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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--46)

अध्‍याय—(छियालीसवां)

लोग एक खास तरह की पोशाक पहनते हैं, जो ओशो को बहुत अच्छी लगती है। वे हमें स्टूडियो में जाकर कश्मीरी पोशाक में अपनी फोटो खिंचवाने को कहते हैं। हम उनके इस सुझाव से उत्साहित होकर फोटो खिंचवाने चले जाते हैं।

अपने चित्र उतरवाने के बाद, हम कैमरामैन से पूछते हैं कि क्या वह हमारे साथ चलकर ओशो का भी. कश्मीरी पोशाक में घोड़े पर बैठा हुआ चित्र खींच सकता है। वह तैयार हो जाता है।
ओशो बरामदे में कुछ मित्रों के साथ बैठे हुए हैं। हमें घोड़े और कैमरामैन के साथ आते देखकर वे हमारी मंशा भांप लेते हैं, और कहते हैं, यह मुसीबत आ गई।
यह सुनकर मैं उनसे कहती हूं 'आपने हम सबको परेशान किया। अब कृपा करके जरा कश्मीरी पोशाक पहन लीजिए। हम आपकी घोड़े पर बैठी हुई तस्वीर खींचना चाहते हैं।बाकी लोग मेरी बातें सुनकर चकित होते हैं लेकिन ओशो मुस्कुराकर अपनी कुर्सी से उठ जाते हैं और कहते हैं, ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी।क्रांति कपड़ों का थैला लेकर उनके साथ भीतर चली जाती है।
कई बार मुझे अचरज होता है कि कैसे मैं कभी—कभी मित्रों की तरह ओशो के साथ इतनी घनिष्ठता से बात कर लेती हूं। मैं जानती हूं यह उनका बेशर्त प्रेम ही है जिसकी वजह से हमें ऐसा नहीं लगता कि वे हम से अलग और ऊपर हैं। वे हमें बिना किसी दिखावट के, अपना हृदय उनके प्रति खोलने देते हैं।
कुछ ही मिनटों में वे कश्मीरी पोशाक पहने बाहर निकलते हैं जैसे कोई मुगल बादशाह चेहरे पर शरारती मुस्कान लिए चला आ रहा हो। कैमरामैन कॉटेज के पास ही मैदान में अपने घोड़े के साथ इंतजार कर रहा है।
ओशो गरिमापूणै मंद गति से घोड़े के पास जाते हैं, और उसे थपथपाते हैं। वे घोड़े पर चढ़ने के बाद हम सबकी ओर मुस्कुराकर देखते —हैं और कैमरामैन चित्र ले लेता है। अगले दिन हमें ओशो की तस्वीर मिल जाती है, जिसमें ओशो कश्मीर के बादशाह की तरह घोड़े पर बैठे हुए हैं।