुरू करो। और कभी-कभी यह भी समझ में आता है या नहीं कि कभी विचार ज्यादा होते हैं और कभी कम होते हैं? उससे एक बात प्रमाणित हो जाती है कि विचार कम हो सकते हैं, और कम हो सकते हैं, और कम हो सकते हैं, और ज्यादा हो सकते हैं, और ज्यादा हो सकते हैं। विचार जब बहुत ज्यादा हो जाते हैं कि तुम संभाल न पाओ, तो उस अवस्था का नाम विक्षिप्तता है। और विचार जब बिल्कुल शून्य हो जाते हैं कि संभालने को कुछ बचे ही नहीं, उस अवस्था का नाम विमुक्तता है। विचार की भीड़ का बढ़ जाना विक्षिप्तता की यात्रा है, और विचार से खाली होते जाना विमुक्त की। जिस दिन विचार बिल्कुल नहीं होते उस दिन परमात्मा सामने ही खड़ा हो जाता है, सब तरफ खड़ा हो जाता है। खड़ा ही था, सिर्फ विचारों के कारण तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता था। आंख से जाली कट गई। विचार की जाली ने तुम्हारी आंख को अंधा किया है। विचार के परदे पर परदे पड़े हैं।
और जहां परमात्मा दिखा, वहीं सौंदर्य दिखा। यह परमात्मा का ही दूसरा नाम है। मेरे लिए सत्य से भी ज्यादा मूल्यवान शब्द है--सौंदर्य । क्योंकि सत्य में तो थोड़ी तर्क की गंध आती है, विचार की थोड़ी-सी झलक मिलती है। सत्य तो ऐसा लगता है जैसे विचार का निष्कर्ष हो, जैसे तर्क की निष्पत्ति हो।
नहीं, परमात्मा सौंदर्य है। रसो वै सः। वह रस-रूप है। वह परम सौंदर्य है। फूल में जो छिपा है सौंदर्य, चांद में जो छिपा है सौंदर्य, किन्हीं की आंखों में जो छिपा है सौंदर्य, बच्चे की मुस्कराहट में, पक्षियों की चहचहाट में . . . यह सारा सौंदर्य वही है! यह तुम्हारे भीतर चलनेवाली विचार की प्रक्रिया की निष्पत्ति नहीं है। इसलिए सत्य से भी ज्यादा उचित, सत्य से भी ज्यादा सार्थक शब्द परमात्मा को प्रकट करने वाला "सौंदर्य' है।
मैं रवींद्रनाथ से राजी हूं। रवींद्रनाथ ने सत्य शब्द का उपयोग किया; परमात्मा को सुंदर कहा। हमारे पास दो बड़े बहुमूल्य सूत्र हैं। "सच्चिदानंद' एक सूत्र है और "सत्यं शिवं सुंदरम्' दूसरा सूत्र है। इन दो सूत्रों में भारत की सारी खोज समाविष्ट है। दूसरा सूत्र पहले सूत्र से भी मूल्यवान है। सच्चिदानंद मूल्यवान सूत्र है--कि वह परम सत् है, चित् है, आनंद है। दूसरा सूत्र पहले से भी ज्यादा मूल्यवान है। वह परमात्मा सत्य है, शिव है, सुंदर है। दूसरे सूत्र में काव्य है, पहले सूत्र में दर्शन है। पहला सूत्र दार्शनिक की भाषा में अभिव्यक्त हुआ है, दूसरा सूत्र कवि की भाषा में। और कवि की भाषा हृदय की भाषा है। कवि ऋषि के निकटतम है।
तुम पूछते हो : न मैं सत्य को देखता हूं, न सौंदर्य को। तो इससे एक ही बात की खबर मिलती है कि तुम्हारे पास सत्य को और सौंदर्य को ग्रहण करनेवाली संवेदनशीलता नहीं है। और ऐसा नहीं है कि कोई आदमी बिना संवेदनशीलता के पैदा होता है। यह तो असंभव है। संवेदनशीलता तो हम सभी लेकर आते हैं, कुछ लोग निखार लेते हैं और कुछ लोग बिना निखारे ही छोड़ रखते हैं। कुछ लोग सुव्यवस्थित कर लेते हैं, कुछ लोग अव्यवस्थित छोड़ देते हैं। कुछ लोग इस संवेदनशीलता को श्रृंगारित कर लेते हैं, और कुछ लोग उपेक्षित छोड़ देते हैं। तुमने उपेक्षित छोड़ रखी है।
तुमने अपनी हृदय की वीणा पर ध्यान नहीं दिया। उस पर धूल जम गई है, कूड़ा-करकट बैठ गया है। शायद वीणा दब ही गयी होगी। शायद अब वीणा का पता भी न चलता होगा। जैसे किसी दर्पण पर बहुत धूल जम जाए और दर्पण का कोई पता ही न चले। दर्पण मिट नहीं जाता। दर्पण अब भी वैसा का वैसा है, लेकिन अब उसमें प्रतिफलन की क्षमता नहीं है। अब कोई सामने से निकलेगा तो दर्पण उसे पकड़ नहीं पाएगा। दर्पण अंधा है। ज़रा-सी धूल झाड़ने की बात है और दर्पण फिर सजीव हो उठेगा, सप्राण हो उठेगा। तब तुम जानोगे सत्य भी, तब तुम जानोगे शिव भी, तब तुम जानोगे सुंदर भी।
पूछते हो : प्रभु का भी मुझे कुछ आभास नहीं होता। कैसे होगा? और जो कहते हैं उन्हें होता है, उनमें से भी निन्यानबे झूठ ही कहते हैं। इसलिए तुम उस चिंता में भी मत पड़ना कि तुम बड़े अल्पमत में हो। तुम्हारा ही बहुमत है। सौ व्यक्ति जो कहते हैं कि ईश्वर को हम मानते हैं, उनमें से निन्यानबे तो झूठ ही कहते हैं। और यह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है। और सब झूठ तो छोटे-छोटे हैं। किसी आदमी ने दो रुपए की जगह तीन रुपए बता दिए और किसी आदमी ने कुछ और छोटा-मोटा झूठ बोल दिया, कुछ कहा था कुछ बदल दिया; कमरे में दस लोग बैठे थे, उसने बाहर जाकर बारह बता दिए; घर में कुछ भी न था, बाहर ऐसे अकड़कर चला कि जैसे लाखों पड़े हों . . .मगर ये सब छोटे झूठ हैं। इनका कोई मूल्य नहीं है। ये तो सपने के भीतर सपने हैं, झूठ के भीतर झूठ हैं, छोटे झूठ हैं। लेकिन जो व्यक्ति ईश्वर को बिना जाने कहता है कि ईश्वर है, उसने तो आखिरी झूठ बोल दिया! इसकी बेईमानी तो हद के बाहर हो गई। यह आदमी तो बिल्कुल अधार्मिक है।
इसलिए मैं तुमसे कहता हूं, तुम्हारे मंदिर और मस्जिदों में जो लोग पाए जाते हैं, अधार्मिक लोग हैं। बाजारों में मिलनेवाले लोगों से ज्यादा अधार्मिक ! क्योंकि बाजार के झूठ हैं; मंदिर और मस्जिदों में जो झूठ बोले जा रहे हैं, ये आध्यात्मिक झूठ हैं। जब तक तुमने न जाना हो तब तक ईमानदारी इसी में है कि कहना कि अभी मैंने जाना नहीं। न तो यह कहना कि "ईश्वर है', क्योंकि वह भी झूठ है, तुम्हारे अनुभव के अनुकूल नहीं है। और न यह कहना कि "नहीं है', क्योंकि वह भी झूठ है, तुमने वह भी नहीं जाना।
और दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं--आस्तिक और नास्तिक। एक तरह का झूठ हिंदुस्तान में बोला जाता है, एक तरह का झूठ रूस में बोला जाता है; मगर दोनों झूठ हैं। और इसीलिए यह एक अपूर्व घटना घटती है। एक झूठ से दूसरे झूठ पर जाने में देर भी नहीं लगती! रूस बड़ा आस्तिक देश था, उन्नीस सौ सत्रह के पहले, क्रांति के पहले। रूस ऐसे ही था जैसे भारत। बड़ा आस्तिक, बड़ा धार्मिक; मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च सारे रूस की भूमि पर फैले हुए थे। हर आदमी धार्मिक था। और तब एक चमत्कार हो गया, क्रांति हुई, और सारे के सारे लोग दस साल के भीतर नास्तिक हो गए! वे ही लोग! क्या हुआ, इतनी जल्दी कैसे बदल गए? एक झूठ से दूसरे झूठ पर जाने में अड़चन क्या? एक झूठ मानते थे आस्तिक का, मानने लगे नास्तिक का।
लोग तो उसके साथ हो जाते हैं जिसके हाथ में ताकत होती है! जिसकी लाठी उसकी भैंस। पहले ताकत थी जिनके हाथ में वे आस्तिक थे, तो लोग आस्तिक थे। अब ताकत आ गई उनके हाथ में जो नास्तिक हैं, तो लोग नास्तिक हो गए। लोग तो सदा पीछे चलते हैं, अनुकरण करते हैं। लोग तो नकली हैं। लोगों के चेहरे तो मुखौटे हैं। वे क्या कहते हैं, उनकी बातों का कुछ अर्थ नहीं है।
तो तुम इससे चिंतित मत हो जाना कि तुम कुछ बड़ी मुश्किल में हो, और बाकी लोग बड़ा आनंद पा रहे हैं। ईश्वर को जाननेवाले, ईश्वर की पूजा करनेवाले, प्रार्थना करनेवाले, सत्यनारायण की कथाएं करनेवाले, पंडित-पुजारियों के पास जानेवाले--तुम जैसे ही हैं, तुमसे भी गए-बीते हैं! क्योंकि तुम्हें कम से कम इतना तो बोध है कि मुझे कुछ एहसास नहीं होता। इतनी सच्चाई की किरण तो तुम्हारे पास है। इसी किरण का अगर सहारा पकड़ा तो एक दिन तुम परमसत्य तक पहुंच जाओगे।
लेकिन खयाल रहे, सारे बात भीतर घटनी है। परमात्मा बाहर है, ऐसी तलाश में मत निकलो। न तो हिमालय पर मिलेगा, न काशी में मिलेगा, न काबा में मिलेगा। जब तुम्हारे भीतर का अंतःचक्षु खुलेगा, जब तुम्हारे भीतर की संवेदनशीलता प्रगाढ़ होगी--ऐसी प्रगाढ़ कि जो छिपा है वह प्रतीति में आने लगे।
इसे तुम ऐसा समझो, कभी तुमने खयाल किया, अभी तुम मुझे सुन रहे हो . . .जब तुम मुझे सुन रहे हो तो पक्षियों की चहचहाहट तुम्हें सुनाई नहीं पड़ेगी। मैं चुप हो जाऊं, पक्षियों की चहचहाहट सुनाई पड़ने लगेगी। फिर एक और बात सोचोः मैं तो चुप हूं, लेकिन तुम भीतर बोल रहे हो, तो पक्षियों की चहचहाहट सुनाई पड़ रही, लेकिन अपनी परिपूर्णता में नहीं। अगर तुम भीतर भी चुप हो जाओ तो चहचहाहट में ऐसा सौंदर्य प्रकट होगा, रसविमुग्ध हो जाओगे। वह रसविमुग्धता ही परमात्मा का अनुभव है। परमात्मा कोई ऐसा थोड़े ही है कि लिए धनुष-बाण खड़े हैं! . . . कि मुख पर बांसुरी रखे नृत्य की मुद्रा में खड़े हैं। पत्थर के हों तो ठीक, असली हों तो अब तक लकवा मार गया होगा! अब उनको लिटाओ, थोड़ी मालिश करो। उनके पैर अकड़ गए होंगे, वही मुद्रा पकड़ गयी होगी। उनकी नसें जकड़ गयी होंगी। कुछ उन पर भी दया करो!
कोई परमात्मा धनुष-बाण लिए थोड़े ही खड़ा है, कि बांसुरी बजा रहा है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है। यह जगत् अपूर्व सौंदर्य से भरा है। यह जगत् अपूर्व आनंद से लबालब है। यह जगत् ऐसी शांति से तरंगित हो रहा है, ऐसे संगीत से आंदोलित हो रहा है कि जिसका हमें पता नहीं है। जब हम बिल्कुल चुप हो जाते हैं, तब वह संगीत एकदम से हम पर टूट पड़ता है। चारों तरफ से! न मालूम कितने ढंगों में, परमात्मा का मेघ हम पर बरस जाता है।
इसलिए बाहर मत खोजो। संवेदनशीलता खोजो। परमात्मा शब्द ही छोड़ दो, चलेगा। संवेदनशीलता खोजो। ज्यादा संवेदनशील बनो।
तुमने देखा, कुछ लोग होते हैं जिनका काम शराब को परखना होता है। उनके मुंह पर तुम ज़रा-सा, दो बूंद शराब दे दो, उस शराब का स्वाद लेते ही बता सकेंगे कि किस ढंग की शराब है। इतना ही नहीं, उसमें जो बड़े पारखी होते हैं, वे कंपनी का नाम बता देंगे--कहां की बनी है, किस देश की बनी है। इतना ही नहीं, कितनी पुरानी है--सौ साल पुरानी है, कि दो सौ साल पुरानी है, कि तीन सौ साल पुरानी है--यह भी बता देंगे। सैकड़ों ढंग की शराबें दुनिया में हैं। सैकड़ों कंपनियां बनाती हैं। लेकिन पारिखी की जीभ इतनी संवेदनशील हो जाती है कि ज़रा-ज़रा से भेद पकड़ती है। तुम्हें तो कुछ पता न चलेगा। तुम्हें तो सब शराबें एक जैसी मालूम पड़ेंगी। अगर भेद भी पता चलेगा तो भी इतना स्पष्ट पता नहीं चलेगा कि तुम बता सको क्या क्या है।
चित्रकार जब बगीचे में आता है तो एक ही हरा रंग नहीं देखता; तुम जब आते हो बगीचे में, तुम को दिखाई पड़ता है सब वृक्ष हरे हैं। चित्रकार जब बगीचे में आता है तो उसको लगता है--हजारों हरे रंग . . .। क्योंकि हरे रंग भी बहुत ढंग के हैं। कोई दो वृक्ष एक से हरे नहीं हैं। हरे रंग हैं, और हरे रंग हैं, और हरे रंग हैं, और उनमें बड़े भेद हैं, बारीक भेद हैं। मगर चित्रकार की आंख को पकड़ में आते हैं। साधारण आदमी तो देखता है कि ठीक है, हरियाली है। बस इतना देख लिया, काफी है।
जब कोई शास्त्रीय संगीत को सुनता है तो जिसके कान प्रवण हो गए हैं, जिसके पास शास्त्रीय संगीत को समझने की क्षमता आ गई है, तुम यह मत सोचना कि वह भी वही सुनता है जो तुम सुनते हो। वह बहुत कुछ सुनता है, जो तुम्हें कभी सुनाई नहीं पड़ेगा। वह स्वरों के बीच में जो शून्य है, उनको भी सुनता है। दो स्वरों के बीच में जो अंतराल है, उनको भी सुनता है। उन्हीं अंतरालों से तो गहरा संगीत निर्मित होता है। गहरा संगीत स्वर में नहीं होता--स्वरों के बीच में, दो स्वरों के बीच में जो खाली रिक्त स्थान होता है, उसमें होता है।
तुम मुझे सुन रहे हो, यह दो ढंग से सुन सकते हो। जो विद्यार्थी की तरह यहां आया है, वह मेरे शब्दों को सुनेगा। जो शिष्य की तरह यहां आया है, वह मेरे दो शब्दों के बीच में जो खाली जगह है उसको भी सुनेगा। और तब अर्थ बदल जाएंगे। तब अर्थ बिल्कुल ही भिन्न हो जाएंगे।
हर चीज में संवेदनशीलता बढ़ती चली जाए। तुम रंग देखो तो गहराई से देखो। तुम संगीत सुनो तो गहराई से सुनो। तुम नाचो तो गहराई से नाचो। तुम गाओ तो गहराई से गाओ। तुम्हारी गहराई बढ़ती चली जाए। गहराई का ही नाम परमात्मा है। जिस दिन गहराई इतनी हो जाएगी कि तुम पाओगे कि तुम अपने से ज्यादा गहराई में पहुंच गए--जहां तुम चूक जाते हो और गहराई नहीं चूकती; जहां तुम पिघल गए और गहराई नहीं चूकती।
रामकृष्ण कहते थे : दो नमक के पुतले एक मेले में गए। मेला भरा था समुद्र के तट पर। लोगों में विवाद छिड़ गया कि समुद्र कितना गहरा है? बैठे लोग अपने-अपने शास्त्र खोलकर, किसके शास्त्र में कितना गहरा लिखा है। पर सब बैठे घाट पर। नमक के एक पुतले ने कहा : यह भी क्या बकवास लगा रखी है! यहां बैठकर कैसे तय होगा कि समुद्र कितना गहरा है? मैं डुबकी मारता हूं, अभी पता लगाकर आता हूं।
उसने डुबकी मारी, वह लौटा ही नहीं। फिर दूसरे ने कहाः मैं ज़रा उसका पता लगाऊं कि वह गया कहां? उसने भी डुबकी मारी, वह भी नहीं लौटा। मेला बसा था, रहा, उजड़ भी गया। लोग राह देखते-देखते थक भी गए, चले भी गए। रामकृष्ण कहते थे, अब तक वे नमक के पुतले लौटे नहीं। नमक के पुतले लौटें कैसे? गल गए! सागर का ही तो अंग थे। जैसे-जैसे गहरे गए होंगे, वैसे ही वैसे गलते गए होंगे। जब ऐसी गहराई आ गई होगी कि जहां बिल्कुल गल गए, लौटने का उपाय न रहा होगा। फिर भी गहराई पर गहराई थी, और भी गहराइयां थीं।
जहां मनुष्य गल जाता है, उसके आगे भी गहराइयां हैं। उन्हीं गहराइयों का नाम परमात्मा है। परमात्मा को हम कभी पूरा चुका नहीं पाएंगे। किसी ने परमात्मा को कभी पूरा नहीं जाना, और न कोई कभी पूरा जानेगा। क्योंकि अगर कोई परमात्मा को पूरा जान ले तो उसका मतलब हुआ परमात्मा की सीमा है। किसी ने कभी परमात्मा को पूरा नहीं जाना।
लेकिन फिर हम पूर्ण ज्ञानी किसको कहते हैं? तुम मुश्किल में पड़ोगे कि यह मैं क्या कह रहा हूं! अगर किसी ने परमात्मा को पूरा नहीं जाना, तो फिर हम पूर्णज्ञानी क्यों कहते हैं बुद्ध को, नानक को, कबीर को, सुंदरदास को? इनको हम पूर्णज्ञानी क्यों कहते हैं? इनको पूर्णज्ञानी कहने का दूसरा अर्थ है। इनको पूर्णज्ञानी कहने का यह अर्थ नहीं कि इन्होंने पूरा परमात्मा जाना; पूर्णज्ञानी कहने का अर्थ है, ये पूरे परमात्मा में डूबे। ये पूरे परमात्मा में लीन हुए। इन्होंने कुछ बचाया नहीं। ये परमात्मरूप हो गए। जैसे नमक का पुतला सागर में मिलकर एक हो गया। नमक के पुतले ने पूरा सागर जाना, पूरे सागर की गहराई नाप ली, ऐसा नहीं है। लेकिन क्या बचा? नमक का पुतला सागर के साथ एक हो गया . . .यही तो सागर को जान लेना है। जानने का और कोई उपाय नहीं है।

सौंदर्य का जन्म आदमी की आंखों में है

आकाश की शून्यता पंछी की पांखों में है

अगर आदमी खूबी न देखे तो सब खराब है

अगर पंछी न उड़े तो आकाश एक बड़ा घाव है

घोंसले की छाती का जो भर नहीं सकता

पंछी अगर उड़े तो आकाश

उसका कुछ कर नहीं सकता

आज के उदास सिद्धांतों को चीर डालो

हिम्मत के तरकश में आशा के तीर डालो

हर अंधेरे में दीपक जलाओ

हर अमावस में दीवाली मनाओ

गले में अगर गीत है तो गाओ

चुप्पी की सांस टूट जाए उसे ऐसा उठाओ

उदार बनो, इतना मत परखो साथियों को

कसौटी पर नहीं कसते हैं पगले, बातियों को

वे तो स्नेह में डुबाकर सुलगा दी जाती हैं

इतना करो, वे तुम्हारे खातिर खुशी से चलेंगे

दूर-दूर तक तुम्हारे साथ अंधेरे में चलेंगे

जिंदगी आज की भी मीठी है, चखो

शर्त एक ही है भाई

दांतों को साफ और मजबूत रखो।

तुम्हारे भीतर की पचाने की क्षमता प्रगाढ़ हो।

शर्त एक ही है भाई

दांतों को साफ और मजबूत रखो!
परमात्मा को पचाने की क्षमता, परमात्मा को चबाने की क्षमता, परमात्मा को पी जाने की क्षमता! तुम्हारे भीतर संवेदनशीलता बड़ी से बड़ी होती चली जाए। तुम्हारा पात्र बड़ा से बड़ा होता चला जाए।
तुम शून्य बनो, पूर्ण अपने से आएगा। लोग पूर्ण की तलाश में निकल जाते हैं, इसकी फिक्र बिना किए कि हम अभी शून्य नहीं हैं। और जिंदगी को ऐसा बांटो भी मत कि यह साधु है वह असाधु है, यह सुंदर वह असुंदर, यह सत्य वह झूठ। जिंदगी तो एक है, कौन साधु कौन असाधु, कौन सुंदर कौन असुंदर? जिन्होंने जाना है, उन्होंने सर्वांग को सुंदर पाया है। जिन्होंने जाना है, उन्होंने सारे अस्तित्व को परमात्मामय पाया है। उन्होंने राम में तो देखा ही है, रावण में भी देखा है।
रावण को जलाना बंद करो! रावण को जलाने में तुम बस इसकी ही घोषणा कर रहे हो कि हम परमात्मा के भी खास-खास ढंग चुनेंगे, हम चुनाव करेंगे। परमात्मा ऐसा होगा तो चुनेंगे, वैसा होगा तो नहीं चुनेंगे। गोरा होगा तो चुनेंगे, काला होगा तो नहीं चुनेंगे। सुंदर होगा तो चुनेंगे, असुंदर होगा तो नहीं चुनेंगे।
परमात्मा सभी में व्याप्त है। बुरे से बुरे में भी उतना ही है जितना भले से भले में है। जिस दिन तुम्हें शुभ और अशुभ में, जीवन में और मृत्यु में, रोशनी में और अंधेरे में, सफलता में और विफलता में, सुख में और दुःख में, सब में एक का ही अनुभव होने लगेगा। ऐसी जब तुम्हारी पात्रता होगी --तभी तुम कह पाओगे परमात्मा है, उसके पहले नहीं।

यह फल है यह पत्ती है यह सूरज है यह बत्ती है

यह दुर्बल है वह पुष्ट है यह साधु है वह दुष्ट है

यह कवि है वह दार्शनिक!

ये खंड हैं और खाने हैं लगभग मनमाने हैं

इनमें हम बंधें तो बंधें लेकिन यह मानकर

अपना अस्तित्व सिर्फ खाना नहीं

खानों में समाए रहना जीवन ने माना नहीं

जीवन तो पत्ती है फूल है फल है

सूरज है चंदा है साधु है सकल है

खानों में बंद रहना जिससे बनेगा नहीं

अपने को अपने तक मानना मनेगा नहीं

अपने से उस तक चलेगा वह

बीज से कुसुम तक फलेगा वह

बिखरेगा फैलेगा धूल बन जाएगा

चाहोगे बिछेगा वह पंथ पर चाहोगे बनेगा दूर्वा

धारा बनेगा, अभी फूल बन जाएगा!
वही है, एक ही है! वही फूल बन जाता है, वही धूल बन जाता है। फिर धूल से फूल उग आते हैं, फिर फूल धूल में समा जाते हैं। वही जीवन की तरंग में उठता है, वही मृत्यु में शांत सो जाता है। दिन में वही जागता है, रात वही सोता है। वही भटकता है, वही पहुंचता है। लेकिन उसे जानने को कोई तर्क, कोई शास्त्र काम का नहीं। एक चीज भर काम की है--तुम्हारी संवेदनशीलता बढ़े।
इसलिए मैं तुमसे कहता हूं बार-बार : जितने ज्यादा प्रेमपूर्ण बन सको बनो। प्रेम से तुम पाओगे, प्रेम से तुम जानोगे, प्रेम से तुम पहचानोगे।

जो बात तुम्हारी करते हैं प्रभु रातों दिन

हमको लगती हैं उनकी बातें बहुत कठिन

वे जब देखो तब बहसें करते दिखते हैं

वे बड़े-बड़े ग्रंथों में तुमको लिखते हैं

वे तरहत्तरह का रूप तुम्हारा बतलाते

वे तुम्हें खोजने घने जंगलों में जाते

वे कहते हैं तुम छोटे हो अणु से कण से

फिर कहते हैं विस्तृत हो जग के आंगन से

प्रभु कुछ है ऐसे जिन्हें नहीं आता पढ़ना

जो नहीं जानते लिखना या बातें गढ़ना

वे सुबह किरण फूटी बिस्तर से उठ जाते

और अपने अनगढ़ स्वर में मन का सुख गाते

हम उनको सुनते हैं तो तुम मिल जाते हो

तुम उनके हाथों खेतों में खिल जाते हो
परमात्मा सब तरफ मौजूद है, ज़रा पंडित से बचना! परमात्मा सब तरफ से घेरे हुए है, ज़रा शास्त्र को विदा देना। और आस्तिक के शास्त्र हैं, नास्तिक के शास्त्र हैं; आस्तिक के पंडित हैं, नास्तिक के पंडित हैं।
पांडित्य से बचो। पांडित्य का क्या अर्थ होता है? पांडित्य का अर्थ होता हैः बिना जाने जानने की भ्रांति। अनुभवी बनो। ज्ञान से बचो, तो तुम ज्ञानी बन सकोगे। शास्त्र से बचो तो तुम्हारा अपना शास्त्र आविर्भूत हो सकेगा। वेद और कुरान से बच सके तो तुम्हारे भीतर से आयतें उठेंगी; तुम्हारे भीतर कुरान जन्मेगा; तुम्हारे भीतर वेद की ऋचा उठेगी। तुम पाओगे भीतर उपनिषद जन्मने लगे। और तभी तुम सारे शास्त्रों का सार भी पा जाओगे।
लेकिन सारी बात भीतर है। और सारी बात स्वयं को निखारने की है-- अपने मन के दर्पण को निखारने की है, पखारने की!

दूसरा प्रश्न : आप हमें अकसर समझाते हैं कि मन की बजाय हृदय की सुनो। लेकिन कोई कैसे जाने कि उसके मन की आवाज कौन है और उसके हृदय की आवाज कौन है? कुछ समझाने की अनुकंपा करें।

रेणुका! बात बिल्कुल सीधी-साफ है। ज़रा भी उलझन नहीं है।
मन सदा बाहर की तरफ ले जाने के इशारे करता है, हृदय सदा भीतर की तरफ ले जाने के इशारे करता है। जब कोई तुम्हारे भीतर बोले कि चलो बाहर, धन कमाओ, पद कमाओ, प्रतिष्ठा , महत्त्वाकांक्षा . . .तो समझना मन बोला; क्योंकि हृदय की ये आकांक्षाएं नहीं हैं। जब कोई कहे कि बैठो चुप, आंखें बंद करो, डूबो अपने में, डुबकी मारी अपने अस्तित्व में, अपने प्राणों की सुनो, भीतर जो नाद उठ रहा है उसमें पगो--तो जानना कि हृदय बोला है।
अंतर्यात्रा हृदय की सूचना है; बहिर्यात्रा, मन की। इसमें भूल का कोई कारण नहीं। जब द्वेष उठे तो जानना कि मन बोला और जब प्रेम उठे तो जानना कि हृदय बोला। जब विचार घेर लें तो जानना कि मन ने पकड़ा, और जब भावों की तरंगे उठें तो जानना कि मन ने पकड़ा, और जब भावों की तरंगें उठें तो जानना कि हृदय में हो। जब नकार उठे, नहीं कहने का मन हो, संदेह उठे, तो जानना कि मन बोल रहा है। क्योंकि मन का अस्त्र है नकार। जब प्रकार उठे, स्वीकार उठे, श्रद्धा उठे, तो जानना कि हृदय बोला। कठिनाई नहीं होगी।
चीजें बिल्कुल साफ-साफ हैं। उतनी ही साफ-साफ, जैसे सिर में दर्द होता है तो तुम्हें पता चलता है सिर में दर्द है और पैर में कांटा गड़ता है तो तुम्हें पता चलता है कि पैर में कांटा गड़ा है। इतनी ही साफ-साफ हैं। शायद बाहर तुम किसी को समझा न पाओ। कोई अगर पूछे कि कैसे तुम्हें पक्का होता है कि पेट में दर्द है कि सिर में दर्द है? क्या लक्ष्ण है? तो तुम कहोगे : लक्षण की कोई जरूरत नहीं, मुझे पता चलता है कि सिर में दर्द है या पेट में दर्द है। इसमें लक्षण की क्या जरूरत है? तुम डॉक्टर के पास जाओ और कहो कि मेरे सिर में दर्द है। वह कहे : पहले सिद्ध करो। तुम्हें कैसे पता चला? अगर कोई जोर देकर तुमसे पूछे कि कैसे पता चले, तो तुम्हें तो बहुत संदेह पैदा होने लगेगा कि पता नहीं पेट में है कि सिर में है? कोई अगर बहुत तुम्हें उलझाए, तो झंझट में डाल दे सकता है। लेकिन भीतर स्वर बिल्कुल साफ होते हैं।
इतनी ही साफ होती है बात हृदय की और मन की। ज़रा भी विभ्रम का कारण नहीं है। लेकिन विभ्रम पैदा हुआ है। और मैं समझा कि रेणुका का प्रश्न सार्थक है। बहुत लोगों को यह झंझट खड़ी होती है--कैसे समझें? पुरुषों को यह अकसर हो जाता है कि वे मन को ही हृदय समझ लेते हैं। और स्त्रियों को अकसर यह हो जाता है, वे हृदय को ही मन समझ लेती हैं। इसलिए पुरुष और स्त्रियों के बीच संवाद बड़ा मुश्किल होता है। पति-पत्नी के बीच संवाद कभी देखा है? होता ही नहीं। विवाद होता है, बोले कि विवाद . . .। धीरे-धीरे पति सीख ही लेता है कि बोलना ही नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन के बेटे को एक नाटक में एक पात्र मिला, काम करने का मौका मिला। विश्वविद्यालय में पढ़ता है। नाटक हुआ, घर आया, बाप से बोला कि मुझे भी पात्र मिला है, मुझे भी अभिनय करने का अवसर मिला है। पिता ने कहा : किस बात का पात्र मिला है, तू क्या अभिनय करेगा? बेटे ने कहा कि मुझे पति बनने का अभिनय करना है। बाप ने कहा : तू फिक्र मत कर, किए जा। कभी ऐसा भी समय आएगा कि तुझे बोलनेवाला अभिनय भी मिलेगा। इसमें तो बोलने की कोई जरूरत आनेवाली नहीं है। मगर अभ्यास करता चल।
पति बोलते ही नहीं, धीरे-धीरे चुप होने लगते हैं। इसी में सुरक्षा पाते हैं। कारण? बोलने से सिर्फ विवाद खड़ा होता है।
क्यों स्त्री और पुरुष के बीच संवाद नहीं हो पाता? दोनों के केंद्र अलग-अलग हैं। स्त्री भाव से जीती है, तर्क से नहीं। पुरुष तर्क से चलता है, विचार से चलता है, गणित से चलता है।
एक पति-पत्नी झगड़ रहे थे। पति ने कहा : बैठो, बैठकर शांति से, विचार पूर्वक बात करें। पत्नी ने कहा कि रहने दो, विचारपूर्वक बात नहीं करनी है। क्योंकि जब भी विचारपूर्वक मैं बात करती हूं, मैं हार जाती हूं। सीधी बातें होने दो, विचार इत्यादि को बीच में लाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि विचार से मुझे सदा हानि होती है।
पति सदा चाहता है कि विचारपूर्वक बात हो--शांति से बैठो, तुम अपनी कहो, मैं अपनी कहूं। विचारपूर्वक निर्णय करें। विचार पूर्वक निर्णय में स्त्री हार जाती है। इसलिए विचारपूर्वक निर्णय होने ही नहीं देती। तुम विचार कर रहे हो, वह रोना शुरू कर देती है। अब कोई सामने बैठकर रो रहा हो, विचार कैसे करोगे? तुम विचार कर रहे हो, वह चीजें तोड़ना-फोड़ना शुरू कर देती है। अब कैसे विचार करोगे? वह सिर्फ विचार में बाधा डाल रही है। वह यह कह रही है कि विचार नहीं चलने देंगे। क्योंकि विचार जब भी करो, तभी हार हो जाती है। वह भाव को बीच में ला रही है। वे जो आंसू हैं, भाव हैं। वह जो चीजें पटकना है, वह भी भाव हैं। वह तुम्हें उद्विग्न कर रही है। वह तुम्हें कह रही है मस्तिष्क से उतरो नीचे; यह कोई गणित का सवाल नहीं है, यह पति-पत्नी का संबंध है। इसमें हिसाब-किताब नहीं चलेगा, चलाओ दफ्तर में हिसाब-किताब! यहां तो सीधी-सीधी बात होगी। सीधी-सीधी बात का मतलब होता है कि पति की बिल्कुल समझ में नहीं आती।
भाव का एक अलग लोक है, तर्क का एक अलग लोक है। और बातें बहुत साफ हैं। अड़चन इसलिए पैदा हो जाती है कि हमें बचपन से कभी साफ-साफ बताया नहीं जाता, स्पष्ट नहीं किया जाता। हमारे विद्यापीठ हृदय को कोई ध्यान नहीं देते। सम्यक् शिक्षा कभी अगर होगी दुनिया में तो हम लोगों को बुद्धि को निष्णात करने की कला तो सिखाएंगे ही, हृदय को निखारने की कला भी सिखाएंगे। इतना ही नहीं, हम उनको यह भी समझाएंगे कि कब हृदय में उतरो, कब बुद्धि में जाओ, कहां किसकी जरूरत है। जब दुकान पर बैठे हो, बाजार में काम कर रहे हो, तो एक बात; जब घर आए हो, अपने बेटे से बात कर रहे हो, या अपनी पत्नी से बात कर रहे हो, तो दूसरी दुनिया है। यहां उपकरण हृदय का काम आएगा।
जब परमात्मा के सामने मंदिर में झुके हो तो यहां तर्क इत्यादि को हटा दो। यहां भाव की तरंगों को उठने दो। यहां प्रार्थना के स्वर गूंजने दो। यहां प्रेम आए, और तुम प्रेम में दीवाने हो जाओ तो ही प्रार्थना सार्थक होगी।
पर यह लक्षण खयाल में रखो। मन बाहर जाने की बात करता है। द्वेष-प्रतिस्पर्धा, संघर्ष, प्रतियोगिता, तुलना, विचार का बवंडर खड़ा करता है। इनकार, "नहीं' सुगमता से आती है मन को, और संदेह स्वाभाविक है। संदेह मन का गुणधर्म है। जब संदेह उठे तो समझना कि तुम्हारा हृदय चुप है, तुम्हारा मस्तिष्क बोल रहा है। हृदय को बाहर से कुछ लेना-देना नहीं है। हृदय का सारा रस भीतर-भीतर है। हृदय तो ऐसा है जैसे वृक्ष की जड़ें जमीन के भीतर छिपी रहती हैं। शाखाएं ऊपर फैलती हैं, जड़ें भीतर छिपी रहती हैं। ऐसा ही हृदय भीतर छिपा है, उसमें तुम्हारे प्राणों की जड़ें हैं। जीवन का सारा सत्व वहीं से तुम पाते हो। जब भीतर जाने की बात उठे, तो हृदय की सुनना।
और जब भीतर जाने की बात उठे तो जान लेना कि हृदय ने पुकारा है। वहां द्वेष नहीं पैदा होता, क्योंकि वहां दूसरा नहीं है। दूसरा हो तो द्वेष, द्वैत हो तो द्वेष। वहां कोई दूसरा है ही नहीं, वहां बस अकेले तुम हो। वहां परम सुंदर एकांत है। उस एकांत में तो सिर्फ प्रेम ही तरंगें लेता है। यह भी जानकर तुम्हें हैरानी होगी! क्योंकि तुमने अब तक जो प्रेम जाना है, वह भी द्वेष का ही दूसरा हिस्सा है। तुमने असली प्रेम नहीं जाना। तुमने हृदय का प्रेम नहीं जाना।
तुम्हारे प्रेम का मतलब इतना ही होता है कि इस आदमी से हमें द्वेष नहीं है। तब तुम कहते हो : इससे हमारा प्रेम है। मगर जिससे तुम्हारा प्रेम है, एक क्षण में द्वेष हो जाता है। ज़रा-सी बात खटक जाए, तुम्हारे अनुकूल न हो, बस दुश्मनी हो गई! मित्रता को शत्रुता में बदलने में कितनी देर लगती है? तुम्हारी मित्रता-शत्रुता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तुम्हारा प्रेम बहुत कुछ प्रेम जैसा नहीं है, द्वेष का ही विपरीत हिस्सा है। इसलिए जिससे तुम्हारा द्वेष होता है, उससे ही तुम्हारा द्वेष भी होता है,र् ईष्या भी होती है।
मुल्ला नमरुद्दीन की पत्नी कल मुझे दिखाई पड़ी। आंखें सूजी-सूजी, चेहरा फुला-फुला। मैंने कहा : हुआ क्या? उसने कहा कि आपको पता नहीं कि मुल्ला बहुत बीमार हैं। तो मुझे जागना पड़ता है। तो मैंने पूछाः लेकिन मैंने तो सुना है कि रात जागने के लिए एक नर्स रख छोड़ी है। उसने कहा कि इसीलिए तो मुझे जागना पड़ता है। अब रात-भर नर्स पर नजर रखो। बीमार भला है, बिल्कुल मरणासन्न है, मगर इससे क्या फर्क पड़ता है तो वह मुल्ला नसरुद्दीन ! रात एकांत में छोड़ना नर्स के पास . . .नर्स नहीं थी तो मैं कभी-कभी थोड़ा-बहुत सो भी लेती थी, नर्स आयी तो मुझे बैठे रहना पड़ता है।
प्रेम में तुम्हारे भरोसा कहां है, श्रद्धा कहां है? तुम्हारा प्रेम तोर् ईष्या है, जलन है। तुम्हारा प्रेम तो एक तरह का बंधन है। नहीं, इस प्रेम की मैं बात नहीं कर रहा हूं। हृदय में जब प्रेम का आविर्भाव होता है तो वह प्रेम एक दशा है, संबंध नहीं। उसका किसी से कुछ लेना-देना नहीं है . . . कि पति से प्रेम, कि पत्नी से प्रेम, कि बेटे से, कि मां से, कि भाई से। जब तुम्हारे हृदय में प्रेम का जन्म होता है तो सिर्फ प्रेम का एक भाव होता है। तुम वृक्ष को भी छुओगे तो तुम्हारे हाथ में प्रेम होता है। तुम पत्थर को भी उठाओगे तो तुम्हारे हाथ में प्रेम होता है। तुम नदी में स्नान करने जाओगे तो नदी के प्रति तुम्हारे भीतर में प्रेम बहता होता है। तुम अकेले बैठोगे तो प्रेम की सुवास उड़ती रहती है। जो ले ले तुम्हारा प्रेम तब किसी के प्रति नवेदित नहीं होता, चारों ओर बहता है। बाढ़ आयी होती है . . .कंजूस नहीं होता, कृपण नहीं होता। तुम ऐसे घबड़ाए नहीं होते कि कहीं इसको दे दिया, तो फिर उसको क्या देंगे? प्रेम कोई ऐसी चीज थोड़े ही है।
प्रेम का अर्थशास्त्र भिन्न है। साधारण अर्थशास्त्र में तुम्हारे पास अगर पांच रुपए हैं और तुमने किसी को एक दे दिया, तो चार ही बचे। इसीलिए तुम्हारे साधारण जीवन में जो प्रेम है उसमेंर् ईष्या है। पत्नी घबड़ाई हुई है कि पति अगर किसी ओर से प्रेम से हंसकर बोल लिया तो फिर इतना कम हो गया। अब जब वह मेरे पास आएगा, तो इतना नहीं हंसेगा; इतनी हंसी तो निकल ही गई। कारतूस खाली है, अब बैठे रहो कारतूस खाली लिए।
तुम सोचते हो प्रेम कोई ऐसी चीज है कि करने से घटता है? तो तुम्हें प्रेम का पता नहीं है। फिर तुमने प्रेम का धोखा खा लिया है। हृदय का प्रेम जब उठता है तो जितना दो उतना बढ़ता है; जितना बांटो उतना बढ़ता है। अगर पति दिन-भर हंसता रहा है, दफ्तर में भी हंसा है, मित्रों के साथ भी मिला है, प्रसन्न रहा है, तो पत्नी के पास और भी ज्यादा प्रसन्न रहेगा। उसके दिन-भर की प्रसन्नता उसे प्रसन्न अर ताजा रखेगी, आनंदित रखेगी। पत्नी अगर दिन-भर प्रसन्न रही है, सहेलियों से मिली है, मित्रों से मिली है, बात की है, गीत गाए हैं, तो पति जब घर आएगा तो प्रसन्न होगी। अभी तो हालत उलटी है, दिन-भर वह उदास बैठी है। दिन-भर की उदासी इकट्ठी हो जाती है, बदला किससे लो? वह राह देखती है कि आओ। पति दिन-भर हंसा नहीं है, अब अगर हंसना भी चाहे तो ओंठ साथ न देंगे, हंसना चाहे तो हंसी न निकलेगी।
ऐसे ही समझो कि घर के बाहर गए कि सांस लेनी बंद कर दी, फिर घर क्या लौटोगे? मुर्दा लौटोगे। वह तो अच्छा कहो कि पत्नी यह नहीं कहती तुमसे कि घर के बाहर जाओ तो सांस मत लेना। जब आओ सांस सदा मेरे पास लेना। और पति पत्नियों से नहीं कहते कि देख, अब मैं जा रहा हूं, अब तू सांस बंद कर दे; जब मैं आऊंगा, जब हम दोनों पास-पास बैठेंगे, खूब प्रेम में मगन होंगे, सांस लेंगे।
मगर प्रेम के साथ यही हो रहा है। प्रेम श्वास है। जैसे शरीर श्वास से जीता है, ऐसे प्रेम से आत्मा जीती है। हृदय के दो अंग हैं। एक तो फेफड़े हैं, उन तक श्वास जाती है। फेफड़ों के पीछे ही छिपा हुआ अदृश्य हृदय है, उस तक प्रेम जाता है। सांस कम हो, देह निर्बल होने लगती है; प्रेम कम हो, आत्मा निर्बल होने लगती है। एक ऐसे प्रेम की जब तुम्हारे भीतर अभिव्यक्ति होने लगे, जिस प्रेम को बांटने में कंजूसी नहीं है, आनंद है; और जिस प्रेम में किसी एक दिशा में निवेदन नहीं है, सभी दिशाओं में बहाव है--उस दिन जानना, हृदय का प्रेम जन्मा।
यही प्रेम धीरे-धीरे प्रार्थना बनता है। और यह प्रेम जन्म सकता है तभी, जब तुम्हारे भीतर श्रद्धा हो। तुम्हारा तो प्रेम भी संदेह ही होता है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन सांझ घर लौटा। पत्नी ने उसके सारे कपड़े देखे, कोट देखा--कोई बाल इत्यादि नहीं मिल जाए, अकसर मिल जाता है। मिल जाता है तो झंझट शुरू हो जाती है। उस दिन बाल इत्यादि नहीं मिला, मुल्ला भी बिल्कुल सफाई करके आया था। खूब झड़-झड़ा कर आया था। बाल इत्यादि नहीं मिला। आज सोचता था कोई झंझट नहीं होगी, लेकिन एकदम पत्नी ने सिर पीट लिया और एकदम चिल्लाने लगी, रोने लगी। मुल्ला ने कहाः भई, न बाल मिला न कुछ, तू किसलिए रो रही, किसलिए चिल्ला रही? उसने कहा : अब तो हद हो गई, मालूम होता है अब तुम गंजी औरतों के साथ भी जाने लगे।
 संदेह तो संदेह है। हालांकि गंजी औरतें खोजना बहुत मुश्किल मामला है। मगर संदेह संदेह है।
तुम्हारे प्रेम में संदेह ही संदेह है, इसलिए वह प्रेम हृदय का नहीं है। जहां श्रद्धा का आविर्भाव होता है, जहां सब स्वीकार करने की क्षमता होती है, पात्रता होती है--फिर तुम्हें ज़रा भी भेद करने में अड़चन न आएगी। मन और हृदय की भाषाएं बिल्कुल अलग-अलग हैं।
हालांकि रेणुका, मैं जानता हूं लोगों के भीतर सब अस्त-व्यस्त हो गया है, खिचड़ी हो गया है। उनके भीतर कुछ भी साफ-सुथरा नहीं है। जो चीजें जहां होनी चाहिए वहां नहीं हैं। जैसे भूकंप आया हो और घर की चीजें सब अस्त-व्यस्त हो गई हों--ऐसा आदमी सदियों से भूकंप से गुजरता रहा है। सब अस्त-व्यस्त हो गया है। हाथ की जगह पैर हो गए हैं, पैर की जगह हाथ हो गए हैं। हृदय की जगह सिर हो गया है, सिर की जगह हृदय हो गया है। मनुष्य एक अराजकता हो गया है, इसलिए ऐसे सवाल उठते हैं।
लेकिन, अगर ज़रा समझपूर्वक, होशपूर्वक अपने भीतर खोजबीन करना शुरू करो तो चीजें फिर सजायी जा सकती हैं, फिर संवारी जा सकती हैं। इसी सजाने और संवारने को मैं संन्यास कह रहा हूं।
संन्यास से मेरा अर्थ इतना ही है कि तुम्हारे जीवन में एक संगीतपूर्ण छंद पैदा हो जाए, तुम सुव्यवस्थित हो जाओ। तुम्हारा मस्तिष्क मस्तिष्क हो, तुम्हारा हृदय हृदय हो। जब मस्तिष्क की जरूरत हो तो तुम उसका उपयोग कर सको। बेकार नहीं है, उसकी जरूरत है। अब कोई हृदय से गणित के सवाल हल नहीं किए जा सकते। लाख रोओ, गणित का सवाल हल नहीं होगा। अगर कोई वैज्ञानिक पहेली सुलझाना है तो कितना ही नाचो, इससे कोई वैज्ञानिक पहेली नहीं सुलझेगी, और उलझ जाए भला। लेकिन अगर परमात्मा की खोज करनी है तो नाचने से करीब पहुंचोगे। और किसी तरह कोई करीब पहुंचता ही नहीं है। नाचनेवाले ही उसके करीब पहुंचते हैं। वही उसकी यात्रा है।
बाहर की दुनिया के संबंध में अगर कुछ जानना हो--अर्थात् विज्ञान--तो मन, बुद्धि काम देती है; और परमात्मा के संबंध में अगर कुछ जानना हो--अर्थात् धर्म--तो हृदय काम देता है। दोनों की जरूरत है। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि हृदय को ही चुनो और मस्तिष्क को बिल्कुल फेंक दो। इतना ही कह रहा हूं कि तुम्हारी इतनी मालकियत होनी चाहिए कि जब जिसकी जरूरत हो उसका उपाय कर सको। किसी की भी तुम्हारे ऊपर मालकियत नहीं होनी चाहिए। यही स्वामित्व का अर्थ होता है कि जब मुझे चलना हो तो पैर का उपयोग करूं, जब मुझे बैठना हो तो पैर का उपयोग बंद कर दूं।
अब एक सज्जन बैठे हैं, वे पैर चलाए जा रहे हैं। कुछ लोग बैठे-बैठे चलाते रहते हैं। कुर्सी पर बैठे हैं, मगर उनकी टांगें चल रही हैं। इसका मतलब क्या है?
इनकी टांगें पागल हो गई हैं। इनको पक्का पता नहीं समझ में आ रहा है कि ये बैठे हैं, कि चल रहे हैं। अब पैर रुकने चाहिए। जब चलो तो चलने चाहिए। अगर बैठे-बैठे पैर चलते रहे तो जब चलने का मौका आएगा तब तुम पाओगे कि थके ही हुए हो। अब चलें कैसे? जब काम नहीं है बुद्धि का, तब भी बुद्धि चलती रहती है, तो जब काम आता है तब थके-मांदे होते हैं, तब बुद्धि काम नहीं करती।
उतना ही काम लो, जब काम हो--तुम सदा पाओगे तुम्हारे सब अंग ताजे हैं। तुम सदा पाओगे तुम्हारे सारे यंत्र सुचारू रूप से काम कर रहे हैं। और जब सारे जीवन के यंत्र सुचारू रूप से काम करते हैं तो उनमें एक छंद होता है, एक नाद होता है। वही नाद संन्यास है।

तीसरा प्रश्न : जगत् में सर्वाधिक मूल्यवान क्या है?

प्रेम! परमात्मा भी उतना मूल्यवान नहीं है। क्योंकि प्रेम मिल जाए तो परमात्मा मिल ही जाता है। और प्रेम के बिना परमात्मा मिलता नहीं। प्रेम सर्वाधिक मूल्यवान है, प्रार्थना भी उतनी मूल्यवान नहीं। क्योंकि जिसने प्रेम नहीं जाना वह प्रार्थना से परिचित ही नहीं हो सकेगा। प्रेम ही शुद्ध हो-हो कर प्रार्थना बनता है। प्रेम ही निखरकर प्रार्थना बनता है। प्रेम समझो कच्ची प्रार्थना, प्रार्थना पका प्रेम ।

इस पार उस पार

एक ही कगार

इस पार उस पार

आर-पार धार

इस पार उस पार

धार औ' कगार

इस पार उस पार

प्यार, प्यार, प्यार!
इस पार भी प्रेम महत्त्वपूर्ण है और उस पार भी प्रेम महत्त्वपूर्ण है। इस पार को उस पार से जोड़नेवाला ही प्रेम है। प्रेम सेतु है। प्रेम है इंद्रधनुष, जो जोड़ता है पदार्थ को परमात्मा से; जो जोड़ता है देह को आत्मा से। दृश्य और अदृश्य के बीच संवाद है, शब्द और मूल्य के बीच।

जलती ज्योति नहीं

जलता स्नेह,

यह जो फैला प्रकाश

समर्पित

अपरिमेय

मानव का मानव के लिए

अमिट नेह!
प्रेम करो। मनुष्य से शुरू करो, मगर रुक मत जाना, फैलता जाए . . .! जैसे कोई कंकड़ फेंकता है झील में, पहले तो छोटी-सी लहर उठती है वर्तुल, फिर फैलती जाती है लहर, फैलती जाती है लहर, दूर- दिगंत तक फैलती चली जाती है, अनंत के किनारों तक फैलती चली जाती है।
मनुष्य से प्रेम शुरू करो, क्योंकि वह तुम्हारे निकटतम है, लेकिन वहां रुक मत जाना। फिर फैलने दो प्रेम को। फिर पशु भी उसमें समाविष्ट हो जाएं। फिर पक्षी भी समाविष्ट हो जाएं। फिर पौधे भी समाविष्ट हो जाएं। फिर पत्थर भी समाविष्ट हो जाएं। इसीलिए हमने परमात्मा की मूर्तियां पत्थर की बनाई हैं, ताकि तुम्हारे प्रेम में पत्थर भी समाविष्ट हो जाए। मगर तुम ऐसे अद्भुत हो कि तुम मूल तो भूल ही जाते हो, तुम कुछ का कुछ करने लगते हो। पत्थर को समाविष्ट करना है प्रेम में। इसलिए पत्थर की मूर्तियां बनाई हैं ताकि तुम्हें याद रहे कि प्रेम जब तक पत्थर तक न पहुंच जाए तब तक समझना अभी यात्रा अधूरी है। और जहां से भी प्रेम सीखने की संभावना हो, जैसे भी, सीखो।

प्यार की सीमा नहीं है

मुक्त स्वर में कह सकूं वह शक्ति दे

प्यार के मेरे पुजारी मन

लुटा दूं प्यार पर सब कुछ मुझे वह भक्ति दे

फूल जैसे खिल गया

सीमा नहीं बांधी कि यह तोड़े कि वह तोड़े

उसी-जैसा लगा ले कंठ से हर कोई

न सोचूं बात नाते की कि यह जोड़े कि वह जोड़े

जिसे छू दूं वही

आभा समेटे स्वर्ण की सब धन्य हो जाए

सभी का मैं बनूं

सब बन सकें मेरे, नहीं कुछ अन्य हो पाए

बसे वह प्यार की बस्ती

कि जिसमें हर किसी का दुःख मेरा शूल हो जाए

मुझे तिरसूल भी मारे कोई यदि दूर करने में उसे

तो फूल हो जाए!
प्रेम चमत्कार है। प्रेम जादू है। अगर हृदय प्रेम से भरा हो, तुम्हारे लिए कांटे भी फूल हो जाते हैं। और अगर हृदय प्रेम से शून्य हो तो फूल भी कांटे हो जाते हैं। जिन्होंने प्रेम का जादू सीखा उन्होंने सारी दुनिया को रूपांतरित कर लिया है। यह सारा जगत् उनके लिए परमात्ममय हो जाता है।
लेकिन धर्म के नाम पर इतने झगड़े खड़े हुए हैं। हिंदू मुसलमान को काटता है, मुसलमान हिंदू को काटता है। कोई मंदिर तोड़ता है, कोई मस्जिद जलाता है। आदमी के पागलपन का कोई अंत नहीं मालूम होता। धर्म का तो सार प्रेम है। यह कैसा धर्म ? ऐसे धर्मों को जाने दो। ऐसे धर्मों को विदा दो। ऐसे धर्मों के जाने से पृथ्वी धन्यभागी होगी। इन पंडित-पुजारियों को जाने दो इनको अलविदा दो। काफी हो चुका उपद्रव। अब आदमी से आदमी के जुड़ने की बात हो।
यहां देखते हो तुम, सारे धर्मों के लोग हैं, सारी जातियों के लोग हैं, सारे रंगों के लोग हैं। न कोई विवाद है, न कोई झगड़ा है, न कोई उपद्रव है। अगर यह छोटे-से जमात में हो सकता है तो यही बड़ी जमात में हो सकता है, यह पूरी पृथ्वी पर हो सकता है। क्योंकि इन्हीं आदमियों से तो सारी पृथ्वी बनी है। कोई और अलग तरह के आदमी थोड़े ही हैं, इसी तरह के आदमी हैं। तुम जैसे ही लोग पृथ्वी पर हैं। लेकिन गलत धारणाओं ने, गलत सिद्धांतों ने, गलत शिक्षण ने, गलत संस्कारों ने एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया है। यहां तुम्हें खयाल भी नहीं आता कि तुम्हारे पड़ोस में जो बैठा है वह हिंदू है कि मुसलमान है कि ईसाई है कि जैन है कि बौद्ध है।
शुभ घड़ी होगी वह, जब प्रेम सारी पृथ्वी पर ऐसा फैले कि प्रेम ही एकमात्र धर्म रह जाए और प्रेम के द्वारा ही एकमात्र प्रार्थना का जन्म हो और लोग प्रेम से ही परमात्मा को पाने चलें। जिस दिन काबा और काशी एक ही प्रेम के तीर्थ हों, जिस दिन मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा जो करीब पड़ जाए वहीं जाकर आदमी नाच ले, प्रेम कर ले, प्रभु को स्मरण कर ले--तो इस पृथ्वी का रूपांतरण हो सकता है।
और होना अत्यंत जरूरी है अब। या तो आदमी बदलेगा या आदमी मरेगा। रोग उस सीमा पर पहुंच गया है कि अब बिना इलाज के काम चल नहीं सकता। यह आदमी इतना सड़ गया है अगर ऐसा ही आदमी रहा तो यह जमीन खाली हो जाएगी। यह जमीन लाशों से पट जाएगी। या तो मनुष्य समाप्त होगा और आत्महत्या कर लेगा, अपनी घृणा में डूबकर खुद ही मर जाएगा। अपने धर्मों की राजनीति और अपने राजनीतिज्ञों के उपद्रव में खुद ही भस्मीभूत हो जाएगा। और या फिर इस दुर्घटना के आने के कारण जागेगा, सजग होगा और रूपांतरित होगा। लेकिन अब आदमी जैसा अब तक था वैसा ही रहनेवाला नहीं है।
मैं तुम्हें जो संकेत दे रहा हूं, वे नए आदमी के संकेत हैं--नया आदमी कैसा होना चाहिए? और नए आदमी का धर्म क्या होगा? इस पृथ्वी पर अब कैसी प्रार्थना की भार-भंगिमा बनेगी; बननी चाहिए, जो आदमी को बचा सकती है। यह छोटा-सा प्रयोग विराट हो सकता है।
सभी प्रयोग प्रारंभ में छोटे-छोटे होते हैं। जीसस के साथ सौ-पचास लोग थे, कोई बड़ी संख्या न थी। बुद्ध के साथ कुछ हजार लोग थे, कोई बहुत बड़ी संख्या न थी। लेकिन प्रयोग फैले। पृथ्वी के कोने-कोने तक गए। यह छोटा-सा प्रयोग ... और तुम धन्यभागी हो कि इसमें भागीदार हो! आज तुम्हें पता भी न हो। जीसस के साथ जो चले थे उन्हें क्या पता था कि वे किस महत् प्रयोग में भाग ले रहे हैं। बुद्ध के साथ जो लोग चले थे, उन्हें क्या खबर थी? तुम्हें भी कुछ खबर नहीं है। तुम तो अपने-अपने कारणों से आ गए हो। किसी को छोटी-सी तकलीफ है, किसी को चिंता है, किसी को और दुःख है। तुम अपने दुःखों को मिटाने आ गए हो। तुम्हारे दुःख तो मिट ही जाएंगे। तुम्हारे दुःख मिट ही रहे हैं।
मेरे सामने एक और बड़ा चित्र भी है। उसमें पूरी मनुष्यता समाविष्ट है। एक और बड़ा दुःख है, जो हर आदमी को घेरे हुए है। वह भी मिट सकता है, अगर हम आनंद का, प्रेम का नाचता हुआ धर्म पैदा कर सकें--जो विशेषण न माने, जो सीमाएं न माने।
और सीमाएं बड़ी क्षुद्र बातों से बनती हैं। वे सभी क्षुद्र बातें एक ही बात की खबर देती हैं कि प्रेम कहीं कम पड़ गया होगा। इसलिए मैं कहता हूं : प्रेम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है इस जगत् में। सीखो प्रेम को। लोगों को काटो मत, जोड़ो।

किरणों को न काटो

ज्योति के द्वार नहीं पाटो

हम सब हैं एक प्राण

एक मन

लक्ष्य दीन जन का

लाख-लाख टुकड़ों में न बांटो!
मगर अब तक यही हआ है। आदमी वैसे ही दरिद्र है, वैसे ही दीन है, वैसे ही दुःखी है, और उसको बांटते चले जाओ . . .। बांटो मत, जोड़ो। तोड़ो मत। और जहां से भी आनंद के और प्रेम के स्वर सीखे जा सकें, वहीं से सीखो।

चलो उषा के पास

उसी से मांगें टटका हास

किरन का फूलों का

चलो उषा के पास

उसी से मांगें

नीला गगन

सुनहली सुबह

मोतिया घास

चलो शाम के पास

कि उगते तारागन ओढ़ें

चांदनी की चादर तानें

लगाएं हंसने में होड़ें

चांद से फूलों से

लहर से कूलों से

चलो रात के पास

अंधेरे को अपना समझें

उदासी को सपना समझें

दुःख को कर डालें आनंद

सुबह से लेकर मन के रंग

रात से लेकर मन के छंद!
चारों तरफ मौजूद है बहुत कुछ। ज़रा जुटाओ, आयोजन करो। सब साज मौजूद हैं, जमाना है, बिठाना है--विराट गीत पैदा हो सकता है। अपूर्व प्रेम की लपट जन्म सकती है।

चलो उषा के पास

उसी से मांगे टटका हास
आदमी तो हंसना भूल गया है, अब सुबह से मांग लें हंसी थोड़ी। सुबह के पास खूब हंसी है। सूरज आता है और सारे फूल हंसने लगते हैं। सुबह आया और सारे पक्षी हंसने लगते हैं।

चलो उषा के पास

उसी से मांगें टटका हास

किरन का फूलों का

चलो उषा के पास

 उसी से मांगें

नीला गगन
आदमी तो आंखें गड़ा लिया है जमीन में, आकाश की तरफ देखता ही नहीं। क्षुद्र में लीन हो गया, विराट की उसे पुकार सुनाई ही नहीं पड़ती।

चलो उषा के पास

उसी से मांगें

नीला गगन

सुनहली सुबह

मोतिया घास
आदमी तो हीरे-जवाहरातों में उलझ गया है। कौन देखता है कि मोतिया घास का सौंदर्य क्या है, कि जब घास पर मोती जम जाते हैं सुबह ओस के और सारे मोतियों को फीका कर जाते हैं! फूलों का सौंदर्य कौन देखे! कौन पूछे बेला से? कौन पूछे गुलाब से? लोग तो पत्थरों के पीछे पड़े हैं।

चलो उषा के पास

उसी से मांगें

नीला गगन

सुनहली सुबह

मोतिया घास

चलो शाम के पास

कि उगते तारागन ओढ़ें
रात आकाश से पूछो। रामनाम की चदरिया ओढ़ने से कुछ भी न होगा। उगते तारागन ओढ़ें। सारा आकाश तारों से भर जाता है, कभी इसकी चादर ओढ़ो और नाचो। यह चादर परमात्मा की है। परमात्मा न भी दिखाई पड़े, चादर तो दिखाई पड़ती है, इसे ओढ़ो और नाचो! इसे ओढ़कर नाचने में शायद उससे भी मिलना हो जाए। शायद उसकी थोड़ी गंध इस चादर में भी हो। है ही, उसी की रोशनी है।

चलो शाम के पास

कि उगते तारागन ओढ़ें

चांदनी की चादर तानें

लगाएं हंसने में होड़ें
लोगों ने रोने में होड़ें लगा रखी हैं! लोग हिंसा में, प्रतिहिंसा में होड़ें लगा बैठे हैं। हंसो, हंसाओ! दो घड़ी जीवन के, हंसने से पाटो इस रास्ते को।

लगाए हंसने में होड़ें

चांद से फूलों से

लहर से कूलों से
हराओ फूलों को हंसने से, हराना ही है तो। . . . चले चुनाव लड़ने! चला मुरारी हीरो बनने!. . .बचो! और अब तो मुरारी दिल्ली पहुंच गए। अब तो मुरारी हीरो भी नहीं बनते। अब तो वे कहते हैं : मैं हूं प्रधानमंत्री, और कोई भी नहीं!... फूलों से करो प्रतिस्पर्धा, तारों से करो प्रतिस्पर्धा। मजा आ जाएगा, रस बह जाएगा, प्रेम उमगेगा। तुम भी फूलों-से खिलोगे। तुम भी तारों-से हंसोगे। आदमी की यह वसीयत है। यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार को ऐसे ही छोड़ मत दो। यह अवसर ऐसा ही खो न जाए।

चलो रात के पास

अंधेरे को अपना समझें
अंधेरे की शांति देखी? अंधेरे का सन्नाटा देखा? अंधेरे का संगीत सुना? अंधेरे का विस्तार देखा? अंधेरे की शाश्वतता देखी? न आदि न अंत . . .!

चलो रात के पास

अंधेरे को अपना समझें

दुःख को कर डालें आनंद

सुबह से लेकर मन के रंग

रात से लेकर मन के छंद!
ऐसा मैं तुम्हें बनाना चाहता हूं। ऐसा तुम्हें देना चाहता हूं छंद, ऐसा रंग, ऐसा गीत, ऐसा राग! ऐसा तुम्हें देना चाहता हूं संन्यास, जो उत्सवपूर्ण हो; जो महोत्सव हो। लेकिन उस महोत्सव का केंद्र प्रेम ही हो सकता है, और कुछ नहीं।
तुम पूछते हो : जगत् में सर्वाधिक मूल्यवान क्या है? मैं तुमसे कहता हूं : प्रेम। और प्रेम उतरा कि परमात्मा उतरा।

आज उतरी किरन मन कमल हो गया

आज आंखों में पानी सजल हो गया

पास आई किरन हास मन में घुला

रूप चंदा का जैसे गगन में घुला

सब निखरकर धुला नभ विमल हो गया

आज उतरी किरन मन कमल हो गया

इस किरन को बसा लें अगर प्राण में

इस समय को समेटें अगर गान में

गूंथ लें कर्म में, रोज के धर्म में

तो सबल प्राण दिन यह सफल हो गया

आज उतरी किरन मन कमल हो गया
और इसलिए चाहता हूं कि तुम्हारा संन्यास तुम्हारे तन-प्राण में, तुम्हारे जीवन में, तुम्हारे व्यवहार में, तुम्हारे रोजमर्रा के दैनंदिन कामों में जुड़ जाए, संयुक्त हो जाए; उससे अलग न हो, पृथक् न हो।

गूंथ लें कर्म में रोज के धर्म में

तो सबल प्राण दिन यह सफल हो गया

आज उतरी किरण मन कमल हो गया!

अंतिम प्रश्न : भगवान्! अब दुल्हन हूं अपने पिया की! आपका आशीर्वाद।

स्वामी आनंद वैराग्य! यही घड़ी है, शुभ घड़ी! जिसकी प्रत्येक व्यक्ति प्रतीक्षा कर रहा है। जब कह सके : अब दुल्हन हूं अपने पिया की! जब अपने को समर्पित कर सके। जब उस प्यारे के पैर पकड़ ले।
और प्यार हो तो ही उसके पैर दिखाई पड़ सकते हैं, क्योंकि वे पैर स्थूल नहीं हैं। चमड़े की आंखों से दिखाई नहीं पड़ते हैं; प्रेम की सूक्ष्म आंखें चाहिए तो ही दिखाई पड़ते हैं। प्यारा तो सामने ही खड़ा है, तुम्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है; दिखाई पड़ जाए तो धन्य घड़ी आ गई। और तब सिवाय इसके क्या बचता है, कि हम नाचें मगन होकर!

अब दुल्हन हूं अपने पिया की!
एक ही पुरुष है इस जगत् में --परमात्मा ; शेष सब गोपियां हैं। ऐसा भक्ति का शास्त्र। ऐसा भक्ति का अपूर्व सूत्र!
मीरां गई वृंदावन। तो वृंदावन में एक मंदिर था, बड़ा मंदिर, सबसे बड़ा मंदिर, कृष्ण का मंदिर। उस मंदिर का जो पुजारी था, उसने स्त्रियों को न देखने का व्रत ले रखा था। कोई स्त्री मंदिर में अंदर नहीं जा सकती थी। जब पुजारी ने स्त्री न देखने का व्रत ले रखा हो तो कोई स्त्री मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं कर सकती थी। कोई स्त्री कभी प्रवेश नहीं की थी। मीरां तो नाचती हुई मंदिर में चली गई। द्वारपाल खड़े भी थे, मगर मीरां का नाच ऐसा था कि द्वारपाल नाच में भूल ही गए। वे मीरां के स्वर ऐसे थे कि मगन हो गए, द्वारपाल भी नाचने लगे! पहली बार कृष्ण का मंदिर, कृष्ण का मंदिर हुआ : नाच आया, गीत आया, मीरां आई! मीरा के बिना मंदिर खाली ही रहा होगा, मंदिर का देवता भी वहां नहीं रहा होगा, दुल्हन ही न हो तो दूल्हा भी वहां क्या करे? आज दुल्हन आई, मंदिर सप्राण हुआ, सजीव हुआ।
द्वारपाल भूल गए रोकना कि स्त्री को भीतर जाने की मनाही है। और मीरां तो ऐसी मस्ती में थी कि कोई रोकता तो रुकनेवाली थी भी नहीं। ऐसे लोग किसी को रुकनेवाले थोड़े ही होते हैं। वह तो भीतर पहुंच गई, पूजा चलती थी। पुजारी के हाथ से थाल गिर गया, स्त्री दिखाई पड़ गई! नारज हो गया पुजारी। चिल्लायाः बदतमीज स्त्री! भीतर कैसे आयी?
और मीरां हंसने लगी, और ऐसी हंसी कि जैसे फूल झर जाएं वृक्षों से और कहने लगी कि मैं तो सोचती थी कि कृष्ण के अतिरिक्त और कोई पुरुष नहीं है। तो तुम भी एक पुरुष हो? तो दुनिया में दो पुरुष हुए--एक कृष्ण और एक तुम। मैं तो सोचती थी उसके भक्त सभी उसकी गोपियां हैं। तुम क्या पूजा करते थे? तुम किसकी पूजा करते थे? अभी तुम्हारा पुरुष भी नहीं गया! पुरुष का अर्थ होता है : अकड़। पुरुष का अर्थ होता है : अहंकार। अभी तुम्हारा पुरुष भी नहीं गया, तुम किसकी पूजा करते थे? यह थाल तुम्हारे हाथ से नहीं गिरा; तुम्हारे सारे जीवन की पूजा अकारथ थी, यह सिद्ध हुआ।
कहते हैं पुजारी तो सकते में आ गया। बात तो सच थी। जैसे बिजली कौंध गई! गिर पड़ा चरणों में मीरां के। जिसने कभी स्त्री न देखी थी उसने स्त्री के पैर पकड़ लिए। जिसने कभी स्त्री छुई न थी, वर्षों बीत गए थे। सोचता था मैं ब्रह्मचारी हूं। आज उसे पता चला कि उसे भक्ति के शास्त्र का क, , ग भी मालूम नहीं है।
एक ही पुरुष है, परमात्मा ! आनंद वैराग्य, ठीक भाव उठा : अब दुल्हन हूं अपने पिया की! मेरे पूरे आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं। इसी कोशिश में तो लगा हूं कि सभी यहां दुल्हन की तरह सज जाएं। सभी ऐसे नाचें, सभी के मन ऐसी उमंग से भरें, जैसे दुल्हन के भरे होते हैं, जो चल पड़ी है पिया से मिलने!
अकबर शिकार को गया था। सांझ हो गई, नमाज पढ़ने बैठा। एक स्त्री भागी हुई उसके पास से निकल गई उसको धक्का मारती हुई। वह नमाज पढ़ रहा था, लुढ़क गया। बहुत नाराज हुआ। एक तो अकबर, सम्राट्! . . . मगर अब नमाज में बीच में बोले भी कैसे? जल्दी नमाज पूरी की। जब तक पूरी की तब तक वह स्त्री वापिस आती थी। रोककर उसे कहा कि तू होश में है या बेहोश है? एक तो कोई नमाज पढ़ रहा हो, कोई भी नमाज पढ़ रहा हो, कोई भी प्रार्थना कर रहा हो, तो इतनी तो समझ होनी चाहिए, इतना तो संस्कार होना चाहिए कि उसकी नमाज में बाधा न दो। फिर मैं तेरा सम्राट् हूं, मैं देश का सम्राट्, तू मुझे धक्का देती गयी! इतने जोर से धक्का मारा तूने भागते हुए कि मैं लुढ़क ही पड़ा।
उस स्त्री ने कहा : आप नमाज पढ़ रहे थे? क्षमा करें! मुझे कुछ पता नहीं। मुझे किसी ने खबर दे दी कि मेरा प्रेमी आ रहा है तो मैं दौड़कर रास्ते पर उससे मिलने गई थी। मुझे तो होश ही नहीं था। जब प्रेमी आ रहा हो तो कैसे होश रहे? मुझे पता ही नहीं। मेरा धक्का आपको लगा और आप लुढ़क गए तो एक बात पक्की है कि आपका धक्का भी मुझे लगा होगा। हम दोनों टकराए होंगे। मगर मुझे याद नहीं है। मैं अपने प्रेमी से मिलने जा रही थी। लेकिन महाराज एक प्रश्न मेरे मन में उठता है : आप अपने प्रेमी से मिलने में लगे थे, प्रार्थना कर रहे थे, नमाज पढ? रहे थे, आपको मेरा धक्का पता चल गया? आप उस परम प्यारे की याद कर रहे थे और आपको मेरा धक्का पता चल गया? और मैं तो अपने साधारण-से प्रेमी से मिलने गई थी, जो आया भी नहीं। खबर झूठी थी। मैं तो झूठी खबर में ऐसी लीन हो गई थी; तुम सच्चे प्रेमी से मिलने चले थे, जो कि सदा का ही आया हुआ है, फिर भी तुम्हें मेरा धक्का पता चल गया? तुम्हारी आंखों में क्रोध है। मुझे क्षमा करो!
अकबर ने अपनी आत्मकथा में लिखवाया है कि उस दिन मुझे पता चला कि मैंने अभी प्रार्थना करना सीखा ही नहीं। अभी परमात्मा मेरे लिए प्रेमी भी नहीं हो पाया है। मैं अभी प्रेयसी भी नहीं हो पाया हूं।
प्रेम जगे, और तुम दुल्हन बन जाओ, तो चमत्कार हो जाता है। ऐसा चमत्कार--

क्या इल्म उन्होंने सीख लिए जो, बिन लिक्खे को बांचे हैं!

जो बात नहीं मुंह से निकली बिन होंठ हिलाए जांचे हैं!

दिल उनके तार सितारों के, तन उनके तबलत्तमाचे हैं

मुंह चंग-जबां, दिल सारंगी, पग घुंघरू, हाथ कमांचे हैं।

हैं राग उन्हीं के रंग भरे, जो भाव उन्हीं के सांचे हैं

जो बेगत, बेसुरत्ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं।

कुल बाजे बजकर टूट गए, आवाज लगी जब लहराने

जो छम-छम घुंघरू बंद हुए, तब गत का अंत लगे पाने।

संगीत नहीं यह संगत है, नटुवे भी जिससे नट माने

यह नाच कोई क्या पहचाने, इस नाच को नाचे सो जाने।

हैं राग उन्हीं के रंग भरे, जो भाव उन्हीं के सांचे हैं

जो बेगत, बेसुरत्ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं।।
एक जादू आ जाता है, जब प्रेम उतरता है। फिर न तो ताल की कोई चिंता है, न वाद्य की कोई चिंता है। वीणा टूटी भी पड़ी रहे तो भी उससे स्वर उठते हैं।

हैं राग उन्हीं के रंग भरे, जो भाव उन्हीं के सांचे हैं

जो बेगत, बेसुरत्ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं।

कुल बाजे बजकर टूट गए, आवाज लगी जब लहराने

और छम-छम घुंघरू बंद हुए तब गत का अंत लगे पाने।

आ गया जादू का वह क्षण, दुल्हन होकर नाचो!

जो आग जिगर में भड़की है, उस मिश्अल की उजियाली है

जो मुंह पर हुस्न की जर्दी है, उस जर्दी की सब लाली है।

जिस गत पर उनका पांव पड़ा, उस गत की चाल निराली

जिस मजलिस में वह नाचे हैं, वह मजलिस सबसे खाली है।

हैं राग उन्हीं के रंग भरे, औ भाव उन्हीं के सांचे हैं

जो बेगत, बेसुरत्ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं।

अब नाचो, नाचने की घड़ी आ गई!

था जिनकी खातिर नाच किया, जब मूरत उनकी आय गयी


कहीं "आप' कहा, कहीं "नाच' कहा, औ तान कहीं लहराया गयी।

जब छैल-छबीले सुंदर की छवि, नयनों अंदर आय गयी

एक मूर्च्छा गत से आय गयी, औ जोत में जोत समाय गयी।

हैं राग उन्हीं के रंग भरे, और भाव उन्हीं के सांचे हैं

जो बेगत, बेसुरत्ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं


अब रुको मत। अब ठहरो मत। अब अपने को संभालना मत। 

सब होश बदन का दूर हुआ, जब गत पर आ मृदंग बजी

तन भंग हुआ, दिल दंग हुआ, सब आन गयी, बे-आन सभी।

ये नाचा कौन,"नजीर' अब यां, औ रकिस ने देखा नाच अजी

जब बूंद मिली जा दरिया में, इस तान का आखिर, निकला जी।

हैं राग उन्हीं के रंग भरे, औ भाव उन्हीं के सांचे हैं

जो बेगत, बेसुरत्ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं।।

आज इतना ही।