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शनिवार, 31 मई 2014

गीता दर्शन--(भाग-3) प्रवचन--6


अंतर्यात्रा का विज्ञान (अध्याय—6) प्रवचन—छठवां


शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।। 11।।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः
उपविश्यासने युग्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।। 12।।

शुद्ध भूमि में कुशा, मृगछाला और वस्त्र है उपरोपरि जिसके, ऐसे अपने आसन को न अति ऊंचा और न अति नीचा स्थिर स्थापन करके, और उस आसन पर बैठकर
तथा मन को एकाग्र करके, चित्त और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में किया हुआ, अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।

अंतर-गुहा में प्रवेश के लिए, वह जो हृदय का अंतर- आकाश है, उसमें प्रवेश के लिए कृष्ण ने कुछ विधियों का संकेत अर्जुन को किया है।

योग की समस्त विधियां बाहर से प्रारंभ होती हैं और भीतर समाप्त होती हैं। यही स्वाभाविक भी है। क्योंकि मनुष्य जहां है, वहीं से प्रारंभ करना पड़ेगा। मनुष्य की जो स्थिति है, वही पहला कदम बनेगी। और मनुष्य बाहर है। इसलिए योग की कोई भी शुरुआत स्वभावतः बाहर से होगी। हम जहां हैं, वहीं से यात्रा पर निकल सकते हैं। जहां हम नहीं हैं, वहां से यात्रा शुरू नहीं की जा सकती है।
इस संबंध में दोत्तीन अनिवार्य बातें समझ लेनी चाहिए, फिर कृष्ण की विधि पर हम विचार करें।
बहुत बार ऐसा हुआ है। जो जानते हैं, उनका मन होता है आपसे कहें, वहीं से शुरू करो, जहां वे हैं। उनकी बात इंच-इंच सही होती है, फिर भी बेकार हो जाती है।
मैं जहां हूं, अगर मैं किसी दूसरे को कहूं कि वहां से शुरू करो, तो भला बात कितनी ही सही हो, वह दूसरे के लिए व्यर्थ हो जाएगी। उचित और सार्थक तो यही होगा कि दूसरा जहां है, वहां से मैं कहूं कि यहां से शुरू करो।
बहुत बार जानने वाले लोगों ने भी अपनी स्थिति से वक्तव्य दे दिए हैं, जो कि किसी के काम नहीं पड़ते हैं। और उन वक्तव्यों से बहुत बार हानि भी हो जाती है। क्योंकि वहां से आप कभी शुरू ही नहीं कर सकते हैं। सुनेंगे, समझेंगे, सारी बात खयाल में आ जाएगी और फिर भी पाएंगे कि अपनी जगह ही खड़े हैं; इंचभर हट नहीं पाते हैं। क्योंकि जहां आप खड़े हैं, वहां से वह बात शुरू नहीं हो रही है। वह बात वहां से शुरू हो रही है, जहां करने वाला खड़ा है। और यात्रा तो वहां से शुरू होगी, जहां आप खड़े हैं।
मैं अगर मंदिर के भीतर खड़ा हूं, तो मैं आपसे कह सकता हूं कि मंदिर के भीतर आ जाओ। और सीढ़ियों की चर्चा छोड़ सकता हूं। क्योंकि जहां मैं खड़ा हूं, वहां सीढ़ियों का कोई भी प्रयोजन नहीं है। द्वार-दरवाजों की बात न करूं, हो सकता है। क्योंकि जहां मैं खड़ा हूं, अब वहां कोई द्वार-दरवाजा नहीं है। लेकिन आपको द्वार-दरवाजा भी चाहिए होगा, सीढ़ियां भी चाहिए होंगी, तभी मंदिर के भीतर प्रवेश हो सकता है।
जो आत्यंतिक वक्तव्य हैं, अंतिम वक्तव्य हैं, वे सही होते हुए भी उपयोगी नहीं होते हैं।
कृष्ण ऐसी बात कह रहे हैं, जो कि पूरी सही नहीं है, लेकिन फिर भी उपयोगी है। और बहुत बार कृष्ण जैसे शिक्षकों को ऐसी बातें कहनी पड़ी हैं, जो कि उन्होंने मजबूरी में कही होंगी--आपको देखकर, आपकी कमजोरी को देखकर। वे वक्तव्य आप पर निर्भर हैं, आपकी कमजोरी और सीमाओं पर निर्भर हैं।
अब जैसे कृष्ण कह रहे हैं आसन की बात कि आसन न बहुत ऊंचा हो, न बहुत नीचा हो।
जो भीतर पहुंच गया, वहां ऊपर-नीचा आसन, न-आसन, कुछ भी शेष नहीं रह जाते। वैसा भीतर पहुंचा हुआ आदमी कह सकता है, जैसा कबीर ने बहुत जगह कहा है कि क्या होगा आसन लगाने से? सब व्यर्थ है! कबीर गलत नहीं कहते। कबीर एकदम ठीक ही कहते हैं। लेकिन कबीर जो कहते हैं उसमें और आप में इतना बड़ा अंतराल, इतना बड़ा गैप है कि वह कभी पूरा नहीं होगा।
कबीर कहते हैं, क्या होगा मृगछाल बिछा लेने से? ठीक ही कहते हैं, गलत नहीं कहते हैं। मृग की चमड़ी भी बिछा ली, उस पर बैठ भी गए, तो क्या होगा? आत्यंतिक दृष्टि से, आखिरी दृष्टि से कबीर ठीक ही कहते हैं कि क्या होगा? कितने ही मृगचर्म बिछाकर बैठ जाएं, तो होना क्या है?
फिर भी जब कृष्ण कहते हैं, तो कबीर से ज्यादा करुणा है उनके मन में। जब वे अर्जुन से कहते हैं कि मृगचर्म पर बैठकर, न अति ऊंचा हो आसन, न अति नीचा हो, सम हो, ऐसे आसन में बैठकर, चित्त को एकाग्र करे, इंद्रियों के व्यापार को समेट ले, इंद्रियों का मलिक हो जाए--तो ही योग में प्रवेश होता है।
कृष्ण और कबीर के इन वक्तव्यों में इतना फासला क्यों है? देखकर लगेगा कि या तो कृष्ण गलत होने चाहिए, अगर कबीर सही हैं। या कबीर गलत होने चाहिए, अगर कृष्ण सही हैं, जैसा कि सारी दुनिया में चलता है।
हम सदा ऐसा सोचते हैं, इन दोनों में से दोनों तो सही नहीं हो सकते। हां, दोनों गलत हो सकते हैं। लेकिन दोनों सही नहीं हो सकते।
कबीर तो कहते हैं, फेंक दो यह सब। इस सबसे कुछ न होगा। और कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं कि इस सबसे यात्रा शुरू होगी! क्या कारण है? और मैं कहता हूं, दोनों सही हैं। कारण सिर्फ इतना है कि कबीर वहां से बोल रहे हैं, जहां वे खड़े हैं। और कृष्ण वहां से बोल रहे हैं, जहां अर्जुन खड़ा है। कबीर वह बोल रहे हैं, जो उनके लिए सत्य है। कृष्ण वह बोल रहे हैं, जो कि अर्जुन के लिए सत्य हो सके।
गहरे अर्थों में क्या फर्क पड़ता है? आत्मा का कोई आसन होता है? गङ्ढे में बैठ गए, तो आत्मा न मिलेगी? ऊंची जमीन पर बैठ गए, तो आत्मा न मिलेगी? अगर ऐसी छोटी शर्तों से आत्मा का मिलना बंधा हो, तो बड़ा सस्ता खेल हो गया!
नहीं; आत्मा तो मिल जाएगी कहीं से भी। फिर भी, जहां हम खड़े हैं, वहां इतनी ही छोटी चीजों से फर्क पड़ेगा, क्योंकि हम इतने ही छोटे हैं। जहां हम खड़े हैं, इतनी क्षुद्र बातों से भी भेद पड़ेगा।
कभी ध्यान करने बैठे हों, तो खयाल में आएगा। अगर जरा तिरछी जमीन है, तो पता चलेगा कि उस जमीन ने ही सारा वक्त ले लिया। अगर पैर में एक जरा-सा कंकड़ गड़ रहा है, तो पता चलेगा कि परमात्मा पर ध्यान नहीं जा सका, कंकड़ पर ही ध्यान रह गया! एक जरा-सी चींटी काट रही है, तो पता चलेगा कि चींटी परमात्मा से ज्यादा बड़ी है! परमात्मा की तरफ इतनी चेष्टा करके ध्यान नहीं जाता और चींटी की तरफ रोकते हैं, तो भी ध्यान जाता है!
जहां हम खड़े हैं अति सीमाओं में घिरे, अति क्षुद्रताओं में घिरे; जहां हमारे ध्यान ने सिवाय क्षुद्र विषयों के और कुछ भी नहीं जाना है, वहां फर्क पड़ेगा। वहां इस बात से फर्क पड़ेगा कि कैसे आसन में बैठे। इस बात से फर्क पड़ेगा कि कैसी भूमि चुनी। इस बात से फर्क पड़ेगा कि किस चीज पर बैठे। क्यों फर्क पड़ जाएंगे? हमारे कारण से फर्क पड़ेगा। हमें इतनी छोटी चीजें परिवर्तित करती हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं है!
तो कबीर जैसे लोगों के वक्तव्य हमारे लिए खतरनाक सिद्ध भी हो जाते हैं। क्योंकि हम कहते हैं, ठीक है। कबीर कहते हैं कि क्या आसन? और बिलकुल ठीक कहते हैं। बात बिलकुल ठीक लगती है। लेकिन फिर भी जहां हम हैं, वहां बिलकुल ठीक नहीं है।
और सारे वक्तव्य इस जगत में रिलेटिव हैं, सापेक्ष हैं। और जो लोग भी एब्सोल्यूट, निरपेक्ष वक्तव्य देने की आदत से भर जाते हैं, वे हमारे किसी काम के सिद्ध नहीं होते।
जैसे कृष्णमूर्ति हैं। उनके सारे वक्तव्य निरपेक्ष हैं, एब्सोल्यूट हैं, और इसलिए बिलकुल बेकार हैं। सही होते हुए भी बिलकुल बेकार हैं। वर्षों कोई सुनता रहे; वहीं खड़ा रहेगा जहां खड़ा था, इंचभर यात्रा नहीं होगी। क्योंकि जिन चीजों से हम यात्रा कर सकते हैं, उन सबका निषेध है। और बात बिलकुल सही है, इसलिए समझ में आ जाएगी कि बात बिलकुल सही है। समझ में आ जाएगी और अनुभव में कुछ भी न आएगा। और समझ और अनुभव के बीच इतना फासला बना रहेगा कि उसकी पूर्ति कभी होनी संभव नहीं है।
और कृष्णमूर्ति को सुनने वाले, चालीस साल से सुनने वाले लोग कभी मेरे पास आते हैं। वे कहते हैं कि हम चालीस साल से सुन रहे हैं। हम सब समझते हैं कि वे क्या कहते हैं। बिलकुल ठीक समझते हैं। इंटलेक्चुअल अंडरस्टैंडिंग हमारी बिलकुल पूरी है। लेकिन पता नहीं, कुछ होता क्यों नहीं है!
अगर उनसे कहो कि आसन ऐसा लगाना, तो वे कहेंगे, आप भी क्या बात कर रहे हैं! आत्मा का आसन से क्या लेना-देना? अगर उनसे कहो कि दृष्टि इस बिंदु पर रखना, वे कहेंगे कि इससे क्या होगा? अगर उनसे कहो, इस विधि का उपयोग करना, तो वे कहते हैं, कृष्णमूर्ति कहते हैं, कोई मेथड नहीं है।
वे बिलकुल ठीक कहते हैं, मगर आप गलत आदमी हैं। और आपको नहीं सुनना चाहिए था उन्हें। बिना विधि के आपने जिंदगी में कुछ भी नहीं किया है, बिना मेथड के कुछ भी नहीं किया है। आपके मन की सारी समझ, आपके चित्त की सारी व्यवस्था मेथड और विधि से चलती है।
एक बहुत बड़ा वक्तव्य आपने सुना कि किसी मेथड की कोई जरूरत नहीं है। आपका वह जो आलसी मन है, वह कहेगा कि बात तो बिलकुल ठीक है, मेथड की क्या जरूरत है! झंझट से भी बच गए। अब कोई विधि भी नहीं लगानी है। कोई आसन भी नहीं लगाना है। कोई मंत्र नहीं पढ़ना है। कोई स्मरण नहीं करना है। कुछ नहीं करना है। मगर कुछ नहीं तो आप पहले से ही कर रहे हैं। अगर पहुंचना होता, तो बहुत पहले पहुंच गए होते। और अब आपको और एक पक्का मजबूत खयाल मिल गया कि कुछ भी नहीं करना है।
ध्यान रहे, कुछ भी नहीं करना इस पृथ्वी पर सबसे कठिन करने वाली बात है। इसलिए आप जिसको समझते हैं, कुछ भी न करना, वह कुछ भी न करना नहीं है।
तो कृष्ण का यह वक्तव्य ऐसा लगेगा कि बड़ा साधारण है, लेकिन साधारण नहीं है। अगर समतुल आसन हो और आपके शरीर के दोनों हिस्से बिलकुल समान स्थिति में भूमि पर हों, कोई हिस्सा नीचा-ऊपर न हो, आपके शरीर को झुकना न पड़े, तो उसके बहुत वैज्ञानिक कारण हैं।
जमीन चौबीस घंटे प्रतिपल अपने ग्रेविटेशन से हमारे शरीर को प्रभावित करती है। उसका गुरुत्वाकर्षण पूरे समय काम कर रहा है। जब आप बिलकुल समतुल होते हैं, तो गुरुत्वाकर्षण न्यूनतम होता है, मिनिमम होता है। जब आप जरा भी तिरछे होते हैं, तो गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण का और आपके शरीर का संबंध बढ़ जाता है। अगर मैं बिलकुल सीधे आसन में बैठा हुआ हूं, तो गुरुत्वाकर्षण बिलकुल सीधी रेखा में, सिर्फ रीढ़ को ही प्रभावित करता है। अगर मैं जरा झुक गया, तो जितना मैं झुक गया, पृथ्वी उतने ही हिस्से में कोण बनाकर गुरुत्वाकर्षण से शरीर को प्रभावित करने लगती है।
इसीलिए तिरछे खड़े होकर आप जल्दी थक जाएंगे, सीधे बैठकर आप कम थकेंगे। तिरछे बैठकर आप जल्दी थक जाएंगे। जमीन आपको ज्यादा खींचेगी। इसलिए लेटकर आप विश्राम पा जाते हैं, क्योंकि लेटकर आप जरा भी तिरछे नहीं होते, पूरी जमीन का गुरुत्वाकर्षण आपके शरीर पर समान होता है।
समान गुरुत्वाकर्षण आधार है कृष्ण के इस वक्तव्य का। जरूरी नहीं है कि कृष्ण को गुरुत्वाकर्षण का कोई पता हो; आवश्यक भी नहीं है। कोई न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण को पैदा नहीं किया है। न्यूटन नहीं था, तो भी गुरुत्वाकर्षण था। शब्द नहीं था हमारे पास कि क्या है। लेकिन इतना पता था कि जमीन खींचती है, और शरीर को चौबीस घंटे प्रतिपल खींचती है।
शरीर को हम ऐसी स्थिति में रख सकते हैं कि जमीन का अधिकतम आकर्षण शरीर पर हो। और जहां शरीर पर अधिकतम आकर्षण होगा, वहां शरीर जल्दी थकेगा, बेचैन होगा, परेशान होगा और चित्त को थिर करने में आपके लिए कठिनाई होगी--कृष्ण के लिए नहीं।
शरीर ऐसी स्थिति में हो सकता है, जहां गुरुत्वाकर्षण न्यूनतम है, मिनिमम है। जिसको हम सिद्धासन कहते हैं, सुखासन कहते हैं, पद्मासन कहते हैं, वे न्यूनतम गुरुत्वाकर्षण के आसन हैं। और आज तो वैज्ञानिक भी स्वीकार करता है कि अगर सिद्धासन में आदमी बहुत दिन तक, बहुत समय तक रह सके, तो उसकी उम्र बढ़ जाएगी। बढ़ जाएगी सिर्फ इसलिए कि उसके शरीर और जमीन के आकर्षण के बीच जो संघर्ष है, वह कम से कम होगा और शरीर कम से कम जरा-जीर्ण होगा।
अगर कृष्ण कहते हैं कि ऐसी भूमि चुनना ध्यान के लिए, जो नीची-ऊंची न हो; बहुत ऊंची भी न हो, बहुत नीची भी न हो। उसके भी कारण हैं। एक आदमी गङ्ढे में भी बैठ सकता है। एक आदमी एक मचान बांधकर भी बैठ सकता है। खतरे क्या हैं? अगर आप गङ्ढे में बैठ जाते हैं, जमीन के नीचे बैठ जाते हैं, तो एक दूसरे नियम पर ध्यान दे देना जरूरी है।
मैं यहां बोल रहा हूं, इस माइक को थोड़ा मैं नीचे कर लूं, अपने हाथ के तल पर ले आऊं, तो मेरी आवाज इस माइक के ऊपर से निकल जाएगी। मेरी ध्वनि तरंगें इसके ऊपर से निकल जाएंगी। यह आवाज मेरी ठीक से नहीं पकड़ पाएगा। इसे मैं बहुत ऊंचा कर दूं, तो भी मेरी ध्वनि तरंगें नीचे से निकल जाएंगी। यह माइक उन्हें पकड़ नहीं पाएगा। यह माइक मेरी ध्वनि तरंगों को तभी ठीक से पकड़ेगा, जब यह ठीक समानांतर, वाणी की तरंगों के समानांतर होगा। मेरे होंठों के जितने समानांतर होगा, उतनी ही सुविधा होगी इसे मेरी ध्वनि पकड़ लेने के लिए।
पूरी पृथ्वी पूरे समय अनंत तरह की तरंगों से प्रवाहित है। अनंत तरंगें चारों ओर फैल रही हैं। इन तरंगों में कई वजन की तरंगें, कई भार की तरंगें हैं। और यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जितने बुरे विचारों की तरंगें हैं, वे उतनी ही भारी हैं, उतनी ही हैवी हैं। जितने शुभ विचारों की तरंगें हैं, उतनी हलकी हैं, निर्भार हैं।
अगर आप एक गङ्ढे में बैठकर ध्यान करते हैं, कुएं में बैठकर ध्यान करते हैं, तो आपके संपर्क में इस पृथ्वी पर उठने वाली जितनी निम्नतम तरंगें हैं, उनसे ही आपका संपर्क हो पाएगा। वे तो कुएं में उतर जाएंगी, श्रेष्ठ तरंगें कुएं के ऊपर से ही प्रवाहित होती रहेंगी।
इसलिए पहाड़ों पर लोगों ने यात्रा की। पहाड़ों पर यात्रा का कारण था। कारण थी ऊंचाई, और ऊंचाई से तरंगों का भेद।
तरंगों की अपनी पूरी स्थितियां हैं। हर तल पर विभिन्न प्रकार की तरंगें यात्रा कर रही हैं। और एक तरह की तरंग एक सतह पर यात्रा करती है। तो गङ्ढे के लिए इनकार किया है।
लेकिन आप पूछेंगे कि फिर बहुत ऊंची जगह के लिए क्यों इनकार किया है? क्योंकि ऊंचे जितने हम होंगे, उतनी श्रेष्ठतर तरंगें मिल जाएंगी!
तो वह भी आप ध्यान रख लें। ऊंचे पर श्रेष्ठतर तरंगें मिलेंगी, लेकिन अगर आपकी पात्रता न हो, तो श्रेष्ठतर तरंगें भी सिर्फ आपके भीतर उत्पात पैदा करेंगी। आपकी पात्रता के साथ ही श्रेष्ठतर तरंगों को झेलने की क्षमता पैदा होती है।
आप कितना झेल सकते हैं? हम जहां जीते हैं, वही तल अभी हमारे झेलने का तल है। जहां बैठकर आप दुकान करते हैं, भोजन करते हैं, बात करते हैं, जीते हैं जहां, प्रेम करते हैं, झगड़ते हैं जहां, वही आपके जीवन का तल है। उस तल से ही शुरू करना उचित है; न बहुत नीचे, न बहुत ऊपर।
जहां आप हैं, वहीं आपकी टयूनिंग है। अभी आप वहीं से शुरू करें। और जैसे-जैसे आपकी क्षमता बढ़े वैसे-वैसे ऊपर की यात्रा हो सकती है। और जैसे-जैसे आपकी क्षमता बढ़े, तो आप गङ्ढे में बैठकर भी ध्यान कर सकते हैं। क्षमता बढ़े, तो ऊपर जा सकते हैं, पर्वत शिखरों की यात्रा कर सकते हैं।
पुराने तीर्थ इस हिसाब से बनाए गए थे कि जो श्रेष्ठतम तीर्थ हो, वह सबसे ऊपर हो। और धीरे-धीरे साधक यात्रा करे; धीरे-धीरे यात्रा करे। वह आखिरी यात्रा कैलाश पर हो उसकी पूरी। वहां जाकर वह समाधि में लीन हो। वहां शुद्धतम तरंगें उसे उपलब्ध होंगी। लेकिन उसकी क्षमता भी निरंतर ऊंची उठती जानी चाहिए, ताकि उतनी शुद्ध तरंगों को वह झेलने में समर्थ हो सके। अन्यथा शुद्धतम को झेलना भी उत्पात का कारण हो सकता है। जितनी आपकी पात्रता नहीं है, उससे ज्यादा आपके ऊपर गिर पड़े, तो वह आपको हानि ही पहुंचाता है, लाभ नहीं।
सूफी फकीरों में गङ्ढे में जाकर ध्यान करने की प्रक्रिया है, कुएं में जाकर ध्यान करने की प्रक्रिया है, नीचे जमीन में उतरकर ध्यान करने की प्रक्रिया है। लेकिन इस प्रक्रिया के लिए तभी आज्ञा दी जाती है, जब कोई श्रेष्ठतम पर्वत शिखर पर ध्यान करने में समर्थ हो जाता है--तब। यह क्यों? यह तब आज्ञा दी जाती है, जब वह व्यक्ति इस स्थिति में पहुंच जाता है कि उसके आस-पास सब तरह की गलत तरंगें मौजूद रहें, लेकिन वह अप्रभावित रह सके, तब उसे गङ्ढे में बैठकर साधना करने की आज्ञा दी जाती है।
कृष्ण ने अर्जुन को देखकर कहा है कि तू ऐसा आसन चुन, जो बहुत नीचा न हो, ऊंचा न हो, तिरछा-आड़ा न हो। वहां तू सरलता से शांत होने में सुगमता पाएगा।
मृगचर्म की बात कही है। उसके भी कारण हैं। और कारण ऐसे हैं, जो आज ज्यादा स्पष्ट हो सके हैं। इतने स्पष्ट कृष्ण के समय में भी नहीं थे। प्रतीति थी, प्रतीति थी कि कुछ फर्क पड़ता है। लेकिन किस कारण से पड़ता है, उसकी वैज्ञानिक स्थिति का कोई स्पष्ट बोध नहीं था।
संन्यासी इस देश में हजारों, लाखों वर्षों से कहना चाहिए, लकड़ी की खड़ाऊं का उपयोग करता रहा है, अकारण नहीं। मृगचर्म का उपयोग करता रहा है, अकारण नहीं। सिंहचर्म का उपयोग करता रहा है, अकारण नहीं। लकड़ी के तख्त पर बैठकर ध्यान करता रहा है, अकारण नहीं। कुछ प्रतीतियां खयाल में आनी शुरू हो गई थीं कि भेद पड़ता है।
जो चीजें भी विद्युत के लिए नान-कंडक्टिव हैं, वे सभी ध्यान में सहयोगी होती हैं। लेकिन अब इसके वैज्ञानिक कारण स्पष्ट हो सके हैं। आज विज्ञान कहता है कि जिन चीजों से भी विद्युत प्रवाहित होती है, उन पर बैठकर ध्यान करना खतरे से खाली नहीं है। क्यों? क्योंकि जब आप गहरे ध्यान में लीन होते हैं, तो आपका शरीर एक बहुत अनूठे रूप से एक बहुत नए तरह की अंतर्विद्युत पैदा करता है, एक इनर इलेक्ट्रिसिटी पैदा करता है। जब आप पूरे ध्यान में होते हैं, तो आपके शरीर की बाडी इलेक्ट्रिसिटी सक्रिय होती है।
और सबके शरीर में विद्युत का बड़ा आगार है। हम सबके शरीर में विद्युत का बड़ा आगार है। उसी विद्युत से हम जीते हैं, चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं। यह जो श्वास आप ले रहे हैं, वह सिर्फ आपके शरीर की विद्युत को आक्सीजन पहुंचाकर जीवित रखती है, और कुछ नहीं करती। वह आक्सीडाइजेशन करती है। आपको प्रतिपल आपके शरीर की विद्युत को चलाए रखने के लिए आक्सीजन की जरूरत है, इसलिए श्वास के बिना आप जी नहीं सकते। और शरीर विद्युत का, कहना चाहिए, एक जेनेरेटर है। वहां पूरे समय विद्युत पैदा हो रही है। इस विद्युत को ध्यान के समय में कंजरवेशन मिलता है, संरक्षण मिलता है।
साधारणतः आप विद्युत को फेंक रहे हैं। मैंने इतना हाथ हिलाया, तो भी मैंने विद्युत की एक मात्रा हाथ से बाहर फेंक दी। मैं एक शब्द बोला, तो उस शब्द को गति देने के लिए मेरे शरीर की विद्युत की एक मात्रा विनष्ट हुई। रास्ते पर आप चले, उठे, हिले, आपने कुछ भी किया कि शरीर की विद्युत की एक मात्रा उपयोग में आई।
लेकिन ध्यान में तो सब हिलन-डुलन बंद हो जाएगा। वाणी शांत होगी, विचार शून्य होंगे, शरीर निष्कंप होगा, चित्त मौन होगा, इंद्रियां शिथिल होकर निष्क्रिय हो जाएंगी। तो वह जो चौबीस घंटे विद्युत बाहर फिंकती है, वह सब कंजर्व होगी, वह सब भीतर इकट्ठी होगी।
अगर आप ऐसी जगह बैठे हैं, जहां से विद्युत आपके शरीर के बाहर जा सके, तो आपको ठीक वैसा ही शॉक अनुभव होगा, जैसा बिजली के तार को छूकर अनुभव होता है। और जो लोग ध्यान में थोड़े गहरे गए हैं, उनमें से अनेकों का यह अनुभव है। मेरे पास सैकड़ों लोग हैं, जिनका यह अनुभव है कि अगर वे गलत जगह बैठकर ध्यान किए हैं, तो उनको शॉक लगा है, उनको धक्का लगा है।
जब आप बिजली का तार छूते हैं, अगर लकड़ी की खड़ाऊं पहनकर छू लें, तो शॉक नहीं लगेगा। क्यों? शॉक बिजली की वजह से नहीं लगता, बिजली के तार को छूने से नहीं लगता शॉक। शॉक लगता है, बिजली के तार से आपके भीतर बिजली आ जाती है और झटके के साथ जमीन उसको खींच लेती है। वह जो जमीन खींचती है झटके के साथ, उसकी वजह से शॉक लगता है। अगर आप खड़ाऊं पहने खड़े हैं, तो शॉक नहीं लगेगा। बिजली का तार आपने छू लिया है। वह नहीं लगेगा इसलिए कि जमीन उसे झटके से खींच नहीं सकी और लकड़ी की खड़ाऊं ने बिजली को वापस वर्तुल बनाकर लौटा दिया।
शॉक लगता है वर्तुल के टूटने से, सर्किट टूटने से शॉक लगता है। अगर बिजली एक वर्तुल बना ले, तो आपको कभी धक्का नहीं लगता। और वर्तुल बनाने का एक ही उपाय है कि आप नान-कंडक्टर पर बैठे हों।
मृगचर्म नान-कंडक्टर है, सिंहचर्म नान-कंडक्टर है। बिजली उसके पार नहीं जा सकती, वह बिजली को वापस लौटाता है। लकड़ी नान-कंडक्टर है, वह बिजली को वापस लौटा देती है। खड़ाऊं नान-कंडक्टर है, वह बिजली को वापस लौटा देती है।
तो जो ध्यान कर रहा है, उसके लिए खड़ाऊं उपयोगी है। जो ध्यान कर रहा है, उसे लकड़ी के तख्त पर बैठना उपयोगी है। जो ध्यान कर रहा है, उसे मृगचर्म का उपयोग सहयोगी है।
फिजूल लगेगा। अगर कबीर से पूछने जाएंगे, कृष्णमूर्ति से, वे कहेंगे, बकवास है। लेकिन अगर वैज्ञानिक से पूछने जाएंगे, वह कहेगा, सार्थक है बात। और सार्थक है।
एक घड़ी ऐसी आ जाती है, जहां बिलकुल बेकार है। लेकिन वह घड़ी अभी आ नहीं गई है। वह घड़ी आ जाए, तब तक उपयोगी है। एक घड़ी ऐसी आ जाती है कि शरीर की विद्युत का अंतर-वर्तुल निर्मित हो जाता है। और जो लोग भी परम शांति को उपलब्ध होते हैं, उनके हृदय में अंतर-वर्तुल निर्मित हो जाता है। विद्युत अंतर-वर्तुल बना लेती है। फिर वे जमीन पर बैठ जाएं, तो उन्हें कोई शॉक नहीं लगने वाला है।
लेकिन वह घटना अभी आपको नहीं घट गई है। आपके भीतर कोई अंतर-वर्तुल नहीं है, कोई इनर सर्किट नहीं है। आपको तो अभी बाह्य-वर्तुल पर निर्भर रहना पड़ेगा। वह मजबूरी है; उससे बचने का उपाय नहीं है; उससे पार होने का उपाय है। जो बचने की कोशिश करेगा, कि इसे बाई-पास कर जाएं, वह दिक्कत में पड़ेगा। उसके पार हो जाना ही उचित है। क्योंकि पार होकर ही पात्रता निर्मित होती है।
तो कृष्ण कहते हैं, ऐसी आसनी पर बैठे, ऐसा आसन लगाए, ऐसी जमीन पर हो, ऊंचा न हो, नीचा न हो और तब, तब इंद्रियों को सिकोड़ ले।
और इंद्रियों को सिकोड़ना ऐसी स्थिति में आसान होता है। बाह्य विघ्न और बाधाओं को निषेध करने की व्यवस्था कर लेने पर इंद्रियों को सिकोड़ लेना आसान होता है।
कभी आपने खयाल न किया होगा, योग ने ऐसे आसन खोजे हैं, जो आपकी इंद्रियों को अंतर्मुखी करने में अदभुत रूप से सहयोगी हो सकते हैं। इस तरह की मुद्राएं खोजी हैं, जो आपकी इंद्रियों को अंतर्मुखी करने में सहयोगी हो सकती हैं। बैठने के ऐसे ढंग खोजे हैं, जो आपके शरीर के विशेष केंद्रों पर दबाव डालते हैं और उस दबाव का परिणाम आपकी विशेष इंद्रियों को शिथिल कर जाना होता है।
अभी अमेरिका में एक बहुत बड़ा विचारक और वैज्ञानिक था, थियोडर रेक। उसने मनुष्य के शरीर के बाबत जितनी जानकारी की, कम लोगों ने की है। वह कहता था कि शरीर में ऐसे बिंदु हैं मनुष्य के, जिन बिंदुओं को दबाने से मनुष्य की वृत्तियों में बुनियादी अंतर पड़ता है। और यह कोई योगी नहीं था रेक। रेक तो एक मनसविद था। फ्रायड के शिष्यों में से, बड़े शिष्यों में से एक था। और उसने हजारों लोगों को सहायता पहुंचाई। उसे कुछ पता नहीं था। काश, उसे पता होता तिब्बत और भारत में खोजे गए योगासनों का, तो उसकी समझ बहुत गहरी हो जाती।
वह बिलकुल अंधेरे में टटोल रहा था; लेकिन उसने ठीक जगह टटोल ली। उसने कुछ स्थान शरीर में खोज लिए, जिनको दबाने से परिणाम होते हैं। जैसे उसने दांतों के आस-पास ऐसी जगह खोज ली जबड़ों में, जिनमें आदमी की हिंसा संगृहीत है। आपको खयाल में भी नहीं आ सकता। और अगर कोई आदमी बहुत वायलेंट है, बहुत हिंसक है, तो थियोडर रेक उसकी जो चिकित्सा करेगा, वह बहुत अनूठी है। वह यह है कि उसको लिटाकर वह सिर्फ उसके जबड़ों के विशेष स्थानों को दबाएगा, इतने जोर से कि वह आदमी चीखेगा, चिल्लाएगा, मारने-पीटने लगेगा। और अक्सर यह होता था कि थियोडर रेक को उसके मरीज बुरी तरह पीटकर जाते थे, मारकर जाते थे! लेकिन दूसरे दिन से ही उनमें अंतर होना शुरू हो जाता। उनकी हिंसा में जैसे बुनियादी फर्क हो गया।
रेक का कहना था, और कहना ठीक है, कि हिंसा का जो बुनियादी केंद्र है, वे दांत हैं--समस्त जानवरों में, आदमियों में भी। क्योंकि आदमी सिर्फ एक जानवरों की शृंखला में आगे आ गया जानवर है, उससे ज्यादा नहीं।
समस्त जानवर दांत से ही हिंसा करते हैं। दांत या नाखून, बस दो ही हिस्से हैं। आदमी ने हिंसा की ऐसी तरकीबें खोज ली हैं, जिनमें नाखून की भी जरूरत नहीं है, दांत की भी जरूरत नहीं है। लेकिन शरीर का जो मैकेनिज्म है, शरीर का जो यंत्र है, उसे कुछ भी पता नहीं कि आपने छुरी बना ली है। उसे कुछ भी पता नहीं कि आपने दांतों की जगह औजार बना लिए हैं, जिनसे आप आदमी को ज्यादा सुविधा से काट सकते हैं। शरीर को कोई पता नहीं है। शरीर के अंग तो, सेल तो, पुराने ढंग से ही काम करते चले जाते हैं।
इसलिए जब भी आप हिंसा से भरते हैं, खयाल करना, आपके दांतों में कंपन शुरू हो जाता है। आपके दांतों में विशेष विद्युत दौड़नी शुरू हो जाती है। दांत पीसने लगते हैं। आप कहते हैं, क्रोध में इतना आ गया कि दांत पीसने लगा। दांत पीसने का क्रोध से क्या लेना-देना! आप मजे से क्रोध में आइए, दांत मत पीसिए! लेकिन दांत पीसे बिना आप न बच सकेंगे, क्योंकि दांत में विद्युत दौड़नी शुरू हो गई।
लेकिन दांत का उपयोग सभ्य आदमी करता नहीं। कभी-कभी असभ्य लोग कर लेते हैं कि क्रोध में आ जाएं, तो काट लें आपको। सभ्य आदमी काटता नहीं। लेकिन दांतों को कुछ पता नहीं कि आप सभ्य हो गए हैं। जब आप नहीं काटते, तो दांतों में जो विद्युत पैदा हो गई, जो काटने से रिलीज हो जाती, वह रिलीज नहीं हो पाएगी। वह दांतों के मसूढ़ों के आस-पास संगृहीत होती चली जाएगी, उसके पाकेट्स बन जाएंगे।
आदमी के दांतों की बीमारियों में नब्बे प्रतिशत कारण दांतों के आस-पास बने हिंसा के पाकेट हैं। इसलिए जानवरों के दांत जैसे स्वस्थ हैं! जरा कुत्ते के दांत खोलकर देख लेना, तो खुद शर्म आएगी कि न कभी दतौन करता, न कभी मंजन करता, न कोई टुथपेस्ट का, किसी मार्क के टुथपेस्ट का कोई उपयोग करता। ऐसी चमक, ऐसी रौनक, ऐसी सफेदी! बात क्या है? बात गहरे में शारीरिक कम और मनस से ज्यादा जुड़ी हुई है।
हिंसा के पाकेट्स कुत्ते के दांत में नहीं हैं। और अगर कुत्तों के दांतों में कभी हिंसा के पाकेट्स हो जाते हैं, तो वे खेलकर उसको रिलीज कर लेते हैं। आपने कुत्तों को देखा होगा, खेलने में काटेंगे। काटते नहीं हैं, सिर्फ भरेंगे मुंह, छोड़ देंगे। वे रिलीज कर रहे हैं। खेलकर हिंसा को मुक्त कर लेंगे। तो जानवरों के दांत जैसे स्वस्थ हैं, आदमी सपने में भी नहीं सोच सकता कि उतने स्वस्थ दांत पा जाए।
आपकी अंगुलियों के आस-पास भी हिंसा के पाकेट्स इकट्ठे होते हैं। वहां भी हिंसा है। वह भी हमने बंद कर दी है। अब हम अंगुलियों से किसी को चीरते-फाड़ते नहीं। कभी-कभी गुस्से में हो जाता है, किसी का कपड़ा फाड़ देते हैं, नाखून चुभा देते हैं, अलग बात है। लेकिन सामान्यतया, हम आमतौर से दूसरी चीजों का उपयोग करते हैं, सब्स्टीटयूट। हमने बुनियादी प्रकृति की चीजों का उपयोग बंद कर दिया है। तो हमारी अंगुलियों के आस-पास हिंसा इकट्ठी हो जाएगी।
आदमी की अंगुलियों को देखकर कहा जा सकता है कि उसके चित्त में कितनी हिंसा है। उसकी अंगुलियों के मोड़ बता देंगे कि उसके भीतर कितनी हिंसा है। क्योंकि अंगुलियां अकारण नहीं मुड़ती हैं।
तो बुद्ध की अंगुलियों का मोड़ अलग होगा। अलग होगा ही। कोई हिंसा भीतर नहीं है। हाथ एक फूल की तरह खिल जाएगा। अंगुलियों के भीतर कोई पाकेट्स नहीं हैं।
और ठीक ऐसे ही हमारे पूरे शरीर में पाकेट्स हैं। ऐसे बिंदु हैं, जहां बहुत कुछ इकट्ठा है। अगर उन बिंदुओं को दबाया जा सके, उन बिंदुओं को मुक्त किया जा सके, तो भेद पड़ेगा।
इस मुल्क ने जो योगासन खोजे, विशेष पद्धतियां बैठने की खोजीं...। अगर आपने बुद्ध या महावीर की मूर्ति देखी है, करीब-करीब सभी ने देखी होगी, गौर से नहीं देखी होगी। उन्होंने भी गौर से नहीं देखी, जो रोज महावीर को नमस्कार करने मंदिर में जाते हैं! लेकिन असली राज उस मूर्ति की व्यवस्था में छिपा हुआ है।
अगर महावीर की मूर्ति को गौर से देखेंगे, तो आपको क्या दिखाई पड़ेगा कि महावीर का पूरा शरीर एक विद्युत सर्किट है। दोनों पैर जुड़े हुए हैं। दोनों पैरों की गद्दियां घुटनों के पास जुड़ी हुई हैं।
विद्युत के रिलीज के जो बिंदु हैं, वह हमेशा नुकीली चीजों से विद्युत बाहर गिरती है। गोल चीजों से कभी विद्युत बाहर नहीं गिरती, सिर्फ नुकीली चीजों से विद्युत बाहर यात्रा करती है। जितनी नुकीली चीज हो, उतनी ज्यादा विद्युत बाहर यात्रा करती है।
जननेंद्रिय से सर्वाधिक विद्युत बाहर जाती है। और इसीलिए संभोग के बाद आप इतने थके हुए और इतने बेचैन और उद्विग्न हो गए होते हैं। क्योंकि आपका शरीर बहुत-सी विद्युत खो दिया होता है। संभोग के बाद आपका ब्लड-प्रेशर बहुत ज्यादा बढ़ गया होता है। हृदय की धड़कन बढ़ गई होती है। आपकी नाड़ी की गति बढ़ गई होती है। और पीछे निपट थकान हाथ लगती है। उसका कारण? उसका कारण सिर्फ वीर्य का स्खलन नहीं है। वीर्य के स्खलन के साथ-साथ जननेंद्रिय बहुत बड़ी मात्रा में विद्युत को शरीर के बाहर फेंक रही है। उस विद्युत के भी पाकेट्स हैं।
इसलिए सिद्धासन या पद्मासन में जो बैठने का ढंग है, एड़ियां उन बिंदुओं को दबा देती हैं, जहां से जननेंद्रिय तक विद्युत पहुंचती है। और उसका पहुंचना बंद हो जाता है। दोनों पैर शरीर के साथ जुड़ जाते हैं और दोनों पैर से जो विद्युत निकलती है, वह शरीर वापस एब्जार्ब कर लेता है, फिर पुनः अपने भीतर ले लेता है। दोनों हाथ जुड़े होते हैं, इसलिए दोनों हाथों की विद्युत बाहर नहीं फिंकती, एक हाथ से दूसरे हाथ में यात्रा कर जाती है। पूरा शरीर एक सर्किट में है।
महावीर की या बुद्ध की मूर्ति आप देखेंगे, तो खयाल में आएगा कि पूरा शरीर एक विद्युत चक्र में है। इस बने हुए विद्युत वर्तुल के भीतर इंद्रियों को सिकोड़ लेना अत्यंत आसान है। अत्यंत आसान है, बहुत सरल है।
यह विद्युत का जो वर्तुल निर्मित हो जाता है, यह आपके और आपकी इंद्रियों के बीच एक प्रोटेक्शन, एक दीवाल बन जाता है। आप अलग कट जाते हैं, इंद्रियां अलग पड़ी रह जाती हैं।
ध्यान रहे, विद्युत का स्रोत आपके भीतर है। इंद्रियां केवल विद्युत का उपयोग करती हैं। और अगर बीच में वर्तुल बन जाए--जो कि बिलकुल एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, एक साइंटिफिक प्रोसेस है--बीच में वर्तुल बन जाए, तो इंद्रियां बाहर रह जाती हैं, आप भीतर रह जाते हैं। और आपके और इंद्रियों के बीच में विद्युत की एक दीवाल खड़ी हो जाती है, जिसको पार नहीं किया जा सकता। इस क्षण में अंतर-आकाश में यात्रा आसान हो जाती है। अति आसान हो जाती है।
इसलिए कृष्णमूर्ति कितना ही कहें या कबीर कितना ही कहें, थोड़ी सावधानी से उनकी बात सुनना। उनकी बात खतरे में ले जा सकती है। वे कह दें, आसन से क्या होगा? वे कह दें कि इससे क्या होगा, उससे क्या होगा? मेथडॉलाजी से क्या होगा? अपनी तरफ से वे ठीक कह रहे हैं। उनका अंतर-आकाश और उनकी अंतर्विद्युत की यात्रा शुरू हो गई है। शायद उन्हें पता भी नहीं हो।
कृष्णमूर्ति के साथ तो निश्चित ही यह बात है कि कृष्णमूर्ति के साथ जो प्रयोग उनके बचपन में किए गए, वे करीब-करीब उनको बेहोश करके किए गए। इसलिए उनको कुछ भी पता नहीं है कि वे किन प्रयोगों से गुजरे हैं। कांशसली उन्हें कुछ भी पता नहीं है, सचेतन रूप से, कि वे किन प्रयोगों से गुजरे हैं; और जहां पहुंचे हैं, किस मार्ग से गुजरकर पहुंचे हैं।
उनकी हालत करीब-करीब वैसी है, जैसे हम किसी आदमी को सोया हुआ उसके घर से उठा लाएं और बगीचे में उसकी खाट रख दें। और बगीचे में उसकी आंख खुले और वह कहे कि ठीक। और कोई पूछे उससे कि बगीचे में कैसे आऊं? तो वह कहे, कोई रास्ता नहीं है; बस आ जाओ। कोई मार्ग नहीं है, बस आ जाओ। जागो, और बगीचे में पाओगे कि तुम हो। वे ठीक कह रहे हैं। वे गलत नहीं कह रहे हैं।
लेकिन कृष्णमूर्ति को बगीचे में ले आने वाले कुछ लोग थे, एनीबीसेंट थी, लीडबीटर था। उन लोगों ने कृष्णमूर्ति के बचपन में, जब करीब-करीब कोई होश उनके पास नहीं था...। इसलिए कृष्णमूर्ति को बचपन की कोई याद नहीं है, बचपन की कोई याददाश्त नहीं है। बचपन और उनके बीच में एक भारी बैरियर है, एक भारी दीवाल खड़ी हो गई है।
कृष्णमूर्ति को अपनी मातृभाषा का कोई भी स्मरण नहीं है। यद्यपि नौ साल का या दस साल का बच्चा अपनी मातृभाषा को कभी नहीं भूलता। दस साल का बच्चा अपनी मातृभाषा काफी सीख चुका होता है--काफी, करीब-करीब पूरी। लेकिन कृष्णमूर्ति को उसकी कोई याददाश्त नहीं है।
कृष्णमूर्ति के नाम से एक किताब है, एट दि फीट आफ दि मास्टर--श्री गुरु चरणों में। नाम उस पर कृष्णमूर्ति का है। वह तब लिखी गई। लेकिन वे कहते हैं कि मुझे कुछ याद नहीं, मैंने कब लिखी! वह उनसे लिखवाई गई। सिर्फ मीडियम की तरह उन्होंने उसमें काम किया। उन्हें कुछ स्मरण नहीं कि उन्होंने कब लिखी। वे यह भी नहीं कहते कि मैं उसका लेखक हूं या नहीं।
लीडबीटर, एनीबीसेंट और थियोसाफिस्टों ने कृष्णमूर्ति को बहुत ही अचेतन मार्गों से वहां पहुंचाया, जहां पहुंचकर, जहां जागकर उन्होंने पाया कि किसी मार्ग की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन वे भी मार्गों से पहुंचे हैं।
आज जब वे लोगों से कह देते हैं, कोई मार्ग नहीं है, कोई विधि, कोई व्यवस्था नहीं है, तो सुनने वालों का इतना अहित हो जाता है कि जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है।
कृष्णमूर्ति के सत्यों ने न मालूम कितने लोगों को भयंकर हानियां पहुंचाई हैं। और उसके कारण हैं। उनका कोई कसूर नहीं है। उन्होंने आंख खोली और पाया कि वे बगीचे में हैं। वे आपसे भी कहते हैं, आंख खोलो और पाओगे कि तुम बगीचे में हो!
नहीं! कई बार ऐसा होता है कि अतीत जन्मों में कोई साधक यात्रा कर चुका होता है, परिपक्व हो गई होती है यात्रा। जैसे निन्यानबे डिग्री पर पानी खौल रहा हो गर्म। अभी भाप नहीं बना है, एक डिग्री की कमी रह गई है। पिछले जन्म से वह निन्यानबे डिग्री की हालत लेकर आया है। और इस जन्म में कुछ छोटी-सी घटना हो जाए कि एक डिग्री गर्मी पूरी हो जाए कि वह भाप बनना शुरू हो जाए। और आप उससे कहें कि मैं कैसे गर्म होऊं? तो वह कहे, कुछ खास करने की जरूरत नहीं है। जरा आकर धूप में, खुले आकाश में खड़े हो जाओ; भाप बन जाओगे। और आप जमे हुए बरफ के पत्थर हैं। आप खड़े हो जाना धूप में, कुछ न होगा। बरफ तो कुछ सिकुड़ा हुआ था, एक जगह में सीमित था; और पानी बनकर और फैल जाएंगे; ज्यादा जमीन घेर लेंगे; और मुसीबत खड़ी हो जाएगी।
आपके लिए तो भयंकर आग की भट्ठियां चाहिए। एटामिक भट्ठियां! तब, तब शायद आप भाप बन पाएं उतनी ही तीव्रता से।
इसलिए कई बार पिछले जन्म से आया हुआ साधक, अगर बहुत यात्रा पूरी कर चुका है; इंच, आधा इंच बाकी रह गया है; जरा-सा झटका, जरा-सी बात, कोई भी जरा-सी बात, जो हमें लगेगा कि कैसे इससे हो सकता है...!
रिंझाई ने कहा है, एक फकीर ने, जो कि जरा-सी बात से जाग गया। सोया है एक रात एक वृक्ष के तले। पतझड़ के दिन हैं और वृक्ष से पके पत्ते नीचे गिर रहे हैं। वह खड़ा होकर नाचने लगा और गांव-गांव कहता फिरा कि अगर किसी को भी ज्ञान चाहिए हो, तो पतझड़ के समय में वृक्ष के नीचे सो जाए। और जब पके पत्ते नीचे गिरते हैं, तो ज्ञान घटित हो जाता है!
उसे हुआ। पका पत्ता टूटते देखकर उसके लिए सारी जिंदगी पके पत्ते की तरह टूट गई। मगर वह यात्रा कर चुका है निन्यानबे दशमलव नौ डिग्री तक। नाइनटी नाइन प्वाइंट नाइन डिग्री पर वह जी रहा होगा। एक सूखा पत्ता गिरा और सौ डिग्री पूरी हो गई बात, वह भाप बनकर उड़ गया।
उसका कोई कसूर नहीं है कि वह लोगों से कहता है, ज्ञान चाहिए? पतझड़ में सूखे वृक्ष के नीचे बैठ जाओ, ध्यान करो। जब सूखा पत्ता गिरे, मेडिटेट आन इट; उस पर ध्यान करो, ज्ञान हो जाएगा।
जिन्होंने सुना, उन्होंने, कई ने पतझड़ के पत्तों के नीचे बैठकर कोशिश की। क्योंकि जब रिंझाई जैसा आदमी कहता है, तो ठीक ही कहता है। और रिंझाई की आंखें गवाही देती हैं कि वह ठीक कहता है। झूठ कहने का कोई कारण भी तो नहीं है। उसका आनंद कहता है कि उसे घटना घटी है। और सारा गांव जानता है उसका कि पतझड़ में घटी है और सूखे पत्ते गिरते थे रात में, तब घटी है। सुबह हमने इसे नाचते हुए पाया। सांझ उदास था, सुबह आनंद से भरा था। रात कुछ हुआ है; एक्सप्लोजन हुआ है। झूठ तो कहता नहीं। वह आदमी गवाह है; उसकी जिंदगी गवाह है; उसकी रोशनी, उसकी सुगंध गवाह है। लेकिन फिर अनेक लोगों ने पत्तों के नीचे रात-रात गुजारी; बहुत ध्यान किया। कुछ न हुआ। सिर्फ सूखे पत्ते गिरते रहे! सुबह वे और उदास होकर घर लौट आए। रातभर की नींद और खराब हो गई।
लोगों के स्थान हैं उनकी यात्राओं के।
कृष्ण जो कह रहे हैं, वह अर्जुन के लिए कह रहे हैं। अर्जुन जहां खड़ा है वहां से--वहां से यात्रा शुरू करनी है।
आसन उपयोगी होगा। स्थान, समय उपयोगी होगा। दोपहर में बैठकर ध्यान करें, बहुत कठिनाई हो जाएगी। कोई कारण नहीं है। क्योंकि दोपहर कोई ध्यान का दुश्मन नहीं है। लेकिन बहुत कठिनाई हो जाएगी।
सूर्य जब पूरा उत्तप्त है और सिर के ऊपर आ जाता है, तब सिर को शांत करना बहुत कठिन है। सूर्य जब जाग रहा है सुबह, बालक है अभी। अभी गर्मी भी नहीं है उसमें। और जब उसकी किरणें आप पर सीधी नहीं पड़तीं, आड़ी पड़ती हैं; आपके शरीर के आर-पार जाती हैं, सिर से नीचे की तरफ नहीं आतीं
ठीक दोपहर में जब सूर्य सिर के ऊपर है, तब सूर्य की सारी किरणें आपके शीर्ष से, जिसे सहस्रार कहते हैं योगी, उससे प्रवेश करती हैं और आपके सेक्स सेंटर तक चोट पहुंचाती हैं। उस वक्त पूरी धारा आपके सिर से यौन केंद्र तक बह रही है।
और ध्यान की यात्रा उलटी है। ध्यान की यात्रा यौन केंद्र से सहस्रार की तरफ है। और सूर्य की किरणें दोपहर के क्षण में सहस्रार से यौन केंद्र की तरफ आ रही हैं। नदी जैसे उलटी जा रही हो और आप उलटे तैर रहे हों, ऐसी तकलीफ होगी। ऐसी तकलीफ होगी!
सुबह यह तकलीफ नहीं होगी। सूर्य की किरणें आर-पार जा रही हैं आपके। आपको सूर्य की किरणों से नहीं लड़ना पड़ेगा। संध्या भी यह तकलीफ नहीं होगी। फिर किरणें आर-पार जा रही हैं। इसलिए प्रार्थना का नाम ही धीरे-धीरे संध्या हो गया। संध्या का मतलब ही इतना है, वह क्षण, जब सूर्य की किरणें आर-पार जा रही हैं। चाहे सुबह हो, चाहे सांझ हो, बीच का गैप--जब सूरज आपके ऊपर से सीधा प्रभाव नहीं डालता।
लेकिन रात के बारह बजे, आधी रात फायदा हो सकता है। उसका उपयोग योगियों ने किया है, अर्धरात्रि का। क्योंकि तब सूरज आपके ठीक नीचे पहुंच गया। और सूरज की किरणें आपके यौन केंद्र से सहस्रार की तरफ जाने लगी हैं। दिखाई नहीं पड़ रही हैं, पर अंतरिक्ष में उनकी यात्रा जारी है। उस वक्त नदी सीधी बह रही है। आप उसमें बह जाएं, तो सरलता से तैर जाएंगे। तैरने की भी शायद जरूरत न पड़े; बह जाएं, जस्ट फ्लोट, और आप ऊपर की तरफ निकल जाएंगे।
लेकिन दोपहर के क्षण में जब सूरज आपके ऊपर से नीचे की तरफ यात्रा कर रहा है, तब आप फ्लोट न कर सकेंगे, बह न सकेंगे। तैरना भी मुश्किल पड़ेगा; क्योंकि सूर्य की किरणें आपके जीवन का आधार हैं! सूर्य जीवन है, उससे लड़ना बहुत मुश्किल मामला है।
इसलिए सूर्य पर त्राटक शुरू हुआ। वह अभ्यास है सूर्य से लड़ने का। वह आपके खयाल में नहीं होगा। त्राटक करने वाले के खयाल में भी नहीं होता; क्योंकि किताब में कहीं कोई पढ़ लेता है और करना शुरू कर देता है।
सूर्य की किरणों पर जो त्राटक है, घंटों लंबा अभ्यास है खुली आंखों से, वह इस बात की चेष्टा है कि हम सूर्य की किरणों के विपरीत लड़ने के लिए अपने को तैयार कर रहे हैं! अगर किसी ने त्राटक का गहन अभ्यास किया है, तो वह ठीक दोपहर बारह बजे भी ध्यान में ऊपर यात्रा कर सकता है; क्योंकि उसने सूर्य की किरणों के साथ सीधा संघर्ष करके तैरने की व्यवस्था कर ली है। अन्यथा नहीं।
तो अगर पूछें कि किस समय ध्यान करें? तो जो परम ज्ञानी है, वह कहेगा, समय का कोई सवाल नहीं है। ध्यान तो टाइमलेसनेस है। आप समय के बाहर चले जाएंगे। समय का कोई सवाल ही नहीं है। सुबह हो, कि दोपहर हो, कि सांझ हो।
वह ठीक कह रहा है। ध्यान की जो परम स्थिति है, वह समय के बाहर है, कालातीत है। लेकिन ध्यान का प्रारंभ समय के भीतर है, इन दि टाइम। ध्यान का अंत समय के बाहर है। ध्यान का प्रारंभ समय के भीतर है। और जो समय की व्यवस्था को ठीक से न समझे, वह ध्यान में व्यर्थ की तकलीफें पाएगा, व्यर्थ के कष्ट पाएगा। अकारण मुसीबतें खड़ी कर लेगा; व्यर्थ ही अपने हारने का इंतजाम करेगा। जीतने की सुविधाएं जो मिल सकती थीं, वह खो देगा।
करीब-करीब ऐसा है, जैसे कि नदी में नाव चलाते हैं पाल बांधकर। जब हवाओं का रुख एक तरफ होता है, तो यात्रा करते हैं। पाल को खुला छोड़ देते हैं, फिर मांझी को, नाविक को पतवार नहीं चलानी पड़ती। हवाएं पाल में भर जाती हैं और नाव यात्रा करने लगती है।
ध्यान की नाव के भी क्षण हैं, स्थितियां हैं। जब हवाएं अनुकूल होती हैं--और ध्यान की हवाएं सूर्य की किरणें हैं--जब हवाएं अनुकूल होती हैं, जब ग्रेविटेशन अनुकूल होता है, जब तरंगें अनुकूल होती हैं, जब चारों तरफ ठीक अनुकूल स्थिति होती है, तब पाल खुला छोड़ दें; बहुत कम श्रम में यात्रा हो जाएगी।
और जब सब चीजें प्रतिकूल होती हैं, तो फिर बहुत मेहनत करनी पड़ती है। तब भी जरूरी नहीं है कि दूसरा किनारा मिल जाए। हवाएं बहुत तेज हैं, नदी की धार बहुत प्रगाढ़ है। आप बहुत कमजोर हैं। बहुत संभावना तो यही है कि थककर अपने किनारे पर वापस लग जाएं। हाथ जोड़ लें कि यह अपने से न हो सकेगा।
यही होता है। ध्यान में जो लोग भी लगते हैं, ठीक व्यवस्था न जानने से, राइट टयूनिंग न जानने से व्यर्थ परेशान होते हैं और परेशान होकर फिर यह सोच लेते हैं कि शायद अपने भाग्य में नहीं है, अपनी नियति में नहीं है, अपने कर्म ठीक नहीं हैं, अपनी पात्रता नहीं है। ऐसा अपने को समझाकर, वह जो दुनिया है व्यर्थ की, उसमें फिर वापस लौटकर लग जाते हैं, अपने किनारे पर लग जाते हैं।
ऐसा न हो, इसलिए कृष्ण अर्जुन को ठीक प्राथमिक बातें कह रहे हैं।


प्रश्न:

भगवान श्री, इस श्लोक में दो और छोटी बातें साफ करें, तो अच्छा हो। पहली बात कुशा, मृगचर्म और वस्त्र, यह क्रम दिया है, उपरोपरि। और दूसरी बात, शुद्ध भूमि। इस पर कुछ कहें।

कुश का बहुत उपयोग ध्यान के लिए किया गया है, कई कारणों से। एक तो, जिन दिनों ध्यान की प्रक्रिया विकसित हो रही थी इस पृथ्वी पर, जिन क्षणों में ध्यान का उदघाटन हो रहा था, आविष्कार हो रहा था, उन क्षणों से बहुत संबंध कुश का है।
हमारे पास शब्द है उस समय का, कुशल। वह कुश से ही बना हुआ शब्द है। आपने कभी सोचा न होगा कि हम एक आदमी को कहते हैं कि बहुत कुशल ड्राइवर है; कहते हैं, बहुत कुशल अध्यापक है; लेकिन कुशल का मतलब आपको पता है।
कुशल का कुल मतलब इतना ही है, ठीक कुश को ढूंढ़ लेने वाला। सभी घास कुश नहीं है। तो जिन दिनों ध्यान इस पृथ्वी पर बड़ा व्यापक था, विशेषकर इस देश में, और जिस दिन ध्यान के प्राथमिक चरण हमने उदघाटित किए थे, उस दिन कुशल उस आदमी को कहते थे, जो हजारों तरह की घास में से उस घास को खोज लाए, जो ध्यान में सहयोगी होती है, उस कुश को खोज लाए।
एक विशेष तरह की घास अपने साथ एक विशेष तरह का वातावरण, एक विशेष तरह की ताजगी ले आती है।
हमें अनुभव होता है कई बार कि कुछ चीजों की मौजूदगी कैटेलिटिक का काम करती है--कुछ चीजों की मौजूदगी। आपने अपने चारों तरफ फूल रख लिए हैं, आपने अपने चारों तरफ एक सुगंध छिड़क रखी है, आपने अपने चारों तरफ धूप जला रखी है, तो आप एक विशेष मौजूदगी के भीतर घिर गए हैं। इस मौजूदगी में कुछ बातें सोचनी मुश्किल, कुछ बातें सोचनी आसान हो जाएंगी। जब चारों तरफ आपके सुगंध हो, तो दुर्गंध के खयाल आने मुश्किल हो जाएंगे।
कुछ विशेष प्रकार की घास, कुछ विशेष प्रकार की धूप, जो कि ध्यान के ही माध्यम से खोजी गई थी कि सहयोगी हो सकती है। उसकी अपनी पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
लुकमान के जीवन में उल्लेख है कि लुकमान पौधों के पास जाता, उनके पास आंख बंद करके, ध्यान करके बैठ जाता और उन पौधों से पूछता कि तुम किस काम में आ सकते हो, मुझे बता दो! तुम किस काम में आ सकते हो? तुम्हारे पत्ते किस काम में आएंगे, किस बीमारी के काम आएंगे? तुम्हारी जड़ किस काम में आएगी? तुम्हारी छाल किस काम में आएगी?
कहानी अजीब-सी मालूम पड़ती है, लेकिन लुकमान ने लाखों पौधों के पत्ते, जड़ों और उन सबका विवरण दिया है कि वे किस काम में आएंगे।
असंभव मालूम पड़ता है कि पौधे बता दें। लेकिन जब लुकमान की किताब हाथ में लगी वैज्ञानिकों के, तो कठिनाई यह हुई कि दूसरी बात और भी असंभव है कि लुकमान के पास कोई प्रयोगशाला रही हो, जिसमें लाखों पौधों की करोड़ों प्रकार की चीजों का वह पता लगा पाए। वह और भी असंभव है। क्योंकि लेबोरेटरी मेथड्स तो अब विकसित हुए हैं; और केमिकल एनालिसिस तो अब विकसित हुई है, लुकमान के वक्त में तो थी ही नहीं। लेकिन आपकी केमिकल एनालिसिस, रासायनिक प्रक्रिया से और रासायनिक विश्लेषण से आप जो पता लगा पाते हैं, वह गरीब लुकमान बहुत पहले अपनी किताबों में लिख गया है, सुश्रुत अपनी किताबों में लिख गया है, धनवंतरि ने उसकी बात कर दी है। और इनके पास कोई प्रयोगशाला नहीं थी, कोई प्रयोगशाला की विधियां नहीं थीं। इनके पास जानने का जरूर कोई और विधि, कोई और मेथड था, कोई और उपाय था।
वह ध्यान का उपाय है। ध्यान के गहरे क्षण में आप किसी भी वस्तु के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकते हैं।
मनोवैज्ञानिक उसे एक खास नाम देते हैं, पार्टिसिपेशन मिस्टीक। एक बहुत रहस्यमय ढंग से आप किसी के साथ एकात्म हो सकते हैं।
ध्यान के क्षण में, गहरी शांति और मौन के क्षण में, अगर आप गुलाब के फूल को सामने रख लें और इतने एकात्म हो जाएं कि उस गुलाब से पूछ सकें कि बोल, तू किस काम में आ सकता है? तो गुलाब नहीं बोलेगा, लेकिन आपके प्राण ही, आपकी अंतर्प्रज्ञा ही कहेगी, इस काम में।
तो कुशल उस व्यक्ति को कहते थे, जो अनंत तरह की घासों के बीच से उस कुश घास को खोज लाता था, जो ध्यान में सहयोगी होने का वातावरण निर्मित करती है।
इसलिए कृष्ण ने कहा सबसे पहले, कुश।
वस्त्र! विशेष वस्त्र। सभी वस्त्र सहयोगी नहीं होते। जिन वस्त्रों में आपने भोजन किया है, उन्हीं वस्त्रों में ध्यान करना कठिन होगा। जिन वस्त्रों में आपने संभोग किया है, उन्हीं वस्त्रों में ध्यान करना तो महा कठिन होगा। जिस बिस्तर पर लेटकर आपने कामवासना के विचार किए हैं, उसी बिस्तर पर बैठकर ध्यान करना बहुत मुश्किल होगा। क्योंकि प्रत्येक वृत्ति और प्रत्येक वासना अपने चारों तरफ की चीजों को इनफेक्ट कर जाती है।
ऐसे लोग आज भी पृथ्वी पर हैं और ऐसी प्रक्रियाएं भी हैं कि मेरा रूमाल उन्हें दे दिया जाए, तो वे मेरे बाबत सब कुछ बता देंगे, हालांकि वे कुछ भी नहीं जानते कि मैं कौन हूं और यह रूमाल किसका है। क्योंकि यह रूमाल मेरे साथ रहकर मेरी सब तरह की संवेदनाओं को, मेरी सब तरह की तरंगों को, मेरे सब तरह के प्रभाव को आत्मसात कर जाता है, पी जाता है।
सूती कपड़े बहुत तीव्रता से पीते हैं, रेशमी कपड़े बहुत मुश्किल से पीते हैं। रेशमी कपड़े बहुत रेसिस्टेंट हैं। इसलिए ध्यान के लिए रेशमी कपड़ों का बहुत दिन उपयोग किया जाता रहा है। वे बिलकुल रेसिस्टेंट न के बराबर हैं। कम से कम दूसरी चीजों के प्रभावों को पीते हैं, इंप्रेसिव नहीं हैं, उन पर इंप्रेशन नहीं पड़ता। कम पड़ता है, फिसल जाता है, बिखर जाता है, टूट जाता है।
सूती कपड़ा एकदम पी जाता है। तो सूती कपड़े की खूबी भी है, खतरा भी है। अगर ध्यान के वक्त सूती कपड़े का उपयोग करें, तो वह ध्यान को पी जाएगा। लेकिन फिर उसकी सुरक्षा करनी पड़ेगी, उसको बचाना पड़ेगा। क्योंकि वह दूसरे प्रभावों को भी इसी तरह पी जाएगा। और चौबीस घंटे में तो ध्यान का मुश्किल से कभी एक क्षण आएगा, बाकी तो क्षण बहुत होंगे; वह सब पी जाएगा।
इसलिए रेशमी कपड़े का उपयोग किया जाता रहा। वह प्रभावों को नहीं पीता है। और आपके चारों तरफ एक निष्प्रभाव की धारा बना देता है। स्वच्छतम हों, कोरे हों, रेशमी हों।
और फिर जिन्होंने पाया कि कपड़े का किसी भी तरह उपयोग करो, कुछ न कुछ कठिनाई होती है, तो महावीर ने दिगंबर होकर प्रयोग किया। उसके कारण थे। ऐसे ही नग्न नहीं हो गए। ऐसा कोई दिमाग खराब नहीं था। कारण थे। कैसे ही कपड़े का उपयोग करो, कुछ न कुछ प्रभाव संक्रमित हो जाते हैं। आप अगर अपने ध्यान के कपड़े भी अलग रख दें, तो आप ही रखेंगे, आप ही उठाएंगे; कहीं तो रखेंगे। और अब हमारे घरों में ऐसी कोई जगह नहीं है, जिसे हम समस्त प्रभावों के बाहर रख सकें।
अगर आप अपने घर में एक छोटा-सा कोना समस्त प्रभावों के बाहर रख सकते हैं, तो वह मंदिर हो गया। मंदिर का उतना ही मतलब है। गांव में अगर एक घर आप ऐसा रख सकते हैं, जो समस्त प्रभावों के बाहर है, तो वह मंदिर है। मंदिर का उतना ही अर्थ है। लेकिन कुछ भी अब बाहर रखना बहुत मुश्किल है। एक कोना...।
इसलिए वे कह रहे हैं, शुद्ध स्थान।
शुद्ध स्थान से मतलब है, अप्रभावित स्थान। जो जीवन की निम्नतर वासनाएं हैं, उनसे बिलकुल अप्रभावित स्थान। और इस तरह के अप्रभावित स्थान का परिणाम गहरा है। और वह घर बहुत गरीब है, चाहे वह कितना ही अमीर का घर हो, जिस घर में ऐसी थोड़ी-सी जगह नहीं, जिसे शुद्ध कहा जा सके। किस जगह को शुद्ध कहें?
जिस जगह बैठकर आपने कभी कोई दुष्विचार नहीं सोचा; जिस जगह बैठकर आपने कोई दुष्कर्म नहीं किया; जिस जगह बैठकर आपने सिवाय परमात्मा के स्मरण के और कुछ भी नहीं किया; जिस जगह बैठकर आपने ध्यान, प्रार्थना, पूजा के और कुछ भी नहीं किया; जिस जगह प्रवेश करने के पहले आप अपनी सारी क्षुद्रताओं को बाहर छोड़ गए--ऐसा एक छोटा-सा कोना!
और निश्चित ही ऐसा कोना निर्मित हो जाता है। और अगर इस कोने पर सैकड़ों लोगों ने प्रयोग किया हो, तो वह धीरे-धीरे घनीभूत होता चला जाता है, क्रिस्टलाइज हो जाता है। वह आपकी इस दुनिया के बीच एक अलग दुनिया बस जाती है। वह एक अलग कोना हो जाता है। जिसके भीतर प्रवेश करते से ही परिणाम शुरू हो जाएंगे। जिसके भीतर कोई अजनबी आदमी भी आएगा, तो परिणाम शुरू हो जाएंगे।
कई बार आपको अनुभव में आया होगा, इससे उलटा आया होगा, लेकिन बात तो समझ में आ जाएगी। कई बार आपको अनुभव में आया होगा, किसी घर में प्रवेश करते, किसी स्थान पर बैठते, मन बहुत दुष्विचारों से भर जाता है। किसी व्यक्ति के पास जाते, मन बहुत दुष्कर्मों की वासनाओं से भर जाता है। इससे उलटा बहुत कम खयाल में आया होगा। क्योंकि इससे उलटे आदमी बहुत कम हैं, इससे उलटी जगह बहुत कम हैं कि किसी के पास जाकर मन उड़ान लेने लगता है आकाश की, जमीन को छोड़ देता है। क्षुद्र से हट जाता है, विराट की यात्रा करने लगता है--किसी के पास।
इस तरह किसी के पास होने का पुराना नाम सत्संग था। सत्संग का मतलब किसी को सुनना नहीं था। सत्संग का मतलब कोई व्याख्यान नहीं था। सत्संग का मतलब, सन्निधि; ऐसे व्यक्ति की सन्निधि, जहां पहुंचकर आपकी अंतर्यात्रा को सुगमता मिलती है।
इसलिए इस मुल्क में दर्शन का बड़ा मूल्य हो गया। पश्चिम के लोग बहुत हैरान होते हैं कि दर्शन से क्या होगा? किसी के पास जाकर आप नमस्कार कर आए, उससे क्या होगा? पश्चिम के लोगों को पता नहीं कि कोई गहरा वैज्ञानिक कारण दर्शन के पीछे है।
अगर किसी पवित्र व्यक्ति के पास जाकर आप दो क्षण खड़े भी हुए हैं, दो क्षण सिर भी झुकाया है, तो परिणाम होगा।
सिर झुकाने का भी विज्ञान तो है ही। क्योंकि जैसे ही आप सिर झुकाते हैं, उस पवित्र व्यक्ति की तरंगें आप में प्रवेश करने के लिए सुविधा पाती हैं, आप रिसेप्टिव होते हैं। किसी के चरणों में सिर रखने का कुल कारण इतना था कि आप अपने को पूरा का पूरा सरेंडर करते हैं उसकी किरणों के लिए, उसके रेडिएशन के लिए, वह आप में प्रवेश कर जाए। एक क्षण का भी वैसा स्पर्श, एक आंतरिक स्नान करा जाता है।
तो शुद्ध स्थान के लिए कृष्ण कह रहे हैं। शुद्ध स्थान हो, ऐसी वस्तुएं आस-पास मौजूद हों, जो ध्यान में यात्रा करवाती हैं। इस तरह की बहुत-सी चीजें खोज ली जा सकीं। ऐसी सुगंधें खोज ली गईं, जो ध्यान में सहयोगी हो जाती हैं। ऐसी वस्तुएं खोज ली गईं, जो ध्यान में सहयोगी हो जाती हैं। ऐसे चार्ज्ड आब्जेक्ट्स खोज लिए गए, जो ध्यान में सहयोगी हो जाते हैं।
आज भी, आज भी बचाने की कोशिश चलती है, लेकिन पता नहीं रहता। पता नहीं है, इसलिए बचाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। आज भी कोशिश चलती है अंधेरे में टटोलती हुई, लेकिन उसके साइंटिफिक, उसके वैज्ञानिक कारण खो जाने की वजह से जो बचाने की कोशिश में लगा है, वह बुद्धिहीन मालूम पड़ता है। जो तोड़ने की कोशिश में लगा है, बुद्धिमान मालूम पड़ता है।
और उस व्यक्ति को बहुत कठिनाई हो जाती है, जो जानता है कि बहुत-सी चीजें तोड़ देने जैसी हैं, क्योंकि उनके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नहीं, वे सिर्फ समय की धारा में जुड़ गई हैं। और बहुत-सी चीजें बचा लेने जैसी हैं, क्योंकि उनके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण हैं। यद्यपि समय की धारा में वैज्ञानिक कारण भूल गए हैं और खो गए हैं।
यह बाह्य परिस्थिति का निर्माण करना है एक मनःस्थिति के जन्माने के लिए। और निश्चित ही बाहर की परिस्थिति में सहारे खोजे जा सकते हैं, क्योंकि बाहर की परिस्थिति में विरोध और अड़चन भी होती है।


समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।। 13।।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।। 14।।

उसकी विधि इस प्रकार है कि काया, सिर और ग्रीवा को समान और अचल धारण किए हुए दृढ़ होकर, अपने नासिका के अग्रभाग को देखकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ और ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित रहता हुआ, भयरहित तथा अच्छी प्रकार शांत अंतःकरण वाला और सावधान होकर मन को वश में करके, मेरे में लगे हुए चित्त वाला और मेरे परायण हुआ स्थित होवे


स विधि के और अगले कदम।
एक, शरीर बिलकुल सीधा हो, स्ट्रेट, जमीन से नब्बे का कोण बनाए। वह जो आपकी रीढ़ है, वह जमीन से नब्बे का कोण बनाए, तो सिर सीध में आ जाएगा। और जब आपकी बैक बोन, आपकी रीढ़ जमीन से नब्बे का कोण बनाती है और बिलकुल स्ट्रेट होती है, तो आप करीब-करीब पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर हो जाते हैं--करीब-करीब, एप्रोक्सिमेटली। और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर हो जाना ऊर्ध्वगमन के लिए मार्ग बन जाता है, एक।
दूसरी बात, दृष्टि नासाग्र हो। पलक झुक जाएगी, अगर नासाग्र दृष्टि करनी है। नाक का अग्र भाग देखना है, तो पूरी आंख खोले रखने की जरूरत न रह जाएगी। आंख झुक जाएगी। अगर आप बैठे हैं, तो मुश्किल से दो फीट जमीन आपको दिखाई पड़ेगी। अगर खड़े हैं, तो चार फीट दिखाई पड़ेगी। लेकिन वह भी ठीक से दिखाई नहीं पड़ेगी और धुंधली हो जाएगी, धीमी हो जाएगी। दो कारण हैं।
एक, अगर बहुत देर तक नासाग्र दृष्टि रखी जाए, तो पूरा संसार आपको, आपके चारों तरफ फैला हुआ संसार, वास्तविक कम, स्वप्नवत ज्यादा प्रतीत होगा। जो कि बहुत गहरा उपयोग है। अगर आप ऐसी अर्धखुली आंख रखकर नासाग्र देखेंगे, तो चारों तरफ जो जगत आपको बहुत वास्तविक, ठोस मालूम पड़ता है, वह स्वप्नवत प्रतीत होगा।
इस जगत के ठोसवत प्रतीत होने में आपके देखने का ढंग ही कारण है। इसलिए जिसे ध्यान में जाना है, उसे जगत वास्तविक न मालूम पड़े, तो अंतर्यात्रा आसान होगी। जगत धुंधला और ड्रीमलैंड मालूम पड़ने लगेगा।
कभी देखना आप, बैठकर सिर्फ नासाग्र दृष्टि रखकर, तो बाहर की चीजें धीरे-धीरे धुंधली होकर स्वप्नवत हो जाएंगी। उनका ठोसपन कम हो जाएगा, उनकी वास्तविकता क्षीण हो जाएगी। उनका यथार्थ छिन जाएगा, और ऐसा लगेगा जैसे कोई एक बड़ा स्वप्न चारों तरफ चल रहा है।
यह एक कारण, बाहरी। बहुत कीमती है। क्योंकि संसार स्वप्न मालूम पड़ने लगे, तो ही परमात्मा सत्य मालूम पड़ सकता है। जब तक संसार सत्य मालूम पड़ता है, तब तक परमात्मा सत्य मालूम नहीं पड़ सकता। इस जगत में दो सत्यों के होने का उपाय नहीं है। इसमें एक तरफ से सत्य टूटे, तो दूसरी तरफ सत्य का बोध होगा।
आपसे आंख बंद कर लेने को कहा जा सकता था। लेकिन आंख बंद कर लेने से संसार स्वप्नवत मालूम नहीं पड़ेगा। बल्कि डर यह है कि आंख बंद हो जाए, तो आप भीतर सपने देखने लगेंगे, जो कि सत्य मालूम पड़ें। अगर आंख पूरी बंद है, तो डर यह है कि आप रेवरी में चले जाएंगे, आप दिवास्वप्न में चले जाएंगे।
पश्चिम में एक विचारक है, रान हुबार्ड। वह ध्यान को भूल से दिवास्वप्न से एक समझ बैठा। आंख बंद करके स्वप्न में खो जाने को ध्यान समझ बैठा। जानकर भारत में--आंख न तो पूरी खुली रहे, क्योंकि पूरी खुली रही तो बाहर की दुनिया बहुत यथार्थ है; न पूरी बंद हो जाए, नहीं तो भीतर के स्वप्नों की दुनिया बहुत यथार्थ हो जाएगी। दोनों के बीच में छोड़ देना है। वह भी एक संतुलन है, वह भी एक समता है, वह भी दो द्वंद्वों के बीच में एक ठहराव है। न खुली पूरी, न बंद पूरी--अर्धखुली, नीमखुली, आधी खुली।
वह जो आधी खुली आंख है, उसका बड़ा राज है। भीतर आधी खुली आंख से सपने पैदा करना मुश्किल है और बाहर की दुनिया को यथार्थ मानना मुश्किल है। जैसे कोई अपने मकान की देहलीज पर खड़ा हो गया; न अभी भीतर गया, न अभी बाहर गया, बीच में ठहर गया।
और जब आंख नासाग्र होती है, जब दृष्टि नासाग्र होती है, तो आपको एक और अदभुत अनुभव होगा, जो उसका दूसरा हिस्सा है। जब दृष्टि नासाग्र होगी, तो आपको आज्ञा चक्र पर जोर पड़ता हुआ मालूम पड़ेगा। दोनों आंखों के मध्य में, दोनों आंखों के मध्य बिंदु पर, इम्फेटिकली, आपको जोर पड़ता हुआ मालूम पड़ेगा। जब आंख आधी खुली होगी और आप नासाग्र देख रहे होंगे, तो नासाग्र तो आप देखेंगे, लेकिन नासांत पर जोर पड़ेगा। देखेंगे नाक के अग्र भाग को और नाक के अंतिम भाग, पीछे के भाग पर जोर पड़ना शुरू होगा। वह जोर बड़े कीमत का है। क्योंकि वहीं वह बिंदु है, वह द्वार है, जो खुले तो ऊर्ध्वगमन शुरू होता है।
आज्ञा चक्र के नीचे संसार है, अगर हम चक्रों की भाषा में समझें। आज्ञा चक्र के ऊपर परमात्मा है, आज्ञा चक्र के नीचे संसार है। अगर हम चक्रों से विभाजन करें, तो आज्ञा चक्र के नीचे, दोनों आंखों के मध्य बिंदु के नीचे जो शरीर की दुनिया है, वह संसार से जुड़ी है। और आज्ञा चक्र के ऊपर का जो मस्तिष्क का भाग है, वह परमात्मा से जुड़ा है। उस पर जोर पड़ने से--वह जोर पड़ना एक तरह की चाबी है, जिससे बंद द्वार खोलने के लिए चेष्टा की जा रही है। वह सीक्रेट लाक है। कहें कि उसको खोलने की कुंजी यह है। जैसा कि आपने कई ताले देखे होंगे, जिनकी चाबी नहीं होती, नंबर होते हैं। नंबर का एक खास जोड़ बिठा दें, तो ताला खुल जाएगा। नंबर का खास जोड़ न बिठा पाएं, तो ताला नहीं खुलेगा।
यह जो आज्ञा चक्र है, इसके खोलने की एक सीक्रेट की है, एक गुप्त कुंजी है। और वह गुप्त कुंजी यह है कि जो शक्ति, जो विद्युत हमारी आंखों से बाहर जाती है, उसी विद्युत को एक विशेष कोण पर रोक देने से उस विद्युत का पिछला हिस्सा आज्ञा चक्र पर चोट करने लगता है। वह चोट उस दरवाजे को धीरे-धीरे खोल देती है। वह दरवाजा खुल जाए, तो आप एक दूसरी दुनिया में, ठीक दूसरी दुनिया में छलांग लगा जाते हैं। नीचे की दुनिया बंद हो गई।
इसमें तीसरी बात कृष्ण ने कही है, ब्रह्मचर्य व्रत में ठहरा हुआ।
ध्यान के इस क्षण में जब आधी आंख खुली हो, नासाग्र हो दृष्टि और आज्ञा चक्र पर चोट पड़ रही हो, अगर आपके चित्त में जरा भी कामवासना का विचार आ गया, तो वह जो द्वार खोलने की कोशिश चल रही थी, वह समाप्त हो गई; और आपकी समस्त जीवन ऊर्जा नीचे की तरफ बह जाएगी। क्योंकि जीवन ऊर्जा उसी केंद्र की तरफ बहती है, जिसका स्मरण आ जाता है।
कभी आपने सोचा है कि जैसे ही कामवासना का विचार आता है, जननेंद्रिय के पास का केंद्र फौरन सक्रिय हो जाता है। विचार तो खोपड़ी में चलता है, लेकिन केंद्र जननेंद्रिय के पास, सेक्स सेंटर के पास सक्रिय हो जाता है। बल्कि कई दफा तो ऐसा होता है कि आपको भीतर कामवासना का विचार चल रहा है, इसका पता ही तब चलता है, जब सेक्स सेंटर सक्रिय हो जाता है। वह पीछे धीरे-धीरे सरकता रहता है। लेकिन विचार तो मस्तिष्क में चलता है और केंद्र बहुत दूर है, वह सक्रिय हो जाता है! उसकी भी कुंजी है वही। अगर विचार कामवासना का चलेगा, तो आपकी जीवन ऊर्जा कामवासना के केंद्र की तरफ प्रवाहित हो जाएगी।
ध्यान के क्षण में अगर कामवासना का विचार चला, तो आप ऊपर तो यात्रा कम करेंगे, बल्कि इतनी नीचे की यात्रा कर जाएंगे, जितनी आपने कभी भी न की होगी। इसलिए सचेत किया है। साधारणतः भी आप कामवासना में इतने नीचे नहीं जा सकते, जितना आधी आंख खुली हो, नासाग्र हो दृष्टि और उस वक्त अगर काम-विचार चल जाए, तो आप इतनी तीव्रता से कामवासना में गिरेंगे, जिसका हिसाब नहीं।
इसलिए बहुत लोगों को ध्यान की प्रक्रिया शुरू करने पर कामवासना के बढ़ने का अनुभव होता है। उसका कारण है। बहुत लोगों को...न मालूम कितने लोग मुझे आकर कहते हैं कि यह क्या उलटा हुआ? हमने ध्यान शुरू किया है, तो कामवासना और ज्यादा मालूम पड़ती है! उसके ज्यादा मालूम पड़ने का कारण है।
अगर ध्यान के क्षण में कामवासना पकड़ गई, तो कामवासना को ध्यान की जो ऊर्जा पैदा हो रही है, वह भी मिल जाएगी। इसलिए ब्रह्मचर्य व्रत में थिर होकर। उस क्षण तो कम से कम कोई काम-विचार न चलता हो।
तो अगर आपको चलाना ही हो, तो एक सरल तरकीब आपको कहता हूं। ध्यान करने के पहले घंटेभर काम-चिंतन कर लें। पक्का ही कर लें कि परमात्मा को स्मरण करने के पहले घंटेभर बैठकर काम का चिंतन करेंगे, यौन-चिंतन करेंगे।
और यह बड़े मजे की बात है कि अगर कांशसली यौन-चिंतन करें, तो घंटाभर बहुत दूर है, पांच मिनट करना मुश्किल हो जाएगा--चेतन होकर अगर करें, सावधानी से अगर करें।
काम-चिंतन की एक दूसरी कुंजी है कि वह अचेतन चलता है, चेतन नहीं। अगर आप होशपूर्वक करेंगे, तो आप खुद ही अपने पर हंसेंगे कि यह मैं क्या-क्या मूढ़ता की बातें सोच रहा हूं! वह तो बेहोशी में सोचें, तभी ठीक है। होश में सोचेंगे, तो कहेंगे, क्या मूढ़ता की बातें सोच रहा हूं!
इसलिए कामुक व्यक्ति को शराब बड़ी सहयोगी हो जाती है। उन व्यक्तियों को, जिनकी काम-शक्ति क्षीण हो गई हो, उनको भी शराब बड़ी सहयोगी हो जाती है। क्योंकि वे फिर बेहोशी से इतने भर जाते हैं कि फिर काम-चिंतन में लीन हो पाते हैं।
तो ध्यान करने के पहले अगर आप घंटेभर आंख बंद कर लें। आधी आंख नहीं, आंख बंद कर लें। और सचेत रूप से मेडिटेट आन सेक्स--सचेत रूप से, अचेत रूप से नहीं--जानकर ही कि अब मैं कामवासना पर चिंतन शुरू करता हूं। और शुरू करें। पांच मिनट से ज्यादा आप न कर पाएंगे। और जैसे ही आप पाएं कि अब करना मुश्किल हुआ जा रहा है, अब कर ही नहीं सकता, तब ध्यान में प्रवेश करें। तो शायद पंद्रह मिनट, आधा घंटा आपके चित्त में कोई काम का विचार नहीं होगा। क्योंकि अर्जुन कोई ब्रह्मचारी नहीं है। पूर्ण ब्रह्मचारी हो, तब तो यह कोई सवाल नहीं उठता। तब तो ब्रह्मचर्य की याद दिलाने की भी जरूरत नहीं है।
एक बहुत मजे की घटना आपसे कहूं।
महावीर के पहले जैनों के तेईस तीर्थंकरों ने ब्रह्मचर्य की कभी बात नहीं की, नेवर। महावीर के पहले तेईस तीर्थंकरों ने जैनों के कभी नहीं कहा, ब्रह्मचर्य। वे चार धर्मों की बात करते थे--अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य। इसलिए पार्श्वनाथ तक के धर्म का नाम चतुर्याम धर्म है।
महावीर को ब्रह्मचर्य जोड़ना पड़ा, पांच महाव्रत बनाने पड़े; एक और जोड़ना पड़ा। जो लोग खोज-बीन करते हैं इतिहास की, उन्हें बड़ी हैरानी होती है कि क्या महावीर को ब्रह्मचर्य का खयाल आया! बाकी तेईस तीर्थंकरों ने क्यों ब्रह्मचर्य की बात नहीं की?
ये तेईस तीर्थंकर जिन लोगों से बात कर रहे थे, वे निष्णात ब्रह्मचारी थे। ये उपदेश जिनको दिए गए थे, उनके लिए ब्रह्मचर्य सहज था। यह लोक-चर्चा नहीं थी। यह आम जनता से कही गई बात नहीं थी, जो कि ब्रह्मचारी नहीं हैं।
महावीर ने पहली दफा तीर्थंकरों के आकल्ट मैसेज को, जो बहुत गुप्त मैसेज थी, बहुत छिपी मैसेज थी, जो कि बहुत गुप्त राज था और केवल निष्णात साधकों को दिया जाता था, उसको मासेस का बनाया। और इसीलिए दूसरी घटना घटी कि तेईस तीर्थंकर फीके पड़ गए और ऐसा लगने लगा कि महावीर जैन धर्म के स्थापक हैं। क्योंकि वे पहले, पहले पापुलाइजर हैं, पापुलाइज करने वाले हैं, लोकप्रिय करने वाले पहले व्यक्ति हैं। पहली दफा जनता में उन्होंने वह बात कही, जो कि सदा थोड़े साधकों के बीच, थोड़े गहन साधकों के बीच कही गई थी। इसलिए तेईस तीर्थंकरों को ब्रह्मचर्य की कोई बात नहीं करनी पड़ी। महावीर को बहुत जोर से करनी पड़ी। सबसे ज्यादा जोर ब्रह्मचर्य पर देना पड़ा, क्योंकि अब्रह्मचारियों के बीच चर्चा की जा रही थी।
कृष्ण जब अर्जुन से कह रहे हैं कि ब्रह्मचर्य व्रत में ठहरा हुआ! इसका यह मतलब नहीं है कि ब्रह्मचारी, इसका इतना ही मतलब है कि ध्यान के क्षण में ब्रह्मचर्य व्रत में ठहरा हुआ।
हां, यह बड़े मजे की बात है कि अगर कोई ध्यान के क्षण में ब्रह्मचर्य में ठहर जाए, क्षणभर को भी ठहर जाए, तो फिर अब्रह्मचर्य में जाना रोज-रोज मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि जब एक दफे ऊर्जा ऊपर चढ़ जाए, तो इतना आनंद लाती है, जितना नीचे सेक्स में गिराई गई ऊर्जा में सपने में भी नहीं मिल सकता है। सोचने में भी नहीं मिल सकता है। उससे कोई तुलना ही नहीं की जा सकती है। एक बार यह ऊपर का अनुभव हो जाए, तो ऊर्जा नीचे जाने की यात्रा बंद कर देगी।
इसलिए तीन बातें कहीं। थिर आसन में, सीधी रीढ़ के साथ बैठा हुआ, अर्धखुली आंख, नासाग्र दृष्टि, आज्ञा चक्र पर पड़ती रहे चोट, ब्रह्मचर्य व्रत में ठहरा हुआ, तो ऐसा व्यक्ति, कृष्ण कहते हैं, मुझे उपलब्ध हो जाता है, मुझमें प्रवेश कर जाता है, मुझसे एक हो जाता है। और जब भी कृष्ण कहते हैं मुझसे, तब वे कहते हैं परमात्मा से।
अर्जुन से वे कह सके सीधी-सीधी बात, मुझसे। क्योंकि जिसने जाना परमात्मा को, वह परमात्मा हो गया। इसमें कोई अस्मिता की घोषणा नहीं है कि कृष्ण कह रहे हैं, मैं परमात्मा हूं। इसमें सीधे तथ्य का उदघोषण है। वे हैं; हैं ही। और जो भी जान लेता है परमात्मा को, वह परमात्मा ही है। वह कहने का हकदार है कि कहे कि मुझमें। लेकिन वहां मैं जैसी कोई चीज बची नहीं है, तभी वह हकदार है। जिसका मैं समाप्त हुआ, वह कह सकता है, मैं परमात्मा हूं।
कृष्ण कहते हैं, वह मुझे जान लेता है।
और शेष बात हम रात करेंगे। लेकिन अभी उठेंगे नहीं। पांच मिनट कीर्तन में भाग लें, फिर विदा हों।
आज इतना ही।