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शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--8

तांत्रिक शुद्धि का आधार अभेद है—प्रवचन—आठवां

      प्रश्‍नसार:

1—शुद्धि से तंत्र का अभिप्राय क्‍या है?

एक बात अक्सर पूछी जाती है :

तांत्रिक शुद्धि का तंत्र का क्या मतलब है जब वह कहता है की प्रगति के लिए मन का शुद्धिकरण, की शुद्धि बुनियादी शर्त है?


 सामान्‍यत: शुद्धि का जो अर्थ लिया जाता है वही तंत्र का अर्थ नहीं है। सामान्यत: हम हर चीज को शुभ और अशुभ में, भले और बुरे में बांटते हैं। यह विभाजन किसी भी कारण से हो सकता है, यह स्वास्थ्य—विज्ञान की दृष्टि से भी हो सकता है, नैतिक दृष्टि से भी हो सकता है, या किसी भी तरह हो सकता है। लेकिन हम जीवन को शुभ और अशुभ में बांट देते हैं। और जब भी हम शुद्धि का नाम लेते हैं तो उससे शुभ का ही मतलब निकालते हैं। हम चाहते हैं कि अच्छे गुणों को तो रहना चाहिए और बुरे गुणों को जाना चाहिए।

लेकिन तंत्र के लिए शुभाशुभ का यह विभाजन कोई अर्थ नहीं रखता है। तंत्र जीवन को किसी द्वंद्व या विभाजन की दृष्टि से नहीं देखता है। इसलिए यह प्रश्न बहुत प्रासंगिक है कि तंत्र के लिए शुद्धि का, शुचिता का क्या अर्थ है।
अगर तुम किसी साधु—महात्मा से पूछो तो वह कहेगा कि क्रोध बुरा है, कामवासना बुरी है, लोभ बुरा है। और अगर गुरजिएफ से पूछो तो वह कहेगा कि नकारात्मकता बुरी है, जो भी निषेध भाव हैं वे बुरे हैं और विधेय भाव शुभ हैं। तुम जैन, बौद्ध, हिंदू ईसाई या मुसलमान से पूछो; उनकी शुभाशुभ की परिभाषाएं अलग— अलग हो सकती हैं, लेकिन उन सबकी परिभाषाएं हैं। वे कुछ चीजों को अशुभ कहते हैं और कुछ चीजों को शुभ। इसलिए उनके लिए शुद्धता की परिभाषा करना कठिन नहीं है। जिसे वे शुभ मानते हैं वह उनके लिए शुद्ध है और जिसे अशुभ मानते हैं वह अशुद्ध है।
लेकिन तंत्र के लिए यह एक गंभीर समस्या है। तंत्र शुभ और अशुभ के बीच सतही विभाजन नहीं करता है। तब शुद्धता क्या है? पवित्रता क्या है?
तंत्र कहता है : बांटना ही अशुद्धि है और विभाजन में जीना शुद्धि है, शुचिता है।

 एक बच्चा, तुम उसे शुद्ध कहते हो। वह क्रोधित होता है, उसे लोभ पकड़ता है, फिर उसे शुद्ध क्यों कहते हो? बचपन में शुद्ध क्या है? उसकी निर्दोषता शुद्ध है। बच्चे के मन में विभाजन नहीं है। बच्चा यह विभाजन जानता ही नहीं है कि क्या शुभ है और क्या अशुभ
है। उसका वह अबोध ही निर्दोषता है। अगर वह क्रोध भी करता है तो भी उसके पास क्रोध करने का मन नहीं है। उसका क्रोध करना शुद्ध और सरल कृत्य है। वह कृत्य मात्र घटित होता है। और जब क्रोध चला जाता है तो चला जाता है; कुछ भी पीछे नहीं छूट रहता है। बच्चा फिर वही का वही हो जाता है, मानो क्रोध कभी आया ही नहीं था। उसकी शुद्धता अछूती रहती है, पवित्रता वही की वही रहती है। बच्चा इसलिए पवित्र है कि उसके पास मन नहीं है।
ज्यों—ज्यों मन बड़ा होगा त्यों—त्यों बच्चा अशुद्ध होता जाएगा। तब क्रोध विचार के साथ आएगा, वह सहज—स्फूर्त नहीं होगा। तब कभी—कभी बच्चा अपने मन का दमन भी करेगा, जब स्थिति क्रोध करने की इजाजत नहीं देगी। और जब क्रोध का दमन होता है तब वह क्रोध अपने को दूसरी स्थिति में, दूसरे ढंग से प्रकट करेगा। तब वह उस स्थिति में भी क्रोध करेगा जब क्रोध करने की जरूरत नहीं होगी। क्योंकि दमित क्रोध को कोई निकास चाहिए। और तब सब कुछ अशुद्ध हो जाएगा, क्योंकि मन प्रविष्ट हो गया।
एक बच्चा हमारी नजर में चोर हो सकता है, लेकिन वह खुद कभी भी चोर नहीं है। क्योंकि उसके मन में अभी यह खयाल ही नहीं है कि चीजें व्यक्तियों की निजी संपत्ति हैं। अगर वह तुम्हारी घड़ी या रुपया या कुछ भी ले लेता है तो यह उसके लिए चोरी नहीं है, क्योंकि यह भाव ही कि चीजें दूसरों की हैं वहा नहीं है। इसलिए उसकी चोरी भी शुद्ध है। जब कि तुम्हारी गैर—चोरी भी शुद्ध नहीं है। तुम्हारे साथ मन है।
तंत्र कहता है कि जब कोई फिर से शिशुवत हो जाता है तब वह शुद्ध है। बेशक वह बच्चा नहीं है, वह बच्चे जैसा है। दोनों में फर्क भी है और समानता भी। समानता है फिर से उपलब्ध निर्दोषता में, फिर से कोई बच्चे के समान हो गया है।
बच्चा नग्न खड़ा है, किसी को उसकी नग्नता महसूस नहीं होती, खटकती नहीं। क्यों? क्योंकि बच्चे को अभी अपने शरीर का बोध नहीं है। उसकी नग्नता का गुणधर्म तुम्हारी नग्नता के गुणधर्म से भिन्न है। तुम्हें अपने शरीर का बोध है।
संत को यही निर्दोषता पुन: प्राप्त करनी है। महावीर फिर नग्न खड़े हो जाते हैं। इस नग्नता में फिर उसी निर्दोषता का गुणधर्म आ गया। वे अपने शरीर को भूल गए हैं, वे अब शरीर नहीं हैं। लेकिन शिशु और संत में फर्क भी साथ—साथ है। और फर्क बड़ा है। बच्चा महज अज्ञान में है, इसलिए निर्दोष है। लेकिन संत ज्ञानवान है, और वही उसकी निर्दोषता का कारण है। बच्चा एक दिन अपने शरीर के प्रति बोध से भरेगा और तब उसे उसकी नग्नता का एहसास होगा। तब वह उसे छिपाना चाहेगा, तब वह अपराधी अनुभव करेगा और शरमाएगा। वह बोध को प्राप्त करेगा। इसलिए उसकी निर्दोषता अज्ञान की निर्दोषता है। ज्ञान उसे नष्ट कर देने वाला है।
बाइबिल में जो आदम और ईव के अदन के बाग से निकाले जाने की कथा है उसका अर्थ यही है। वे बच्चों की भांति नग्न थे। उन्हें शरीर का बोध नहीं था, उन्हें क्रोध, लोभ, कामवासना या किसी चीज का बोध नहीं था। वे अबोध थे और बच्चों जैसे निर्दोष थे, पवित्र थे। लेकिन ईश्वर ने उन्हें ज्ञान के वृक्ष का फल खाने से मना कर दिया। ज्ञान का वृक्ष निषिद्ध था, लेकिन उन्होंने फल खाया। क्योंकि निषेध में निमंत्रण होता है, निषिद्ध वस्तु आकर्षक हो जाती है। वे एक बहुत बड़े बाग में रहते थे जिसमें अनंत वृक्ष थे। लेकिन ज्ञान का वृक्ष सब से महत्वपूर्ण हो गया, क्योंकि उसका निषेध किया गया था। सच तो यह है कि यह निषेध ही आकर्षण बन गया, निमंत्रण बन गया। मानो उस एक वृक्ष ने उन्‍हें सम्‍मोहित करके अपनी और खींच लिया। वे बच नहीं सके, उन्हें उसका फल खाना पड़ा।
लेकिन यह कथा सुंदर है, क्योंकि वृक्ष का नाम ज्ञान का वृक्ष है। जिस क्षण उन्होंने ज्ञान का फल खाया, वे गैर—निर्दोष हो गए। वे बोधपूर्ण हो गए और वे समझ गए कि हम नंगे हैं। फिर तुरंत ईव ने अपने शरीर को छिपाने की कोशिश की। और शरीर के बोध के साथ—साथ वे सब के प्रति—क्रोध, काम, लोभ—सब के प्रति बोधपूर्ण हो गए। वे वयस्क हो गए और इसलिए उन्हें स्वर्ग के बगीचे से निष्कासित किया गया।
इसलिए बाइबिल में ज्ञान ही पाप है। ज्ञान के कारण उन्हें बगीचे से निकाल बाहर किया गया, उन्हें दंडित किया गया। और जब तक वे फिर से बच्चे की भांति निर्दोष, अबोध नहीं हो जाते तब तक उन्हें फिर से बगीचे में प्रवेश नहीं मिलेगा। वे परमात्मा के राज्य में तभी पुन: प्रवेश पाएंगे जब वे फिर निर्दोष हो जाएंगे।
यह पूरी कथा मनुष्यता की कथा है। न सिर्फ आदम और ईव अदन के बाग से निकाले गए थे, प्रत्येक बच्चे को वहां से निकाला जाता है। प्रत्येक बच्चा अपना बचपन निर्दोषता में बिताता है, वह कुछ भी नहीं जानता है। वह शुद्ध है। लेकिन वह शुद्धता अज्ञान की शुद्धता है, वह सदा नहीं चलेगी। और जब तक वह विवेक की शुद्धता नहीं बनती तब तक तुम उसका भरोसा नहीं कर सकते। उस शुद्धता को तो जाना ही होगा, देर—अबेर तुम्हें ज्ञान का फल खाना ही होगा।
अदन के बाग में तो बात आसान थी, वहा वृक्ष था। यहां वृक्ष की जगह स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय हैं। और हरेक बच्चे को उनसे गुजरना होगा, उन्हें गैर—निर्दोष होना होगा, निर्दोषता खोनी होगी। संसार में ज्ञान जरूरी है, अस्तित्व के लिए ज्ञान की जरूरत है। यहां तुम ज्ञान के बिना नहीं जी सकते हो। और ज्यों ही ज्ञान आया कि विभाजन आया। तुम यह विभाजन करते हो कि क्या शुभ है और क्या शुभ नहीं है।
तो तंत्र के लिए यह शुभाशुभ का विभाजन ही अशुद्धि है। इसके पहले तुम शुद्ध हो, इसके बाद भी तुम शुद्ध हो; इसमें ही अशुद्ध हो। लेकिन ज्ञान एक आवश्यक बुराई है, तुम इससे बच नहीं सकते। सब को इससे गुजरना होता है, वह जीवन का हिस्सा है। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि इस में सदा—सर्वदा रहा जाए। तुम उसका अतिक्रमण कर सकते हो। और यह अतिक्रमण तुम्हें फिर से निर्दोष और पवित्र कर देगा। अगर विभाजन व्यर्थ हो जाए, अगर शुभाशुभ का भेद करने वाला ज्ञान जाता रहे तो तुम पुन: एक निर्दोष दृष्टि से संसार को देखने में समर्थ हो जाओगे।
जीसस ने कहां है : जब तक तुम बच्चे जैसे नहीं हो जाते तुम हमारे प्रभु के राज्य में नहीं प्रवेश पा सकोगे।
जब तक तुम बच्चे जैसे नहीं हो जाते! यही तंत्र की शुद्धता है।
लाओत्सु कहता है. एक इंच का विभाजन और स्वर्ग और नरक अलग—अलग हो जाते हैं।
अविभाजन, बिलकुल अविभाजन संत के मन का लक्षण है। संत नहीं जानता है कि क्या शुभ, क्या अशुभ। वह बच्‍चे जैसा है। लेकिन वह बच्‍चे से भिन्‍न भी है। क्‍योंकि उसने विभाजन जाना है। वह इस विभाजन से होकर गुजरा है। और उसने इसका अतिक्रमण किया है, इसके पार गया है। उसने अंधेरे और उजाले को जाना है और अब उनके पार चला गया है। अब वह अंधेरे को उजाले के अंग की तरह देखता है और उजाले को अंधेरे के अंग की तरह। अब उसके लिए उनमें कोई विभाजन नहीं है। प्रकाश और अंधकार एक हो गए हैं—एक ही तत्व की घटती—बढ़ती मात्राएं हैं। अब वह हरेक चीज को एक ही तत्व के कमोबेश परिमाण की भांति देखता है। वे कितने ही एक—दूसरे के बिलकुल विपरीत मालूम पड़े, पर वे दो नहीं हैं। जीवन और मृत्यु, प्रेम और घृणा, शुभ और अशुभ, सब कुछ एक तत्व के, एक ऊर्जा के अंग हैं। अंतर परिमाण का है, अंश का है, मात्रा का है, और उन्हें कभी अलग—अलग नहीं किया जा सकता। यह नहीं कहां जा सकता कि इस बिंदु से विभाजन शुरू होता है। विभाजन है ही नहीं।
शुभ क्या है? अशुभ क्या है? कहां से तुम उन्हें अलग—अलग करके बांटोगे, परिभाषित करोगे? वे सदा एक हैं, एक ही चीज के अलग—अलग परिमाण हैं। और जब यह एक बार जान और समझ लिया गया तो तुम्हारा मन शुद्ध हो गया। तंत्र की शुद्धि का यही अर्थ है। इसलिए मैं तांत्रिक शुद्धि को निर्दोषता कहूंगा, अच्छाई नहीं।
लेकिन निर्दोषता अज्ञानपूर्ण हो सकती है। तब वह किसी काम की नहीं होती। उस निर्दोषता को तो विदा देनी होगी, तुम्हें उसके बाहर जाना होगा। अन्यथा तुम प्रौढ़ नहीं हो सकोगे। ज्ञान का अर्जन और फिर ज्ञान का अतिक्रमण, दोनों जरूरी हैं, दोनों प्रौढ़ता के अंग हैं, सच में वयस्क होने के हिस्से हैं। इसलिए उनसे गुजरो जरूर, लेकिन उनसे बंधे मत रहो। आगे बढ़ते जाओ। और तब एक दिन आता है जब तुम सच में उनके पार निकल जाते हो।
यही वजह है कि तांत्रिक शुद्धि को समझना कठिन है। उसे गलत समझा जा सकता है, वह इतनी नाजुक है। इसलिए किसी तांत्रिक संत को पहचानना करीब—करीब असंभव है। साधारण साधु—संतों को पहचानना आसान है, क्योंकि वे तुम्हारा अनुगमन करते हैं, तुम्हारे मानकों का, तुम्हारी परिभाषाओं का, तुम्हारी नैतिकता का अनुगमन करते हैं। तांत्रिक संत को पहचानना कठिन है, क्योंकि वह सब विभाजनों का अतिक्रमण कर जाता है। इसलिए मनुष्य के विकास के पूरे इतिहास में तांत्रिक संतों के बारे में हम कुछ भी नहीं जान पाए। उन्हें पहचानना इतना कठिन है कि उनके बारे में उल्लेख नहीं हो सका।
कनफ्यूसियस लाओत्सु के पास गया। लाओत्सु का चित्त तांत्रिक ढंग के सबुद्ध संत का चित्त है। तंत्र शब्द का भी लाओत्सु को पता नहीं था, उसके लिए शब्द ही निरर्थक है। वह तंत्र के संबंध में कुछ नहीं जानता था, लेकिन उसने जो कुछ कहां है वह तंत्र है। कनफ्यूसियस हमारे चित्त का प्रतिनिधि है, महाप्रतिनिधि है। वह सदा शुभ और अशुभ की भाषा में सोचता है, सोचता है कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं करने योग्य है। कनफ्यूसियस विधिवादी है, सबसे बड़ा विधिवादी। वह लाओत्सु के पास गया और उससे पूछा, शुभ क्या है? करने योग्य क्या है? अशुभ क्या है? कृपा करें और इनकी स्पष्ट परिभाषा करें।
लाओत्‍सु ने कहां कि परिभाषाएं सब गुड़—गोबर किए देती हैं, क्योंकि परिभाषा का अर्थ है बांटना, कि यह यह है और वह वह है। तुम बांटकर कहते हो कि अ अ है ब ब है। तुम बांटते हो और कहते हो कि अ ब नहीं हो सकता है। तब भेद पैदा हो गया, द्वंद्व निर्मित हो गया। और अस्‍तित्‍व एक है। अ सतत ब हो रहा है, अ निरंतर ब में प्रवेश कर रहा है। जीवन सतत मृत्यु बन रहा है, जीवन निरंतर मृत्यु में प्रवेश कर रहा है। इस हालत में तुम परिभाषा कैसे करोगे? बचपन जवानी में प्रवेश कर रहा है और जवानी बुढ़ापे में गति कर रही है। स्वास्थ्य रोग में गति कर रहा है और रोग स्वास्थ्य में। इस हालत में तुम उनके बीच विभाजन रेखा कैसे खींचोगे?
जीवन एक प्रवाह है। और जब तुम उसकी परिभाषा करते हो, तुम सब गड्ड—मडु कर देते हो। क्योंकि परिभाषाएं मृत होती हैं और जीवन एक जीवंत प्रवाह है। इसलिए परिभाषाएं सदा गलत होती हैं। लाओत्सु कहता है, परिभाषा असत्य को जन्म देती है। इसलिए परिभाषा मत करो। मत कहो कि क्या शुभ है और क्या अशुभ।
कनफ्यूसियस ने कहां, यह आप क्या कह रहे हैं! तब लोगों का मार्ग—दर्शन कैसे होगा? तब उनका शिक्षण कैसे होगा? वे नैतिक और शुभ कैसे बनेंगे? लाओत्सु ने कहां, मेरी दृष्टि में यही पाप है कि कोई किसी दूसरे को अच्छा बनाने की कोशिश करे। तुम मार्ग—दर्शन करने वाले कौन हो? तुम राह दिखाने वाले कौन हो? जितने ही मार्ग—दर्शक होंगे उतनी ही उलझन बढ़ेगी। हर आदमी को अपने ऊपर छोड़ दो। तुम कौन होते हो?
यह दृष्टि खतरनाक मालूम होती है। है ही। ऐसी दृष्टि पर समाज नहीं खड़ा किया जा सकता। कनफ्यूसियस यही पूछे जाता है। और लाओत्सु की पूरी बात यह है कि प्रकृति, स्वभाव पर्याप्त है। नैतिकता की जरूरत क्या है? स्वभाव सहज है, स्वभाव पर्याप्त है। आरोपित नियम और अनुशासन जरूरी नहीं हैं। निर्दोषता, सरलता काफी है। नैतिकता अनावश्यक है। स्वभाव सहज है, स्वभाव पर्याप्त है। ऊपर से लादे गए नियम—निषेध कतई जरूरी नहीं हैं। निर्दोषता काफी है। ज्ञान की भी क्या जरूरत है?
कनफ्यूसियस बहुत घबराया हुआ वापस आया। रातों उसे नींद नहीं आयी। और उसके शिष्य पूछते थे कि हमें उसके साथ हुई मुलाकात के संबंध में कुछ कहिए कि क्या हुआ? कनफ्यूसियस ने कहां कि वह आदमी नहीं है, वह एक खतरा है। एक सिंह है। वह मनुष्य नहीं है। जहां वह रहता है उधर कभी मत जाना। जहां लाओत्सु का नाम सुनो वहीं से खिसक जाओ। वह तुम्हारे मन को पूरी तरह हिलाकर छोड़ेगा।
और यह बात सही है। क्योंकि पूरा तंत्र इस बात के लिए है कि मन का कैसे अतिक्रमण किया जाए। तंत्र मन को विनष्ट करने के लिए ही है। मन परिभाषा, नियम और अनुशासन के सहारे जीता है। मन एक व्यवस्था है। लेकिन याद रहे, तंत्र अव्यवस्था नहीं है। और यह एक नाजुक बात है जो समझने योग्य है।
कनफ्यूसियस लाओत्सु को नहीं समझ सका। कनफ्यूसियस जब चला गया तब लाओत्सु हंस रहा था। उसके शिष्यों ने पूछा कि आप इतना हंस क्यों रहे हैं? बात क्या है? तो लाओत्सु ने कहां, समझ के लिए मन बड़ी बाधा है; कनक्यूसियस तक का मन बाधा है। वह मुझे बिलकुल नहीं समझ सका और वह मेरे संबंध में जो भी कहेगा वह नासमझी होगी। वह समझता है कि वह दुनिया में व्यवस्था लाने जा रहा है। तुम संसार में व्यवस्था पैदा नहीं कर सकते, व्यवस्था तो उसमें निहित है, व्यवस्था उसमें समायी हुई है। और जब तुम व्यवस्था पैदा करने चलते हो तब अव्यवस्था ही पैदा ही होती है। और जब तुम व्‍यवस्‍था पैदा करने चलते हो तब अव्यवस्था पैदा कर रहा हूं लेकिन सच्चाई यह है कि अव्यवस्था वह पैदा कर रहा है। मैं तो सब आरोपित व्यवस्था के खिलाफ हूं क्योंकि मैं उस सहज अनुशासन में विश्वास करता हूं जो आप ही आता है, जो आप ही विकसित होता है। उसे लाना और लादना नहीं पड़ता है।
तंत्र चीजों को इसी भांति देखता है। तंत्र के लिए निर्दोषता सहजता है। बिना किसी आरोपण के स्वयं होना, बस स्वयं होना, जैसे वृक्ष बढ़ता है वैसे बढ़ना सहजता है। और ध्यान रहे, तुम्हें तुम्हारे बगीचे का वृक्ष नहीं होना है, तुम्हें जंगल का वृक्ष होना है, जो सहजता से बढ़ता है, किसी मार्ग—दर्शन के अनुसार नहीं। क्योंकि सब मार्ग—दर्शन कुमार्ग—दर्शन हैं, तंत्र के लिए सब मार्ग—दर्शन कुमार्ग—दर्शन हैं। बिना मार्ग—दर्शन के, बिना पहरेदारी के, बिना दिशा—सूचन के, बिना प्रयोजन के बढ़ता है। बस, बढ़ता है।
आंतरिक नियम काफी है; और कोई नियम जरूरी नहीं है। और अगर तुम्हें किसी और नियम की जरूरत है, तो उसका अर्थ है कि तुम्हें आंतरिक नियम का पता नहीं है, उसके साथ तुम्हारा संपर्क छूट गया है। इसलिए असली चीज आरोपण नहीं है। असली चीज है संतुलन को, सम्यकत्व को फिर से प्राप्त करना, फिर से केंद्र की ओर गति करना, फिर से घर की ओर लौटना, ताकि तुम्हें सच्चा आंतरिक नियम उपलब्ध हो जाए।
लेकिन नीति के लिए, धर्मों के लिए, तथाकथित धर्मों के लिए जरूरी है कि वे व्यवस्था को, अच्छाई को ऊपर से लादे, बाहर से आरोपित करें। याद रहे, धर्म, नैतिक शिक्षण, पुरोहित, पोप, सब तुम्हें बुरा, बुनियादी रूप से बुरा मानकर चलते हैं। वे मनुष्य के शुभ में, उसकी अच्छाई में विश्वास नहीं करते, किसी आंतरिक अच्छाई में उन्हें भरोसा नहीं है। वे मानकर चलते हैं कि तुम बुरे हो, और जब तक तुम्हें अच्छा होना न सिखाया जाए तब तक अच्छे नहीं हो सकोगे। वे समझते हैं कि जब तक अच्छाई बाहर से न थोपी जाएगी तब तक उसके आने की, भीतर से आने की संभावना नहीं है।
इसलिए पुरोहितों, नीतिवादियों और धर्मगुरुओं की नजर में तुम बुनियादी रूप से बुरे हो। अच्छाई तो वह अनुशासन है जो ऊपर से थोपी जाती है। तुम एक अराजकता हो और वे तुम्हें व्यवस्था देंगे। वे व्यवस्था लाने वाले हैं, और उन्होंने सारी दुनिया को एक गुड़—मड्ड, एक उलझाव, एक पागलखाना बना दिया है। क्योंकि सदियों से वे संसार में व्यवस्था पैदा करने में लगे हैं, अनुशासन ला रहे हैं। उन्होंने इतना सिखाया है कि सीखने वाले पागल हो गए हैं।
तंत्र तुम्हारी आंतरिक अच्छाई में विश्वास करता है। इस फर्क को स्मरण रखो। तंत्र कहता है कि हरेक व्यक्ति शुभ है, अच्छा है। वह अच्छा ही पैदा होता है, अच्छाई उसका स्वभाव है। यह हकीकत है, तुम अच्छे हो ही। तुम्हें स्वाभाविक विकास की जरूरत है, किसी आरोपण की जरूरत नहीं है। यही कारण है कि कोई भी चीज बुरी नहीं समझी जाती। अगर क्रोध है, कामवासना है, लोभ है, तो तंत्र कहता है कि वे सब भी शुभ हैं। बस एक ही चीज की कमी है कि तुम अपने में केंद्रित नहीं हो और इस कारण से तुम उनका उपयोग नहीं कर पाते हो। यही कारण है कि तुम उनका सदुपयोग नही कर पाते हो।
क्रोध बुरा नहीं है। असली समस्या यह है कि तुम अपने भीतर नहीं हो, और यही कारण है कि क्रोध तबाही लाता है। अगर तुम अपने भीतर उपस्थित रहे तो क्रोध स्वस्थ ऊर्जा बन जाता है, स्वास्थ्य बन जाता है। तब क्रोध ऊर्जा में रूपांतरित हो जाता है। और तब वह शुभ हो जाता है।
 जो कुछ भी है शुभ है। तंत्र सब चीज की अंतर्भूत अच्छाई में विश्वास करता है। सब कुछ पवित्र है। कुछ भी अपवित्र नहीं है, कुछ भी अशुभ नहीं है। तंत्र के लिए कहीं कोई शैतान नहीं है, केवल दिव्य अस्तित्व है।
धर्म शैतान के बिना जीवित नहीं रह सकते हैं। उन्हें ईश्वर की भी जरूरत है और शैतान की भी जरूरत है। इसलिए तुम उनके मंदिरों में अकेले ईश्वर को देखकर भूल में मत पड़ जाना, उस ईश्वर के ठीक पीछे शैतान छिपा बैठा है। क्योंकि कोई भी धर्म शैतान के बिना कैसे रह सकता है? कुछ चीज जरूरी है जिसकी निंदा की जाए, जिसे विनष्ट किया जाए। वहां समग्र नहीं स्वीकृत है, सिर्फ अंश स्वीकृत है।
यह बुनियादी बात है। कोई भी धर्म तुम्हें तुम्हारी समग्रता में नहीं, आशिक रूप में, खंड में ही स्वीकार करता है। सारे धर्म कहते हैं कि हम तुम्हारे प्रेम को स्वीकार करते हैं, घृणा को नहीं, इसलिए घृणा को मिटाओ। और यह एक बहुत गहरी समस्या है। क्योंकि जब घृणा को पूरी तरह मिटा देते हो तब उसके साथ ही प्रेम भी मिट जाता है। क्योंकि घृणा और प्रेम दो नहीं हैं। वे कहते हैं, हम तुम्हारे मौन को तो स्वीकार करते हैं, लेकिन तुम्हारे क्रोध को नहीं। तुम क्रोध को मिटा दो और तुम्हारी जीवंतता भी मिट जाती है। तब तुम शांत तो हो जाओगे, लेकिन जिंदा न रहोगे, मुर्दा होकर रहोगे। वह शांति जीवन नहीं, मृत्यु है।
धर्म तुम्हें सदा दो में, शुभ और अशुभ में बांटते हैं। शुभ को वे स्वीकार करते हैं और अशुभ के विरोध में खड़े होते हैं। तब अशुभ को मिटाना है। इसलिए अगर कोई सच में उनकी मानकर चले तो अंतिम परिणाम होगा कि जिस क्षण शैतान मिटेगा उसी क्षण परमात्मा भी मिट जाएगा। लेकिन वास्तव में कोई भी उनकी नहीं मानता है। कोई मान भी नहीं सकता, क्योंकि यह शिक्षा ही बेहूदी है। फिर लोग क्या करते हैं?
वे बस धोखा देते हैं। इसलिए तो जगत में इतना पाखंड है। वह पाखंड धर्मों के द्वारा पैदा किया गया है। तुम वह नहीं कर सकते जो धर्म करने को सिखाते हैं, इसलिए तुम पाखंडी बन जाते हो। अगर तुम उनकी मानकर चलो तो तुम मरोगे, और अगर न मानो तो अपराधी अनुभव करोगे कि मैं अधार्मिक हूं। तब क्या किया जाए?
तो इसलिए चालाक मन समझौता करता है। एक ओर तो वह उनके शाब्दिक समर्थन में कहता है कि मैं तुम्हारा अनुसरण करता हूं और दूसरी ओर वह वही करता है जो करना चाहता है। तुम अपने क्रोध को जारी रखते हो, अपनी कामवासना को चलाए रखते हो, अपने लोभ को जहां का तहां रहने देते हो, और सतत यह भी कहे जाते हो कि लोभ बुरा है, क्रोध बुरा है, काम बुरा है। और यही पाप है, यही पाखंड है।
समूचा संसार पाखंडपूर्ण हो गया है। कोई आदमी ईमानदार नहीं है। यह बात विरोधाभासी लगती है। सभी धर्म ईमानदारी सिखाते हैं और वे ही बेईमानी की आधारशिला बने बैठे हैं। वे तुम्हें बेईमान बनाते हैं, क्योंकि वे तुम्हें असंभव चीजें करने को कहते हैं। तुम ''उन्हें नहीं कर पाते हो और पाखंडी बन जाते हो।
तंत्र तुम्हें तुम्हारी समग्रता में, पूरे का पूरा स्वीकार करता है। क्योंकि तंत्र कहता है कि या तो पूरा स्‍वीकार करो या पूरा अस्‍वीकार करो, बीच—बीच की बात नहीं हो सकती। आदमी संपूर्ण है, जैविक रूप से संपूर्ण है। तुम उसके खंड नहीं कर सकते हो, तुम नहीं कह सकते कि यह खंड हम नहीं स्वीकारेंगे। क्योंकि जिसे तुम अस्वीकारोगे वह जैविक रूप से उससे जुड़ा है जिसे तुम स्वीकारते हो।
यह ऐसा है कि जैसे यह मेरा शरीर है। कोई आता है और कहता है कि मैं तुम्हारे रक्त—संचालन को तो स्वीकारता हूं लेकिन हृदय की धड़कन को नहीं। यह जो निरंतर धड़क रहा है हृदय उसे मैं नहीं स्वीकारता हूं पर रक्त—संचालन मुझे स्वीकार है। यह ठीक है, यह चुपचाप है।
लेकिन सच तो यह है कि मेरा रक्त—संचालन मेरे हृदय के द्वारा हो रहा है, और हृदय की धड़कन उससे संबंधित है। रक्त—संचालन धड़कन के कारण होता है। तो मैं क्या करूं? मेरा हृदय और रक्त—संचालन सावयव रूप से जुड़े हैं। वे दो नहीं, एक हैं। इसलिए या तो मुझे पूरी तरह स्वीकार करो या पूरी तरह अस्वीकार करो। लेकिन कृपा कर मुझे बांटने की कोशिश मत करो। यह बेईमानी होगी, गहरी बेइमानी होगी। अगर तुम मेरे हृदय की धड़कन की निंदा करोगे तो मैं भी उसकी निंदा करने लगता। लेकिन तब रक्त का संचालन नहीं होगा, और उसके बिना मैं जिंदा नहीं रह सकता। इसलिए क्या किया जाए?
यह कि जैसे हो वैसे ही बने रहो, और सदा कुछ और कहते रहो जो तुम नहीं हो, जो तुम नहीं हो सकते हो।
फिर यह देखना कठिन नहीं है कि कैसे हृदय और रक्त—संचालन आपस में जुडे हैं, लेकिन यह देख पाना कठिन है कि प्रेम और घृणा वैसे ही आपस में जुड़े हैं। वे एक ही हैं। जब तुम किसी को प्रेम करते हो तो क्या करते हो? वह एक प्रवाह है, वैसे ही जैसे श्वास का बाहर जाना है। जब तुम किसी को प्रेम करते हो तो क्या करते हो? तुम उससे मिलने के लिए बाहर जा रहे हो, वह श्वास का बाहर जाना है। और जब तुम घृणा करते हो तो वह श्वास का वापस आना है। तुम प्रेम करते हो तो तुम किसी के प्रति आकर्षित होते हो, और जब घृणा करते हो तो विकर्षित होते हो।
आकर्षण और विकर्षण एक ही प्रवाह की दो लहरें हैं। आकर्षण और विकर्षण दो चीजें नहीं हैं, तुम उन्हें विभाजित नहीं कर सकोगे। तुम मुझे यह नहीं कह सकते कि तुम श्वास ले तो सकते हो, लेकिन श्वास छोड़ नहीं सकते। तुम मुझे यह नहीं कह सकते कि तुम श्वास छोड़ तो सकते हो, लेकिन श्वास ले नहीं सकते। दो में से एक ही काम कर सकते हो, दोनों नहीं। पर अगर तुम्हें श्वास छोड़ने न दी जाए; तो तुम श्वास ले कैसे सकते हो? इसी तरह अगर तुम्हें घृणा न करने दी जाए तो तुम प्रेम भी नहीं कर सकते हो।
तंत्र कहता है कि हम पूरे मनुष्य को स्वीकार करते हैं। क्योंकि मनुष्य एक जैविक एकता है। मनुष्य एक गहरी एकता है, तुम उसमें से कुछ भी नहीं छोड़ सकते। और वह जैसा है वैसा ही उसे होना चाहिए। क्योंकि अगर मनुष्य जैविक एकता नहीं है तो इस ब्रह्मांड में कुछ भी जैविक एकता नहीं है। मनुष्य जैविक संपूर्णता का शिखर है। सड़क पर पड़ा पत्थर वह एकता है, वृक्ष एकता है, फूल और पक्षी वह एकता हैं। सब एकता है तो मनुष्य क्यों नहीं?
मनुष्य तो शिखर है, एक महाएकता है, एक जटिल जैविक संपूर्णता। सच तो यह है कि तुम किसी को भी अस्वीकृत नहीं कर सकते।
तंत्र कहता है कि तुम जैसे हो हम तुम्‍हें वैसे ही स्‍वीकार करते है। उसका यह मतलब नहीं है कि तुम्हें बदलने की जरूरत नहीं है। उसका यह मतलब भी नहीं है कि अब तुम्हें विकास नहीं करना है। वरन उसका अर्थ तो यह है कि तंत्र तुम्हारे विकास के मूलाधार को स्वीकार कर रहा है। तभी तुम विकास कर सकते हो। लेकिन यह विकास चुनाव नहीं होगा। यह चुनाव—रहित विकास होगा।
उदाहरण के लिए बुद्ध को देखो। जब बुद्ध बुद्ध होते हैं, हम पूछ सकते हैं, उनका क्रोध कहां गया? उनमें भी क्रोध था, उनमें भी कामवासना थी। अब वह क्रोध, वह कामवासना कहां गई? अब उनका लोभ कहां है? अब हम उनमें कोई क्रोध नहीं देखते। जब वे बुद्ध हो गए तो उनमें कोई क्रोध क्यों नहीं दिखाई पड़ता?
क्या तुम कमल में कीचड़ को देख सकते हो? कमल कीचड़ से आता है। अगर तुमने कमल को कीचड़ से जन्मते और बढ़ते नहीं देखा है और एक कमल का फूल तुम्हारे पास लाया जाए तो क्या तुम सोच सकते हो कि यह सुंदर कमल किसी तालाब के मामूली कीचड़ से पैदा हुआ है? ऐसा सुंदर कमल और कुरूप कीचड़ से? क्या कमल में कहीं भी तुम कीचड़ को पहचान सकते हो?
कीचड़ कमल में है, लेकिन रूपांतरित होकर है। उसमें जो सुगंध है वह उसी कुरूप कीचड़ से आ रही है। उसकी पंखुड़ियों का गुलाबीपन उसी कुरूप कीचड़ का वरदान है। अगर तुम इस कमल को फिर से कीचड़ में छिपाकर रख दो तो थोड़े ही दिनों में वह अपनी माता में विलीन हो जाएगा। और तब तुम फिर नहीं पहचान सकोगे कि कमल कहां गया? उसकी सुगंध कहां है? उसकी सुंदर पंखुड़ियां कहां हैं?
वैसे ही तुम बुद्ध में मनुष्य को नहीं पहचान सकोगे, लेकिन वह वहां है—एक बड़े और ऊंचे तल पर रूपांतरित होकर। वहां कामवासना है, क्रोध है, घृणा है; सब कुछ जो मनुष्य का है, वह वहा है।
बुद्ध मनुष्य हैं, लेकिन वे अपने परम विकास को उपलब्ध हो गए हैं। वे कमल का फूल हो गए हैं, इसलिए उनमें तुम कीचड़ को नहीं देख सकते। लेकिन उसका यह अर्थ नहीं है कि कीचड़ वहा नहीं है, वह वहा है, लेकिन कीचड़ की तरह नहीं, वह अब एक ऊंची एकता बन गई है। यही कारण है कि बुद्ध में न तुम्हें घृणा मिलेगी और न प्रेम मिलेगा।
यह समझना और भी कठिन होगा, क्योंकि बुद्ध सर्वथा प्रेमपूर्ण मालूम पड़ते हैं। वे कभी घृणा नहीं करते, कभी क्रोध नहीं करते; वे सदा शांत हैं। लेकिन उनकी शांति तुम्हारी शांति से भिन्न है। वे समान नहीं हैं। तुम्हारी शांति क्या है?
आइंस्टीन ने कहीं कहां है कि हमारी शांति युद्ध की तैयारी के सिवाय और कुछ नहीं है। दो युद्धों के बीच में हमें शांति का एक छोटा सा अंतराल मिलता है, लेकिन वह शांति असली शांति नहीं है। वह दो युद्धों के बीच मात्र एक विराम है, एक अंतराल है। इसलिए तो वह विराम शीत युद्ध बन जाता है। कहना चाहिए कि युद्ध दो तरह के हैं, गरम युद्ध और शीत युद्ध। दूसरे महायुद्ध के बाद रूस और अमेरिका के बीच शीत युद्ध हुआ। उनके बीच शांति नहीं है, वे महज दूसरे युद्ध की तैयारी में लगे हैं। वे तैयार हो रहे हैं। हर युद्ध अंशांति और विनाश लाता है, इसलिए उसकी तैयारी के लिए अंतराल जरूरी है।
लेकिन अगर संसार से सचमुच युद्ध विदा हो जाएं, बिलकुल विदा हो जाएं, तो इस तरह की शांति जो सच में शीत युद्ध है विदा हो जाएगी। क्योंकि यह शांति सदा दो युद्धों के बीच घटित होती है। अगर युद्ध समाप्त हो जाएं तो यह शीत युद्ध भी, जिसे हम शांति कहते हैं, समाप्त हो जाएगा।
तुम्हारा मौन क्या है? बस दो क्रोधों के बीच तैयारी का समय। जब तुम चैन में, आराम में होते हो तो क्या होते हो? क्या तुम सचमुच शिथिल हो, सचमुच विश्राम में हो, या दूसरे विस्फोट की मात्र तैयारी कर रहे हो? क्रोध ऊर्जा का अपव्यय है, इसलिए तुम्हें समय चाहिए। जब तुम क्रोध करते हो तो उसके तुरंत बाद तुम फिर क्रोध नहीं कर सकते।
जब तुम संभोग में उतरते हो तो उसके तुरंत बाद ही फिर दूसरे संभोग में नहीं जा सकते। इसलिए तुम्हें समय की जरूरत होगी, कम से कम दों—तीन दिनों तक ब्रह्मचर्य रखने की जरूरत होगी। और यह तुम्हारी उम्र पर निर्भर करेगा। लेकिन यह ब्रह्मचर्य वास्तविक ब्रह्मचर्य नहीं है। तुम सिर्फ तैयारी कर रहे हो। दो संभोगों के बीच ब्रह्मचर्य नहीं हो सकता।
तुम दो भोजनों के बीच के समय को उपवास कहते हो। इसलिए तो अंग्रेजी में सुबह के जलपान को ब्रेकफास्ट कहते हैं। लेकिन उपवास कहां है? तुम तैयारी भर कर रहे थे। तुम अपने भीतर निरंतर भोजन नहीं ठूंस सकते हो, तुम्हें अंतराल चाहिए। लेकिन वह अंतराल उपवास नहीं है। वह दूसरे भोजन की तैयारी भर है।
ऐसे ही जब हम मौन रहते हैं तो वह दो क्रोधों के बीच का मौन है। जब हम विश्राम में होते हैं तो वह दो तनावों के बीच का विश्राम है। हमारा ब्रह्मचर्य दो संभोगों के बीच का ब्रह्मचर्य है। और जब हम प्रेम करते हैं तो वह दो घृणाओं के बीच का प्रेम है। यह याद रहे। तो यह मत समझो कि बुद्ध की शांति तुम्हारी शांति है। जब तुम्हारा क्रोध खतम होता है तब तुम्हारी शांति भी खतम हो जाती है। वे दोनों साथ—साथ रहते हैं, उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। वैसे ही बुद्ध के ब्रह्मचर्य को अपना ब्रह्मचर्य मत समझो। जब तुम्हारी कामवासना विदा होती है तब तुम्हारा ब्रह्मचर्य भी विदा हो जाता है। दोनों एक ही चीज के हिस्से थे, दोनों साथ—साथ विदा होते हैं।
बुद्ध के साथ एक भिन्न ही व्यक्ति का उदय होता है जिसकी तुम्हें कोई भी धारणा नहीं हो सकती। तुम सिर्फ द्वंद्वों की सोच सकते हो। तुम यह सोच भी नहीं सकते कि बुद्ध किस भांति के मनुष्य हैं कि उन्हें क्या घटित हुआ है। उनमें समस्त ऊर्जा अस्तित्व के एक सर्वथा भिन्न तल पर आ खड़ी हुई है। कीचड़ कमल बन गया है। लेकिन वह है। कीचड़ को कमल से निकाल बाहर नहीं किया गया है, वह रूपांतरित हुआ है।
इसलिए तंत्र तुम्हारी समस्त ऊर्जा को स्वीकार करता है। तंत्र किसी के छोड़े जाने के पक्ष में नहीं है, वह उसे रूपांतरित करने के पक्ष में है। और तंत्र का कहना है कि इस रूपांतरण की ओर पहला कदम स्वीकार है। यह पहला कदम, स्वीकार करने का कदम कठिन है। तुम दिन में कई बार क्रोध करते होगे, लेकिन उस क्रोध को स्वीकारना बहुत कठिन है। क्रोध करना म् बहुत आसान है, लेकिन उसे स्वीकारना बहुत कठिन है। क्यों? क्रोध करने में बहुत कठिनाई नहीं होती है, उसे स्वीकारने में इतनी कठिनाई क्यों होती है?
क्रोध करना उतना बुरा नहीं मालूम पड़ता है जितना बुरा उसे स्वीकारना मालूम पड़ता है। हर आदमी सोचता है कि मैं अच्‍छा आदमी हूं और यह क्रोध क्षणिक है; यह आता है और चला जाता है। वह तुम्हारी प्रतिमा को नष्ट नहीं करता है; तुम अच्छे के अच्छे बने रहते हो। तुम कहते हो, क्रोध बस हो गया। वह तुम्हारे अहंकार को नहीं नष्ट करता है।
इसलिए जो लोग चालाक हैं वे तुरंत पश्चात्ताप कर लेते हैं। वे क्रोध करेंगे और फिर पश्चात्ताप कर लेंगे। वे क्षमा मांग लेंगे। मैं उन्हें चालाक क्यों कहता हूं? क्योंकि उनका क्रोध उनकी प्रतिमा को कंपा देता है। वे बेचैन अनुभव करने लगते हैं, वे समझते हैं कि मैं इतना बुरा हूं कि क्रोध करता हूं। इसलिए उसकी अच्छे आदमी होने की प्रतिमा कांपने लगती है। और उसे पुनर्स्थापित करना है। इसलिए वह कहता है कि यह बुरा हुआ, ऐसा फिर मैं नहीं करूंगा, मुझे क्षमा करें। और क्षमा मांगकर उसकी प्रतिमा पुनर्स्थापित हो जाती है। वह फिर दुरुस्त है, ठीक है; क्रोध के पहले की अवस्था में वापस चला गया है। क्षमा मांगकर उसने अपने क्रोध को बराबर कर दिया, अपने को बुरा कहकर उसने अपनी भलमनसी वापस पा ली।
यही कारण है कि तुम जन्मों—जन्मों तक क्रोधी बने रहते हो, कामी बने रहते हो, कब्जा जमाते रहते हो, या यह—वह करते रहते हो, लेकिन कभी उन्हें स्वीकार नहीं करते। यही मन की चालाकी है। यह जो भी तुम करते हो वह परिधि पर है, केंद्र पर तुम भले बने रहते हो।
अगर तुम स्वीकार कर लो कि मैं क्रोधी हूं तो तुम केंद्र पर बुरे हो जाते हो। तब यह महज करने का सवाल नहीं रह जाता, तब यह क्षणिक नहीं रहता, तब क्रोध तुम्हारी संरचना का हिस्सा हो जाता है। तब ऐसा नहीं है कि कोई तुम्हें क्रोध करने को उत्तेजित करता है, तब तुम अकेले भी हो तो क्रोध में हो। जब तुम क्रोध नहीं कर रहे हो तब भी क्रोध है, क्योंकि क्रोध तुम्हारी ऊर्जा है, तुम्हारा अंग है। ऐसा नहीं है कि क्रोध कभी—कभी भड़कता है और फिर शांत हो जाता है। नहीं, अगर वह सदा मौजूद नहीं है तो भड़केगा कैसे?
तुम इस बल्व को बुझा सकते हो, फिर जला सकते हो, लेकिन विद्युत—प्रवाह को वहा सतत रहना चाहिए। अगर प्रवाह नहीं है तो तुम जला—बुझा नहीं सकते। उसी तरह क्रोध का प्रवाह सदा मौजूद है; कामवासना का प्रवाह सदा मौजूद है; लोभ का प्रवाह सदा मौजूद है। उन्हें भी तुम जलाते—बुझाते रहते हो। बाह्य स्थितियों में तुम बदलते हो, अंतर—स्थिति में तुम वही के वही रहते हो।
स्वीकार का अर्थ है कि क्रोध कृत्य नहीं है, तुम ही क्रोध हो। कामवासना कृत्य नहीं है, तुम ही कामवासना हो। लोभ कृत्य नहीं है, तुम ही लोभ हो। इसे स्वीकार करने का अर्थ है, अपनी प्रतिमा को उखाड़ फेंकना। और हम सबने अपनी सुंदर प्रतिमाएं बना रखी हैं। हरेक ने अपनी— अपनी सुंदर, अत्यंत सुंदर प्रतिमाएं बना रखी हैं। और तुम जो भी करते हो उससे वे प्रतिमाएं एकदम अछूती रह जाती हैं। तुम उन्हें बचाए चलते हो। और जब प्रतिमा सुरक्षित है तो तुम प्रसन्न महसूस करते हो। यही कारण है कि तुम क्रोध करते हो, कामवासना में उतरते हो, और उससे विचलित नहीं होते। लेकिन अगर तुम स्वीकार कर लो और कहो कि मैं कामवासना हूं मैं क्रोध हूं मैं लोभ हूं तो तुम्हारी प्रतिमा तत्‍क्षण बिखर जाती है।
तंत्र कहता है कि तुम जो भी हो उसे स्वीकारना पहला कदम है, और सबसे कठिन कदम है। कभी—कभी हम स्वीकारने की कोशिश भी करते हैं, लेकिन जब भी यह कोशिश करते है तो बहुत हिसाब—किताब के साथ करते है। हमारी चालाकी गहरी और सूक्ष्‍म है और मन के धोखा देने के ढंग भी बड़े सूक्ष्म हैं।
कभी—कभी तुम स्वीकारते हो और कहते हो कि ही, मैं क्रोध में हूं। लेकिन यह स्वीकार तभी करते हो जब सोचते हो कि क्रोध से कैसे मुक्त हुआ जाए। तब तुम स्वीकारते हुए कहते हो, ठीक है, मैं क्रोध में हूं; अब बताओ कि इसके ऊपर कैसे उठा जाए? तुम कामवासना से छूटने के लिए कामवासना को स्वीकार करते हो। जब भी तुम कुछ और होने की कोशिश करते हो तो तुम स्वीकार करते हो, क्योंकि तब भविष्य के द्वारा तुम्हारी प्रतिमा सुरक्षित रह जाती है। तुम हिंसक हो और तुम अहिंसक होने की चेष्टा कर रहे हो। इसलिए तुम स्वीकार करते हो कि मैं हिंसक हूं आज मैं हिंसक हूं लेकिन कल अहिंसक हो जाऊंगा।
लेकिन तुम अहिंसक कैसे हो जाओगे? इस तरह तुम अपनी प्रतिमा को भविष्य के लिए स्थगित करते हो, बचा लेते हो। तुम अपने को वर्तमान में नहीं सोचते; तुम सदा आदर्श की भाषा में, अहिंसा, प्रेम और करुणा की भाषा में सोचते हो। और तब तुम भविष्य में होते हो। यह वर्तमान तो तुरंत अतीत हो जाने वाला है। तुम्हारा असली रूप तो भविष्य में है, इसलिए तुम आदर्शों के साथ तादाक्य किए जाते हो।
वे आदर्श भी यथार्थ को, हकीकत को अस्वीकृत करने के ढंग हैं। तुम हिंसक हो, यह यथार्थ है। और सिर्फ वर्तमान का अस्तित्व है, भविष्य कहीं है नहीं। तुम्हारे सब आदर्श मात्र सपने हैं। वे मन को स्थगित करने के, मन को कहीं और बांधे रखने के ढंग भर हैं।
तुम हिंसक हो, यह यथार्थ है। इसलिए इसे स्वीकार कर लो। और अहिंसक बनने की चेष्टा छोड़ दो। कोई हिंसक चित्त अहिंसक नहीं हो सकता है। यह कैसे संभव है? अपने भीतर गहरे देखो। तुम हिंसक हो, अहिंसक कैसे हो सकते हो? तुम जो भी करोगे वह हिंसक आदमी का कृत्य होगा। अहिंसक होने का प्रयास भी हिंसक मन का ही प्रयास होगा। तुम हिंसक हो, इसलिए अहिंसक होने की चेष्टा में भी तुम हिंसक ही रहोगे। अहिंसक होने की चेष्टा में ही तुम हर तरह की हिंसा करोगे।
यही कारण है कि तुम अहिंसा के साधकों के पास जाते हो। वे दूसरों के साथ तो हिंसा नहीं करते, लेकिन अपने साथ हिंसा कर रहे हैं। वे अपने प्रति बहुत हिंसापूर्ण हैं, वे आत्महत्या कर रहे हैं। और वे जितने ही पागलपन के साथ अपने खिलाफ होते हैं वे उतने ही पूजे जाते हैं। और जब वे पूरी तरह पागल हो जाते हैं तो समाज कहता है कि वे संत हैं।
लेकिन उन्होंने सिर्फ हिंसा के विषय बदल लिए हैं। पहले वे औरों के साथ हिंसा करते थे, अब अपने साथ कर रहे हैं, लेकिन हिंसा कायम है। और इस हिंसा में एक और सुविधा है। जब तुम दूसरे के साथ हिंसा करते हो तो कानून, अदालत, समाज सब उसकी रक्षा को आ सकते हैं, लेकिन जब तुम अपने साथ हिंसा करते हो तो कोई कानून नहीं है। तब कोई कानून तुम्हें तुमसे नहीं बचा सकता। जब आदमी अपने ही विरुद्ध होता है तब कोई बचाव नहीं है। दूसरा कोई चिंता भी नहीं लेता, क्योंकि यह तुम्हारा मामला है। कोई दूसरा इसमें सम्मिलित नहीं है, यह बिलकुल तुम्हारा निजी मामला है। तथाकथित साधु—संत अपने ही प्रति हिंसक हैं। किसी को क्या पड़ी है? वे कहते हैं, तुम जानो, तुम्हारा काम जाने।
अगर तुम्हारा मन लोभी है तो तुम अलोभी कैसे हो सकते हो? लोभी मन लोभी ही रहेगा। वह लोभ के पार जाने के लिए जो भी करेगा उससे कुछ होने वाला नहीं हे। ही, हम नए लोभ पैदा कर लेंगे। किसी लोभी आदमी से पूछो कि क्‍या कर रहे हो। सिर्फ धन कमा रहे हो? मर जाओगे और यह धन यहीं पड़ा रह जाएगा।
यही सारे तथाकथित धर्मगुरुओं का तर्क है—कि तुम अपने साथ अपना धन नहीं ले जा सकते। लेकिन अगर कोई धन साथ ले जा सके तो तुम्हारा सारा तर्क व्यर्थ हो जाता है। लोभी आदमी को भी यह तर्क जंचता है। वह भी कहता है कि धन हम अपने साथ नहीं ले जा सकेंगे। लेकिन वह ले जाना तो चाहता ही है। और यही कारण है कि पुरोहित प्रभावी हो जाता है। वह उसे बताता है कि जो चीजें मृत्यु के बाद साथ नहीं जाने वाली हैं उनका परिग्रह व्यर्थ है, मैं तुम्हें वे चीजें बताता हूं जो साथ जा सकती हैं। पुण्य साथ जा सकता है, अच्छाई साथ जा सकती है, लेकिन धन नहीं। इसलिए धन दान कर दो।
लेकिन यह भी तो उसके लोभ को ही उकसाना हुआ। उसे यह कहना हुआ कि अब हम तुम्हें ऐसी चीजें देते हैं जो मृत्यु के पार जा सकती हैं। और यह उपदेश नतीजा लाता है। लोभी आदमी सोचता है कि उपदेशक सही कहता है। मौत है, और उसके साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता; इसलिए मुझे कुछ ऐसा करना होगा जो मृत्यु के पार जा सके। मुझे परलोक के लिए किसी तरह का बैंक—बैलेंस जमा करना होगा, क्योंकि इस लोक की संपदा सदा साथ नहीं रह सकती है। वह इसी भाषा में सोचता है।
तुम शास्त्रों को पढ़ो, वे तुम्हारे लोभ को उकसा रहे हैं। वे कहते हैं कि क्षणभंगुर सुखों के पीछे क्यों समय व्यय कर रहे हो! जोर क्षणभंगुर पर है। कुछ शाश्वत सुख की खोज करो। फिर ठीक है। वे सुख के विरुद्ध नहीं हैं, वे क्षणभंगुर सुख के विरुद्ध हैं। इस लोभ को तो देखो।
तो कभी यह हो सकता है तो कि एक लोभरहित आदमी तुम्हें मिल जाए जो क्षणिक सुखों का सुख ले रहा हो, लेकिन तुम्हें तुम्हारे साधु—महात्माओं में कोई न मिलेगा जो शाश्वत सुखों की खोज न करता हो। उनका लोभ तो और भी भारी है। तुम्हें सामान्यजनों के बीच कोई अलोभी मिल भी सकता है, लेकिन तथाकथित साधु—संतों के बीच अलोभी न मिलेगा। वे भी सुख खोजते हैं, लेकिन उनका लोभ बहुत बड़ा है। तुम क्षणभंगुर सुखों से संतुष्ट हो, वे नहीं। उनका लोभ तो शाश्वत सुख से ही तृप्त होगा। ध्यान रहे, असीम लोभ असीम सुख की खोज करता है, सीमित लोभ सीमित सुख से संतुष्ट है।
वे तुम्हें कहेंगे, क्या एक स्त्री को प्रेम करते हो! उसमें खून और हड्डी के सिवाय और क्या है? वे स्त्री के विरोध में नहीं हैं, वे हड्डी और शरीर के विरोध में हैं। अगर स्त्री सोने की हो तो ठीक। वे स्वर्ण—स्त्री की मांग कर रहे हैं। और चूंइक सोने की स्त्री इस दुनिया में नहीं होती, इसलिए वे दूसरी दुनिया निर्मित करते हैं। वे कहते हैं, स्वर्ग में अप्सराएं हैं जिनकी काया सोने की है और जो सदा युवा रहती हैं।
हिंदुओं के स्वर्ग में अप्सराओं की उम्र कभी सोलह साल से ऊपर नहीं जाती। वे कभी की नहीं होतीं, सदा सोलह साल की बनी रहती हैं। तो इन मामूली औरतों के पीछे क्यों समय बर्बाद करते हो? स्वर्ग की सोचो। ये लोग सुख के विरोध में नहीं हैं। असल में वे क्षणभंगुर सुख के विरोध में हैं। अगर किसी झक में परमात्मा इस संसार को शाश्वत सुखों से भर दे, तो तुरंत तुम्हारे धर्म का सारा महल धूल—धूसरित हो जाएगा। तब धर्म का सारा आकर्षण ही जाता रहेगा। अगर किसी तरह बैंक बैलेंस मृत्यु के पार जाए जा सकें तो कोई वहां के बैंक बैलेंस में उत्सुक नहीं होगा। इसलिए तो मृत्यु पुरोहित का भारी सहारा है।
लोभी आदमी सदा दूसरे लोभ से आकर्षित होता है। अगर तुम उससे कहो कि तुम्हारा लोभ तुम्हारे दुखों का कारण है और इसलिए अगर लोभ छोड़ दो तो तुम आनंद को उपलब्ध हो जाओगे, तो वह राजी हो जा सकता है। क्योंकि तुम अब उसके लोभ को नए चरागाह दे रहे हो। वह लोभ के नए आयामों में प्रवेश कर जा सकता है।
इसलिए तंत्र कहता है : लोभी मन अलोभ को नहीं उपलब्ध हो सकता है। लेकिन यह तो बहुत निराशाजनक है। अगर ऐसी बात है तो कुछ भी नहीं किया जा सकता। तब तंत्र चाहता क्या है? अगर लोभी चित्त अलोभ को नहीं प्राप्त हो सकता, अगर हिंसक चित्त अहिंसक नहीं हो सकता और अगर कामुक चित्त कामुकता को नहीं पार कर सकता, अगर कुछ किया ही नहीं जा सकता, तो तंत्र आखिर क्या चाहता है?
तंत्र यह नहीं कहता है कि कुछ भी नहीं किया जा सकता। कुछ किया जा सकता है, लेकिन उसका आयाम सर्वथा भिन्न है। एक लोभी मन को समझना है कि वह लोभी है, और यह उसे स्वीकार करना है। उसे अलोभी होने की चेष्टा में नहीं लगना है। लोभी मन को अपनी गहराई में उतरकर अपने लोभ की गहराई को जानना है। उसे अपने लोभ से पृथक नहीं होना है, उसे उसके साथ—साथ रहना है। उसे आदर्शों में, लोभ के विपरीत आदर्शों में नहीं गति करनी है, बल्कि वर्तमान में रहना है। उसे लोभ में ही गति करनी है, लोभ को ही जानना है, लोभ को ही समझना है। उसे लोभ से किसी भी भांति पलायन नहीं करना है। और अगर तुम अपने लोभ के साथ रह सके तो बहुत सी बातें होंगी। अगर तुम अपने लोभ के साथ, कामवासना के साथ, अपने क्रोध के साथ इस तरह रह सके तो तुम्हारा अहंकार विसर्जित हो जाएगा। यह पहली बात होगी। और यह कितना बड़ा चमत्कार है!
अनेक लोग मेरे पास आते हैं और पूछते हैं कि अहंकार से कैसे मुक्त हुआ जाए? तुम अहंकार से नहीं मुक्त हो सकते, क्योंकि मुक्त होने के लिए तुम्हें अहंकार के आधार को खोजना और पाना होगा। तुम लोभी हो और तुम समझते हो कि मैं अलोभी हूं —यही अहंकार है। अगर तुम लोभी हो और समग्रता से जानते और स्वीकारते हो कि मैं लोभी हूं तो तुम्हारे अहंकार को खड़े होने की जगह कहां रही? अगर तुम क्रोधी हो और कहते हो कि मैं क्रोधी हूं दूसरों से नहीं कहते हो, लेकिन अपने भीतर गहरे महसूस करते हो, अपनी बेबसी महसूस करते हो, तो तुम्हारा क्रोध कहां खड़ा रहेगा? अगर तुम कामुक हो तो यह स्वीकार कर लो। तुम जो भी हो उसे स्वीकार कर लो।
स्वभाव की अस्वीकृति से, तथाता के इनकार से, जो भी तुम हो उससे पलायन से अहंकार का निर्माण होता है। और तुम उसे स्वीकार कर लो तो अहंकार नहीं रहेगा। और अगर उसे नहीं स्वीकार करते हो, इनकार करते हो, उसके विरुद्ध आदर्श निर्मित करते हो तो अहंकार रहेगा। आदर्श ही वह चीज है जिससे अहंकार का निर्माण होता है।
अपने को स्वीकार करो। लेकिन तब तुम जानवर जैसे मालूम पड़ोगे। तब तुम मनुष्य जैसे नहीं मालूम पड़ोगे, क्योंकि तुम्हारी मनुष्य की धारणा तुम्हारे आदर्शों में बसती है। यही कारण है कि हम लोगों को सिखाते हैं कि पशु जैसे मत होओ। और हरेक आदमी पशु है। क्या कर सकते हो? तुम पशु है।
तो अपनी पशुता को स्‍वीकार कर लो। और जिस क्षण तुम अपनी पशुता को स्‍वीकारते हो उसी क्षण तुमने अपनी पशुता से आगे जाने का कदम उठा लिया। क्योंकि कोई पशु नहीं जानता है कि वह पशु है। केवल मनुष्य यह जान सकता है। और वही पार जाना है। तुम इनकार करके, अस्वीकार करके पार नहीं जा सकते। स्वीकार करो। और जब सब स्वीकृत होता है तो तुम अचानक महसूस करते हो कि तुम अतिक्रमण कर गए।
यह कौन है जो स्वीकार करता है? यह कौन है जो समग्र को स्वीकार करता है? जो स्वीकार करता है वह पार चला जाता है। अगर तुम इनकार करते हो तो तुम उसी तल पर पड़े रहते हो। स्वीकार करने से अतिक्रमण करते हो। स्वीकृति अतिक्रमण है।
और अगर तुम समग्रता से स्वीकार करते हो तो तुम अचानक अपने केंद्र पर फेंक दिए जाते हो। तब तुम कहीं नहीं जा सकते; तब तुम अपने तथाता से, अपने स्वभाव से अलग नहीं हो सकते और इसीलिए तुम अपने केंद्र पर फेंक दिए जाते हो। जिन तांत्रिक विधियों की हम यहां चर्चा कर रहे हैं वे तुम्हें तुम्हारे केंद्र पर फेंकने के अलग— अलग उपाय हैं।
और तुम अनेक—अनेक ढंगों से अपने केंद्र से बचने की चेष्टा कर रहे हो। आदर्श इस बचाव के, पलायन के बहुत अच्छे उपाय हैं। आदर्शवादी सब से सूक्ष्म रूप से अहंकारी लोग होते हैं। इसमें बहुत सी बातें हैं।
तुम हिंसक हो और तुम अहिंसा का आदर्श निर्मित करते हो। तब तुम्हें अपने भीतर अपनी हिंसा में जाने की, उसे देखने की जरूरत न रही। तब इतना ही जरूरी है कि तुम अहिंसा के संबंध में सोचो, अहिंसा के संबंध में पढ़ो और अहिंसा का अभ्यास करो। तुम अपने को कहते हो कि हिंसा के पास भी नहीं जाना है, और तुम हिंसक हो। इसलिए तुम अपने से, स्वयं से पलायन कर सकते हो। तब तुम परिधि पर पहुंच सकते हो। लेकिन अब तुम केंद्र पर कभी न आ सकोगे। यह एक बात हुई।
दूसरी बात कि जब तुम अहिंसा का आदर्श निर्मित करते हो तब तुम दूसरों की निंदा कर सकते हो। अब यह बहुत आसान काम है। अब तुम्हारे पास हरेक के संबंध में निर्णय लेने का मापदंड है। वह आदर्श है। अब तुम हरेक से कह सकते हो कि तुम हिंसक हो।
भारत ने ऐसे अनेक आदर्श खड़े किए हैं। यही वजह है कि भारत निरंतर समूचे संसार की निंदा से भरा है। वह सारे संसार को निंदित कर रहा है। सब कोई हिंसक है, केवल भारत अहिंसक है। सच तो यह है कि यहां कोई भी अहिंसक नहीं है। लेकिन दूसरों की निंदा करने के लिए आदर्श एक अच्छा नुस्सा है। इससे तुम नहीं रूपांतरित होते हो, लेकिन तुम दूसरों की निंदा तो कर सकते हो। क्योंकि तुम्हारे पास आदर्श है, मापदंड है। और जब तुम खुद हिंसा करते हो तो तुम उसके इर्द—गिर्द तर्कजाल खड़े कर सकते हो। तुम कहते हो, मेरी हिंसा कुछ और चीज है।
पिछले पच्चीस वर्षों में हम अनेक बार हिंसा पर उतरे, लेकिन हमने कभी उसकी निंदा नहीं की। सदा हमने सुंदर शब्दों में उसका बचाव और समर्थन किया। अगर हम बंगलादेश में हिंसा करते हैं तो कहते हैं कि हम वहां के लोगों को स्वतंत्र होने में सहायता कर रहे हैं। अगर काश्मीर में हिंसा करते हैं तो वह काश्मीरियों की सहायता के लिए करते हैं।
लेकिन तुम्‍हें पता होगा कि सभी युद्धखोर यही भाषा बोलते है। अगर अमेरिका वियतनाम में हिंसा कर रहा है तो वह वहा के गरीबों के लिए कर रहा है। कोई अपने लिए थोड़े ही हिंसा करता है, हमेशा दूसरों के लिए करता है। अगर मैं तुम्हारी हत्या भी कर दूं तो यह तुम्हारे ही हित के लिए करूंगा, तुम्हारी मदद में करूंगा। अगर तुम मर भी गए और मेरे हाथ से मरे तो भी तुम्हें मेरी करुणा पर निगाह रखनी पड़ेगी। तुम्हारे ही हित के लिए मैं तुम्हारी हत्या भी कर सकता हूं।
इस तरह तुम सारे संसार की निंदा किए चले जाते हो। जब भारत ने गोआ पर आक्रमण किया और चीन के साथ युद्ध किया तो बर्ट्रेंड रसेल ने नेहरू की आलोचना की और पूछा कि अब तुम्हारी अहिंसा कहां गई? तुम सब गाधीवादी हो; तुम्हारी अहिंसा का क्या हुआ?
नेहरू ने भारत में बर्ट्रेंड रसेल की पुस्तक पर प्रतिबंध लगाकर उसका जवाब दिया। रसेल ने जो किताब लिखी थी, उस पर नेहरू ने पाबंदी लगा दी, यही हमारी अहिंसा है। यह एक बढ़िया विवाद बन सकता था। वह किताब भारत में मुफ्त बांटी जानी चाहिए थी, क्योंकि रसेल ने सुंदर विवाद खड़ा किया था। उसने कहां था तुम हिंसक हो; तुम्हारी अहिंसा महज राजनीतिक है। तुम्हारे गांधी महात्मा नहीं थे, वे एक कूटनीतिज्ञ थे। तुम सब अहिंसा की बात करते हो, लेकिन जब मौका आता है तो तुम हिंसक हो जाते हो। और जब दूसरे लड़ते हैं तब तुम ऊंचे मंच पर खड़े होकर सारी दुनिया को हिंसक कहकर उसकी निंदा करते हो।
व्यक्ति, समाज, संस्कृति, राष्ट्र, सबके साथ यही होता है। अगर तुम आदर्शवादी हो, तो तुम्हें खुद को बदलने की जरूरत न रही। तुम हमेशा इस आशा में रहोगे कि वे आदर्श तुम्हें भविष्य में बदल देंगे। और ऐसे तुम आसानी से दूसरों की निंदा कर सकते हो।
तंत्र कहता है : अपने साथ रहो, जो भी तुम हो उसे स्वीकार करो। न अपनी निंदा करो और न दूसरों की। निंदा निरर्थक है। उससे ऊर्जा का रूपांतरण नहीं होता। इसलिए पहला कदम स्वीकार है। तथ्य के साथ जीयो। यह बहुत वैज्ञानिक बात है। क्रोध, लोभ और कामवासना के तथ्य के साथ जीयो और उन्हें उनकी पूरी तथ्यता में जानो। उन्हें बस ऊपर—ऊपर, सतह पर छूकर मत छोड़ दो, बिलकुल उनकी जड़ में उतरो।
और याद रहे, जब तुम किसी चीज की जड़ में उतरते हो तो तुम उसका अतिक्रमण कर जाते हो। अगर तुम अपनी कामवासना को उसकी जड़ों तक जान लो तो तुम उसके मालिक हो जाओगे। अगर क्रोध को उसकी जड़ों तक जान लो तो तुम क्रोध के मालिक हो जाओगे। तब क्रोध साधन बन जाता है। और तुम उसका उपयोग कर सकते हो।
मुझे गुरजिएफ की अनेक बातें याद आती हैं। गुरजिएफ अपने शिष्यों को सही ढंग से, सम्यक रूप से क्रोध करना सिखाता था। उसकी यह शिक्षा पुरानी तंत्र परंपरा से प्रभावित थी। पश्चिम में गुरजिएफ की बहुत निंदा हुई, क्योंकि पश्चिम में वह तंत्र का जीवंत प्रतीक था। वह सम्यक क्रोध सिखाता था।
गुरजिएफ सिखाता था कि कैसे सम्यकरूपेण क्रोध किया जाए। अगर तुम्हें क्रोध आए तो वह कहेगा : पूरी तरह क्रोध करो; उसे दबाओ मत, उसे उसकी समग्रता में प्रकट होने दो, उसमें पूरी तरह उतर जाओ और क्रोध ही बन जाओ।
गुरजिएफ कहेगा : क्रोध को रोको मत; उसके बाहर मत खड़े रहो, उसकी गहराई में कूद पड़ो, तुम्हारे समूचे शरीर को अंगार बन जाने दो।
कभी किसी को तुमने क्रोध की इस गहराई में उतरते नहीं देखा होगा। कभी तुमने खुद भी इस तरह क्रोध नहीं किया होगा। क्योंकि कमोबेश हर आदमी सुसंस्कृत है; कोई भी मौलिक नहीं है, हर आदमी अनुकरण कर रहा है, नकल कर रहा है। अगर तुम क्रोध में समग्रता से उतर सके, तो तुम दहकती आग बन जाओगे। और वह आग इतनी गहरी होगी, उसकी ज्वाला इतनी गहरी होगी कि अतीत और भविष्य दोनों उसमें विलीन हो जाएंगे, तुम मात्र वर्तमान की ज्वाला बनकर रह जाओगे। और जब तुम्हारा कोश—कोश आग हो जाएगा और तुम मात्र क्रोध ही होकर रह जाओगे, तब गुरजिएफ कहेगा. अब सजग हो जाओ, बोधपूर्ण हो जाओ; दमन मत करो, जागो। अब अचानक होशपूर्वक देखो कि तुम क्या हो गए हो! देखो कि यह क्रोध क्या है!
इस समग्र उपस्थिति के क्षण में तुम अचानक जाग सकते हो और पूरी बात की व्यर्थता पर, उसकी मूढ़ता पर, बेवकूफी पर हंस सकते हो। यह दमन नहीं है, यह हंसी है। तुम अपने पर हंस सकते हो, क्योंकि तुम अपना अतिक्रमण कर चुके हो। क्रोध अब फिर कभी तुम पर मालकियत नहीं कर सकेगा। तुमने क्रोध को उसकी संपूर्णता में जान लिया। अब तुम उस पर हंस सकते हो, अब तुम उसके पार जा सकते हो। तुम अब पार से अपने ही क्रोध को देख सकते हो। और यदि तुमने एक बार उसे उसकी समग्रता में देख लिया तो तुमने जान लिया कि क्रोध क्या है। और अब तुम यह भी जानते हो कि अगर समूची ऊर्जा भी क्रोध में बदल जाए तो भी तुम उसके द्रष्टा बने रह सकते हो। इसलिए अब डर की कोई बात न रही।
यह याद रहे कि जो ज्ञात नहीं है, अज्ञात है, वह सदा भय पैदा करता है, जो अंधेरे में है, वह हमेशा भयभीत करता है।
तुम अपने क्रोध से भयभीत हो, डरे हो। लोग कहते हैं कि हम अपने क्रोध को इसलिए दबाते हैं कि क्रोध करना अच्छा नहीं है, उससे दूसरे को चोट लगती है। लेकिन यह असली कारण नहीं है। असली कारण है कि वे अपने क्रोध से भयभीत हैं। अगर वे सच में क्रोधित हो जाएं तो क्या होगा, इसका उन्हें पता नहीं है। वे अपने आप से डरे हुए हैं, भयभीत हैं। उन्होंने कभी क्रोध को नहीं जाना है। यह उनके भीतर छिपी हुई एक डरावनी चीज है, वे डरे हुए हैं। यही कारण है कि वे समाज, संस्कृति, शिक्षा के पीछे—पीछे हो लेते हैं और कहते हैं कि हमें क्रोध नहीं करना चाहिए; क्रोध बुरा है, उससे दूसरों को दुख होता है।
तुम अपने क्रोध से भयभीत हो, तुम अपनी कामवासना से भयभीत हो। तुम कभी समग्र रूप से काम—कृत्य में नहीं उतरे, तुम कभी इस समग्रता से संभोग में नहीं उतरे कि अपने को भूल गए हो। तुम हमेशा वहां मौजूद थे, तुम्हारा मन मौजूद था। और अगर काम—कृत्य में तुम्हारा मन मौजूद है तो वह कृत्य सदा झूठा होगा, नकली होगा। मन को वहां विसर्जित होना चाहिए; तुम्हें मात्र शरीर रह जाना चाहिए। वहां किसी तरह का सोच—विचार नहीं चलना चाहिए। अगर विचार चलता है तो तुम विभाजित हो गए। तब तुम्हारा काम—कृत्य अतिरिक्त ऊर्जा का स्खलन मात्र होकर रह जाएगा। वह स्खलन से ज्यादा कुछ नहीं होगा।
लेकिन तुम काम—कृत्य में समग्रता के साथ उतरने में डरते हो। और इसी वजह से तुम समाज की मानकर चलते हो और कहते हो कि कामवासना बुरी है। तुम भयभीत हो। लेकिन तुम भयभीत क्‍यों हो?
तुम भयभीत हो, क्योंकि अगर तुम समग्रता से संभोग में उतरे तो तुम क्या कर गुजरोगे, इसका तुम्हें कुछ पता नहीं है। तब क्या होगा, यह भी तुम्हें नहीं मालूम है। तब कौन सा पशुबल जागेगा, यह तुम नहीं जानते हो। और तुम नहीं जानते हो कि तुम्हारा अचेतन तुम्हें उठाकर कहां फेंक देगा। तुम्हें कुछ नहीं मालूम है। तब तुम अपने मालिक नहीं रहोगे, तब तुम्हारा नियंत्रण जाता रहेगा। और तब तुम्हारी प्रतिमा भी नष्ट हो जाएगी। इसीलिए तुम काम—कृत्य पर नियंत्रण रखते हो। और नियंत्रण रखने का उपाय है कि मन से तुम मौजूद रही। काम—कृत्य तो हो, लेकिन महज स्थानीय रहे।
इस 'स्थानीय और समग्र' को समझने की कोशिश करो। तंत्र कहता है कि जब सिर्फ तुम्हारा काम—केंद्र काम—कृत्य में संलग्न होता है तब वह कृत्य स्थानीय है। वह स्थानीय है, स्थानीय स्खलन है। काम—केंद्र निरंतर ऊर्जा इकट्ठी कर रहा है, और जब वह ऊर्जा अतिशय हो जाती है तो तुम्हें उसे निकास देना पड़ता है। अन्यथा वह ऊर्जा तनाव पैदा करेगी, बोझिल हो जाएगी। इसलिए तुम उसका स्खलन कर देते हो। लेकिन वह स्थानीय स्खलन है। उसमें तुम्हारा समूचा शरीर, समूचे तुम सम्मिलित नहीं होते हो।
गैर—स्थानीय यानी समग्र काम—कृत्य का अर्थ है कि उसमें तुम्हारे शरीर का एक—एक रेशा, एक—एक कोश, समूचे तुम सम्मिलित होते हो। काम—केंद्र ही नहीं, तुम्हारा पूरा अस्तित्व कामुक हो उठा है; समूचा अस्तित्व काममय हो गया है।
लेकिन तुम भयभीत हो, डरे हुए हो। क्योंकि उस हालत में कुछ भी हो सकता है। और तुम्हें नहीं मालूम है कि क्या होगा, क्योंकि तुमने कभी समग्रता को नहीं जाना है। तब तुम कुछ भी कर सकते हो जिसको तुम सोच भी नहीं सकते। उसमें तुम्हारे अचेतन का विस्फोट हो सकता है। तुम एक नहीं अनेक पशु एक साथ हो जा सकते हो, क्योंकि तुम अनेक जीवनों से गुजर चुके हो, अनेक पशु —जीवनों से। तुम चीखने—चिल्लाने लग सकते हो, तुम सिंह की भांति दहाड़ने लग सकते हो। तुम नहीं जानते कि क्या हो सकता है। कुछ भी संभव है। और उससे भय पैदा होता है।
इसीलिए तुम नियंत्रण में रहते हो और किसी भी कृत्य में अपने को पूरी तरह नहीं खोते। और उसका नतीजा यह होता है कि तुम कभी कुछ नहीं जानते हो। और जाने बिना अतिक्रमण नहीं हो सकता है।
स्वीकार करो। गहरे उतरो और बिलकुल जड़ों तक जाओ। यही तंत्र है। तंत्र गहन अनुभव की हिमायत करता है। जिसका अनुभव ले लिया जाता है, उसका अतिक्रमण हो जाता है। और जिसका दमन करोगे, उसका अतिक्रमण कभी नहीं हो सकता।

आज इतना ही।