दिनांक 20
सितंबर, 1974,
प्रात:
काल,
श्री ओशो
आश्रम,
पूना।
सूत्र:
सुखासुखयोर्बहिर्मननमू।
तद्विमुक्तस्तु केवली।
तदारूढप्रमितेस्तन्धयाज्जीवसंक्षय।
भूतकंचुकी तदाविमुक्तो
भूय: पतिसम:
पर:।
ओम, श्री शिवार्पण
अस्तु।
सुख—दुख
बाह्य
वृत्तियां है—ऐसा
सतत जानता है 1 और उनसे
विमुक्त—वह
केवली हो जाता
है। उस कैवल्य
अवस्था में
आरूढ़ हुए योगी
का अभिलाषा—क्षय
के कारण जन्म—मरण
का पूर्ण क्षय
हो जाता है।
ऐसा भूत—कंचुकी
विमुक्त
पुरुष परम शिवरूप
ही होता है।
ओम
भगवान श्री
शिव को यह अर्पित
हो।
सूत्र में
प्रवेश के
पहले—पीछे
मैंने आपको
कहा था कि
मंत्र के
संबंध में कुछ
कहूंगा। आज
शिविर का
अंतिम दिन है; मंत्र के
पर्त संबंध
में कुछ समझ
लें। उसका
प्रयोग जीवन
में क्रांति
ला सकता है।














