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सोमवार, 6 मार्च 2017

ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूूंदर दास)--प्रवचन-14



ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-चौदहवां
प्रश्‍नसार:


1--एकांत मधुर है
भगवान्!

मेरी निंदिया में तुम, मेरे ख्वाबों में तुम

हो गए हम तुम्हारी मुहब्बत में गुम

मन की वीणा की धुन गा रही है सुन

हो गए हम तेरी मुहब्बत में गुम!

2-भगवान्! कभी आप कहते हैं कि सपने
          सच नहीं होते और कभी कहा है कि स्वप्न
          की अवस्था बहुत ग्राहक होती है और स्वप्न
          में कभी संदेह नहीं उठता। और मैं आपके
          साथ उन नौ सालों में स्वप्न से ही जुड़ी
          रही हूं, और कोई कड़ी आपसे जुड़ी नहीं
          थी। और अब भी जो बातें आपसे कहनी
          होती हैं या आप मुझे कुछ कहना चाहते हैं,
          वह सब स्वप्नों में ही होता रहता है। तो
          यह कैसी अवस्था है? इसमें सच क्या है?
          इस पर मार्गदर्शन की कृपा करें।


3-आबू के पावन पर्वत पर जब आपने
          "प्रेम वेदांत' नाम दिया था, तब तो एड़ी से
          चोटी तक घृणा और द्वेष से लबालब भरा
          था। आपके चरणों में बैठते-बैठते प्रेम के
          पारस का स्पर्श हुआ है। परंतु इसके साथ
          "वेदांत' का अर्थ अभी तक नहीं खुल पाया
          है। स्पष्ट कर अनुगृहित करें।

          यह जीवन क्या है?

4-भगवान्! आप इस पद पर कैसे पहुंचे?

          आप कहते हैं ध्यान एकाकी यात्रा है।
          और अकेलेपन से मैं बहुत डरता हूं। मुझे
          साहस दें।

          समाज और शासन आपके विरोध में
          क्यों हैं? निरंतर आपकी आवाज दबाने की
          क्यों कोशिश की जा रही है?

पहला प्रश्न : भगवान् !

मेरी निंदिया में तुम मेरे ख्वाबों में तुम

हो गए हम तुम्हारी मुहब्ब्त में गुम

मन की वीणा की धुन गा रही है सुन

हो गए हम तुम्हारी मुहब्बत में गुम
भगवान्! कभी आप कहते हैं कि सपने सच नहीं होते और कभी कहा है कि स्वप्न की अवस्था बहुत ग्राहक होती है और स्वप्न में कभी संदेह नहीं उठता। और मैं आपके साथ उन नौ सालों में स्वप्न से ही जुड़ी रही हूं, और कोई कड़ी आप से नहीं जुड़ी थी। और अब भी जो बातें आपसे कहनी होती हैं या आप मुझे कुछ कहना चाहते हैं, वह सब स्वप्नों में ही होता रहता है। तो यह कैसी अवस्था है? इसमें सच क्या है? इस पर मार्ग दर्शन की कृपा करें।
वीणा! प्रेम में भेद गिर जाते हैं--बाहर के, भीतर के; मेरे, तेरे; स्वप्न के, सत्य के। प्रेम अभेद की स्थापना है। प्रेम में दुई मिट जाती है, दोपन मिट जाता है, एकपन ही शेष रह जाता है। प्रेम में न तो कुछ माया है न ब्रह्म, न संसार है न निर्वाण। प्रेम का स्वाद एक है जैसे सागर का स्वाद एक है।
जैसे-जैसे प्रेम गहन होगा वैसे-वैसे सत्य में और स्वप्न में कोई भेद न रह जाएगा। वैसे-वैसे बाहर और भीतर में अभेद अपने-आप निर्मित हो जाता है। सब भेद बुद्धि के हैं, हृदय कोई भेद नहीं जानता। हृदय की पहचान तो बस अभेद की है।
प्रश्न संगत मालूम होता है--"स्वप्न सच है या झूठ?' बुद्धि स्वप्न पर ही प्रश्न नहीं उठाती, बुद्धि तो जिसको हम सच कहते हैं उस पर भी प्रश्न उठाती है--"संसार सच है या झूठ?' बुद्धि तो सभी चीजों पर प्रश्न उठाती है। बुद्धि में प्रश्न ऐसे ही लगते हैं जैसे वृक्षों में पत्ते लगते हैं। बुद्धि की प्रक्रिया प्रश्नों को जन्माने की प्रक्रिया है। निष्प्रश्न होना है, प्रश्नों के पार चलना है।
प्रेम के अतिरिक्त और कोई द्वार नहीं है प्रश्नों के पार जाने का। प्रेम पूछता ही नहीं--प्रेम जीता है। पूछो मत, जियो। और कुछ चीजें हैं जो पूछने से नष्ट हो जाती हैं। और कुछ चीजें हैं जिन पर विचार करोगे, विश्लेषण करोगे, छिन्न-भिन्न हो जाएंगी। प्रेम हो तो प्रेम में डूबो; प्रेम का विश्लेषण मत करना। फूल हो तो फूल के सौंदर्य को अनुभव करो; फूल को तोड़त्ताड़ कर उसकी पत्तियों को उखाड़ कर, उसकी पंखुरियों को बिखेरकर, उसके भीतर झांकने मत लगना कि सौंदर्य कहां छिपा है, अन्यथा जो था वह भी खो जाएगा।
बुद्धि ऐसे ही तो धीरे-धीरे जगत् से सारी चीजों को समाप्त कर दी है। परमात्मा खो गया है--बुद्धि के कारण। समाधि खो गई--बुद्धि के कारण। प्रेम भी तिरोहित हो गया है--बुद्धि के कारण। सौंदर्य भी गया। जगत् एकदम खाली हो गया है, थोथा हो गया है। प्रेम ने जो मूल्य जगत् को दिए थे, बुद्धि ने सब छीन लिए हैं। हृदय ने जो रंग भरे थे, बुद्धि ने सब पोत डाले ।
परमात्मा की प्रतीति हृदय का रंग है। बुद्धि उसे स्वीकार नहीं करेगी। बुद्धि तो केवल क्षुद्र को स्वीकार कर सकती है, जो उसके विश्लेषण की पकड़ में आ जाए।
कुछ चीजें हैं जो अविश्लिष्ट हैं और शुभ हैं कि उनका विश्लेषण नहीं होता। जैसे जड़ें वृक्षों की जमीन में छिपी होती हैं, उन्हें भूलकर भी उखाड़कर बाहर देखने मत लगना। यह मत सोचना कि वृक्ष को जड़ तो होगी, रस तो मिलता होगा भूमि से, कहां से मिलता है, कैसे मिलता है? वृक्ष को उखाड़कर मत देख लेना जिज्ञासा के कारण। वृक्ष की जड़ों को धूप में मत ले आना, अन्यथा वृक्ष मर जाएगा। उसकी जड़ें उखड़ जाएंगी। जड़ें तो होती ही अंधेरे में हैं, मौन में, शून्य में, शांति में--जहां सूरज की किरण भी नहीं पहुंचती, वहां।
जहां विचार की किरण नहीं पहुंचती, वहीं तुम्हारे जीवन की जड़ें हैं। जहां बुद्धि का कोई व्यापार नहीं पहुंचता, वहीं तुम्हारे सारे रसस्रोत हैं। इसलिए पूछो ही मत। जो हो रहा है उसके अनुभव में उतरो। उसका अनुभव ही सिद्ध करेगा कि यह सच है या झूठ है।
प्रेम में और प्रमाण लाने की आवश्यकता नहीं है। प्रेम स्वतः प्रमाण है। प्रेम को किसी और गवाही की जरूरत नहीं है, प्रेम स्वयं ही अपनी गवाही है और उसके अतिरिक्त कोई गवाही हो भी नहीं सकती। दीया जल रहा हो तो देखने के लिए दीए को, कोई और दूसरा दीया थोड़े ही लाना पड़ता है। दीया स्वतः प्रकाश है ऐसे ही प्रेम का दीया भी स्वतः प्रमाण है।
मुल्ला नसरुद्दीन किसी के घर नौकरी करता था, किसी नवाब के घर। सुबह हो गयी। मुल्ला सोया पड़ा है। उसके मालिक ने पूछा कि नसरुद्दीन, ज़रा उठकर बाहर देख, (सर्दी की मीठी सुबह) सूरज अभी निकला है या नहीं?
नसरुद्दीन बाहर गया। फिर भीतर आया। बिना उत्तर दिए लालटेन जलाने लगा। मालिक ने पूछा : तू क्या कर रहा है? मैं पूछता हूं, सुबह हुई या नहीं? सूरज निकला या नहीं?
नसरुद्दीन ने कहाः वही तो कर रहा हूं। बाहर गया, बहुत अंधेरा है। लालटेन जलाकर ले जा रहा हूं, देखने कि सूरज निकला या नहीं।
सूरज को देखने के लिए लालटेन जलाकर ले जानी पड़ेगी? प्रेम के देखने के लिए किसी और दीए की जरूरत नहीं है। प्रेम तो स्वतः अपनी सिद्धि है। रस लो, रस विभोर होओ। और जैसे-जैसे रस गहन होगा, वैसे-वैसे प्रामाणिकता अनुभव में आएगी।
प्रेम से रहित संसार भी झूठा है, प्रेम से भरे स्वप्न भी सच हैं।
पश्चिम में सिग्मंड फ्रायड ने स्वप्नों पर बहुत बड़ा काम किया है, लेकिन केवल एक तरह के स्वप्नों पर काम किया। उन स्वप्नों को हम कह सकते हैं वासना के स्वप्न--मनुष्य की दमित वासना के स्वप्न, अपूर वासना के स्वप्न, दुष्पूर वासना के स्वप्न। मनुष्य के भीतर नरक पाया है उसने। क्योंकि न मालूम कितनी अपूर्ण वासनाएं मनुष्य के भीतर पड़ी हैं। उन सबका ढेर लगा है। उन्हीं वासनाओं से तुम्हारे स्वप्न उठते हैं।
यह बात आधी सच है। और जहां तक सच है वहां तक बिल्कुल सच है। लेकिन एक और तरह के स्वप्न होते हैं, जो वासना के स्वप्न नहीं हैं, जिनको हम कहें --प्रार्थना के स्वप्न। वह दूसरा ही लोक है। अगर वासना के स्वप्न अंधकारपूर्ण हैं तो प्रार्थना के स्वप्न प्रकाशपूर्ण हैं। अगर वासना के स्वप्न उन वासनाओं से पैदा होते हैं जो तुमने जी नहीं और दबाकर रख ली हैं; जिनकी छाती पर तुम चढ़कर बैठ गए हो; समाज ने, संस्कार ने, सभ्यता ने जिन्हें तुम्हें जीने दिया; जिनका दमन करने की तुम्हें शिक्षा दी गयी है--उन दबाई गई वासनाओं से स्वप्न उठते हैं, एक प्रकार के। फ्रायड ने उनका ही विश्लेषण किया है। एक और तरह का स्वप्न का जगत् है, जो उनसे ठीक उलटा है : प्रार्थना के स्वप्न।
जैसे दबाई गई वासनाओं से स्वप्न उठते हैं, वैसे ही उठाई गई प्रार्थनाओं से स्वप्न उठते हैं। जिन प्रार्थनाओं को तुमने उठाया है, जगाया है, उनसे स्वप्नों का एक नया अस्तित्व शुरू होता है। वासना को दबाओ तो स्वप्न पैदा होता है। प्रार्थना को जगाओ तो स्वप्न पैदा होता है। वासना तो सभी को मिली है, जन्म के साथ मिली है। दबाने का काम समाज की शिक्षा करवा देती है। प्रार्थना तो जन्म से नहीं मिली है और जगानेवाले लोग कभी लाखों में एक-आध होते हैं। उसी के लिए सुंदरदास ने कहाः समागम करो, संत-समागम करो, जहां प्रार्थना जगे।
शायद फ्रायड के अनुभव में कोई भक्त कभी आया ही न होगा। आने का कोई कारण भी न था। फ्रायड तो उन्हीं का विश्लेषण करता रहा जो रुग्ण थे, परेशान थे, पीड़ित थे। कोई भक्त अपनी अंतर्दशाओं का विश्लेषण करवाने तो जाएगा नहीं। कोई सुंदरदास तो फ्रायड के सामने अपने अंतर का निवेदन न करेगा। उसे तो निवेदन करना होगा तो अपने गुरु से करेगा। उसका गुरु ही समझेगा, जो प्रार्थना में और भी आगे गया है। जो परमात्मा में गया है, वही प्रार्थना की बात समझ सकेगा।
अब वीणा अगर अपना प्रश्न फ्रायड से पूछे तो वह इस प्रश्न की पूरी की पूरी प्रक्रिया को भ्रष्ट कर देगा। वह कहेगा : यह भी दबी हुई वासना है। वह समझने की कोशिश करेगा कि यह प्रेम भी वासना का ही विस्तार है। परमात्मा के प्रति जो प्रेम है, वह भी वासना का ही विस्तार है! फ्रायड की सोचने की पद्धति है। तो फिर वासना के अतिरिक्त कुछ बचता ही नहीं। और अगर वासना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचता तो मनुष्य के जीवन का सार भी कुछ नहीं बचता, अभिप्राय भी कुछ नहीं बचता, अर्थ भी कुछ नहीं बचता। फिर मनुष्य का अतिक्रमण भी नहीं हो सकता। फिर मनुष्य व्यर्थ है। फिर होना-न-होना बराबर है। अगर मनुष्य अपने से पार नहीं जा सकता तो उसके जीवन में कोई मूल्य नहीं हो सकता। मूल्य का पदार्पण होता है अपने से पार जाने में।
प्रार्थना का अर्थ है : अपने से पार जाना। प्रार्थना का अर्थ है : अपने से दूर जाना और परमात्मा के पास जाना। वासना अहं-केंद्रित होती है। प्रार्थना परमात्मा-केंद्रित होती है। वासना कहती है, मैं प्रार्थना कहती हूं, तू। ये दोनों अलग आयाम हैं।
अभी प्रार्थना के स्वप्नों का विश्लेषण करने वाला फ्रायड पैदा होने को है, अभी पैदा नहीं हुआ। और जब तक पैदा न होगा तब तक स्वप्नों का जो विज्ञान निर्मित हो रहा है, वह अधूरा रहेगा, पूरी तरह अधूरा रहेगा।
तुमने पूछा . . .और यह सच है, वीणा मुझे मिली नौ वर्ष पहले और फिर खो गयी। फिर कोई मेरे और उसके बीच संबंध नहीं था। लेकिन फिर भी जुड़ी रही और नहीं खोई। कोई दृश्य संबंध नहीं था, लेकिन अदृश्य में जुड़ी रही, स्वप्नों में जुड़ी रही, चेतना की गहराइयों में जुड़ी रही। उसके प्राण कहीं गहरे में मुझे पुकारते ही रहे। और वह पुकार व्यर्थ नहीं गई। वह पुकार मुझ तक पहुंचती रही। उसी पुकार का परिणाम है कि फिर उसका आना हो गया। अदृश्य में जड़ें फैलती रहीं, अब दृश्य में भी पत्ते आने शुरू हो गए हैं, फूल लगने शुरू हो गए हैं। अदृश्य में तैयारी होती रही। जैसे गर्भ में बच्चा बड़ा होता है, ऐसे प्रार्थना पकती रही, पकती रही, पकती रही। अब प्रार्थना के जन्म का क्षण करीब आ गया है।
ठीक है कि "उन सात सालों में मैं आपसे स्वप्न से ही जुड़ रही हूं, और कोई कड़ी आपसे नहीं जुड़ी थी। और जो भी बातें आपसे करनी होती हैं या आप मुझे कुछ कहना चाहते हैं वह सब स्वप्नों में ही होता रहता है।' ठीक हो रहा है, शुभ हो रहा है। ज़रा भी कहीं भूल-चूक नहीं है। इतनी तन्मयता से उसे होने दो कि संदेह की कोई रूपरेखा भी उसके पास न रह जाए और तब स्वप्न भी सत्य के पास लाने का सेतु बन जाते हैं।
इस जगत् में सभी चीजें परमात्मा की तरफ ले जाने के लिए सेतु बनानी हैं, स्वप्न भी! माया को भी उसका ही द्वार बनाना है। है ही उसका द्वार। हम जहां हैं वहीं से हमें उसकी तरफ चल पड़ना है। यही तो मेरा बुनियादी संदेश है तुम्हें कि मैं तुम्हें छोड़ने को कुछ भी नहीं कहता। स्वप्न भी छोड़ने को नहीं कहता हूं, क्योंकि स्वप्न की ऊर्जा को भी उसी को समर्पित करो। स्वप्नों को भी उसी के गीत और गूंज से भर जाने दो। स्वप्न भी उसी के घिर जाएं। स्वप्न में भी उसकी धूप जले, उसकी पूजा उतरे। स्वप्न में भी उसकी आरती उठे। और जो तुम्हारे स्वप्न में उतरने लगेगा, वह तुम्हारे जीवन में भी फैल जाएगा। क्योंकि तुम्हारा जीवन ऐसे ही है जैसे वृक्षों के पत्ते हैं और फल। और तुम्हारे स्वप्न ऐसे ही हैं जैसे वृक्षों की जड़ें।
तुम्हारे स्वप्न बस स्वप्न मात्र नहीं हैं, क्योंकि जो तुम सपने में देखते हो, जो तुम सपने में पाते हो, उसकी छाया, उसके परिणाम, तुम्हारे चौबीस घंटे के जीवन पर पड़ते हैं।
अब ज़रा सोचना, किसी रात तुमने स्वप्न देखा कि किसी की हत्या कर दी; सुबह पाया कि हत्या की थी, सपना था; लेकिन उस दिन तुम दिन-भर पाओगे कि चित्त खिन्न है। हालांकि हत्या सपने में की थी और कुछ भी हुआ नहीं। कोई मारा नहीं गया है। अदालत तुम्हें पकड़ेगी नहीं। खून की एक बूंद नहीं गिरी है और गवाह कोई नहीं है। मगर चित्त खिन्न रहेगा, उदास रहेगा, अपराध-भाव से भरा रहेगा। हत्या हुई या नहीं, यह सवाल नहीं है; हत्या करने का भाव तो तुममें उठा ही है।
यही तो पाप और अपराध का भेद है। अपराध का अर्थ है : भाव उठा और भाव के अनुसार कृत्य हुआ। लेकिन पाप का अर्थ है : भाव उठा, पाप हो गया। अपराध हुआ हो न हुआ हो, अदालत पकड़ सके न पकड़ सके; लेकिन उस परम ऊर्जा के समक्ष तुम दोषी हो गए।
जब कोई आदमी किसी की हत्या करता तो पहले तो भाव ही उठता है न, कृत्य पहले तो नहीं होता। हत्या करने के पहले न मालूम कितनी बार सोचता है! सोच-सोच कर, विचार कर-करके भाव को सघन करता है । फिर भाव इतना सघन हो जाता है कि हत्या करनी पड़ती है।
दोस्तोवस्की के प्रसिद्ध उपन्यास "क्राइम एंड पनिश्मेंट' में एक विद्यार्थी रासकोल्निकोव . . .वह जिस मकान के सामने रहता है उस मकान में एक बूढ़ी औरत रहती है। होगी अस्सी साल से ऊपर। दिखाई भी उसे ठीक से नहीं पड़ता, चलना भी बहुत मुश्किल है, उसका धंधा भी बड़ा खतरनाक है। धंधा है उसका, चीजें गिरवी रखना। महाकंजूस है। और जो उसके हाथ में फंस जाता है, उसे चूस ही लेती है। फिर उसकी चीज कभी वापिस नहीं लौटती। उसका ब्याज भी इतना है कि वही नहीं चुकता, मूल तो चुकेगा कैसे? यह रासकोल्निकोव उसके सामने ही रहता है, विद्यार्थी है विश्वविद्यालय का। यह अपनी खिड़की से देखता रहता है, रोज लोग फंसते हैं। और जो उसके चक्कर में फंसा, गया! जैसे मकड़ी कोई जाला फैलाए, ऐसे ही वह बुढ़िया अपना जाला फैला रही है।
यह रासकोल्निकोव ऐसे ही सोचता है कि इस बुढ़िया को करना क्या है, इसके पास बहुत है! न बेटा है, न बेटी है, न कोई आगे न कोई पीछे। इसके पास जितना है काफी है। नगर के आधे मकान इसके हैं। धन भी खूब है। अब यह किसलिए चूस रही है? ऐसा सोचते-सोचते उसके मन में यह विचार उठता है : इसको तो कोई मार ही डाले तो अच्छा है। न इसके होने से दुनिया को कोई लाभ है न इसकी कोई जरूरत है, न ही यह किसी उपयोग की है, न इसके अपने जीवन में अब कुछ अर्थ रहा है। मौत के कगार पर खड़ी है, एक पैर तो इसका कब्र में ही है। कोई इसको मार ही डाले तो न मालूम कितने लोगों का छुटकारा हो जाए! इसकी मृत्यु पाप नहीं हो सकती। इसको मारा जाना एक तरह का पुण्य-कृत्य होगा।
सिर्फ सोचता ही है। फिर उसकी परीक्षा के दिन करीब आते हैं। परीक्षा की फीस भरनी है और उसके घर से रुपए नहीं आए तो वह अपनी घड़ी गिरवी रखने उस बुढ़िया के पास जाता है। सांझ का समय है, बुढ़िया को ठीक से दिखाई नहीं पड़ता, वह उसकी घड़ी को गौर से देखती है रोशनी के पास ले जाकर। जब वह रोशनी के पास घड़ी को देख रही है तब कमरे में कोई भी नहीं है। तीसरी मंजिल मकान है। तीसरी मंजिल पर वे हैं। रासकोल्निकोव पीछे खड़ा है, अचानक क्या उसे होता है, पास में पड़ा हुआ जो भी उसे मिल गया उसने उठाकर उसके सिर पर दे मारा। उसकी पीठ उसकी तरफ है। बुढ़िया तो गिर गई। गिरने को ही थी, जैसे सूखा पत्ता था कुछ मारने में देर न लगी, कुछ खास चोट भी नहीं थी, ज़रा-सी चोट लगी कि वह गिर गयी। तब उसे होश हुआ कि यह मैंने क्या कर दिया! कंप गया, घबड़ा गया! भागा, किसी ने देखा भी नहीं, कोई गवाह भी नहीं। अपने कमरे में आ गया, लेकिन उसे एक बात समझ में नहीं आती कि मैंने इसे मार क्यों डाला? भाव सघन होता रहा, हालांकि कभी उसने ऐसा नहीं सोचा था कि मैं इसे मार डालूं। इतना ही सोचता था कि कोई इसे मार डाले तो अच्छा। और यह भी कभी नहीं सोचा था कि इस तरह सोचना, कृत्य बन जाएगा।
भाव कृत्य बन जाते हैं। पाप बनने की प्रक्रिया पहले है, फिर अपराध। पाप बीज है, अपराध उसकी परिणति है। अपराध न भी हो तो भी पाप हो गया। अपराध सामाजिक कृत्य है, पाप धार्मिक कृत्य है।
तो अगर तुमने स्वप्न में किसी की हत्या की है तो तुम पाओगे; दिन-भर एक उदासी तुम्हें घेरे है। तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं। तुम उस दिन दिन में कई बार हाथ धोओगे। और किसी रात अगर तुमने किसी को डूबते नदी में से बचाया है तो तुम दिन-भर पाओगे एक प्रफुल्लता, एक भीनी-भीनी महक तुम्हें घेरे हुए है। यद्यपि जिसको बचाया है वह डूबता भी नहीं था, कोई डूबने वाला था भी नहीं--सिर्फ स्वप्न था! स्वप्न की तरंगें भी तुम्हें आंदोलित करती हैं।
स्वप्न के विज्ञान को पूरब ने खूब विकसित किया था। इतना विकसित किया था कि स्वप्न देखने की क्षमता, और जैसा स्वप्न देखना चाहो वैसे स्वप्न देखने की क्षमता के सूत्र भी खोज लिए थे।
जागरण को ही नहीं बदला जा सकता है, स्वप्न भी बदले जा सकते हैं। तुम अपने स्वप्नों के भी सर्जक हो सकते हो। भक्त अनजाने ही अपने स्वप्नों का सर्जक हो जाता है। वह परमात्मा को स्मरण करते ही सोता है। जब नींद उतरने लगती है तब भी परमात्मा का स्मरण गूंजता रहता है। धीमी-धीमी आवाज, धीमी-धीमी आवाज. . .स्मरण, फिर नींद पकड़ लेती है। लेकिन स्मरण चेतन से अचेतन में उतर जाता है। अगर कृष्ण का भक्त है तो रात कृष्ण को देखता है, उनके साथ रास रचाता है, उनके साथ नाचता है। उनकी बांसुरी सुनाई पड़ती है।
और खयाल रखना, इसका परिणाम होनेवाला है। जीवन में यह बांसुरी सुनाई पड़ती है।
और खयाल रखना, इसका परिणाम होनेवाला है। जीवन में यह बांसुरी जो आज स्वप्न में सुनी है, कल जागने में सुनाई पड़ेगी। क्योंकि स्वप्न में जिसके आधार रखे गए हैं, जागने में उसके कलश उठेंगे।
स्वप्न और जागरण संयुक्त हैं। क्यों? क्योंकि स्वप्न भी तुम्हारा है, जागरण भी तुम्हारा है, तुम तो दोनों में मौजूद हो। जो स्वप्न देखता है वही जागता है। फिर जैसे स्वप्न देखता है वैसा ही तो जागरण भी होगा। प्रेमी भी अनजाने अपने स्वप्नों का स्रष्टा हो जाता है।
वीणा ! तूने प्रेम किया, गहरा प्रेम किया! तूने प्रार्थना की। उस प्रार्थना के परिणाम होने शुरू हुए हैं। पहले स्वप्न में उतरे, अब तेरे बाहर के जीवन तक फैलने शुरू हो गए हैं। अब तेरा सारा जीवन इससे भरेगा। इसके विश्लेषण में जाने की कोई भी जरूरत नहीं है। इसका रस ले।
          रोज प्रकट होता है भीतर वह
          किंतु शांत उस स्वर को सुनते नहीं हमारे कान
          रोज प्रकट होता है बाहर वह
          किंतु ज्वलंत शिखा के देखे छुप जाते हैं प्राण
          किसी कोने में जाकर
          रोज-रोज प्रभु लौट रहे हैं
          हम तक आकर!
परमात्मा रोज तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता है। उसकी दस्तक की आवाज धीमी है। तुम्हारे कान जब सुनने में समर्थ हो जाएंगे, संवेदनशील हो जाएंगे, तुम दस्तक पहचानोगे।
रोज परमात्मा भीतर से पुकारता है--तुम्हारे सपनों में भी, तुम्हारी निद्रा में भी! उसका रथ आता है। उसके हाथ तुम तक पहुंचते हैं। वह तुम्हें तलाश रहा है। इस भ्रांति को तो छोड़ ही देना कि तुम्हीं परमात्मा को तलाश रहे हो। तुम्हारी अकेली तलाश से कुछ भी न होगा, यह आग तो दोनों तरफ से लगे तभी परिणाम लाती है। वह भी तलाश रहा है।
          गीत बन जाते हृदय के भाव
          गीत बन जाते
          तोड़ बंधन और बाधा
          गीत ये फिर-फिर उमड़ते
          उड़ स्वरों के पंख पर फिर
          वर्ण-भास्वर गगन जाते
          गीत बन जाते हृदय के भाव
          गीत बन जाते
          जब नयन में रूप आता
          रंग आता
          तब तरंगित हंस
          मानस छोड़ उड़ते
          नील नभ को पार करते
          किस दिशा में मगन
          गीत बन जाते हृदय के भाव
          गीत बन जाते
          कौन परिचय कौन संचय
          जन्म कैसे, किस तरह छय
          कौन जाने
          किंतु भू के भाव ये
          उड़ गगन जाते
          गीत बन जाते हृदय के भाव
          गीत बन जाते
जो भाव तुम्हारे भीतर सघन होते हैं, वे ही तुम्हारे स्वप्न बनते हैं, वे ही तुम्हारे गीत बनते हैं, वे ही तुम्हारे कृत्य बनते हैं। धीरे-धीरे तुम्हारा सारा जीवन आच्छादित हो जाता है। होने दो आच्छादन।
भेद जाने दो--सत्य के और स्वप्न के। वे सब तर्क के भेद हैं, नहीं तो एक ही है। वही स्वप्न है, वही सत्य है। वही संसार है, वही निर्वाण।
          धारा ऊंचे से गिरती है तोड़कर सन्नाटा
          टूटती है तारिका चीरकर आकाश
          चुपचाप फैल जाती है धरती भर चांदनी
          नेह आंखों का टपककर चू जाता है प्राणों में
          छू जाता है जब आंचल निराकार का
          इतना सब एक साथ हो जाता है तब
          टूट जाता है सन्नाटा खिंच जाती है लकीर
          फैल जाता है प्रकाश
          आकाश धरती और मन सब एक हो जाते हैं
          धारा के तारा के भेद खो जाते हैं
          फिर वहां कुछ पता नहीं चलता क्या सच क्या झूठ . . .
          छू जाता है जब आंचल निराकार का!
          इतना सब एक साथ हो जाता है तब
          आकाश और धरती और मन सब एक हो जाते हैं
          धारा के तारा के भेद खो जाते हैं
प्रेम है अभेद का विज्ञान। . . .तुम्हें जगा रहा हूं--तुम्हारे जागते में भी जगा रहा हूं! और अगर तुम मुझसे जुड़े तो तुम्हारे सोते में भी जगाऊंगा। तुम्हें पुकार रहा हूं, जब तुम खुली आंख बैठे हो। और तुम अगर मुझसे जुड़े तो तब भी पुकारूंगा जब तुम अपनी गहन तंद्रा में हो, निद्रा में हो। तुम्हारे स्वप्न में भी उतरना शुरू हो जाऊंगा, हृदय का द्वार खुला मिलना चाहिए।
          उठो आंख खोलो कि पौ फट गयी है
          युगों की अंधेरी निशा कट गई है
          नया प्राण लेकर हवा आ रही है
          नया गान लेकर सबा आ रही है
          कली खिल गई है नया रूप धरकर
          नया रंग भरकर किरन छा रही है
          कमल के दलों की खुशी कुछ न पूछो
          उदासी की छाया सभी हट गई है
          उठो आंख खोलो कि पौ फट गयी है
          युगों की अंधेरी निशा कट गई है।
क्यों मैंने तुम्हें पुकारा है? क्यों तुम्हें रंगने में लगा हूं? इसीलिए! न केवल तुम्हारा जागरण रंग जाए, तुम्हारा स्वप्न भी रंग जाए।
मनुष्य के चित्त की चार दशाएं हैं। जाग्रत, जिससे हम परिचित हैं। स्वप्न, जिसकी थोड़ी-थोड़ी झलक हमें सुबह याद रह जाती है। फिर सुषुप्ति, उसकी तो हमें याद भी नहीं रहती, सिर्फ एक आभास होता है कि रात गहरी नींद सोए। बड़ी शांत निद्रा थी, स्वप्न भी नहीं आए! बस इतनी ही याद आती है कि स्वप्न नहीं थे तो नींद गहरी रही होगी, ऐसा नकारात्मक आभास होता है। और फिर एक चौथी दशा है--तुरीय। उस चौथी दशा तक तुम्हें ले चलना है।
गुरु का साथ तीसरी दशा तक होता है। जाग्रत में गुरु जुड़ेगा, स्वप्न में गुरु जुड़ेगा, सुषुप्ति में गुरु जुड़ेगा। जब तक गुरु तुम्हें सुषुप्ति के द्वार से तुरीय में धक्का न दे दे तब तक साथ रहेगा। और तुरीय में धक्का देने पर साथ छूट जाता है, ऐसा कहना ठीक नहीं; तुरीय में धक्का देने पर गुरु गुरु नहीं रह जाता, शिष्य शिष्य नहीं रह जाता, दोनों एक हो जाते हैं। साथ के लिए तो दो का होना जरूरी है। इसलिए सुषुप्ति तक साथ, सुषुप्ति के आगे एकात्म!
              वह निशा चली गई
              जो अब तक
              रंग रंग के सपने देती रही
              उड़ो विहग--
              जिन किरणों ने
              कोमल स्पर्श से
              तुमको अपना प्रिय परिचय दिया
              उनको अब अपना लो
              उड़ो विहग--
              अब प्रकाश ही प्रकाश
              भूतल पर नभतल पर
              ये प्रकाश की लहरें
              उज्जवल से उज्जवलतर
              तिरते हैं जड़-चेतन
              चर-अचर
              उड़ो विहग!
वीणा! उड़ने का क्षण आ गया! जुड़ने का क्षण आ गया! मिटने का क्षण आ गया। अब बुद्धि के विचार छोड़ो। अब विश्लेषण की चिंता में मत पड़ो। अब क्या है स्वप्न, क्या है सत्य--जिन्हें कुछ और काम नहीं है उन्हें इनका विश्लेषण करने दो। तुम तो उतरो, तुम तो डूबो, तुम तो पियो।
दूसरा प्रश्न : आबू के पावन पर्वत पर जब आपने "प्रेम वेदांत' नाम दिया था, तब तो ऐड़ी से चोटी तक घृणा और द्वेष से लबालब भरा था। आपके चरणों में बैठते-बैठते प्रेम के पारस का स्पर्श हुआ है। परंतु इसके साथ "वेदांत' का अर्थ अभी तक नहीं खुल पाया है। स्पष्ट कर अनुगृहीत करें।
जैसे प्रेम का अर्थ खुला ऐसे ही वेदांत का भी खुलेगा, ज़रा धीरज रखो। प्रेम का अर्थ खुला तो वेदांत का अर्थ खुलेगा ही, क्योंकि प्रेम कुंजी है वेदांत की।
वेदांत बड़ा प्यारा शब्द है; वेदांतियों ने खराब कर दिया, दूसरी बात है। वेदांतियों ने तो अर्थ का अनर्थ कर दिया, वह दूसरी बात है। मगर वेदांत शब्द बड़ा अद्भुत है। उसका सार अपूर्व रूप से क्रांतिकारी है। वेदांत शब्द आग्नेय है।
वेदांत का अर्थ होता हैः जहां सब शास्त्र समाप्त हो जाते हैं, जहां वेद समाप्त हो जाते हैं, जहां वेदों का अंत आ जाता है। वहीं परमात्मा का प्रारंभ है।
वेदांत का अर्थ है : जहां शब्द गए, सिद्धांत गए, शास्त्र गए। वहीं सत्य का प्रारंभ है। कहां जाते हैं शब्द, सिद्धांत और शास्त्र ? कब जाते हैं? जब प्रेम का आविर्भाव होता है।
इसलिए प्रेम कुंजी है वेदांत की। जिसने प्रेम जाना, वह फिर किसी शास्त्र की चिंता नहीं लेगा। उसे परम शास्त्र हाथ लग गया। अब तो वह प्रेम को ही पढ़ेगा। प्रेम को ही गुनेगा। अब तो प्रेम में डुबकी लगाएगा। अब तो मिल गई उसे मधुशाला, अब मंदिरों से क्या लेना? अब तो हो गया पियक्कड़। अब तो डूबने लगा। परमात्मा ने उसे पुकार ही लिया है।
मैं जब तुम्हें नाम देता हूं तो अनेक कारणों से देता हूं। तुम ठीक ही कहते हो कि जब आपने प्रेम वेदांत नाम दिया था तब तो एड़ी से चोटी तक घृणा और द्वेष से लबालब भरा था।
घृणा और द्वेष उसी ऊर्जा के अंग हैं जिससे प्रेम बनता है। घृणा प्रेम का विकृत रूप है। प्रेम नहीं बन पाए, तो वही ऊर्जा घृणा बन जाती है। सृजन का जीवन में आविर्भाव न हो तो वही ऊर्जा विध्वंस बन जाती है। जो बना न पाए वह मिटाने में लग जाता है। ऊर्जा कुछ तो करेगी! ऊर्जा का कुछ तो रूप प्रकट होगा!
इसलिए मैं तुमसे घृणा छोड़ने को नहीं कहता। तुम घृणा छोड़ भी न सकोगे। घृणा रोग नहीं है, रोग तो है कि प्रेम नहीं जन्म पा रहा है। प्रेम न जन्मे तो प्रेम की जो तुम संपदा लेकर आए हो, वह सड़ेगी। उसी की सड़ांध घृणा है। प्रेम बहने लगे, तुम अचानक पाओगे : सड़ांध गई!
जैसे कोई नदी बहती हो, तो नदी गंदी नहीं होती। कूड़ा-करकट उसमें बहुत गिरता है, सारा कूड़ा-करकट उसमें गिरता रहता है। नगरों-नगरों की गंदगी ले जाती है। नदी, फिर भी स्वच्छ की स्वच्छ! बहाव उसे स्वच्छ रखता है। फिर एक डबरा होता है। उस डबरे में भी कूड़ा-करकट गिरता है, लेकिन सब सड़ता है। भयंकर दुर्गंध उठनी शुरू हो जाती है।
जिनके जीवन में प्रेम नहीं है उनके जीवन में घृणा की दुर्गंध आएगी, क्योंकि वे डबरे की भांति हैं। जिनके जीवन में प्रेम है उनके जीवन में प्रवाह है। कचरा तो गिरता है, कचरा तो गिरता ही रहेगा, लेकिन प्रवाह कहां सुनता है कचरे की! बहा ले जाता है सब। दूर सागर में जाकर सब फेंक देता है। और सागर विराट है . . सबको लीन कर लेता है, सब को आत्मसात कर लेता है।
तुम घृणा से भरे थे, यह देखकर ही तुम्हें "प्रेम' नाम दिया था। इसी बात की याद दिलाने को कि तुमने संपत्ति को विपत्त बना लिया है। तुम शीर्षासन कर रहे हो नाहक! पैर के बल खड़े हो जाओ। ऊर्जा को उलटा कर बैठे रहो। और तुम कहते हो आपके चरणों में बैठते-बैठते प्रेम के पारस का स्पर्श हुआ है। अब तुम समझे प्रेम का अर्थ, क्यों तुम्हें नाम दिया था। स्वभावतः जिज्ञासा उठी होगी कि वेदांत और क्यों जोड़ दिया था?
प्रेम अगर वेदांत से न जुड़ा हो तो एक सीमा तक जा सकता है, लेकिन फिर अटक जाएगा। जैसे नदी को सागर से जुड़ना पड़ता है, ऐसे प्रेम को वेदांत से जुड़ना पड़ता है। नदी की अंतिम परिणति तो सागर है। प्रेम की अंतिम परिणति वेदांत है।
"वेदांत' से मेरा प्रयोजन वेदांतियोंवाला नहीं है। वह संप्रदाय वेदांत के नाम से जो चलता है उससे कुछ लेना-देना नहीं है। मैं तो वेदांत का शुद्ध अर्थ इतना ही करता हूं : जहां वेद छूट जाते हैं, शब्द छूट जाते हैं; जहां भाषा मौन हो जाती है; जहां बोलने को कुछ भी नहीं बचता; जहां अनिर्वचनीय आ जाता है, अव्याख्या के दर्शन होते हैं! नदी चल पड़ी, अब तुम डबरे नहीं हो! सागर भी आएगा। इतना हुआ, उतना भी होगा। अब तो श्रद्धा करो!
अगर घृणा प्रेम बन सकती है, बड़ा चमत्कार तो हो ही गया कि डबरा नदी बन गया, बहने लगा। गति आ गई अगति में। ठहरा हुआ गतिवान हो गया। अब दूसरी बात तो सहज हो जाएगी। बैठते ही रहे, जैसे अब तक बैठते रहे हो, इस पारस को अगर स्पर्श होने ही दिया, जैसा अब तक होने दिया है . . . जल्दी भाग मत जाना, क्योंकि कई बार ऐसा हो जाता है कि लोग सोचते हैं कि काफी हो गया, अब चलें। अब तो अपने पैर पर खड़े हो जाएं।
मैं भी चाहता हूं कि तुम अपने पैर पर खड़े हो जाओ। लेकिन प्रतीक्षा करना मेरी, जब मैं कहूं तब। नहीं तो तुम्हें कुछ पता ही नहीं कि कितना और हो सकता था। तुम्हें तो उतना ही पता होगा जितना हुआ है। और कई बार ऐसा होता है, गरीब आदमी को थोड़ा-सा भी धन मिले तो वह सोचता है : मिल गया सारा साम्राज्य ! तुम्हारे पास कितनी बड़ी संपदा है, कितनी बड़ी संपदा के तुम मालिक हो सकते हो-- इसका तुम्हें तब तक पता चलेगा ही नहीं जब तक तुम मालिक हो ही न जाओ।
चलने दो सत्संग! प्रेम भी आया, वेदांत भी आएगा। शब्द का अर्थ तो साफ है कि तुम्हें एक ऐसी चित्त की दशा में ले चलना है, एक ऐसे चैतन्य में ले चलना है, जहां निर्विकार, निराकार, निर्गुण का वास है। तुम्हें उस मूलस्रोत पर ले चलना है, जहां से हम उठे हैं और जहां हमें जाना है। ताकि वर्तुल पूरा हो जाए।
प्रेम यात्रा है; वेदांत तीर्थ है, जहां पहुंचना है। प्रेम तीर है; वेदांत लक्ष्य है। तीर चल पड़ा, अब लक्ष्य भी दूर नहीं। लक्ष्य की चिंता में न पड़ो, सारी ऊर्जा तीर को दे दो, ताकि गति त्वरा से, तीव्रता से हो; ताकि तीर अटके नहीं कहीं, भटके नहीं कहीं। रास्ते में बहुत भटकाव आते हैं, बहुत अटकाव आते हैं। उन सब को पार करना है।
और खयाल रखना, जो चल पड़ता है उसी को मुसीबतें आती हैं, जो बैठा रहता है उसको तो मुसीबत का कोई कारण ही नहीं। जो चलता है वही गिर सकता है; जो बैठा ही है वह तो गिरेगा ही क्यों? जो पहाड़ों की ऊंचाई चढ़ते हैं, वे खतरा मोल लेते हैं। गिरेंगे तो बुरी तरह गिरेंगे। इसलिए धर्म को खड्ग की धार कहा है, दुर्गम कहा है।
तुम चल पड़े। मेरी दृष्टि में तुम्हारे पैरों में गति आ गई। सागर भी दूर नहीं है। चलनेवाले से सागर दूर है ही नहीं। । एक ही अड़चन है इस जगत् में कि लोग डबरे हो जाते हैं। शास्त्रों के डबरे बन गए हैं; हिंदू, मुसलमान, ईसाई के डबरे बन गए हैं। तुम बह चले, अब न तुम हिंदू हो न मुसलमान हो न ईसाई हो। अब तुम कोई भी नहीं हो। अब तुम परमात्मा के हो और परमात्मा तुम्हारा है। कम, थोड़े-बहुत अटके हुए शास्त्र भी रहे होंगे अभी। वह तुम्हारी गति से मेरी समझ में आता है कि कहीं कुछ थोड़ा अभी अटका होगा। धारा अभी भी धीमे-धीमे जा रही है। अभी कुछ चट्टानें शास्त्रों की पड़ी होंगी। अचेतन में पड़ी होंगी, गहरे में पड़ी होंगी, जन्मों-जन्मों की पड़ी हैं, तुम्हें उनका पता भी न होगा।
बर्ट्रेंड रसेल ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं बचपन में ईसाई की तरह पाला पोसा गया। बड़ा हो गया, तब ईसाइयत से मेरा भरोसा उठ गया। ईसाइयत से ही नहीं, सारे धर्मों से मेरा भरोसा उठ गया।
बर्ट्रेंड रसेल ने बहुत प्रसिद्ध किताब लिखी है : हवॉय ऑय एम नाट ए क्रिश्चियन? मैं ईसाई क्यों नहीं हूं? उसका जवाब अभी भी कोई ईसाई दे नहीं पाया। वर्षों हो गए, अब तो बर्ट्रेंड रसेल जा भी चुके दुनिया से, मगर किताब अभी तक बेजवाब है। जो-जो प्रश्न उठाए थे वे वैसे के वैसे खड़े हैं।
रसेल ने लिखा है : सारे धर्मों से भरोसा उठ गया, ईसाइयत से तो बिल्कुल उठ गया, तब मैं बुद्ध से परिचित हुआ। यह मनुष्य अपूर्व मालूम हुआ। ऐसा लगा कि इतिहास में इससे ज्यादा शुद्धतम अभिव्यक्ति सत्य की और कभी नहीं हुई है। इससे बड़ा महामानव पृथ्वी पर कोई नहीं चला। यह बात बुद्धि को तो लगे, लेकिन जब भी मैं सोचूं तो कभी भी अपने अंतरतम में, अपने अचेतन में, बुद्ध को जीसस के ऊपर नहीं रख पाया। ईसाइयत से छुटकारा हो गया। बचपन के सारे संस्कार छूट गए। अब बुद्धि को साफ-साफ प्रमाणित भी हो गया है कि बुद्ध की बात बड़ी प्रगाढ़ है।
और यह सच है, बुद्ध के वचन जितने शुद्ध हैं उतने किसी के वचन नहीं हैं। सत्य को सभी ने कहा है, मगर जैसा बुद्ध ने कहा है उतने साहस से किसी ने भी नहीं कहा है! सत्य को बहुतों ने कहा है। जीसस ने भी कहा, मुहम्मद ने भी कहा, कृष्ण ने भी कहा, महावीर ने भी कहा; लेकिन जैसा बुद्ध ने कहा है, उतनी परम शुद्धता से किसी ने भी नहीं कहा है। सबने जाना--वही एक सत्य जाना--लेकिन बुद्ध के कहने की क्षमता अपूर्व है!
फिर भी बर्ट्रेंड रसेल लिखता है कि अपने गहरे मन में मैं नंबर दो पर ही रख पाता हूं बुद्ध को, नंबर एक पर नहीं रख पाता। नंबर एक पर तो जीसस बैठे हैं सो बैठे हैं। जानता हूं, सोचता हूं, मगर सोचना और जानना काम नहीं कर पाता। संस्कार बहुत गहरे बैठ जाते हैं।
तो प्रेम वेदांत! नाम तो मैंने तुम्हें वेदांत दिया, यह मेरी आशा है तुम्हारे लिए, ऐसा कभी हो। लेकिन अभी वेद पड़े हैं। फिर वेद का नाम कुरान है कि बाइबिल, इससे कुछ प्रयोजन नहीं है। वेद पड़े हैं। अभी भी शास्त्र कहीं अटके हैं। तुम्हारी धारा चल पड़ी है, शास्त्रों के बीच में से रास्ता निकालकर बहने भी लगी है। लेकिन अभी धारा चट्टानों में बह रही है शास्त्रों के; अभी निर्बाध नहीं हो पायी है। बैठते ही रहे अगर, अगर मेरी चोटें खाते ही रहे, सहते ही रहे, अगर गर्दन को कट ही जाने दिया, तो एक दिन धारा निर्बाध होकर बहेगी। उस दिन तुम जानोगे वेदांत क्या है।
वेदांत कहा नहीं जा सकता, लेकिन अनुभव का रास्ता मैंने बता दिया है। कुंजी तुम्हें दे दी है। प्रेम कुंजी है।

तीसरा प्रश्न : यह जीवन क्या है?
मूर्च्छा से देखो तो "पानी केरा बुदबुदा'; होश से देखो तो परमात्मा। यह जीवन दोनों है। अंधे की तरह देखो तो क्षणभंगुर--अभी है, अभी गया!
सुबह घास के पत्ते पर जमी ओस की बूंद हैं; सूरज निकलेगा, उड़ जाएगी।
नाव में बैठे गए यात्री हैं, जैसा सुंदरदास ने कहा। मिल गए घड़ी-भर को, उस पार नाव पहुंच जाएगी, सब अपने-अपने रास्तों पर विदा हो जाएंगे।
या सांझ को वृक्ष पर इकट्ठे हो गए पक्षियों का मेला। सोएंगे रात-भर, सूरज उगेगा, सुबह उड़ जाएंगे।
मूर्च्छा से देखो तो जीवन बस ऐसा है--
          दिवस की ज्योति हुई सरसों के फूल-सी
          सरसों के फूल-सी
          लहराया ज्वार में
          धरती से आसमान
          एक रंग
          भिन्न रूप
          धरती से आसमान
          सुंदरता छाई है सरसों के फूल-सी
          सरसों के फूल-सी
          संचित आनंद उड़ा
          गीतों के पर खोले
          लहरों सा
          खेल रहा
          गीतों के पर खोले
          यह श्री झर जाएगी सरसों के फूल-सी
          सरसों के फूल-सी
सरसों का फूल देखा--अब झरा तब झरा! सुबह का डूबता तारा देखा? --अब गया तब गया! ऐसा है जीवन, मूर्छा से देखो तो क्षणभंगुर!
          एक-एक सांस से
          जुड़ा हुआ
          एक-एक तार से
          बुना हुआ
          कौन जाने कब टूटे
          निश्चय क्या
          जीवन का निश्चय क्या
          लहरों पर दीप-दान
          होता है
          दीपक कब तक प्रकाश
          ढोता है
          अक्षय रहता प्रकाश
          परिचय क्या
          जीवन का निश्चय क्या
          हाथों से छूट
          छूट जाता है
          तारों से टूट
          टूट जाता है
          बंधन, संबंध, कौन
          संचय क्या
          जीवन का निश्चय क्या
          इस जीवन से तुम परिचित हो--
          एक एक सांस से
          जुड़ा हुआ
          एक एक तार से
          बुना हुआ
          कौन जाने कब टूटे
          निश्चय क्या, जीवन का निश्चय क्या!
चमत्कार है यह जीवन। जो सांस गयी शायद वापस न आए! कोई भरोसा नहीं। इस जीवन में जो अपने को उलझा लेता है, इस मूर्च्छा में जो मान लेता है, सब है, वह बुरी तरह भटक जाता है। एक और जीवन है--शाश्वत जीवन। और तुम्हें कठिनाई होगी यह जानकर कि वह जीवन और यह जीवन दो नहीं हैं। भेद मूर्च्छा और जाग्रति का है, जीवन तो एक ही है। मूच्र्छित देखो, क्षणभंगुर मालूम होता है; जागकर देखो, शाश्वत मालूम होता है। जिन्होंने जागकर देखा उनके लिए मृत्यु झूठी हो जाती है, जीवन शाश्वत हो जाता है। जिन्होंने सोए-सोए देखा, उनके लिए मृत्यु सच्ची मालूम होती है, जीवन झूठा मालूम होता है।
तुम देखते नहीं, जीवन में सिवाय मृत्यु के और कुछ भी निश्चित नहीं है! और सब अनिश्चित है; निश्चित है एक बात, वह है मृत्यु। यह भी खूब जीवन हुआ, जिसमें मृत्यु के अतिरिक्त और कुछ भी निश्चित नहीं है! पत्नी छोड़ दे, बांध डूब जाए, सरकार कानून बदल दे, हजार रुपए के नोट बंद हो जाएं, कुछ भी निश्चित नहीं है। लेकिन एक बात निश्चित है कि मृत्यु होगी, मृत्यु निश्चित होगी।
यह कैसा जीवन हुआ, जिसमें मृत्यु भर निश्चित है! नहीं, कहीं कुछ भूल हो रही है। जिन्होंने जागकर देखा, उन्होंने जीवन को शाश्वत पाया और मृत्यु को झूठा पाया। बुद्धों से पूछो, जाग्रत पुरुषों से पूछो, तो वे कहेंगे : मृत्यु झूठ है, जीवन सच है। तुमने जैसा जाना है वह तो बस ऐसा है :
बना बना कर चित्र सलोने यह सूना आकाश सजाया
          राग दिखाया रंग दिखाया,
          क्षण-क्षण छवि से चित्त चुराया
          बादल चले गए वे
          आसमान अब नीला-नीला
          एक रंग रस श्याम सजीला
          धरती पीली हरी रसीली,
          शिशिर प्रभात समुज्ज्वल गीला
          बादल चले गए वे
          दो दिन सुख का दो दिन दुःख का
          दुःख-सुख दोनों संगी जग में
          कभी हास है कभी अश्रु है
          जीवन नवलत्तरंगी जग में
          बदल चले गए वे
          दो दिन पाहुन जैसे रहकर बादल चले गए वे!
          बस, दो दिन पाहुन जैसे रहकर. . .।
          इस जीवन से जागो।
इस में छिपा हुआ एक तत्त्व है : तुम्हारा साक्षी-भाव। ओस की बूंद ही मत देखो। देख चुके ओस की बूंदें बहुत। और पानी के बनते बबूले ही मत देखो; देख चुके बनते और फूटते भी बहुत। इंद्रधनुषों में मत उलझो; देख चुके इंद्रधनुष बनते और मिटते बहुत। अब ज़रा उसे भी तो तलाशो, जो देख रहा है; जिसने बूंदों को बनते देखा मिटते देखा; इंद्रधनुष उठते देखे जाते देखे। अतिथि बहुत आए और गए, अब ज़रा आतिथेय को पहचानो।
झेन फकीर कहते हैं : बहुत दिन उलझे रहे मेहमानों में, अब ज़रा मेजबान को पहचानो। वह कौन है जो तुम्हारे भीतर सब देखता है? सुख को भी, दुःख को भी, सफलता-असफलता को, यश-अपयश को! जीवन को भी, मृत्यु को भी! वह कौन है जो तुम्हारे भीतर देखता है? जिस दिन तुम उसे देखने लगोगे, उस दिन शाश्वत से संबंध जुड़ गया। उस साक्षी को जानकर ही असली जीवन का स्वाद मिलता है
चौथा प्रश्न : भगवान्! आप इस पद पर कैसे पहुंचे?
कृष्णतीर्थ! यह कोई पद है? . . . चला मुरारी हीरो बनने! इसे तुम पद समझते हो? यह तो मिटने की प्रक्रिया है, मिटने की प्रक्रिया का अंत है।
मोक्ष को, निर्वाण को, समाधि को पद की भाषा में सोचना ही मत, नहीं तो अहंकार तुम्हारे सिर पर सवार हो जाएगा। पद के पीछे अहंकार अपने को छिपा लेगा। पद उसकी भाषा है। तुम तो इसे शून्य सोचो, मिटना सोचो, मृत्यु सोचो।
ऐसा मत पूछो कि आप इस पद पर कैसे पहुंचे? ऐसे पूछो कि आप मिटे कैसे? व्यक्ति मिटता है तो परमात्मा होता है। बूंद मिटती है तो सागर हो जाती है। गिरने दो बूंद सागर में। यद्यपि जब बूंद सागर में गिर जाती है तो सागर हो जाती है, लेकिन सागर तो होगी तब जब बूंद की तरह खो जाएगी।
पहले से ही पद की भाषा में सोचोगे तो खोने में डरोगे। वही तो अहंकार की दौड़ है--यह हो जाऊं, वह हो जाऊं, धनी हो जाऊं, यशस्वी हो जाऊं! अहंकार महत्त्वाकांक्षा है।
कुछ दिनों पहले मैं पढ़ रहा था, सामरसेट मॉम के भतीजे ने, रॉबिन मॉम ने एक किताब लिखी है : कंवर्सेशंस विद मॉम। सामरसेट मॉम इस सदी के प्रसिद्ध से प्रसिद्ध लेखकों में एक और सबसे ज्यादा धनी लेखकों में भी। जब मैं इस अंश पर आया तो बहुत चौंका। उसके भतीजे ने एक दिन सामरसेट मॉम से पूछा : "आपके जीवन की सबसे सुखद स्मृति क्या है?' मॉम हकलाए और कहा : "ऐसा . . . ऐसा कोई भी क्षण मैं याद नहीं कर पाता हूं।' भतीजा चौंका!
मॉम का लंबा जीवन सफलता ही सफलता की कहानी है। यश के एक सोपान से दूसरे सोपान पर चढ़ने की कहानी है। जगत्-ख्याति, जैसी किसी दूसरे लेखक की इस पूरी सदी में नहीं! और मॉम कहे कि "ऐसा कोई भी क्षण मैं याद नहीं कर पाता हूं जिसे मैं जीवन की सुखद स्मृति कहूं!'
भतीजे ने लिखा है : मैंने दीवानखाने में चारों ओर सजे हुए कीमती फर्नीचर, सजावटी सामान, कीमती पेंटिंग्स आदि पर नजर डाली, जो मॉम की सफलता के प्रतीक थे। इससे ज्यादा सुंदर सजा हुआ महल शायद पृथ्वी पर दूसरा हो! मुझे याद आया कि भूमध्यसागर के किनारे स्थित उनका यह महल और इसके साथ लगे बगीचे का मूल्य छह लाख पौंड है, करीब एक करोड़ रुपया। मॉम के पास ग्यारह नौकर थे जो सदा चौबीस घंटे उनकी सेवा में तत्पर रहते थे। वे ठोस सोने की रकाबियों में भोजन करते थे। हीरे-जवाहरात जड़ी हुई चीजों का उनके पास अंबार था।
भतीजा भरोसा न कर पाया। लेकिन उसने उस दिन बात वहीं छोड़ दी। दूसरे दिन दोपहर को, भतीजे ने लिखा है कि मैंने देखा कि वे सोफे पर लेटे हुए, बहुत मोटे टाइप में छपी बाइबिल के पन्ने पर नजर गड़ाए हुए कुछ पढ़ रहे हैं। आंखें उनकी कमजोर हो गयी थीं और केवल मोटे-मोटे अक्षरों में छपी हुई किताब ही वे पढ़ सकते थे। और अंतिम दिनों में सिवाय बाइबिल के और वे दूसरी किताब पढ़ते भी नहीं थे। उनका चेहरा बहुत गंभीर था। उन्होंने मुझसे कहा : "तुमने यह बाइबिल भेजी थी न, इसमें मैंने यह वाक्य पाया हैः मनुष्य समूचा संसार पा ले, मगर अपनी आत्मा गंवा बैठे तो भला उसने हासिल क्या किया?' जीसस का प्रसिद्ध वचन है।
और मॉम ने कहा : मेरे प्यारे रॉबिन! मैं तुम्हें बताता हूं कि जब मैं छोटा बच्चा था, यह वाक्य मेरे बिस्तर के पास टंगा रहता था। लेकिन तब मैं इसका अर्थ न समझा और पूरा जीवन गंवा बैठा; जानते हो, जब मैं मरूंगा, ये सारी चीजें मुझसे छिन जाएंगी। ये बगीचे, इस बगीचे के एक-एक पेड़, यह समूचा महल, यह फर्नीचर, यह फर्नीचर का हर हत्था और पाया। मैं तुमसे कहता हूं कि एक मेज भी मैं अपने संग न ले जा सकूंगा; मैं सरासर असफल आदमी रहा हूं, सारे जीवन सब तरह से असफल!
वे बोले : मैं गलती पर गलती करता रहा। मैं सब कचरा कर बैठा। और जब मैं छोटा बच्चा था तो मेरे झूले के पास यही वाक्य टंगा हुआ थाः मनुष्य समूचा संसार पा ले, मगर अपनी आत्मा गंवा बैठे, तो भला उसने हासिल क्या किया?
भतीजे ने उन्हें ढांढस बंधाने की कोशिश की और कहा : छोड़िए भी, आज आप जिंदा लेखकों में सबसे नामी हैं। आपकी यश-पताकाएं सारी पृथ्वी पर सारी भाषाओं में फहरा रही हैं। ऐसी कोई भाषा नहीं दुनिया की, जिसमें आपकी किताबों के अनुवाद न हुए हों, जहां लोग आपको जानते न हों, जहां आपका सम्मान न हो। इसका कुछ तो अर्थ होगा?
सामरसेट मॉम ने कहा : काश, मैंने एक भी अक्षर न लिखा होता। इस चीज ने बस मुझे दुःख ही दुःख दिया है। जो भी मेरा परिचित हुआ, अंत में मेरा द्वेषी बन गया। मेरा सारा जीवन विफल रहा है। पर अब बहुत विलंब हो चुका, अब मैं बदल नहीं सकता। अब बहुत देर हो चुकी। और मैं तुमसे फिर कहता हूं कि जब मैं छोटा बच्चा था तो मेरे झूले के पास ही यह वचन टंगा हुआ था : "मनुष्य समूचा संसार पा ले, मगर अपनी आत्मा गंवा बैठते तो भला उसने हासिल क्या किया?' लेकिन अब बहुत देर हो चुकी, अब बहुत विलंब हो चुका, अब मैं बदल न सकूंगा।
इसके कुछ ही दिन, कोई तीन या चार दिन बाद सॉमरसेट मॉम की मृत्यु हो गयी। . . . ये सफल आदमियों की कहानियां हैं! ये पद पर पहुंचे हुए लोगों की कथाएं हैं!
नहीं, पद की भाषा बोलो ही मत, नहीं तो अहंकार बड़ा चालबाज है। वह "पद' शब्द पर सवारी कर लेगा। वह उसका घोड़ा बना लेगा। चले तुम! अहंकार ने कहा कि ठीक है, समाधि पाकर रहेंगे, सिद्ध होकर रहेंगे, बुद्ध होकर रहेंगे!
एक युवक ने बुद्ध के चरणों में जाकर सिर रखा और कहा कि मैं कसम लेकर आया हूं कि बुद्ध होकर ही जाऊंगा। बुद्ध ने कहा : मुश्किल हो गयी तब, यही बात बाधा बन जाएगी। छोड़ दे, यह बात छोड़ दे। यह कसम किसने खाई है? जिस अहंकार ने यह कसम खाई है, वही तो बाधा है। तू जिस अहंकार से यह संकल्प लिया है, वही तो दीवाल है।
बुद्धत्व तब आता है, जब कुछ भी मन में बनने का भाव नहीं रह जाता। कुछ भी बनने का भाव नहीं रह जता! बुद्ध बनने का भाव भी नहीं रह जाता! समाधि तब फलती है जब समाधि तक को पाने की आकांक्षा नहीं रह जाती। जब अभीप्सा मात्र समाप्त हो जाती है। जब जो जहां जैसा है वैसे ही राजी हो जाता है, परम राजी, संतुष्ट। जब परितोष इतना सघन होता है कि अब कुछ भी करने की जरूरत नहीं, न कुछ होने की जरूरत है। . . . उसी घड़ी, उसी शुभ घड़ी में परमात्मा उतर आता है।
परितोष की घड़ी में परमात्मा का आगमन होता है। पदाकांक्षी .. . फिर चाहे पद संसार के हों और चाहे परलोक के, भेद नहीं है . . . पदाकांक्षी कभी नहीं पहुंच पाता। पदाकांक्षी भटकता ही रहता है।
तुम पूछते हो : आप इस पद पर कैसे पहुंचे? यह पद नहीं है। यहां भीतर मेरे मैं जैसा कुछ नहीं है। पहुंचने वाला समाप्त हो गया तब पहुंचना होता है।
हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराइ। खोजते-खोजते जब खोजनेवाला भी खो जाता है, तब मिलन है, तब परम मिलन है।
पांचवां प्रश्न : आप कहते हैं, ध्यान एकाकी यात्रा है। और अकेलेपन से मैं बहुत डरता हूं। मुझे साहस दें।
निश्चित ही ध्यान एकाकी यात्रा है, मगर यह तुमसे किसने कहा कि अकेलापन? परमात्मा साथ होगा। संसार की यात्रा में तुम अकेले हो; परमात्मा साथ नहीं है, यह याद रखना। और जिनका तुमने संग-साथ समझा है, नदी-नाव संयोग है। बस अजनबी इकट्ठे हो गए हैं नाव में। कोई पत्नी बन गई है, कोई पति बन गया है, कोई बेटा बन गया है, कोई भाई बन गया, कोई मित्र बन गया ... अजनबी इकट्ठे हो गए हैं नाव में। और नाव में थोड़ी देर को हमने कैसे-कैसे खेल रचा लिए हैं--मोह के, आसक्ति के, राग के!
यहां तुम बिल्कुल अकेले हो। मगर तुमने भ्रांति यह बना ली है कि सब हैं--भाई है, पत्नी है, बेटा है, मित्र है। सब हैं, परिवार है, प्रियजन हैं। और बिल्कुल अकेले हो। ज़रा सोचो, फिर से सोचो। एक बार फिर से पर्दा उठाकर देखो अपने भीतर, तुम बिल्कुल अकेले हो या नहीं? पत्नी बाहर है, पति बाहर है; भीतर तो तुम बिल्कुल अकेले हो।
तो मैं तुमसे एक बेबूझ-सी बात कहना चाहता हूं, एक अटपटी बात कहना चाहता हूं : संसार में लोग बिल्कुल अकेले हैं। ध्यान में परमात्मा का साथ मिलता है। लेकिन जो लोग समझते हैं संसार में संग-साथ है, उनसे मुझे कहना पड़ता है कि ध्यान में तुम्हें अकेला होना पड़ेगा। यह संग-साथ यह झूठा है संग-साथ, यह छोड़ना पड़ेगा, तो असली संगी मिले।
तुम्हें थोड़ी देर को तो पति-पत्नी, बाल-बच्चे सब भूल ही जाने चाहिए। थोड़ी देर को तो तुम्हें आंख बंद करके बिल्कुल अकेले हो जाना चाहिए, जैसे कि तुम वस्तुतः हो--न किसी के पति न किसी की पत्नी, न किसी के पिता न किसी की मां तुम --असंग! असंगता ध्यान है। कम से कम चौबीस घंटे में एक घंटे को तो तुम असंग हो जाओ। भूल ही जाओ कि तुम्हारा किसी से कोई नाता है। सारे खेलों के बाहर हो जाओ। थोड़ी देर को तो ये ताश के खेल बंद करो। ये ताश के राजा, रानी थोड़ी देर को तो इन्हें छोड़ो . . .। थोड़ी देर को तो आंख बंद कर लो और बिल्कुल अकेले रह जाओ।
इसलिए मैं कहता हूं कि अकेले रह जाओगे; इसका मतलब यह मत समझना कि तुम अकेले हो गए, अकेले तुम रह जाओगे, तुम अचानक पाओगेः परमात्मा तुम्हारे साथ मौजूद है। असली संगी, असली साथी तुम्हारे साथ मौजूद है। और उसकी मौजूदगी कुछ ऐसी नहीं है कि वह पराया है। वह तुम्हारा अंतरतम है। वह तुम्हारे भीतर ही जलता हुआ दीया है।
          बढ़ अकेला
          यदि न कोई संग तेरे पंथ-बेला
          बढ़ अकेला
          चरण ये तेरे रुके ही यदि रहेंगे
          देखने वाले तुझे कह, क्या कहेंगे,
          हो न कुंठित, हो न स्तंभित
          यह मधुर अभियान-बेला
          बढ़ अकेला
          श्वास ये संगीत्तरंगी क्षण प्रति क्षण
          और प्रति पद-चिह्न परिचित पंथ के कण
          शून्य का श्रृंगार तू
          उपहार तू, किस काम मेला
          बड़ अकेला
          विश्व-जीवन मूक दिन का प्राणमय स्वर
          सांद्र पर्वत-श्रृंग पर अभिराम निर्झर
          सफल जीवन जो जगत् के
          बढ़ अकेला
बाहर खेलो, खेल है। बाहर का मेला--खेलो, जी भर खेलो, उल्लास भर खेलो; मगर याद रखना, भूल मत जाना मेला है और तुम अकेले हो। और उस यात्रा पर भी जाना है।
          शून्य का श्रृंगार तू
          उपहार तू, किस काम मेला
          बढ़ अकेला
वहां तो अकेले जाना पड़ेगा। भीतर तो किसको साथ ले जा सकोगे, कैसे ले जा सकोगे? सब बाहर हैं, वे तो बाहर ही छूट जाएंगे। भीतर तो तुम अकेले ही जाओगे न? कैसे पत्नी को निमंत्रित करोगे कि आ, मेरे साथ चल।
लेकिन तुम्हारे प्रश्न की संगति मैं समझता हूं। यह तुम्हारा ही भय नहीं है , अनेक का भय है। इसीलिए तो लोग ध्यान से डरते हैं, बचते हैं। क्योंकि ध्यान का मतलब है : मेले के बाहर जाना। और मेले-ठेले की ऐसी आदत पड़ गई है, जब तक धक्कम-धुक्का न होता रहे, तब तक तुम्हें लगता ही नहीं कि कुछ ठीक चल रहा है। जितना धक्कम-धुक्का हो, तो जितना रेला-पेली हो, जितना ठेला-ठेली हो, उतना ही तुम्हें लगता है कुछ हो रहा है। जैसे ही तुम अकेले रह जाते हो, प्रश्न उठता हैः मैं कौन हूं और क्या कर रहा हूं? भीड़-भाड़ में भूल जाते हैं, विस्मरण हो जाता है। जीवन के वास्तविक प्रश्न भूल जाते हैं, और झूठे प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।
किसी ने जोर से धक्का मार दिया, झगड़ा हो गया। कहां याद रही अपनी? और किसी ने भेंट लिया, गले लगा लिया, प्रेम हो गया--कहां याद रही अपनी?
तुम्हारे प्रेम, तुम्हारे झगड़े, तुम्हारी दोस्ती, तुम्हारी दुश्मनियां एक ही काम करती हैं -- तुम्हें उलझाए रखती हैं, व्यस्त रखती हैं। तुम्हें अवसर नहीं देतीं कि तुम ज़रा भीतर झांक लो। वहां तो अकेला ही बढ़ना पड़ेगा।
          बढ़ अकेला
          यदि न कोई संग तेरे पंथ-बेला
          बढ़ अकेला
डर तो लगता है एकाकी होने में; मगर तभी तक लगता है जब तक तुम हुए नहीं। हुए कि तुम चकित हो जाओगे! शांत, एकांत, मौन . . .भीतर जब एकाकीपन का अनुभव होता है, तुम चकित हो जाओगे, सारा भय गया! क्योंकि उस एकांत में पता चलता है कि तुम अमृत हो। अमृतस्य पुत्रः! तुम्हारी कोई मृत्यु नहीं, भय कैसे होगा? तुम स्वयं परमात्मा हो--सच्चिदानंदघन! तुम्हें भय क्या? सारा अस्तित्व तुम्हारा है। सब कुछ तुम्हारे साथ है। न तुम कभी अकेले थे, न तुम कभी अकेले हो सकते हो। मगर इस अनुभव के पहले अकेला तो होना पड़ेगा। यह झूठा जो संग-साथ है इससे तो थोड़ी आंख मोड़नी पड़ेगी, इसकी तरफ थोड़ी पीठ करनी पड़ेगी। इस पीठ करने की प्रक्रिया का नाम ही ध्यान है।
और भय मत खाओ। मैं तुमसे कहता हूं, सुंदरदास ने बारबार कहाः "मान सके तो मान'! मैं भी तुमसे कहता हूं: मान सको तो मान!
अकेले होकर परमात्मा का साथ मिलता है। फिर कोई अकेला नहीं रह जाता। राह तुम्हें दिखा दी है। कैसे अपने भीतर की सीढ़ियां उतरो, तुम्हें बता दिया है। उतरना तो तुम्हीं को पड़ेगा।
              राह पा गया
              अब मैं
              चलना है
              चलता हूं
              दिन हो या रात हो
              बाधाएं
              आएं
              अच्छा तो है साथ हो
              समझ-बूझ करके
              इस ओर आ गया
              अब मैं
              राह पा गया
               अब मैं
              चिंता क्या
              शंका क्या
              बुरा क्या अकेलापन
              चलना है
              गति बल है
              तन-गिरि में निर्झर मन
              स्वर से संगीत से
              सहाय पा गया
              अब मैं राह पा गया
              अब मैं।
              स्वर से संगीत से
              सहाय पा गया।
ज़रा भीतर तो चलो, भीतर का अनाहद नाद तो सुनो, वही संगीत संगीत हो जाएगा। वही संगीत साथी हो जाएगा। वही संगीत डुबाता चलेगा, डुबाता चलेगा और एक दिन तुम पाओगे तुम कभी नहीं। तुम्हारे संगी-साथी जैसे झूठ थे वैसे ही तुम भी एक झूठ थे।
मैं भी झूठ है, तू भी झूठ है। सत्य तो वहां है जहां न मैं बचता है न तू बचता है। सुंदरदास के शब्दों में : न म्हारो न थारो।
इस एकांत का अपूर्व सौंदर्य है। इस एकांत में अपूर्व संगीत है। इस एकांत का अनुभव ही सत्य है।
              धूप सुंदर
              धूप में
              जग-रूप सुंदर
              सहज सुंदर
              व्योम निर्मल
              दृश्य जितना
              स्पृश्य जितना
              भूमि का वैभव
              तरंगित रूप सुंदर
              सहज सुंदर
              तरुण हरियाली
              निराली शान शोभा
              लाल पीले
              और नीले
              वर्ण-वर्ण प्रसून सुंदर
              धूप सुंदर
              धूप में जग-रूप सुंदर
              ओस कण के
              हार पहने
              इंद्रधनुषी
              छवि बनाए
              शस्य तृण
              सर्वत्र सुंदर
              धूप सुंदर
              धूप में जग-रूप सुंदर
              सघन पीली
              ऊर्मियों में
              बोर
              हरियाली
              सलोनी
              झूमती सरसों
              प्रकंपित वात से
              अपरूप सुंदर
              धूप सुंदर
              मौन एकाकी
              तरंगें देखता हूं
              देखता हूं
              यह अनिर्वचनीयता
              बस देखता हूं
              सोचता हूं
              क्या कभी
              मैं पा सकूंगा
              इस तरह
                इतना तरंगी
              और निर्मल
              आदमी का
              रूप सुंदर
              धूप सुंदर
              धूप में जग-रूप सुंदर
              सहज सुंदर
              मिलता है, अनंत सौंदर्य मिलता है।
              मौन एकाकी
              तरंगें देखता हूं
              देखता हूं
              यह अनिर्वचनीयता
              बस देखता हूं
तुमने देखा है जगत् का सौंदर्य? इससे बहुत बड़ा सौंदर्य तुम्हारे भीतर छिपा पड़ा है। ये फूल सुंदर हैं, यह धूप सुंदर है, यह आकाश सुंदर है, यह रूप सुंदर है; मगर इस सबसे बड़ा रूप तुम्हारे भीतर छिपा पड़ा है। चेतना का फूल इन सारे फूलों को मात कर जाता है। इसलिए तो हमने उसे सहस्रदल कमल कहा है। जैसे हजार-हजार पंखुड़ियों वाला स्वर्णकमल खिला हो जिसकी आभा अवर्णनीय है और जिसकी सुवास शाश्वत है!
तुम्हारे भीतर क्या है, इसका तुम्हें पता नहीं। इसलिए डरते हो भीतर जाने में। और बाहर कुछ भी नहीं है और भागे चले जा रहे हो। कब, किसने, क्या पाया है बाहर ? दौड़-दौड़ लोग गिरते हैं और मरते हैं। दौड़-दौड़ लोग कब्रों तक पहुंचते हैं, और कहां पहुंचते हैं?
फिर क्या फर्क पड़ता है कि गांव के किसी छोटे-मोटे मरघट पर जलाए गए कि दिल्ली के राजघाट पर, क्या फर्क पड़ता है? अगर बहुत कोशिश की तो राजघाट पहुंच जाओगे; और क्या होगा? और फिर चिता में लकड़ियां साधारण थीं कि चंदन की थीं, क्या फर्क पड़ता है? और फिर चिता की राख ऐसा ही किसी मिट्टी के बर्तन में किसी नदी-सरोवर में डूबो दी गयी या स्वर्ण के कलशों में ले जायी गई और गंगा में डाली गई, क्या फर्क पड़ता है?
एक बात निश्चित है कि यहां सब जो हम करते हैं मिट जाता है, मिट्टी हो जाता है। फिर भी तुम निर्भय चले जा रहे हो! जहां सब तरह का भय होना चाहिए, वहां तुम निर्भय जा रहे हो और जहां किसी तरह का भय नहीं होना चाहिए, वहां जाने में तुम डरते हो! अपने भीतर जाने में डरते हो! और वहां बैठा है राजाओं का राजा, मालिकों का मालिक। वहां भीतर बैठा है तुम्हारा अंतरतम, तुम्हारा अमृत स्वरूप!
डरो मत, बढ़ो! कोई साथ वहां जाने को नहीं है, एकाकी ही बढ़ो। लेकिन इतना मैं भरोसा दिलाता हूं, कि पहुंचते ही पाओगे; अकेले नहीं हो, परमात्मा साथ है। और वही असली साथ है, शेष सब साथ के धोखे हैं।**त्र्!)ध्****त्र्!)इ१४)१०**
अंतिम प्रश्न : समाज और शासन आपके विरोध में क्यों हैं? निरंतर आपकी आवाज दबाने की कोशिश क्यों की जा रही है?
जैसा होना चाहिए वैसा ही हो रहा है। यही उचित है। यही सदा हुआ है। समाज यदि मेरी बातों का विरोध न करे तो मेरी बातें सत्य न होंगी। समाज मेरी बातों का विरोध करे तो ही प्रमाण है कि बातों में कुछ सचाई होगी।
समाज केवल सत्य का विरोध करता है। झूठ से तो समाज सदा राजी है। झूठ समाज का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। झूठ को तो समाज पचा लेता है, अपना अंग बना लेता है; सत्य को नहीं पचा पाता। इसलिए जीसस को सूली लगानी पड़ती है। इसलिए सुकरात को जहर पिलाना पड़ता है। इसलिए बुद्ध पर पत्थर मारने पड़ते हैं।
जो हो रहा है, ठीक हो रहा है। जैसा होना चाहिए, ठीक वैसा ही हो रहा है, नियमानुसार हो रहा है। इससे चिंता न लो। इसमें व्यर्थ समय भी खराब मत करो। मैं जो कह रहा हूं वह ऐसा है कि समाज उसे नहीं सहेगा। उसे तो केवल थोड़े-से साहसी व्यक्ति ही सह सकते हैं। समाज तो एक झूठ का समझौता है। समाज की चिंता सत्य की तलाश के लिए नहीं है। समाज सत्य के खोजियों को चाहता भी नहीं, क्योंकि सत्य के खोजी सदा ही समाज के लिए अड़चन पैदा करते हैं; समाज का पाखंड, समाज का झूठ तोड़ने लगते हैं। समाज की सुविधा से चलती हुई जीवन-व्यवस्था को तरंगित कर देते हैं, आंदोलित कर देते हैं।
लोग नाराज होते हैं, जब उनकी मान्यताओं को तुम तोड़ते हो। इसलिए नहीं कि उनको मान्यताओं से कोई बड़ा लगाव है। तुमने देखा नहीं है यह?--चाहे हिंदू मंदिर नहीं जाता हो, लेकिन अगर उसके मंदिर के खिलाफ कुछ कहो, वह लड़ने को तैयार है। मंदिर पूजा करने नहीं जाता। मंदिर से प्रेम जैसा कुछ भी नहीं है। मगर अगर मंदिर के खिलाफ कुछ कहो तो लड़ने को जरूर तैयार है। यह बड़े मजे की बात है कि जिसको प्रेम नहीं है, वह मारने-मरने को तैयार है। मुसलमान कुरान पढ़ता हो न पढ़ता हो, कुरान उसे समझ आती हो न आती हो, लेकिन कुरान के विपरीत कोई बात, बस बर्दाश्त के बाहर हो जाएगी। क्या कारण होगा? कारण यह है कि जब भी तुम किसी की मान्यताओं पर आघात करते हो तो तुम उसके पैर के नीचे की जमीन खींच रहे हो। इसी के हारे वह खड़ा है निश्चिंत, कि सब ठीक है। मंदिर आज नहीं जाता हूं, लेकिन जब भी जरूरत होगी तब चला जाऊंगा। मंदिर वहां है, मौजूद है--मैं निश्चिंत हूं। आज नहीं लिया राम का नाम, कोई हर्ज नहीं; मरते वक्त ले लूंगा। आसरा तो है, सहारा तो है, सुनिश्चिंतता तो है।
और तुमने कह दिया कि राम के नाम लेने से कुछ भी नहीं होगा; राम का कोई नाम ही नहीं है। अब तुमने उसको घबड़ा दिया। तुमने उसको बेचैन कर दिया। उसकी एक सुव्यवस्था थी, एक सुरक्षा थी--तुमने छीन ली। इसी के सहारे वह मजे से चला जा रहा था--ले लेंगे कभी नाम। सोचता था कि पाप बहुत हो जाएंगे, कोई फिक्र नहीं, चले जाएंगे, गंगा-स्नान कर आएंगे। और तुमने कह दिया--"पागल' हुए हो! गंगा में स्नान करने से कहीं पाप धुलते हैं। पानी से हो सकता है देह की मैल, देह की धूल धुल जाए, लेकिन आत्मा से पानी कैसे जुड़ेग? आत्मा से पानी कैसे पापों को अलग करेगा?' तुमने उसको दिक्कत में डाल दिया। अभी वह पाप निश्चिंतता से किए जा रहा था, चोरी भी करता था, रिश्वत भी लेता था, रिश्वत भी देता था--सब चल रहा था। एक बात पीछे मन में रखी थी कि कभी हो आऊंगा प्रयाग कभी कर लूंगा गंगा में स्नान। गंगा कोई बहुत दूर तो नहीं है। सब निपटारा हो जाएगा। तुमने उससे उसका सहारा छीन लिया, उसकी आशा छीन ली, तुमने उसे दुविधा में डाल दिया। अब क्या होगा! तुमने उसे बेचैन कर दिया, वह नाराज न हो तो क्या करे?
तो अगर लोग मुझ पर नाराज हैं, तो कसूरवार मैं हूं। वे कसूरवार नहीं हैं। मैं ही जो कह रहा हूं वह उन्हें नाराज कर देता है। मेरी भी मजबूरी है। मैं वही कह सकता हूं जो ठीक है। उनकी भी मजबूरी है, वे ठीक को बर्दाश्त नहीं कर सकते, क्योंकि झूठ के साथ उन्होंने काफी दोस्ती कर रखी है। झूठ के साथ उनके बहुत से न्यस्त स्वार्थ जुड़ गए हैं।
कुछ ही दिन पहले एक जोड़ा मुझे मिलने आया--एक युवक और युवती। वे बड़े आनंदित थे। विवाह में बंधने को आतुर थे। बड़े प्रसन्न थे। एक क्षण तो मुझे भी लगा कि कुछ भी न कहूं उनसे, उनकी प्रसन्नता ऐसी थी, हालांकि प्रसन्नता कोई ज्यादा देर टिकनेवाली नहीं थी। दिन-दो-चार दिन में वर्षा के झोंके आएंगे, और सब रंग बह जाएगा। लेकिन उनकी प्रसन्नता देखकर मुझे लगा कि कुछ न कहूं। दो चार दिन ही सही, चलो उनको प्रसन्न रह लेने दो। लेकिन वे जिद्द किए थे, कि आप हमें सच-सच कहें। आप हमें बताएं कि हम विवाह में बंधें या न बंधें। विवाह का सत्य क्या है?
मैंने कहा, विवाह का कोई सत्य है ही नहीं। एक खेल है। खेलना हो, खेलो। और खेल खतरनाक है। ये ऐसी हवाएं आती रहती हैं और जाती रहती हैं। अगर कुछ जीवन का दांव ही लगाना हो तो किसी और बड़ी चीज पर लगाओ, किसी और बड़ी खोज पर लगाओ। अगर घर ही बसाना हो, तो असली घर बसाओ; यह घर बसाने का क्या लाभ होगा? इतने लोगों ने बसा रखे हैं और इतने कष्ट में पड़े हुए हैं, तो इन्हें देखकर तुम्हारी आंखें नहीं खुलतीं?
उस युवक ने कहा : जो सबके साथ हुआ है वह हमारे साथ भी हो यह जरूरी तो नहीं है।
यही मनुष्य की भ्रांति है। प्रत्येक मनुष्य सोचता है कि मैं अपवाद हूं। सबके साथ हुआ होगा। सब मरते हैं, मैं थोड़े ही मरूंगा! सब दुःख में पड़े हैं, मैं थोड़े ही पड़ूंगा! सब के प्रेम आज नहीं कल फंदे बन जाते हैं, मेरा प्रेम फंदा नहीं बनेगा।
अब यदि ऐसी बात तुम कहोगे विवाहातुर जोड़े से, तो नाराज तो होगा ही। जो धन की यात्रा पर निकला है उसको अगर तुम कहोगे कि धन कूड़ा-कचरा है, नाराज तो होगा ही।
एक राजनेता आ गए थे आशीर्वाद मांगने--चुनाव लड़ना है। मैंने उनसे कहा, अगर मेरे दिल की कहो, अगर मेरा आशीर्वाद चाहते हो . . .। तो कहा : आपका ही आशीर्वाद लेने आया हूं।
"तो मेरे हिसाब से चाहते हो आशीर्वाद कि तुम्हारे हिसाब से?'
वे थोड़े चिंता में पड़े। उन्होंने कहा : इसमें क्या फर्क होगा ?
"फर्क बहुत होगा। मेरा आशीर्वाद तो यह होगा कि तुम चुनाव हारो, क्योंकि यहीं बात खत्म हो। नहीं तो यह लंबा सिलसिला है। अगर जीत गए, एम. एल. ए. हो गए, तो फिर डिप्टी मिनिस्टर होना है, फिर मिनिस्टर होना है, फिर चीफ मिनिस्टर होना है, फिर दिल्ली पहुंचना है --और यह यात्रा लंबी है। इसमें तुम भटक जाओगे। हार जाओ, तो हारे को हरिनाम।'
वे कहने लगे : आप ठहरें। ऐसा न कहें। यह बात ही आप न कहें। क्योंकि आप जैसे व्यक्तियों के मुंह से निकले वचन सच हो जाते हैं।
मैंने कहा : मेरे . . .।
"आपको आशीर्वाद न देना हो तो मत दें, मगर यह तो मत कहें कि हारे को हरिनाम। "हरिनाम' लूंगा, मगर अभी नहीं।'
तो तुम पूछते हो : "समाज और शासन आपके विरोध में क्यों हैं?' होगा ही। राजनीति तो सदा ही धर्म के विपरीत है। और जब राजनीति धर्म के विपरीत न हो तो समझ लेना कि वह धर्म धर्म नहीं है, राजनीति का ही हिस्सा है। जब तक धर्म धर्म होता है, जलती आग होता है, तब तक राजनीति उसके विपरीत होती है। क्योंकि ये दो विपरीत यात्राएं हैं। धर्म की यात्रा है अंतर्यात्रा, राजनीति की यात्रा है बहिर्यात्रा । धर्म की यात्रा है निर्अहंकार की यात्रा और राजनीति की यात्रा है अहंकार की यात्रा। सारा खेल ही अहंकार का है वहां। तो राजनीतिज्ञ तो परेशान होगा, नाराज भी होगा। फिर मेरे जैसे व्यक्तियों से तो बहुत नाराज होगा, क्योंकि मैं उसका किसी भी तरह साथ नहीं देता। और किसी का नहीं देता। ऐसा नहीं कि इस तरह के राजनीतिक का नहीं देता हूं, उस तरह के राजनीतिक का नहीं देता हूू--किन्हीं भी रंग-ढ़ंग के हों राजनीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ विक्षिप्त हैं। सारी राजनीति विक्षिप्तता है। और मनुष्य-जाति का सौभाग्य का दिन होगा जिस दिन राजनीति से छुटकारा हो जाएगा। . . .तो स्वभावतः नाराजगी होगी।
नाराजगी हजार तरह से प्रकट होनी शुरू होती है। ऐसी खबरें आनी शुरू हुई हैं कि सारी दुनिया के राजदूतावासों को खबरें दी गयी हैं कि जो व्यक्ति भी मेरे आश्रम आना चाहे, उसको भारत के भीतर न आने दिया जाए। तो जो मित्र जाते हैं वीसा के लिए, अगर उन्होंने मेरा नाम लिया, तत्क्षण सील मार दी जाती है उनके पासपोर्ट पर कि तुम्हें जाने की आज्ञा नहीं है। अब तो मेरे संन्यासियों को आना पड़ रहा है यहां, तो दूसरे नाम ले-लेकर आना पड़ रहा है। कोई कहता है, काशी जा रहे हैं संस्कृत पढ़ने। कोई कहता है, श्री अरविंद आश्रम में जा रहे हैं, पांडिचेरी। कोई कहता है, शिवानंद आश्रम जा रहे हैं, ऋषिकेश। तब उनको आज्ञा मिलती है। इतना ही नहीं, अभी एक मित्र ने हालैंड से आकर खबर दी कि जब उसने मेरा नाम लिया और यहां आने की बात की तो एकदम नाराज हो गया अधिकारी। उसने कहा : वहां तो जाना ही मत। वहां तो हम प्रवेश भी नहीं देंगे। लेकिन अगर तुम हमारी सलाह मानो तो ये आश्रम हैं।
उसने साठ आश्रमों के नाम बताए। लिस्ट दी, इनमें से कहीं भी जा सकते हो। उसमें मुक्तानंद का आश्रम भी है! तो मैंने कहा : यह ठीक ही है, होना ही चाहिए।
अभी कुछ ही दिन पहले मुक्तानंद मोरारजी का सत्संग करने गए थे। जब कोई संत किसी राजनीतिक का सत्संग करने जाए तो समझ लेना कि मतलब क्या हो सकता है! राजनीतिज्ञ आएं संतों के पास, समझ में आता है; लेकिन संत राजनीतिकों के पास जाने लगें तो संत दो कौड़ी के हैं। मुक्तानंद गए मोरारजी का सत्संग करने। सत्संग का लाभ तो होता ही है--यह हुआ। क्या कहा उन्होंने मोरारजी को? मोरारजी को कहा कि यह हमारा धन्यभाग है, हमारे देश का धन्यभाग है, कि हमारे साधुओं के देश में आप जैसा साधु-पुरुष प्रधानमंत्री है!
मगरूर जी भाई--और साधु-पुरुष! साधु का क्या अर्थ होता है? साधु-- और राजनीति में! साधु और राजनीति का क्या संबंध ! तो ठीक है कि राजदूतावासों को खबरें दी गयी हों। मुक्तानंद कहते हैं कि मोरारजी साधु हैं, अब मोरारजी कहेंगे कि मुक्तानंद असली साधु हैं। ऐसा पारस्परिक लेन-देन चलता है। मुझसे तो कैसे चल सकता है?
मेरे साथ तो किसी तरह का पारस्परिक लेन-देन नहीं चल सकता। मैं निपट अकेला हूं। और जो मुझे कहना है और जैसा मुझे कहना है वैसा ही मुझे कहना है --उसके जो भी परिणाम हों। भीड़-भाड़ मैं चाहता भी नहीं हूं। यहां कोई मेला थोड़े ही भरना है। मैं चाहता हूं वे ही थोड़े-से लोग, जो सच में प्यासे हैं, यहां आ जाएं। उनकी प्यास बुझाने का सार उपाय है। लेकिन जिनको प्यास ही नहीं है, उनकी भीड़ इकट्ठी नहीं करनी है। उनकी भीड़ के कारण जो प्यासे हैं वे भी प्यासे रह जाएंगे।
फिर, मैं जो कह रहा हूं, अपनी गवाही से कह रहा हूं। न तो मैं कहता हूं कि मैं हिंदू हूं, न मुसलमान, न ईसाई, न जैन। तो कौन मेरे साथ हो! मेरे साथ तो वे ही हो सकते हैं जो सिर्फ धार्मिक हैं, या धार्मिक होने की जिनकी क्षमता है, जिन्होंने सारे विशेषण छोड़ दिए हैं।
          कदामद हदें खींचती ही रहेंगी
          कदामद की बुनियाद ढाता चला जा
          दकियानूसी बातें तो लकीरें खींचती ही रहती हैं।
          कदामद हदें खींचती ही रहेंगी
          कदामद की बुनियाद ढाता चला जा
          जो परचम उठा ही लिया सरकशी का
          इसे आसमां तक उड़ाए चला जा
तो मैं तो अपने संन्यासियों से कहता हूं कि तुम्हें तो तोड़ना है--परंपरा ; तुम्हें तो तोड़ना है लकीरें; तुम्हें तो तोड़ना है सारी सीमाएं। और तुम्हें सीमाएं तोड़ने के कारण जो कष्ट आएं, जो पीड़ाएं हों--वे अहोभाव से स्वीकार करनी हैं। यही तुम्हारी साधना है।
लेकिन किसी के रोके सत्य रुकता नहीं। न तो सुकरात को जहर पिलाकर रोका जा सका, न जीसस को सूली पर लटका कर रोका जा सका।
          और दबाने से उभरेगी गीतों की गुंजार
          चलती आंधी रुक नहीं सकती।
          उड़ती बदली झुक नहीं सकती
          नन्हीं लहरें रोक से बन जाती हैं तीखी धार
          और दबाने से उभरेगी गीतों की गुंजार।
          कोई कलम को तोड़ भी डाले
          ओठों पर पड़ जाएं ताले
          लेकिन फिर भी सांच की होगी, हर सूं जय-जयकार
          और दबाने से उभरेगी गीतों की गुंजार।
          ओ चीखों से डरनेवाले
          उंगली कान में धरनेवाले
          उड़ता पंछी कैदी होकर और मचाए रार
          और दबाने से उभरेगी गीतों की गुंजार।
          लाख मिटा, आबाद रहेंगे
          गीत सदा आजाद रहेंगे
          पायल चाहे कैद हो लेकिन, कैद नहीं झंकार
          और दबाने से उभरेगी गीतों की गुंजार।
इससे कुछ भेद नहीं पड़नेवाला है। समाज हो विपरीत और शासन हो विपरीत, कुछ भेद नहीं पड़नेवाला।
          पायल चाहे कैद हो लेकिन कैद नहीं झंकार
          और दबाने से उभरेगी गीतों की गुंजार
ये सब अच्छे लक्षण हैं। ये खबरें सुंदर हैं। ये नए उगते सूरज की खबरें हैं। यह नए उगते सूरज के सामने सदा ही इस तरह का उपद्रव खड़ा होता है।
तुम सौभाग्यशाली हो कि तुम किसी एक ऐसे आदमी के साथ हो जिसे जहर दिया जा सकता है, जिसे सूली पर लटकाया जा सकता है। तुम सौभाग्यशाली हो कि तुम किसी ऐसे आदमी के साथ हो।
          आता है सूरज तो जाती है रात
          किरणों ने झांका है, होगा प्रभात
          नए भाव-पंछी चहकते हैं आज
          नए फूल मन में महकते हैं आज
          नए बागबां हम नए ढंग से
          जगत् को रंगेंगे नए रंग से
          खिलाएंगे नए फल-फूल-पात
          करोड़ों कदम गम को कुचलेंगे जब
          खुशी की तरंगों में मचलेंगे जब
          तो सूरज हंसेगा, हंसेगी सबा
          बदल जाएंगे आग पानी हवा
          बढ़ाओ कदम, चलाओ तो हाथ
          आता है सूरज तो जाती है रात
          किरणों नें झांका है, होगा प्रभात
मैं तुमसे जो कह रहा हूं, वह एक नयी किरण है। उस किरण के साथ जुड़ना चुनौती है। उस किरण के साथ जुड़ना एक संघर्ष है। लेकिन संघर्ष में ही आत्मा पकती है, संघर्ष में ही निखार होता है। और आग में पड़कर ही स्वर्ण कुंदन बनता है।
तो इन क्षुद्र-सी बातों की चिंता न लेना और इन व्यर्थ की बातों के विचार में भी न पड़ना। यह जैसा हो रहा है, ठीक। जैसा होना चाहिए वैसा ही है।
लाओत्सु ने कहा है कि अगर मूढ़ मेरी बातों पर न हंसे, तो मेरी बातों में सचाई न होगी। और अगर जड़ मेरी बातों के विरोध में खड़े न हो जाएं, तो मेरी बातों में चैतन्य न होगा।
सत्य जब भी जन्मता है तब असत्यों की हजारों-हजारों सालों की दीवालें ढहने लगती हैं। वे सब अपनी सुरक्षा का उपाय करती हैं। यह बिल्कुल स्वाभाविक है इसलिए इसमें मैं कुछ आकस्मिक नहीं देखता हूं। तुम भी आकस्मिक मत देखना। और अगर आकस्मिक न देखोगे तो तुम्हारे मन में इसका भी एक स्वीकार-भाव होगा। यह ठीक है। तुम हंसे जाओ। तुम गाए जाओ। तुम गुनगुनाए जाओ। तुम नाचे जाओ। इस पृथ्वी को नाचते हुए धर्म की एक झलक देनी है।
और ध्यान रहे--

पायल चाहे कैद हो, लेकिन कैद नहीं झंकार

और दबाने से उभरेगी गीतों की गुंजार।

आज इतना ही।