अकंप
चैतन्य ही
ध्यान—(प्रवचन—चौथा)
पहला
प्रश्न:
बुद्ध
ने मन को
जानने-समझने
पर ही सारा
जोर दिया लगता
है। क्या मन
से मनुष्य का
निर्माण होता
है? आत्मा-परमात्मा
की सारी बातें
क्या व्यर्थ हैं?
बातें
व्यर्थ हैं।
अनुभव व्यर्थ
नहीं। आत्मा, परमात्मा, मोक्ष शब्द
की भांति, विचार
की भांति दो कौड़ी के
हैं। अनुभव की
भांति उनके
अतिरिक्त और
कोई जीवन
नहीं। बुद्ध
ने मोक्ष को
व्यर्थ नहीं
कहा है, मोक्ष
की बातचीत को
व्यर्थ कहा
है। परमात्मा को
व्यर्थ नहीं
कहा है। लेकिन
परमात्मा के
संबंध में
सिद्धांतों
का जाल, शास्त्रों
का जाल, उसको
व्यर्थ कहा
है।
मनुष्य
इतना धोखेबाज
है कि वह अपनी
ही बातों से
स्वयं को धोखा
देने में
समर्थ हो जाता
है। ईश्वर की
बहुत चर्चा
करते-करते
तुम्हें लगता
है ईश्वर को
जान लिया।
इतना जान लिया
ईश्वर के संबंध
में, कि लगता है
ईश्वर को जान
लिया। लेकिन
ईश्वर के
संबंध में
जानना ईश्वर
को जानना नहीं
है। यह तो ऐसा
ही है जैसे
कोई प्यासा
पानी के संबंध
में सुनते-सुनते
सोच ले कि
पानी को जान
लिया। और
प्यास तो बुझेगी
नहीं। पानी की
चर्चा से कहीं
प्यास बुझी
है! परमात्मा
की चर्चा से
भी प्यास न बुझेगी।
और जिनकी बुझ
जाए, समझना
कि प्यास लगी
ही न थी।




