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सोमवार, 5 सितंबर 2016

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--17)

प्रार्थना स्वयं मंजिल—(प्रवचन—सत्रहवां)

सारसूत्र:

 न परेस विलोमनि न परेस कताकतं।
अत्‍तनो’ वअवेक्‍खेय्य कतानि अकतानि च।।44।।

यथापि रूचिरं पुष्‍फं वण्‍णवंतं अगंधकं।
एवं सुभाषिता वाचा अफला होति अकुब्‍बतो।।45।।

यथापि रूचिरं पप्‍फं वण्‍णवंतं सगंधकं।
एवं सुभाषिता वाचा सफला होती कुब्‍बतो।।46।।

यथापि पुप्‍फरासिम्‍हा कयिरा मालागुणे बहु।
एवं जातेन मच्‍चेन कत्‍तव्‍वं कुसलं।।47।।

न पुप्‍फगंधो पटिवातमेति न चंदनं तगरं मल्‍लिका वा।
सतज्‍व गंधो पटिवातमेति सब्‍बा दिसा सप्‍पुरिसो पवाति।।48।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--16)

समझ और समाधि के अंतरसूत्र—(प्रवचन—सौहलवां)

पहला प्रश्न :

      महाकाश्यप उस दिन सुबह खिलखिलाकर न हंसा होता, तो भी क्या बुद्ध उसे मौन के प्रतीक फूल को देते?

प्रश्‍न पूछते समय थोड़ा सोचा भी करें कि प्रश्न का सार क्या है। यदि ऐसा हुआ होता! यदि वैसा हुआ होता! इन सारी बातों में क्यों व्यर्थ समय को व्यतीत करते हो?
      महाकाश्यप न हंसा होता तो बुद्ध फूल देते या न देते, इससे तुम्हें क्या होगा?
      महाकाश्यप न भी हुआ हो, हुआ हो, कहानी सिर्फ कहानी हो, तो भी तुम्हें क्या होगा? कुछ अपनी पूछो। कुछ ऐसी बात पूछो जो तुम्हारे काम पड़ जाए। प्रश्न ऐसे न हों कि सिर्फ मस्तिष्क की खुजलाहट हों, क्योंकि खुजलाहट का गुण है जितना खुजाओ बढ़ती चली जाती है।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--15)

केवल शिष्य जीतेगा—(प्रवचन—पंद्रहवां)

सारसूत्र:


को इमं पठविं विजेस्सति यमलोकज्‍च इमं सदेवकं।
को धम्मपद सुदेसितं कुसलो पुप्‍फमिव पचेस्सति।।39।।

सेखो पठविं विजेस्सति यमलोकज्‍च इमं सदेवकं।
सेखो धम्मपद सुदेसित कुसलो पुप्‍फमिव पचेस्सतिा।।40।।

फेणूपमं कायमिमं विदित्वा मरीचिधम्मं अभिसम्‍बुधाना।
छेत्वान मारस्स पुपुप्‍फ अदस्‍सनं मच्‍चुराजस्‍स गच्छे।।41।।

पुप्‍फ हेव पचिनतं व्यासत्तमनसं नरं।
सुत्‍तं गामं महोघोव मच्चु आदाय गच्छति।।42।।

यथापि भमरो पुप्‍फं वण्णगन्‍धं उहेठयं।
पलेति रसमादाय एवं गामे मुनिचरे।।43।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--14)

अनंत छिपा है क्षण में—(प्रवचन—चौहदवां)


 पहला प्रश्न :

आप श्रद्धा, प्रेम, आनंद की चर्चा करते हैं, लेकिन आप शक्ति के बारे में क्यों नहीं समझाते? आजकल मुझमें असह्य शक्ति का आविर्भाव हो रहा है। यह क्या है और इस स्थिति में मुझे क्या रुख लेना चाहिए?

शक्‍ति की बात करनी जरूरी ही नहीं। जब शक्ति का आविर्भाव हो तो प्रेम में उसे बांटो, आनंद में उसे ढालो। उसे दोनों हाथ उलीचो।
      शक्ति के आविर्भाव के बाद अगर उलीचा न, अगर बांटा न, अगर औरों को साझीदार न बनाया, अगर प्रेम के गीत न गाए, उत्सव पैदा न किया जीवन में, तो शक्ति बोझ बन जाएगी। तो शक्ति पत्थर की तरह छाती पर बैठ जाएगी। फिर शक्ति से समस्या उठेगी।

     गरीबी की ही समस्याएं नहीं हैं संसार में, अमीरी की बड़ी समस्याएं हैं। लेकिन अमीर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो धन उसे मिल गया, उसका क्या करे? पर यह भी कोई समस्या है? उसे बांटो, उसे लुटाओ। बहुत हैं जिनके पास नहीं है, उन्हें दो।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--13)

अंतर्बाती को उकसाना ही ध्यान—(प्रवचन—तेहरवां)

 सारसूत्र-

अनवस्‍सुतचित्‍तस्‍स अनन्‍वाहतचेतसो।
पुज्‍जपापपहीनस्‍स नत्‍थि जागरतो भयं।।34।।

कुम्‍भूपमं कायमिमं विदित्‍वा नगरूपमं चित्‍तमिदं ठपेत्‍वा।
योधेथ मारं पज्‍जायुधेन जितं च रक्‍खे अनिवेसनोसिया।।35।।

अचिरं वत’ यं कायो पठविं अधिसेस्‍सति।
छुद्धो अपेतविज्‍जाणो निरत्‍थं व कलिड्गरं।।36।।

दिसो दिसं यन्‍तं कयिरा वेरी व पन वेरिन।
मिच्‍छापणिहितं चितं पापियों नं ततो करे।।37।।

न तं माता-पिता कयिरा अज्‍जे वापि च जातका।
सम्‍माणिहितं चितं सेरूयसो नं ततो करे।।38।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--12)

उठो. तलाश लाजिम है—(प्रवचन—बारहवां)

पहला प्रश्‍न:

       जीवन विरोधाभासी है, असंगतियों से भरा है, तो फिर तर्क, बुद्धि, व्यवस्था और अनुशासन का मार्ग बुद्ध ने क्यों बताया?


      प्रश्‍न जीवन का नहीं है। प्रश्न तुम्हारे मन का है। जीवन को मोक्ष की तरफ नहीं जाना है। जीवन तो मोक्ष है। जीवन नहीं भटका है, जीवन नहीं भूला है। जीवन तो वहीं है जहां होना चाहिए। तुम भटके हो, तुम भूले हो। तुम्हारा मन तर्क की उलझन में है। और यात्रा तुम्हारे मन से शुरू होगी। कहां जाना है, यह सवाल नहीं है। कहां से शुरू करना है, यही सवाल है।
मंजिल की बात बुद्ध ने नहीं की। मंजिल की बात तुम समझ भी कैसे पाओगे? उसका तो स्वाद ही समझा सकेगा। उसमें तो डूबोगे, तो ही जान पाओगे। बुद्ध ने मार्ग की बात कही है। बुद्ध ने तुम जहां खड़े हो, तुम्हारा पहला कदम जहां पड़ेगा, उसकी बात कही है। इसलिए बुद्ध बुद्धि, विचार, अनुशासन, व्यवस्था की बात नही कि उन्हें पता नहीं है कि जीवन कोई व्यवस्था नहीं मानता।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--11)

तथाता में है क्रांति—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

 सारसूत्र:

 फन्दनं चपलं चितं दूरक्‍खं दुन्‍निवारयं।
उजुं करोति मेधावी व उसुकारो‘ व तेजनं।।29।।

वारिजो' व क्ले कित्तो ओकमोकत-उव्भतो।
परिफन्दतिदं चित्तं मारधेथ्यं पहातवे।।30।।

दुन्‍निग्‍गहस्‍स लहुनो यत्थकाम निपातिनो।
चित्‍तस्‍स दमथो साधु चितं दन्‍तं सुखावहं।।31।।


दूरड्गम एकचरं असरीरं गुहासयं।
ये चित्तं सज्जमेस्सन्ति मोक्खन्ति मारबन्‍धना।।32।।

अनवट्ठित चित्तस्स सद्धम्मं अविजानतो।
परिप्लवपसादस्स पज्जा न परिपूरति।।33।।

एस धम्‍मो सनंतनो- (भाग--02)-ओशो

एस धम्‍मो सनंतनो--(भाग-02)
-ओशो

(ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्‍मपद पर दिए गए दस अमृत प्रवचनों का संकलन)

जो गीत तुम्‍हारे भीतर अनगाया पडा है। उसे गाओ। जो वीणा तुम्‍हारे भीतर सोई हुई पड़ी है छेड़ो उसके तारों को। जो नाच तुम्‍हारे भीतर तैयार हो रहा है, उसे तुम बोझ की तरह मत ढोओ। उसे प्रगट हो जाने दो। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति अपने भीतर बुद्धत्‍व को लेकर चल रहा है। जब तक वह फूल न खिले,तब तक बेचैनी रहेगी, संताप रहेगा। वह फूल खिल जाए, निर्वाण है। सच्‍चिदानंद है, मोक्ष है।

रविवार, 4 सितंबर 2016

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--10)

देखा तो हर मुकाम तेरी रहगुजर में है—(प्रवचन—दसवां)

पहला प्रश्न:

भगवान, एक ही आरजू है कि इस खोपड़ी से कैसे मुक्ति हो जाए? आपकी शरण आया हूं।

पूछा है चिन्मय ने।
खोपड़ी से मुक्त होने का खयाल भी खोपड़ी का ही है। मुक्त होने की जब तक आकांक्षा है, तब तक मुक्ति संभव नहीं। क्योंकि आकांक्षा मात्र ही, आकांक्षा की अभीप्सा मन का ही जाल और खेल है। मन संसार ही नहीं बनाता, मन मोक्ष भी बनाता है। और जिसने यह जान लिया वही मुक्त हो गया।
साधारणतः ऐसा लगता है, मन ने बनाया है संसार, तो हम मन से मुक्त हो जाएं तो मुक्त हो जाएंगे। वहीं भूल हो गयी। वहीं मन ने फिर धोखा दिया। फिर मन ने चाल चली। फिर मन ने जाल फेंका। फिर तुम उलझे। फिर नया संसार बना। मोक्ष भी संसार बन जाता है।
संसार का अर्थ क्या है? जो उलझा ले। संसार का अर्थ क्या है? जो अपेक्षा बन जाए, वासना बन जाए। संसार का अर्थ क्या है? जो तुम्हारा भविष्य बन जाए। जिसके सहारे और जिसके आसरे और जिसकी आशा में तुम जीने लगो, वही संसार है। दुकान पर बैठे हो, इससे संसार में हो; मंदिर में बैठ जाओगे, संसार के बाहर हो जाओगे--इतनी सस्ती बातों में मत पड़ जाना।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--09)

यात्री, यात्रा, गंतव्य: तुम्हीं—(प्रवचन—नौवां)
सूत्र:

मा प्रमादमनुयुग्चेथ मा कामरतिसंथवं।
अप्पमत्तो हि झायंतो पप्पोति विपुलं सुखं।।24।।

पमादं अप्पमादेन यदा नुदति पंडितो।
पग्भपासादमारुयूह असोको सोकिनिं पजं।
पब्बतट्ठो' व भूमट्ठे धीरो बाले अवेक्खति।।25।।

अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो।
अबलस्सं' व धीघस्सो हित्वा याति सुमेधसो।।26।।


अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा।
सग्जोजनं अपुं थूलं डहं अग्गी' व गच्छति।।27।।

अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा।
अभब्बो परिहानाय निब्बानस्सेव संतिके।।28।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--08)

प्रेम है महामृत्यु—(प्रवचन—आठवां)

पहला प्रश्न:

दुनिया के ज्यादातर धर्मगुरुओं ने अपने स्त्री-पुरुष संन्यासियों को हो सके उतनी दूरी रखने के नियम दिए; पर आप हमेशा दोनों के प्रेम पर ही जोर देते हैं। क्या आप प्रेम का कुछ विधायक उपयोग करना चाहते हैं? या उसकी निरर्थकता का हमें अनुभव कराना चाहते हैं?

प्रेम को समझना जरूरी है।
जीवन की ऊर्जा या तो प्रेम बनती है, या भय बन जाती है। दुनिया के धर्मगुरुओं ने आदमी को भय के माध्यम से परमात्मा की तरफ लाने की चेष्टा की है। पर भय से भी कहीं कोई आना हुआ है? भय से भी कहीं कोई संबंध बनता है? भय से घृणा हो सकती है, भय से प्रतिरोध हो सकता है; लेकिन भय से मुक्ति नहीं हो सकती। भय तो जहर है, फिर परमात्मा का ही क्यों न हो।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--07)

जागकर जीना अमृत में जीना है—(प्रवचन—सातवां)

अप्पमादो अमतपदं पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयंति ये पमत्ता यथा मता।।18।।

एतं विसेसतो भ्त्वा अप्पमादम्हि पंडिता।
अप्पमादे पमोदंति अरियानं गोचरे रता।।19।।


ते झायिनो साततिका निच्चं दल्ह-परक्कमा।
फुसंति धीरा निब्बानं योगक्खेमं अनुत्तरं।।20।।


उट्ठानवतो सतिमतो सुचिकम्मस्स निसम्मकारिनो।
सग्भ्तस्स च धम्मजीविनो अप्पमत्तस्स यसोभिङ्ढति।।21।।

उट्ठानेनप्पमादेन सग्भ्मेन दमेन च।
दीपं कयिराथ मेधावी यं ओधो नाभिकीरति।।22।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--06)

'आज' के गर्भाशय से 'कल' का जन्म—(प्रवचन—छठवां)

पहला प्रश्न:

आपने स्त्री के लिए प्रेम और पुरुष के लिए ध्यान का मार्ग बताया। मेरी तकलीफ यह है कि न प्रेम में पूरा डूब पाती हूं, न ध्यान में गहराई आती है। कृपया बताएं मेरे लिए मार्ग क्या है?

धर्म ज्योति ने पूछा है।
धर्मगुरुओं का डाला हुआ जहर बाधा बन रहा है। उस जहर से जब तक छुटकारा न हो, प्रेम तो असंभव है। क्योंकि प्रेम की सदा से निंदा की गयी है। प्रेम को सदा बंधन कहा गया है। और चूंकि प्रेम की निंदा की गयी है और प्रेम को बंधन कहा गया है, इसलिए स्त्री भी सदा अपमानित की गयी है। जब तक प्रेम स्वीकार न होगा तब तक स्त्री भी सम्मानित नहीं हो सकती, क्योंकि स्त्री का स्वभाव प्रेम है।

एस धम्‍मो सनंननो--(प्रवचन--05)


बुद्धपुरुष स्वयं प्रमाण है ईश्वर का—(प्रवचन—पांचवां)

इध सोचति पेच्च सोचति पापकारी उभयत्थ सोचति।
सो सोचति सो विहग्भ्ति दिस्वा कम्मकिलिट्ठमत्तनो।।13।।

इध मोदति पेच्च मोदति कतपुग्भे उभयत्थ मोदति।
सो मोदति सो पमोदति दिस्वा कम्मविसुद्धिमत्तनो।।14।।

इध तप्पति पेच्च तप्पति पापकारी उभयत्थ तप्पति।
पापं मे कतन्ति तप्पति भीय्यो तप्पति दुग्गतिङ्गतो।।15।।


बहुम्पि चे सहितं भासमानो न तक्करो होति नरो पमत्तो।
गोपो' व गावो गणयं परेसं न भागवा सामग्भ्स्स होति।।16।।

अप्पम्पि चे सहितं भासमानो धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।
रागग्च दोसग्च पहाय मोहं सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो।
अनुपादियानो इध वा हुरं वा स भागवा सामग्भ्स्स होति।।17।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--04)

अकंप चैतन्य ही ध्यान—(प्रवचन—चौथा)

पहला प्रश्न:

बुद्ध ने मन को जानने-समझने पर ही सारा जोर दिया लगता है। क्या मन से मनुष्य का निर्माण होता है? आत्मा-परमात्मा की सारी बातें क्या व्यर्थ हैं?

बातें व्यर्थ हैं। अनुभव व्यर्थ नहीं। आत्मा, परमात्मा, मोक्ष शब्द की भांति, विचार की भांति दो कौड़ी के हैं। अनुभव की भांति उनके अतिरिक्त और कोई जीवन नहीं। बुद्ध ने मोक्ष को व्यर्थ नहीं कहा है, मोक्ष की बातचीत को व्यर्थ कहा है। परमात्मा को व्यर्थ नहीं कहा है। लेकिन परमात्मा के संबंध में सिद्धांतों का जाल, शास्त्रों का जाल, उसको व्यर्थ कहा है।
मनुष्य इतना धोखेबाज है कि वह अपनी ही बातों से स्वयं को धोखा देने में समर्थ हो जाता है। ईश्वर की बहुत चर्चा करते-करते तुम्हें लगता है ईश्वर को जान लिया। इतना जान लिया ईश्वर के संबंध में, कि लगता है ईश्वर को जान लिया। लेकिन ईश्वर के संबंध में जानना ईश्वर को जानना नहीं है। यह तो ऐसा ही है जैसे कोई प्यासा पानी के संबंध में सुनते-सुनते सोच ले कि पानी को जान लिया। और प्यास तो बुझेगी नहीं। पानी की चर्चा से कहीं प्यास बुझी है! परमात्मा की चर्चा से भी प्यास न बुझेगी। और जिनकी बुझ जाए, समझना कि प्यास लगी ही न थी।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--03)


ध्यानाच्छादित अंतर्लोक में राग को राह नहीं—(प्रवचन—तीसरा)

सुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु असंवुतं।
भोजनम्हि अमत्तग्भु कुसीतं हीनवीरियं।
तं वे पसहति मारो वातो रुक्खं' व दुब्बलं।।7।।

असुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु सुसंवुतं।
भोजनम्हि च मत्तग्भु सद्धं आरद्धवीरियं।
तं वे नप्पसहति मारो वातो सेलं' व पब्बतं।।8।।


असारे सारमतिनो सारे चासारदस्सिनो।
ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छासङ्कप्पगोचरा।।9।।

सारंग्च सारतो भ्त्वा असारग्च असारतो।
ते सारं अधिगच्छन्ति सम्मासङ्कप्पगोचरा।।10।।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

समाधि कमल--(प्रवचन--15)

राजनीति से छुटकारा—(प्रवचन—पंद्रहवां)


मेरे प्रिय आत्मन्!
शिविर का अंतिम दिन है और इसलिए यहां से विदा होने के पूर्व कुछ थोड़ी सी जरूरी बातें आपसे कह देनी आवश्यक हैं। लेकिन इसके पहले कि मैं उन्हें कहूं, एक-दो प्रश्न और, जो महत्वपूर्ण हैं और छूट गए हैं, उनकी भी चर्चा कर लेनी उचित होगी। फिर भी कुछ प्रश्न छूट जाएंगे, तो मैं निवेदन करूंगा कि जिन प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं, जिनकी चर्चा की गई, यदि उनको ठीक से सुना गया होगा, तो जो प्रश्न छूट जाएं उनका भी विचार आपके भीतर पैदा हो सकता है।
बहुत से प्रश्न समान हैं, थोड़ा-बहुत भेद है, और जो-जो उनमें प्रतिनिधित्व करने वाले प्रश्न थे उनको चुन कर मैंने अपने विचार आपसे कहे।
सबसे पहले एक सबसे फिजूल प्रश्न है उसको ले लूं, ताकि उससे छुटकारा हो जाए। वह तीन दिन से मैं उसे फेंक देता हूं, वह फिर कोई लिख कर भेज देता है। फिर उसे अलग कर देता हूं, फिर भेज देता है।

समाधि कमल--(प्रवचन--14)

एकांत का मूल्य—(प्रवचन—चौदहवां)

मैं समझता हूं कि कोई और प्रश्न नहीं हैं। जो प्रश्न पूछे हैं, कुछ प्रश्न दोपहर भी किसी ने पूछे थे और एक-दो प्रश्न कल के भी बिना उत्तर के रह गए हैं।
प्रश्नों के संबंध में सबसे पहली बात तो यह जाननी जरूरी है कि जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है उसके संबंध में किसी दूसरे से कोई भी उत्तर नहीं पाए जा सकते हैं। और जो भी उत्तर दूसरे से पाए जा सकते हैं वे भीतर जाकर न कोई समाधान बनते हैं और न मनुष्य की उलझन को हल कर पाते हैं। ठीक-ठीक जीवन के उत्तर तो खुद ही खोजने होते हैं। श्रम से, साधना से खुद ही उनके उत्तर पाने पड़ते हैं।
लेकिन फिर भी सोचने का ढंग, विचार करने का ढंग पूछने से उपलब्ध हो सकता है। मैं जिन प्रश्नों के उत्तर आपको दूं, मेरे उत्तर मान लेने आवश्यक नहीं हैं, ज्यादा अर्थ की बात यह होगी कि आप भी उन प्रश्नों पर नई-नई दृष्टियों से विचार करना शुरू करें। प्रश्न तो एक मौका है, उस मौके से मनुष्य विचार करने में पड़ जाता है।

समाधि कमल--(प्रवचन--13)

अभाव का बोध—(प्रवचन—तैहरवां)


मेरे प्रिय आत्मन्!
बीते दो दिनों में सुबह की चर्चाओं में दो बिंदुओं पर हमने विचार किया: अज्ञान का बोध और रहस्य का बोध।
अज्ञान का बोध न हो तो ज्ञान ही बाधा बन जाता है और रहस्य का बोध न हो तो व्यक्ति अपने में ही सीमित हो जाता है। और जो विराट ब्रह्म विस्तीर्ण है चारों ओर, उससे उसके संपर्क-सूत्र शिथिल हो जाते हैं, उससे उसकी जड़ें टूट जाती हैं। और जो व्यक्ति अपने में ही केंद्रित हो जाता है वह स्वभावतः पीड़ा और दुख में पड़ जाता है और चिंता में पड़ जाता है।
इन दो तत्वों के संबंध में विचार किया। मनुष्य सर्वसत्ता से इन दो दीवालों के कारण टूटा है। टूट की वजह से उसके भीतर कौन सी घटना घटी है और वह घटना कैसे विसर्जित होगी, उसकी चर्चा मैं आज करना चाहता हूं। क्यों मनुष्य अपने को ज्ञान से भरना चाहता है? क्यों मनुष्य प्रकृति के रहस्य से दूर हट गया और टूट गया? कोई सुनिश्चित कारण पीछे होंगे। अकारण यह नहीं हुआ है। उन कारणों पर थोड़ा सा विचार करेंगे, और कैसे वापस मनुष्य अपने थोथे अहंकार से मुक्त हो सकता है और जीवन से संबंधित, उसका भी।

समाधि कमल--(प्रवचन--12)

शास्त्र, धर्म और मंदिर—(प्रवचन—बाहरवां)

किसी ने पूछा है कि मैं कहता हूं: शास्त्र-ग्रंथ और धर्म-मंदिर व्यर्थ हैं। यह कैसे? शास्त्र-ग्रंथों से तो तत्व का ज्ञान मिलता है और मंदिर की भगवान की मूर्ति देख कर सम्यक दर्शन की प्राप्ति होती है।

संभवतः मैंने जो इतनी बातें कहीं, जिन्होंने भी पूछा है उन्हें सुनाई नहीं पड़ी होंगी।
मैंने यह कहा कि पदार्थ का ज्ञान बाहर से मिल सकता है, क्योंकि पदार्थ बाहर है। जो बाहर है उसका ज्ञान बाहर से मिल सकता है। कोई आत्म-ज्ञान से गणित और इंजीनियरिंग और केमिस्ट्री और फिजिक्स का ज्ञान नहीं हो जाएगा और न ही भूगोल के रहस्यों का पता चल जाएगा। जो बाहर है उसे बाहर खोजना होगा।

विज्ञान उस काम को करता है, इसलिए विज्ञान के शास्त्र होते हैं। विज्ञान एक शास्त्र है। विज्ञान के शास्त्र होते हैं, बिना शास्त्रों के विज्ञान का कोई ज्ञान नहीं हो सकता। केमिस्ट्री सीखनी हो, फिजिक्स या गणित सीखना हो, तो शास्त्र से सीखना पड़ेगा। क्योंकि विज्ञान के विषय भी बाहर हैं और उसका ज्ञान भी बाहर है।

समाधि कमल--(प्रवचन--11)

ध्यान--जागरण का द्वार—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

इतने दिन की चर्चा में मैंने यह कहा कि अज्ञानी मनुष्य, अज्ञान से घिरा हुआ व्यक्ति जो भी करेगा वह गलत होगा। वह जो भी करेगा गलत होगा।

पूछा है: यदि अज्ञान से घिरा हुआ व्यक्ति जो भी करेगा वह गलत होगा, तो ध्यान, जागरण, इसकी जो चेष्टा है वह भी उसकी गलत होगी। फिर तो कोई द्वार नहीं रहा, फिर तो कोई मार्ग नहीं रहा। इससे संबंधित और दोत्तीन प्रश्न भी हैं इसलिए सबसे पहले इसी प्रश्न को मैं ले लेता हूं।

निश्चित ही, भीतर अज्ञान हो तो हम जो भी करेंगे वह ठीक नहीं हो सकता। सामान्यतया सोचा जाता है कि कर्म ठीक होते हैं या गलत होते हैं। एक आदमी मंदिर जाता है तो हम कहते हैं ठीक है; एक आदमी वेश्यागृह में जाता है तो हम कहते हैं गलत है।
एक आदमी चोरी करता है तो हम कहते हैं बुरा है, पाप है; एक आदमी दान देता है तो हम कहते हैं शुभ है, पुण्य है। हम कर्मों को देखते और विचार करते हैं। मेरे देखे यह आमूलतः गलत है। कर्म न तो अच्छे हो सकते हैं और न बुरे; चेतना अच्छी होती है या बुरी। और चेतना यदि गलत हो तो चाहे कर्म ऊपर से कितना ही ठीक दिखाई पड़े, बुनियाद में, आधार में गलत होगा।