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मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म-उपनिषद--(प्रवचन--02)

परमात्‍मा मझधार है—दूसरा प्रवचन

सूत्र :

अंत:  शरीरे  निहतो  गुहायामज   एको    नित्यमस्य।
पृथिवी शरीरं व: पृखूइवीमंतरे संचरन् यं पृद्धइवी न  वेद।
यस्याप: शरीरं योएध्पोऽन्तरे संचरन् यमापो न    विदुः।
यस्य तेज: शरीरं यस्तेजोऽन्तरे संचरन् यं तेजो   वेद।
यस्य वायु: शरीर यो वमुमन्तरे  संचरन् यं  वायुर्न  वेद।
यस्याकाश: शरीरं व आकाशमन्तरेसंचरन् यमाकाशो न वेद।
यस्य मन: शरीर  यो  मनोध्न्तरे संचरन्  यं मनो न वेद।
यस्य बुद्धि: शरीर यो  बुद्धिमन्तरे संचरन्  यं  बुद्धिर्न वेद।
यस्याहंकार: शरीरं योध्हंकारमन्तरे संचरन् यमहंकारो न वेद।
यस्य चित्त शरीर यश्चित्तमन्तरे संचरन् यमीचत्तं न वेद।
यस्याव्यक्सं शरीरं योध्व्यक्तमन्तरे संचरन् यमध्यक्लं न वेद।
यस्याक्षरं शरीर येष्क्षरमन्तरे  संचरन्   यमक्षरं न वेद।
यस्य मृत्यु: श्प्रीरं यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युर्न वेद।
त्र एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाम्मा दिव्यो देव नारायण:।
अहं   समेति   यो   भावो        देहाक्षाद्यवनल्मीन।
अध्यासो   यं   निरस्तव्यो   विदुषो  च्छनिष्ठया ।।1।।

अध्‍यात्‍म उपनिषद--(प्रवचन--01)

                  आध्‍यात्‍म उपनिषद-ओशो 


जीवन के द्वार की कुंजी—पहला प्रवचन


                        शांति पाठ

ओम शं नो मित्र: शै वरुण:। शै नो भवर्त्यम।। शं न इंद्रो बृहस्पति:। शं नो विष्णुरुक्रम:।
नमे। क्यणे। नमस्ते वाये।। त्वमेव प्रत्यक्ष ब्लासि त्वमेव प्रत्यक्ष क्ल वादिष्यामि।
            ऋत वादिष्यामि। सत्यं वादिष्यामि। तन्मामवतु।
            ऋक्लारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्।
                       
                  ओम शांतिः शांतिः शांति:।


ओम, हमारे लिए सूर्य देवता कल्याणकारी हों। वरुण कल्याणकारी हों, अर्यमा कल्याणकारी                    हों, इंद्र और बृहस्पति भी कल्याणकारी हों, विष्णु कल्याणकारी हों।

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

बुद्ध और सर्पराज—(कथा यात्रा—106)

 बुद्ध और सर्पराज-(एस धम्‍मो सनंतनो) 


यह सूत्र भी—यह अंतिम सूत्र बुद्ध ने एक परिस्थिति में कहे थे, वह मैं आपको दोहरा दूं।

जंगल में बुद्ध बैठे हैं ध्यान करने और एक सर्पराज— सर्पों का राजा— फन फैलाकर खड़ा हो गया। उसने झुककर बुद्ध के चरणों में प्रणाम किए। बुद्ध ने आंख खोली उन्होंने कहा महाराज— क्योंकि देखा उसके माथे पर अदभुत मणि है जो सिर्फ नागों में सम्राटों के माथे पर होती है— तो बुद्ध ने कहा महाराज क्या चाहते हैं?  तो उस नाग ने कहा मैं जन्मों— जन्मों से भटक रहा हूं। जो भी किया सब उलटा चला गया। कब तक सरकता रहूंगा जमीन पर? कब तक सरकता रहूंगा खाई— खंदकों में अंधेरी गलियों में? कब तक सरकता रहूंगा? कब उठूंगा? कब उड़ सकूंगा? तुम्हें मैने उड़ते देखा। तुम्हारे प्राणों की ऊर्जा को कहीं जाते देखा। इसलिए पूछता हूं मुझे कुछ उपदेश है?
ये जो सूत्र हैं :
'सभी पापों का न करना, पुण्यों का संचय करना और अपने चित्त का शोधन करते रहना—यही बुद्धों का शासन है। '

बुद्ध का श्रावस्‍ती में तीन माह का वर्षा वास—(कथा—105)

 बुद्ध का श्रावस्‍ती में तीन माह का वर्षा वास-(एस धम्‍मो सनंतनो)


ये ज्ञानपसुता धीरा नेक्खम्‍मूपसमे रता ।
      देवापि तेसं पिह्यंति संबुद्धानं सतीमतं ।।

'जो धीर ध्यान में लगे हैं..। '
ज्ञानी बुद्ध उसी को कहते हैं जो ध्यान में लगा है। वही है धीरपुरुष, जो ध्यान में लगा है। जो जान का अर्जन कर रहा है, वह जानी नहीं है, विद्वान होगा। जो ध्यान का अर्जन कर रहा है, वही ज्ञानी है, वही धीर है। क्योंकि ज्ञान तो बासा है और उधार है। ध्यान से अपनी अनुभूति संगृहीत होती है। जो ध्यान में लगे, वे धीर।
'जो परम शात निर्वाण में रत हैं।'
और निर्वाण का अर्थ है, बुद्ध की भाषा में, परम शाति की खोज। जहा कोई तरंग न रह जाए। जहा चित्त की सारी तरंगें शात हो जाएं, झील मौन हो जाए। जहा कोई लहर न आए, न जाए। तृष्णा न हो, वासना न हो, कामना न हो, वहीं आत्मा है।  'ऐसे शांत निर्वाण में रत जो धीर हैं, ध्यान में जो लगे हैं, उन स्मृतिवान संबुद्धों की स्पृहा देवता भी करते हैं।'

महावीर वाणी--(भाग--2) प्रवचन--24

पहले ज्ञान, बाद में दया—(प्रवचन—चौबीसवां)

दिनांक 8 सितम्‍बर, 1973;
तृतीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

 मोक्षमार्ग-सूत्र : 1

      कहं चरे? कहं चिट्ठे? कहमासे? कहं सए?
कहं भुजलो भासन्तो पाव कम्मबंधइ?
जयं चरे जयं चिट्ठे जयमासे जयं सए
जयं भुजलो भासन्तो पावै कम्मबन्धइ।।
सब्बभूयप्पभूयस्स, सम्म भयाइं पासओ
पिहियासवस्स दलस्म पावै कम्मबंधइ।।
पडमं नाण तओ दया, एवं चिहुइ सब्बसंजए
अन्नाणी कि काही, कि वा नाहिइ छेय-पावगं?
सोच्चा जाणइ कल्लाण सोच्चा जाणइ पाशा।
उभय पि जाणइ सोच्चा, जै छेयं तं समायरे।।

 भत्ते! साधक कैसे चले? कैसे खडा हो? कैसे बैठे? कैसे सोये? कैसे भोजन करे? कैसे बोले-जिससे कि पाप-कर्म का बंध न हो?
आयूष्‍मन! साधक विवेक से चले; विवेक से खड़ा हो; विवेक से बैठे; विवेक से सोये; विवेक से भोजन करे; और विवेक से ही बोले, तो उसे पाप-कर्म नहीं बांध सकता।

महावीर वाणी--(भाग--2) प्रवचन--23

कल्याण-पथ पर खड़ा है भिक्षु—(प्रवचन—तेईसवां)

दिनांक 7 सितम्बर, 1973;
तृतीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

भिक्षु-सूत्र : 4
     
परं वइज्जासि अयं कुसीले, जेणंकुप्पेज्ज न तं वएज्जा
जाणिय पत्तेयं पुण्ण-पावं, अत्ताणंसमुक्कसे जे स भिक्खू।।
जाइमत्ते न य रूवमत्ते, लाभमत्तेसुएण मत्ते
मयाणि सव्वाणि विवज्जइत्ता, धम्मज्झाणरए जे स भिक्ख।।
पवेयए अज्जपयं महामुणी, धम्मे ठिओ ठावयई परं पि
निक्खम्म वज्जेज्ज कुसीललिंगं, न यावि हासंकुहए जे स भिक्ख।।
तं देहवासं असुइं असासयं, सया चए निच्चहियट्ठियप्पा
छिंदित्तु जाईमरणस्स बंधणं, उवेइभिक्खू अपुणागमं गइ।।

जो दूसरों को "यह दुराचारी है' ऐसा नहीं कहता, जो कटु वचन—जिससे सुननेवाला क्षुब्ध हो—नहीं बोलता, "सब जीव अपने-अपने शुभाशुभ कर्मों के अनुसार ही सुख-दुख भोगते हैं।’—ऐसा जानकर जो दूसरों की निन्द्य चेष्टाओं पर लक्ष्य न देकर अपने सुधार की चिंता करता है, जो अपने-आपको उग्र तप और त्याग आदि के गर्व से उद्धत नहीं बनाता, वही भिक्षु है।

रविवार, 7 दिसंबर 2014

बुद्ध की तपश्‍चर्या और मार की तीन कन्‍याएं—(कथा—104)

बुद्ध की तपश्‍चर्या और मार की तीन कन्‍याएं-(एस धम्‍मो सनंतनो)


आज के सूत्र जिस कथा से संबंधित हैं, वह मैं पहले कह दूं, जिस परिस्थिति में बुद्ध ने ये सूत्र, आज के पहले दो सूत्र कहे। पहले दो सूत्र—

      यस्स जित नावजीयति जितमस्स नौ याति कोचि लोके ।
      तं बुद्धमनंतगोचर अपदं केन पदेन नेस्सथ ।।
      यस्स जालिनी विसत्तिका तन्हा नत्थि कुहिन्चि नेतवे ।
      त बुद्धमनंतगोचरं अपद केन पदेन नेस्मथ ।।

'जिसका जीता कोई अनजीता नहीं कर सकता, और जिसके जीते को कोई दूसरा नहीं पहुंच सकता, उस अनंतद्रष्टा और अपद बुद्ध को किस पथ से ले जाओगे?'  'अपने जाल में सबको फंसाने वाली तृष्णा जिसे नहीं डिगा सकती, उस अनंतद्रष्टा और अपद बुद्ध को किस पथ से ले जाओगे?'
ये पहले दो सूत्र एक खास स्थिति में कहे गए थे, वह स्थिति बड़ी समझने जैसी है। क्योंकि उस स्थिति से तुम्हें कभी न कभी गुजरना होगा। स्थिति यह थी—

अनाथपिंडक का दान और काल—(कथा—103)

 अनाथपिंडक का दान और काल-(एस धम्‍मो सनंतनो)


यह गाथा बुद्ध ने एक विशेष अवसर पर कही।  
ये सारे अवसर बड़े प्यारे हैं, इसलिए मैं कह रहा हूं।

क बड़ा दानी था उसका नाम था, अनाथपिंडक। वह अनाथों का बड़ा सहारा था। देता लोगों को दिल खोलकर देता। उसके घर काल नाम का एक पुत्र था। उानाथपिंडक बुद्ध को सुनने जाता लेकिन काल कभी बुद्ध को सुनने न जाता था। काल शब्द भी बड़ा अच्छा! अनाथपिडक का मतलब होता है, देने वाला, दान दे ने वाला, अनाथों को सनाथ कर दे जो। और काल का अर्थ होता है, समय, या मौत। न तो समय बुद्ध को सुनने जाना चाहता है और न मौत, क्योंकि दोनों बुद्ध से डरते हैं।

तीस बौद्ध—भिक्षु परमहंस हो गए—(कथा—102)

 तीस बौद्ध—भिक्षु परमहंस हो गये-( धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 क दिन तीस खोजी बुद्ध के पास आए। तीसों बुद्ध के भिक्षु हैं बहुत लंबा पाटन करके आए हैं। भिक्षु आनंद द्वार पर पहरा दे रहा है और वे तीस खोजी बुद्ध के कमरे के भीतर बात कर रहे हैं। आनंद को बड़ी देर लग रही है कि बहुत देर हो गयी, बहुत देर हो गयी बात चलती ही जा रही है बुद्ध को वे सताए ही चले जा रहे हैं, अब निकलें भी अब निकलें भी समय मांगा था, उससे दुगुना समय हो गया ! आखिर सीमा आ गयी उसके धैर्य की वह उठा उसने दरवाजे से झांककर देखा, बड़ा हैरान हुआ वहां बुद्ध अकेले बैठे हैं। वे तीस आदमी वहां हैं ही नहीं। उसको तो—अपनी आंखें मीड़ीं—उसको भरोसा न आया क्योंकि दरवाजा एक है, वह दरवाजे पर बैठा है वे जा तो सकते नहीं गए कहां?

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--107

मेरे तीन खजाने: प्रेम और अन-अति और अंतिम होना—प्रवचन—(एकसौसातवां)

अध्याय 67 : खंड 1

तीन खजाने

सब संसार कहता है: मेरा उपदेश (ताओ) मूढ़ता से बहुत मिलता-जुलता है।
क्योंकि यह महान है, इसलिए यह मूढ़ता से मिलता-जुलता है।
और यदि मूढ़ता जैसा नहीं लगता, तो यह कब का तुच्छ हो गया होता।
मेरे तीन खजाने हैं; उन पर पहरा दो, और उन्हें सुरक्षित रखो।
पहला है: प्रेम।
दूसरा है: अति कभी नहीं।
तीसरा है: संसार में प्रथम कभी मत हो।
प्रेम के जरिए आदमी अभय को उपलब्ध होता है।
अति नहीं करने से आदमी के पास आरक्षित शक्ति का अतिरेक होता है।
और संसार में प्रथम होने की धृष्टता नहीं करने से
आदमी अपनी प्रतिभा का विकास कर सकता है और उसे प्रौढ़ बना सकता है।

ताओ उपनिषाद--(भाग--6)--ओशो

ताओ उपनिषद—(भाग—6)
ओशो

ओशो द्वारा लाओत्‍से के ताओ तेह किंग पर दिए गए 127 अमृत प्रवचनों में से आखरी 21 (107 से 127) )एक सौ सात से एकसौ सत्‍ताईस) प्रवचनों का अपूर्व संकलन।

लाओत्‍से का जन्‍मआज से पच्‍चीस सौ वर्ष पूर्व हुआ, लेकिन वे एक ऐसे विलक्षण प्रज्ञापूरूष है कि आज उन्‍हें पढ़कर ऐसा लगता है कि कभी भविष्‍य में उन्‍हें समझा जा सकेगा। इन पच्‍चीस सौ वर्षों में उनकी अंतदृष्‍टि उपलब्‍ध थी। फिर भी उन्‍हें आज तक समझा नहीं गया उसका उपयोग करना तो बाद की बात है। हां आज बहुत छोटे स्‍तर पर उनके सूत्रों की चर्चा होती है। लेकिन वह कभी मेंन स्‍ट्रीम नी बन पाती, वह मुख्‍य धारा से बहुत दूर है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--106

धर्म की राह ही उसकी मंजिल है—(प्रवचन—एकसौछ:वां)

प्रश्न-सार

01-क्या प्रत्येक व्यक्ति का मज्झिम निकाय अलग है?

02-छोटी सी भूल के चलते बड़ा पतन कैसे संभव है?

03-क्या संत लोगों को बदलना नहीं चाहते?

पहला प्रश्न:

महावीर, बुद्ध, लाओत्से, आप, आप सबके मध्य अलग-अलग प्रतीत होते हैं। क्या हम सामान्य जनों के भी मध्य अलग-अलग होंगे? मज्झिम निकाय की इस बात को हमें समझा दें।

क-एक व्यक्ति अनूठा है, बेजोड़ है; उस जैसा न कभी कोई हुआ, न कभी कोई फिर और होगा।

महावीर वाणी--(भाग--2) प्रवचन--22

भिक्षु कौन?—(प्रवचन—बाईसवां)


दिनांक 6 सितम्बर, 1973;
तृतीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

भिक्षु-सूत्रः 3


उवहिम्मि अमुच्छिए अगिद्धे, अन्नायउंछं पुलनिप्पुलाए
    कयविक्कयसन्निहिओ विरए, सव्वसंगावगए य जे स भिक्खू।।
अलोल भिक्खूरसेसु गिद्धे,
उंछं चरे जीविय नाभिकंखे
     इडिंढ़सक्कारण-पूयणं,
                      चए ठियप्पा अणिहे जे स भिक्खू।।

जो अपने संयम-साधक उपकरणों तक में भी मूर्च्छा (आसक्ति) नहीं रखता, जो लालची नहीं है, जो अज्ञात परिवारों के यहां से भिक्षा मांगता है, जो संयम-पथ में बाधक होनेवाले दोषों से दूर रहता है, जो खरीदने-बेचने और संग्रह करने के गृहस्थोचित धन्धों के फेर में नहीं पड़ता, जो सब प्रकार से निःसंग रहता है, वही भिक्षु है।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

नरोपा का स्‍वप्‍न--(कथा- यात्रा-101)

नरोपा का स्वपन-(एस धम्मो सनंतनो)

अज्ञान ज्ञान के द्वारा नहीं मिट सकता है। वह मिट सकता है केवल होश के द्वारा। ज्ञान तो तुम स्वप्न में भी इकट्ठा किए जा सकते हो; लेकिन वह स्वप्न का हिस्सा ही है, और स्वप्न हिस्सा है तुम्हारी नींद का। कोई चाहिए जो तुम्हें झकझोर दे। कोई चाहिए जो तुम्हें धक्का दे दे। कोई चाहिए जो तुम्हें तुम्हारी नींद से जगा दे। अन्यथा तुम तो ऐसे ही चलते चले जा सकते हो। नींद मादक होती है। अज्ञान मादक होता है, वह एक प्रकार का नशा है। तुम्हें उससे बाहर आना है।
मैं तुम से एक कहानी कहूंगा, जो मुझे सदा प्रीतिकर रही है। वह तिलोपा के शिष्य, सिद्ध नरोपा के विषय में है। नरोपा के अपने गुरु तिलोपा से मिलने के पहले की घटना है। उसके बुद्धत्व को उपलब्ध होने से पहले की घटना है। और यह बहुत जरूरी है प्रत्येक खोजी के लिए, सब के साथ ऐसा ही होगा।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--105

वे वही सीखते हैं जो अनसीखा है—(प्रवचन—एकसौ
पांचवां)

अध्याय 64 : खंड 2

आरंभ और अंत

जो कर्म करता है, वह बिगाड़ देता है;
जो पकड़ता है, उसकी पकड़ से चीज फिसल जाती है।
क्योंकि संत कर्म नहीं करते, इसलिए वे बिगाड़ते भी नहीं हैं;
क्योंकि वे पकड़ते नहीं हैं, इसलिए वे छूटने भी नहीं देते।
मनुष्य के कारबार अक्सर पूरे होने के करीब आकर बिगड़ते हैं।
आरंभ की तरह ही अंत में भी सचेत रहने से, असफलता से बचा जाता है।
इसलिए संत कामनारहित होने की कामना करते हैं।
और कठिनता से प्राप्त होने वाली चीजों को मूल्य नहीं देते।
वे वही सीखते हैं जो अनसीखा हो,
और उसे वे पुनः स्थापित करते हैं, जिसे समुदाय ने खो दिया है।
यह कि प्रकृति के क्रम में वे सहायक तो होते हैं,
लेकिन उसमें हस्तक्षेप करने की धृष्टता नहीं करते।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--104

जो प्रारंभ है वही अंत है—(प्रवचन—एकसौचारवां)
अध्याय 64 : खंड 1
आरंभ और अंत

जो शांत पड़ा है, उसे नियंत्रण में रखना आसान है;
जो अभी प्रकट नहीं हुआ है, उसका निवारण आसान है;
जो बर्फ की तरह तुनुक है, वह आसानी से पिघलता है;
जो अत्यंत लघु है, वह आसानी से बिखरता है।
किसी चीज के अस्तित्व में आने से पहले उससे निपट लो;
परिपक्व होने के पहले ही उपद्रव को रोक दो।
जिसका तना भरा-पूरा है, वह वृक्ष नन्हे से अंकुर से शुरू होता है;
नौ मंजिल वाला छज्जा मुट्ठी भर मिट्टी से शुरू होता है;
हजार कोसों वाली यात्रा यात्री के पैर से शुरू होती है।

जीवन की सारी समस्या इस एक बात में ही छिपी है कि जब तुम हल कर सकते हो तब तुम हल नहीं करते। जब बात को रोक देना आसान था

गीता दर्शन (भाग--4) प्रवचन--097

जीवन ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन--उत्तरायण पथ—(प्रवचन—नौवां)

अध्याय—8
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।। 23।।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।। 24।।

और हे अर्जुन, जिस काल में शरीर त्यागकर गए हुए योगीजन, पीछे न आने वाली गति को और पीछे आने वाली गति को भी प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात मार्ग को कहूंगा।
उन दो प्रकार के मार्गों में से जिस मार्ग में अग्नि है, ज्योति है, और दिन है, तथा शुक्ल पक्ष है और उत्तरायण के छः माह हैं, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
कोई ऐसे भी जी सकता है जैसे मरा हुआ रहा हो, और कोई ऐसे भी मर सकता है कि उसकी मृत्यु को हम जीवंत कहें। जीवन भी मृतवत हो सकता है, और मृत्यु भी अति जीवंत।
जिस भांति हम जीते हैं, उसे जीवन नाम-मात्र को ही कहा जा सकता है। न तो जीवन का हमें कोई पता है; न जीवन के रहस्य का द्वार खुलता है; न जीवन के आनंद की वर्षा होती है; न हम यही जान पाते हैं कि हम क्यों जी रहे हैं,

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--103

स्वादहीन का स्वाद लो—(प्रवचन—एकसौतीनवां) 

अध्याय 63

कठिन और सरल

निष्क्रियता को साधो। अकर्म पर अवधान दो। स्वादहीन का स्वाद लो।
चाहे वह बड़ी हो या छोटी, बहुत या थोड़ी, घृणा का प्रतिदान पुण्य से दो।
कठिन से तभी निबट लो, जब वह सरल ही हो;
बड़े से तभी निबट लो, जब वह छोटा ही हो;
संसार की कठिन समस्याएं तभी हल की जाएं, जब वे सरल ही हों;
संसार की महान समस्याएं तभी हल की जाएं, जब वे छोटी ही हों।
इसलिए संत सदा बड़ी समस्याओं से निबटे बिना ही महानता को संपन्न करते हैं।
जो फूहड़पन के साथ वचन देता है,
उसके लिए अक्सर वचन पूरा करना कठिन होगा।
जो अनेक चीजों को हलके-हलके लेता है, उसे अनेक कठिनाइयों से पाला पड़ेगा।
इसलिए संत भी चीजों को कठिन मान कर हाथ डालते हैं,
और उसी कारण से उन्हें कठिनाइयों का सामना नहीं होता।

निष्क्रियता लाओत्से का मूल स्वर है।
इसे बहुत गहरे से समझ लेना जरूरी है। कठिनाई बढ़ जाती है और भी, क्योंकि निष्क्रियता को हम अक्सर अकर्मण्यता समझ लेते हैं। शब्द निषेधात्मक है, लेकिन स्थिति निषेध की नहीं है। निष्क्रियता शब्द तो नकार का है, लेकिन स्थिति बड़ी अकारात्मक है।