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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

जाति-स्‍मरण: गुप्त सूत्रों का रहस्‍य (1 )


जाति-स्‍मरण अर्थात पिछले जन्‍मों की स्‍मृतियों में प्रवेश की विधि पर आपके द्वारा शिविर में चर्चा की है। आपने कहा है कि चित को भविष्‍य की दिशा से पूर्णत: तोड़ कर ध्‍यान की शक्‍ति को अतीत की और फोकस करके बहाना चाहिए। प्रक्रिया का क्रम आपने बताया। पहले पाँच वर्ष की स्‍मृति में, फिर तीन वर्ष की स्‍मृति में, फिर जन्‍म की स्‍मृति में, फिर गर्भाधान की स्‍मृति में लौटना, फिर पिछले जन्‍म की स्‍थिति में प्रवेश होता है। पूरे सूत्र क्‍या है? आगे के सुत्र का कुछ स्‍पष्‍टीकरण करने की कृपा कीजिएगा?
          पिछले जन्‍म की स्मृतियाँ प्रकृति की और से रोकी गई है। प्रयोजन है उनके रोकने का जीवन की व्‍यवस्‍था में जिसे हम रोज-रोज जानते है, जीते है, उसका भी अधिकतम हिस्‍सा भूल जाए, यह जरूरी है। इसलिए आप इस जीवन की भी जितनी स्मृतियाँ बनाते है। उतनी स्मृतियाँ याद नहीं रखते। जो आपको याद नहीं है, वह भी आपकी स्‍मृति से मिट नहीं  जाती। सिर्फ आपकी चेतना और उस स्‍मृति का संबंध छूट जाता है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

बैताल पचीसी—अद्भुत अध्‍यात्‍म रहस्‍य कथाएं (2)

  
 किसी तरह नाक को अवरूद्ध कर के वृक्ष पर चढ़ा। हाथ-पैर कंप रहे थे । वृक्ष पर चढ़ना भी बहुत मुश्‍किल था। किसी तरह उस लाश की डोरी काटी। वह लाश जमीन पर धम्‍म से नीचे गिरी, न केवल गिरी , बल्‍कि खिलखिला कर हंसी। विक्रमादित्‍य के प्राण निकल गये होगें। सोचा था मुर्दा है, वह जिंदा मालूम होता है। और जिंदा भी अजीब हालत में। घबड़ाया हुआ नीचे आया। और उससे पूछा क्‍यों हंसे? क्‍या मामला है।
         बस, इतना कहना था कि लाश उड़ी वापस जाकर वृक्ष पर लटक गई थी। और लाश ने कहा कि शांत होना, तो ही तुम मुझे उस फकीर तक ले जा सकते हो। तुम बोले और चुक गये।

बैताल पचीसी—अद्भुत अध्‍यात्‍म रहस्‍य कथाएं( 1 )

 
तुमने बैताल पच्चीसी का नाम सुना होगा। तुम कभी सोच भी नहीं सकते कि वह भी कोई ज्ञानियों की बात हो सकती है। बैताल पच्चीसी। पर इस देश ने बड़े अनूठे प्रयोग किए है। इस देश ने ऐसी किताबें लिखी है, जिनको बहुत तलों पर पढ़ा जा सकता है। जिनमें पर्त दर पर्त अलग-अलग रहस्‍य और अर्थ है। जिनमें एक साथ दो, तीन, चार या पाँच अर्थ एक साथ दौड़ते रहते है। जैसे एक साथ पाँच रास्‍ते चल रहे हो। पैरेलल, समानांतर।

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

उद्दालक और श्‍वेतकेतु—(कथा यात्रा-007)

उद्दालक और श्‍वेतकेतु

उपनिषद में कथा है:- उद्दालक का बेटा श्‍वेतकेतु ज्ञान लेकर घर लौटा; विश्‍वविद्यालय से घर आया। बाप ने देखा, दूर गांव की पगडंडी से आते हुए। उसकी चाल में मस्‍ती कम और अकड़ ज्‍यादा थी। सुर्य पीछे से उग रहा था। अंबर में लाली फेल रही थी। पक्षी सुबह के गीत गा रहे थे। पर उद्दालक सालों बाद अपने बेटे को घर लोटते देख कर भी उदास हो गया। क्‍योंकि बाप ने सोचा था विनम्र होकर लौटेगा। वह बड़ा अकड़ा हुआ आ रहा था। अकड़ तो हजारों कोस दूर से ही खबर दे देती है अपनी। अकड़ तो अपनी तरंगें चारों तरफ फैला देती है। वह ऐसा नहीं आ रहा था की कुछ जान का आ रहा है। वह ऐसे आ रहा था जैसे मूढ़ता से भरा हुआ। ऊपर-ऊपर ज्ञान तो संग्रहीत कर लिया है। पंडित होकर आ रहा है। ज्ञानी होकर आ रहा है। विद्वान होकर आ रहा है। प्रज्ञावान होकर नहीं आ रहा। ज्ञानी हो कर नहीं आ रहा। कोई अपनी समझ की ज्‍योति नहीं जली है। अंधेरे शास्‍त्रों का बोझ लेकर आ रहा है। बाप दुःखी और उदास हो गया!

   बेटा आया, उद्दालक ने पूछा कि क्‍या–क्‍या तू सीख कर आया?

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सोमरस

जो श्रेष्‍ठतम हे, उसे वेदों ने सोमरस कहा है। सदिया हो गई, न मालूम कितने लोग सोमरस की तलाश में रहे है। वैज्ञानिक हिमालय की खाइयों में,  पहाड़ियों में, सोमरस किस पौधे से पैदा होता था, उसकी अनथक अन्वेषण करते रहे है। अब तक कोई जान नहीं पाय कि सोमरस कैसे पैदा होता था? सोमरस क्‍या था?

सोमवार, 9 अगस्त 2010

मूर्तिपूजा-व्‍यक्‍तिपूजा:-- (कमजोरी व कायरता)

बुद्ध ने कहां था, अपने शिष्‍यों से कि मेरी मूर्ति मत बनाना। आज जमीन पर बुद्ध की जितनी मूर्तियां है। उतनी किसी दूसरे आदमी की नहीं। अकेले बुद्ध की इतनी मूर्तियां है, जितने किसी दूसरे आदमी की नहीं। उर्दू में तो बुत शब्‍द बुद्ध का ही बिगड़ा हुआ रूप है। बुद्ध का मतलब ही मूर्ति हो गया। बुद्ध की इतनी मूर्तियां बनीं कि बुद्ध का मतलब ही मूर्ति हो गया। एक-एक मंदिर में दस-दस हजार बुद्ध की मूर्तियां है।
      चीन में एक मंदिर है, दस हजार मूर्तियों वाला मंदिर। उसमें बुद्ध की दस हजार मूर्तियां हैं। और बुद्ध ने कहां की मेरी पूजा मत करना।

सत्यह शब्दों में नहीं—गुरु के चरणों में नहीं—



धर्म का सबसे बुनियादी प्रश्‍न ईश्‍वर नहीं है। धर्म का सबसे ज्‍यादा प्रश्‍न स्‍वयं का होना है।
      सत्‍य की यात्रा बाहर की तरफ नहीं है। सत्‍य की यात्रा भीतर की तरफ है। बाहर जो यात्रा चल रही है, खोज चल रही है, उससे सत्‍य कभी भी उपलब्‍ध नहीं होता। ज्‍यादा से ज्‍यादा काम-चलाऊ बातें ज्ञात हो सकती है।

रविवार, 8 अगस्त 2010

ओशो की विश्‍व यात्रा—2

बुद्ध की जन्‍म स्‍थली नेपाल में—

     3 जनवरी, 1986 को काठमांडू एयरपोर्ट पर नई दिल्‍ली से आने वाली पहली उड़ान का इंतजार बड़े जोश-खरोश से चल रहा था। विशिष्‍ट व्‍यक्‍तियों के स्‍वागत की नेपाली परंपरा के अनुसार पानी से भरे 108 कलश एयरपोर्ट के आगमन द्वार से पार्किग एरिया तक दो क़तारों में लगे हुए थे—और उनके पीछे सैकड़ों पूरबी पश्‍चिमी संन्यासियों का समूह नाच गा रहा था। रंग बिरंगी तख्‍तियां गर्व से घोषणा कर रही थी—‘’बुद्ध की धरती नए बुद्ध का स्‍वागत करती है।‘’

ओशो की विश्‍व यात्रा—1

29 अक्‍तूबर 1985 को जब अमरीका की सरकार ने बिना किसी अपराध और बिना किसी वारंट के ओशो को गिरफ्तार कर लिया-–तो प्रताड़ना से भरे उन बाहर दिनों में—एक बात स्‍पष्‍ट हो गई कि रोनाल्ड रीगन और उसकी सरकार ओशो की क्रांतिकारी आवाज को बंद करने के लिए किसी भी हद को पार कर सकती है। ऐसी स्‍थिति में ओशो के मित्रों ने उनसे प्रार्थना की अमरीका में रहकर पाखंडों के खिलाफ अपनी लड़ाई जानी रखने की बजाएं भारत लौट चलें। जहां वे शारीरिक रूप से अधिक सुरक्षित रह सकेंगे।
     14 नवंबर, अमरीका की धरती ने ओशो को अंतिम प्रणाम किया। जैट स्‍टार 731 पर सवार होकर ओशो नई दिल्‍ली की और रवाना हो गए।
     लेकिन ओशो के लिए यह यात्रा अपनी जन्‍मभूमि पर वापस लौटने की यात्रा नहीं थी। वरन, यह शुरूआत थी उस ऐतिहासिक विश्‍व यात्रा की, जिसमें 46,000 मील का आकाश नाप कर उन्‍होंने विश्‍व के उन सब बड़े-बड़े देशों का पर्दाफाश किया जो लोकतांत्रिक होने का दावा करते है। एक निहत्‍था,कोमल-सा-व्‍यक्‍ति सिर्फ अपने हवाई जहाज पर बैठा-बैठा ही बड़े से बड़े बम बनाने वाली सरकारों को कंप कँपाता रहा—और हंसता रहा। चलो चल हम भी उस यात्रा पर.......

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

संत भर्तृहरि—

   
 भर्तृहरि ने घर छोड़ा। देखा लिया सब। पत्‍नी का प्रेम, उसका छलावा, अपने ही हाथों आपने छोटे भाई विक्रमादित्‍य की हत्‍या का आदेश। मन उस राज पाठ से वैभव से थक गया। उस भोग में केवल पीड़ा और छलावा ही मिला। सब कुछ को खूब देख परख कर छोड़ा। बहुत कम लोग इतने पककर छोड़ते है इस संसार को जितना भर्तृहरि ने छोड़ा है। अनूठा आदमी रहा होगा भर्तृहरि। खूब भोगा। ठीक-ठीक उपनिषद के सूत्र को पूरा किया: ‘’तेन त्‍यक्‍तेन भुंजीथा:।‘’ खूब भोगा। एक-एक बूंद निचोड़ ली संसार की। लेकिन तब पाया कि कुछ भी नहीं है। अपने ही सपने है, शून्‍य में भटकना है।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

संत झुन्‍नून—

मिश्र में एक अद्भुत फकीर हुआ है झुन्‍नून। एक युवक ने आकर उससे पूछा, मैं भी सत्‍संग का आकांक्षी हूं। मुझे भी चरणों में जगह दो। झुन्‍नून ने उसकी तरफ देखा—दिखाई पड़ी होगी बही बुद्ध की कलछी वाली बात जो दाल में रहकर भी उसका स्‍वाद नहीं ले पाती। उसने कहा, तू एक काम कर। खीसे में से एक पत्‍थर निकाला और कहा, जा बाजार में, सब्‍जी मंडी में चला जा, और दुकानदारों से पूछना कि इसके कितने दाम मिल सकते है।

बुधवार, 28 जुलाई 2010

अधूरी वासना—(कहानी) लेखक--ओशो

  
(28 नवंबर 1953 के नव भारत (जबलपुर) में इस संपादकीय टिप्‍पणी के साथ यह कहानी पहली बार प्रकाशित हुई थी)
     ‘’ अधूरी वासना ’’ लेखक की रोमांटिक कहानी है।
     भारत के तत्‍व दर्शन में पुनर्जन्‍म का आधार इस जीवन की अधूरी छूटी वासनायें ही है। कहानी के लेखक नह ऐ अन्‍य जगह लिखा है कि ‘’ शरीर में वासनायें है पर वह शरीर के कारण नहीं है, वरन शरीर ही इन वासनाओं के कारण से है।
     अधूरी वासनायें जीवन के उस पास भी जाती है। और नया शरीर धारण करती है। जन्‍मों–पुनर्जन्‍मों का चक्र इन अधूरी छूटी वासना ओर का ही खेल है, लेखक की इस कहानी का विषय केंन्‍द्र यही है।
     23 अगस्‍त 1984 को पुन: नव भारत ने इस के साथ इस कहानी को प्रकाशित किया: संपादकीय टिप्‍पणी:-
     श्री रजनीश कुमार से आचार्य रजनीश और भगवान रजनीश तक का फासला तय करने वाले आचार्य रजनीश का जबलपुर से गहरा संबंध रहा है। अपनी चिंतन धारा और मान्‍यताओं के कारण भारत ही नहीं समूचे विश्‍व में चर्चित श्री रजनीश ने आज से लगभग 31 वर्ष पूर्व नव भारतको एक रोमांटिक कहानी प्रकाशनार्थ भेजी थी और वह जिस संपादकीय टिप्‍पणी के साथ प्रकाशित की गई थी, 28 नवंबर 1953 के नव भारत से लेकिर अक्षरशः: प्रकाशित कर रहे है।
    
      मैं पथ पर अकेला था, मेरा गीत था और दूर-दूर तक पहाड़ी पगडंडियों में चांदनी बिखरी सोई था। रातें ठंडी हो गई थी। और ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर बर्फ गिरने लगी थी एक माह की दे थी कि यहां भी बर्फ के गोले पड़ने लगेंगे, नदिया जमकर चाँदी की धारों में बदल जायेगी और काले पहाड़ों की चोटियों पर शुभ्र हिम ऐसे चमकने लगेगा, जैसे पहाड़ों ने अपने जूड़ों पर जुही के सफेद फूल बाँध लिये हो।
      मैं अपने आप में खोया-खोया आगे बढ़ता गया। कभी-कभी पक्षी रात में मौन को तोड़ता निकल जाता और सूनी वादियाँ उसके परों की फड़फड़ाहट में गूंज जाती। फिर रात का ठंडा मौन वैसे ही वापस घिर आता जैसे नदी की छाती पर गिरे पत्‍थर से कांपती लहरें फिर एक दूसरे में मिलकर मौन जो जाती।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

विनोद खन्‍ना--2 (एक पहचान परदों के पार)

 
यह तो आपके अहंकार पर सब तरफ से सीधी चोट थी। उससे आपके अंदर क्रोध नहीं उठता होगा?
      मुझे बहुत मजा आ रहा था, विनोद ने उस स्‍थिति का जायका लेते हुए कहा। मैं इतना मस्‍ती में था कि मुझे ओशो के पास रहने का मौका मिल रहा है। मेरे मन की सारी उथल पुथल शांत हो गई थी। शायद इस फकीरी की ही मुझे तलाश थी। मैं खूब काम करता था ओर खूब ध्‍यान करता था। समाधि टैंक मुझे बहुत अच्‍छा लगता था। उसमें मां के गर्भ जैसी स्‍थिति बनाई जाती है। वहां पर मुझे अपने जन्‍म का अनुभव भी हुआ।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

विनोद खन्‍ना--एक पहचान परदों के पार

मेरा आध्‍यात्‍मिक जीवन तब शुरू हुआ जब मैं उस मुकाम पर पहुंच गया था, जहां पर बहार की कोई चीज में मायना नहीं रखती थी। सब कुछ था मेरे पास: पैसा था, अच्‍छा परिवार था, शोहरत थी, इज्जत.....जो भी इच्‍छाएं थीं सब पूरी हो चुकी थी। उस वक्‍त मैंने यह सोचना शुरू कर दिया कि यह जो चेतना है( कांशसनेस) जिसकी सभी गुरु चर्चा करते है। वह क्‍या है। तो मैं पुस्‍तकों की दुकानों में खोजा करता था। किसी पुस्‍तक में मुझे क्‍या मिलेगा....
      यह किस उम्र में आपकी खोज शुरू हुई?
            वैसे तो में आठ साल का था तभी से में साधुओं के पास जाया करता था। किसी को हाथ दिखा था , किसी के पास आंखें बंद करके, ध्‍यान में बैठ जाता था। फिर मेरी पढ़ाई शुरू हुई, कॉलेज गया तो मेरा यह हिस्‍सा पीछे की और चला गया। मेरे अंदर ख्‍वाहिश जाग उठी के मैं अभिनेता बनूं। उस दिशा में मेरे कदम चल पड़े। वह कहानी ताक सबको पता है। फिर जब मेरा कैरियर कामयाब हो गया तो बचपन की वो चीजें फिर वापस आई। मैं एक दुकान में गया और मैंने परमहंस योगानंद की वह मशहूर किताब खरीद ली: आटो बाई ग्राफी आफ एक योगी—एक ही रात में उसे पुरी पुस्‍तक को पढ़ गया। योगानंद जी की फोटो देख कर मुझे लगा मैं इस आदमी को जानता हूं।
      फिर मेरी ध्‍यान की खोज शुरू हुई। डेढ़ दो साल तक मैंने टी. एम. किया। लेकिन उसमें एक जगह जाकर लगा, अब दिवाल आ गई। थोड़ी बहुत शांति आ जाती है लेकिन उसके बाद कुछ नहीं है। उस बीस मिनट के दौरान थोड़े रंग दिखाई देते थे। दृश्‍य तैरते थे लेकिन आगे क्‍याइसे समझाने वाला कोई नहीं था। उन दिनों हमारे क्षेत्र के विजय आनंद ओशो से संन्‍यास ले चुके थे। महेश भट्ट भी ओशो को सुनते बहुत थे। ये दोनों मेरे अच्‍छे दोस्‍त थे। उनके साथ में पूना आया और ओशो की कुछ कैसेट खरीदे। आश्‍चर्य की बात, उन प्रवचनों में मुझे उन सारे प्रश्‍नों के उत्‍तर मिल गए जो मेरे मन में चलते थे।

रविवार, 18 जुलाई 2010

फकीर संत हरिदास—

   अकबर ने एक दिन तानसेन को कहा, तुम्‍हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा ख्‍याल उठता है कि तुम जैसा गाने वाला शायद ही इस पृथ्‍वी पर कभी हुआ हो और न हो सकेगा। क्‍योंकि इससे ऊंचाई और क्‍या हो सकेगी। इसकी धारणा भी नहीं बनती। तुम शिखर हो। लेकिन कल रात जब तुम्‍हें विदा किया था, और सोने लगा तब अचानक ख्‍याल आया। हो सकता है, तुमने भी किसी से सीखा है,ुम्‍हारा भी कोई गुरू होगा। तो मैं आज तुमसे पूछता हूं। कि तुम्‍हारा कोई गुरू है? तुमने किसी से सीखा है?

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

सरहा की गुरु एक तीरंदाज स्‍त्री--(कथा यात्रा-006)

 
सरहा महाराष्‍ट्र के विदर्भ प्रांत में पैदा हुआ। सम्राट महा पाल के दरबार में एक विद्वान ब्राह्मण था। सरहा उस ब्राह्मण का पुत्र था। सम्राट अपनी पुत्री का विवाह सरहा के साथ करने को तैयार था। लेकिन सरहा संन्‍यास लेना चाहता था। वह श्री विमल कीर्ति नामक बौद्ध भिक्षु का शिष्‍य बना।  
      श्री विमल कीर्ति ने सबसे पहली बात जो सरहा से कही वह थी:  सारा पांडित्‍य छोड़ दो। वेदों को भूल जाओ।
      वर्ष बीतते चले गए और सरहा बहुत बड़ा ध्‍यानी बन गया। एक बार ध्‍यान में बैठे-बैठे उसने एक दृश्‍य देखा की बाजार में एक स्‍त्री है जो उसकी असली गुरु बनने वाली हे। श्री विमल कीर्ति ने उसे मार्ग दिखा दिया था लेकिन असली मार्गदर्शन एक स्‍त्री से होने वाला हे।    
      सरहा ने श्री विमल कीर्ति से कहा: आपने मेरी तख्‍ती साफ कर दी, अब मेरे काम का शेष आधा हिस्‍सा करने के लिए में तैयार हूं। विमल कीर्ति हंस पडा और उसने अपने आशीष सरहा को दिए।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

युवक वणिक की सात दिन बाद मृत्‍यु—(कथा यात्रा-005)

 युवक वणिक की सात दिन में मृत्यु-(एस धम्मो सनंतनो)

गवान श्रावस्‍ती नगरी में ठहरे थे। वही जैत बन के पास ही एक नवयुवक वणिक अपनी पाँच से बेल गाड़ियों सहित ठहरा था। जिसमें उसने बहुमूल्य, हीरे जवाहारात, मेवे, वस्‍त्र, आभूषण, और नाना प्रसाधान की वस्तुएँ भरी थी। जिनका वह व्यापार करता था। भगवान सुबह ध्‍यान के बाद ताप्‍ती(अचरवती) के किनारे एक वृक्ष की छाव में बैठे थे। पास ही आनंद टहल रहा था। युवक वणिक का व्यापार इस समय बहुत जोर शोर से चल रहा था। पर भगवान उसके इतने पास थे पर वह धड़ी भर का भी टाईम निकाल कर उन्‍हें सुनने नहीं आया।  वह अपने व्‍यापार की वृद्धि को देख अति प्रसन्‍न हो रहा था।

      वह धन कमाने में इतना तल्‍लीन था उसे भगवान दिखाई ही नहीं दिये। उसके पास से ही हजारों की संख्‍या में रोज श्रावस्‍ती निवासी गूजरें होगें, उससे सामान भी खरीदते होगें। शायद इसी लिए वह वणिक यहां खड़ा हो व्‍यापार कर रहा था। वह जानता था की भगवान को सुनने के लिए यहां से हजारों लोग गुजरते है। जिसमें बहुत धनवान भी होते थे। जिस के मन में वासना जितनी प्रगाढ़ होगी वह ध्यान के विषय में सोचगा भी नहीं। अगर वह किसी को ध्‍यान करते देखेगी तब भी यहीं सोच विचार करेंगे की ये लोग पागल है। इतना समय बैठ कर बरबाद कर रहे है। इतनी देर में तो न जाने कितना धन कमा लेते। वह केवल लाभ हानि की भाष समझता है। और भाषा उसे आती ही नहीं।   

बुधवार, 14 जुलाई 2010

परम संत--सहजो बाई—

 
अब तक मैं मुक्‍त पुरूषों पर ही बोला हूं। पहली बार एक मुक्‍त नारी पर चर्चा शुरू करता हूं। मुक्‍त पुरूषों पर बोलना आसान था। उन्‍हें में समझ सकता हूं-वे सजातीय है। मुक्‍त नारी पर बोलना थोड़ा कठिन है। वह थोड़ा अंजान, अजनबी रस्‍ता है। ऐसे तो पुरूष ओर नारी अंतरतम में एक ही है। लेकिन उनकी अभिव्यक्ति बड़ी भिन्‍न-भिन्‍न है। उनके होने का ढंग उनके दिखाई पड़ने की व्‍यवस्‍था उनका व्‍यक्‍तित्‍व उनके सोचने की प्रक्रिया, न केवल भिन्‍न है बल्‍कि विपरीत भी है।

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

विशाखा--श्‍वसुर की गुरू माता--(कथा यात्रा-004)

विशाखा-श्वसुर की गुरू माता-(एस धम्मो सनंतनो)
विशाखा एक अति धनी परिवार में पैदा हुई थी। उस का पुरा परिवार भगवान बुद्ध से प्रभावित था। उसके पिता धनंजय और माता का नाम सुमना था। उसके पिता भगवान बुद्ध के अटूट भक्तों में से एक थे। वह बचपन से ही अपने माता पिता के साथ धर्म श्रवण को जाती थी। कहते है वह सात साल की थी,तब ही श्रोतापत्ती के फल को उपलब्‍ध हो गई थी। श्रोतापत्‍ती का अर्थ है ध्‍यान की धारा में बह जाना। अपने को छोड़ देना उस आस्तित्व के हाथों। और अपने में डूब जाना। मनुष्‍य जब ही अध्‍यात्‍म की यात्रा पर चल सकता है जब वह श्रोता पन्न को उपल्‍बध हो जाये। ये मनुष्‍य के जीवन के अति महत्‍व पूर्ण पड़ाव है। मनुष्‍य के शरीर को सात चक्रों में विभाजित किया जाये तो यह तीसर मणिपूर चक्र होता है। पहल दो चक्रों तक प्रकृति अपना काम करती है। उत्पत्ति और भय और क्रोध। जो जीवन के अभिन्‍न अंग हे। मणि पुर जिसे हिन्‍दुओं ने उसे सचमुच बहुत ही सुंदर नाम दिया है। वह सच में मणि है। जो मनुष्‍य के अंदर का भाग्‍य खोल देती हे। वह बंध होता है। बिना गुरु के सहयोग के वह कभी नहीं खुलता। पर जिस का खुल गया वह समाज की नजरों में आपको पागल सा लगेंगे। आप कहोगे ये तो उसका दीवाना हो गया। बावरा हो गया।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

आर्य रेवत—(ऐतिहासिक कहानी)-कथा यात्रा--003

 
रेवत स्‍थविर सारि पुत्र को छोटा भाई था। राजगृह के पास एक छोटे से गांव का रहने वाला था। सारि पुत्र और मौद्गल्यायन स्‍थविर बचपन से ही संग साथ खेल और बड़े हुए। दोनों ने ही राजनीति ओर धर्म में  तक्ष शिला विश्‍वविद्यालय से शिक्षा प्राप्‍त की । और एक दिन घर परिवार छोड़ कर दोनों ही बुद्ध के अनुयाई हो गये। उस समय घर में बूढ़े माता-पिता, पत्‍नी दो बच्‍चे, दो बहने और छोटा रेवत था। इस बात की परिवार को दु:ख के साथ कही गर्व भी था की उनके सपूत ने बुद्ध को गुरु माना। पर परिवार की हालत बहुत बदतर होती चली गई। कई-कई बार तो खानें तक लाले पड़ जाते। जो परिवार गांव में कभी अमीरों में गिना जाता था। खुशहाल था। अब शरीर के साथ-साथ मकान भी जरजर हो गया था।
     
      रेवत जब बड़ा होने लगा तो उसे तक्ष शिला नहीं भेजा गया पढ़ने के लिए। एक तो तंग हाथ दूसरा सारि पुत्र का यूं अचानक घर से छोड़ जाना। घर को बहुत बड़ा सदमा दे गया। सारी आस उसी पर टीकी थी। की घर गृहथी को सम्हाले। और जो मां बाप ने सालों धन उस पर खर्च किया था उसकी भरपाई करेंगे। बहनों का शादी विवाहा करेंगे। छोटे भाई रेवत को पढ़ाते, पर सब बर्बाद हो गया। घर की हालत दीन हीन होई।

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

धनंजाति ब्राह्मणी---नमा तस्‍य.....(कथा यात्रा)

 
बात राज गृह की है। वहां एक धनंजाति नाम की ब्रह्मणी रहती थी। मायके से उसका परिवार भगवान बुद्ध का अनुयायी था। पर विवाह के वाद जिस परिवार में औरत जाती है। वहीं उसका धर्म हो जाता है। इस लिए तो हमारे पंडित पुरोहित भी पत्‍नी के आगे एक शब्‍द लगा देते है, धर्म पत्‍नी। वह जब दीक्षित हुई तब ही वह श्रोतापति को उपलब्‍ध हो गई। श्रोतापति को अर्थ है कि वह कुछ गया नदी की धारा में   अब उसने अपने को छोड़ दिया आस्‍तित्‍व के बहाव में। वह उसी दिन से ही एक पाठ दोहराती थी। सदा नमो तस्‍य भगवतो अरहंतो सम्‍मासंबुद्धस्‍य दोहराती रहती थी।

सोमवार, 5 जुलाई 2010

रोहिणी का छवि रोग--(कथा यात्रा--002)

 रोहिणी का छवि रोग-(एस धम्मो सनंतनो)
एक बार भगवान कपिलवस्‍तु गए। उनके एक शिष्‍य थे अनिरुद्ध, जिनकी बहन थी रोहणी। वह बहुत सुंदर थी पर बहुत अहंकारी भी थी। अहंकार स्‍त्री को होता है रूप का। दो ही अहंकार होते है एक नाम और एक रूप। नाम यानि सूक्ष्‍म मन जिसके पीछे चले आते है। पद, प्रतिष्‍ठा, यश, धन, त्‍याग…….
      और नारी को रूप का, कुरूप से कुरूप स्‍त्री को भी आप जब सुंदर कहोगे तो वह मान जायेगी की वह सच में ही सुन्‍दर है। तो रोहणी सुन्‍दर थी, रूप का दंभ था उसे रूप के दंभ के कारण मनुष्‍य को बहुत चोट पहुँचती है। अगर उसे कोई सुन्‍दर नहीं कहे या उस के सामने आप किसी दूसरे के रूप गुणों की तारीफ करों तो उसके अहं को बहुत ठेस लगती है। अगर हमें क्रोध आता है तो इसका एक सीधा सा लक्षण है की हमारे अंदर अहंकार है। जहां अहंकार होगा वहां प्रेम नहीं हो सकता।

मंगलवार, 29 जून 2010

चमत्‍कार वैज्ञानिक चित का आभाव—3

   
यह हो सकता है, जीसस ने किसी के हाथ पर हाथ रखा हो और आँख ठीक हो गयी हो, लेकिन फिर भी चमत्‍कार नहीं है। क्‍योंकि पूरी बात अब पता चल गयी है। अब पता चल गयी है कि कुछ अंधे तो सिर्फ मानसिक रूप से अंधे होते है। वे अंधे होते है ही नहीं सिर्फ मेंटल बलांइडनेस होती है। उनको सिर्फ ख्‍याल होता है अंधे होने का और यह ख्‍याल इतना मजबूत हो जाता है कि आँख काम करना बंद कर देती है। अगर कोई आदमी उनको भरोसा दिला दे तो उनकी आंखे ठीक हो सकती है। तो उनका मन तत्‍काल वापस लौट आयेगा और आँख ठीक हो गयी, तो वह तत्‍काल उनका मन वापस लौट आयेगा और आँख के तल पर काम करना शुरू कर देगा।

सोमवार, 28 जून 2010

सोने की मछली —(कथा यात्रा-001)

सोने की मच्छली- (एस धम्मों सनंतनो)
बात उस समय की है, जब भगवान बुद्ध श्रावस्‍ती में विहरते थे। श्रावस्‍ती नगर के पास केवट गांव के कुछ मल्‍लाहों ने अचरवती नदी में जाल फेंककर कर एक स्‍वर्ण-वर्ण की अद्भुत मछली को पकड़ा।  कहानी कहती है अचरवती नदी.....जो चिर नहीं है......अचिर यानि क्षणभंगुर है।
      ऐसा ही तो जीवन है, प्रत्‍येक प्राणी क्षण-क्षण बदलते प्रवाह के संग-साथ जाता है और पकडना चाहता है। जाल फेंक कर बैठे है, अचरवती के किनारे, कोई पद का, यश का, धन का, नाम का......की मछली को पकड़-पकड़ को कहां पकड़ पाता है। कास हम समझ जाते ये जीवन क्षण भंगुर है।
      सोने की मछली तो मल्‍लाहों ने पकड़ ली, जिसका शरीर तो सोने का था, परन्‍तु उसके मुख से भयंकर दुर्गंध आ रही थी।

शुक्रवार, 25 जून 2010

चमत्‍कार वैज्ञानिक चित का अभाव है—2


एक हजार साल गुलाम रहे थे, और यहां ऐसे चमत्‍कारी पड़े है कि जिसका कोई हिसाब नहीं, गुलामी की जंजीरें नहीं कटतीं। ऐसा लगता है कि अंग्रेज के सामने चतत्‍कार नहीं चलता। चमत्‍कार होने के लिए हिंदुस्‍तानी होना जरूरी है। क्‍योंकि अगर खोपड़ी में थोड़ी भी विचार चलता हो, तो चमत्‍कार के कटने का डर रहता है। तो जहां विचार है, बिलकुल न चला पाओगे चमत्‍कार को। सब से बड़ा चमत्‍कार यह है कि लोग चमत्‍कार कर रहे है। सबसे बड़ा चमत्‍कार यह है कि हम खुद भी होते हुए चमत्‍कार देख रहे हे। और घरों में बैठकर चर्चा कर रहे है। कि चमत्‍कार हो रहा है। और कोई इन चमत्‍कारियों की जाकर गर्दन नहीं पकड़ लेता कि जो खो गयी है घड़ी उसको बाहर निकलवा ले, कि क्‍या मामला है। क्‍या कर रहे हो? वह नहीं होता है।

चमत्‍कार वैज्ञानिक चित का अभाव— 1

चमत्‍कार शब्‍द का हम प्रयोग करते है, तो साधु-संतों का खयाल आता है। अच्‍छा होता कि पूछा होता कि मदारियों के संबंध में आपका क्‍या ख्‍याल आता है। अच्‍छा तरह के मदारी है—एक जो ठीक ढंग से मदारी हैं, आनेस्‍ट वे सड़क के चौराहों पर चमत्‍कार दिखाते है। दूसरे: ऐसे मदारी है, डिस्‍आनेस्‍ट, बेईमान, वे साधु-संतों के वेश करके, वे ही चमत्‍कार दिखलाते है। जो चौरस्‍तों पर दिखाई जाते है। बेईमान मदारी सिनर है, अपराधी है, क्‍योंकि मदारी पन के अधार पर वह कुछ और मांग कर रहा है।

बुधवार, 16 जून 2010

महेश भट्ट -विजय आंनद- का संन्यास-ओशो भाग-02

महेश भट्ट-विजय आंनद-का संन्यास-
मरौ हे जोगी मरौ-ओशो
....तो यह तो जब तुम दीक्षा लोगे यह घटना घटेगी। फिर जब तुम दीक्षा छोड़ोगे, इससे उल्‍टी घटना घटेगी। घटनी ही चाहिए, ठीक तर्क है; एक सरणी है उसकी। अब तुम्‍हें बोलना पड़ेगा मेरे खिलाफ। अब तुमने जो-जो संदेह दबा लिए थे, वे सब उभर कर ऊपर आ जायेंगे। और जो-जो श्रद्धा तुमने आरोपित कर ली थी, वह सब तिरोहित हो जायेगी। अब तुम्‍हारे सारे संदेह अतिशयोक्‍ति से प्रकट होंगे। करने ही पड़ेंगे। क्‍योंकि जिसे तुमने छोड़ा वह गलत होना चाहिए, जैसे तुमने जब पकड़ा था तो वह सही था।

      तो विजया नंद पाँच साल मेरे पक्ष में बोलते रहे, अब पचास साल मेरे खिलाफ बोलना पड़ेगा। वे सब जो पाँच साल में दबाये हुए संदेह थे, सब उभरकर आयेंगे। और अब रक्षा करनी होगी, क्‍योंकि वे ही लोग जो कल कहते थे कि क्‍या तुम पागल हो गये हो संन्‍यास लेकर,अब कहेंगे कि हमने पहले ही कहा था कि तुम पागल हो गये हो। अब इनको जवाब देना होगा।  तो अब बड़ी अड़चन खड़ी होगी। उस अड़चन से बचाव करना होगा। बचाव एक ही है कि हम भ्रांति में पड़ गये थे। या बचाव यह है कि कुछ-कुछ बातें ठीक थीं, उन्‍हीं बातों के कारण हम संन्‍यस्‍त हो गये थे। फिर जब संन्‍यस्‍त हुए तब धीरे-धीरे पता चला है कि कुछ-कछ बातें गलत है।

सोमवार, 14 जून 2010

महेश भट्ट -विजय आंनद- का संन्यास-ओशो भाग-01

महेश भट्ट-विजय आंनद-का संन्यास-
मरौ हे जोगी मरौ-ओशो
शिष्‍यों की चार कोटियां है। पहली कोटि—विद्यार्थी की है, जो कुतूहल वश आ जाता है। जिसके आने में न तो साधना की कोई दृष्‍टि है न कोई मुमुक्षा है, न परमात्‍मा को पाने की कोई प्‍यास है। चलें देखें, इतने लोग जाते है, शायद कुछ हो। तुम भी रास्‍ते पर भीड़ खड़ी देखो तो रूक जाते हो, पूछने लगते हो क्‍या मामला है? भीतर प्रवेश करना चाहते हो, भीड़ में। देखना चाहते हो कुछ हुआ होगा.....। नहीं कि तुम्‍हें कोई प्रयोजन है, अपने काम से जाते थे। आकस्‍मिक कुछ लोग आ जाते है। कोई आ रहा है। तुमने उसे आते देखा;उसने कहा: क्‍या करते हो बैठे-बैठ, आओ मेरे साथ चलो, सत्‍संग में ही बैठेंगे। खाली थे कुछ काम भी न था, चले आये। पत्‍नी आयी, पति साथ चला आया; पति आया, पत्‍नी साथ चली आई। बाप आया बेटा साथ चला आया।

      ऐसे बहुत से लोग आकस्‍मिक रूप से आ जाते है। उनकी स्‍थिति विद्यार्थी की है। वे कुछ सूचनाएं इकट्ठी कर लेंगे, सुनेंगे तो कुछ सूचनाएं इकट्ठी हो जायेगी। उनका ज्ञान थोड़ा बढ़ जायेगा। उनकी स्‍मृति थोड़ी सधन होगी। ऐसे आने वालों में से, सौ में से दस ही रूकेंगे; नब्‍बे तो छिटक जायेंगे। दस रूक जाते है यह भी चमत्‍कार है। क्‍योंकि वे आये न थे किसी सजग-सचेत प्रेरण के कारण—ऐसे ही मूर्छित -मूर्छित किसी के धक्‍के में चलें आये थे पानी में बहती हुई लकड़ी की तरह किनारे लग गये थे। किनारे की कोई तलाश नहीं थी।

शनिवार, 12 जून 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म—7

  

बहुत पुराना संघर्ष है आदमी के चिन्‍तन का। अगर आदमी पूरी तरह स्‍वतंत्र है जैसा ज्‍योतिषी साधारणत: कहते हुए मालूम पड़ते है, कि सब सुनिश्‍चित है, जो विधि ने लिखा है वह होकर रहेगा तो फिर सारा धर्म व्‍यर्थ हो जाता है। और या फिर जैसा कि तथाकथित तर्कवादी और बुद्धिवादी गुरु कहते है कि सब स्‍वच्‍छन्‍द है, कुछ बंधा हुआ नहीं है। कुछ होने का निश्‍चित नहीं है, कुछ अनिश्‍चित है—तो जिन्‍दगी एक के ऑफ और एक अराजकता और एक स्‍वच्‍छन्‍दता हो जाती है। फिर तो यह भी हो सकता है कि मैं चोरी करूं और मोक्ष पा जाऊं, हत्‍या करूं और परमात्‍मा मिल जाए। क्‍योंकि जब कुछ भी बन्‍धा हुआ नहीं है। और किसी भी कदम से कोई दूसरा कदम बंधता नहीं है और अब कहीं भी कोई नियम और सीमा नहीं है......।

सोमवार, 7 जून 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म—6

  जब बुद्ध को ज्ञान हुआ, तब बुद्ध ने दोनों हाथ जोड़कर पृथ्‍वी पर सिर टेक दिया। कथा है कि आकाश से देवता बुद्ध को नमस्‍कार करने आए थे कि  वह परम ज्ञान को उपलब्‍ध हुए है। बुद्ध को पृथ्‍वी पर हाथ टेके सिर रखे देखकर वे चकित हुए। उन्‍होने पूछा: तुम, और किसको नमस्‍कार कर रहे हो। क्‍योंकि हम तो तुम्‍हें नमस्‍कार करने स्‍वर्ग से आते है। हम तो नहीं जानते कि बुद्ध भी किसी को नमस्‍कार करे, ऐसा कोई है। बुद्धत्‍व तो आखिरी बात है। बुद्ध ने आंखें खोली और बुद्ध ने कहा, जो भी घटित हुआ है उसमें मैं अकेला नहीं हूं, सारा विश्‍व है। तो इस सबको धन्‍यवाद देने के लिए सिर टेक रहा था। यह एसेंशियल एस्‍ट्रोलाजी से बंधी हुई बात है—सार जगत।

शनिवार, 5 जून 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म—5

ज्‍योतिष से इसका कोई लेना देना नहीं है। और चुंकी ज्‍योतिष इस तरह की बात चीत में लगे रहते है। इसलिए ज्‍योतिष का भवन गिर गया। ज्‍योतिष के भवन के गिर जाने का कारण यही हुआ। कोई भी बुद्धिमान आदमी इस बात को मानने को राज़ी नहीं हो सकता है,  कि मैं जिस दिन पैदा हुआ उस दिन लिखा था कि मरीन ड्राइव पर फलां-फलां दिन एक छिलके पर मेरा पैर पड़ जाएगा। और फिसल जाऊँगा। न तो मेरे फिसलने का चाँद तारों से प्रयोजन है, न उस छिलके का कोई प्रयोजन है। इन बातों से संबंधित होने के कारण ज्‍योतिष बदनाम हुआ। और हम सबकी उत्‍सुकता यहीं है। कि ऐसा पता चल जाए। इससे कोई संबंध नहीं है।

शुक्रवार, 4 जून 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म—4

अब जैसे हिरोशिमा में एटम बम के गिरने के बाद पता चला, उसके पहले पता नहीं था। हिरोशिमा में एटम जब तक नहीं गिरा था तब तक इतना ख्‍याल नहीं था कि एटम गिरेगा तो लाखों लोग मरेंगे। लेकिन यह पता नहीं था की पीढ़ियों तक आनेवाले बच्‍चे प्रभावित हो जाएंगे। हिरोशिमा और नागासाकी में जो लोग मर गए—मर गए, वह तो क्षण की बात थी। समाप्‍त हो गई। लेकिन हिरोशिमा में जों वृक्ष बच गए, जो जानवर बच गए, जो पक्षी बच गए, जो मछलियाँ बच गई, जो आदमी बच गए वे सदा के लिए प्रभावित हो गए।

शनिवार, 29 मई 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्यात्म—3

जगत में न मालूम कितनी घ्‍वनियां है जो चारों तरफ हमारे गुजर रही है। भंयकर कोला हाल है—वह पूरा कोलाहल हमें सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते हे। ध्‍यान रहे, वह हमें सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते हे। वह हमारे रोएं-रोएं को स्‍पर्श करता है। हमारे ह्रदय की धड़कन-धड़कन को छूता है। हमारे स्‍नायु-स्‍नायु को कंपा जाता है। वह अपना काम तो कर ही रहा है। उसका काम तो जारी है। जिस सुगंध को आप नहीं सूंघ पाते उसके अणु आपके चारों तरफ अपना काम तो कर ही जाते हे। और अगर उसके अणु किसी बीमारी को लाए है तो आप को दे जाते है। आपकी जानकारी आवश्‍यक नहीं है। किसी वस्‍तु के होने के लिए।

गुरुवार, 27 मई 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म—2

   इजिप्‍ट के एक सम्राट ने आज से चार हजार साल पहले अपने वैज्ञानिको को कहा था कि नील नदी में जब भी जल घटता है, बढ़ता है, उसका पूरा ब्‍योरा रखा जाए। अकेली नील एक ऐसी नदी है जिसकी चार हजार वर्ष की बायो ग्राफी है। उसकी जीवन कथा है पूरी। और किसी नदी की कोई बायो ग्राफी नहीं है। उसकी जीवन कथा है पूरी, कब इसमें इंच भर पानी बढ़ा है, उसका पूरा रिकार्ड है—चार हजार वर्ष फैर हों के जमाने से लेकर आज तक।

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म--1

  कुछ बातें जान लेनी जरूरी है। सबसे पहले तो यह बात जान लेनी जरूरी है कि वैज्ञानिक दृष्‍टि से सूर्य से समस्‍त सौर्य परिवार का—मंगल का, बृहस्‍पति का, चंद्र का, पृथ्‍वी का जन्‍म हुआ है। ये सब सुर्य के ही अंग है। फिर पृथ्‍वी पर जीवन का जन्‍म हुआ—पौधों से लेकर मनुष्‍य तक। मनुष्‍य पृथ्‍वी का अंग है, पृथ्‍वी सूरज का अंग है। अगर हम इसे ऐसा समझें—एक मां है, उसकी एक बेटी है। और उसकी एक बेटी है—उन तीनों के शरीर का निर्माण एक ही तरह के सेल्‍स से एक ही तरह के कोष्‍ठों से होता है।

ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—8(अन्‍तिम)

 
ज्‍योतिष सिर्फ नक्षत्रों का अध्‍ययन नहीं हे। वह तो है ही वह तो हम बात करेंगे—साथ  ही ज्‍योतिष और अलग-अलग आयामों से मनुष्‍य के भविष्‍य को टटोलने की चेष्‍टा है कि वह भविष्‍य कैसे पकड़ा जा सके। उसे पकड़ने के लिए अतीत को पकड़ना जरूरी है। उसे पकड़ने के लिए अतीत के जो चिन्‍ह है, आपके शरीर पर और आपके मन पर भी छुट गये है। उन्‍हें पहचानना जरूरी हे।  और जब से ज्‍योतिषी शरीर के चिन्‍हों पर बहुत अटक गए है तब से ज्‍योतिष की गिराई खो गई है, क्‍योंकि शरीर के चिन्‍ह बहुत उपरी है।

ज्‍योतिष अद्वैत का विज्ञान—7

टाईम ट्रैक और—हुब्‍बार्ड
      भविष्‍य एकदम अनिश्‍चित नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्‍चित है। हमारा अज्ञान भारी है। भविष्‍य में हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हम अंधे है। भविष्‍य का हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। नहीं दिखाई पड़ता है इसलिए हम कहते है कि निश्‍चित नहीं है। लेकिन भविष्‍य में दिखाई  पड़ने लगे....ओर ज्‍योतिष भविष्‍य में देखने की प्रक्रिया है।
      तो ज्‍योतिष सिर्फ इतनी ही बात नहीं है कि ग्रह-नक्षत्र क्‍या कहते है। उनकी गणना क्‍या कहती है। यह तो सिर्फ ज्‍योतिष का एक डायमेंशन है, एक आयाम है। फिर भविष्‍य को जानने के और आयाम भी है।

मंगलवार, 25 मई 2010

धर्म क्‍या है?

  
 मैं धर्म क्‍या कहूं? जो कहा जा सकता है, वह धर्म नहीं होगा। जो विचार के परे है, वह वाणी के अंतर्गत नहीं हो सकता है। शास्‍त्रों में जो है, वह धर्म नहीं है। शब्‍द ही वहां है। शब्‍द सत्‍य की और जाने के भले ही संकेत हों,पर वे सत्‍य नहीं है। शब्‍दों से संप्रदाय बनते है, और धर्म दूर ही रह जाता है। इन शब्‍दों ने ही मनुष्‍य को तोड़ दिया है। मनुष्‍यों के बीच पत्‍थरों की नहीं, शब्‍दों की ही दीवारें है।

रविवार, 23 मई 2010

ज्‍योतिष अद्वैत का विज्ञान—6

जैसा मैं आपसे कह रहा था पैरासेल्‍सस के संबंध में। आधुनिक चिकित्‍सक भी इस नतीजे पर पहुंचे रहे है। कि जब भी सूर्य पर अनेक बार धब्‍बे प्रकट होते है....ऐसे भी सूर्य पर कुछ धब्‍बे है, डाट्स, स्‍पाट्स होते है—कभी वे बढ़ जाते है, कभी वे कम हो जाते है। जब सूर्य पर स्पाट्स बढ़ जाते है तो जमीन पर बीमारियां बढ़ जाती है। और जब सुर्य पर काले धब्‍बे कम हो जाते है, तो जमीन पर बीमारियां कम हो जाती है। और जमीन से हम बीमारियां कभी न मिटा सकेंगे जब तक सूर्य के  स्पाट्स कायम है।

गुरुवार, 20 मई 2010

ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—5

शायद पहला जन्‍म काई, वह जो पानी पर जम जाती है—वह जीवन का पहला रूप है, फिर आदमी तक विकास। जो लोग पानी के ऊपर गहन शोध करते है, वे कहते है पानी सर्वाधिक रहस्‍यमय तत्‍व है। जगत से, अन्‍तरिक्ष से तारों का जो भी प्रभाव आदमी तक पहुंचता है उसमें मीडियम, माध्‍यम पानी है। आदमी के शरीर के जल को ही प्रभावित करके कोई भी रेडिएशन कोई भी विकीर्णन मनुष्‍य में प्रवेश करता है। जल पर बहुत काम हो रहा है और जल के बहुत से मिस्‍टीरियस, रहस्‍यमय गुण खयाल में आ रहे है।

बुधवार, 12 मई 2010

ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—4

इनके रुझान, इनके ढंग, इनके भाव समानांतर है। अगर करीब-करीब ऐसा मालूम पड़ता है कि ये दोनों एक ही ढंग से जीते है। एक दूसरे की कापी की भांति होते है। इनका इतना एक जैसा होना और बहुत सी बातों से सिद्ध होता है।
      हम सबकी चमड़ियां अलग-अलग हैं, इण्‍डीवीजुअल है। अगर मेरा हाथ टुट जाए और मेरी चमड़ी बदलनी पड़े तो आपकी चमड़ी मेरे हाथ के काम नहीं आयेगी। मेरे ही शरीर की चमड़ी उखाड़ कर लगानी पड़ेगी। इस पूरी जमीन पर कोई आदमी नहीं खोजा जा सकता, जिसकी चमड़ी मेरे काम आ जाए। क्‍या बात है? शरीर शास्‍त्री से पूँछें कि क्‍या दोनों की चमड़ी की बनावट में कोई भेद है—तो कोई भेद नहीं है।

सोमवार, 10 मई 2010

ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—3

तो साधारणत: देखने पर पता चलता है कि इन ग्रह-नक्षत्रों की स्‍थिति का किसी के बच्‍चे के पैदा होने से, होरोस्‍कोप से क्‍या संबंध हो सकता है। यह तर्क सीधा और साफ मालूम होत है। फिर चाँद तारे एक बच्‍चे के जन्‍म की चिन्‍ता तो नहीं करते? और फिर एक बच्‍चा  ही पैदा नहीं होता, एक स्‍थिति में लाखों बच्‍चें पैदा होते है। पर लाखों बच्‍चे एक से नहीं होते, इन तर्कों से ऐसा लगने लगा....। तीन सौ वर्षों  से यह तर्क दिये जा रहे हे कि कोई संबंध नक्षत्रों से व्‍यक्‍ति के जन्‍म का नहीं है।

शनिवार, 8 मई 2010

ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—2


      और पाइथागोरस जब यह बात  कह रहा था तब वह भारत और इजिप्‍ट इन दो मुल्‍कों की यात्रा करके वापस लौटा था। और पाइथागोरस जब भारत बुद्ध और महावीर के विचारों से तीव्रता से आप्‍लवित लौटा था। पाइथागोरस ने भारत से वापस लौटकर जो बातें कहीं है उसमें उसने महावीर ओ विशेषकर जैनों के संबंध में बहुत सी बातें महत्‍वपूर्ण कहीं है। उसने जैनों का मतलब तो जैन,तो जैन दार्शनिकों पाइथागोरस ने जैनोसोफिस्‍ट कहा है। वे नग्‍न रहते हैं, यह बात भी उसने की है।

गुरुवार, 6 मई 2010

ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—1

ज्‍योतिष शायद सबसे पुराना विषय है और एक अर्थ में सबसे ज्‍यादा तिरस्‍कृत विषय भी है। सबसे पुराना इसलिए कि मनुष्‍य जाति के इतिहास की जितनी खोजबीन हो सकी उसमें ऐसा कोई भी समय नहीं था जब ज्‍योतिष मौजूद न रहा हो। जीसस से पच्‍चीस हजार वर्ष पूर्व सुमेर में मिले हुए हडडी के अवशेषों पर ज्‍योतिष के चिन्‍ह अंकित है। पश्‍चिम में,पुरानी से पुरानी जो खोजबीन हुई है। वह जीसस से पच्‍चीस हजार वर्ष पूर्व इन हड्डियों की है। जिन पर ज्योतिष के चिन्‍ह और चंद्र की यात्रा के चिन्ह अंकित है। लेकिन भारत में तो बात और भी पुरानी है।

शनिवार, 1 मई 2010

तीर्थ—11 अंतिम पोस्‍ट (वृक्ष के माध्‍यम से संवाद)

तीर्थ है, मंदिर  है, उनका सारा का सारा विज्ञान है। और उस पूरे विज्ञान की अपनी सूत्रबद्ध प्रक्रिया है। एक कदम उठाने से दूसरा कदम उठना है, दूसरा उठाने से तीसरा उठता है। पीछे चौथा उठता है और परिणाम होता है। यदि एक भी कदम बीच में खो गया तो, एक भी सूत्र बीच में खो गया तो। परिणाम नहीं होता। एक और बात इस संबंध में ख्‍याल में ले लेनी चाहिए कि जब भी कोई सभ्‍यता बहुत विकसित हो जाती है और जब भी कोई विज्ञान बहुत विकसित हो जाता है। तो ‘’रिचुअल’’ सिम्‍पलीफाइड़ हो जाता है। काम्प्लैक्स नहीं रह जाता। जब वह काम विकसित होता है तब उसकी प्रक्रिया बहुत जटिल होती है। पर जब पूरी बात पता चल जाती है। तो उसके क्रियान्‍वित करने की जो व्‍यवस्‍था है वह बिलकुल सिम्पलीफाइड़ और सरल जो जाती है।
     अब इससे सरल क्‍या होगा की आप बटन दबा देते है और बिजली जल जाती है। लेकिन आप सोच सकते है कि जिसने बिजली बनायी, क्‍या उसने बटन दबाकर बिजली जला ली होगीं। अब इससे सरल क्‍यो होगा कि जो मैं बोल रहा हूं वह रिकार्ड  हो रहा है। कुछ भी तो नहीं करना पड़ रहा है हमें। लेकिन आप सोचते है, इतनी आसानी से वह टेप रिकार्डर बन गया। अगर मुझसे कोई पूछे कि क्‍या करना पड़ता है, तो मैं कहूंगा बोल दो और रिकार्ड हो जाता है। लेकिन इस तरह वह बन नहीं गया है।