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रविवार, 28 फ़रवरी 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--64)

अध्‍याय—(चौष्‍ठवां)

शो ने हर शाम 8 बजे से अपने बुडलैंड्स अपार्टमेंट में प्रवचन करना शुरू कर दिया है। कई बार प्रवचन दो—दो घंटे तक चलता है। मुझे वहां से अपने घर पहुंचने में एक घंटे से भी ज्यादा समय लगता है। रात काफी देर हो जाती है। इस समय मुश्किल से ही कोई महिला लोकल ट्रेन में सफर करती है। पुरुष मुझे अजीब नजरों से देखते हैं और कभी—कभी अश्लील फब्‍तियां भी कसते हैं। लेकिन किसी भी कीमत पर, मैं उनके प्रवचन से चूकना नहीं चाहती।

हमेशा की तरह, मैं लोकल ट्रेन से घर जा रही हूं और किसी कारण से ट्रेन दो स्टेशनों के बीच करीब आधे घंटे के लिए खड़ी हो जाती है। मैं चिंतित हो रही हूं। आज रात तो बहुत देर हो जाएगी। जब तक गाड़ी अंधेरी स्टेशन पहुँचती है, रात के 11—45 बज चुके हैं।
मैं स्टेशन से निकलकर बस स्टॉप पर बस का इंतजार करने लगती हूं। मेरे पास ही खड़ा व्यक्ति बड़े सौम्य ढंग से मुझसे बात करने लगता है और कहता है यदि मैं चाहूं तो वह मुझे टैक्सी में लिपट दे सकता है। पहले तो मैं झिझकती हूं लेकिन फिर कोई और उपाय न देख, यह बात मान लेती हूं। वह एक टैक्सी बुलाकर मेरे लिए उसका दरवाजा खोलता है। पहले मैं टैक्सी में बैठती हूं, फिर वह आकर मेरे बाजू में बैठ जाता हे। टैक्सी चलना शुरू होती है तो वह मेरे कंधे पर हाथ रख लेता हैं और मुझसे मेरा परिचय मांगने लगता है। मैं उसकी तरंगों को महसूस कर सकती हूं और उसकी बात मान लेने के लिए स्वयं को कोसने लगती हूं। मेरा दिमाग काम करना बंद कर देता है। मुझे नहीं पता कि अब क्या करूं। वह मेरे कुछ और करीब खिसक आता है और कहता है कि मैं थकी हई लग रही हूं। क्या मैं पहले कुछ खाना या पीना पसंद करूंगी......।
मैं हिम्मत करके उससे कहती हूं, बहुत देर हो चुकी है, मैं सीधे घर जाना चाहती हूं।वह हंसता है और मेरे कान में फुसफुसाकर कहता है, 'आज रात तुम घर नहीं जाओगी।यह कहकर वह मेरा हाथ दबाता है। मैं बिलकुल सन्न रह जाती हूं और ओशो को याद करने लगती हूं। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता, जब भीतर अचानक कुछ क्लिक होता है। मैं बिलकुल चौकन्नी होकर उससे कहती हूं हां, मुझे बहुत भूख लग रही है। यहां उतरकर हम कुछ खाते हैं।
वह ड्राइवर को टैक्सी रोकने के लिए कहता है और हम टैक्सी से उतर जाते हैं। वह किराया देने के लिए मीटर में देख रहा है और सचमुच ही एक चमत्कार घटता है। एक बस आकर सीधी मेरे सामने ही खड़ी हो जाती है। मैं दौड़कर निकास द्वार से ही बस में चढ़ जाती हूं जिसके लिए ड्राइवर कोई आपत्ति नहीं करता। जबकि मैं सुरक्षित घर पहुंच गई हूं फिर भी भय से मेरा दिल तेज—तेज धड़क रहा है। मैं खुद से ही कसम लेती हूं कि अब अपने जीवन में दोबारा कभी किसी अजनबी से लिपट नहीं लूंगी।
क्या घटना थी! लेकिन ओशो हमारे काम दमित समाज के बारे में जो कह रहे हैं, इससे वह बात बिलकुल सिद्ध हो जाती है।