कुल पेज दृश्य

सोमवार, 26 नवंबर 2018

सहज समाधि भली-(प्रवचन-08)

आठवां प्रवचन

मिटना है द्वार--‘होने’ का

दिनांक 28 जुलाई, 1974; प्रातःकाल, श्री रजनीश आश्रम, पूना

कथा:

एक नदी दूर पहाड़ों से निकल कर यात्रा करती हुई, किसी मरुभूमि में जा फंसी। वहां उसकी धाराएं दहकते बालू में खोने लगीं। नदी घबड़ाई, क्योंकि उसकी जीवन-यात्रा ही समाप्त होने को आ गई।
तभी नेपथ्य से एक आवाज आईः ‘जैसे हवा रेगिस्तान पार करती है, वैसे ही नदी भी कर सकती है। बजाय इसके कि तुम बालू में सूख कर समाप्त हो जाओ, अच्छा होगा कि भाप बन कर तुम बन कर तुम भी हवा के साथ मरुस्थल के पार हो जाओ।’
यह सुन कर नदी बोलीः ‘हवा में घुल जाने पर मैं कैसे जानूंगी कि मैं ही हूं? मेरा तो रूप ही बदल जाएगा! फिर मेरी पहचान क्या रहेगी?’

नेपथ्य की आवाज ने कहाः ‘तुम्हारे स्वरूप को हवा सम्हाल लेगी और वर्षा के द्वारा उतार कर फिर तुम्हें नदी बना देगी।’
नदी ने वही किया। पहाड़ों पर फिर वर्षा हुई और फिर नदी नदी हो गई। और नदी सीख भी गई कि मेरा स्वरूप क्या है। नदी इधर सीखती रही और उधर बालू ने कहाः ‘हम जानते हैं, यही हम रोज होते देखते हैं; क्योंकि नदी-तट से पहाड़ों तक हम ही फैले हैं।’
इसलिए कहा जाता है कि ‘जीवन की नदी’ कैसे बहे, यह बात बालुओं में लिखी पड़ी है।
ओशो, कृपापूर्वक इस बोध-कथा का अर्थ समझाएं।



जीवन को जीने के दो ही ढंग हैं। एक ढंग तो है--संघर्ष का, एक ढंग है--समर्पण का। संघर्ष का ढंग वस्तुतः कोई ढंग नहीं है। क्योंकि सिवाय पीड़ा और दुख के उससे कुछ हाथ आता नहीं है। समर्पण का ढंग ही ढंग है। और परिणाम--संघर्ष कर-कर के हाथ खाली रह जाते हैं। और समर्पण करते ही हाथ भर जाते हैं; सब खालीपन भर जाता है।
यह बात बड़ी उलटी लगेगी। ऐसा कहने पर बड़ा विरोधाभास लगेगा कि जो लड़ते हैं, वे हार जाते हैं। और जो पहले चरण में ही हारे हुए हैं, उनके हारने का कोई उपाय नहीं है। जीतने का ढंग हार जाना है।
प्रेम में तो, हमने सुना है कि, जीतने का ढंग हार जाना है; प्रार्थना में भी वही ढंग लागू होगा। क्योंकि प्रार्थना प्रेम का ही विस्तीर्ण रूप है। प्रार्थना प्रेम ही है।
संसार में जीतने का ढंग लड़ना है, मोक्ष में जीतने का ढंग हारना है। और यह ठीक ही है कि संसार का रास्ता और मोक्ष का रास्ता विपरीत है।
मुल्ला नसरुद्दीन मरने के करीब था। आखिरी चरण, आखिरी श्वास। मित्रों ने पूछा, ‘नसरुद्दीन, हम तुम्हें कैसे दफनाएं--इस संबंध में कुछ सूचना दे दो।’ तो नसरुद्दीन ने कहा, ‘एक काम करना, वही मैं सदा से सोचता रहा हूं कि मुझे तुम सिर के बल दफना देना; शीर्षासन करता हुआ दफना देना।’ मित्रों ने कहा चकित होकर, ‘कभी सुना नहीं कि किसी को सिर के बल दफनाया गया हो! यह उलटी बात तुम क्यों करते हो?’ नसरुद्दीन ने कहा, ‘पैर के बल खड़े होकर देख लिया, सिवाय दुख के कुछ भी न पाया। अब इससे उलटे होकर देख लेना चाहता हूं; उस दूसरी दुनिया में, इस दुनिया से उलटे होकर देख लेना चाहता हूं, क्योंकि ज्ञानियों से मैंने सुना है कि दोनों के ढंग। विपरीत हैं। इस दुनिया में पैर के बल खड़े होकर देखा और हार गया। अब सिर के बल खड़े होकर देखना चाहता हूं--उस दुनिया में, ताकि और हार न मिले।’
बात उसने ठीक ही कही। इस जगत और उस जगत के नियम ठीक विपरीत हैं। ‘यहां’ लड़ो तो ही जीत सकोगे; तब भी जीतना पक्का नहीं है; संभावना है। ‘वहां’ लड़े कि हारोगे। हारना--संभावना नहीं है--बिल्कुल सुनिश्चित है। वहां हारने की तैयारी हो, तो जीतोगे। वहां जो मिट सकता है--खो सकता है--वही सब कुछ पाने का अधिकारी हो जाता है।
जीसस ने कहा है, ‘मिट जाओ--बीज की भांति, तो तुम अंकुरित होओगे; तुममें परमात्मा के फूल खिलेंगे।’ जीसस ने यह भी कहा है कि ‘जो अपने को बचाएंगे, वे खो देंगे। और जो अपने को खो देंगे, वे ही केवल अपने को बचाने में सफल हो पाते हैं।’
यह कहानी इसी राज को कहने वाली कहानी है। इस छोटी सी कथा में जीवन के ये दो बिंदु प्रकट हुए हैं। कहानी हम पढ़ें और एक-एक शब्द को समझने की कोशिश करें।
‘एक नदी दूर पहाड़ों से निकल कर यात्रा करती, किसी मरुभूमि में जा पहुंची। वहां उसकी धाराएं दहकते बालू में खोने लगीं। नदी घबड़ाई, क्योंकि अचानक उसकी जीवन-यात्रा समाप्त होने को आ गई!’
सभी नदियां रेगिस्तान में पहुंचती हैं; पहुंचना ही पड़ेगा। क्योंकि रेगिस्तान ही अनुभव है। सभी जीवन-यात्राएं दुख में पहुंचती हैं। क्योंकि दुख के बिना कब कोई कभी निखरा है? सभी स्वर्णों को अग्नि से गुजरना पड़ता है। क्योंकि कचरे के जलने का और स्वर्ण के निखरने का--वही उपाय है।
तुम भी रेगिस्तान में पहुंच गए हो; रोज पहुंचते हो--जहां सब तपता है। और जहां लगता है--अब मिटे, अब मिटे। और जहां बचने का कोई मार्ग नहीं सूझता; जहां सब मार्ग खो जाते हैं। ‘रेगिस्तान’ का अर्थ हैः जहां कोई मार्ग नहीं बचता और जहां कुछ भी करो, बचने की कोई सुविधा नहीं दिखाई पड़ती।
ठीक से समझो तो हमारा पूरा जीवन ही एक रेगिस्तान है। जैसे ही हम शरीर में प्रविष्ट होते हैं, रेगिस्तान में प्रविष्ट हो गए। इसलिए तो ज्ञानी निरंतर पुकारते रहे--एक ही बात--कि ‘आवागमन से छुटकारा मिले। हे प्रभु, कैसे आवागमन से छुटकारा मिले? नदी कैसे रेगिस्तान से मुक्त हो?’
शरीर रेगिस्तान है--उसमें तुम खो रहे हो। तुम्हारी जीवन-धारा सूख रही है। इसलिए तो बच्चा पैदा होता है, तो जीवन-धारा से जगमगाता होता है। फिर रोज-रोज जीवन-धारा सूखती जाती है। बूढ़ा रसहीन हो जाता है। सब ज्योति खो जाती है। सब ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
आखिर जिसको हम जीवन कहते हैं, वह क्या है? --एक रेगिस्तान में खोते जाना। एक दिन नदी बिल्कुल सूख जाती है और लाश हाथ में रह जाती है।
जिसे हम जीवन कहते हैं, वही रेगिस्तान है। और नदी की चर्चा हो रही है, वह तुम ही हो। यह किसी नदी की बात नहीं है। यह ‘चेतना की नदी’ की बात है।
‘एक नदी दूर पहाड़ों से निकल कर यात्रा करती, किसी मरुभूमि में जो पहुंची।’ सभी नदियां पहुंचती हैं; पहुंचना ही पड़ेगा। बिना मरुभूमि से निकले, नदी की कसौटी कहां होगी?
लोग मुझसे पूछते हैं--लोग सदा से पूछते रहे हैं कि ‘आखिर जीवन में दुख क्यों है?’ पर उन्हें पता नहीं कि अगर दुख न हो तो जीवन के निखरने का, संवरने का, जीवन के प्रौढ़ होने का उपाय क्या होगा! यह तो ऐसे है, जैसे पत्थर का टुकड़ा मूर्तिकार को पूछे कि तुम छेनी क्यों चलाते हो? मेरे ऊपर छेनी क्यों काम में लाते हो? उस पत्थर के टुकड़े को पता भी नहीं है कि अगर छेनी न हो, तो अनगढ़ पत्थर अनगढ़ ही रह जाएगा। छेनी काटती लगती है। लेकिन जो काटती है, वही बनाती है। व्यर्थ टुकड़े कटेंगे, गिरेंगे--मूर्ति उभरेगी। राह के किनारे पड़ा हुआ पत्थर मंदिर में विराजमान हो जाएगा। जो उकसे ऊपर पैर रखते थे, वे ही उसके सामने सिर झुकाने लगेंगे। जिन्होंने कभी उसकी तरफ देखा भी नहीं था, वे ही उसके सामने आरती उतारने लगेंगे। पर छेनी से गुजरना जरूरी था।
दुख छेनी है। जिन्हें मिलता है, वे सौभाग्यशाली हैं। जिन्हें नहीं मिलता है, वे अभागे हैं। लेकिन जिन्हें दुख मिलता है, वे सोचते हैं कि हम अभागे हैं, क्योंकि वे दुख का मूल्य नहीं समझते हैं। वे दुख की सृजनात्मकता नहीं समझते। कि दुख एक क्रिएटिव फोर्स है--छेनी।
दुख को अगर तुम ठीक से देख पाओ, तो तुम दुख के लिए भी परमात्मा को धन्यवाद दोगे। और अगर तुम्हारे पास देखने की आंखें न हों, तो तुम सुख के लिए भी परमात्मा से शिकायत करते हो। आंख हो देखने की, तो दुख के लिए भी धन्यवाद उठता है, क्योंकि तुम जानते हो कि दुख से गुजर कर ही तुम उभरोगे, प्रकट होओगे; तुम्हारा व्यर्थ कटेगा, सार्थक निकलेगा; असार गिरेगा, सार बचेगा।
सूफी फकीर बायजीद ने कहा हैः ‘नरक से जो न निकले, वे कभी स्वर्ग न पहुंचे। और जिन्होंने अंधेरी रात न जानी, उनके लिए कोई प्रभात नहीं है। हो भी नहीं सकता। और जिसने यह देख लिया कि ‘हर अंधेरी रात के पीछे सुबह छिपी है’, वह रात के लिए भी परमात्मा को धन्यवाद देता है। फिर उसके जीवन में शिकायत नहीं रह जाती। और जिस जीवन में शिकायत नहीं है, वही प्रार्थनापूर्ण जीवन है।’
तुम राम-राम जपते हो या नहीं, इससे प्रार्थना का कोई संबंध नहीं है। क्योंकि तुम्हारे राम-राम जपने के पीछे भी शिकायत हो सकती है। तुम मंदिर और मस्जिद जाते हो या नहीं, अप्रासंगिक है, क्योंकि तुम जा सकते हो--इसलिए कि--शिकायत करने और कहां जाओगे!
तुम जाओ मंदिर या न जाओ, अगर तुम्हारे जीवन से शिकायत समाप्त हो जाए, तुम प्रार्थना करो या न करो, प्रार्थना शुरू हो गई। शिकायत का अभाव प्रार्थना है। और जब तुम्हें जीवन में सब तरफ धन्यवाद देने का अवसर मिल जाता है, तब तुम दुख के लिए भी अनुगृहीत हो। क्योंकि तुम जानते हो कि दुख निखारता है। तब तुम जानते हो, दुख मांजता है। जब तुम जानते हो कि दुख छिपे को उघाड़ता है। असार को जलाता है, सार को बचाता है। दुख तुम्हारे भीतर जो मरणधर्मा है, उसी को तोड़ पाएगा; जो अमृत है, उसे प्रकट कर जाएगा। दुख की पृष्ठभूमि के बिना इसके होने का कोई भी उपाय नहीं है।
सभी नदियां रेगिस्तान में पहुंच जाती हैं। और अब जब तुम्हारी नदी रेगिस्तान में पहुंचे तो घबड़ाना मत। इस कहानी को थोड़ा समझना।
‘वहां उसकी धाराएं दहकते बालू में खोने लगीं। नदी घबड़ाई, क्योंकि अचानक उसकी जीवन-यात्रा समाप्त होने को आ गई।’
मरुस्थल परीक्षा है--अंत नहीं। दुख समाप्ति नहीं है, यात्रा है।
एक महत्वपूर्ण बात इस संबंध में समझ लेनी चाहिए।
पूरब में--भारत में विशेष कर--ट्रैजिडीज नहीं लिखी गईं; नाटक नहीं लिखे गए। भारत ने बड़ा अनूठा साहित्य पैदा किया है, लेकिन सभी सुखांत है, सभी कॉमेडीज हैं; ट्रैजिडी लिखी ही नहीं गई। पश्चिम के साहित्यकार बड़े चिंतित होते हैं और सोचते हैंः ‘बात क्या है?’ इतनी बड़ी परंपरा है भारत की, फिर भी दुखांत नाटक नहीं लिखे गए। सब सुखांत है। क्या कारण होगा? क्या भारतीयों को दुखांत नाटक नहीं लिखना आता? और पश्चिम में जो भी नाटक लिखे गए हैं, वे सभी दुखांत हैं। पश्चिम तो सोच ही नहीं सकता है कि सुखांत नाटक लिख कर तुम कैसे महान नाटककार हो सकते हो! लेकिन कारण है। भारत में दुखांत नाटक न लिखने का कारण है।
भारत मानता हैः ‘अंत दुख पर कभी होता ही नहीं। मध्य में दुख हो सकता है, यात्रा में दुख हो सकता है, मंजिल पर कोई दुख नहीं है।’ यह एक गहरी भीतर की खोज है कि मंजिल पर तो परमात्मा है, वहां महासुख है, वहां आनंद है। नदी कितनी ही रेगिस्तानों से भटके और कितनी ही बार लगे कि--खोई, अब खोई, नष्ट हुई--कभी नष्ट होती नहीं। दुख ही नष्ट हो जाते हैं; चेतना उनके पार निकल जाती है। रेगिस्तान ही खो जाते हैं, नदी सदा बचती है। नदी को मिटाने का कोई उपाय नहीं है।
तुमने न मालूम कितने रेगिस्तान देखे हैं। तुम्हारी नदी न मालूम कितने दुखों को पार कर आई है। और तब तक चलती ही रहेगी, जब तक कि महासुख को उपलब्ध न हो जाए। इसलिए बहुत अनूठी बात है कि भारत में जीवन-यात्रा आनंद पर पूर्ण होती है। इसलिए जो आनंद को उपलब्ध हो जाता है उसकी जीवन-यात्रा समाप्त हो जाती है। इसलिए हम कहते हैंः बुद्ध फिर नहीं जन्मते। कृष्ण दुबारा पैदा नहीं होते। ज्ञानी का पुनर्जन्म नहीं है। क्योंकि यात्रा समाप्त हो गई।’
यह बड़े मजे की बात है। दुख न मिटा पाया, लेकिन सुख ने मिटा दिया! बड़े दुख थे, बड़े रेगिस्तान थे, उनमें नदी न खो पाई! जन्मों-जन्मों तक पीड़ा झेली, लेकिन पीड़ा से कोई भी कभी मिटा नहीं है। महा-आनंद में मिट जाता है। बुद्ध खोते हैं, तुम नहीं खोते!
बुद्ध से बार-बार पूछा जाता है कि ‘जब तथागत--जब कोई बुद्ध-पुरुष मरता है, तो क्या होता है! वह कहां जाता है? कैसे बचता है? फिर उसकी जीवन-यात्रा कैसी होती है?’ बुद्ध कहते हैंः ‘मत पूछो ये बातें। जब कोई दीए को बुझा देता है, तो तुम पूछते हो, ज्योति कहां गई? ज्योति सिर्फ खो जाती है--महाशून्य में। ऐसे ही बुद्ध-पुरुष खो जाते हैं--महाशून्य में।’
अज्ञानी नहीं खोते, ज्ञानी खोते हैं! इसलिए तुम खोने से मत डरना। तुम तो खो भी नहीं सकते हो। खोना तो परम सौभाग्य है। सिर्फ परम ज्ञानी खोते हैं। और आनंद के पहले यात्रा चलती ही रहती है। क्योंकि जब तक मंजिल न मिले, तब तक यात्रा पूरी कैसे होगी? मध्य में कोई यात्रा कभी पूरी नहीं होती।
इसलिए भारत ने सुखांत नाटक लिखे हैं, दुखांत नहीं।
अंतिम क्षण में भारत का नाटक सुख पर पूरा होता है। दुख पर पूरा होने का अर्थ तो यह होगा कि जीवन एक ट्रेजेडी है, जीवन एक दुख है। सुख पर पूरे होने का अर्थ यह है कि दुख होगा जीवन के मार्ग में, सीढ़ियां होंगी--दुख की, लेकिन वे सभी सीढ़ियां महासुख की तरफ ले जाती हैं। कष्ट होगा पथ पर, लेकिन वह कष्ट केवल मंजिल के सुख को बढ़ाता है। प्यास होगी, लेकिन वह प्यास भी, जल से जब प्यास बुझती है, तो उसकी तृप्ति का निर्माण करती है।
हमने दुख को भी--आनंद को पैदा करने में एक उपकरण माना है। हमने दुख का भी आनंद के लिए उपयोग किया है। वह साधन है। हमने दुख को भी नियोजित कर दिया है कि वह महासुख में हमें ले जाए। हमने मृत्यु को भी अमृत्यु का द्वार माना है। और यह कोई मान्यता नहीं है; यह अनुभव है।
नदी घबड़ाई, जैसा कि तुम घबड़ाओगे। तपती बालू, दहकता मरुस्थल, चारों तरफ जैसे आग लगी हो, नदी खोने लगी। अचानक उसे लगा जीवन-यात्रा समाप्त हो गई।
नदी को पूरी जीवन-यात्रा का पता भी नहीं है। तुम्हें पता नहीं कि तुम कहां से आए हो। तुम्हें भी पता नहीं कि तुम कैसे आए हो। काश! तुम्हें अपने मूलस्रोत का पता हो, तो तुम इतने भयभीत न होओ। अगर तुम्हें यह पता हो कि तुम कहां से आ रहे हो, तो तुम इतने जल्दी डरो भी न। ‘तुम कौन हो’, अगर तुम पहचान लो, तो तुम निर्भय हो जाओ, अभय हो जाओ। तब मौत सामने खड़ी रहे, रेगिस्तान जलता हुआ--मृत्यु का ही रूप हो जाए, तो भी तुम्हारे भीतर कुछ कंपेगा नहीं--अगर तुम जानते हो कि तुम कौन हो। लेकिन न तुम जानते हो, न नदी जानती है।
नदी को इतना पता है कि दूर पहाड़ों से आ रही है। लेकिन पहाड़ों पर नदी कहां से आई थी? आकाश से बरसी थी, बादलों से उतरी थी। सागर से चढ़ी थी। सागर कहां से पहुंची थी? पहाड़ों से उतरी थी। और तब जीवन एक वर्तुल बन गया। तब जीवन एक वर्तुल हैः एक रेखा नहीं है--सीधी। इसलिए हम इस देश में कहते रहेः ‘न जीवन का कोई अंत है, न प्रारंभ। क्योंकि वर्तुल का कोई अंत और प्रारंभ नहीं होता। रेखा का अंत होता है, प्रारंभ होता है; वर्तुल का न कोई अंत होता है, न प्रारंभ होता है।
जीवन एक वर्तुल है। जहां अंत है, वहीं से फिर प्रारंभ हो जाता है। जहां प्रारंभ है, वहीं फिर अंत हो जाता है। जीवन एक घूमता हुआ वर्तुल है, साइकिल है। नदी को पता नहीं है। नदी को शायद इतना ही पता है कि हिमालय से आती हूं, गंगा हूं। लेकिन हिमालय पर कोई शून्य से तो नदी उतरेगी नहीं; शून्य से तो कुछ पैदा नहीं होता! अस्तित्व ही अस्तित्व से जाता है। और अगर शून्य से अस्तित्व आता हो, तो उसका अर्थ हुआ कि शून्य महा अस्तित्व है। क्योंकि जो नहीं है, उससे कुछ पैदा नहीं होगा।
गंगोत्री पर गंगा अचानक कहां से आ जाएगी! अचानक कुछ भी नहीं घटता। अकस्मात कुछ भी नहीं घटता। हमें दिखाई पड़ती है कि गंगोत्री पर गंगा अचानक प्रकट हो गई; लेकिन अप्रकट थी। खोज जारी रखनी चाहिए। तो हम बादलों में खोजेंगे, वहां दिखाई नहीं पड़ती थी।
तुम अचानक अपनी मां के पेट से पैदा नहीं हो गए। वह गंगोत्री है। उसके पहले तुम्हारे भी बादल थे, तुम्हारा भी आकाश था। मां के पेट से तुम अचानक कैसे पैदा हो जाओगे? बात बेहूदी है। अचानक कुछ भी पैदा नहीं होता। जमीन पर अंकुर आता है तो बीज से आता है। बीज किसी वृक्ष से आया। अगर तुम खोज पर निकलोगे, तो तुम पाओगेः ‘हर वृक्ष के पीछे बीज है। और फिर वृक्ष में बीज लग जाते हैं। वर्तुल पूरा हो जाता है।’
तुम मां के पेट से अचानक पैदा नहीं हो गए हो। मां का पेट भी एक पड़ाव था। प्रारंभ नहीं। वहां तुम थोड़ी देर रुके और विश्राम किया। वहां तुमने इस जीवन-यात्रा का आयोजन किया, पाथेय जुटाया। सत्तर वर्ष चल सको, इसके लायक जीवन ऊर्जा इकट्ठी की। वह तुम्हारा मूलस्रोत नहीं है। वह भी तुम्हारा यात्रा-पथ है। लेकिन तुम्हें पता नहीं है, तो सोचो नदी को कैसे पता होगा! तुम्हें भी पता नहीं है। तुम भी सोचते हो यही जन्म सब कुछ है। तुम्हें भी भूल गए पिछले जन्म, तुम्हें भी आकाश-पथ की कोई याद न रही। गंगा को कैसे रहेगी! वह भी सोचती हैः ‘गंगोत्री से मैं पैदा हुई और यह आ गया मरुस्थल; मिटने का क्षण आ गया!’
स्रोत को खोज लो, तो तुमने अंत को खोज लिया। प्रथम को तुमने जान लिया, तो तुमने अंतिम को पहचान लिया। और जब तक तुम प्रथम को न जान लोगे, तब तक तुम अंतिम को न पहचान सकोगे। क्योंकि अंतिम और प्रथम एक के ही नाम हैं। जीवन एक वर्तुल है।
नदी घबड़ाई कि जीवन-यात्रा समाप्त हुई। इतना आसान है--जीवन का समाप्त होना? जीवन कभी समाप्त होता ही नहीं। जीवन कभी समाप्त हुआ ही नहीं है। जीवन उसी का नाम है, जो कभी समाप्त नहीं होता। जो समाप्त होता है, उसका नाम तो जीवन नहीं है।
तुमने कोई ऐसी चीज देखी है, जो समाप्त होती है? रूपांतरण होते हैं, रूप बदलते हैं। समाप्त तो कुछ भी नहीं होता। बर्फ पिघल कर पानी बन जाती है, पानी उड़ कर भाप बन जाता है। रूप बदलते हैं। लेकिन जो जीवन ऊर्जा है, वह तो समाप्त नहीं होती।
वैज्ञानिक से पूछो; वह तो पदार्थवादी है, लेकिन वह भी कहता हैः ‘इस जगत में कुछ समाप्त नहीं होता। इस जगत की जो ऊर्जा है, वह सदा उतनी ही है। न तो ज्यादा हो सकती है, क्योंकि ज्यादा कहां से आएगी? न तो कम हो सकती है, क्योंकि कम होने के लिए कहां जाएगी!’ यह हो सकता है कि जो पत्थर राह के इस किनारे पड़ा था, अब दूसरे किनारे पड़ा हो। यह हो सकता है कि पानी का जो डबरा यहां था, अब आकाश में उड़ गया हो; सागर में उतर गया हो। लेकिन इस पूरे अस्तित्व के बाहर जाने का कोई उपाय नहीं है। न भीतर आने का उपाय है, न बाहर जाने का उपाय है।
यहां कुछ मिटता नहीं है। यहां कुछ बनता भी नहीं। यहां केवल रूपांतरण होता है।
जन्म और मृत्यु झूठे शब्द हैं। जन्म और मृत्यु गलत शब्द हैं। न तो तुम कभी पैदा हुए हो, न तुम कभी मर सकते हो। तुम सदा थे, तुम्हारे रूप बदले हैं। कल तुम्हारा कोई और रूप था, आज तुम्हारा कोई और रूप है। रूप जन्मा है, रूप मरेगा भी। जन्म भी रूप का होता है, मृत्यु भी रूप की होती है। तुम अरूप में हो। आज इस लहर में हो तुम, कल दूसरी लहर में हो जाओगे। यह लहर मिट जाएगी। दूसरी लहर होगी, पर तुम न मिटोगे, मिटना असंभव है।
वैज्ञानिक कहते हैंः किसी भी वस्तु का न तो क्रिएशन, सृजन हो सकता है और न तो डिस्ट्रक्शन, विनाश हो सकता है। एक छोटे से रेत कण को भी मिटाने का कोई उपाय नहीं है। बनाने का भी कोई उपाय नहीं है। तुम जोड़-तोड़ कर सकते हो। चीजों को यहां से वहां कर सकते हो। संयोग बदल सकते हो।
तुम्हें भी मौत का डर लगता है, तो नदी घबड़ा गई हो, तो कुछ आश्चर्य नहीं! लगाः जीवन-यात्रा समाप्त हुई। जीवन से जो परिचित नहीं हैं, उन्हें ही यह घबड़ाहट पकड़ती है कि जीवन-यात्रा समाप्त हुई। जो जीवन से परिचित हैं, वे मौत के सामने भी हंसते रहेंगे।
जीवन की कभी कोई मृत्यु नहीं हो सकती। मृत्यु का कभी कोई जीवन नहीं हो सकता। मृत्यु का अर्थ है--जो नहीं है। जीवन का अर्थ है--जो है। इन दोनों का कभी कोई संबंध नहीं हुआ है। कभी संबंध हो भी नहीं सकता। इनके मिलने का कोई उपाय नहीं है।
तभी नेपथ्य से एक आवाज आईः जैसे हवा रेगिस्तान पर आवाज करती है। नदी को लगा कि हवा कुछ बोली। नदी को लगा कि रेगिस्तान कुछ बोला। ‘जैसे हवा रेगिस्तान पार करती है, वैसे ही नदी भी कर सकती है।’ हवा तो पार हो जाती है रेगिस्तान के, कभी खोती नहीं, चाहे रेगिस्तान कितना ही जलता हो, दहकता हो। आती है हवा, रेगिस्तान के पार निकल जाती है। रेगिस्तान हवा को लीन नहीं कर पाता, मिटा नहीं पाता।
आवाज आई नेपथ्य से कि ‘नदी, घबड़ा मत, जैसे हवा पार कर जाती है रेगिस्तान को, वैसे ही तू भी पार कर जा सकती है।’
बुद्ध का एक वचन हैः ‘संत हवा की भांति होते हैं।’ बुद्ध का एक नाम है--तथागत। यह नाम बड़ा प्यारा है। बुद्ध को बहुत नाम हमने दिए, इससे प्यारा दूसरा नाम नहीं है। ‘तथागत’ का अर्थ होता हैः हवा के झोंके की तरह जो आया, हवा के झोंके की तरह जो चला गया। दस केम दस गॉन--ऐसा आया, जैसे हवा आए; ऐसा ही चला गया, जैसे हवा चली जाए। न कोई पीछे पद-चिह्न छूटे, न कोई रेखा छूटी। न हमें पता चला कि कब आया, न पता चला कि कब गया। जैसे उसके आने-जाने की कोई ध्वनि न हुई। जैसे उसने कोई शोरगुल न मचाया। शोरगुल तो अहंकार मचाता है। शोरगुल तो ‘मैं’ का भाव मचाता है।
शून्य की भांति आया और शून्य की भांति चला गया। जिनके पास शून्य को समझने की क्षमता थी, वे पहचान पाए। लेकिन जो शोरगुल के आदी थे, उनको सुनाई ही न पड़ा।
‘तथागत’ बड़ा प्यारा शब्द है; ऐसे आया, ऐसे चला गया--किसी को पता भी न चला। इसीलिए बुद्ध-पुरुषों का नाम इतिहास में लिखा भी नहीं जाता, छूट ही जाता है--अक्सर छूट जाता है। क्योंकि कोई शोरगुल नहीं मचता।
अखबार में खबर छापने वाले उसको ही पकड़ पाते हैं, जो शोरगुल करता है। जो उपद्रव करता है, वह इतिहास में सम्मिलित हो जाता है। जो उपद्रव नहीं करता, उसका क्या इतिहास? न तुमने किसी को मारा, न तुमने किसी को पीटा, न तुमने कहीं आग लगाई--तुम इतिहास में नाम कैसे छोड़ोगे! सिकंदर, तैमूर, चंगिज, हिटलर--उनके नाम इतिहास में छूटते हैं! बुद्ध का क्या नाम है? क्या कथा है? कुछ भी नहीं है। हवा के झोंके की भांति आया और गया।
‘नेपथ्य से एक आवाज आई कि तू डर मत, जैसे हवा पार कर जाती है रेगिस्तान को, ऐसे ही तू भी कर सकती है। बजाय इसके कि तू बालू में सूख कर समाप्त हो, अच्छा होगा भाप बनकर हवा के साथ तू भी मरुस्थल के पार हो जा। क्यों न हवा की सवारी कर ले। बजाए इसके कि तू सड़े।’
इसे थोड़ा समझना है; थोड़ा बारीक है। क्योंकि नदी अगर सूखे भी तो हवा पर सवार तो हो जाएगी; चाहे उसे पता न हो। अगर रेगिस्तान में सूखे भी तो भी क्या होगा? सूखने का मतलब क्या होता है? --नदी भाप बन जाएगी। हवा पर सवार तो होगी ही। फर्क क्या होगा? फर्क इतना ही होगा कि पीड़ित होती हुई हवा पर सवार होगी। नदी यही समझेगी कि मैं मिट रही हूं, मर रही हूं, सड़ रही हूं। गई--खो गई--मेरी जीवन-यात्रा बंद हुई। कहीं जीवन-यात्रा बंद हुई है! तुम्हारे अज्ञान के कारण कहीं जीवन नष्ट हो सकता है! सिर्फ तुम दुख में मरोगे।
जब मृत्यु के क्षण में कोई तड़फता है, मरता है, घबड़ाता है, रोता है, चीखता है, छाती पीटता है, तब मर थोड़े ही रहा है। उसके छाती पीटने से, रोने से कोई जीवन-यात्रा समाप्त थोड़े ही हो जाएगी! आत्मा तो नये शरीर लेती ही रहेगी। यह व्यर्थ ही रो रहा है। यह अकारण ही परेशान हो रहा है। ज्ञानी भी मरता है; वह हंसता हुआ मरता है। क्योंकि वह देखता है कि जीवन-यात्रा चलती रहेगी।
रामकृष्ण मरने के करीब थे, तो पत्नी रोने लगी। घड़ी भर पहले जब सांस छूटने को थी, तो रामकृष्ण बोले, ‘तू रो मत, क्योंकि मैं सिर्फ वस्त्र बदल रहा हूं। ये कपड़े ही छूटते हैं; नये कपड़े पहन लूंगा। मैं रहूंगा।’
रामकृष्ण की पत्नी--बड़ी सादी--भोली; स्वीकार कर लिया उसने। रामकृष्ण मर गए, तो नियम के अनुसार विधवा को चूड़ी तोड़नी चाहिए। उसने चूड़ी तोड़ने से इनकार कर दिया। उसने कहा, ‘उन्होंने कहा थाः मैं रहूंगा।’ उनकी मानूं, कि तुम्हारी?’ उन्होंने तो कहा था, ‘मैं वस्त्र बदल रहा हूं। मैं रहूंगा।’ तो वे होंगे, मैं सधवा हूं। मुझे दिखाई पड़ें, न दिखाई पड़ें, लेकिन कहीं होंगे। मैं विधवा नहीं हूं। उनका होना ही मेरा सधवा होना है। मुझे नहीं दिखाई पड़ते, यह मेरा अज्ञान होगा, लेकिन उनका होना नहीं समाप्त हुआ है।’
शायद भारत में अकेली विधवा है--शारदा, जो चूड़ी पहन कर जी। लेकिन कभी रोई भी नहीं फिर। उसकी आंख में कभी आंसू नहीं देखे गए। उसका क्रम वैसा ही जारी रहा, जैसा पहले था। वह रोज रात रामकृष्ण की मसहरी बांधती, तकिया लगाती। बिस्तर सम्हालती। और उनसे कहती, ‘अब परमहंस देव तुम सो जाओ।’ रोज सुबह थाली लगाती, बैठक में जाती--जहां वे बैठते थे और उनसे कहती ‘अब परमहंस देव, चलो भोजन तैयार हो गया है।’ उन्हें थाली पर बिठालती, पंखा झलती रहती। जैसा कृत्य चलता था, वैसा ही चलता रहा।
रामकृष्ण के निकटतम शिष्य भी समझने लगे कि इसका दिमाग खराब हो गया है। साफ ही है! निकटतम शिष्यों को भी यह तो दिखाई नहीं पड़ता! निकटतम शिष्यों ने भी कहा, ‘लोग हंसेंगे, शारदा मां! यह बंद करो। लोग समझेंगे, कि शारदा पागल है!’ पर शारदा ने कहा, ‘मुझे भी समझ में आता है कि यह पागलपन है, क्योंकि मेरे पास आंखें नहीं हैं। मैं अज्ञानी हूं, मुझे वे दिखाई नहीं पड़ते। जब मैं बिस्तर लगाती हूं, तो वे मुझे दिखाई नहीं पड़ते। जब मैं भोजन के लिए बुलाती हूं, तब भी मुझे दिखाई नहीं पड़ते। लेकिन यह कसूर मेरा है, क्योंकि उन्होंने कहा था कि ‘मैं सिर्फ वस्त्र बदल रहा हूं। मैं मिटूंगा नहीं।’ भरोसा उनके ज्ञान का करूं या अपने अज्ञान का? तो दुनिया मुझे पागल कहे, लेकिन वे मुझे समझेंगे--वे जहां भी हैं।’
ज्ञानी भी मरता है, अज्ञानी भी मरता है। अज्ञानी रो-रो कर मरता है। मृत्यु को दुख बना लेता है, अपने ही हाथ से। ज्ञानी हंसता हुआ मरता है जैसे मृत्यु एक द्वार है। इस तरफ संसार रह जाता है, उस तरफ नया संसार शुरू हो जाता है। मृत्यु भी जन्म का दूसरा नाम है। इधर जो मृत्यु है, उधर वही जन्म है। इधर तुम मरे, कि कहीं तुम जन्मे। पानी आग में पड़ा--पानी की तरह मिटा--भाप हो गया। इधर मृत्यु हुई, उधर जन्म हुआ। दरवाजे के इस तरफ ‘मृत्यु’ लिखा है, उस तरफ ‘जन्म’ लिखा है। बस, बीच का दरवाजा वस्त्र है। वस्त्र ही बदले जाते हैं।
नदी सड़ती तो भी भाप पर तो सवार हो जाती, लेकिन अज्ञान में। उस नेपथ्य की आवाज ने कहाः ‘बजाय इसके कि तुम बालू में सूख कर समाप्त हो, अच्छा होगा कि भाप बन कर हवा के साथ तू भी मरुस्थल के पार हो जा। बजाय इसके कि मरुस्थल तुझे मिटाए, तू खुद ही मिट जा।’ बस, यही राज है। बजाय इसके कि मौत तुझे मारे, तू खुद ही मर जा। मौत को यह मौका मत दे। बजाए इसके कि तू पीड़ित हो--हो कर सूखे, तू आनंद भाव से नाचती हुई सूख जा। बजाय इसके कि तू समझे कि मैं नदी की तरह मिट रही हूं, तू यह समझ कि मैं हवा पर सवारी कर रही हूं। तू हवा पर सवार हो जा। हवा घोड़े की तरह है। तुझे मरुस्थल के पार ले जाएगी। हवा सदा पार होती रही है। तू इसका सहारा ले ले। इसके साथ हो जा। यह ‘साथ’ शब्द समझने जैसा है।
जिस चीज के भी हम साथ हो जाएं, वहीं दुख मिट जाता है। और जिस चीज के हम विरोध में हो जाएं वहीं दुख पैदा हो जाता है। ‘साथ होना’ साधु की कला है। बस, साधु की कला ही इतना है--सार में, वह साथ होना जानता है। सिर में दर्द हो, तो वह सिरदर्द के साथ हो जाता है। हाथ कट जाएं, तो वह कटे हाथ के साथ हो जाता है। हार जाए, तो वह हार के साथ हो जाता है। तुम उसे जमीन पर पटक दो, तो वह तुम्हें गिराने का मौका नहीं देता है, वह खुद ही लेट जाता है। साथ होना जानता है।
जापान में एक कला है--जूडो। जूडो की कला, बस, यही है--साथ होने की कला। ‘कोई तुम्हारे ऊपर हमला करता है, तो तुम उससे लड़ो मत,’ जूडो का गुरु कहता है। वह कहता है कि कोई तुम पर हमला करता है, तो तुम उसके साथ हो जाओ। तुम उसे ‘पीटने’ मत दो, तुम पिटो। और बड़ी हैरानी की बात है कि जूडो सीखने में बहुत वर्ष लगते हैं। क्योंकि यह कठिन से कठिन बात है। कोई जब तुम पर घूंसा मारता है, तो तुम अकड़ कर घूंसे के खिलाफ खड़े हो जाते हो। चाहे तुम घूंसा न भी मारो, तो भी तुम्हारी हड्डियां घूंसे को झेलने को तैयार हो जाती हैं।
जूडो की कला यह है कि तुम घूंसे को पी जाओ--उसके साथ हो जाओ। जैसे कोई घूंसा मारता हो तकिए में, तो क्या होगा? तकिया लड़ेगा नहीं, तकिया जगह दे देगा। हाथ में ही चोट आएगी, तकिए को चोट न आएगी।
जूडो के गुरु कहते हैं, कि तुम तकिए की भांति हो जाओ। जब कोई तुमको चोट मारे, तो तुम उसके हाथ को जगह दे दो--साथ हो जाओ। और वे कहते हैंः बड़ा अनूठा रहस्य है कि अगर तुम घूंसे मारने वाले के साथ हो जाओ, तो उसके घूंसे से जितनी ऊर्जा, जितनी शक्ति तुम्हारे ऊपर आती है, वह तुम्हारी हो जाती है। क्योंकि तुम लड़ते तो नहीं, उसकी शक्ति तुम पी लेते हो। इसलिए वे कहते हैंः अगर जूडो की कला कोई ठीक से जानता हो, तो बड़े से बड़ा शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर से कमजोर आदमी को नहीं हरा सकता। क्योंकि वह कमजोर अपनी शक्ति नहीं खोता और शक्तिशाली अपनी शक्ति खोता है और कमजोर उसकी शक्ति पीता जाता है। और वह शक्तिशाली गिरेगा, हारेगा--अपनी ही शक्ति के अपव्यय से। कहते हैंः अगर दो व्यक्ति एक समान जूडो के कलाकार हैं, तो हार-जीत का निर्णय नहीं होता है। बड़ा कठिन है।
जूडो की कला अध्यात्म का सार है। जरूरी नहीं है कि तुम किसी से कुश्ती लड़ने में यह कला सीखो, आवश्यक भी नहीं है। तुम्हारा पूरा जीवन एक कुश्ती है--मल्लयुद्ध। वहां तुम लड़ ही रहे हो--हर घड़ी। वहां तुम लड़ो मत।
एक वृक्ष खड़ा है। तूफान आता है। बड़ा वृक्ष अकड़ कर खड़ा रहता है, लड़ता है। जड़ें उखड़ जाती हैं। क्या तुम सोचते हो कि तूफान उखाड़ रहा है उसकी जड़ें? तूफान उखाड़ रहा है, वृक्ष की जड़ें या वृक्ष अकड़ कर खड़ा है, इसलिए जड़ें उखड़ रही हैं? तूफान को इस वृक्ष का पता भी न होगा। तूफान इस वृक्ष के लिए आया भी नहीं। तूफान कोई पता-ठिकाना लाया है? तूफान सिर्फ गुजर रहा था। संयोग की बात थी कि ये बीच में अकड़े खड़े थे। छोटे घास के तिनके भी लगे हैं, वृक्ष के नीचे। तूफान उन पर से भी गुजर रहा है। घास का तिनका झुक जाता है, तूफान के साथ हो जाता है; आंधी के साथ झुक जाता है। बड़ा वृक्ष गिर जाएगा, घास का तिनका फिर खड़ा हो जाएगा।
वह जो घास तिनका जानता है, वही सीखना जूडो है। वही सीखना अध्यात्म है--साथ होने की कला।
तुम नाहक लड़ रहे हो। तुम सोचते होः ‘तूफान तुमसे लड़ने आया है!’ तूफान अपने स्वभाव से गुजर रहा है। तुम अकारण दुश्मनी ले लेते होः तुमसे कोई संबंध भी न था। तुम्हारा--तूफान को कुछ पता भी नहीं है। तुमसे कोई राग-विराग का नाता-रिश्ता भी नहीं है। तूफान को पता भी नहीं चलेगा कि तुम झुके कि अकड़े रहे। पर घास का तिनका तूफान से जीत जाएगा। और बड़े वृक्ष टूटेंगे और नष्ट हो जाएंगे।
बड़े वृक्ष की क्या कमजोरी थी? बड़ा वृक्ष ताकतवर था--तिनके से ज्यादा; घास के पौधे से बहुत ज्यादा ताकतवर था। पर ताकतवर हार गया, कमजोर जीत गया! वृक्ष ताकतवर था, लेकिन लड़ने में सब ताकत नष्ट हो गई, जड़ें उखड़ गईं। फिर इतनी भी ताकत न बची कि वापस खड़ा हो जाए।
कमजोर था--घास का तिनका, उसने संघर्ष ही न लिया। वह झुक गया। तूफान जा चुका, वह फिर खड़ा हो गया; और भी ज्यादा ताजा। सिर्फ धूल झड़ गई--तूफान के साथ। और कुछ मिटा नहीं। सूखे-साखे पत्ते होंगे, वे गिर गए। वह--और ताजा, और नया होकर खड़ा हो गया।
तूफान के बाद घास के तिनकों से पूछो; वे आनंदित थे कि तूफान आया। क्योंकि वे साथ हो गए थे।
इस नेपथ्य की आवाज ने कहाः ‘तू लड़ मत।’ और जहां भय है, वहां लड़ाई शुरू हो जाती है। भयभीत आदमी के पास दो ही उपाय हैंः या तो लड़ो या भागो। या तो बचो या लड़ो।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटे को घूंसेबाजी सिखा रहा था। पड़ोसियों ने पूछा, ‘यह क्या सिखा रहे हो!’ उसने कहा, ‘सिखाना जरूरी है। मुहल्ले में बदमाश लड़के हैं। स्कूल भी जाना पड़ता है। रास्ते में कलह भी हो जाती है। इसलिए घूंसे बाजी सिखा रहा हूं।’ किसी ने कहा, ‘पर इससे तगड़े, मजबूत लड़के हैं, वे पहले से घूंसेबाजी सीखे हैं, उनके सामने यह क्या करेगा?’ नसरुद्दीन ने कहा, ‘क्या तुमने मुझे नासमझ समझा है? भागने की कला पहले ही सिखा चुका हूं कि जब अपने से मजबूत देखो, तो भाग ही खड़ा होना। अपने से कमजोर देखो, मौका मत देना उसे मारने का। और इसकी भी बहुत फिकर मत करना कि किसने तुझ पर हमला किया। तू कमजोर पर हमला करना और जो तुझ पर हमला कर सकता हो, तुझसे ताकतवर हो, उससे बचना। इसे मैं दोनों सिखाये दे रहा हूं।’
ये दो ही उपाय हैं। या तो भागो या लड़ो। लेकिन जिंदगी में--जिंदगी की गहराई में लौटने का उपाय है कहां? भागोगे कहां? नदी अगर रेगिस्तान में आ गई, तो लौटेगी कैसे? तुम अगर दुख में पहुंच गए, तो वापस कैसे जाओगे? अतीत में लौटने की जगह ही नहीं है। अतीत बचता नहीं; वापस लौटने का मार्ग नहीं है।
तब जीवन की गहराई में क्या उपाय है? भागना तो हो नहीं सकता। एस्केप संभव नहीं है, पलायन तुम कर नहीं सकते। करोगे क्या? जब दुख आ जाएगा तो तुम करोगे क्या? वहां दूसरे दो उपाय हैंः या तो दुखी मन से लड़ो या सुखी मन से साथ हो जाओ। अगर तुम दुखी मन से लड़े, तो भी वही होगा--जो होना है। तुम सुखी मन से साथ हुए, तो भी वही होगा--जो होना है। यही नियति का सिद्धांत है। भाग्य का यही गहरा अर्थ है।
जो होना है--वह होगा; तुम्हारे करने, न करने से बहुत फर्क नहीं पड़ता, फिर तुम नाहक ही परेशान हो रहे हो। जब तुम्हारे करने से फर्क ही नहीं पड़नेवाला है--नदी सूखेगी ही रेगिस्तान में, भाप बनेगी ही--तो अब नदी के हाथ में क्या बचा है? दृष्टि। नदी के हाथ में बचा है--रुख, सोचने का ढंग, निर्णय, व्याख्या। कृत्य तो जो होना है, वह होगा। अब तुम क्या सोचते हो उस संबंध में, वही तुम्हारे हाथ में बचा है।
कृष्ण अर्जुन को गीता में, बस, इतनी ही बात कहे हैं, जो इस कहानी में नेपथ्य की आवाज ने नदी से कही। अर्जुन खड़ा है युद्ध में; लौटने का कोई उपाय नहीं है। जीवन में लौटने का उपाय होता ही नहीं। भागोगे कहां, जाओगे कहां? जहां जाओगे, वहीं संघर्ष पाओगे। भागने से कुछ दुश्मन पीछा छोड़ देगा? डटे रहो, तो शायद पीछा भी छोड़ दे। भागे कि और पीछा करेगा।
तुम जिस-जिस से भागते हो, वही तुम्हारा पीछा करता है। तुम जिससे डरते हो, वह तुम्हें और डराता है। तुम जिससे भयभीत हो गए हो, वह भूत-प्रेत की भांति हो जाता है; वह चारों तरफ मंडराता है।
अगर यह अर्जुन भाग जाता, तो कौरव सदा के लिए इसका पीछा करते। तो शत्रु सदा इसको जगह-जगह मिलते। और आत्मग्लानि, पराजय, हार की पीड़ा और संताप--सब इसका पीछा करते। कृष्ण ने इसे कहा कि उपाय यह नहीं है। युद्ध तो होगा ही।
कृष्ण ने बड़ी अदभुत बात कही है कि तू यह सोच ही मत कि तू इन्हें मार रहा है। मैं देखता हूं कि ये मारे जा चुके हैं। नियति इन्हें समाप्त कर चुकी है। ये जिंदा नहीं हैं, ये लाशें खड़ी हैं। तू सिर्फ धक्का देगा, तेरे धक्के की जरूरत है, ये गिर जाएंगे। ये गरदनें कट चुकी हैं, ये अपने ही हाथ से अपने को काट चुके हैं। नियति में खेल पूरा हो चुका है। तू तो सिर्फ निमित्त है। तू कर्ता मत बन। और तू यह भी मत सोच कि तू लड़ रहा है। तू तो सिर्फ नियति के हाथ एक उपकरण है--उसके साथ हो जा। तू परमात्मा को बाधा मत दे, परमात्मा को तेरे भीतर से बहने दे। और वह जो चाहता है, होने दे। तू साथ हो जा।
पूरा गीता इस एक छोटे से शब्द में समा सकती है--‘तू साथ हो जा।’ जो हो रहा है, उससे तू विपरीत मत जा। जो हो रहा है, तू उसमें लीन हो जा। तू अपने को इतना महत्वपूर्ण मत मान कि तेरे किए कुछ भिन्न हो सकेगा।
अहंकार की यही मान्यता है। इसलिए अहंकार भाग्य को कभी स्वीकार नहीं कर पाता। दुनिया में जितने अहंकारी हैं, वे सदा जोर देंगे कि तुम कुछ कर सकते हो। क्योंकि ‘करने’ से अहंकार खड़ा होता है। अगर यह पक्का हो जाए कि कुछ किया ही नहीं जा सकता, तो अहंकार को खड़े होने की भूमि नहीं बचती। कहां खड़े होओगे अगर तुम कुछ कर ही नहीं सकते, तो तुम हो ही नहीं। कुछ कर सकते हो, तो ही तुम हो। तुम्हारे होने की अकड़ ‘करने’ में ही निर्भर है।
नियति या भाग्य के सिद्धांत का गहरा अर्थ इतना ही है कि तुम कुछ भी करो--जो होना है, वही होगा। लेकिन तुम्हारे निर्णय और तुम्हारी दृष्टि और तुम्हारे रुख के कारण तुम अकारण दुखी या सुखी हो सकते हो सकते हो।
नदी दुखी हो सकती है--अगर सोचे कि मैं खो जाऊंगी। नदी सुखी हो सकती है--अगर सोचे कि मैं हवा पर सवार होकर रेगिस्तान को पार कर जाऊंगी।
इसलिए असाधु सदा दुखी है और साधु सदा सुखी, क्योंकि साधु साथ होने की कला जान गया है। और असाधु लड़ रहा है। असाधु का मतलब बुरा आदमी नहीं है। असाधु अच्छा आदमी भी हो सकता है। असाधु का गहरा अर्थ--लड़ने वाला है। अवरोध खड़े कर रहा है। प्रतिशोध ले रहा है। असाधु का गहरा अर्थ--कर्ता का भाव है। साधु का अर्थ हैः कर्ता परमात्मा है, मैं सिर्फ निमित्त हूं।
इसलिए तुम साधु-असाधु से बुरे और अच्छे का अर्थ मत लेना। वह है नहीं। असाधु बहुत बार अच्छा हो सकता है। लेकिन अच्छे में भी वह कर्ता रहेगा। ‘मैंने दान किया, मैंने अहिंसा की, मैंने सेवा की, मैंने यह किया, मैंने वह किया।’ वह अपने ‘मैं’ के आस-पास कर्तृत्व के बड़े-बड़े मकान खड़े करेगा।
मैंने सुना हैः स्वर्ग के द्वार पर दो आदमियों ने एक साथ दस्तक दी। एक ही साथ जमीन पर मरे होंगे। द्वारपाल ने द्वार खोला। और पहला आदमी जो शराबी रहा था--जमीन पर, व्यभिचारी रहा था; ऐसा कोई पाप न था, जो उसने न किया हो; अभी तक उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, इतनी शराब पी गया था। ऐसा लड़खड़ाता भीतर प्रविष्ट हुआ।
दूसरा आदमी जो एक धार्मिक आदमी था, पुण्यात्मा था; मंदिर बनाए थे, दान-दक्षिणा की थी; उसका नशा भी अभी उतरा नहीं था; अकड़ से प्रविष्ट हुआ। उसकी चाल देख कर तुम कह सकते थे कि यह आदमी कोई साधारण आदमी नहीं है। जाति का मुखिया रहा होगा, पंचायत का प्रमुख रहा होगा! कई मंदिरों पर इसका नाम खुदा है। इसके कृत्यों की गाथा नीचे जमीन पर अभी भी चल रही होगी। मरघट पर जो लोग इसको बिदा देने गए होंगे, वे इसका यशोगान कर रहे होंगे।
और दूसरे आदमी को--इसे देख कर तुम कह सकते थे कि मरघट शायद इसको कोई पहुंचाने गया भी न होगा। शायद म्युनिसिपल की गाड़ी ने इसको मरघट पहुंचाया होः अभी तक नशे में था और पैर लड़खड़ा रहे थे।
द्वारपाल ने पूछा इस शराबी से, ‘तूने क्या किया है जगत में, बता। उस हिसाब से हम तुझे भेज दें--स्वर्ग या नरक?’ उसने कहा, ‘किया कुछ भी नहीं--कहने योग्य कुछ भी नहीं किया। और मुझे जैसा पापी खोजना कठिन है। इसलिए पूछने की कोई जरूरत नहीं है; हिसाब लगाओ मत; नरक का रास्ता कहां है--मुझे बता दो। मैं खुद ही चला जाऊंगा। तुम्हें कोई पहुंचाने का कष्ट भी लेने की जरूरत नहीं है। पक्का ही है--नरक मेरा; यह मुझे पहले से ही पता है।’
पूछा दूसरे आदमी से, उसने पूरी फेहरिस्त गिनाई कि इतने मंदिर बनाए, इतने साधुओं को इतनी बार भोजन कराया, इतने उपवास किए, इतनी माला जपी, इतने लाख बार राम का नाम लिखा--यह सब! उसने लिस्ट बताई। उसने भी कहा, ‘पूछने की कोई जरूरत नहीं है। जैसे यह आदमी कहता है कि ‘नरक कहां है, रास्ता बता दो’, वैसा मुझे बता दो कि स्वर्ग कहां है।’
और जब वे दोनों पहुंचाए गए, तो शराबी स्वर्ग में था और दानी नरक में था। क्योंकि जिसने यह स्वीकार कर लिया कि मैंने कुछ किया ही नहीं; जिसने यह स्वीकार कर लिया कि मैं ना-कुछ हूं, उसके सब पाप शून्य हो गए। क्योंकि बिना अहंकार के कोई पाप रुक ही नहीं सकता। जगह ही नहीं बचती, जहां रुके--उसके सब पाप डूब गए। और जिसने यह कहा कि मैंने किया, उसके सब पुण्य डूब गए। क्योंकि पुण्य का अहंकार से संबंध जुड़ा कि सब पुण्य पाप हो जाते हैं।
इसलिए साधु-असाधु से अच्छे-बुरे का कोई भी संबंध नहीं है। जो जानते हैं, वे कहते हैंः साधु वह है, जो साथ हो गया। असाधु वह है, जो लड़ा। असाधु वह है, जिसने जिद्द की। बड़े वृक्ष, आंधियों में जो खड़े रह जाते हैं, वे असाधु हैं। झुक जाने वाले पौधे साधु हैं।
कहा उस आवाज ने नेपथ्य सेः ‘नदी, तू घबड़ा मत और बालू में सूख कर समाप्त हो इससे अच्छा है कि भाप बन कर हवा के साथ तू मरुस्थल के पार हो जा।’ सुन कर नदी बोलीः ‘हवा में घुल जाने पर मैं कैसे जानूंगी कि मैं, मैं ही हूं?’
वही पीड़ा है। एक ही पीड़ा, एक ही कांटा चुभा है--सभी की छाती में, वह चाहे नदी हो, चाहे आदमी हो। नदी ने कहाः ‘यह सब तो ठीक है, लेकिन हवा में घुल जाने पर मैं कैसे जानूंगी कि मैं, मैं ही हूं? मेरा तो रूप बदल जाएगा, फिर मेरी पहचान क्या रहेगी?’ पहचान--इस शब्द को समझ लेना, यह पाप का सार है। पहचान--लोग कैसे रिकग्नाइज करेंगे? मेरी आइडेंटिटी, मेरी पहचान खो जाएगी।
गंगा का एक नाम है, यमुना का एक नाम है। हवा में खोकर तो नाम नहीं रह जाएगा। गंगा का जल यह दावा नहीं कर सकेगा कि मैं पवित्र गंगा का जल हूं। गंदे डबरे के जल के साथ एक हो जाएगा। गंगा का जल यह न कह सकेगा कि मेरे किनारे हजारों-हजारों लोग मोक्ष को उपलब्ध हुए हैं। दावेदार खो जाएगा, पहचान न रह जाएगी, नाम-रूप मिट जाएगा।
नाम-रूप को बचाने की आकांक्षा संसार है। तुम बचाना चाहते हो--किसी तरह--नाम बचे, रूप बचे, मैं बचूं। चाहे दुख ही रहे, तो भी चलेगा, लेकिन मैं बचूं। तुम नरक भी पसंद करोगे, अगर तुम्हारी पहचान हो--रास्ते पर लोग तुम्हें नमस्कार करते हों।
बर्नार्ड शॉ ने कहा है, गहरे व्यंग्य में कहा है, लेकिन सत्य है; हर आदमी के भीतर की बात है। बर्नार्ड शॉ ने कहा कि ‘मैं नरक पसंद करूंगा, लेकिन ‘नंबर एक’ होना चाहता हूं। स्वर्ग में नंबर दो होना, वह मेरी पसंद नहीं है। कि खड़े हैं क्यू में--वह नहीं। नरक सही, लेकिन नंबर एक... !’ क्योंकि ‘पहचान’ में नंबर एक का रस है।
जब तुम ‘नंबर एक’ खड़े होते हो, चाहे नरक सही, लेकिन राष्ट्रपति... और तुम्हारे सब राष्ट्रपति नरकों में हैं। और कहीं हो भी नहीं सकते। लेकिन ‘नंबर एक’ होने का मजा इतना ज्यादा है कि आदमी नरक झेलने को तैयार हो जाता है।
जीसस ने कहा है कि ‘जो पंक्ति में प्रथम खड़े हैं, ध्यान रहे, स्वर्ग के राज्य में वे अंतिम होंगे। और जो पंक्ति में अंतिम खड़े हैं, स्वर्ग का राज्य उन्हें प्रथम खड़ा करेगा।’ लेकिन अंतिम खड़ा होना कौन चाहता है? अंतिम होने की बात ही पीड़ा देती है। सोच कर ही दुख होता है। पहचान खो जाएगी, रूप न होगा, रंग न होगा, काया न बचेगी। ये किनारे न होंगे। यह ढंग न होगा।
तो नदी ने कहाः ‘मैं, मैं ही हूं, इसका पता कैसे चलेगा?’ इसीलिए तो हम शरीर को इतने जोर से पकड़ते हैं। कितने ही ज्ञानी चिल्लाते हों कि ‘तुम आत्मा हो’, लेकिन तुम उनकी सुनकर भी शराब को जोर से पकड़ते हो, क्योंकि वह तुम्हारा किनारा है। उनके बीच तुम्हें पक्का पता है कि तुम कौन हो।
ज्ञानियों की मानी तो आत्मा हवा हो जाएगी। उसका न कोई रूप है, न कोई रंग है; न कोई नाम है, न कोई परिचय। न कोई पता और न कोई ठिकाना; वह अरूप है। ‘अरूप आत्मा’--सुन लेते हैं हम, लेकिन मन हमारा रूप को पकड़ता है; क्योंकि रूप के साथ पहचान बनी रहती है। पहचान बड़ी क्षुद्र है कोई बहुत गहरी नहीं है।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन एक गांव में आया। मेला भरा था गांव में और कहीं जगह ठहरने को न मिली। बामुश्किल एक होटल का मालिक राजी हुआ। उसने कहा ‘तुम्हें दूसरे के कमरे में साथ ही सोना पड़ेगा। और कोई उपाय नहीं है।’ नसरुद्दीन ने कहा, ‘सोना तो है ही।’ तो वह उस कमरे में गया। दूसरा आदमी वहां पहले से मौजूद था। नसरुद्दीन ने उससे कहा, ‘और सब तो ठीक है। एक ही तकलीफ है। लेकिन कोई बात नहीं... ।’
वह जूता पहने, पगड़ी बांधे, कपड़ा--कोट पहने बिस्तर पर सो गया। फिर करवटें बदलने लगा। उस दूसरे आदमी को भी नींद न लगी। यह भी अजीब आदमी है। पगड़ी भी नहीं उतारी, जूता भी नहीं उतारा! नींद इसको लगेगी कैसे? और यह करवट बदलता रहे तो मुझे भी नींद नहीं आ सकती है। तो उसने कहा, ‘मेरे भाई, यह कपड़ा तो कम से कम उतार दो; जूता-पगड़ी?’ नसरुद्दीन ने कहा, ‘फिर सुबह मैं पहचानूंगा कैसे कि मैं कौन हूं? यह पगड़ी, यह जूता, यह कोट-इनसे मेरी पहचान है। और सुबह झंझट खड़ी होगी फिर!’ उस दूसरे आदमी ने कहा, ‘इसमें क्या! कोई रास्ता हम निकाल लेते हैं। यह उचित नहीं कि रात भर न तुम सो पाओ, न मुझे सोने दो।’ तो पहले जो लोग कमरे में रुके होंगे, उनके बच्चे एक खिलौना छोड़ गए थे, एक फुग्गा छोड़ गए थे, वह कमरे में पड़ा था। उस दूसरे आदमी ने कहा, ‘तुम ऐसा करो, तुम कपड़े उतार दो; यह फुग्गा मैं तुम्हारी टांग से बांध देता हूं। यह तुम्हारी पहचान रहेगी सुबह--कि तुम तुम्हें हो’ नसरुद्दीन ने कहा, ‘यह ठीक है, इससे काम चलेगा। कोई पहचान--छोटी ही सही--फुग्गा ही सही।’
उस आदमी को रात मजाक सूझी। क्योंकि यह आदमी कुछ अजीब सा लगा। लेकिन सभी आदमी इसी तरह के हैं। सभी को पहचान... । और पगड़ी आसान है उतारना? पगड़ी के लिए तो सारा खेल चल रहा है। तो जब तुम्हारी इज्जत चली जाती है, तो लोग कहते हैंः ‘पगड़ी उतर गई।’ जब किसी को किसी की इज्जत लेनी रहती है, तो पगड़ी गिरा देता है, पगड़ी उतार लेता है।
यह कहानी तो बिल्कुल ठीक है, आदमी की ही कहानी है।
उस आदमी को रात मजाक सूझी। उसने फिर फुग्गा काट लिया--जब नसरुद्दीन खर्राटे लेने लगा! और अपनी टांग में बांध कर सो गया। सुबह नसरुद्दीन उठा; उसने घबड़ा कर दूसरे व्यक्ति को उठाया और उससे कहा, ‘मैंने पहले ही कहा था कि इससे झंझट होगी। अब बड़ी मुसीबत हो गई! इतना तो पक्का है कि मैं, मैं नहीं हूं, क्योंकि फुग्गा नहीं है! लेकिन यह भी मुझे मानने में बड़ी मुसीबत हो रही है कि तुम मैं हूं। यह और मुसीबत की बात है।’
हमारी सारी पहचान शरीर से है, इसीलिए हमें पिछले जन्म की याद भूल जाती है।
लोग मुझसे पूछते हैं--निरंतर आकर--कि पिछले जन्म की याद क्यों नहीं रहती? याद रहेगी कैसे? पिछले जन्म में जो शरीर था, वह अब नहीं है। जो फुग्गा बंधा था, वह अब नहीं बंधा है। जो नाम था, वह अब नहीं है। जो रंग-रूप था वह अब नहीं है। नाक कुछ और थी, हाथ कुछ और थे, पैर कुछ और थे; ढंग कुछ और था। सब बात बदल गई। और पहचान तुम्हारी--उसी का जोड़ थी। इसलिए पिछले जन्म की याद नहीं रह जाती। क्योंकि याद रहने के लिए पहचान का आधार ही खो गया। आइडेंटिटी कार्ड जो पिछले जन्म में तुम्हारा था, अब नहीं है। उसी को देख कर तुम पहचानते थे कि यह मैं हूं, तो स्मृति जुड़ी रहती थी। सारी स्मृति पहचान के सेतु को चाहती है, नहीं तो स्मृति खो जाएगी।
जब तक तुमने भीतर न झांका हो, जब तक न देख लिया हो--जिससे फुग्गे बंधे हैं, तब तक तुम झंझट में पडोगे; हर बार स्मृति खोयेगी। हर बार तुम भटक जाओगे। इसलिए पिछले जन्म की याददाश्त नहीं रहती।
नदी ने घबड़ा कर कहा कि ‘बात तो ठीक है कि मैं साथ हो जाऊं, लेकिन यह तो आत्मघात मालूम होता है। ध्यान रहे, अहंकार को धर्म सदा आत्मघात मालूम होता है, स्युसाइड मालूम होता है। उसका मतलब यह हुआ कि हम मिटे। साथ होने का मतलब है कि हमारी पहचान खो जाएगी। हम झुके कि हम गए। फिर हमारी प्रतिष्ठा क्या? हमारा गुण-गौरव क्या?
नदी को भी लगा कि यह तो आत्महत्या है। अपने हाथ से मर जाना है। इससे तो बेहतर है, लड़ते रहो। कुछ देर तो रहेंगे। डबरे बन जाएंगे, सूखेंगे, लेकिन लड़ाई तो रहेगी। रेगिस्तान कम से कम इतना तो जानेगा कि हम ऐसे ही न मिट गए। हमने ऐसे ही हथियार न डाल दिए; लड़े थे।
‘मेरा रूप बदल जाएगा, फिर मेरी पहचान क्या रहेगी?’ नेपथ्य की आवाज ने कहा, ‘तुम्हारे स्वरूप को हवा सम्हाल लेगी।’
ध्यान रखना, रूप और स्वरूप में बड़ा फर्क है। रूप का अर्थ है--वह जो तुम्हारे बाहर है। स्वरूप का अर्थ है--वह जो तुम्हारे भीतर है। रूप तो बदल जाता है--हर जन्म में, स्वरूप नहीं बदलता। और अगर तुमने रूप को ही समझा है कि मैं हूं, तो तुम हर बार मुसीबत में पड़ोगे। किनारे बदल जाते हैं, नदी नहीं बदलती। किनारे खो भी जाते हैं, तो भी नदी नहीं बदलती। वह जो भीतर का स्वरूप है, वह तो सदा वही बना रहता है। लेकिन उससे तुम्हारा कोई संबंध नहीं है। उसे तुमने कभी देखा नहीं है।
रूप को खोने का डर है, क्योंकि स्वरूप की पहचान नहीं है। जिसने स्वरूप को पहचान, उसे रूप को खोने का कोई भी डर नहीं रहता।
नेपथ्य की आवाज ने कहाः ‘तुम्हारे स्वरूप को हवा सम्हाल लेगी।’ घबड़ा मत। भयभीत न हो। वर्षा के द्वारा तेरे स्वरूप को हवा ऊपर उठा लेगी--उठा लेगी आकाश में। और फिर वापस पहाड़ों पर उतार देगी।
नदी ने वही किया। बड़ी समझदार नदी मालूम पड़ती है--इतने समझदार तुम नहीं हो--कि नदी ने इतनी जल्दी मान ली बात।
तुमसे नेपथ्य से कितनी बार नहीं कहा गया है! कितनी बार बुद्ध, महावीर, कृष्ण, क्राइस्ट--तुम्हारे चारों तरफ--नहीं कह गए हैं--कि छोड़ो रूप की पकड़, ताकि स्वरूप की पहचान आ जाए। वह कभी नहीं मिटेगा। फिर तुम कभी भयभीत न होओगे। लेकिन तुमने अब तक इसे नहीं सुना।
नदी ने वही किया। पहाड़ों पर फिर वर्षा हुई, और फिर नदी, हो गई। और नदी सीख भी गई कि मेरा स्वरूप क्या है।
बिना मिटे कोई सीखता भी नहीं। बिना गुजरे--अनुभव से, कोई जानता भी नहीं। कितनी ही नेपथ्य की आवाज कहे, वह दूसरे पर भरोसा है।
बुद्ध कितना ही कहें, तुम भला उन पर भरोसा कर लो, क्योंकि वे आदमी प्रामाणिक हैं, उनकी आंख में प्रमाण है। लेकिन अनुभव तो तुम्हें स्वयं ही करना पड़ेगा। तुम जब स्वयं गुजरोगे--मिटने की कला से, जब तुम्हारी नदी रेगिस्तान में खो जाएगी--हवा पर सवार होगी--फिर वर्षा होगी पहाड़ों पर--तब तुम पहचानोगे कि कोई रेगिस्तान तुम्हें मिटा नहीं सकता। कोई मृत्यु तुम्हें मिटा नहीं सकती। तुम शाश्वत हो, तुम अजर-अमर हो।
फिर नदी, नदी हो गई; और नदी सीख भी गई कि मेरा स्वरूप क्या है। और अब उसने जाना कि नदी होना तो मेरा ढंग है--मेरा स्वरूप नहीं। वह तो मेरा आवरण है, मेरी आत्मा नहीं। नदी होना मेरा एक आचरण है, मेरा अंतस नहीं। नदी होना मेरा बाहर का वस्त्र है, वह मेरे भीतर का स्वरूप नहीं है। वह मैं नहीं हूं। मैं तो वही थी, जब नदी खो गई--तब भी थी। जब आकाश में उड़ गई, तब भी थी। जब पहाड़ों पर फिर बरसी, तो तब भी वही हूं।
तुम सदा से वही हो--एक रस। बीच में जो भी हुआ है, वह सब लहरों का उठना और गिरना है। उससे तुम्हारे भीतर जरा भी अंतर नहीं हुए हैं। तुम्हारे स्वभाव में कोई भी भेद नहीं पड़ा है। तुम्हारा ब्रह्म होना अछूता है, अस्पर्शित है, कुंवारा है। उस पर कोई दाग नहीं आया है।
और नदी सीख भी गई है कि मेरा स्वरूप क्या है। नदी तो इधर सीखती रही और उधर बालू ने कहाः ‘हम जानते हैं, यही हम रोज होते देखते हैं। क्योंकि नदी-तट से पहाड़ों तक हम ही फैले हैं।’
इधर नदी सीखती रही, इधर नदी नये अनुभव से गुजरती रही--मिटने और होने के, मृत्यु और अमृत के। इधर नदी ने रूप खोया और स्वरूप पाया। इधर नदी की आंखें बाहर से भीतर की तरफ मुड़ीं, उसने खुद को पहचाना।
एक पहचान है तुम्हारी, जो बाहर से आती है। तुम्हारा नाम है, उसे तुम लेकर नहीं आए। वह तुम्हें बाहर से दिया गया है। तुम जब पैदा हुए, तब तुम अनाम थे। तुम जब आए, तब तुमने बताया नहीं कि तुम्हारा नाम क्या है। किसी ने पूछा भी नहीं तुमसे कि तुम्हारा नाम क्या है। लोगों ने तुम्हें नाम दे दिया। तुम्हारी मां ने, तुम्हारे पिता ने, परिवार ने, समाज ने तुम्हें नाम दिया। वह बाहर से दिया गया है। वह तुम्हारी पहचान नहीं है।
जिन्होंने तुम्हें नाम दिया है, उन्हें पता है कि तुम्हारा नाम क्या है। अलिलटप्पू है, अनुमान है, कामचलाऊ है, एक लेबल है। उसके बिना दिक्कत होगी तुम्हें पुकारने में, बुलाने में। एक कानूनी जरूरत है। और कुछ उसका मूल्य नहीं है। वह तुम नहीं हो।
फिर उनमें से ही किसी ने कहा कि ‘तुम बड़े सुंदर हो।’ वह भी किसी ने कहा, तुम्हें पता नहीं है। तुमने उसे भी मान लिया। किसी ने कहा कि ‘बड़े बुद्धिमान हो’ या किसीने कहा कि ‘बड़े बुद्ध हो’, वह भी तुमने मान लिया।
तुम मानते चले गए--जो-जो तुम्हें बाहर से कहा गयाः तुम उसी के जोड़ हो। उसको तुम अपनी पहचान कहते हो! और उसको खोने से तुम डर रहे हो कि कहीं खो न जाए। तुम सम्हाल रहे हो। बड़ी जद्दोजहद करते हो--बचाने की। इससे ज्यादा नासमझी क्या होगी? कचरा जो दूसरों ने तुम्हें दिया, जो तुम लेकर नहीं आए... ।
दूसरे तुम्हें जानते हैं? वे खुद अपने को नहीं जानते हैं, वे तुम्हें कैसे जानेंगे! जो स्वयं को नहीं जानता, वह दूसरे को कैसे जान पाएगा? जो नहीं जानते, वे तुम्हें रास्ता दिखा रहे हैं! जीसस ने कहा है, अंधे अंधों को मार्ग दिखाते हैं। कबीर ने कहा है कि अंधा अंधों को मार्ग पर ले जाता है। ‘अंधे अंधा ठेलिया, दोनों कूप पडंत।’ वे दोनों कुएं में गिर गए।
जिनको अपनी पहचान नहीं है, वे तुम्हें तुम्हारी पहचान बता रहे हैं कि तुम्हारा यह नाम है, कि तुम सुंदर हो!
और ध्यान रहे, तुम किसी को सुंदर लगते हो, किसी को कुरूप लगते हो। किसी को प्रीतिकर लगते हो, किसी को प्रीतिकर नहीं लगते हो। इसलिए तुम्हारी पहचान बड़ी कनफ्यूज्ड है--होने वाली है। क्योंकि किसी के तुम मित्र हो, किसी के तुम दुश्मन हो। दुश्मन कहता है कि तुम बिल्कुल दुष्ट हो। मित्र कहता है कि तुमसे करुणावान कोई नहीं। तुम्हारी पत्नी कहती है कि तुम सुंदर हो। तुमसे ज्यादा सुंदर कोई पुरुष नहीं। तुम्हारा पति कहता है कि तुम बड़ी सुंदर हो, तुम जैसी स्त्री पृथ्वी पर नहीं है। पर यह बात सभी के लिए सच नहीं है। कोई तुम्हें कुरूप समझाता है। कोई सोचता है कि यह पति इस पत्नी को कैसे झेल रहा है? कैसे ढो रहा है? ऐसी स्त्री के साथ कैसे जी रहा है! इसने अब तक आत्महत्या क्यों नहीं कर ली!
तो चारों तरफ हजार तरह के लोग हैं और हजार तरह की बातें तुम्हारे बाबत कहते हैं। इसलिए तुम्हारी पहचान कनफ्यूज्ड है। तुम अपने संबंध में विपरीत बातें माने बैठे हो। किसी ने तुम्हें बुद्ध कहा, किसी ने बुद्धिमान कहा। दोनों बातें तुम्हारे भीतर घुस गई हैं। इसलिए तुम एक भीड़ हो। बाजार में सुनी गई खबरें हो। इसलिए तुम्हें भीतर कभी भी शांति मालूम नहीं पड़ती। तुम किसी भी बात में, संबंध में, निश्चित नहीं हो सकते। होओगे कैसे? चारों तरफ लोग अलग-अलग बातें कर हरे हैं। तम निश्चित तो तभी हो पाओगे, जब तुम भीतर देखोगे और दूसरों की न सुनोगे।
जब तक आदमी दूसरों की सुनता है, तब तक उसकी पहचान भ्रांत होगी; तब तक उसकी पहचान उलझन से भरी होगी; तब तक उसकी पहचान एक पहेली होगी। जैसे ही व्यक्ति आंख बंद करता है और भीतर देखता है और स्वयं को पहचानता है, उस दिन उसकी पहचान सुनिश्चित हो जाती है। फिर उसे कोई डगमगा नहीं सकता। फिर वह वही जानता है, जो वह है। इसे हमने आत्मज्ञान कहा है।
इधर नदी सीखती रही, उधर बालू ने कहाः ‘हम जानते हैं, यही हम रोज होते देखते हैं। क्योंकि नदी तट से पहाड़ों तक हम ही फैले हैं। बहुत नदियां आती हैं। बालू ने सबकी कहानियां देखी हैं। बहुत नदियां भटकती हैं मरुस्थल में; लड़ती हैं, उनको भी जाना है। साथ हो जाती हैं, उनको भी जाना है।
ज्ञानी कहते हैं कि पृथ्वियां बदलती हैं, आकाश नहीं बदलता। आज पृथ्वी है, कल मिट जाएगी। हजारों पृथ्वियां हैं, हजारों पृथ्वियों पर हजारों तरह के लोग हैं, लेकिन आकाश एक है। इस आकाश को सबका पता है--अज्ञानियों का भी और ज्ञानियों का भी। इसने उनको भी देखा है, जो लड़ते-लड़ते मरते हैं--अनेकों बार, अनंतों बार। इस आकाश ने बुद्धों को भी। इसने उनको भी देखा है, जो लड़ते-लड़ते मरते हैं--अनेकों बार, अनंतों बार। इस आकाश ने बुद्धों को भी देखा है, जो हंसते हुए लीन हो जाते हैं।
इस आकाश ने बड़े वृक्ष भी देखे हैं, जो लड़ कर टूटते हैं। इस आकाश ने छोटे, झुकने वाले घास के पौधे भी देखे हैं, जो ताओ की कला, जूडो की कला जानते हैं, जो झुकते हैं। इस आकाश ने सब जाना है। इसलिए समस्त पृथ्वी के धर्मों में इस बात की सूचना है कि अगर तुम्हें जीवन का परम रहस्य पूछना है, तो आकाश से पूछना। क्योंकि इसने सब बुद्धों को जाना है--सब ज्ञानियों को, सब अज्ञानियों को।
थिओसॉफी ने--इस सदी में पैदा हुए एक महत्वपूर्ण विचार की परंपरा ने--आकाशिक रेकार्ड का उल्लेख किया है कि जो कुछ घटता है, वह सब आकाश में अंकित हो जाता है। जो भी महत्वपूर्ण है, वह खोता नहीं है।
इस कहानी में जो रेत है, तुम्हारी कहानी में वही आकाश है। और रेत ने कहाः ‘हमें पता ही है, हम रोज ही यही देखते हैं। क्योंकि नदी तट से पहाड़ों तक हम ही फैले हैं।’ तुम्हारी गंगोत्री से लेकर तुम्हारे गंगासागर तक, तुम्हारे जन्म से तुम्हारी मृत्यु तक, तुम्हारे अनंत जन्मों, अनंत मृत्युओं तक आकाश फैला है। तुम्हारी कथा, तुम्हारा सार आकाश में छिपा है।
आकाश सब जानता है और जब तक तुम आकाश जैसे न हो जाओ, तब तक तुम सब न जान सकोगे। इसलिए सर्वज्ञ आकाश जैसा हो जाता है। वह आकाश के साथ एक हो जाता है। वह इतना मिट जाता है, शून्य हो जाता है कि आकाश और उसके बीच कोई दीवाल नहीं रह जाती, कोई परदा, कोई ओट नहीं रह जाती।
जिस दिन तुम शून्य हो जाते हो, भीतर का आकाश बाहर के आकाश से मिल जाता है, उस दिन तुम सर्वज्ञ हो; उस दिन तुम वह सब जान लेते हो, जो आकाश जानता है। उस दिन आकाश अपने सारे रहस्य तुममें उंडेल देता है।
‘इसलिए कहा जाता है कि जीवन की नदी कैसे बहे, यह बात बालुओं में लिखी पड़ी है।’ यह सूफियों का एक गहन सिद्धांत है कि ‘जीवन की नदी’ कैसे बहे, यह बात बालुओं में लिखी पड़ी है। लेकिन बड़ी मुसीबत है। नदी और बालू की भाषा अलग-अलग है। बालू बोलती रहे, नदी सुन नहीं पाती। नदी और बालू की भाषा अलग है।
आकाश बोलता रहता है और तुम सुन नहीं पाते हो। तुम्हारी और आकाश की भाषा अलग है। आकाश की भाषा मौन है और जब तक तुम मौन होना न सीख जाओ, तब तक तुम आकाश के वचन न समझ पाओगे।
नेपथ्य में आवाज रोज ही गूंजती है। नेपथ्य में आवाज रोज ही तुमसे कहती है, डरो मत, तुम मरोगे नहीं। भयभीत न होओ। दुख तुम्हारे आस-पास है, तुम्हारे भीतर नहीं है। असफल तुम कितने ही हो जाओ, जीवन में तुम कितने ही पराजित हो जाओ, तुम्हारी आंतरिक विजय सुनिश्चित है। वहां कभी कोई हार प्रवेश नहीं करती। वहां तुम अमृत हो। वहां तुम सच्चिदानंद हो। लेकिन नेपथ्य की आवाज हमें सुनाई नहीं पड़ती। हमारी भाषा अलग है।
जमीन पर कोई तीन सौ भाषाएं हैं। आकाश की भाषा तो एक ही है--तीन सौ नहीं। जब तक तुम आकाश की भाषा न सीखोगे, तब तक ‘बालुएं’ अपने रहस्य को ‘नदी’ से नहीं कह सकेंगी।
आकाश की भाषा का नाम ध्यान है--मौन है। जैसा आकाश शून्य सन्नाटे में है, ऐसे ही तुम शून्य सन्नाटे हो जाओ। जब तुम कुछ न बोलोगे, तभी बालू अपने रहस्य को तुमसे कहना शुरू कर देगी।
और क्या है रहस्य? यही है रहस्य कि जीवन अनंत है। यहां कोई नदी कभी मिटती नहीं। यही है रहस्य कि जीवन अनादि है। यही है रहस्य कि जीवन सनातन है।
मृत्यु का भय इसलिए है कि तुमने गलत ‘पहचान’ बना ली है अपनी। तुम्हारी गलत पहचान मरेगी, तुम नहीं मरोगे। तुमने रूप से अपने को जोड़ लिया है, स्वरूप से नहीं। और तुम इतने भयभीत हो कि तुम्हारे इस रूप के कहीं भी टूट जाने से, छोटा सा टूट जाए... । तुम्हें बेचैनी होती है।
तुम घर में आए और बेटा उठ कर खड़ा न हुआ। तुम बाप हो। बस, कठिनाई खड़ी हो गई, उपद्रव शुरू हुआ। सम्मान नहीं मिला। तुम स्कूल में शिक्षक हो; तुम गए और विद्यार्थी मुस्कुरा दिए या हंस दिए। बस, कठिनाई शुरू हो गई। तुम बाजार गए, जो लोग नमस्कार करते थे, उन्होंने नमस्कार न किया, बस चिंता व्याप्त हो गई।
छोटी-छोटी बात में जहां भी तुम्हारा रूप, तुम्हारी पहचान टूटती लगती है, वहीं तुम मुश्किल में पड़ जाते हो। तो जहां पूरा रूप ही टूटता लगेगा, वहां तो तुम कंप जाओगे--तूफान में, आंधी में।
कहते हैंः दूध का जला छाछ फूंक-फूंक कर पीने लगता है।
मुल्ला नसरुद्दीन जल्दी में था एक दिन। दौड़ कर सीढ़ियां उतर कर बाहर बगीचे में खड़ा हो गया, तब उसे ख्याल आया कि घड़ी और रूमाल ऊपर भूल आया। उसने चिल्ला कर आवाज दी अपनी पत्नी को कि ‘मैं घड़ी और रूमाल भूल आया हूं। जल्दी में हूं।’ तो पत्नी उन्हें लेकर सीढ़ियां उतरने लगी तो उसने कहा, ‘मैं जल्दी में हूं, तू वहीं से सम्हाल कर फेंक दे।’ पत्नी ने घड़ी फेंकी; चूक गई। जमीन पर गिरी। घड़ी के टुकड़े-टुकड़े हो गए। मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, ‘मूरख अब रुक, घड़ी तो टूट ही गई, अब रूमाल और न फेंक देना। मैं खुद ही आता हूं।’
दूध का जला छाछ फूंक-फूंक कर पीने लगता है।
तुम्हें जीवन भर का यही अनुभव है कि तुम्हारी पहचान जरा-जरा में टूट जाती है। तो तुम कैसे मानोगे कि मौत में न टूटेगी!
कोई नमस्कार नहीं करता, तुम मिटने लगते हो, पिघलने लगते हो। कोई हंस देता है, तुम्हारी प्रतिष्ठा खो जाती है। कोई तुम्हारे संबंध में कुछ कह देता है, अपमान कर देता है, कि बस, तुम्हारे प्राण संकट में पड़ जाते हैं। तो तुम कैसे मानोगे कि मौत तुम्हें न मिटा पाएगी! लोगों के विचार मिटा देते हैं, जरा से शब्द तुम्हें हिला देते हैं, तो रेगिस्तान जब जाएगा, तब भी तुम बचोगे? नहीं, तुम्हारी यह पहचान तो नहीं बचेगी। इस पहचान से अगर तुमने नाता तोड़ लिया, तो ही तुम बच सकोगे।
इस ‘पहचान’ से जो अपना नाता रेगिस्तान में पहुंचने के पहले तोड़ लेता है, उसके आनंद का अंत नहीं है। रेगिस्तान भी उसे आनंद ही देता है। वहां भी वह नाचते हुए ही प्रवेश करता है। मृत्यु भी उसे नृत्य करता हुआ पाती है। उसके पद में घुंघरू बंधे होते हैं--जब मौत द्वार पर आती है।
साधु-असाधु की यही पहचान है कि मौत को तुमने कैसे स्वीकार किया। तुम उसके हाथ हो गए, या तुम उससे लड़ने लगे? तुम उस पर सवार हो गए, तुम उठ कर तैयार हो गए कि ‘चलो, राजी हूं’ या कि तुम झगड़े, कि तुमने पूरी चेष्टा की कि थोड़ी देर और बच जाऊं?
असाधु--चाहे वह दिखाई साधु पड़ता हो--डरेगा। उसकी पहचान उधार है। साधु--उसकी पहचान स्वरूप की है। उसे कोई भी कभी मिटा नहीं सकता। ‘नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि’--उसे कोई शस्त्र छेद नहीं सकते। ‘नैनं दहति पावकः’--उसे आग जला नहीं सकती। उसके मिटने का कोई उपाय नहीं है। अमिटता--अमृत उसका स्वरूप है, उसका स्वभाव है।
इस कहानी को गहरे में उतरने देना क्योंकि ज्यादा देर नहीं है, तुम्हारी नदी भी रेगिस्तान में पहुंचेगी। तैयार करना अपने को, ताकि तुम नेपथ्य की आवाज सुन सको।
इधर जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह नेपथ्य की आवाज है। अगर तुम तैयार हो, तो ही सुन सकोगे।
और नेपथ्य की आवाज सुन कर अगर तुम ‘साथ’ जाने को राजी हो गए तो तुम्हारा सौभाग्य। अगर जरा सी भी झिझक बनी रही, तुम बहे नहीं--लड़े, तो तुम यह जीवन भी चूक जाओगे।
बहुत जीवन तुम वैसे ही चूक चुके हो। हर बार तुम लड़े हो और हारे हो। इस बार ऐसा करना--लड़ना मत, साथ हो जाना।
साथ जो हुआ वह जीत गया। साथ जो हुआ, उसे कोई मिटा नहीं सकता, क्योंकि वह खुद ही मिट गया। उसने पहचान अपनी खुद ही उतार कर रख दी। उसने संघर्ष छोड़ दिया।
संघर्ष संसार है, समर्पण धर्म है।

आज इतना ही।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें