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गुरुवार, 9 मार्च 2017

कन थोरे कांकर घने-(संत मलूकदास)-प्रवचन-04



कन थोरे कांकर घने-(संत मलूकदास)

भक्ति की शराब स्वभाव की उदघोषणा समानुभूति धारणा और भक्ति त्वरा और सातत्य जीवन-उत्सव
चौथा प्रवचन
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रात;, दिनांक 14 मई 1977 ;
प्रश्न-सार:
1--भक्ति के लिए शराब की उपमा आप क्यों देते हैं?
2--मध्ययुगीन संत गरीब और पिछड़ें वर्ग से क्यों आये?
3--दूसरों के दुःख को अपना मानना कब संभव?
4--मिलन असंभव क्यों लगता है?
5--अनेक साधनाएं करके घटना क्यों नहीं घटी?
6--मृत्यु के रहते उदासी से कैसे मुक्त रहा जा सकता है?


पहला प्रश्न: कृपा करके शराब की तो बात न करें। क्या प्रभु-भक्ति के लिए आप और कोई उपमा नहीं ढूंढ सकते हैं?

शराब से सुंदर कोई उपमा नहीं है। शराब शब्द से चौंकें मत। भक्ति एक अनूठी शराब है; अंगूर की नहीं--आत्मा को। और भक्ति और शराब में कुछ गहरा तालमेल है।
शराब भुलाती है; भक्ति मिटाती है। शराब क्षण भर को करती है वही काम, जो भक्ति सदा के लिए कर देती है। शराब क्षण-भंगुर भक्ति है; और भक्ति है; और भक्ति शाश्वत शराब है।
शराब का इतना आकर्षण है--सदियों से, सदा से; क्योंकि आदमी जब अहंकार से बहुत पीड़ित और परेशान और चिंताओं से बहुत ग्रस्त और संतापों से बहुत बोझिल हो जाता है, तो एक ही उपाय मालूम पड़ता है कि किसी तरह अपने को भूला बैठो। थोड़ी देर को सही।
थोड़ी देर को भूल जाए यह अहंकार, भूल जाए ये चिंताएं, भूल जाए यह विषाद। शराब थोड़ी देर को अहंकार पर पर्दा डाल देती है; तुम्हें याद नहीं रहती है कि तुम कौन हो। थोड़ी देर को डुबकी लगा जाती है। झूठी है डुबकी। फिर लौट आओगे। शराब मिटा नहीं सकती, सिर्फ धोखा दे सकती है। फिर लौटोगे और चिंताएं कम भी न होंगी, शायद इस बीच बढ़ भी जायेंगी। क्योंकि जितनी देर तुम शराब में डुबे रहे, चिंताएं खाली नहीं बैठी रहीं। उनका काम जारी है; उनका उलझाव बढ़ रहा है। उतने समय में उनमें और नए पत्ते निकल आयेंगे, और नयी शाखायें निकल आयेंगी; तुम और भी चिंतित हो जाओगे। शायद और चिंता में और ज्यादा शराब पी लोगे। एक दुष्टचक्र पैदा होगा।
लेकिन भक्ति की शराब भी, है तो शराब ही। उसमें अहंकार भूलता नहीं, अहंकार विनष्ट ही हो जाता है।
शराब मग विस्मरण है; भक्ति में विसर्जन। फिर तुम लौटकर कभी भी वही न हो पाओगे, जो तुम थे। अहंकार गया--सो गया और अहंकार के साथ गई सारी गांठें--चिंता की, दुःख की, पीड़ा की।
अहंकार ही मूल गांठ है। मैं हूं--यही सारे उपद्रवों की जड़ है। मैं नहीं हूं--ऐसी प्रतीति, परमात्मा है--इस प्रतीति का द्वार बन जाती है। इसलिए मैं तो भक्तों को शराबी कहता हूं। और इससे बेहतर उपमा संभव नहीं है। और मैं ही कह रहा हूं, ऐसा भी हनीं है। बड़े पुराने दिनों से यह बात अनुभव की गई है कि इस पृथ्वी पर शराब ही ऐसा तत्व है, जो थोड़ी सी खबर देता है--उस परलोक की।
कुरान कहता है कि बहिश्त में, स्वर्ग में शराब के चश्मे बहते हैं। वह भी प्रतीक है। उसका अर्थ है: अपूर्व आनंद के झरने बह रहे हैं, जिनमें डुबकी लगा ली, तो सदा के लिए खो गये। एक बार गोता लग गया, तो खो गये। विस्मरण के झरने बह रहे हैं। शराब के झरने का इतना ही अर्थ होता है।
स्वर्ग अगर आत्म-विस्मरण न हो, तो और क्या होगा?
फिर बाबा मलूकदास के साथ तो और भी इस प्रतिमा का तालमेल है। मलूक कहते हैं कि भक्त ऐसे चलता, संन्यस्त ऐसे चलता, जैसे मस्त हाथी, पागल हाथी। किसी अपूर्व रस से भरा झलकता चलता, छलकता चलता।
कोई किस तरह राज-ए-उल्फत छुपाये।
निगाहें मिली और कदम डगमगाये।
परमात्मा से आंख मिल जाए, तो फिर छिपाओगे कहां? लाख छिपाओ, पता चल-चल जायेगा। उठते-बैठते, बोलते न बोलते, सोते-जागते पता चल जायेगा। कोई कभी छिपा पाया परमात्मा को जानकर? कोई उपाय नहीं है--छिपाने का।
यह तो ऐसे है, जैसे अंधेरा रात में किसी ने दीया जलाया हो, और दीए को छिपाने की कोशिश करे। कैसे छिपायेगा? फूल खिला हो, और फूल सुगंध को छिपाने की कोशिश करे, कैसे छिपेगी?
कोई किस तरह राज-ए-उल्फत छिपाते। यह प्रेम का रहस्य छिपाये छिपता नहीं। निगाहें मिली और कदम डगमगाये। और जब पहली खबर मिलती है कि परमात्मा से कुछ संबंध जुड़ा, वह कदम के डगमगाने से मिलती है। एक मस्ती बहने लगती है। इसलिए मैंने शराब की बात कही।
और तुमसे मैं यह भी कह दूं कि इस संसार में मिलने वाली शराब तुम तब तक छोड़ न सकोगे, जब तक तुम परमात्मा की शराब का स्वाद न ले लो। जिस दिन परमात्मा की शराब का स्वाद आ गया, सब शराबें फीकी और तिक्त कड़वी हो जाती हैं। फिर कोई शराब जंचती नहीं। जिसने उस परम को पी लिया, फिर और कोई चीज कंठ में उतरती नहीं; फिर रास ही आतीं। फिर सब चीजें छोटी पड़ जाती हैं।
परमात्मा से आंख मिल गई, तो फिर इस जगत में किसी को आंख से आंख मिलाने का भाव चला जाता है। परमात्मा से आंख मिल गई, तो इस जगत में फिर किसी से भी कोई आसक्ति और प्रेम नहीं रह जाता। बड़ा प्रेम आ जाए, तो छोटा अपने से चला जाता है। सूरज निकल आये, तो जो दीया अंधेरे में छिपाये न छिपता था, सूरज के निकलने पर अपने आप छिप जाता है। उसका पता ही नहीं चलता। देखते नहीं, रोज रात आकाश तारों से भर जाता है सुबह तारे कहां चले जाते हैं? क्या तुम सोचते हो: कहीं चले जाते हैं? अपनी जगह हैं। लेकिन सूरज निकल आया है; विराट प्रकाश फैल गया है। उस विराट प्रकाश में छोटे-छोटे टिमटिमाते तारों का प्रकाश खो जाता है। वे अपनी जगह है। जब सूरज विदा हो जायेगा, तब वे फिर टिमटिमाने लगेंगे। अभी भी टिमटिमा रहे हैं, लेकिन बड़े प्रकाश के सामने छोटा प्रकाश छिपा जाता है।
भक्त तो मस्ती में है। भक्त तो बेहोशी में है। और इस बेहोशी का मजा कुछ ऐसा कि बेहोशी बढ़ती है और होश भी बढ़ता है। यही तो चमत्कार है, यही तो रहस्य है! एक तरफ भक्त की बेहोशी बढ़ती है, और एक तरफ भक्त का होश बढ़ता है! एक तरफ अहंकार की तरफ; और आत्मा की तरफ होश आता। एक तरफ भक्त गंवाने लगता, दूसरी तरफ कमाने लगता। अहंकार के सिक्के खोने लगते हाथ से और आत्मा के सिक्के हाथ में पड़ने लगते।
चाल है मस्त, नजर मस्त, अदा में मस्ती।
जैसे आते हैं वो, लौटे हुए मैखाने से।।
मंदिर से भक्त को आते देखो! पूजागृह से भक्त को आते देखो। या पूजागृह की तरफ जाते भक्त को देखो। उसकी धुन सुनो। उसके हृदय के पास थोड़ा कान लगाओ। उसके पास तुम तरंगें पाओगे--शराब की।
भक्त के साथ रहो, तो धीरे-धीरे तुम भी डूबने लगोगे। भक्त का संग-साथ तुम्हें भी बिगाड़ देगा। मीरा ने कहा है: सब लोक-लाज खोई--साध संगत। साधुओं के संग में सब लोक-लाज खो गई।
मीरा राज-घराने से थी; फिर राजस्थानी राज-घराने की! जहां घूंघट उठता ही नहीं। फिर सड़कों पर नाचने लगी। शराब न कहोगे, तो क्या कहोगे? पागल हो उठी। दीवानी हो गई। राहों पर, चौराहों पर नृत्य चलने लगा। जिस राजरानी का चेहरा कभी किसी ने न देखा था, भीड़ और बाजार के साधारण जन उसका नृत्य देखने लगे! घर के लोग अगर परेशान हुए होंगे, तो कुछ आश्चर्य नहीं है। और उन्होंने अगर जहर का प्याला भेजा, तो मीरा से दुश्मनी थी--ऐसा नहीं। मीरा को पागल समझा। और घर की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगाए दे रहे है!
लेकिन जिसको परमात्मा की शराब चढ़ जाए, फिर कोई और प्रतिष्ठा मूल्य नहीं रखती।
उर्दू, पर्शियन, अरबी संतों ने बहुत शराब की उपमा का प्रयोग किया है। उमर खय्याम तो जग जाहिर है। और तुम चकित होओगे जान कर कि उमर खय्याम कभी शराब पिया ही नहीं। वह तो परमात्मा की शराब की बात कर रहा है। उमर खय्याम के साथ बड़ा अनाचार हो गया है। फित्जराल्ड ने जब पहली दफा उमर खय्याम का अंग्रेजी में अनुवाद किया, तो फित्जराल्ड ठीक से समझा नहीं कि बात क्या है। वह समझा--कि शराब यानी शराब। जैसा कि प्रश्न पूछनेवाले ने समझ लिया है कि शराब यानी शराब।
फित्जराल्ड के अनुवाद के कारण सारी दुनिया में एक भ्रांति फैल गई है। क्योंकि उसी के अनुवाद से उमर खय्याम जाहिर हुआ। अनुवाद अनूठा है, लेकिन भ्रांतियों से भरा है।
पहली भ्रांति तो यही है...। उमर खय्याम एक सूफी फकीर है, एक अलमस्त फकीर है। बाबा मलूकदास से मिल बैठता, तो दोनों की खूब छनती। दोनों एक दूसरे की बात समझ लेते। शायद कहने की जरूरत भी न पड़ती। शायद बोलते भी न; साथ-साथ डोलते नाचते। कौन कहे! कौन जाने! ऐसे अनूठे लोग मिल जाए, तो उनको भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
उमर खय्याम सूफी फकीर था। शराब की बात में तो वह परमात्मा की बात कर रहा। मधुशाला से मतलब है--परमात्मा का घर। साकी से मतलब है--खुद परमात्मा।
साकिया तशनगी की ताब नहीं,
जहर दे दे अगर शराब नहीं।
और अगर परमात्मा ही पिलाने वाला हो, तो फिर कौन फिक्र करता है। अगर जहर भी पिला दे, तो ठीक।
साकिया तसनगी की बात नहीं। तू फिक्र मत कर। अगर शराब न हो, तो जहर दे दे। जहर दे दे, अगर शराब नहीं। चलेगा। तेरे हाथ से जो मिल जायेगा, वही अमृत है।
वाइज न तुम पियो, न किसी को पिला सको।
क्या बात है तुम्हारे शराब-एत्तहूर की।।
इसलाम कहता है कि स्वर्ग में शराब के चश्मे बह रहे हैं। पूछना चाहिए कि क्या करोगे, इन शराब के चश्मों का! क्योंकि यहां तो तुम लोगों को सिखाते हो--शराब न पीयो। जो शराब पीते हैं, वे तो नर्क जायेंगे। वे तो बहिश्त जायेंगे नहीं। जाहिर है--गणित साफ है। जो यहां शराब नहीं पीते, शराब छोड़े हुए हैं, जीवन का सब राग-रंग तोड़ा हुआ है, गृहस्थ नहीं है--विरागी हैं, उदासी हैं--वे जायेंगे स्वर्ग। मगर वे करेंगे क्या कहां--शराब के चश्मों का--जिन्होंने कभी पी ही नहीं।
व इल न तुम पियो--धर्म-गुरु न तो तुम पीते हो, न किसी को पिला सको।--और न तुम किसी को पिला सकते हो; क्या बात है तुम्हारी शराब-एत्तहूर की; फिर सार क्या हुआ--तुम्हारे स्वर्ग की शराब का? न तुम खुद पीओगे, न किसी को पिला सकोगे। न पीने की हिम्मत है, न पिलाने की हिम्मत है, और वहां जो लोग होंगे, वे न पीने वाले होगे। कसमें खाये हुए लोग होगे। वहां शराब के चश्मे बहाने से सार भी क्या है!
ये पंक्तियां महत्वपूर्ण हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर तुम्हें परमात्मा के जीवन में कभी प्रवेश करना हो, तो उदास हो कर प्रवेश मत करना। इस जीवन में जहां, भी जैसे भी, जितना भी, क्षण-भंगुर सही, जो सुख मिलता हो, उसका स्वाद लो। उस स्वाद में भी परमात्मा का स्वाद अनुभव करो। बूंद सही, लेकिन बूंद में से भी है तो सागर ही। क्षण-भंगुर सही, लेकिन क्षण-भंगुर में भी छाया तो पड़ी शाश्वत की।
इसलिए भक्त कहता है: जीवन से भागो मत; जीवन को छोड़ो मत; जीवन को जीओ।
मलूक कहते हैं; घर में रहे उदासी। भागो मत कहीं; बीच बाजार में रहो। घर में रहे उदासी।
और उदासी का अर्थ मैंने समझाया--उदास नहीं। उदासी का अर्थ है--उद आसीत--परमात्मा के पास बैठा रहे। रहे बाजार में, लेकिन मन परमात्मा के पास रहे। बैठक उसके पास लगी रहे। शरीर बाजार में रहे और प्राण उसके पास रहें। ऐसे आदमी का नाम उदासी।
नाचो--गाओ--गुनगुनाओ। वसंत है तो खिलो--फूलों जैसे। और जब वृक्ष नाचते हो हवाओं में, तो तुम भी नाचो। और जब सूरज उगे, तो गुनगुनाओ--गीत गाओ, प्रार्थना करा। सब तरह से अपनी जीवन को आनंद से भरो और हर आनंद में परमात्मा का अनुग्रह स्वीकार करो, तो ही तुम किसी दिन स्वर्ग के आनंद को पाने के योग्य बन सकोगे। नहीं तो स्वाद ही नहीं रहेगा!
जरा सोचो तो, तुम्हारे सब उदासी--तथाकथित उदासी और विरागी और संन्यासी--सब स्वर्ग पहुंच जाए, तो स्वर्ग की हालत नरक से भी बदतर हो जाए। हो गई होगी तब तक। तुम्हें नरक में चाहे थोड़े भले आदमी भी मिल जाए--मुस्कुराते, गुनगुनाते, गीत गाते, नाचते, मगर स्वर्ग में कहां मिलेंगे!
स्वर्ग बड़ा उदास हो गया होगा! स्वर्ग में धूल जम गई होगी। स्वर्ग में कोई उत्सव तो नहीं हो रहा होगा।
ये पंक्तियां ठीक ही हैं कि--वाइज, न तुम पीयो, न किसी को पिला सको। क्या बात है तुम्हारी शराब-एत्तहूर की!
पीना तो यहीं सीखी। संसार पाठशाला है। संसार छोटा सा आंगन है, जिसमें तुम उड़ना सीखो, ताकि एक दिन तुम विराट के आंगन में भी उड़ सको।
इस संसार में और परमात्मा में कोई अनिवार्य विरोध नहीं है। यह परमात्मा की ही सीढ़ी है। होना ही चाहिए। उसका है, तो उसकी ही सीढ़ी होगी। उसका हो कर उसके विपरीत कैसे होगा? इन सीढ़ियों का उपयोग करो। निश्चित इसके पार जाना है। सीढ़ियों पर अटक नहीं जाना है। लेकिन इसका उपयोग करो।
तुम्हें बेचैनी शराब शब्द से हुई, क्योंकि तुम्हें लगा--कि शराब तो सांसारिक चीज है।
अगर ठीक से समझो, तो संसार के अतिरिक्त हमारे पास कोई दूसरे शब्द ही नहीं हैं। तुम जो भी शब्द उपयोग करोगे, वे सभी सांसारिक होंगे। शास्त्र कहते हैं: परमात्मा को पा लेने का आनंद है--ऐसा--जैसे करोड़ गुना विषयानंद। तो सांसारिक हो गया! संभोग से सुख मिलता है, उसका करोड़ गुना; लेकिन बात संभोग की हो गई।
हम कहते हैं: संसार क्षण-भंगुर; परमात्मा शाश्वत। लेकिन शाश्वत का नाचने का उपाय भी क्षण-भंगुर! हम हैं; यहां जो जरा-सी देर को मिलता, परमात्मा को सदा के लिए मिल जाता। लेकिन हमारी भाषा तो यहीं की होगी।
भाषा मात्र पृथ्वी की है। आकाश को समझाने चलोगे, तो भी पृथ्वी की भाषा का ही उपयोग करना पड़ेगा।
शराब कुछ बुरा शब्द नहीं है। प्यारा शब्द है। अर्थ समझो। अर्थ इतना ही है--कि ऐसी डुबकी लगाओ परमात्मा में--उसके नाम ऐसे डूबो कि तुम्हें अपना स्मरण न रह जाए। मैं हूं--यह भाव खो जाए। और तब तुम समझोगे कि मैं किस शराब की बात कर रहा हूं।
मिरी शराब की क्या कद्र तुझको ऐ वाइज
जिसे मैं पी के दुआ दूं वह जन्नती हो जाए।।
जिस शराब की मैं बात कर रहा हूं, मिरी शराब की क्या कद्र तुझको ऐ वाइज--हे धर्मगुरु, तुझे मेरे शब्द शराब का कुछ भी पता नहीं है; उसकी तुझे कद्र भी नहीं हो सकती। तू समझ ही न पायेगा। जिसे मैं पी के दुआ दूं, वह जन्नती हो जाये। जिसे मैं पी कर दुआ दे दूं, स्वर्ग के पाने का उसे मजा आ जाए।
बाबा मलूकदास उस मस्ती की बात कर रहे हैं कि तुम अगर उस मस्ती की छाया में क्षण भर विश्राम भी कर लो, तो रूपांतरित हो जाओ।
यह बात तुम्हें जानकर हैरानी होगी कि शराब का आविष्कार एक ईसाई संत ने किया। इसी तरह चाय का आविष्कार एक बौद्ध भिक्षु ने किया। दोनों बातें बड़ी प्रतीकात्मक हैं।
बौद्धों की परंपरा है--ध्यान की। चाय जगाती है; नींद को तोड़ती है। प्रतीकात्मक है। झपकी नहीं आने देती। आती हो झपकी, तो झपकी चली जाती है। जम्हाई आती हो, तो जम्हाई चली जाती है।
चाय का संबंध जुड़ा है--बोधिधर्म बोधिधर्म कोई अठारह सौ साल पहले चीन गया। बौद्ध सदगुरु था--अपूर्व! वह टाह नाम के पहाड़ पर वर्षों तक बैठा रहा; ध्यान करता रहा। टाह पहाड़ का नाम था, इसीलिए--टी। और टाह का एक उच्चारण चा भी है चीन में--इसीलिए चाय। उस पहाड़ से इसका संबंध जुड़ा।
कहानी बड़ी मधुर है। कहानी तो कहानी है...। लेकिन है अर्थपूर्ण। एक रात बोधिधर्म जागरण के लिए बैठा है; पूरी रात जागरण करना है; और झपकी आने लगी। तो उसने गुस्से में अपी आंख की दोनों पलकें उखाड़ कर फेंक दी। न रहेगी। पलकें, न झपकी आयेगी। न कुछ झपकने को ही बचेगा, तो झपकी कैसे आयेगी! न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। उसने पलकें उखाड़ कर फेंक दी। और कहानी बड़ी मधुर है; कहते हैं: उन्हीं पलकों से पहली दफा चाय का पौधा पैदा हुआ। वे पड़ी रहीं जमीन में; गल गई और उनसे जो पौधा पैदा हुआ, वह चाय बनी।
उस चाय को अब भी तुम पीते हो, तो नींद टूट जाती है। यह नींद तोड़ने के लिए ही फेंकी थी बोधिधर्म ने।
लेकिन बात सोचने जैसी है। बौद्ध है। बौद्ध है--ध्यान का मार्ग। इसलिए बौद्ध भिक्षु को चाय पीने की मनाही नहीं है। बौद्ध भिक्षु और कुछ न करे, चाय तो जरूर पीता है। चाय तो दिन में कई बार पीता है। सुबह का ध्यान चाय से शुरू होता है; ध्यान का अंत चाय से होता है।
तुम शायद चकित होओगे जानकर--कि चाय और बौद्ध भिक्षु! चाय तो नहीं पीनी चाहिए। लेकिन सदियों से बौद्ध भिक्षु पीता रहा है। और उसका उपयोग करता रहा है। और जापान में उन्होंने चाय को बिलकुल ही धार्मिक मूल्य और महत्व दे दिया है। चाय पीने को ही ध्यान की प्रक्रिया बना ली है। चाय बनाना; चाय भेंट करना; चाय पीना; इसमें घंटों लग जाते हैं। और इसको इतने बोधपूर्वक किया जाता है कि चाय की प्रक्रिया से ही ध्यान का काम हो जाता है।
टी सेरेमनी कहते हैं जापान में तो वे--चाय का उत्सव। जिनके पास कोई सुविधा है...। जैसे हिंदुस्तान में लोग घर में छोटा सा मंदिर बना लेते हैं, ऐसे जापान में जिनके घर में थोड़ी सुविधा है, उनका चाय-घर अलग होता है: बगीचे के एक कोने में; दूर एकांत में; जहां लोग ऐसे जाते जैसे मंदिर में जा रहे हैं। क्योंकि ध्यान--जागरण।
और शराब की खोज की कथा है कि एक ईसाई फकीर ने की; डायोनिसस उसका नाम था। यह बात भी ठीक है, क्योंकि ईसाइयत भक्ति का मार्ग है। ये प्रतीक बड़े ठीक हैं।
भक्ति के मार्ग पर--विस्मरण; ध्यान के मार्ग पर--होश। भक्ति के मार्ग पर डूबना है; ध्यान के मार्ग जागना है। अंतिम परिणाम एक ही होता है। अगर तुम ध्यान के मार्ग पर चल-चल कर जागते रहे, जागते रहे, तो एक तरफ तुम जाओगे, और एक तरफ तुम पाओगे--खोते जा रहे हो। तुम्हारा ध्यान जागने पर रहेगा और खोने की घटना छाया की तरह घटेगी।
भक्ति के मार्ग पर तुम खोते जाओगे, और तुम पाओगे: एक तरफ जागरण आ रहा है। एक तरफ खोते जा रहे हो, एक तरफ जागरण आ रहा है। खोना तुम्हारी प्रक्रिया होगी;  जागना परिणाम होगा। अंत में खोना और जागना एक साथ घट जाते हैं, जैसे कि एक ही सिक्के के दो पहलू।
भक्त का एक तरफ ध्यान रहता है; ध्यानी का दूसरी तरफ ध्यान रहता है। लेकिन सिक्का तो वही है।
तो चूंकि मैं मलूक की बात रहा हूं, इसलिए शराब का प्रतीक चुना है। उसे समझना।

दूसरा प्रश्न: ऐसा लगता है कि जहां प्राचीन युग के भारतीय संत और प्रज्ञापुरुष श्री संपन्न और श्रेष्ठ कुलों से आया किए हैं, वहां मध्ययुगीन संत प्रायः दरिद्र और पिछड़े वर्गों में ही पैदा हुए हैं। क्या इस ऐतिहासिक तथ्य पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करेंगे?

ऐसा हुआ। होने का कारण भारत की वर्ण व्यवस्था थी। भारत वर्ण व्यवस्था से पीड़ित रहा है। अभी भी छुटकारा नहीं हुआ है। इसलिए भारत में जो पहले संतों की परंपरा हुई, वह ब्राह्मणों की थी। ऋषि-मुनि--वेद और उपनिषद के--ब्राह्मण हैं। श्रेष्ठतम वर्ग ही धर्म के जगत में प्रवेश करने के योग्य था और पात्र था--ऐसी मान्यता थी। इस मान्यता के कारण हजारों, लाखों, करोड़ों लोग परमात्मा से संबंधित होने से वंचित रह गये।
जो भी मनुष्य है, वह परमात्मा को पाने के लिए योग्य है। मनुष्य होने में ही वह योग्यता मिल गई है। अब मनुष्य के अतिरिक्त और किसी योग्यता की जरूरत नहीं। ब्राह्मण होना आवश्यक नहीं है।
लेकिन इस देश की जो धारणा थी, वह यह थी--कि ब्राह्मण ही इतना शुद्ध है कि परमात्मा की तरफ जा सके। इसलिए उसको ब्राह्मण कहते हैं। ब्राह्मण यानी जो ब्रह्म की तरफ जा सके। बाकी क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को तो काट दिया। ब्रह्म से उनको कोई संबंध नहीं है।
लेकिन यह बात ज्यादा दिन नहीं चल सकती थी। स्वभावतः पहली पहली बगावत हुई--बुद्ध और महावीर के समय में। बगावत क्षत्रियों से आई। वे नंबर दो थे। बगावत हमेशा नंबर दो हो आती है।
ध्यान रखना: लोग सोचते हैं कि बगावत नीचे आती है। बगावत नीचे से कभी नहीं आती। बगावत नंबर दो से आती है। इंदिरा को हटाना हो, तो मोरारजी देसाई हटाते हैं। वे नंबर दो हैं। बगावत हमेशा नंबर दो से आती है। आखिर में जो खड़ा है, उसको तो इतनी आशा भी नहीं होती, भरोसा भी नहीं होता। कि वह हटा पायेगा। वह जो नंबर दो है, वही खतरनाक सिद्ध होता है, क्योंकि नंबर दो को ऐसा लगता है कि बस, एक ही कदम की बात है कि मैं नंबर एक हो सकता हूं। ज्यादा दूर नहीं है मंजिल; इतने करीब है कि अगर मैं चूका, तो मैं ही जिम्मेवार हूं, कोई और जिम्मेवार नहीं है।
इसलिए सबसे बड़ा खतरा, जो पास होते हैं, उनसे होता है; जो दूर होते हैं, उनसे नहीं होता।
ब्राह्मण के निकटतम थे क्षत्रिय। यह नंबर दो का वर्ग था।  और क्षत्रियों को लगने लगा--कि यह भी क्या बात है!--कि ब्राह्मण को पा सके? इसके प्रति बगावत करी जरूरी थी।
ब्रह्म उन दिनों में सबसे ऊंची बात थी, जो पाने योग्य थी। और सब तो गौण है। तो क्षत्रियों ने बगावत की: जैन धर्म और बौद्ध धर्म उस बगावत के परिणाम हैं। जैनों के चौबीसों तीर्थंकर क्षत्रिय हैं। उनमें एक भी ब्राह्मण नहीं है। बुद्ध क्षत्रिय हैं; और बुद्ध ने अपने चौबीस जन्मों की जो कथाएं कही हैं, उनमें हर बार वे क्षत्रिय हैं। वे किसी भी बार ब्राह्मण ही हैं।
यह बड़ी बगावत थी। इसलिए हिंदू धर्म जितना नाराज जैनों और बौद्धों पर रहा है, उतना नाराज किसी से नहीं है। हो भी नहीं सकता। और एक ऐसा वक्त आया कि क्षत्रियों ने बिलकुल ही ब्राह्मण-केंद्रित धर्म को बुरी तरह क्षत-विक्षत कर डाला।
यह बगावत क्षत्रियों से आई। लेकिन जब क्षत्रिय ज्ञानी होने लगे..। पहले तो ब्राह्मणों ने उसे बिलकुल स्वीकार नहीं किया। महावीर के नाम का भी उल्लेख नहीं किया। महावीर के नाम का भी उल्लेख नहीं किया। महावीर के नाम की भी उल्लेख नहीं किया है--ब्राह्मण शास्त्रों में। कैसे उल्लेख करो! बुद्ध का उल्लेख भी किया है, तो बड़ी चालबाजी से किया है, बड़ी कूटनीति से किया है। बुद्ध का उल्लेख करना पड़ा। क्योंकि बुद्ध का इतना प्रभाव पड़ा कि उस प्रभाव को एकदम अस्वीकार भी नहीं किया जा सकता। महावीर का तो प्रभाव इतना बड़ा नहीं था। छोटा दायरा था महावीर का। उनकी प्रक्रिया ऐसी थी कि बहुत भीड़ उसमें जा नहीं सकती थी; कठोर थी। बुद्ध की प्रक्रिया सुगम थी, उसमें करोड़ों लोग जा सकते थे। तो करोड़ों लोग गये। यह बात इतनी बड़ी थी कि इनकार तो की नहीं जा सकती थी। मगर बड़ी तरकीब से इनकार की गई।
तो ब्राह्मणों ने एक कथा गढ़ी--कि भगवान ने जब सृष्टि रची तो उसने नरक बनाया, स्वर्ग बनाया। नरक पर शैतान को बिठाया--पहरेदार की तरह। लेकिन हजारों करोड़ों साल बीत गये और नरक में कोई आये ही न! क्योंकि कोई पाप ही न करे: तो शैतान गया भगवान के चरणों में और उसने कहा: मुझे काहे के लिए वहां बिठा रखा है! न कोई कभी आता, न कभी कोई जाता। बंद करो यह दफ्तर। मुझे छुटकारा करो। मैं नाहक बंधा हूं। कोई काम भी नहीं है, कोई धाम भी नहीं है।
तो परमात्मा ने कहा: ठीक, तेरे लिए उपाय करता हूं। तो परमात्मा ने बुद्धावतार लिया! और बुद्धावतार ले कर लोगों को भ्रष्ट किया। जब लोग भ्रष्ट हो गये, नरक जाने लगे। तब से नरक में ऐसी भीड़ है कि क्यू लगा है! जगह नहीं मिलती स्वर्ग की तरफ तो लोग जाते ही नहीं।
तो बड़ी होशियारी की बात है। बुद्ध को दसवां अवतार स्वीकार कर लिया और साथ में एक तरकीब लगा दी कि बुद्ध की मानना मत। माना कि अवतार भगवान के हैं, लेकिन भ्रष्ट करने आये हैं।
देखते हैं: राजनीति कैसे चाल चल सकती है! बुद्ध के प्रति सम्मान भी दिखा दिया। दिखाना ही पड़ा, क्योंकि इतने करोड़ों लोगों ने जिसे पूजा, उसके प्रति अगर सम्मान न दिखाये, तो भी खतरा है। लेकिन सम्मान हार्दिक तो नहीं हो सकता। क्योंकि ब्राह्मण बड़े क्रुद्ध थे। और उन्होंने शंकराचार्य के समय में बदला लिया। बुद्ध धर्म को उखाड़ फेंक।
यह तो बात ही ब्राह्मणों की कल्पना के बाहर थी कि कोई क्षत्रिय--और घोषणा करे कि हम अवतार हैं; घोषणा करे कि तीर्थंकर हैं! तीर्थंकर--और अवतार--और परमात्मा के वंशज और हकदार तो केवल ब्राह्मण थे। लेकिन जब एक दफा क्षत्रिय चढ़ गये सीढ़ी, तो नंबर दो वैश्य थे। बगावत वहां से शुरू हो गई। उन्होंने कहा: जब क्षत्रिय जा सकता है, तो हमारा क्या कसूर है कि हम नहीं जा सकते!
तो दूसरी क्रांति घटित हुई वैश्यों की तरफ से। तो वैश्य संत पैदा हुए, वणिक संत पैदा हुए। जब एक दफा वैश्य संत होने लगे, तो फिर शूद्र भी करीब आ गया पद के। तो फिर शूद्र संत हुए। फिर रैदास, और गोरा--और शूद्र संत हुए।
मध्ययुग में जो संत हुए, वे वैश्य और शूद्र थे। पहले वैश्य--फिर शूद्र। मगर यह होना जरूरी था। इस तरह मनुष्य ने अपने स्वभाव की उदघोषणा की।
परमात्मा सभी का अधिकार है--जन्मसिद्ध अधिकार है। न तो ब्राह्मण का अधिकार है, न क्षत्रिय का अधिकार है--न वैश्य का, न शूद्र का। सभी का अधिकार है।
परमात्मा के ऊपर किसी का दावा नहीं हो सकता। परमात्मा किसी की मालकियत नहीं है; स्वामित्व नहीं है। इसलिए ऐसा हुआ।
लेकिन अभी भी पुराने ढांचे एकदम छूट तो नहीं गये हैं इसलिए ब्राह्मण कबीर को संत मानने में झिझकता है। इसलिए ब्राह्मण नानक को अवतार मानने में झिझकता है। सिक्ख धर्म का अलग टूट जाना पड़ा। क्योंकि नानक को स्वीकार नहीं किया जा सकता। और फिर रैदास चमार का तो बिलकुल स्वीकार नहीं किया जा सकता।
एक बार मुझे एक नगर में चमारों ने रैदास पर बोलने बुलाया। मैं जिनके घर में ठहरा था, उन्होंने मुझे बहुत समझाया कि वहां जाओ ही मत। कहां चमारों में बोलने जा रहे हैं! वे बड़ धनपति थे। पर मैंने कहा कि उन्होंने बुलाया है, तो मैं जा रहा हूं। वे सब जगह मेरे साथ जाते थे। वे सांझ कहने लगे कि आज जरा काम है। मैंने कहा, मुझे पता है कि का बिलकुल नहीं है। तुम चमारों में जाने में डर रहे हो।
उनकी पत्नी मेरे पीछे लगी फिरती थी, जहां भी मैं जाता था। उस दिन वह भी...। उसने कहा कि नहीं, आप क्षमा करें। ड्राइव्हर के साथ मुझे अकेला भेज दिया। वहां भी मैं चकित हुआ देख कर कि चमारों के अतिरिक्त वहां एक आदमी सुनने नहीं आया था। दस बीस चमार थे। उसी नगर में मैं बोलता था; तो बीस हजार लोग, पच्चीस हजार लोग सुनते थे। एक दिन पहले ही पच्चीस हजार लोगों ने सुना था और दूसरे दिन पच्चीस लोग भी नहीं थे!
अभी भी हमारी धारणाएं तो वही हैं। चमारों की सभा में कौन जाए! और चमारों के साथ कौन बैठे! और यह तो हम मान ही नहीं सकते कि रैदास को भी परमात्मा उपलब्ध हो गया है।
परमात्मा पर हमने दावे कर रखे हैं।
मध्ययुग में बड़ी से बड़ी क्रांति हुई भारत में। निम्न वर्गों से घोषणा आई इस बात की कि कोई भी परमात्मा हो सकता है। तुम क्या करते हो, तुम किसी घर में पैदा हुए हो, तुम्हारा रंग-रूट कैसा है, तुम्हारे पास धन, पद, प्रतिष्ठा है या नहीं, इससे परमात्मा का कोई लेना-देना नहीं है। तुम अगर प्यास से भरे हो और आतुर होकर पुकारोगे, तो परमात्मा सुनेगा। आतुरता सुनी जाती है। प्यास सुनी जाती है। हृदय की आवाज सुनी जाती है।

तीसरा प्रश्न: अपना सा दुःख सबका मानैं, ताहि मिलैं अविनासी। अविनासी से मिलने की बाबा मलूकदास की यह शर्त तो वास्तव में असंभावना जैसी लगती है। कोई कृष्ण, कोई क्राइस्ट, कोई बुद्ध और कोई रजनीश इस कसौटी पर भला खरे उतर जाएं, लेकिन क्या यह सचमुच संभव है कि कोई साधारण व्यक्ति सब पराये दुःख को अपना समझ ले?

पहली बात: मलूक के वचन का अर्थ ठीक से समझे नहीं। अपना सा दुःख सब का मानै, ताहि मिलैं अविनासी, इसके दो अर्थ हो सकते हैं। एक तो सामान्य अर्थ है कि दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानो। यही सीधा-सीधा अर्थ है। अगर इतना ही अर्थ हो इस वचन में, तो प्रश्न बिलकुल ठीक है: यह असंभव है। कैसे दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानोगे?
दूसरे के सिर में दर्द होता है, इसे तुम अपने सिर का दर्द कैसे मानोगे? और तुम्हारे पैर में बिवाई न पड़ी हो, तो दूसरे के पैर में पड़ी बिवाई की पीड़ा का तुमको पता ही नहीं हो सकता। कांटा तुम्हें गड़े, तो तुम्हें पता चलता है; दूसरों को गड़े, तो दूसरे को पता चलता है।
दूसरे के दुःख को अपना कैसे मानोगे? और अगर मान लिया जबरदस्ती, तो उसको कोई परिणाम न होगे। ऐसे कहीं अविनाशी मिला है?
यह अर्थ अगर होता, तो बात असंभव हो जाती। फिर क्या अर्थ हो सकता है? अर्थ है...एक घटना से समझो।
रामकृष्ण दक्षिणेश्वर में गंगा पार कर रहे हैं--एक छोटी सी नाव पर पसार, उस तरफ जा रहे हैं। साथ में दो-चार भक्त हैं और माझी है। अचानक बीच मझधार में रामकृष्ण चिल्लाने लगे: मुझे मारो मत। मुझे क्यों मारते हैं? भक्तों ने कहा कि पागल तो नहीं हो गये! कौन मार रहा है! वे तो चौंक कर खड़े हो गये। उन्होंने कहा, परमहंसदेव, आप कहते क्या हैं! हम--आपको मारेंगे! कौन मार सकता है आपको? कौन मार रहा है आपको?
लेकिन रामकृष्ण की आंखों से आंसू बहे जाते हैं। और रामकृष्ण ने अपनी चादर उघाड़ कर बताई कि मेरी पीट तो देखो। और वहां कोड़े के निशान हैं! लहूलुहान! घबड़ा गये भक्त भी--कि किसने मारा है! लेकिन कोई है भी नहीं यहां मारने वाला; हम ही चार भक्त हैं। और सब एक दूसरे को देख रहे हैं कि कौन मारेगा।
रामकृष्ण ने कहा, उस तरफ देखो। और उस तरफ घाट पर कुछ आदमी एक आदमी को मार रहे हैं। नाव लगी; भक्त उतरे; जाकर उस आदमी के पास पहुंचे जिसको मारा गया है; उसकी कमीज उठाई। ठीक वैसे ही दो कोड़े के निशान उसकी पीठ पर बने हैं। रामकृष्ण की चादर उठाई, बड़े हैरान हो गये। कोड़े के निशान बिलकुल एक जैसे हैं। हूबहू। एक दूसरे कापी हैं।
इसका क्या कहेंगे।
अंग्रेजी में दो शब्द हैं: सिम्पैथी और एम्पैथी। सिम्पैथी का अर्थ होता है--सहानुभूति। मनोविज्ञान इस पर बड़ा विचार करता है। सहानुभूति का तो अर्थ होता है: जब तुम दूसरे का दुःख देखते हो, अनुमान करते हो कि इसके सिर में दर्द है। माथे पर पड़ी सिकुड़ने देखते हो; आंखों में आई उदासी देखते हो; चित्त का विषाद देखते हो, अनुमान करते हो कि इसके सिर में दर्द है। इसके चेहरे का भाव देख कर तुम अनुमान करते हो कि ऐसा भाव जब मुझे होता है ,तब मेरे भीतर भी सिर में दर्द होता है। मगर हो सकता है कि यह आदमी अभिनय कर रहा हो।
आखिर अभिनेता करते ही क्या हैं? सिर में दर्द नहीं होता है और सिर में दर्द दिखा देते हैं। हृदय में प्रेम नहीं होता और प्रेम दिखा देते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन नाटक देखने गया था। और उसकी पत्नी उसे बार-बार कोहनी मारने लगी, और कहने लगी, देखो! क्योंकि वह जो नायिका है, उसको नायक उतना प्रेम करता है! सदा घुटनों पर हाजिर है। देवी, देवी पुकारता है। तो स्वभावतः पत्नी टेहनी मारने लगी कि जरा देखो, इसको कहते हैं--प्रेम। तुमको ऐसी सूझ कभी नहीं आती!
नसरुद्दीन ने कहा, चुप भी रह। तुझको मालूम है, उसको इसके कितने पैसे मिलते हैं? हमसे मुफ्त में ही चलवा रही है काम!
लेकिन, पत्नी ने कहा, तुमको मालूम होना चाहिए कि वे वस्तुतः पति-पत्नी भी हैं।
नसरुद्दीन ने कहा, हाय राम! अगर ये वस्तुतः भी पति-पत्नी हैं, तब तो निश्चित ही यह अभिनेता मजबूत है; गहरा--बड़ा अभिनेता है। असली पति-पत्नी हैं अगर ये और इतना प्रेत दिखला रहा है...। क्योंकि असली पति-पत्नी के बीच कहां प्रेम! और किसी के बीच हो जाए; असली पति-पत्नी के बीच कहां प्रेम?
तो नसरुद्दीन ने कहा, निश्चित ही यह अभिनेता बड़ा है। इसके अभिनय की कुशलता बड़ी गहरी है। हृदय में बिलकुल नहीं है और दिखला रहा है! और इतनी कुशलता से दिखला रहा है कि जंच रहा है कि होना चाहिए।
अभिनय का अर्थ ही यही है--जो नहीं है, उसे दिखला देना।
तो यह हो सकता है कि दूसरे आदमी के सिर दर्द हो ही ना। वह सिर्फ अभिनय कर रहा हो। पेट में दर्द हो ही न; सिर्फ मुद्रा बना रहा हो--पेट के दर्द की। मगर तुम्हारे पास एक ही उपाय है अनुमान करने का कि तुमको भी अगर ऐसी ही मुद्रा बनी थी, जब पेट में दर्द हुआ था, तो तुम सोचोगे: इसके भी पेट में दर्द है। यह अनुमान है। इस अनुमान में, अगर तुम्हारा लगाव है इस आदमी से, तो सहानुभूति होगी। अगर तुम्हारा बेटा है, तो सहानुभूति होगी। तुम्हारा पिता है, तो सहानुभूति होगी। तुम्हारी मां है, तो सहानुभूति होगी। लेकिन यह सहानुभूति है। यह अनुमान है।
समानुभूति--ऐम्पैथी--बड़ी और बात है। समानुभूति का अर्थ है: जो इसे हो रहा, ठीक ऐसा तुम्हें हो जाए।
यह कब होता है? यह तब होता है, जब तुम्हें मैं तू का भाव नहीं रह जाता। जब अहंकार की बीच में दीवाल नहीं रह जाती।
रामकृष्ण को यह जो घटना घटी, इसीलिए घटी। बीच में कोई दीवाल ही नहीं है। जब उस आदमी को मारा गया, तो रामकृष्ण को ऐसा नहीं हुआ कि क्यों उस बेचारे को मारते हो। वे चिल्लाये: क्यों मुझे मारते हो? यह फर्क समझना। यह समानुभूति है।
इस सहानुभूति पर बहुत प्रयोग किये गये हैं। तुमने शायद कुछ घटनाएं सुनी हों; जिनको ईसाई फकीर स्टिगमैटा कहते हैं। ऐसा सदियों से होता है और अभी भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जिनको यह घटना घटती है।
बवेरिया में एक महिला अभी भी जिंदा है, जिसको स्टिगमैटा उभरते हैं। स्टिगमैटा का अर्थ होता है: जिस तरह जीसस को सूली पर लगाया गया और उनके हाथ में खीले ठोक गये, पैर में खीले ठोंक गये, और उन्हें सूली पर लटकाया गया; कभी-कभी किन्हीं ईसा के भक्तों को उसी तरह के घाव अनायास हाथ और पैर में उभर आते हैं और खून बहने लगता है। घाव बनाने नहीं पड़ते, उभर आते हैं; हजारों के सामने उभर आते हैं। खून बहने लगता है। और फिर घाव खो जाते हैं; खून बंद हो जाता जै।
बवेरिया में एक महिला है--थेरेसा न्यूमॅन। आज तीस साल से उसका मध्ययन हो रहा है। हर शुक्रवार को, जिस दिन जीसस को सूली लगी, उसके हाथ में और पैर में घाव उभर आते हैं और खून बहने लगता है। इतनी तीस सालों में इतना खून बहा है, लेकिन जरा भी वह महिला कमजोर नहीं हुई। और बड़ा आश्चर्य तो यह है कि सब तरह के परीक्षण कर लिए गए हैं, डाक्टरों ने सब तरह के परीक्षण किए हैं, कि कोई धोखे-घड़ी न हो जाए। ठीक चौबीस घंटे खून बहता रहता है और चौबीस घंटे के बाद घाव ऐसे भर जाते हैं, ऐसे तिरोहित हो जाते हैं, जैसे हुए ही न हों! दाग भी नहीं छूट जाता। यह एम्पैथी है।
जीसस के साथ इतना तादात्म्य, जीसस के साथ ऐसी भाव-विभोरता--कि जीसस अलग न रहे--मैं जीसस हूं--यह भाव अगर बहुत प्रगाढ़ हो जाए, यह इतना प्रगाढ़ हो जाए, कि बीच में कोई दीवाल न रह जाए; दीवाल क्या बीच में कोई परदा भी न रह जाए, कोई चिलमन भी न रह जाए, तो परिणाम हो जायेगा।
आदमी के मन की बड़ी क्षमता है। तुम वही हो जाते हो, जैसा सोचते हो। तुम्हारे जीवन में वही घटने लगता है, जो तुम्हारे विचार में बीज की तरह पड़ जाता है।
अब अगर किसी को ऐसा प्रगाढ़ भाव हो जाए कि मैं जीसस के साथ एक हूं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि इसके शरीर की वही दशा हो जाए, तो जीसस के शरीर की दशा हुई थी। दो हजार साल बाद भी...। इससे जीवन का कुछ लेना-देना नहीं है। इसी स्त्री की भाव-दशा है।
इसको कहते हैं: समानुभूति।
मलूक का यह वचन: अपना सा दुःख सबका मानै, ताहि मिलैं अविनासी--सहानुभूति का ही सूत्र नहीं है; समानुभूति का भी सूत्र है। मलूक यह कह रहे हैं कि तुम दूसरे दो नहीं हैं। यहां एक ही विराजा है। मेरे भीतर जो बोल रहा है और तुम्हारे भीतर जो सुन रहा है, ये दो नहीं हैं। इधर वही बोल रहा है, उधर वही सुन रहा है। यह सारा वार्तालाप--एकालाप है। परमात्मा ही परमात्मा से बोल रहा है। वही वृक्ष में हरा हुआ है; वही फूल में लाल हुआ है; वही पक्षी की तरह आ कर गीत गुनगुना रहा है।
यह सारा जगत एक है; अखंड रूप से एक है। इस अखंड के बोध की तरफ इशारा कर रहे हैं मलूकदास--ताहि मिलैं अविनासी। जिसको इस अखंड की प्रतीति होने लगेगी कि हम एक ही हैं यहां दूसरा कोई है ही नहीं; पराया है ही नहीं; पराया भ्रांति है। न तो कोई स्व है न कोई पर है। उस एक की ही जगह-जगह अनेक-अनेक रूपों में अभिव्यक्ति, अभिव्यंजना हुई है। वह एक ही बहुत-बहुत रूपों में आया है। ये सब रूप उसके हैं; वह बहुरूपिया है।
अपना सा दुख सबका जानै, ताहि मिलैं अविनासी, उसे मिल जायेगा अविनासी। इसमें खयाल रखना कि वे यह नहीं कह रहे हैं कि तुम चेष्टा कर करके दूसरे के दुःख को अपना मानने लगो। वे यह कह रहे हैं कि धीरे-धीरे तुम स्व और पर की दीवालें गिराओ, ताकि जो दूसरे के भीतर है और तुम्हारे भीतर है, वह अलग-अलग न मालूम पड़े।
ये सीमाएं थोथी हैं। ये सीमाएं ऐसी हैं, जैसे हम अपनी जमीन के आसपास एक बागुड़ लगा देते हैं। कहते हैं: यह मेरी जमीन; वह जमीन पड़ोसी की। जमी एक है। तुम्हारे बागुड़ लगाने से जमीन कटती नहीं, अलग नहीं होती।
हिंदुस्तानी की सीमा खींच देते हैं नक्शे पर; कहते हैं: यह हिंदुस्तान, यह पाकिस्तान। एक दिन पहले यह हिंदुस्तान था पूरा, एक दिन बाद हिंदुस्तान पाकिस्तान अलग हो जाते हैं। पंद्रह अगस्त को सीमा खिंच जाती है। जमीन वही की वहीं है; जमीन कटती नहीं, सिर्फ नक्शे पर सीमा हो जाती है। मगर फर्क समझते हो! बड़ा फर्क हो गया। भेद पैदा हो गया। अब अगर पाकिस्तान में कुछ गड़बड़ हो जो, तो तुम प्रसन्न होते हो। पाकिस्तान में दुर्दिन आ जाए, तो तुम प्रसन्न होते हो। भारत में दुर्दिन हो जाए, तो पाकिस्तान में लोग प्रसन्न होते हैं!
पाकिस्तान से बंगलादेश टूट गया, तो भारत बड़ा आह्लादित था। ये सीमाओं के कारण...अन्यथा सब वही का वही है। न कुछ टूटता है, न कुछ जुड़ा है। मगर आदमी बड़े खेल बना लेता है। आदमी खेलने में बड़ा कुशल है और धीरे-धीरे भूल ही जाता है कि खेल "खेल' है।
तुमने देखा न: शतरंज खेलते-खेलते तलवारें खिंच जाती हैं। अब शतरंज में कुछ भी नहीं है। हाथी घोड़े भी झूठे हैं। मगर शतरंज पर भी प्राण दांव पर लग जाते हैं। शतरंज भी तुम ऐसे खेलते हो, जैसे जीवन दांव पर लगा है। शतरंज में दुश्मनियां हो गई हैं; पीढ़ी-दर-पीढ़ी दुश्मनी चल गई है। और तुम सोचते नहीं कि लकड़ी के खिलौने बना कर रख लिये हैं, या चलो पैसेवाले हुए, तो हाथीदांत के हैं। पर सब खेल-खिलौने हैं।
जैसे समाज में तुमने रेखाएं खींच रखी हैं: ये हिंदू, ये मुसलमान; ये ब्राह्मण ये शूद्र--रेखा पर रेखाएं खींचते चले जाते हो और तब सिकुड़ कर रह जाते हो--छोटे से--मैं। यह मैं सिर्फ रेखा के कारण मालूम पड़ रहा है। रेखा को हटा दो, तो तुम एक तरंग हो--इस विराट सागर की।
अपना सा दुःख सबका मानै, ताहि मिलैं अविनासी--इसका अर्थ है--गहरा अर्थ--कि जो मैं तू के भाव को भूल जाए; जिसे मैं में तू दिखाई पड़े, तू में मैं दिखाई पड़े, उसे अविनाशी मिल जाता है। मिल ही गया। फिर तुम्हें इसमें कुछ असंभावना न दिखाई पड़ेगी।
और जिस दिन तुम दूसरों के दुखों को अपना मान लोगे, उस दिन दूसरों के सुख भी तुम्हारे अपने हो जायेंगे; उस दिन दूसरों का प्रेम तुम्हारा हो जायेगा; दूसरों का आनंद भी तुम्हारा हो जायेगा। तुम नाहक कृपण बने बैठे हो--छोटी-सी सीमा में बंद; सारा विराट का खेल तुम्हारा हो सकता है।
स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे: एक आंगन छोड़ दिया, तो सारा विश्व मेरा हुआ।
सीमा छोड़ो; असीम के साथ नाता जोड़ो। जहां-जहां सीमा दिखे, वहां-वहां समझ लेना कि कुछ भ्रांति हो रही है। क्योंकि यहां कोई भी सीमा नहीं है। सीमा है ही नहीं। हम यहां बैठे हैं इतने लोग; तुमने श्वास ली, तब तुम्हारी हो गई; तुम कहते हो: मेरी श्वास। क्षण भर पहले तुम्हारा पड़ोसी ले रहा था उसी श्वास को। क्षण भर बाद फिर कोई और लेगा।
तुम्हारा क्या है? श्वास भी अपनी नहीं है। श्वास तक अपनी नहीं! मेरी श्वास तुम्हारे भीतर थी; अब मेरे फेफड़ों में है। घड़ी भर बाद--घड़ी क्या, क्षण भर बाद फिर किसी और के फेफड़ों में होगी।
जिस देह को तुम अपना मान रहे हो, वह कल मिट्टी की तरह पड़ी थी। कल फिर मिट्टी की तरह पड़ जायेगी। अभी जो फल वृक्ष पर लगा है, नासपाती लगी है, अभी वृक्ष की है; तुम उसे खा लोगे; चौबीस घंटे बाद तुम्हारी हो जायेगी। पच जायेगी; मांस-मज्जा बनने लगेगी: तुम्हारी हो गई; अब तुम हो गई! अभी चौबीस घंटे पहले नासपाती तुम्हारी न थी। फिर एक दिन तुम मर जाओगे; जमीन में तुम्हारी कब्र बन जायेगी; और उस कब्र पर नासपाती का पेड़ बनेगा! और फिर तुम नासपाती बनोगे और तुम्हारे बेटे-पोते फिर उस नासपाती को खायेंगे।
कहां सीमा है? सब संयुक्त है। अभी तुमने जो नासपती खाई है, कौन जाने, तुम्हारे दादा-परदादा की हो!
हम एक दूसरे को खा रहे हैं; हम एक दूसरे को पचा रहे हैं; हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। क्षण भर पहले जो विचार मेरे भीतर था, मैंने तुमसे कह दिया, तुम्हारा हो गया। अब मेरी उस पर कोई मालकियत न रही। तुम मालिक हो गये। तुम किसी और को कह दोगे, वह मालिक हो जायेगा। ऐसे विचारों का संतरण चलता है। ऐसे प्राणों को भी संतरण चलता है; ऐसे ही देह का भी संतरण चलता है। हम सब यहां संयुक्त हैं।
तुम जरा सोचो तो: अगर तुम बिलकुल अकेले छोड़ दिये जाओ, तुम बच जाओगे--एक क्षण भी बच सकोगे? सूरज न निकले, ठंडे हो जाओगे। हवा न आये, गला रुंध जायेगा। भोजन न मिले, मरने लगोगे। पानी न मिले--गये। जुड़े हो।
नदियों में तुम्हारा प्राण बह रहा है, क्योंकि उनसे ही तुम्हारी प्यास तृप्त होती है। हवाओं में तुम्हारा प्राण बह रहा है, क्योंकि उससे ही तुम्हें जीवन मिलता है। सूरज की किरणों में तुम्हारा प्राण बह रहा है, क्योंकि उससे ही तुम्हारे प्राण संचालित होते हैं। सब जुड़ा है। जो देखते हैं ठीक से, वे कहते हैं: सारा अस्तित्व जुड़ा है। एक घास के पत्ते को हिलाओ, और दूर के चांदत्तारे हिल जाते हैं। जब जुड़ा है।
ऐसा ही समझो, जैसे मकड़ी का जाला है। उपनिषद के ऋषियों ने कहा है: संसार मकड़ी का जाला है। और बड़ी ठीक प्रतीक चुना है। क्योंकि मकड़ी अपने जाले को अपने भीतर से ही निकालती और फैलाती है। तो परमात्मा ने संसार को अपने भीतर से निकाला और संसार हुआ;  जाले की तरह है। परमात्मा बड़ी मकड़ी है। और अपना जाला बुन देता है।
फिर तुमने देखा: मकड़ी के जाले को एक तरफ से पकड़ कर जरा सा हिलाओ, पूरा जाला हिल जाता है। दूर तक के छोर हिल जाते हैं। ऐसा ही अस्तित्व है।
तुमने अगर किसी को दुःख दिया, तो तुम हैरान होओगे कि वह दुःख तुम तक ही लौट आयेगा, क्योंकि तुम भी उसी जाले पर बैठे हो। इसलिए कर्म के सिद्धांत की बड़ी अर्थवत्ता है। दूसरे को दुःख मत देना, क्योंकि वह अनजाने अपने को ही दुःख देने की व्यवस्था है। और दूसरे के लिए गङ्ढा मत खोदना, क्योंकि तुम ही उस गङ्ढे में किसी दिन गिरोगे। दूसरा गिरा, तो भी तुम ही गिरे।
लेकिन हम बच्चों जैसे हैं। छोटे बच्चे को देखा, अगर उसके हाथ से कुछ भूल हो जाती है, तो उस हाथ को दूसरे हाथ से एक चांटा लगा देता है। खुद से कोई भूल हो जाती है, तो खुद को एक चांटा मार लेता है। खुद का ही हाथ है, खुद का ही गाल है। लेकिन सजा दे देता है।
हम भी जब दूसरे को सजा दे रहे हैं, तो अपने ही गाल पर चांटा मार रहे हैं। दूसरा यहां कोई है नहीं।
इस ऐक्य को देख लेना, इस अखंडता को देख लेना, इसको पहचानना; इसको धीरे-धीरे जीना; तो अविनाशी मिल जाता है। असंभव नहीं है।
हां, अगर तुमने सोचा कि ऐसा मान कर चलेंगे, तो भूल ही जायेगी। धर्म के जगत में जो बड़ी भूल होती हैं, वह यही है।
महावीर को दिखाई पड़ा: सब एक है, उस सब एक है से अहिंसा पैदा हुई अहिंसा का अर्थ है: अब किसकी हिंसा करना! कैसे करना? यहां दूसरा कोई है नहीं, मैं ही हूं। तो सब हिंसा आत्म-हिंसा ही होगी। आत्म-हिंसा कौन करना चाहता है?
तो महावीर कदम फूंक-फूंक कर रखने लगे कि कोई चींटी न दब जाए। कि चींटी को महावीर अपना ही हिस्सा मानने लगे। राम करवट न लेते, कि कहीं रात अंधेरे में करवट ली, कोई कीड़ा-मकोड़ा नीचे पड़ा हो, दब जाये! मांसाहार छोड़ दिया। क्षत्रिय घर से आये थे, तो मांसाहार करते रहे होंगे। मांसाहार छोड़ दिया। मांसाहार तो छोड़ा ही छोड़ा, कच्चे फल भी नहीं लेते थे। जो पका फल अपने से गिर जाए वृक्ष से, वही लेते थे। क्योंकि कच्चे फल को तोड़ने में वृक्ष को थोड़ी पीड़ा तो होगी। अभी वृक्ष देने को राजी नहीं था, यही तो कच्चे का मतलब होता है। अभी झपटना पड़ेगा; तो हिंसा होगी। तो जरा प्रतीक्षा करो; फल तो अपने से ही पक जाते हैं; इतनी जल्दी क्या है! पक कर गिर जाते हैं; वृक्ष खुद ही दे देता है, तब तुम ले लेना।
यह अहिंसा अखंड--ऐक्य भाव से पैदा हुई। फिर जैन भी अहिंसा, करता है; वह भी पानी छान कर पीता है, पैर फूंक कर रखता है। लेकिन उसकी अहिंसा में अखंड का भाव नहीं है। उसकी अहिंसा अहिंसा नहीं है। वह तो डर के मारे कर रहा है--कि कही यह चींटी मर न जाए, नहीं तो नरक में सड़ना पड़ेगा। यह भय है; इसमें कोई बाध नहीं है। अगर उसको पक्का हो जाये कि नियम बदल गये हैं और अब चींटियों को मारने से कोई नरक में नहीं सड़ता है, तो वह सब फिक्र छोड़ देगा। चींटी से कुछ लेना-देना नहीं है; चींटी से कुछ मतलब नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं है। चींटी का दुःख अपना दुःख है--ऐसा उसे दिखा भी नहीं है। लेकिन चींटी मारने से कहीं मुझे दुःख न झेलना पड़े, बाद में, उस वजह से--परिणाम की फिक्र में वह डरा हुआ है।
इसलिए अकसर ऐसा हो जाता है, कि जैन युवक जब पश्चिम में जाते हैं, वे सब मांसाहार इत्यादि करने लगते हैं। उसका कारण है। कम से कम अंडे तो खाने ही लगते हैं। देखते हैं कि इतने लोग खा रहे हैं, इतने लोग पी रहे हैं, ये सब नरक जायेंगे? सब बात जंचती नहीं। इतने सब नरक अगर जा रहे हैं, तो कोई हरजा नहीं; हम भी चले जायेंगे इस भीड़-भाड़ में।
वह जो श्रद्धा यहां काम करती थी, पश्चिम में जा कर काम नहीं करती। क्योंकि दिखाई पड़ता है: सभी लोग खा पी रहे हैं। यह तो नहीं हो सकता कि अरबों लोग सब नरक ही जायेंगे! वह श्रद्धा टूटने लगती है। वह श्रद्धा झूठी थी, इसलिए टूटती है।
मेरे पास एक जैन मुनि मिलने आये थे, तो वे कह रहे थे कि जो युवक पश्चिम जाते हैं, वे मांसाहार करने लगते हैं; इसको रोकने का कोई उपाय? मैंने कहा, इसको रोकने का उपाय कुछ भी नहीं है। इससे सिर्फ एक बात जाहिर होती है कि जो यहां रह रहे हैं, उनके भी मांसाहार न करने पर बहुत भरोसा मत रखना। वे सिर्फ परिस्थितिवश नहीं कर रहे हैं। वे भी कर लेंगे। सिर्फ उनको परिस्थिति नहीं मिली है। यहां का संस्कार, यहां की हवा, यहां का पारिवारिक भय उनको रोके हुए हैं। लेकिन बोध से नहीं रुके हैं; भय से रुके हैं। भय से कहीं कोई क्रांति घटती है जीवन में?
तो महावीर की अहिंसा और जैन की अहिंसा में फर्क है। जैन की तो बात ही छोड़ो जैनियों के जो मुनि हैं, उनकी अहिंसा में और महावीर की अहिंसा में भी उतना ही फर्क है। जै मुनि भी डर के मारे पानी छान कर पीता है; रात चलता नहीं; अंधेरे में उठता-बैठता नहीं; भय के कारण। बोध नहीं दिखाई पड़ता। सिकुड़ा-सिकुड़ा है; डरा-डरा है।
और ध्यान रखना: डरने से कोई धार्मिक नहीं बनता। डरने से तो आदमी सिकुड़ता है; संकुचित होता है। फैलने से आदमी धार्मिक बनता है; और फैलाव अभय में आता है--भय में नहीं आता।
तुमने खयाल किया: जब भी तुम भयभीत होते हो, सिकुड़ जाते हो, छोटे ही हो जाते हो। जब तुम निर्भय होते हो, फैल जाते हो, छाती फूल जाती है।
जिसका अभय पूरा हो गया, उसकी छाती इतनी बड़ी हो जाती है जितना बड़ा यह विराट विश्व है। वह पूरे विश्व पर फैल जाता है; वह विश्वमय हो जाता है।

चौथा प्रश्न: यूं मिले थे, मुलाकात हो न सकी। ओठ कांपे मगर बात हो न सकी। तथा आप अपने प्रवचन में अकसर कहते हैं कि इस बात पर ध्यान करो, इसे गुनो--और अभी--यहीं; लेकिन मुझे लगता है: कभी नहीं।

अगर तुम्हें लगता है, तो वैसा ही होगा, जैसा तुम्हें लगता है। मेरे कहे नहीं होगा; तुम्हारे लगने से ही होगा। अगर तुमने कोई निषेधात्मक धारणा बना ली है, तो वही होगा। अगर तुम कहते हो: कभी नहीं होगा, ऐसी तुम्हारी मान्यता है, तो कैसे हो सकता है! तुम्हारी मान्यता को परमात्मा भी तोड़ नहीं सकता। कहते हैं कि जो सर्वशक्तिमान है, उसकी भी इतनी शक्ति नहीं है कि तुम्हारी मान्यता को तोड़ दे।
अगर तुम यह मान कर बैठे हो कि यह होनेवाला नहीं है; समाधि मुझे लगेगी नहीं; परमात्मा का दर्शन मुझे होगा नहीं; अविनाशी से मिलन मेरा होनेवाला नहीं है; अगर तुमने ऐसी धारणा बना रखी है, तो नहीं होगा।
वही होता है, जिसके लिए तुम धारणा बनाते हो। खयाल रखना इस पर। तुम्हारी धारणा तुम्हारा भविष्य है। तुम्हारी धारणा तुम्हारी नियति है। इसलिए नकारात्मक धारणाएं मत बनाना।
नास्तिक को परमात्मा कभी नहीं मिलता। इसका कारण यह नहीं है कि परमात्मा नहीं है। नास्तिक यही सोचता है कि अगर होता, तो मिलता। अब तक नहीं मिला, तो नहीं है। नास्तिक को परमात्मा नहीं मिलता--नास्तिकता की धारणा के कारण।
नास्तिकता की धारणा--अगर परमात्मा मिल भी जाए, तो भी उसे देखने न देगी; वह कुछ और देख लेगा; वह व्याख्या कुछ और कर लेगा।
मैंने सुना है: शिरडी के सांई बाबा तो मस्जिद में पड़े रहते थे। किसी को पक्का पता नहीं कि वे हिंदू थे, कि मुसलमान थे। किसी संत का किसको पता चल सकता है?--कि हिंदू, कि मुसलमान? सीमाएं नहीं, वहीं तो संत है।
मस्जिद में आने के पहले एक मंदिर में ठहरना चाहा था उन्होंने, लेकिन मंदिर से पुजारी को पक्का नहीं हुआ कि आदमी कौन है, कैसा है, तो उसने हटा दिया। तो वे मस्जिद में ठहर गये। क्या मंदिर, क्या मस्जिद! सब अपने हैं। मस्जिद में किसी ने हटाया नहीं, तो रुके रहे; वही घर बन गया।
लेकिन एक ब्राह्मण साधु रोज उनके दर्शन करने आता था और दर्शन के बाद ही जाकर भोजन करता था। कभी-कभी ऐसा हो जाता, कि भीड़ होती भक्तों की और दर्शन में देर हो जाती, लेकिन जब तक वह पैर न छू ले, तब तक भोजन न करता। कभी-कभी सांझ भी हो जाती, तब दर्शन हो पाते, पैर छू पाता; लौटता; तब कहीं जा कर भोजन कर पाता।
सांई बाबा ने एक दिन उसे कहा की प्यारे, तू इतना परेशान न हो; मैं वही आ कर तुझे दर्शन दे दूंगा। वह तो सड़ा खुद हुआ। उसने कहा, तो कल मैं वहीं प्रतीक्षा करूंगा। धन्यभाग मेरे कि आप मुझे वहां दर्शन दे देंगे!
दूसरे दिन जल्दी ही सुबह-सुबह नहा-धो कर भोजन तैयार करके बैठ गया अपने द्वार पर--सांई बाबा के दर्शन करने के लिए। कोई आया नहीं; आया एक कुत्ता। और कुत्ता भीतर घुसने की कोशिश करने लगा और वह डंडा लेकर उसको भगाने की कोशिश करे लगा--कि कहीं यह सब अपवित्र न कर दे और कहीं भोजन में मुंह न लगा दे। और सांई बाबा अभी आये नहीं। उसने दो-चार डंडे भी कुत्ते को जमा दिए। कुत्ता बड़ी कोशिश किया; डंडे खाने के बाद भी भीतर घुसने की कोशिश कर रहा था।
जब सांई बाबा नहीं आये, सांझ होने लगी, तो भागा हुआ ब्राह्मण आया। और उसने कहा कि आप आये नहीं! वचन दिया; पूरा नहीं किया। उन्होंने कहा, मैं गया था। और यह मेरी पीठ देख! चार डंडे तूने लगा दिए। और मैं फिर भी घुसने की कोशिश करता था, मगर तू घुसने ही नहीं देता था।
तब तो वह रोने लगा। तब उसे याद आया; तब उसे याद आया--कि उसने गौर से नहीं देखा। कुत्ते में कुछ खूबी तो थी; कुत्ता कुछ साधारण तो नहीं था। अब याद आया; पीछे ले लौट कर याद आया। कुछ बात अजब की थी कुत्ते में; कुछ ध्वनि गजब की थी। कुछ ऐसा ही एहसास हुआ था, जैसा सांई बाबा की उपस्थिति में अहसास होता हैं। लेकिन मैं ना-समझ; मैं मंदबुद्धि; समझा क्यों नहीं! रोने लगा। कहा, क्षमा करें। कल एक बार और मौका दें। अब ऐसी भूल न करूंगा।
साई बाबा ने कहा, तेरी मरजी; कल आयेंगे।
तो वह बैठा--अब वह कुत्ते की राह देखता बैठा। हमारी धारणाएं! अब वह देख रहा है कि कहीं कोई कुत्ता आ जाए। कोई कुत्ता दिखाई न पड़े! दूर दूर तक सन्नाटा। ऐसे कभी-कभी आवारा कुत्ते निकलते भी थे; हिंदुस्तान में कुछ कभी भी नहीं है--आवारा कुत्तों की। उस दिन सब नदारत ही हो गये! वह बैठा है थाली सजाये कि आज कुत्ता आये, तो थाली से लगा दूं। पहले कुत्ते को भोजन कराऊं फिर मैं करूं।
कुत्ता नहीं आया--सो नहीं आया। आया एक भिखारी, और वह भी कोढ़ी। और बड़ी दुर्गंध उससे आती थी। और वह चिल्लाया दूर से भाई, इधर  न आ! बाहर रह। आगे जा। अभी हम दूसरे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। तू यहां खड़ा ही मत हो। मगर फिर भी उसने घुसने की कोशिश की। तब तो वह नाराज हो गया, ब्राह्मण। उसने कहा, मैं कहता हूं: आगे जा, अंदर मत घुस। सिर फोड़ देंगे। अभी हम किसी और की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपशकुन मत कर।
सांझ हो गई; सांई बाबा का कोई पता नहीं। वह फिर पहुंचा। सांई बाबा ने कहा, भाई, तू न पहचानेगा। हम आये थे; तूने घुसने न दिया। उन्होंने कहा, महाराज, आप गलत कह रहे हैं; मैं बिलकुल टकटकी लगा कर देखता रहा। एक भिखारी जरूर आ गया था बीच में; उसको मैंने हटाया कि कहीं इसकी बातचीत मग और मैं चूक न जाऊं कि आप आए कुत्ते के रूप में और निकल जाए, और फिर चूक हो जाए।
सांई बाबा ने कहा, मैं उसी भिखारी के रूप में आया था।
हम वही देखते हैं, जो हमारी धारणा है। अगर तुमने मान लिया कि ईश्वर नहीं है, तो ईश्वर नहीं है। फिर ईश्वर लाख उपाय करे, नाचे तुम्हारे सामने आकर, तुम कहोगे--नहीं है। तुम कुछ और देखोगे। तुम व्याख्या कर लोगे कुछ। तुम समझोगे, कोई आदमी पागल हो गया है। या तुम समझोगे कि मैं कोई सपना तो नहीं देख रहा हूं, कि मैंने कुछ भांग इत्यादि तो नहीं खा ली है? यह हो कैसे सकत है?
अगर तुमने मान लिया है कि कभी नहीं होगा, तो कभी नहीं होगा। तुम मालिक हो। तुम्हारे विपरीत यहां कुछ भी नहीं हो सकता।
मैं तुमसे यही कहता हूं कि अभी हो सकता है, यहीं हो सकता है। तुम्हारी मरजी।
यूं मिले थे, मुलाकात हो न सकी। ओंठ कांपे मगर बात हो न सकी। बात करने को भी क्या है? परमात्मा मिलेगा, तो क्या बात करोगे? कुछ कहने को होगा? ओंठ कंप जाए, काफी है। ओंठ कंप जाए, काफी ज्यादा। और क्या करोगे? कहने को है क्या? आंसू बह जाए--बस बहुत। नाच लो--बस बहुत
यूं मिले थे, मुलाकात हो न सकी। मुलाकात का क्या है? कहने को कुछ भी तो नहीं है हमारे पास। देने को कुछ भी नहीं है हमारे पास। पूछने को कुछ भी नहीं है हमारे पास।
लेकिन अगर तुम मुलाकात में उत्सुक हो, तुम अगर परमात्मा का कोई साक्षात्कार लेना चाहते हो, तो चूक हो जायेगी।
परमात्मा जिस रूप में आये, जैसा आये; और जिस रूप में तुम्हारे भीतर उस क्षण सहज स्फुरण हो, वही सच है, वैसा ही सच है।
ओठ कंप जाए--बहुत। न कंपे, तो भी बहुत। चुप रह जाओ--बहुत। आंख खुल जाए--बहुत। आंख बंद हो जाए--बहुत। बोलो--तो ठीक; न बोलो--तो ठीक।
इतनी भर श्रद्धा चाहिए--कि होगा।
और तुम पहले से आयोजन मत बनाओ कि क्या कहेंगे। क्योंकि कोई रिहर्सल काम न पड़ेगा। और सब रिहर्सल झूठे होते हैं।
परमात्मा से मिलना कोई अभिनय नहीं है। तुम पहले से तैयारी न कर सकोगे। जो भी तैयार कर लोगे, वह झूठा सिद्ध होगा। तुम तो सीधे, निष्कपट, बच्चे की भांति जाओ। तुम तो सरल चित्त से उसकी तरफ आंखें उठाओ।
अगर तुम मलूक से पूछोगे राह, तो मलूक की राह तो प्रेमी की रहा है।
जो तिरे पास से आता है, मैं पूछूं हूं यही
क्यों जी, कुछ जिक्र हमारा भी वहां होता था!
भक्त तो यह मान कर ही चलता है कि जैसे मैंने उसे स्वीकार किया, वैसे उसने मुझे स्वीकार किया। उसका हूं मैं; अस्वीकार करेगा भी कैसे? भक्त तो यह मान कर चलता है कि कुछ मुझे ही थोड़े उससे मिलने की आग लगी है; उस तरफ भी आग लगी है। कुछ इसी तरफ थोड़े ही प्यास है, उस तरफ भी प्यास है। और खयाल रहे, अगर हमारे ही तरफ प्यास होती, तो मिलन हो नहीं सकता था। उसकी तरफ से उपेक्षा होती, तो मिलन कैसे होता? दोनों हाथ ताली बजती है। भक्त ही दौड़ता रहे और भगवान को फिक्र ही न हो, तो भी नहीं होने वाला।
भगवान तो दौड़ ही रहा है, तुम्हारी तरफ। वह तुम्हारे प्राणों का प्राण है। अन्यथा होगा भी कैसे? तुम जरा उसकी तरफ आंख उठाओ। एक कदम तुम उठाओ, हजार कदम उसने उठाये ही हुए हैं।
जो तिरे पास आता है, मैं पूछूं हूं यही
क्यों जी, कुछ जिक्र हमारा भी वहां होता था!
क्या बुरी चीज है मुहब्बत भी
बात करने में आंख भर आई।
ओठ फड़फड़ा गए--बहुत। आंख भर आई--बहुत। ज्यादा क्या करोगे। लोभ मत करो। झलक मिल जाए--बहुत--झलक तो दूर, उसकी याद ही आ जाती है, यह भी कुछ कम नहीं। कितने अभागे हैं, जिनको याद भी नहीं आती, जिनके मुंह पर कभी राम नाम नहीं आता? जिनके प्राण में कभी राम नाम नहीं गूंजता।
सौभाग्यशाली हो कि कम से कम उसका नाम तो आता है; याद तो आती है; सोचते तो हो।
चलो यही सही--सोचते हो कि किसी मिलन नहीं होगा; फिर भी सोचते तो हो! यह कभी कम सौभाग्य नहीं। कुछ तो ऐसे हैं, जो यह भी नहीं सोचते।
दुनिया में तीन तरह के लोग हैं। एक वे, जो सोचते हैं: मिलन होगा होकर रहेगा। अडिग है--उनका भाव। तो होकर ही रहेगा। दूसरे वे, जो सोचते हैं: मिलन नहीं होगा। नहीं होगा। लेकिन फिर भी कम से कम सोचते तो हैं। कुछ तो सही। नकारात्मक ही सही।
तीसरे ऐसे हैं, जो उपेक्षा से भरे हैं, जो सोचते ही नहीं; उनकी हालत और भी अजीब है। उनके लिए परमात्मा कभी प्रश्न ही हनीं बनता। अगर तुम उनसे परमात्मा की बात करो, तो वे ऐसे देखते हैं कि कहां की व्यर्थ की बातें कर रहे हो! अरे, कुछ काम की बात करो। कुछ मतलब की बात करो। वे इतना भी नहीं कहते कि परमात्मा नहीं है।
नीत्शे ने लिखा है कि दिन थे, जब लोग परमात्मा को मानते थे; और दिन थे, जब लोग परमात्मा को नहीं मानते थे। अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि लोग परमात्मा को विचारणीय भी नहीं मानते!
नहीं कहने की भी कौन झंझट लेता है! लोग कहते हैं: हां जी, होगा। चलो, काम की बात करें।
तुम्हारी धारणा पर सब निर्भर है। और जब धारणा पर ही सब निर्भर है, तो क्यों नकारात्मक धारणा बनाओ। क्यों न विधायक धारणा हो! और भक्ति तो विधायक धारणा है।
शब वही शब हैं, दिन वही दि हैं,
जो तेरी याद में गुजर आये।
याद करो। तुम फिक्र छोड़ो मिलने--न मिलने की। तुम सिर्फ करो। तुम सिर्फ पुकारो।
सबा, यह उनसे हमारा पयाम कह देना
गये हो जब से, यहां सुबह-ओ-शाम ही न हुई।
याद जब आ जाए, तो पुलक से भर जाना। जब याद खो जाए, तो रोना और कहना:
सबा, यह उनसे हमारा पयाम कह देना
गये हो जब से, सुबह-ओ-शाम ही न हुई।
लेकिन फिर भी मैं तुमसे इतना कहूंगा कि नकारात्मक धारणा भी अच्छी है--उपेक्षा से। कुछ तो है; चलो, दुश्मनी ही सही।
कत्अ कीजे न तअल्लुक हमसे
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही।
चलो, दुश्मन ही सही। चलो, नकारात्मक संबंध ही सही। पीठ ही किए हो परमात्मा की तरफ; चलो, कम से कम पीठ तो किए हो! पीठ है, तो कभी मुंह भी हो जायेगा।
लेकिन सरल हो जाए बात। क्यों न सरल बना दो इसे; क्यों न उन्मुख हो जाओ!
मैं तुमसे जो बार-बार कहता हूं: अभी हो सकता है--यहीं हो सकता है, उसका केवल इतना ही प्रयोजन है कि भाव तुम्हारे भीतर प्रगाढ़ हो जाए कि जब तुम चाहोगे, तभी हो सकता है। तुम्हारी चाहत की पूर्णता चाहिए। तुम्हारी चाहत में त्वरा चाहिए। तुम्हारी चाहत में बल चाहिए।
और जब तुम्हारा मिलन होगा, तब तुम चकित होओगे: तुम ही मिलने को उत्सुक नहीं थे; वह भी उत्सुक था। सदियों तुम ही नहीं तड़पे, तुमने उसे भी तड़पाया।
जब सुना तुम भी मुझे याद किया करते हो
क्या कहूं, हद न रही कुछ मिरी हैरानी की!
जान कर तुम कितने न चकित हो जाओगे उस दिन, जिस दिन तुम पाओगे: परमात्मा भी तुम्हारी याद कर रहा था; अस्तित्व तुम्हें पुकार रहा था।
हम जिससे दूर हो गये हैं, हमने भी कुछ नहीं खोया है, उसने भी कुछ खोया है।
इसलिए मैं तुमसे कहता हूं: अभी घटना घट सकती है। अगर अकेले तुम्हारी ही यात्रा की बात होती, तो शायद कभी नहीं घट सकती थी। मैं तुम्हारे प्रश्न का ऐसा ही अर्थ लेता हूं।
तुम यह सोच रहे हो कि अपने ही प्रयास से करना है, परमात्मा का कुछ पता नहीं। सोचता भी हो, न सोचता हो! उसे हमारा पता भी हो, न पता हो! उसे रस भी हो हमसे मिलन में या न हो। हम ही को चलना है। तो फिर रास्ता बड़ा लंबा हो जायेगा। रास्ता अकेला ही जायेगा, इसीलिए लंबा हो जायेगा।
लेकिन सारे संतों के अनुभव का सार यही है कि जिसने भी उसे मिलन पाया उसने लौट कर यही कहा: हम ही उसकी याद नहीं करते थे; वह भी हमें पुकारता था।
इसलिए कहता हूं: ध्यान दो, गुनो। अभी हो सकता है, यहीं हो सकता है। यह बात तुमसे मैं दोहराये जाऊंगा, ताकि यह पड़ती रहे चोट, पड़ती रहे चोट; बूंद-बूंद सागर बन जाता है।

पांचवां प्रश्न: मैं जप, तप, भक्ति, ध्यान--सब कर चुका हूं। लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला। अब आपकी शरण आया हूं। मुझे उबारें।

तुमने जो भी किया होगा--किया नहीं। बस, ऐसे ही टाल दिया होगा। नहीं तो जप, तप, भक्ति, ध्यान सब कर लेते और न मिलता! अरे, एक ही कर लेते तो मिल जाता। इतनी दवाइयां पीने की जरूरत न थी। ऐसी कोई बीमारी नहीं है तुम्हारी।
तुम कहते हो कि तुम पूरा दवाखाना पी गए!
इतनी जरूरत ही न थी; इतने कुएं नहीं खोदने थे।
जलालुद्दीन रूमी एक दिन अपने शिष्यों को लेकर आश्रम के पास के खेत में गया और उसने अपने शिष्यों को कहा कि कुछ पाठ सीखो। देखो, यहां क्या हो रहा है!
खेत का किसान कुछ झक्की रहा होगा। उसे कुआं खोदना था, तो उसने एक कुआं खोदा--आठ, दस फीट खोदा; फिर उसने कहा: अरे यहां पानी नहीं मिलता! तो उसनने दूसरा कुआं खोदा। ऐसे वह कोई दस कुएं खोद चुका। पूरा खेत ही खराब कर डाला। और अब ग्यारहवां खोद रहा था!
जलालुद्दीन ने कहा, जरा इस किसान से कुछ सीखो। अब यह ग्यारहवां खोद रहा है। और आठ-दस फीट फिर खोदेगा और फिर पायेगा कि पानी नहीं मिलता। आठ-दस फिट में कहीं पानी मिलता है! पचास फीट जाना चाहिए। और अगर यह एक ही कुआं खोदता रहता, तो कभी का पानी मिल गया होता। मगर वह खोदता है एक; छोड़ देता है बीच में। देखता है कि मिट्टी ही मिट्टी आती जाती है; पानी तो आता नहीं। पहले मिट्टी ही आती है।
सच तो यह है कि जब तुम कुआं खोदते हो, तो पहले तो कूड़ा-करकट हाथ आते हैं। फिर रूखी मिट्टी हाथ आती है। फिर गीली मिट्टी हाथ आती है। पानी की खबर मिलने लगी। जब से मिट्टी गीली होती है--पानी की खबर मिलने लगी।
जब से तुम्हारी आंखों में आंसू आने लगते और हृदय गीला होने लगता--पानी की खबर मिलने लगी।
फिर पानी भी आता है, तो पीने-योग्य नहीं होता। गंदा होता है; मटमैला होता है।
मगर जब पानी आ गया, तो पीने-योग्य भी आ जायेगा। खोदे जाओ। फिर जल्दी ही निर्मल झरने उपलब्ध हो जाते हैं। मगर खुदाई चाहिए।
मुझे ऐसा लगता है...कि तुम कहते हो: मैंने जप, तप, भक्ति ध्यान--सब किया। तुमने कई गङ्ढे खोदे, लेकिन कुआं नहीं खोदा। लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला।
तो तुम्हारी शिकायत ऐसी लगती है, जैसे परमात्मा ने तुम्हें धोखा दिया! कहीं कुछ नहीं मिला!
अब तुम यहां आ गये हो, चलो हरजा नहीं। यहां कुआं खोदना, गङ्ढा मत खोदना।
और तुम पहले से होशियारी कर रहे हो! अब तुम कह रहे हो। आपकी शरण आ गया हूं, मुझे उबारें। तुम यह कह रहे हो कि अब मैं कुआं खोदूं।
तुम अपनी पुरानी तरकीब छोड़ो। कुआं तुम्हीं को खोदना पड़ेगा। मैं इतना ही आश्वासन दे सकता हूं कि बीच में छोड़ने न दूंगा। भागने लगोगे; पुरानी आदत; इतने जपत्तप तुमने किए हैं; दो-चार दि बाद तुम कहोगे कि अब चले!
इतना ही आश्वासन दे सकता हूं कि रोकने की पूरी कोशिश करूंगा। कुआं तो तुम्हीं को खोदना पड़ेगा।
यह कुआं ऐसा है कि दूसरे के खोदे नहीं बनता। यह तुम्हारी आत्मा का कुआं है। यह तुम्हें अपने भीतर खोदना है।
त्वरा चाहिए। एकजूट भाव चाहिए। सातत्य चाहिए। धीरज चाहिए। प्रतीक्षा चाहिए। प्रार्थना चाहिए। और लग गये एक बार तो लौटने की जल्दबाजी नहीं चाहिए।
क्या जल्दी है लौटने की? लौट कर भी क्या मिलेगा?
बहुत लोग हैं, यही करते रहते हैं। दो दिन कुछ किया; चार दिन कुछ किया। बड़ी जल्दी में हैं! एकदम चाहते हैं। जल्दबाजी के कारण कहीं कुछ बात पूरी नहीं हो पाती। किसी पौधे की ठीक-ठीक जड़ें नहीं निकल पातीं।
तुमने छोटे बच्चों को देखा। कभी-कभी आम की गुठली को गाड़ आते हैं। मगर चैन नहीं उनको! थोड़ी देर बाद खोद कर देखते हैं कि अभी तक आम का पौधा निकला कि नहीं! रात नींद नहीं आती। कई दफा खयाल आ जाता है कि पौधा शायद निकल आया हो! सुबह उठ कर फिर खोद कर देख लेते हैं।
पौधा कभी न निकलेगा। जरा जमीन में गुठली को पड़े तो रहने दो; गलने तो दो। उघाड़-उघाड़ कर बार-बार मत देखो।
पानी की बहुत जल्दी मत रखो। मिलेगा। तुम अपना श्रम पूरा करो। तुम अपी तरफ से कमी मत करो।
फिर इतनी दवाइयों की जरूरत भी नहीं है। कभी-कभी बहुत दवाइयां फायदे की जगह नुकसान कर जाती हैं। और जो दवाई तुम्हारे लिए न हो, वह दवाई हानिकर होती है।
अब तुमने जप, तप, ध्यान, भक्ति सब कर डाला। जरा यह तो सोचना चाहिए कि मेरे अनुकूल क्या है। मेरी तरंग किससे बैठती है। मेरे भाव की गांठ किससे बंधती है। जरा इसे देखना चाहिए। जल्दी ही खोदने मत लग जाओ।
जरा देख भी तो लो कि यहां जल मेरे लिए मिलेगा? या जो जल मिलेगा, वह मेरे लिए होगा? थोड़ा देख कर, थोड़ा परख कर, थोड़ा समझपूर्वक...।
अगर तुम्हारे भीतर प्रार्थना सरलता से उठती हो, सुगमता से उठती हो, श्रद्धा का बहाव सहज हो; संदेह करने में तुम्हें कठिनाई होती है, और श्रद्धा सरलता से आती हो, तो भक्ति, प्रार्थना, पूजा, अर्चना--उस तरफ लगो।
अगर तुम्हें संदेह बड़ी तीव्रता से आता हो, श्रद्धा बिठानी मुश्किल पड़ती हो; लाख उपाय करो, श्रद्धा खिसल-खिसल जाती हो; पैर फिसल-फिसल जाते हों, तो फिर तुम भक्ति की फिक्र छोड़ो। फिर ध्यान। फिर बोध का मार्ग पकड़ो, जहां श्रद्धा अनिवार्य शर्त नहीं है।
लेकिन पहले अपनी जरा ठीक से पहचान कर लो। इसके पहले कि तुम यात्रा पर निकलो, थोड़ा अपना आत्म-निरीक्षण कर लो। और कठिन नहीं है यह बात। तुम अगर जरा ही शांत बैठ कर विचार करोगे, तो तुम्हें यह बात दिखाई पड़ने लगेगी कि तुम्हारे लिए क्या उचित और अनुकूल होगा।
हर घट से अपनी प्यास बुझा मत ओ प्यासे
प्याला बदले तो मधु ही विष बन जाता है।
पपिहे पर वज्र गिरे, फिर भी उसने अपनी
पीड़ा को किसी दूसरे जल से नहीं कहा
लगा गया चांद को दाग, मगर अब तक निशि का
आंगन तजकर वह और न जाकर कहीं रहा।
हर एक यहां है अडिग, अचल अपने प्रण पर
फिर तू ही क्यों भटका फिरता है इधर-उधर
मत बदल-बदल कर राह सफर तय कर अपना।
हर पथ मंजिल की दूसरी घटाता है।
हर देहरी पर मत अपी भक्ति चढ़ा पागल!
हर मंदिर का भगवान न पूजा जाता है!
हर घट से अपनी प्यास बुझा मत ओ प्यासे
प्याला बदले तो मधु ही विष बन जाता है।
पहले ठीक से पहचान तो लो। जहर किसी बीमारी में अमृत हो जाता। और किसी बीमारी में अमृत भी जहर हो जाता है।
तुम्हारी बीमारी क्या है?
तुम संदेह की बीमारी से भरे हो, तो ध्यान की औषधि काम आयेगी। फिर तुम श्रद्धा के मार्ग पर न चल सकोगे।
अगर तुम्हारे भीतर श्रद्धा का झरना कलकल बह रहा है, सुगमता से तुम श्रद्धा कर लेते हो; चाहे कोई लूटे, कोई धोखा दे, चाहे कोई कुछ भी तुम्हारे साथ कर ले, फिर भी तुम्हारी श्रद्धा अखंड बनी है, टूटती नहीं, मिटती नहीं, तो फिर भक्ति के रास्ते से तुम ऐसे उतर जाओगे, कि पतवार भी न चलानी पड़ेगी। जैसे पाल खोल देते हैं न नाव का; और बैठ जाते हैं--हवा के रुख को देखकर--और नाव चल पड़ती; हवा ले जाती।
विपरीत मत लड़ो। जो तुम्हारे अनुकूल न हो, उससे मत उलझो। ऐसा लगता है कि तुम उलझे होओगे--व्यर्थ की विपरीतताओं से।
जप, तप, भक्ति, ध्यान सक कर चुका। एक से ही काम हो जाता। इतने द्वार-दरवाजे बदलने की जरूरत नहीं है।
मैं पहली बात तुमसे जो कहना चाहता हूं, वह बुनियादी है, उसके बाद ही ठीक कदम उठते हैं। पहले अपनी पहचान कर लो।
दुनिया में दो तरह के स्वभाव हैं: पुरुष का स्वभाव और स्त्री का स्वभाव। सारा अस्तित्व दो में विभाजित है--स्त्री और पुरुष। और मनुष्य की दुविधा यही है कि मनुष्य का निर्माण दोनों से मिल कर हुआ है। तुम्हारा आधा हिस्सा तुम्हें मां से मिला है और आधा हिस्सा पिता से मिला है। तो तुम्हारे भीतर दोनों मौजूद हैं--स्त्री भी मौजूद है, पुरुष भी मौजूद है। तो कोई पुरुष अकेला पुरुष नहीं है; पुरुष के साथ-साथ स्त्री भी है। और कोई स्त्री अकेली स्त्री नहीं है; स्त्री के साथ-साथ पुरुष भी है। जो अंतर है, वह मात्रा का है। हो सकता है: तुम पचपन प्रतिशत पुरुष हो और पैंतालीस प्रतिशत स्त्री हो। बस, इतना ही अंतर है। या कि तुम साठ प्रतिशत स्त्री हो और चालीस प्रतिशत पुरुष हो। बस, अंतर मात्रा का है; अंतर गुण नहीं है।
इसीलिए तो कभी-कभी ऐसी घटना घट जाती है कि कोई पुरुष था और फिर अचानक रूपांतरण हो जाता है और स्त्री हो गया। कि स्त्री थी, और अचानक रूपांतरण हो गया और पुरुष हो गया।
और अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि दिक्कत नहीं है। हारमोनल परिवर्तन से स्त्री को पुरुष और पुरुष को स्त्री बनाया जा सकेगा। और भविष्य में, इस सदी के बीतते-बीतते बहुत लोग इस परिवर्तन से गुजरेंगे। क्योंकि ऊब जाते लोग! स्त्री रहते-रहते ऊब गये; पुरुष हो गये। पुरुष रहते-रहते ऊब गए; स्त्री हो गए। ज्यादा स्वतंत्रता हो जायेगी। एक ढंग का जीवन देख लिया, दूसरे ढंग का जीवन देख लें।
यह रूपांतरण संभव है, क्योंकि तुम दोनों हो। मनुष्य बायसेक्सुअल है।
इसका मतलब यह हुआ कि धर्म के जगत में भी तुम्हारे भीतर से दो राहें निकलती हैं--एक पुरुष की, एक स्त्री की। पुरुष की राह है ध्यान की, स्त्री की राह है प्रेम की।
तो तुम अपने भीतर ठीक से पहचान लो। और ध्यान रखना: यह तुम मत समझना कि तुम शारीरिक रूप से स्त्री हो, इसलिए तुम्हें अनिवार्य रूप से प्रेम का मार्ग ठीक पड़ जायेगा। ज्यादा संभावना है, मगर अनिवार्य नहीं है। और यह भी मत समझ लेना कि तुम पुरुष हो, शरीर से पुरुष हो, इसलिए तुम्हें ध्यान का मार्ग सुगम पड़ जायेगा। संभावना ज्यादा है, मार्ग सुगम पड़ जायेगा। संभावना ज्यादा है, लेकिन अनिवार्य नहीं है। ठीक से अपने भीतर पहचान करनी पड़ेगी।
बहुत पुरुष हैं, जिनके भीतर बड़ी स्त्रैण कोमलता है। और बहुत स्त्रियां हैं, जिनके भीतर बड़ी पुरुष कठोरता है।
कुछ भी बुरा नहीं है; जैसा है--ठीक है, उसको ठीक से पहचान लो और उसके अनुकूल चल पड़ो। या तो ध्यान--या प्रेम। इन दो में से चुनाव कर लेना है। यह चुनाव एक बार ठीक हो जाए, तो फिर पूरी ताकत लगा दो। यहां-वहां मत भटको। फिर बार-बार गङ्ढे अलग-अलग जगह मत खोदो। एक ही दवा काफी है।
और तुम कहते हो: अब आपकी शरण आया, मुझे उबारें। मैं पूरा साथ दूंगा; उबरना तो तुम्हें ही पड़ेगा। क्योंकि इस गङ्ढे में तुम गए हो खुद; मैं तुम्हें इस गङ्ढे में ले नहीं गया। तुम बिना सहारे इस गङ्ढे में गये हो। चाहो तो तुम बिना सहारे भी बाहर आ सकते हो। लेकिन अगर यह कठिन मालूम पड़ रहा हो, तो किसी के हाथ का सहारा पकड़ा जा सकता है। लेकिन फिर भी आना तुम्हीं को बाहर पड़ेगा।
परमात्मा उधार नहीं मिल सकता; किसी और द्वारा नहीं मिल सकता। और अच्छा है--कि किसी और के द्वारा नहीं मिलता। परमात्मा भी उधार मिलने लगता, तो सारा मूल्य खो जाता। जितना तुम श्रम करोगे उसे पाने के लिए, उतना ही आनंद का अनुभव होगा।
अच्छा है कि परमात्मा तक पहुंचने के लिए हमें पहाड़ की चढ़ाई पर से खुद जाना पड़ता है। सब तरह के बोझ अलग कर देने होते हैं। और धूप, गरमी, और वर्षा और शीत--सब सहनी पड़ती है। अच्छा है कि परमात्मा के शिखर पर ले जाने के लिए कोई हेलिकाप्टर नहीं है, हनीं तो सब मजा चला जायेगा। ऐसा ही तो हो रहा है--प्रकृति में।
समझो: जब तेनसिंग और हिलेरी पहली दफा एव्हरेस्ट पर गये, तो जो आनंद उन्हें अनुभव हुआ होगा, अगर तुम्हें हेलिकाप्टर से ले जाकर एव्हरेस्ट पर उतार दिया जाए, तो तुम्हें वह आनंद अनुभव नहीं होगा। क्योंकि आनंद का, निन्यानबे प्रतिशत तो यात्रा में है। मंजिल तो यात्रा की ही पूर्णाहुति है। यात्रा के बिना पूर्णाहुति कैसी? वह निन्यानबे प्रतिशत खो गया, तो पूर्णाहुति कैसी?
तुम अगर हेलिकाप्टर से उतार दिए गए--एव्हरेस्ट पर, तो तुम्हें आखिरी एक प्रतिशत मिलेगा। वह निन्यानबे प्रतिशत तो खो गया। और निन्यानबे प्रतिशत के कंधे पर बैठ कर यह एक प्रतिशत शिखर पर पहुंचता था। यह जमीन पर पड़ा रह जायेगा; इसका कोई मूल्य नहीं है।
तुम ऐसा ही समझो कि तुम पानी गरम कर रहे हो। तुमने निन्यानबे डिग्री तक पानी गरम किया; अभी भी भाप नहीं बना है। फिर सौ डिग्री तक पानी गरम हुआ और छलांग लगी; भाव बना। तुमने कहा, अरे! सौवीं डिग्री पर बनता है भाप; एक ही डिग्री की तो बात है! निन्यानबे से सौवीं डिग्री--एक ही डिग्री पर भाप बनता है। मगर यह एक डिग्री निन्यानबे के बाद आनी चाहिए। अगर तुम एक डिग्री के कंधे पर बैठ कर आनी चाहिए।
मंजिल यात्रा की पूर्णाहुति है। तो जितनी कठोर, जितनी श्रम साध्य यात्रा है, और जितने आनंद और उत्सव से गीत गा कर तुम पूरा, करोगे, उतने ही चरम शिखर पर तुम पहुंचोगे।
परमात्मा तक जाने के लिए कोई हेलिकाप्टर नहीं है। हो भी नहीं सकता। इसलिए मैं तुम्हें नहीं उबार सकूंगा। तुम उबरोगे, तो उबरोगे। बुद्ध ने कहा है: बुद्ध पुरुष इशारा कर सकते हैं, चलना ही तुम्हीं को पड़ेगा।

आखिरी प्रश्न: आप कहते हैं कि उदासी ठीक नहीं है, लेकिन मृत्यु के रहते उदासी से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है?

दृष्टि की बात है। अभी मृत्यु कहां! अभी तो तुम जीवित हो। एक बात तो पक्की है: अभी तुम मेरे नहीं। अगर जीवन के रहते तुम जीवन के आनंद से नहीं भरे तो, फिर मृत्यु की बात उठा कर...।
अभी मृत्यु हुई नहीं है; होंगी कभी। और कौन जाने--होगी कि नहीं होगी! क्योंकि जानने वाले तो कहते हैं: मृत्यु बड़े से बड़ा झूठ है। होता ही नहीं; स्वभावगत मात्र है। शरीर तो मरता नहीं, क्योंकि शरीर मरा हुआ है। और आत्मा मर नहीं सकती, क्योंकि आत्मा अमर है। दोनों का संयोग टूटता है। संयोग टूटने का नाम मृत्यु है; बस।
ऐसी ही समझो कि सुई धागा, अलग-अलग हो गये। बस इतना। इससे ज्यादा नहीं। सुई भी है; धागा भी है। फिर पिरो लोगे। अगर थोड़ी वासना है, तो फिर धागा सुई में पिरो जाएगा। फिर नया जन्म ले लोगे।
जीवन शाश्वत है। देह जीवित नहीं है। और जो तुम्हारे भीतर जीवित है, वह कभी मृत नहीं हो सकता। मगर यह तो जाननेवालों की बात हुई। तुम्हें भय लगा है। मगर एक बात तो समझो; अभी मौत आयी नहीं। अभी तो जीवन को जी लो।
तुम कहते हो: मौत के रहते आदमी कैसे उदास न हो? मैं कहता हूं: जीवन के रहते तुम उदास कैसे हो? अगर जीवन के रहते तुम उदास हो,तो मौत का तो सिर्फ तुम बहाना खोज रहे हो। इधर जीवन बरस रहा है; सब तरफ वसंत है; वृक्षों पर फूल खिले हैं; पक्षियों के कंठों में गीत हैं। सब तरफ चांदत्तारे नाच रहे हैं--और तुम बैठे हो उदास! तुम कहते हो: मौत के रहते...।
मौत कहां है कभी? तुम तो नहीं मरे! जब मरो, तब देख लेना। जब मरो, तब उदास हो लेना। अभी तो नाचो। और मैं तुमसे यह कहता हूं: अगर तुम अभी नाचो, तो तुम्हारा नाच तुम्हें मृत्यु से मुक्त कर देगा। अगर तुम उत्सव में पूरे डूब जाओ, तो तुम जा लोगे अमृत को।
अमृत उत्सव में ही जाना जाता है; गहन आनंद के क्षण में ही पहचाना जाता है। उसे पहचान लिया, तो फिर कोई मृत्यु न होगी।
तुम कहते हो: मृत्यु के रहते कैसे उदास न हों? मैं कहता हूं: जीवन है; जीवन के परम नृत्य में सम्मिलित हो जाओ। जीवन को जानते हो तुम जान लोगे: मृत्यु होती नहीं।
यह जाने का छिन आया
पर कोई उदास गीत अभी गाना ना।
वह जो जानता है, वह तो मृत्यु के क्षण में भी तुमसे कहेगा--कि ठहरो। बुद्ध ने कहा: मैं जाता हूं। शिष्य रोने लगे। बुद्ध ने कहा: यह कैसी बात! चालीस वर्षों तक निरंतर यही समझाया कि मृत्यु नहीं होती। फिर भी तुम रोने लगे! तुमने मुझे सुना या नहीं? उनका निकटतम शिष्य आनंद भी छाती पोटकर रोने लगा। बुद्ध ने कहा: आनंद, तू पागल हुआ है। चालीस वर्ष छाया की तरह मेरे पीछे रहे; मेरी हर बात सुनी, फिर भी तू रोता है! मेरे जाने से क्या होगा? कौन जा रहा है? कौन जाता है? न कभी कोई गया; न कभी कोई जाता है।
यह जाने का छिन आया
पर कोई उदास गीत अभी गाना ना।
चाहना जो चाहना
पर उलाहना मन में ओ मीत कभी लाना ना।
वह दूर-दूर सुनो, कहीं लहर
लाती है और भी दूर--दूर--दूरता का स्वर;
उसमें हां मोह नहीं,
पर कहीं विछोह नहीं,
व गुरुतर सच युगातीत
रे भुलाना ना।
मृत्यु के क्षण में, जिसने जीवन को खूब जाना है, भरपूर जीया है, वह तो सुनेगा:
वह दूर--दूर, कहीं लहर
लाती है और भी दूर--दूर--दूरता का स्वर।
वह तो सुनेगा: आ गया परम का स्वर, परम का संगीत, परमात्मा की पुकार।
उसमें हां मोह नहीं
पर कहीं विछोह नहीं
वह गुरुतर सच युगातीत
रे भुलाना ना।
यह जाने का छिन आया
पर कोई उदास गीत अभी गाना ना
नहीं भोर संझा
उमगते-निमगते
सूरज, चांद,तारे
नहीं वहां
उझगते-झिझकते
डगमग किनारे
वहां एक अंतःस्थ आलोक
अविराम रहता पुकारे
यही ज्योति कवच
है हमारा निजी सच
सार जो हमने पाया
गढ़ा, चमकाया, लुटाया
उसकी सुप्रीत छाया से बाहर ओ मीत
अब जाना ना
कोई उदास गीत ओ मीत अभी गाना ना।
जिसने जीवन को जीया है--भरपूर जीया है, बेझिझक जीया है, समग्र भाव से जीया है, मौत के क्षण में वह देखेगा; जा रहा हूं उस लोक में--
नहीं भोर संझा
उमगते-निमगते...।
जहां न सुबह होती, न सांझ। परिवर्तन नहीं है।
सूरज, चांद, तारे
नहीं वहां
उझगते-झिझकते
डगमग किनारे
वहां एक अंतःस्थ आलोक
अविराम रहता पुकारे।
वहां तो भीतर का सूरज जलता है।
वहां एक अंतःस्थ आलोक
अविराम रहता पुकारे
यही ज्योति कवच
है हमारा निजी सच
यही हमारी निजी सत्यता है; यही हमारा प्रामाणिक सत्य है। अमृत हमारा प्रामाणिक सत्य है।
वेद कहते हैं: अमृतस्य पुत्रः। हे अमृत के पुत्रों, मृत्यु के झूठ में मत पड़ जाना।
यही ज्योति कवच
है हमारा निजी सच
सार जो हमने पाया
गढ़ा--चमकाया--लुटाया
उसकी सुप्रीत छाया से बाहर से मीत
अब जाना ना।
जिसने जाना है जीवन को, जो देखेगा, मृत्यु में गहरी आंख से, वह कहेगा: अब जो एक प्रीतिपूर्ण छाया पड़ रही है, अब इसके बाहर नहीं जाना है। मृत्यु उसके लिए समाधि है।
सार जो हमने पाया
गङ्ढा--चमकाया--लुटाया
उसकी सुप्रीत छाया से बाहर ओ मीत।
अब जाना ना।
कोई उदास गीत ओ मी, अब गाना ना
चाहना जो चाहना
पर उलाहना मन में ओ मीत कभी लाना ना।
जिन्होंने जाना है, वे तो कहेंगे: मृत्यु से कोई शिकायत नहीं है; कोई उलाहना नहीं है। मृत्यु कुछ छीनती नहीं है। अगर तुम सजग हो, तो मृत्यु कुछ दे जाती है। मृत्यु इस जीवन का अंत नहीं है-- महाजीवन का प्रारंभ है।
और तुम कहते हो: मृत्यु के रहते हम उदास कैसे न हों!
मृत्यु है कहां? मृत्यु तुमने मान रखी है। और तुम्हारी मान्यता तब तक न टूटेगी, जब तक तुम जियो न। इसलिए कहता हूं: उमंग से जियो; मस्ती से जियो; गीत गुनगुनाते जियो; तुम्हारा जीवन एक नृत्य हो--एक उत्सव हो। उस उत्सव की चोट में ही सारी मृत्यु पिघल कर बह जाती है और तुम्हारा जो निजी सच है, यह बिखर कर सामने आ जाता है।
फिर तुम मृत्यु के द्वार पर परमात्मा को अपने से मिलता हुआ पाओगे। मृत्यु का द्वार खुलेगा। और तुम पाओगे: तुम परम ज्योति में प्रवेश पर रहे हो। कोई शिकायत न होगी; धन्यवाद होगा। प्रार्थना-पूजा का भाव होगा--मृत्यु के क्षण में भी। क्योंकि तुम मंदिर के द्वार पर खड़े होओगे।
जियो; जो ठीक से जी लेता, उसके लिए मृत्यु नहीं है। और जो ठीक से नहीं जीता, वह रोज-रोज मरता है, हजार बार मरता है, व्यर्थ ही मरता है।

आज इतना ही।