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रविवार, 14 फ़रवरी 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--54)

अध्‍याय—(चौवनवां)

 नारगोल के ध्यान शिविर के बाद लक्ष्मी ने भगवा लुंगी और कुर्त्ता पहनना शुरू कर दिया है। ओशो ने उसे अपनी सेक्रेटरी की तरह नियुक्त किया है और वह सीसीआई. चेंबर्स पर सुबह ७ बजे पहुंच जाती है। किसी को भी ओशो से मिलना हो तो उसे लक्ष्मी से अपाइंटमेंट लेनी पड़ती है। यह मेरी कल्पना से परे है। मेरा मन इस नई व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

मैं लोकल ट्रेन में एक अंधे लड़के से रोज कुछ गुलाब के फूल खरीदती हूं। सक्रिय ध्यान में जाने से पहले मैं उनके बैडरूम में उन्हें फूल देने के लिए जाती हूं। मैं लक्ष्मी द्वारा शुरू की गई इस अपाइंटमेंट की व्यवस्था के बारे में ओशो से पूछती हूं।
वे हंसकर कहते हैं, इसे समस्या मत बना। बस लक्ष्मी के आने से पहले आ जाया कर।मुझे अपने सदगुरू का यह सुंदर सुझाव बहुत अच्छा लगता है और मैं लक्ष्मी के आने से पंद्रह मिनट पहले पहुंचना शुरु कर देती हूं। मैं वहां पहुंचकर सीधी उनके कमरे में घुस जाती हूं। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं ही उनसे मिलना नहीं चाहती, वे भी मुझसे मिलना चाहते हैं।
आज रात मैं प्रवचन में उनको कहते सुनती हूं गुरु जल से भरे बादल के जैसा होता है, जो उन सब पर बरस जाता है जो प्यासे हैं और उसे अपने हृदय में ग्रहण करने को तैयार हैं। शिष्य भले ही अनुग्रहीत हो या न हो, लेकिन गुरु सदा ही उन सबके प्रति अनुग्रहीत होता है जिन्होंने अपने हृदय उसके प्रति खोल दिए हैं।
आगे वे कहते हैं, सदगुरूओं द्वारा ऐसा पहले कभी भी नहीं कहा गया हे, लेकिन ऐसा ही है। यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं।
मेरा सिर अहोभाव में झुक लिए जाता है और 'मैं उन्हें धन्यवाद देने के कोई शब्द नहीं खोज पाती। मैं जानती हूं कि वे उन हृदयों की बात बिन—कहे ही समझ लेते हैं जो धडक रहे हैं। जो उनके हृदय की लय से लय मिलाकर धडक रहे है।