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बुधवार, 4 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--50

तुम अपने भाग्‍य के मालिक हो(प्रवचनपचासवां)

प्रश्‍नसार:
1—क्‍या अंतस के रूपांतरण के लिए बाह्य की बिलकुल उपेक्षा भूल नहीं है?
2—क्‍या सभी ध्‍यान—विधियां भी कृत्य नहीं है?
3—सुस्‍पष्‍टता के लिए क्‍या मन का परिपक्‍व होना जरूरी नहीं है?
4—हम क्‍यों दुःख निर्मित करना जारी रखते है?


पहला प्रश्न :
कल रात आपने कहा कि बक्र को बदलने से अंतत नहीं बदलता है? नही रूपांतरित होता है। लेकिन क्या यह अब नहीं है कि आंतरिक रूपांतरण के लिए सम्यक आहार, सम्‍यक श्रम, सम्‍यक नींद, और सम्यक आचार— विचार भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। क्या बाह्य की बिलकुल उपेक्षा करना भूल नहीं है?

 बाह्य अंतस को बदल तो नहीं सकता है, लेकिन वह सहयोग दे सकता है या बाधा दे सकता है। बाह्य वह परिस्थिति पैदा कर सकता है जिसमें आंतरिक रूपांतरण की घटना ज्यादा सरलता से घट सके। स्मरण रखने की बात यह है कि बाहरी बदलाहट आंतरिक रूपांतरण नहीं है। तुमने अगर सब कुछ कर लिया और परिस्थिति भी अनुकूल हो तो भी संभव है कि आंतरिक रूपांतरण न हो। परिस्थिति आवश्यक है, सहयोगी है, लेकिन वह रूपांतरण नहीं है।
और जो लोग बाह्य में फंस जाते हैं वे व्यर्थ बहुत समय गंवाते हैं। बाह्य बहुत बड़ा है। तुम उसमें जन्मों—जन्मों तक बदलाहट करते रह सकते हो और तुम्हें कभी संतोष नहीं होगा, सदा कुछ न कुछ बदलने को बाकी रहेगा। क्योंकि जब तक अंतस नहीं बदलता है, बाह्य कभी बिलकुल ठीक नहीं हो सकता। तुम उसे कितना भी बदलो, रंगरोगन करो, सुंदर करो, लेकिन तुम कभी तृप्त अनुभव नहीं करोगे, तुम कभी उस स्थिति में नहीं होगे जहां तुम्हें महसूस हो कि अब सब तैयार है। इस तरह अनेक लोगों ने अपना जीवन गंवाया है।
अगर तुम्हारा चित्त बाह्य से ग्रस्त हो जाए— भोजन से, कपड़ों से, आचरण से—तो उनसे बड़ी बाधा हो सकती है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि उनकी उपेक्षा करो। नहीं, मैं यह कह रहा हूं कि उनसे ग्रस्त मत हो जाओ, वे सहयोगी हो सकते हैं। लेकिन अगर तुम्हारा चित्त उनसे ग्रस्त हो गया तो वे भारी अवरोध सिद्ध हो सकते हैं। तब तुम उनमें ही उलझ जाते हो, तब तुम आंतरिक रूपांतरण को स्थगित कर रहे हो। और तुम बाह्य को कितना भी बदलते रहो, अंतस उससे स्पर्शित भी नहीं होता है। अंतस वही का वही रहता है।
तुमने एक पुरानी भारतीय कहानी सुनी होगी। पंचतंत्र में कथा है कि एक चूहा बिल्ली से बहुत डरता था; वह सदा भय और चिंता में डूबा रहता था। उसे नींद नहीं आती थी, नींद में भी वह बिल्ली का ही सपना देखता था और कांपने लगता था। एक जादूगर ने उस पर तरस खाकर उसे बिल्ली बना दिया। बाह्य बदल गया। लेकिन तुरंत बिल्ली के भीतर का चूहा कुत्ते से डरने लगा। चिंता वही रही, सिर्फ विषय बदल गया। पहले बिल्ली चिंता का विषय थी, अब कुत्ता हो गया। कांपना जारी रहा, संताप बना रहा, अभी भी सपने भय के ही आते रहे।
तो जादूगर ने उसे बिल्ली से कुत्ता बना दिया। लेकिन कुत्ते को तुरंत बाघ के भय ने पकड़ लिया। क्योंकि उसके भीतर का चूहा तो वही था; वह नहीं बदला था। उसका शरीर बदला था, बाह्य भर बदला था। वही चिंता, वही रोग, वही भय, सब ज्यों का त्यों रहा। जादूगर ने कुत्ते को बाघ बना दिया; लेकिन अब उसके भीतर का चूहा शिकारी से डरने लगा।
तो जादूगर ने चूहे से कहा 'पुन: मुषको भव। फिर चूहा ही हो जा। क्योंकि मैं तुम्हारे शरीर बदल सकता हूं; पर मैं तुम्हें नहीं बदल सकता। तुम्हारा दिल चूहे का है, मैं क्या कर सकता हूं?'
चूहे का दिल! तुम बाह्य को कितना भी बदलते रहो, चूहे का दिल वही का वही रहेगा। और वह ही समस्या पैदा करता है। रूप—रंग बदल जाता है, लेकिन वास्तविकता नहीं बदलती। और इससे क्या फर्क पड़ता है कि तुम बिल्ली से डरते हो या कुत्ते से डरते हो या बाघ से डरते हो? प्रश्न यह नहीं है कि तुम किससे डरते हो, प्रश्न यह है कि तुम डरते हो।
मेरा जोर इस बात पर है कि तुम्हें सावधान रहना है कि कहीं तुम्हारा बाह्य प्रयत्न आंतरिक रूपांतरण का सब्‍स्‍टीटयूट न बन जाए; तुम बाह्य को ही सब कुछ न मान लो। यह एक बात। उससे जो सहायता ले सको वह लो। सम्यक भोजन अच्छा है; लेकिन चौबीस घंटे भोजन की चिंता में ही लगे रहना मूढूता है। सम्यक आचरण ठीक है, लेकिन उससे ग्रस्त होना मानसिक रुग्णता है। किसी भी चीज की अति अच्छी नहीं है।
भारत में साधुओं के कई संप्रदाय हैं जो भोजन के ही पीछे पड़े रहते हैं। दिन भर वे इसी फिक्र में लगे रहते हैं कि क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए, किसका बनाया भोजन लेना चाहिए और किसका बनाया नहीं लेना चाहिए। एक बार मैं एक संन्यासी के साथ यात्रा कर रहा था। वह सिर्फ गाय का दूध लेता था और वह भी सफेद गाय का दूध। अन्यथा वह भूखा रह जाता था। अब यह व्यक्ति विक्षिप्त है।
तो स्मरण रहे, अंतस महत्वपूर्ण है, अर्थपूर्ण है। बाह्य सहयोगी है, अच्छा है; लेकिन तुम्हें उसमें ही अटक नहीं जाना है। बाह्य इतना महत्वपूर्ण न हो जाए कि तुम अंतस को भूल जाओ। अंतस महत्वपूर्ण रहना चाहिए, केंद्रीय रहना चाहिए। और बाह्य को, यदि आसानी से संभव हो, तो मदद के लिए बदलना चाहिए। उसकी बिलकुल उपेक्षा मत करो। उपेक्षा करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि बाह्य भी अंतस का ही हिस्सा है। बाह्य अंतस का विरोधी नहीं है विपरीत नहीं है। वह तुम पर बाहर से थोपा हुआ नहीं है, वह भी तुम्हारा हिस्सा है। लेकिन अंतस केंद्र है, बाह्य परिधि है। तो परिधि को, चारदीवारी को उतना महत्व दो जितना जरूरी है; लेकिन चारदीवारी घर नहीं है। बाह्य की फिक्र करो, लेकिन उसके पीछे पागल मत होओ।
हमारा मन सदा बहाने खोजने की कोशिश करता है। अगर तुम भोजन से, कामवासना से, कपड़ों से, शरीर से उलझ जाओ तो तुम्हारा मन प्रसन्न होगा। क्योंकि अब तुम अंतस की यात्रा से बच गए; अब मन को बदलने की जरूरत न रही। अब मन को मिटाने की, मन के पार जाने की जरूरत न रही। भोजन की बदलाहट के लिए मन को बदलना जरूरी नहीं है। तुम यह खाओ या वह खाओ, उसके साथ वही मन चल सकता है। सिर्फ जब तुम अंतस की तरफ मुड़ते हो तो वहां तुम जैसे—जैसे आगे बढ़ोगे वैसे—वैसे मन विसर्जित होगा। अंतस का मार्ग अ—मन का मार्ग है।
तो मन भयभीत हो जाता है। वह कोई बहाना खोजेगा जो बाह्य में उलझा दे। और तब मन वैसा ही बना रह सकता है जैसा वह है। तुम क्या कहते हो, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुम क्या करते हो, यह अप्रासंगिक है। असली बात यह है कि मन बना रह सकता है। और मन वही का वही बने रहने के कोई न कोई उपाय खोज ही लेगा।
कभी—कभी तो ऐसा होता है कि यदि तुम किसी वृत्ति की स्वाभाविक, नैसर्गिक अभिव्यक्ति से लड़ते हो तो मन उसकी विकृत अभिव्यक्ति के उपाय खोज लेता है। जो कि और भी खतरनाक होते हैं। तब वे सहायक बनने की बजाय बाधक बन जाते हैं।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन सीढ़ियों से गिर पड़ा। उसके पांव की हड्डी टूट गई। तो उसके पांव पर प्लास्टर चढा दिया गया और उससे कह दिया गया कि तीन महीने तक सीढ़ियों से बिलकुल चढ़े—उतरे नहीं। तीन महीनों के बाद वह फिर डाक्टर के पास गया और उसका प्लास्टर हटा दिया गया। मुल्ला ने पूछा 'क्या अब मैं सीढ़ियों से चढू—उतर सकता हूं?' डाक्टर ने कहा. 'तुम अब बिलकुल ठीक हो, तुम अब सीढियों से चढू—उतर सकते हो।
मुल्ला ने कहा: 'डाक्टर साहब, मैं बहुत खुश हूं। आप कल्पना नहीं कर सकते कि मैं कितना प्रसन्न हूं। दिन भर पाइप के सहारे ऊपर—नीचे जाना कितना कष्टप्रद था! तीन महीनों तक रोज मुझे पाइप के सहारे ऊपर—नीचे जाना पड़ता था, वह कितना भद्दा लगता था! सारा मुहल्ला हंसता था। लेकिन आपने कहा था कि सीढ़ियों से मत ऊपर—नीचे जाना, तो मुझे यह उपाय निकालना पड़ा।
प्रत्येक व्यक्ति यही कर रहा है। यदि सहज मार्ग अवरुद्ध होता है तो विकृति अनिवार्य है। और तुम मन की चालों को नहीं जानते हो; वे बहुत चालाक और सूक्ष्म हैं।
लोग अपनी समस्याएं लेकर मेरे पास आते हैं। समस्या बहुत सीधी—साफ दिखाई पड़ती है, लेकिन सीधी—साफ होती नहीं है। सभी समस्याएं सीधी—साफ मालूम पड़ती हैं, लेकिन ऐसी होती नहीं हैं। गहराई में कुछ और छिपा होता है, और जब तक उस कुछ और को नहीं जाना जाए, नहीं विसर्जित किया जाए, नहीं पार किया जाए, तब तक समस्या बनी रहेगी। सिर्फ उसका रूप बदल जाएगा।
कोई आदमी बहुत धूम्रपान करता है और वह उसे छोड़ना चाहता है। लेकिन धूम्रपान स्वयं समस्या नहीं है; समस्या कुछ और है। तुम धूम्रपान छोड सकते हो, लेकिन समस्या बनी रहेगी और वह फिर किसी नए रूप में प्रकट होगी।
तुम कब धूम्रपान करते हो? जब तुम चिंता में होते हो, तनाव में होते हो, तुम झट सिगरेट पीने लगते हो। और उससे तुम्हें राहत मिलती है। तुम थोडा आश्वस्त अनुभव करते हो, बेहतर अनुभव करते हो।
अब धूम्रपान बंद कर देने से तुम्हारी चिंता, तुम्हारी घबड़ाहट दूर नहीं होने वाली है। तुम्हारी घबड़ाहट, तुम्हारी चिंता, तुम्हारा तनाव, सब जहां का तहां रहेगा। तब तुम कुछ और उपाय करोगे। तब तुम धूम्रपान की जगह उससे कोई बेहतर और भिन्न व्यसन पकड़ लोगे। तुम

 कुछ भी कर सकते हो। तुम धूम्रपान की जगह कोई मंत्र पकड़ लोगे। जब भी तुम घबराहट अनुभव करोगे, तुम राम—राम—राम या कोई दूसरा मंत्र जपने लगोगे। और तुम धुआं भीतर—बाहर करके क्या कर रहे हो? वह भी मंत्र है। तुम धुआं भीतर ले जाते हो, बाहर निकालते हो, भीतर ले जाते हो, बाहर निकालते हो—यह पुनरुक्ति बन जाती है; और इस पुनरुक्ति के कारण तुम्हें हलकापन लगता है। किसी चीज को भी बार—बार दोहराओ, और तुम्हें उससे एक तरह की राहत मिलेगी। लेकिन जब तुम राम—राम का जाप करते हो तो कोई नहीं कहेगा कि तुम कुछ गलत कर रहे हो। और समस्या वही है।
समस्या बिलकुल नहीं बदली, सिर्फ तुमने तरकीब बदल ली। तुम पहले धूम्रपान से जो काम लेते थे वही अब मंत्र से ले रहे हो। पुनरुक्ति मदद करती है, व्यर्थ की पुनरुक्ति भी मदद करती है। तुम्हें बस लगातार उसे दोहराना है। जब तुम कोई चीज लगातार दोहराते हो तो उससे राहत मिलती है। क्यों? क्योंकि उससे एक तरह की ऊब पैदा होती है। ऊब शिथिलता लाती है। तुम किसी भी चीज का उपयोग कर सकते हो जिससे ऊब पैदा होती हो।
अगर तुम धूम्रपान करते हो तो हरेक आदमी कहेगा कि यह गलत है, लेकिन अगर तुम कोई मंत्र जपते हो तो कोई उसे गलत नहीं कहेगा। लेकिन अगर समस्या वही है तो मैं कहता हूं कि यह भी गलत है, बल्कि यह धूम्रपान से भी ज्यादा खतरनाक है; क्योंकि धूम्रपान करते हुए तुम्हें यह बोध तो रहता है कि मैं कुछ गलत कर रहा हूं मंत्र—जाप में यह बोध भी नहीं रहता है। और बोधहीनता के कारण यह रोग ज्यादा खतरनाक है, ज्यादा नुकसानदेह है। तुम सतह पर कुछ भी कर सकते हो, लेकिन जब तक गहरी जड़ें नहीं बदलती तब तक कुछ नहीं होगा। तो बाह्य के संबंध में यह याद रहे कि उसके प्रति बोध रखते हुए सतह से जडों की तरफ चलो और जड़ को खोजो—खोजो कि ऐसा क्यों होता है?
कोई आदमी बहुत खाता है, वह इसे रोक सकता है। तुम अपने को कम खाने के लिए मजबूर कर सकते हो। लेकिन कोई आदमी इतना ज्यादा क्यों खाता है? क्यों? यह शारीरिक जरूरत नहीं है; इसलिए कहीं न कहीं इसमें मन का हाथ है। मन के साथ कुछ करना होगा; यह शरीर का सवाल नहीं है। तुम अपने को भोजन से क्यों भरते रहते हो?
भोजन के साथ इतनी ग्रस्तता प्रेम के अभाव से पैदा होती है। अगर तुम्हें प्रेम नहीं मिला है तो तुम ज्यादा खाओगे। अगर तुम्हें प्रेम मिला है और तुम भी प्रेम करते हो तो तुम कम खाओगे। जब भी कोई तुम्हें प्रेम करता है, तुम ज्यादा नहीं खा सकते। प्रेम तुम्हें इतना भर देता है कि तुम्हें खालीपन नहीं महसूस होता। और जब प्रेम नहीं मिलता है तो तुम खालीपन महसूस करते हो। उस खालीपन को किसी चीज से भरना है, तुम उसे भोजन से भरते हो।
और इसके कारण हैं। बच्चे को प्रेम और भोजन साथ—साथ मिलते हैं, एक ही मां से एक ही मां की छाती से उसे प्रेम और भोजन दोनों मिलते हैं। भोजन और प्रेम जुड़ जाते हैं। यदि मां प्रेमपूर्ण है तो बच्चा कभी बहुत दूध नहीं पीएगा। कोई जरूरत नहीं है। प्रेम है तो वह आश्वस्त है; वह जानता है कि जब जरूरत होगी भोजन मिल जाएगा, दूध मिल जाएगा, मां आ जाएगी। वह सुरक्षित अनुभव करता है। लेकिन अगर मां प्रेम नहीं करती है तो बच्चा असुरक्षित महसूस करता है। तब वह नहीं जानता है कि भूख लगने पर उसे भोजन मिलेगा या नहीं, क्योंकि प्रेम नहीं है। वह बच्चा ज्यादा खाएगा। और यह सिलसिला जारी रहेगा; यह अचेतन में उतर जाएगा।
तो तुम अपना भोजन बदलते रह सकते हो—यह खाओ, वह खाओ, यह मत
खाओ—लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि बुनियादी कारण बना ही रहता है। फिर अगर तुम अपने को भोजन से भरना बंद कर दो तो तुम किसी और चीज से भरने लगोगे। और अनेक उपाय है। अगर तुम बहुत खाना बंद कर तुम धन इकट्ठा करने लगोगे। तुम्हें किसी चीज से अपने को भरना है; तब तुम धन इकट्ठा करने लगते हो।
गौर से निरीक्षण करो और तुम पाओगे कि जो आदमी धन इकट्ठा करता है वह कभी प्रेम नहीं करता है, क्योंकि उसके लिए धन इकट्ठा करना प्रेम का विकल्प बन गया है। अब वह हान से सुरक्षित अनुभव करेगा। जब तुम्हें प्रेम मिलता है तो असुरक्षा नहीं रहती। प्रेम में सब भय खो जाता है। प्रेम में कोई भविष्य नहीं है, कोई अतीत नहीं है। यह क्षण पर्याप्त है, यह क्षण शाश्वत है। तुम स्वीकृत हो। भविष्य की चिंता न रही, कल क्या होगा, इसकी फिक्र न रही। प्रेम में कल नहीं होता है।
लेकिन यदि प्रेम न हो तो कल का खयाल होगा। तब कल क्या होगा, इसकी चिंता पकड़ेगी। तब तुम धन इकट्ठा करोगे, क्योंकि तुम किसी व्यक्ति का भरोसा नहीं कर सकते। तब तुम्हें चीजों का भरोसा होगा, पैसे और धन का भरोसा होगा। ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि धन का दान करो, धन इकट्ठा मत करो, धन की आसक्ति छोड़ो। लेकिन ये सतही बातें हैं, क्योंकि आंतरिक जरूरत तो वही की वही रहेगी। तब आदमी धन छोड्कर कुछ और इकट्ठा करने में लग जाएगा। एक रास्ते को बंद करो और तुम्हें तुरंत दूसरा रास्ता निर्मित करना पड़ेगा। जब तक जड़ें नहीं मिटती हैं, यह सिलसिला जारी रहेगा।
तो बाह्य की बहुत चिंता मत लो। तुम्हारा बाह्य व्यक्तित्व क्या है, उसके प्रति सजग हो, सावचेत रहो। बाह्य के प्रति बोधपूर्ण रहते हुए सदा परिधि से मूल की ओर चलो और खोजो कि कारण क्या है। कितनी भी घबराहट हो, सदा जड़ को खोजो। और एक बार तुम जड़ों को देख लेते हो, जड़ों को प्रकाश में ले आते हो। इस नियम को स्मरण रखो. जड़ें अंधेरे में ही जीती हैं। न सिर्फ पेडू—पौधों की जड़ें, किसी भी चीज की जड़ें अंधेरे में ही जीती हैं। वे अंधकार में ही जी सकती हैं, प्रकाश में लाते ही वे मर जाती हैं।
तो अपनी परिधि से गहरे चलो, गहरे खोदते जाओ और जड़ों तक जाओ, और जड़ों को चेतना के प्रकाश में ले आओ। जैसे ही तुम जड़ों तक पहुंचते हो, वे खो जाती हैं। उनके लिए तुम्हें कुछ नहीं करना पड़ता है। तुम्हें कुछ करना पड़ता है, क्योंकि तुम नहीं जानते हो कि समस्या क्या है। समस्या को भलीभांति समझ लिया जाए तो समस्या विदा हो जाती है। समस्या की सम्यक समझ, समस्या की जड़ तक जाना ही समस्या का विसर्जन बन जाता है। यह पहली बात।
और दूसरी बात. तुम जो कुछ करते हो वह बहुत सतही है, उसमें तुम्हारी समग्रता सम्मिलित नहीं है। तो किसी आदमी के संबंध में उसके कृत्यों से निर्णय मत लो, क्योंकि कृत्य आणविक है, बहुत छोटा है। तुम किसी आदमी को क्रोध में देखकर निर्णय ले सकते हो कि यह आदमी घृणा, हिंसा और प्रतिशोध से भरा है। लेकिन क्षण भर बाद ही उसका क्रोध चला जाता है और वह व्यक्ति अत्यंत प्रेमपूर्ण हो जाता है और एक भिन्न सुगंध, एक भिन्न प्रफुल्लता उसके चेहरे पर फैल जाती है। क्रोध आणविक था। उससे पूरे मनुष्य के बारे में निर्णय मत लो। लेकिन यह प्रेम भी आणविक है, इससे भी पूरे मनुष्य के संबंध में मत निर्णय करो।
तुमने जो कुछ किया है, तुम उनका जोड़ भर नहीं हो। तुम्हारे कृत्य आणविक ही रहते हैं; वे तुम्हारे हिस्से जरूर हैं, लेकिन तुम्हारी समग्रता उनके पार है। तुम एक क्षण बाद भिन्न व्यक्ति हो सकते हो। और तुम्हारे आचरण से, कृत्यों से तुम्हारे संबंध में जो निर्णय लिया गया है, तुम उसके बिलकुल विपरीत जा सकते हो। तुम अभी संत थे; दूसरे क्षण तुम पापी हो सकते हो। कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि तुम्हारे जैसा संत यह कर सकता है। पर तुम यह कर सकते हो। यह अकल्पनीय नहीं है। अभी तक तुम पापी थे और अगले क्षण तुम उससे बाहर छलांग लगा सकते हो।
मैं यह कह रहा हूं कि तुम्हारा अंतस इतना विशाल है कि वह तुम्हारे बाह्य से नहीं निर्णीत हो सकता है। तुम्हारा बाह्य सतही और गौण है। मैं पुन: दोहरा दूं : तुम्हारा बाह्य गौण है, तुम्हारा अंतस मूलभूत है, केंद्रीय है।
तो स्मरण रहे कि अंतस को उघाड़ना है और बाह्य से नहीं उलझे रहना है। एक बात और, बाह्य सदा अतीत का है। वह सदा मृत है, क्योंकि जो कुछ तुम कर चुके वह अतीत हो चुका। वह सदा अतीत का है, वह कभी जीवंत नहीं है। और आंतरिक सदा जीवंत है; वह यहां और अभी है। बाह्य सदा मुर्दा है। अगर तुम मुझे जानते हो तो वही जानते हो जो मैंने किया और कहा है, तुम मेरे अतीत को जानते हो, मुझे नहीं जानते। मैं अभी हूं जीवंत। वह मेरा आंतरिक बिंदु है। और तुम जो कुछ मेरे बारे में जानते हो वह मेरा बाह्य मात्र है। वह मृत अतीत है, वह अब नहीं है।
इसे अपनी ही चेतना में देखो। तुमने जो कुछ किया वह तुम्हारे ऊपर बंधन नहीं है। वह असल में है ही नहीं, वह स्मृति मात्र है। और तुम उससे बहुत बड़े हो। तुम्हारी अनंत संभावनाएं हैं। यह सांयोगिक है कि तुम पापी हो या पुण्यात्मा हो। यह सांयोगिक है कि तुम ईसाई हो या हिंदू हो। लेकिन तुम्हारा अंतरतम, तुम्हारी आत्मा सांयोगिक नहीं है, वह मूलभूत है। और अंतस पर जोर देना मूलभूत पर जोर देना है।
और वह अंतस सदा स्वतंत्र है, वह स्वतंत्रता है। बाह्य पराधीनता है, गुलामी है। तुम बाह्य को तभी जानते हो जब वह घटित हो चुका होता है। और तब तुम उसके बारे में कुछ नहीं कर सकते हो। तुम अपने अतीत के संबंध में क्या कर सकते हो? अतीत अनकिया नहीं हो सकता है। तुम पीछे नहीं लौट सकते हो। तुम अतीत के साथ कुछ नहीं कर सकते हो। अतीत गुलामी है।
अगर तुम यह बात ठीक से समझ लो तो तुम कर्म के सिद्धात को समझ सकते हो। यह सिद्धात—हिंदू—चितना का अत्यंत बुनियादी सिद्धात—यह है कि जब तक तुम अपने कर्मों के पार नहीं जाते, तुम स्वतंत्र नहीं हो सकते। जब तक तुम अपने सभी कर्मों के पार नहीं गए हो, तुम बंधन में रहोगे।
तो बाह्य पर बहुत ध्यान मत दो, बाह्य से बहुत ग्रस्त मत होओ। उससे मदद ले सकते हो, लेकिन सदा स्मरण रहे कि अंतस को आविष्कृत करना है। जिन विधियों की हम यहां चर्चा कर रहे हैं वे अंतस के लिए हैं, अंतस को उघाड़ने के लिए हैं।
यहां मैं तुम्हें एक बात कहूं। ऐसी परंपराएं हैं, उदाहरण के लिए जैन धर्म एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण परंपरा है। और जैन धर्म बाह्य को अतिशय महत्व देता है, जरूरत से ज्यादा महत्व देता है। इतना महत्व देता है कि जैन भूल ही गए हैं कि ध्यान जैसी कोई चीज भी होती है, कि योग—विज्ञान जैसी भी कोई चीज होती है। वे बिलकुल भूल गए हैं। वे भोजन, कपड़े, नींद आदि चीजों में बेहद उलझे रहते है। वे ध्‍यान की दिशा में बिलकुल प्रयत्‍न नहीं करते। ऐसा नहीं है कि उनकी परंपरा की बुनियाद में ध्यान नहीं था। कोई भी धर्म ध्यान के बिना जन्म नहीं ले सकता है। लेकिन कहीं न कहीं वे बाह्य में उलझ गए, भटक गए। बाह्य उनके लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया कि वे बिलकुल भूल ही गए कि बाह्य सिर्फ सहायक है, यह मंजिल नहीं है।
तुम क्या खाते हो, यह मंजिल नहीं है। तुम क्या हो, यह मंजिल है। अच्छा है यदि तुम्हारे भोजन की आदतें तुम्हारी आत्मा के उदघाटन में सहायक होती हैं, यह अच्छा है। लेकिन यदि तुम भोजन से ही ग्रस्त हो गए, यदि तुम निरंतर भोजन की ही सोचते रहे, तो तुम चूक गए। तब तुम भोजन के लिए पागल हो, विक्षिप्त हो।

 दूसरा प्रश्न :

क्या यह सब नहीं है कि सभी ध्यान—विधियां भी कृत्य ही है। जो साधक को उसकी आत्मा तक पहुंचा देती हैं?
क अर्थ में हां, और किसी गहरे अर्थ में नहीं। ध्यान—विधियां कृत्य हैं, क्योंकि तुम्हें कुछ करने को कहा जाता है। ध्यान करना भी कुछ करना है, चुपचाप बैठना भी कुछ करना है, कुछ नहीं करना भी कुछ करना है।
तो ऊपर—ऊपर से देखने पर तो सभी ध्यान—विधियां कृत्य हैं, लेकिन गहरे अर्थ में वे कृत्य नहीं हैं, क्योंकि यदि तुम उनमें सफल हो गए तो करना विदा हो जाता है। केवल आरंभ में ध्यान प्रयत्न जैसा लगता है। अगर तुम उसमें सफल हो गए तो प्रयत्न विलीन हो जाता हैं और पूरी चीज प्रयत्नशून्‍य और सहज हो जाती है। यदि तुम इसमें सफल हो जाओ तो कृत्य नहीं है; तब तुम्हारी ओर से किसी प्रयत्न की जरूरत नहीं रहती है। वह श्वास जैसा हो जाता है, सहज हो जाता है। लेकिन आरंभ में प्रयत्न अनिवार्य है, क्योंकि मन ऐसा कुछ नहीं कर सकता है जो प्रयत्न न हो। अगर तुम मन को प्रयत्नशून्‍य होने को कहोगे तो उसे यह बात ही बेबूझ मालूम होगी।
झेन साधना में प्रयत्नशून्यता पर बहुत जोर दिया जाता है। गुरु शिष्य से कहता है. 'केवल बैठे रहो, कुछ करो मत।और शिष्य चेष्टा करता है, और चेष्टा करता है। और चेष्टा करने के अतिरिक्त तुम कर ही क्या सकते हो? तो शिष्य मात्र बैठने की चेष्टा करता है, कुछ न करने की चेष्टा करता है।
और तब गुरु अपने डंडे से उसके सिर पर चोट करता है और कहता है 'यह मत करो। मैंने तुमसे यह नहीं कहा कि बैठने की चेष्टा करो, क्योंकि वह तो प्रयत्न हो गया, और कुछ न करने की भी चेष्टा मत करो, वह भी कुछ करना हो गया। बस बैठो!'
यदि मैं तुमसे केवल बैठने को कहूं तो तुम क्या करोगे? तुम कुछ करोगे जो उसे केवल बैठना नहीं रहने देगा, उसमें प्रयत्न आ जाएगा। तुम प्रयत्न से बैठोगे, उसमें तनाव होगा। तुम सहज नहीं बैठ सकते हो। यह अजीब लगता है। लेकिन जैसे ही तुम सहज बैठने की कोशिश करते हो, बात जटिल हो गई। सहज बैठने का प्रयत्न ही उसे जटिल बना देता है। तब फिर क्या किया जाए?
वर्षों बीत जाते हैं और शिष्य बैठने में लगा रहता है और गुरु इनकार करता रहता है कि वह चूकता ही जा रहा है। लेकिन शिष्य लगा ही रहता है, लगा ही रहता है। और रोज वह असफल होता है, क्योंकि उसमें प्रयत्न मौजूद रहता है। और वह गुरु को धोखा नहीं दे सकता। लेकिन एक दिन, धीरे— धीरे बैठते—बैठते, बैठने का बोध भी जाता रहता है। एक दिन अचानक वह ऐसे बैठा सहज है जैसे पेडू या पत्थर हो, कुछ और नहीं कर रहा होता है। और तब गुरु कहता है. 'बिलकुल ठीक, अब तुमने उसे पा लिया। बैठने का यही ढंग है।
लेकिन इस अप्रयास सहजता के लिए लंबे प्रयास और धैर्य की जरूरत होती है। प्रारंभ में प्रयत्न करना होगा। लेकिन प्रारंभ में ही; यह एक आवश्यक बुराई है। लेकिन तुम्हें निरंतर याद रखना है कि इसके पार जाना है। एक क्षण जरूर आना चाहिए जब तुम ध्यान के लिए कुछ करते नहीं हो, सिर्फ होते हो और ध्यान घटित होता है। तुम मात्र बैठे हो या खड़े हो और ध्यान घटित होता है। तुम कुछ नहीं करते हो, सिर्फ बोधपूर्ण हो और ध्यान घटित होता है।
ये सभी विधियां तुम्हें सहयोग देने के लिए हैं कि तुम प्रयत्न—रहित दशा को उपलब्ध होओ। आंतरिक रूपांतरण, अंतस की उपलब्धि प्रयत्न के द्वारा नहीं हो सकती, क्योंकि प्रयत्न एक तरह का तनाव है। प्रयत्न के साथ तुम पूरी तरह विश्राम में नहीं हो सकते; प्रयत्न ही बाधा बन जाएगा। अगर तुम इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर प्रयत्न करोगे तो धीरे— धीरे तुम इसे छोड़ने में भी समर्थ हो जाओगे।
यह तैरने जैसा है। अगर तुम्हें तैरने के संबंध में पता है तो तुम जानते होगे कि तुम्हें प्रारंभ में प्रयत्न करना पड़ता है—लेकिन सिर्फ प्रारंभ में। एक बार तुम्हें खयाल में आ जाए, एक बार तुम जान जाओ कि यह क्या है, तो प्रयत्न विदा हो जाता है; तुम सहजता से, बिना किसी प्रयत्न के तैर सकते हो। और अच्छे से अच्छा तैराक भी नहीं कह सकता है कि तैरना क्या है, कि वह कैसे तैरता है। वह तुम्हें नहीं समझा सकता है कि वह क्या कर रहा है।
सच तो यह है कि वह कुछ नहीं कर रहा है; वह सिर्फ अपने को पानी के साथ, नदी के साथ गहन प्रतिसवेदनशील संबंध में, मैत्री में छोड़ रहा है। वह वस्तुत: कुछ कर नहीं रहा है। और अगर वह अभी भी कुछ कर रहा है तो अभी वह कुशल तैराक नहीं है। वह अभी सिक्खड़ है, सीख रहा है।
मैं तुम्हें एक घटना कहता हूं। बर्मा में एक बौद्ध भिक्षु को कहा गया कि वह नए मंदिर के लिए, विशेषकर उसके द्वार के लिए एक ड्राइंग, एक डिजाइन तैयार करे। तो भिक्षु ड्राइंग तैयार करने में लग गया। उस भिक्षु का एक बहुत मेधावी, बहुत कुशल शिष्य था, उसने उसे अपने पास रहने को कहा। शिष्य का काम था कि गुरु जब ड्राइंग बना रहा हो तो वह सिर्फ उसे देखता रहे, और अगर ड्राइंग उसे पसंद आए तो उसे कहना था कि ठीक है, और अगर पसंद न आए तो उसे कहना था कि ठीक नहीं है। और गुरु ने कहा 'जब तुम ही कहोगे तो ही मैं ड्राइंग को अधिकारियों के पास भेजूंगा। जब तक तुम नहीं कहते रहोगे, मैं उसकी जगह दूसरी ड्राइंग बनाऊंगा।
इस भांति सैकड़ों ड्राइंग रह हो गईं। तीन महीने बीत गए और गुरु भी घबड़ा गया।
लेकिन उसने वचन दिया था तो उसे उसका पालन करना ही था। शिष्य वहीं रहता, गुरु ड्राइंग बनाता और शिष्य कहता कि नहीं; गुरु फिर नई ड्राइंग बनाने लगता।
एक दिन स्याही समाप्त होने को थी, गुरु ने शिष्‍य से बाहर जाकर स्‍याही लाने को कहा। शिष्य बाहर गया। इस बीच गुरु उसे, उसकी उपस्थिति को भूल गया और सहज हो गया। उसकी उपस्थिति ही समस्या थी। उसके मन में सतत यह धारणा बनी रहती थी कि शिष्य उसे देख रहा है, उसकी कृति को जांच रहा है। और गुरु को निरंतर यह खयाल बना रहता था कि शिष्य को उसकी रचना जंचेगी या नहीं और कहीं उसे फिर से नई रचना में न लगना पड़े। इस आंतरिक ऊहापोह के कारण गुरु सहज नहीं हो पाता था। जैसे ही शिष्य बाहर गया, ड्राइंग पूरी हो गई। और जब शिष्य वापस आया तो उसने कहा: 'अदभुत! लेकिन आप यह पहले क्यों नहीं बना सके?'
गुरु ने कहा. 'अब मैं समझता हूं कि पहले क्यों नहीं कर सका; इसीलिए क्योंकि तुम यहां थे। तुम्हारे कारण मैं प्रयत्न कर रहा था कि तुम्हारी स्वीकृति मिले। और प्रयत्न ने सब चौपट कर दिया। मैं सहज—स्वाभाविक नहीं हो पाता था, मैं बह नहीं पाता था। तुम्हारे कारण मैं अपने को भूल नहीं पाता था।
जब तुम ध्यान करते हो तो उसे करने का भाव, प्रयत्न का भाव, उसमें सफल होने का भाव ही बाधा बन जाता है। उसके प्रति सजग रहो। ध्यान जारी रखो और प्रयत्न के भाव के प्रति सावचेत रहो। एक दिन आएगा—मात्र धैर्य रखने से वह दिन आ जाता है—जब प्रयत्न नहीं रहता है। सच तो यह है कि तब तुम नहीं रहते, केवल ध्यान रहता है।
इसमें थोड़ा समय लग सकता है। इसकी भविष्यवाणी नहीं हो सकती; कोई नहीं कह सकता कि यह कब घटित होगा। क्योंकि यदि कोई' चीज प्रयत्न से होती है तो भविष्यवाणी की जा सकती है कि अगर तुम इतना प्रयत्न करोगे तो सफल हो जाओगे। लेकिन ध्यान तो तभी होता है जब तुम प्रयत्नशून्‍य होते हो। इसलिए कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती, कुछ नहीं कहा जा सकता कि तुम कब सफल होगे। तुम इसी क्षण सफल हो सकते हो और तुम जन्मों—जन्मों तक निष्फल रह सकते हो। पूरी बात इस पर निर्भर है कि कब तुम्हारे प्रयत्न विदा होते हैं और कब तुम सहज और स्वाभाविक होते हो, कब तुम्हारा ध्यान कृत्य न रह कर तुम्हारा प्राण बनता है, कब तुम्हारा ध्यान प्रेम जैसा सहज हो जाता है।
प्रेम के संबंध में तुम कुछ नहीं कर सकते हो। या कि कर सकते हो? अगर तुम कुछ करते हो तो तुम प्रेम को झुठला रहे हो। वह प्रेम कृत्रिम होगा, उसमें गहराई नहीं होगी। उस प्रेम में तुम नहीं होगे, वह मात्र अभिनय होगा। प्रेम होता है तो होता है। तुम उसके संबंध में कुछ भी नहीं कर सकते हो।
वैसे ही तुम ध्यान के लिए भी कुछ नहीं कर सकते हो। लेकिन मेरा यह मतलब नहीं है कि तुम ध्यान के लिए कुछ न करो। क्योंकि तब तुम वही रह जाओगे जो हो। तुम्हें कुछ करना होगा, यह भली— भांति जानते हुए करना होगा कि सिर्फ करने से ही तुम ध्यान को उपलब्ध नहीं हो सकते। आरंभ में कुछ करना जरूरी होगा। इससे बचा नहीं जा सकता; करने की प्रक्रिया से गुजरना ही होगा। लेकिन उसके पार भी जाना है, उसका अतिक्रमण भी करना, एक प्रयत्नशून्य, सहज बहने की स्थिति को उपलब्ध करना है।
ध्यान का मार्ग कठिन है और बहुत विरोधाभासों से भरा है। तुम्हें ध्यान से ज्यादा विरोधाभासी चीज खोजने से भी नहीं मिलेगी। विरोधाभासी इसलिए है क्योंकि उसे प्रयत्न की भांति शुरू करना है और प्रयत्नशून्‍यता में समाप्त करना है। लेकिन यह होता है। तुम तर्क से नहीं समझ सकते कि यह कैसे होता है; लेकिन अनुभव के तल पर ऐसा होता है। एक दिन आता है जब तुम अपने प्रयत्नों से ऊब जाते हो, थक जाते हो, और प्रयत्न अपने आप गिर जाते हैं।
बुद्ध के जीवन में ऐसा ही हुआ। छह वर्षों तक वे सभी संभव प्रयत्न करते रहे। किसी मनुष्य ने 'बुद्धत्व के लिए इतना अथक श्रम नहीं किया जितना बुद्ध ने किया। उन्होंने सब कुछ किया जो वे कर सकते थे। वे एक गुरु से दूसरे गुरु के पास भटकते रहे; और उन्हें जो कुछ करने को कहा गया उसे उन्होंने समग्रता से पूरा किया।
और वही समस्या थी। क्योंकि कोई गुरु उन्हें नहीं कह सकता था कि तुमने यह नहीं किया और इसलिए उपलब्धि नहीं हुई। यह असंभव था। वे गुरु से भी बेहतर प्रयोग करते थे। तो गुरुओं ने हार मान ली। उन्होंने बुद्ध से कहा : 'इतना ही हमारे पास सिखाने को था, इससे आगे हमें पता नहीं है। तुम कहीं और जाओ।
बुद्ध एक खतरनाक शिष्य थे। और सिर्फ खतरनाक शिष्य ही पहुंचते हैं। उन्होंने सब शास्त्र छान डाले। उन्हें जो भी करने को कहा जाता वे उसे कर डालते, पूरे का पूरा कर डालते जैसा कहा जाता ठीक वैसा ही कर डालते। और तब वे गुरु से आकर कहते 'मैंने सब कर डाला, लेकिन कुछ हुआ नहीं। अब और क्या करना है?' तो गुरु कहते: 'अब तुम कहीं और जाओ। हिमालय में एक गुरु है, उसके पास जाओ। या अमुक जंगल में अमुक गुरु के पास जाओ। हम इससे ज्यादा नहीं जानते हैं।
बुद्ध छह वर्षों तक ऐसे चक्कर काटते रहे। उन्होंने वह सब किया जो किसी मनुष्य के लिए करना संभव था। और तब वे ऊब गए; पूरी चीज उन्हें फिजूल, निष्फल और अर्थहीन मालूम पड़ने लगी। एक रात उन्होंने कहा: 'अब सब समाप्त हो गया। संसार में कुछ नहीं था इस आध्यात्मिक खोज में भी कुछ नहीं है। अब मेरे लिए करने को कुछ नहीं है। सब बात समाप्त हो गई। यह लोक तो छूटा ही था, वह लोक भी छूट गया।
सहसा सभी प्रयास गिर गए। बुद्ध खाली थे। क्योंकि जब करने को कुछ नहीं रहता है तो मन गति नहीं कर सकता। मन तभी गतिमान होता है जब उसे कुछ करने को हो, कोई चाह कोई मंजिल पाने को हो। मन तभी गति करता है, जब कुछ संभव है, कुछ पाया जा सकता है कोई भविष्य है। संभावना है कि आज नहीं तो कल उपलब्धि होगी। तब मन यात्रा करता है।
उस रात बुद्ध आखिरी सीमा पर, आखिरी बिंदु पर पहुंच गए। वस्तुत: वे उसी क्षण मर गए, क्योंकि कोई भविष्य नहीं बचा। कुछ भी पाने को नहीं था, कुछ भी नहीं पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मैंने सब करके देख लिया। सारा संसार व्यर्थ है; यह सारा अस्तित्व एक दुखस्वप्न है। उनके लिए भौतिक जगत ही व्यर्थ नहीं हुआ, आध्यात्मिक जगत भी व्यर्थ हो गया। और वे विश्राम में उतर गए।
ऐसा नहीं है कि बुद्ध को विश्राम में जाने के लिए कुछ करना पड़ा। यही बात ठीक से समझने जैसी है। चिंता करने के लिए जब कुछ नहीं बचा तो वे निश्चित हो गए, विश्राम को उपलब्ध हो गए। विश्राम के लिए उन्हें कोई प्रयास नहीं करना पड़ा। बोधिवृक्ष के नीचे वे विश्राम में जाने की कोई कोशिश नहीं कर रहे थे। उन्हें करने को कुछ नहीं था, चिंता करने को भी कुछ नहीं था—न कोई चाह, न कोई भविष्य, न कोई आशा। उस रात वे पूरी तरह निराश थे, शिथिल थे। और विश्राम घटित हुआ।
तुम विश्राम नहीं कर सकते, क्योंकि तुम्हें अभी बहुत कुछ पाना है। वही तुम्हारे मन को मथता रहता है, उद्वेलित करता रहता है। तुम गोल—गोल चक्कर लगाते रहते हो।
अचानक चक्कर थम गया, चक्र रुक गया। और बुद्ध शिथिल हुए और सो गए। भोर में जब वे जागे तो अंतिम तारा डूब रहा था। वे अंतिम तारे को डूबते हुए देखते रहे, और उसके विलीन होने के साथ—साथ वे भी विलीन हो गए। वे बुद्ध हो गए।
फिर लोग उनसे पूछने लगे कि आपने बुद्धत्व कैसे प्राप्त किया? उसका उपाय क्या है? अब तुम बुद्ध की कठिनाई समझ सकते हो। अगर वे कहते कि इस उपाय से हुआ तो वे गलत कहते, क्योंकि उन्होंने तभी पाया जब कोई उपाय न था। अगर वे कहते कि इस प्रयत्न से पाया तो भी वे गलत कहते, क्योंकि उन्होंने तब पाया जब कोई प्रयत्न न रहा। और अगर वे कहते कि कोई प्रयत्न मत करो और तुम पा लोगे तो भी वे गलत कहते, क्योंकि उनके अप्रयत्न में छह साल के प्रयत्न पृष्ठभूमि की तरह जुड़े थे। उस प्रयत्न के बिना, छह वर्षों के कठिन प्रयत्न के बिना यह प्रयत्नशून्‍यता की स्थिति उपलब्ध नहीं होती। उसी पागल प्रयास के कारण वे शिखर पर पहुंच गए; और जब कहीं जाने को न बचा तो वे विश्राम की घाटी में उतर गए।
इस बात को कई कारणों से स्मरण रखना चाहिए। आध्यात्मिक साधना अत्यंत विरोधाभासी घटना है। प्रयत्न करना है, लेकिन पूरी तरह जानते हुए करना है कि प्रयत्न से कुछ नहीं होने वाला है। प्रयत्न करना है अप्रयत्‍न को उपलब्ध होने के लिए; प्रयत्नशून्यता के लिए प्रयत्न करना है। लेकिन अपने प्रयत्न को शिथिल मत करो। अगर तुम अपने प्रयत्न को शिथिल करोगे तो तुम उस विश्राम को कभी नहीं उपलब्ध हो सकते जो बुद्ध को उपलब्ध हुआ। तुम तो सब प्रयत्न करो, ताकि अपने आप ही एक क्षण आए जब कि प्रयत्न के कारण ही तुम उस बिंदु पर पहुंच जाओ जहां विश्राम घटित होता है।
उदाहरण के लिए, तुम इस बात को एक भिन्न ढंग से देख सकते हो। मेरे देखे, पश्चिम में अहंकार केंद्रीय बिंदु रहा है। पश्चिम का सारा प्रयत्न अहंकार के विकास के लिए, अहंकार की तृप्ति के लिए रहा है। पूर्व का सारा प्रयास निरहंकारिता का रहा है, कि कैसे अहंकारशून्‍य हुआ जाए, कैसे अपने को भूला जाए, कैसे समर्पित हुआ जाए, कैसे अपने को पूरी तरह पोंछ दिया जाए। पूर्व निरहंकारिता के लिए प्रयत्नशील रहा है और पश्चिम पूर्ण अहंकार के लिए। लेकिन विरोधाभास यह है कि अगर तुम्हारे पास एक विकसित अहंकार नहीं है तो तुम समर्पण नहीं कर सकते। तुम समर्पण तभी कर सकते हो अगर तुम्हारे पास एक सुस्पष्ट अहंकार है। अन्यथा समर्पण नहीं हो सकता। कौन समर्पण करेगा?
तो मेरे देखे पूर्व और पश्चिम दोनों आधे—आधे हैं और दोनों दुखी हैं। क्योंकि पूर्व ने निरहंकार को चुना, जो कि अंतिम हिस्सा है, उसमें आरंभिक हिस्सा गायब है। समर्पण कौन करेगा? यदि शिखर ही नहीं है तो घाटी कौन निर्मित करेगा? घाटी शिखर बनती है। जितना ऊंचा शिखर होता है उतनी ही गहरी घाटी होती है। अगर तुम्हारे पास अहंकार नहीं है या तुम्हारा अहंकार कुनकुना—कुनकुना है तो समर्पण संभव नहीं है। या फिर तुम्हारा समर्पण भी कुनकुना—कुनकुना होगा; उस समर्पण से कुछ भी नहीं होगा; कोई विस्फोट नहीं होगा।
पश्चिम में आरंभिक हिस्से पर जोर दिया गया है। तो तुम अपने अहंकार को बढ़ाए जा सकते हो। उससे अधिकाधिक चिंता पैदा होगी। और जब तुम्हारा अहंकार प्रगाढ़ हो जाएगा तो तुम्हें पता नहीं है कि उसका क्या किया जाए, क्योंकि अंतिम हिस्सा गायब है।
मेरे देखे, अध्यात्म की खोज दोनों है। एक बड़ा शिखर खड़ा करो, एक पूर्ण अहंकार निर्मित करो—सिर्फ इसलिए कि उसे विलीन किया जा सके। यह बात बेतुकी लगती है कि सिर्फ विलीन करने के लिए, सिर्फ समर्पण करने के लिए, सिर्फ खोने के लिए अहंकार निर्मित किया जाए। लेकिन तुम उस चीज को कैसे खो सकते हो जो तुम्हारे पास नहीं है? मेरी दृष्टि में मनुष्यता को इन दोनों बातों के लिए एक साथ प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को सहयोग दो कि उसका अहंकार बड़ा हो, परिपूर्ण हो—यह आधी यात्रा है—और फिर उसे समर्पण करने में सहयोग दो। जितना बड़ा शिखर होगा उतनी ही गहरी घाटी होगी। तुम्हारा अहंकार जितना बड़ा होगा, तुम्हारा समर्पण उतना ही गहरा होगा, समग्र होगा।
और यह नियम सभी चीजों के लिए है। अध्यात्म के मार्ग पर इस सतत विरोधाभास के नियम को स्मरण रखो। एक क्षण के लिए भी इसे मत भूलों। परिपूर्ण अहंकारी बनो, ताकि तुम समर्पण कर सको, खो सको, विलीन हो सको। तुम सब प्रयत्न करो जो कर सको, ताकि उस बिंदु पर पहुंच सको जहां प्रयत्न छूट जाए और तुम समग्रत: प्रयत्नशून्‍य हो जाओ।

 तीसरा प्रश्न :

कल रात आपने कहा कि मन जितना बढ़ता है उतना ही हमें पता चलता है कि मन का स्वभाव भ्रांति है भ्रम है। लेकिन क्या यह सब नहीं है कि मन का यह विकास एक प्रकार की सुस्पष्टता की ओर भी ले जाता है?

 मैं अभी जो कह रहा था, इससे संबंधित है।
ही, यह एक प्रकार की सुस्पष्टता की ओर ले जाता है, क्योंकि जब मन परिपक्व और प्रौढ़ होता है तो तुम्हें पता चलता है कि मैं आत हूं। यह जानने के लिए भी कि मन भांति है बहुत विकसित मन की जरूरत है। जिन्हें यह बोध नहीं है कि मन एक भ्रांति है, उनका मन वस्तुत: प्रौढ़ नहीं हुआ है। वे लोग अभी बचकाने हैं, अप्रौढ़ हैं। बहुत प्रौढ़ चित्त ही मन के इस गुण के प्रति, उसके भ्रांतिपूर्ण होने के प्रति, सजग हो सकता है।
और जब तुम्हारा मन अच्छी तरह विकसित हो तो ही ध्यान संभव है, क्योंकि ध्यान विपरीत छोर है। ध्यान का अर्थ है अ—मन, लेकिन यदि तुम्हें मन ही नहीं है तो तुम अ—मन को कैसे उपलब्ध हो सकते हो? तो पहले मन को उपलब्ध करो—ताकि उसे खो सकी। और यह मत सोचो कि जब अंततः अ—मन की स्थिति को उपलब्ध होना है तो फिर मन को उपलब्ध करने की क्या जरूरत है। क्योंकि अगर तुम्हारे पास मन नहीं है तो तुम्हें परम का, अ—मन का अनुभव नहीं होने वाला है। यह तो तभी हो सकता है जब मन हो।
तो मैं मन के विरोध में नहीं हूं मैं बुद्धि के विरोध में नहीं हूं। सच तो यह है कि मैं किसी चीज के भी विरोध में नहीं हूं। मैं प्रत्येक चीज के पक्ष में हूं क्योंकि प्रत्येक चीज उसके विपरीत ध्रुव को उपलब्‍ध करने में उपयोगी हो सकती है। हर ध्रुव का विपरीत ध्रुव है। और अगर एक ध्रुव मौजूद न हो तो विपरीत ध्रुव को नहीं पहुंचा जा सकता है।
एक पागल आदमी ध्यान नहीं कर सकता है। क्यों? क्योंकि उसके पास मन ही नहीं है। लेकिन उसका अ—मन वही नहीं है जो बुद्ध का अ—मन है। अ—मन के दो आयाम हो सकते हैं; एक मन के नीचे और दूसरा मन के ऊपर। जो मन के ऊपर है वह भी अ—मन है और जो मन के नीचे है वह भी अ—मन है। तुम मन से नीचे गिर सकते हो, वहा भी मन नहीं है, लेकिन वह ध्यान नहीं है। तुम्हें मन के ऊपर उठना होगा तो ही बुद्ध के अ—मन की उपलब्धि होती है। इस बात को सतत स्मरण रखो, क्योंकि वे इतने समान हैं कि तुम पूरी चीज को गलत समझ सकते हो। वे इतने समान हैं।
उदाहरण के लिए, बच्चा निर्दोष होता है और संत भी निर्दोष होता है। लेकिन संत की निर्दोषता बचकानी नहीं है; वह बच्चे जैसी है, बचकानी नहीं है। कारण यह है कि बच्चा इसलिए निर्दोष है क्योंकि वह अज्ञानी है। उसकी निर्दोषता नकारात्मक है; वह एक अनुपस्थिति है। देर—अबेर सब प्रकट होगा; बच्चा एक ज्वालामुखी है जो फूटने की प्रतीक्षा कर रहा है। उसकी निर्दोषता ज्वालामुखी के फटने के पूर्व की शांति जैसी है।
संत वह है जो पार चला गया है। विस्फोट हो चुका है, ज्वालामुखी फिर शात हो गया है। लेकिन यह शांति भिन्न है। पहली शांति के गर्भ में कुछ छिपा था, वह शांति सतह पर ही थी। गहरे में बच्चा अशात होने के लिए तैयार हो रहा था। संत अशांति से गुजर चुका है, बवंडर जा चुका है। यह शांति, यह निर्दोषता समान मालूम होती है, लेकिन दोनों में गहरा भेद है।
तो कभी—कभी कोई मूढ़ भी संत जैसा मालूम पड़ सकता है। और मूढ़ संत जैसे होते हैं, वे चालाक नहीं हैं; चालाक होने के लिए प्रतिभा जरूरी है। वे हिसाबी—किताबी नहीं हैं; हिसाबी—किताबी होने के लिए मन चाहिए। मूढ़ सरल होते हैं, निर्दोष होते हैं; चालाक नहीं होते, हिसाबी—किताबी नहीं होते। वे किसी को धोखा नहीं दे सकते हैं। ऐसा नहीं है कि वे धोखा देना नहीं चाहते, लेकिन वे धोखा दे नहीं सकते, उसकी उनमें क्षमता ही नहीं है। वे संतों जैसे दिखते हैं। और कभी—कभी संत मूढ़ों जैसे मालूम पड़ते हैं, क्योंकि पुन: वही चीज घटित हुई है, हालांकि उसका आयाम भिन्न है, सर्वथा भिन्न है।
तुम मन के नीचे गिर सकते हो; उस हालत में भी अ—मन घटित होता है। लेकिन यह ध्यान नहीं है। तुम ने तो वह मन भी गंवा दिया जो ध्यान की ओर जाने के लिए सीढ़ी बन सकता था। तो मैं मन के विरोध में नहीं हूं। मन का विकास करो; लेकिन भलीभांति स्मरण रहे कि यह मात्र साधन है जिसे छोड़ देना है, फेंक देना है। मन का उपयोग नाव की तरह करना है, तुम दूसरे किनारे पहुंचते हो और नाव को छोड़ देते हो। तुम नाव को बिलकुल भूल जाते हो।

 अंतिम प्रश्न :

हमें अक्सर अनुभव होता है कि हम अपना दुख स्वयं निर्मित करते हैं। इसके बावजूद हम दुख निर्मित करना क्यों जारी रखते हैं? और व्यक्ति कब और कैसे अपना दुःख निर्मित करना बद करता?
हली और सबसे बुनियादी बात समझने की यह है कि तुम कहते तो हो कि 'हमें अक्सर अनुभव होता है कि हम अपना दुख स्वयं निर्मित करते हैं'; लेकिन ऐसा है नहीं। तुम वस्तुत: कभी अनुभव नहीं करते कि अपने दुखों के तुम स्वयं ही स्रष्टा हो। तुम ऐसा सोचते हो, क्योंकि तुम्हें यह सिखाया गया है। सदियों से गुरु और शिक्षक कहते आ रहे हैं कि तुम ही अपने दुखों के निर्माता हो, कोई दूसरा नहीं। तुमने ये बातें सुनी हैं, तुमने ये बातें पढ़ी हैं। ये बातें तुम्हारी मांस—मज्जा में समा गई हैं, ये बातें तुम्हारा अचेतन संस्कार बन गई हैं। इसलिए तुम कभी—कभी तोते की तरह दोहरा देते हो कि हम अपना दुख स्वयं निर्मित करते हैं। लेकिन यह तुम्हारा अपना अनुभव नहीं है, यह तुम्हारा अपना बोध नहीं है।
क्योंकि अगर यह तुम्हारा अपना बोध हो तो दूसरी बात असंभव है। तब तुम नहीं कह सकते कि 'इसके बावजूद हम क्यों दुख निर्मित करना जारी रखते हैं?' अगर तुम वास्तव में यह अनुभव करते हो तो तुम जब चाहो दुख निर्मित करना बंद कर दे सकते हो। हा, अगर तुम दुख निर्मित करना चाहते हो, अगर तुम उसमें सुख लेते हो, अगर तुम आत्म—पीड़क हो, तो बात दूसरी है, तब सब ठीक है। अगर तुम कहते हो कि मैं अपने दुख में मजा लेता हूं तो फिर ठीक है; फिर तुम दुख पैदा करते रहो। लेकिन अगर तुम कहते हो कि मैं दुखी हूं और मैं इसके पार जाना चाहता हूं मैं एक क्षण दुखी नहीं रहना चाहता हूं, और मैं समझता हूं कि मैं ही अपने दुखों का निर्माता हूं तो तुम गलत कहते हो। तुम समझ नहीं रहे हो कि तुम क्या कह रहे हो।
सुकरात ने कहा है कि ज्ञान पुण्य है। और पिछले दो हजार वर्षों से बड़ा विवाद रहा है कि सुकरात सही है या गलत—ज्ञान पुण्य है। सुकरात का कहना है कि एक बार तुमने कोई चीज जान ली, फिर तुम उसके विपरीत नहीं कर सकते। अगर तुम जानते हो कि क्रोध दुख है तो तुम क्रोध नहीं कर सकते। जब सुकरात कहता है कि ज्ञान पुण्य है तो उसका यही अर्थ है। तुम यह नहीं कह सकते कि मैं जानता हूं कि क्रोध बुरा है तो भी मैं क्रोध करता हूं। अब मैं इसके लिए क्या करूं? सुकरात कहेगा कि तुम्हारी पहली बात गलत है; तुम नहीं जानते हो कि क्रोध बुरा है। और यही कारण है कि तुम क्रोध करते हो। अगर तुम जानते हो तो फिर तुम क्रोध नहीं कर सकते। तुम अपने ज्ञान के विपरीत कैसे जा सकते हो?
मैं जानता हूं कि अगर मैं आग में हाथ डालूंगा तो जलूंगा, अगर मैं यह जानता हूं तो मैं आग में हाथ नहीं डालूंगा। लेकिन अगर यह बात किसी और ने मुझसे कही है, अगर मैंने यह बात परंपरा से सुनी है, अगर मैंने शास्त्रों में पढ़ा है कि आग जलाती है और मैंने खुद आग को नहीं जाना है, या आग से जलने जैसा कोई अनुभव नहीं जाना है, तो ही मैं आग में हाथ डाल सकता हूं। और वह भी सिर्फ एक बार।
क्या तुम कल्पना भी कर सकते हो कि तुमने आग में हाथ डाला और हाथ जला और तुम्हें पीड़ा हुई; और फिर तुम जाकर पूछते हो कि मैं क्या करूं! मैं जानता हूं कि आग जलाती है, लेकिन इसके बावजूद मैं आग में हाथ डालता रहता हूं!
कौन विश्वास करेगा कि तुम जानते हो? और यह किस तरह का ज्ञान है? अगर तुम्हारा जलने और पीड़ित होने का अपना अनुभव तुम्हें पुन: आग में हाथ डालने से नहीं रोक सकता है तो फिर कोई भी चीज तुम्हें नहीं रोक सकती। तब फिर कोई संभावना नहीं है, क्योंकि अंतिम उपाय भी चूक गया।
लेकिन कोई व्यक्ति इसे नहीं चूक सकता है, यह असंभव है। सुकरात सही है। और जिन्होंने भी जाना है वे सुकरात से सहमत होंगे। उस सहमति में एक गहरा आधार है। एक बार तुम जान गए.....। लेकिन स्मरण रहे, यह जान तुम्हारा अपना होना चाहिए। उधार ज्ञान से काम नहीं चलेगा, उधार ज्ञान बेकार है। जब तक यह तुम्हारा अपना अनुभव नहीं है, यह तुम्हें कभी नहीं बदल सकता। दूसरों के अनुभव काम नहीं आते हैं।
तुमने सुना है कि तुम स्वयं ही अपने दुखों के स्रष्टा हो; लेकिन यह बात सिर्फ बौद्धिक है, यह तुम्हारे प्राणों में नहीं प्रविष्ट हुई है, यह तुम्हारा अपना ज्ञान नहीं है। इसलिए जब तुम चर्चा करते हो तो तुम बौद्धिक ढंग से यह समझते हो, लेकिन जब वास्तविक स्थिति आएगी तो तुम सब चर्चा भूल जाओगे, तब तुम उसी ढंग से व्यवहार करोगे जो तुम जानते हो—उस ढंग से नहीं जैसा दूसरे जानते हैं।
जब तुम शात, स्थिर, आराम से बैठे क्रोध की चर्चा कर रहे हो तो तुम कह सकते हो कि क्रोध जहर है, रोग है, पाप है। लेकिन जब कोई व्यक्ति तुम्हें क्रोधित कर देता है तो बात बिलकुल बदल जाती है। अब यह बौद्धिक चर्चा न रही; अब तुम इससे आविष्ट हो। और जैसे ही तुम आविष्ट होते हो, तुम क्रोधित हो जाते हो। बाद में जब तुम फिर शात होगे तो तुम्हारी स्मृति वापस आ जाएगी, तुम्हारा मन फिर काम करने लगेगा और तुम पश्चात्ताप करोगे कि मैंने गलती की, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, मैं जानता हूं कि क्रोध करना गलत है।
यह 'मैं' कौन है? यह बुद्धि है, ऊपरी मन है। तुम नहीं जानते हों, क्योंकि जब कोई तुम्हें क्रोध में धक्का दे देता है तो तुम इस मन को हटाकर अलग रख देते हो। चर्चा करने के लिए यह ठीक है, लेकिन जब कोई वास्तविक परिस्थिति पैदा होती है तो उसमें वास्तविक ज्ञान ही काम देता है। जब तक परिस्थिति नहीं आती तब तक चलता है। और बातचीत में भी वास्तविक परिस्थिति खड़ी हो सकती है। दूसरा व्यक्ति अगर तुम्हारी बिलकुल न सुने, विवाद करता ही जाए, तो तुम क्रोधित हो जाओगे और सब भूल जाओगे।
सच्चे शान का अर्थ है कि यह तुम्हारा अपना अनुभव है, तुमने इसे सुनकर, पढ़कर सूचना की भांति नहीं इकट्ठा किया है। यह तुम्हारा अपना अनुभव है। और तब कोई समस्या नहीं है, क्योंकि तब तुम उसके विपरीत नहीं जा सकते। ऐसा नहीं कि उसके विपरीत न जाने के लिए तुम्हें कोई प्रयत्न करना होगा; तुम उसके विपरीत जा ही नहीं सकते। मैं कैसे अपने अनुभव के विपरीत जा सकता हूं? जब मैं भलीभांति जानता हूं कि यह दीवार है और मैं कमरे से बाहर जाना चाहता हूं तो मैं दीवार से निकलने की कोशिश कैसे करूंगा? मैं जानता हूं कि यह दीवार है, तो मैं दरवाजे की खोज करूंगा। सिर्फ अंधा आदमी ही दीवार से निकलने की कोशिश करेगा।
लेकिन अगर मैं दीवार से निकलने की कोशिश करूं और तुमसे कहूं कि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि दरवाजा कहां है और मैं जानता हूं कि यह दीवार है, लेकिन इसके बावजूद मैं अपने को दीवार से निकलने से नहीं रोक सकता, तो उसका अर्थ है कि जहां तक मेरा संबंध है वह दरवाजा झूठा है। दूसरों ने मुझे कहा है कि वह दरवाजा है, लेकिन जहां तक मेरा संबंध है, मैं जानता हूं कि वह दरवाजा झूठा है। और दूसरों ने मुझे कहा है कि यह दीवार है, लेकिन जहां तक मैं देखता हूं मुझे इस दीवार में दरवाजा दिखाई पड़ता है, और यही वजह है कि मैं दीवार से निकलने की कोशिश करता हूं।
ऐसी स्थिति में तुम्हें तुम जो जानते हो और तुमने जो सूचना इकट्ठी की है, दोनों में साफ—साफ फर्क करना होगा। सूचना पर, जानकारी पर भरोसा मत करो। चाहे वह सर्वश्रेष्ठ स्रोत से ही क्यों न आई हो, तो भी सूचना सूचना है। अगर बुद्ध भी तुम्हें कहें तो भी यह तुम्हारा अपना ज्ञान नहीं है और उससे किसी भी तरह तुम्हें लाभ नहीं होगा। लेकिन तुम सोचते रह सकते हो कि यह तुम्हारा ज्ञान है, और यह नासमझी तुम्हारी ऊर्जा, समय और जीवन के अपव्यय का कारण हो सकती है।
बुनियादी बात यह नहीं है कि तुम पूछो कि क्या करें कि दुख न निर्मित हो, बुनियादी बात यह जानना है कि तुम स्वयं अपने दुख निर्मित करते हो। अगली बार जब भी कोई वास्तविक स्थिति हो और तुम दुख में होओ तो स्मरण रखना और गौर से देखना कि क्या मैं ही इस दुख का कारण हूं। और अगर तुम्हें अनुभव हो जाए कि मैं ही कारण हूं तो तुम्हारा दुख विलीन हो जाएगा और वह दुख फिर नहीं आएगा। वह फिर असंभव है।
लेकिन अपने को धोखा मत दो। तुम अपने को धोखा दे सकते हो, इसलिए मैं यह कहता हूं। जब तुम दुख में हो तो तुम कह सकते हो. 'हां, मैं जानता हूं, मैंने ही यह दुख निर्मित किया है।लेकिन गहरे में तुम जानते हो कि किसी और ने इसे निर्मित किया है; तुम्हारी पत्नी ने निर्मित किया है, तुम्हारे पति ने निर्मित किया है, किसी और ने निर्मित किया है।
और यह महज सांत्वना है, क्योंकि तुम कुछ कर नहीं सकते। तो तुम अपने को सांत्वना देते हो. 'किसी दूसरे ने नहीं, मैंने ही इसे निर्मित किया है; और धीरे—धीरे मैं इसे निर्मित करना छोड़ दूंगा।
लेकिन ज्ञान त्वरित रूपांतरण है, उसमें धीरे — धीरे की बात नहीं है। अगर तुम समझ गए कि मैंने ही यह दुख निर्मित किया है तो वह दुख तुरंत विदा हो जाएगा और वह फिर वापस नहीं आएगा। और यदि वह वापस आता है तो समझना कि तुम्हारी समझ गहरी नहीं है।
तो यह जानना जरूरी नहीं है कि क्या किया जाए, दुख को कैसे रोका जाए; इतना ही जरूरी है कि गहराई में उतरकर खोजा जाए कि इसका असली कारण कौन है। अगर दुख का कारण दूसरे लोग हैं तो दुख का आना नहीं बंद हो सकता है, क्योंकि तुम पूरे संसार को नहीं बदल सकते हो। अगर कारण तुम हो तो ही उसे रोका जा सकता है।
इसीलिए मैं इस बात पर जोर देता हूं कि केवल धर्म संसार को दुख से सुख की ओर ले जा सकता है। कोई और यह काम नहीं कर सकता, क्योंकि सभी यह मानते हैं कि दूसरे लोग दुख निर्मित करते हैं, अकेला धर्म कहता है कि तुम ही अपने दुख का कारण हो। धर्म तुम्हें अपने भाग्य का मालिक बना देता है। तुम अपने दुख का कारण हो तो तुम अपने आनंद का भी कारण हो सकते हो।

आज इतना ही।