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गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

शिव--सूत्र -(ओशो) प्रवचन--10

साक्षित्‍व ही शिवत्‍व है(प्रवचनदसवां)

दिनांक 20 सितंबर, 1974,
प्रात: काल, श्री ओशो आश्रम, पूना।

सूत्र:

सुखासुखयोर्बहिर्मननमू
तद्विमुक्तस्तु केवली।
तदारूढप्रमितेस्तन्धयाज्जीवसंक्षय
भूतकंचुकी तदाविमुक्तो भूय: पतिसम: पर:।  
ओम, श्री शिवार्पण अस्तु।

 सुख—दुख बाह्य वृत्तियां है—ऐसा सतत जानता है 1 और उनसे विमुक्त—वह केवली हो जाता है। उस कैवल्य अवस्था में आरूढ़ हुए योगी का अभिलाषा—क्षय के कारण जन्म—मरण का पूर्ण क्षय हो जाता है। ऐसा भूत—कंचुकी विमुक्त पुरुष परम शिवरूप ही होता है।
ओम भगवान श्री शिव को यह अर्पित हो।

 सूत्र में प्रवेश के पहले—पीछे मैंने आपको कहा था कि मंत्र के संबंध में कुछ कहूंगा। आज शिविर का अंतिम दिन है; मंत्र के पर्त संबंध में कुछ समझ लें। उसका प्रयोग जीवन में क्रांति ला सकता है।

जुलाहे की बेटी द्वारा बुद्ध के दर्शन—(कथा—100)

 जुलाहे की बेटी द्वारा बुद्ध के दर्शन—(एस धम्‍मो सनंतनो) 

एक जुलाहे की बेटी गौतम बुद्ध के दर्शन को आयी। अत्यंत आनंद और अहोभाव से उसने बुद्ध के चरणों में सिर रखा। बुद्ध ने उससे पूछा बेटी कहां से आती हो? भंते नहीं जानती हूं वह बोली उसकी अभी ज्यादा उम्र भी न थी। अठारह वर्ष की केवल। बुद्ध ने कहा कहां जाओगी बेटी? भंते, उसने कहा, नहीं जानती हूं। क्या नहीं जानती हो बुद्ध ने पूछा वह बोली भंते जानती हूं। जानती हो बुद्ध ने कहा? वह बोली कहां भगवान जरा भी नहीं जानती हूं।

ऐसी बातचीत सुनकर अन्य उपस्थित लोग बहुत नाराज हुए। गांव के लोग जुलाहे की बेटी को भलीभांति जानते हैं कि यह क्या बकवास कर रही है! और यह कोई ढंग है भगवान से बात करने का? यह कोई शिष्टाचार है? गांव के लोगों ने कहा कि सुन पागल यह तू किस तरह की बात कर रही है होश में है? किससे बात कर रही है? डांटा— डपटा भी

समंजनी का सफाई के प्रति पागलपन—(कथा यात्रा—99)

 समंजनी का सफाई के प्रति पागलपन-(एस धम्‍मो सनंतनो)


यह सूत्र बुद्ध ने एक विशेष घटना के समय कहा था, वह घटना भी समझ लेने जैसी है।

बुद्ध के शिष्यों में एक भिक्षु थे उनका नाम था समंजनी। उन्हें सफाई का पागलपन था। क्योंकि बुद्ध ने कहा स्वच्छ रहो साफ— सुथरे रहो। वह उनको धुन पकड़ गयी पागल तो पागल वह ठीक बात में से भी गलत बात निकाल लेते। उनको ऐसी धुन पकड़ गयी कि चौबीस घंटे वह झाडू ही लिए रहते। इधर जाला दिखायी पड़ गया उधर कचड़ा दिखायी पड़ गया सफाई ही सफाई

कई स्त्रियों को यह रोग रहता है, सफाई ही सफाई। किसके लिए सफाई कर रही हैं, यह भी कुछ पक्का नहीं।
मैं एक घर में कुछ दिन तक रहता था, बड़ा साफ—सुथरा घर था, ऐसा साथ— सुथरा घर मैंने देखा ही नहीं। घर कहना ही नहीं चाहिए उसको, इतना साफ—सुथरा था। उसमें रहने की सुविधा ही नहीं थी। वह महिला अपने पति को भी अपने बैठकखाने में नहीं बैठने देती थी,

कुशीनाला के शालवन में बुद्ध की अंतिम विदा—(कथा यात्रा—98)

 कुशीनाला के शालवन में बुद्ध की अंतिम विदा-(एस धम्‍मो सनंतनो)


गवान की इस पृथ्वी पर अंतिम घड़ी। भगवान कुसीनाला के शालवन उप्पवतन में अपने भिक्षुको से अंतिम विदा लेकर लेट गए हैं! दो शालवृक्षों के नीचे उन्होंने अपनी मृत्यु का स्वागत करने का आयोजन किया है।
मौत आ रही है। तो बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा, तुम्हें कुछ पूछना हो तो पूछ लो। कुछ कहना हो तो कह लो, अब मैं चला। अब यह देह जाती है। मैं तो चला गया था बयालीस साल पहले ही, देह भर रह गयी थी, अब देह भी जाती है। तो बौद्ध दो शब्दों का उपयोग करते हैं—निर्वाण और महापरिनिर्वाण। निर्वाण तो उस दिन उपलब्ध हो गया जिस दिन बुद्ध को शान हुआ। फिर महापरिनिर्वाण उस दिन हुआ जिस दिन देह विसर्जित हो गयी। उस दिन वे महाशून्य में खो गए, महाकाश के साथ एक हो गए। आकाश हो गए।

तीन बार प्रार्थना के पश्‍चात बुद्ध बोले—(कथा यात्रा—97)

 तीन बार प्रार्थना के पश्‍चात बुद्ध बोले-(एस धम्‍मो सनंतनो)

 क दिन कुछ उपासक भगवान के चरणों में धर्म—श्रवण के लिए आए। उन्होंने बड़ी प्रार्थना की भगवान से कि आप कुछ कहें हम दूर से आए हैं बुद्ध चुप ही रहे। उन्होंने फिर से प्रार्थना की तो फिर बुद्ध बोले। जब उन्होंने तीन बार प्रार्थना की तो बुद्ध बोले उनकी प्रार्थना पर अंतत: भगवान ने उन्हें उपदेश दिया लेकिन वे सुने नहीं। दूर से तो आए थे लेकिन दूर से आने का कोई सुनने का संबंध। शायद दूर से आए थे तो थके— मांदे भी थे। शायद सुनने की क्षमता ही नहीं थी। उनमें से कोई बैठे—बैठे सोने लगा और कोई जम्हाइयां लेने लगा। कोई इधर—उधर देखने लगा। शेष जो सुनते से लगते थे वे भी सुनते से भर ही लगते थे उनके भीतर हजार और विचार चल रहे थे पक्षपात पूर्वाग्रह धारणाएं उनके पर्दे पर पर्दे पड़े थे। उतना ही सुनते थे जितना उनके अनुकूल पड़ रहा था उतना नहीं सुनते थे जितना अनुकूल नहीं पड़ रहा था।

शिव--सूत्र--(ओशो) प्रवचन--09

साधो, सहज समाधि भली!—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 19 सितंबर, 1974;
प्रात: काल, श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र:

कथाजप:।
दानमात्मज्ञानमू
योऽविपस्थोज्ञाहेतुक्ष्च
स्वशक्तिप्रचयोऽस्थविश्वमू
स्थितिलयौ

वे जो भी बोलते हैं वह जप है। आत्मज्ञान ही उनका दान है। वह अंतदशक्तियों का स्वामी है और ज्ञान का कारण है। स्वशक्ति का प्रचय अर्थात् सतत विलास ही इसका विश्व है। और वह स्वेच्छ से स्थिति और लय करता है।

प्रार्थना, क्या तुम कहते हो, उस पर निर्भर नहीं है; वरन् क्या तुम हो, उस पर निर्भर है। पूजा, क्या तुम करते हो, उससे संबंधित नहीं है, बल्कि क्या तुम हो, उससे ही संबंधित है। धर्म का संबंध कृत्य से नहीं है; अस्तित्व से है।

युवक संन्‍यासी का संसार निंदा करना—(कथा यात्रा—96)

 युवक संन्‍यासी का व्‍यर्थ में संसार की निंदा करते रहना-(एस धम्‍मो सनंतनो)


 गवान जेतवन में विहरते थे। पास के किसी गांव से आए एक युवक ने संन्यास की दीक्षा ली। वह सबकी निंदा करता था। कारण हो तब तो चूकता ही नही था, कारण न हो तब भी निंदा करता था। कारण न हो तो कारण खोज लेता था। कारण न मिले तो कारण निर्मित कर लेता था। कोई दान नें दे तो निंदा करता और कोई दान दे तो क्हता—अरे यह भी कोई दान है। दान देना सीखना हो तो मेरे परिवार से सीखो। वह अपने परिवार की प्रशंसा में लगा रहता। शेष सारे संसार की निंदा अपने परिवार की प्रशंसा यही उसका पूरा काम था। अपनी जाति, अपने वर्ण अपने कुल सभी की अतिशय प्रशंसा में लगा रहता। उसके अहंकार का कोई अंत न था। शायद इसीलिए वह सन्यस्त भी हुआ था!
एक बार कुछ भिक्षु उसके गांव गए तो पाया कि जैसे वह व्यर्थ ही दूसरों की निंदा करता था वैसे ही व्यर्थ ही अपने कुल—परिवार की प्रशंसा भी करता था। उसके की तो कोई स्थिति ही न थी वह तो अत्यंत हीनवृत्तियों वाले परिवार से आया था।

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--096

अक्षर ब्रह्म और अंतर्यात्रा—(प्रवचन—आठवां)
अध्याय—8

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। 21।।
पुरुषःपरः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।। 22।।

और जो वह अव्यक्त अक्षर ऐसे कहा गया है उस ही अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परम गति कहते हैं, तथा जिस सनातन अव्यक्त को प्राप्त होकर मनुष्य पीछे नहीं आते हैं, वह मेरा परम धाम है।
और हे पार्थ, जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत हैं और जिस परमात्मा से यह सब जगत परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है।

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

लालुदाई की ईर्ष्‍या—(कथा यात्रा—95)

 लालुदाई की ईर्ष्‍या-(एस धम्‍मो सनंतनो)


गवान बुद्ध श्रावस्ती में ठहरे थे। नगरवासी उपासक सारिपुत्र और मौदगल्लायन के पास धर्म—श्रवण करके उनकी प्रशंसा कर रहे थे। अपूर्व था रस उनकी वाणी में अपूर्व था भगवान के उन दो शिष्यों का बोध: अपूर्व थी उनकी समाधि और उनके वचन लोगों को जगाते थे— सोयों को जगाते थे मुर्दो को जीवित करते थे। उनके पास बैठना अमृत में डुबकी लगाना था
एक भिक्षु जिसका नाम था लालूदाई यह सब खड़ा हुआ बड़े क्रोध से सुन रहा था। उसे बड़ा बुरा लग रहा था। वह तो अपने से ज्यादा बुद्धिमान किसी को मानता ही नहीं था। भगवान के चरणों में ऐसे तो झुकता था पर ऊपर ही ऊपर। भीतर तो वह भगवान को भी स्वयं से श्रेष्ठ नहीं मानता था। उसका अहंकार आrते प्रज्वलित अहंकार था। और मौका मिलने पर वह प्रकारांतर से परोक्ष रूप से भगवान की भी आलोचना—निंदा करने से चूकता नहीं था। कभी कहता आज भगवान ने ठीक नही कहा; कभी कहता भगवान को ऐसा नहीं कहना था; कभी कहता भगवान होकर ऐसा नहीं कहना चाहिए आदि—आदि।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--102

ताओ की भेंट श्रेयस्कर है—प्रवचन—एक सौदोवां)

अध्याय 62

सज्जन का खजाना

ताओ संसार का रहस्य भरा मर्म है,
सज्जन का खजाना, और दुर्जन की पनाह।
सुंदर वचन बाजार में बिक सकते हैं,
श्रेष्ठ चरित्र भेंट में दिया जा सकता है।
यद्यपि बुरे लोग हो सकते हैं,
तथापि उन्हें अस्वीकृत क्यों किया जाए?
इसलिए सम्राट के राज्याभिषेक पर,
तीन मंत्रियों की नियुक्ति पर,
मणि-माणिक्य और चार-चार घोड़ों
के दल भेंट में भेजने के बजाय,
ताओ की भेंट भेजना श्रेयस्कर है।
किस बात में पूर्व-पुरुषों ने इस
ताओ को मूल्य दिया था?
क्या उन्होंने नहीं कहा था,
"अपराधियों को खोजने और उन्हें माफ कर देने को?'
इसलिए ताओ संसार का खजाना है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--101

स्त्रैण गुण से बड़ी कोई शक्ति नहीं—(प्रवचन—एकसौएकवां)
 
अध्याय 61

बड़े और छोटे देश

बड़े देश को नदीमुख नीची भूमि की तरह होना चाहिए,
क्योंकि वह संसार का संगम है, और संसार का स्त्रैण गुण है।
स्त्री पुरुष को मौन से जीत लेती है, और मौन से वह नीचा स्थान प्राप्त करती है।
इसलिए यदि एक बड़ा देश अपने को छोटे देश के नीचे रखता है,
तो वह छोटे देश को आत्मसात कर लेता है।
और यदि छोटा देश अपने को बड़े देश के नीचे रखता है,
तो वह बड़े देश को आत्मसात कर लेता है।
इसलिए कुछ दूसरों को आत्मसात करने के लिए अपने को नीचे रखते हैं;
कुछ स्वभावतः ही नीचे होते हैं और दूसरों को आत्मसात करते हैं।
बड़ा देश यही तो चाहता है कि दूसरों को शरण दे,
और छोटा देश चाहता है कि वह प्रवेश पा सके और शरण पाए।
इस प्रकार यह विचार कर कि वे दोनों वह पा सकें जो वे चाहते हैं,
बड़े देश को अपने को नीचे रखना चाहिए।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

भिक्षु तिष्‍य की चादर—(कथा यात्रा—94)

भिक्षु तिष्‍य की चादर-(एस धम्‍मो सनंतनो)

एक भिक्षु थे तिष्य। वर्षा—वास के पश्चात किसी ने उन्हें एक बहुत मोटे सूत केला चादर भेट किया।
बहुत भिक्षु वर्षा के दिनों में रुक जाते थे, तीन—चार महीने, और वर्षा—वास के बाद जब वे यात्रा पर पुन: निकलते तो लोग उन्हें भेंट देते। भेंट भी क्या? थोड़ी सी भेंट लेने की उन्हें आज्ञा थी। तीन वस्त्र रख सकते थे, इससे ज्यादा नहीं। तो कोई चादर भेंट कर देता, या कोई भिक्षापात्र भेंट कर देता। तो पुराना भिक्षापात्र छोड़ देना पड़ता, पुरानी चादर छोड़ देनी पड़ती।
यह भिक्षु तिष्य ने वर्षा—वास किया किसी गांव में जब वर्षा—वास के बाद उन्हें एक मोटे सूत वाला चादर भेट किया गया तो उन्हें पसंद न आया। बहुत मोटे सूत वाला था।
भिक्षु को आज्ञा नहीं थी कि जो उसे दिया जाए उसमें वह शिकायत करे। या वह कहे कि यह बहुत मोटे सूत वाला है, यह मैं न लूंगा। भिक्षु को जो दिया जाए, वह चुपचाप स्वीकार कर ले। लेकिन आदमी तो होशियार होते हैं, कानूनी होते हैं, तरकीब तो निकाल ही लेते हैं।

महावीर वाणी--(भा्ग--2) प्रवचन--21

अस्पर्शित, अकंप है भिक्षु—(प्रवचन—इक्कीसवां)

दिनांक 5 सितम्बर, 1973;
तृतीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

भिक्षु-सूत्रः

जो सहइ हु गामकंटए,
    अक्कोस-पहारत्तज्जणाओ य।
भय-भेरव-सद्द-सप्पहासे,
   समसुह-दुक्खसहे अ जे स भिक्खू
हत्थसंजए पायसंजए,वायसंजए संजइन्दिए
अज्झप्परए सुसमाहिअप्पा,सुत्तत्थंवियाणइ जे स भिक्खू

जो कान में कांटे के समान चुभने वाले आक्रोश-वचनों को, प्रहारों को, तथा अयोग्य उपालंभो (तिरस्कार या अपमान) को शांतिपूर्वक सह लेता है, जो भयानक अट्टहास और प्रचण्ड गर्जनावाले स्थानों में भी निर्भय रहता है, जो सुख-दुख दोनों को समभावपूर्वक सहन करता है, वही भिक्षु है। जो हाथ, पांव, वाणी और इंद्रियों का यथार्थ संयम रखता है, जो सदा अध्यात्म-चिंतन में रत रहता है, जो अपने आपको भली भांति समाधिस्थ करता है, जो सूत्रार्थ को पूरा जाननेवाला है, वही भिक्षु है।

शिव--सूत्र (ओशो) प्रवचन--07

ध्‍यान अर्थात चिदात्‍म सरोवर में स्‍नान(प्रवचनसातवां)

दिनांक 17 सितंबर, 1974;
प्रात: काल, श्री ओशो आश्रम, पूना।


      बीजावधानम्।
आसस्थ: सुखं हृदे निमजति।
स्वमात्रा निर्माणमापादयति।
विद्याऽविनाशे जन्मविनाश:।

 ध्यान बीज है। आसनस्थ अर्थात स्व—स्थित व्यक्ति सहज ही चिदात्म सरोवर में निमज्जित हो जाता है और आत्म—निर्माण अर्थात द्विजत्व को प्राप्त करता है। विद्या का अविनाश जन्य का विनाश है।

जीसस से उनके शिष्यों ने पूछा, 'प्रभु का राज्‍य कैसा है? क्‍या उसका रूप—नाम? तो जीसस ने कहा, प्रभु का राज्‍य एक बीज की भांति है?' जीसस उसी बीज की बात कर रहे हैं, जिसकी हम आज चर्चा करेंगे।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--100

कृष्ण में राम-रावण आलिंगन में हैं—(प्रवचन—सौवां)

अध्याय 60

बड़े देश की हुकूमत

एक बड़े देश की हुकूमत ऐसे करो जैसे कि तुम छोटी मछली भूंजते हो।

जो संसार की हुकूमत ताओ के अनुसार चलाता है,

उसे पता चलेगा कि अशुभ आत्माएं अपना बल खो बैठती हैं।

यह नहीं कि अशुभ आत्माएं अपना बल खो देती हैं,

लेकिन वे लोगों को कष्ट देना बंद कर देती हैं।

इतना ही नहीं कि वे लोगों को हानि पहुंचाना बंद कर देती हैं,

संत स्वयं भी लोगों की हानि नहीं करते।

जब दोनों एक-दूसरे की हानि नहीं करते,

तब मौलिक चरित्र पुनःस्थापित होता है।


कुछ बातें सूत्र के पूर्व।
एक ऐसा शुभ है जो अशुभ के विपरीत साधा जाता है। जैसे कोई करुणा को साधे क्रोध के विरोध में, अहिंसा को साधे हिंसा के विरोध में, सत्य को साधे असत्य के विरोध में। जिसका विरोध होगा, वह भी भीतर दबा हुआ सदा मौजूद रहेगा। विरोध से कोई छुटकारा नहीं है। विरोध से बड़ी नासमझी नहीं है।

मरणशय्या पर स्‍वर्णकर द्वारा लम्‍बी आयु की कामना—(कथा यात्रा—93)

 मरणशय्या पर स्‍वर्णकर द्वारा लम्‍बी आयु की कामना-(एस धम्‍मो सनंतनो)

क स्वर्णकार मरणशध्या पर था। स्वभावत: मृत्यु से बहुत भयभीत क्योकि मृत्यु के लिए कोई तैयारी तो की नहीं थी। कोई भी करता नहीं। जीवन ऐसे ही बीत जाता है और आखिरी घड़ी जब करीब आती है तब बेचैनी होती है। उस दूर की यात्रा के लिए कुछ आयोजन तो किया नहीं था। बहुत घबड़ाने लगा। उसके बेटों ने अपने पिता के जीवन के लिए भिक्षुसंघ के साथ भगवान को नियंत्रित करके दान दिया। भोजनोपरांत पुत्रों ने कहा भंते इस भोजन को हम लोगों ने पिता के जीवन के लिए दिया है आप उन्हें आशीष दें। आशीष दें कि उनकी आयु लंबी हो।

मरता हुआ आदमी, मरणशथ्या पर पड़ा आदमी अभी भी आकांक्षा जीवन की ही करता है। तो इसका अर्थ हुआ कि जीवन से कुछ सीखा नहीं। इसका अर्थ हुआ कि जीवन की व्यर्थता दिखायी नहीं पड़ी। इसका अर्थ हुआ कि जीवन जीआ ही नहीं। अन्यथा व्यर्थता दिखायी पड़ ही जाती।
बुद्धपुरुषों के पास जाकर भी लोग व्यर्थ की ही मांग करते हैं। आशीष भी मांगते हैं तो असार के लिए मांगते हैं।

अतुल पाँच सौ व्‍यक्‍तियों के साथ धर्मश्रवण को आया—(कथायात्रा—055)

अतुल नामक व्‍यक्‍ति पाँच सौ व्‍यक्‍तियों के साथ धर्मश्रवण को आया—(एस धम्मो सनंतनो)

श्रावस्ती का अतुल नामक एक व्यक्ति पांच सौ और व्यक्तियों के साथ भगवान के संघ में धर्मश्रवण के लिए गया। वह क्रमश: स्थविर रेवत स्थविर सारिपुत्र और आयुष्मान आनंद के पास जा फिर भगवान के पास पहुंचा।
ऐसी ही व्यवस्था थी। बुद्ध के जो बड़े शिष्य थे, पहले लोग उनको सुनें, समझें, कुछ थोड़ी पकड़ आ जाए, कुछ थोड़ा समझ आ जाए तो फिर भगवान को वे जाकर  पूछ लें।
भगवान से उसने कहा भंते मैं इतनी प्रबल आशा से धर्मश्रवण के लिए आया धा, लेकिन रेवत स्थविर कुछ बोले ही नहीं चुपचाप बैठे रहे। यह कोई बात हुई!। अकेला भी नहीं पांच सौ लोगों के साथ आया था। हम दूर से यात्रा करके आए थे। बड़ा नाम सुना था रेवत का कि ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं आपके बड़े शिष्य हैं। यह क्या बात हुई हम बैठे रहे और वे चुपचाप बैठे रहे कुछ बोले नहीं? यह तो बात कुछ जंची नहीं।

अनागामी स्‍थविर मर कर ब्रह्मलोक में उत्पन्‍न होना—(कथायात्रा—054)

 अनागामी स्‍थविर मर कर ब्रह्मलोक में उत्पन्‍न होना—(एस धम्मो सनंतनो)

गवान के जेतवन में विहरते समय एक अनागामी स्थविर मरकर शुद्धावास ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुए। मरते समय जब उनके शिष्यों ने पूछा क्या भंते कुछ विशेषता प्राप्त हुई है? तब निर्मलचित स्थविर ने यह सोचकर कि यह भी क्या कोई उपलब्धि है या विशेषता है चुप्पी ही साधे रखी। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके शिष्य रोते हुए भगवान के पास जाकर उनकी गति पूछे। भगवान ने कहा भिक्षुओ रोओ मत वह मरकर शुद्धावास में उत्पन्न हुआ है। भिक्षुओ देखते हो तुम्हारा उपाध्याय कामों से रहित चित्त वाला हो गया है जाओ खुशी मनाओ।
तब शिष्यों ने कहा पर उन्होंने मरते समय चुप्पी क्यों साधे रखी? हमने तो पूछा था उन्होंने बताया क्यों नहीं? भगवान ने कहा इसीलिए भिक्षुओ इसीलिए क्योकि निर्मल चित्त को उपलब्धि का भाव नहीं होता।

शिव--सूत्र--(ओशो) प्रवचन--06

दृष्‍टि ही सृष्‍टि है—(प्रवचन—छठवां) 
दिनांक 16 सितंबर, 1974,
श्री ओशो आश्रम, पूना।
प्रात: काल।

सूत्र:

नर्तक: आत्‍मा।
रड्गोउन्‍तरात्‍मा।
धीवशात् सत्‍वसिद्धि:।
सिद्ध: स्‍वतन्‍त्र भाव:।
विसर्गस्‍वाभाव्‍यादबहि: स्‍थितेस्‍तत्‍स्‍थिति।

आत्‍मा नर्तक है। अंतरात्‍मा रंगमंच है। बुद्धि के वश में होने से सत्‍व की सिद्धि होती है। और सिद्ध होने से स्‍वातंत्र्य फलित होता है। स्‍वतंत्र स्‍वभाव के कारण वह अपने से बाहर भी जा सकता है और वह बाहर स्‍थित रहते हुए अपने अंदर भी रह सकता है।

महावीर वाणी--(भाग--2) प्रवचन--20

भिक्षु की यात्रा अंतर्यात्रा है—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 4 सितम्बर, 1973;
तृतीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई
भिक्षु-सूत्र : 1

रोइय-नायपुत्त-वयणे, अप्पसमे मन्नेज्ज छप्पि काए
पंच य फासे महव्वयाइं, पंचासवसंवरे जे स भिक्खू ।।
सम्मदिट्ठि सया अमूढे, अत्थि हु नाणे तवे संजमे य।
तवसा धुणइ पुराणपावगं,
मण-वय-कायसुसंवुडे जे स भिक्खू ।।

जो ज्ञातपुत्र—भगवान महावीर के प्रवचनों पर श्रद्धा रखकर छह प्रकार के जीवों को अपनी आत्मा के समान मानता है, जो अहिंसा आदि पांच महाव्रतों का पूर्णरूप से पालन करता है, जो पांच आस्रवों का संवरण अर्थात निरोध करता है, वही भिक्षु है।
जो सम्यग्दर्शी है, जो कर्तव्य-विमूढ़ नहीं है, जो ज्ञान, तप और संयम का दृढ़ श्रद्धालु है, जो मन, वचन और शरीर को पाप-पथ पर जाने से रोक रखता है, जो तप के द्वारा पूर्व-कृत पाप-कर्मों को नष्ट कर देता है, वही भिक्षु है।