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गुरुवार, 2 मार्च 2017

नेति-नेति-(सत्‍य की खोज)-प्रवचन-13



प्रवचन-तैरहवां
नेति-नेति-(सत्‍य की खोज)

मनुष्य की तरफ देखने पर एक बहुत ही आश्चर्यजनक तथ्य दिखाई पड़ता है--वह यह कि मनुष्य का पूरा व्यक्तित्व एक तनाव, एक खिंचाव, एक बोझ है। कौन-सा बोझ है मनुष्य के चित्त पर, किस पत्थर के नीचे आदमी दबा है? सिर्फ किरणों की तरफ देखें या वृक्षों के हरे पत्तों की तरफ या आकाश की तरफ आंखें उठायें--कहीं कोई बोझ नहीं है, सब जगह बोझहीनता है, कहीं कोई तनाव नहीं है। मनुष्य के मन पर एक तनाव है!
एक तेजी से दौड़ती हुई ट्रेन के भीतर एक आदमी बैठा हुआ था। जो भी उस आदमी के करीब से निकलता था, हैरानी से उसे देखता था। उसने काम ही ऐसा कर रखा था। वह अपना बिस्तर, अपनी पेटी अपने सिर पर रखे हुए था! कोई भी उससे पूछता कि क्या कर रहे हो मित्र?

वह कुछ स्वयंसेवक किस्म का आदमी था। कुछ आदमी स्वयंसेवक किस्म के होते हैं! उन्हें यह खयाल होता है कि सब कुछ स्वयं ही कर लेना है।
उसने कहा, मैं अपना बोझ अपने ही सिर पर रखता हूं। मैं गाड़ी पर क्यों कोई बोझ रखूं?
वह खुद भी गाड़ी पर सवार था, अपने सिर पर बोझ रखे हुए! वह बोझ भी गाड़ी पर ही सवार है। लेकिन जिस बोझ को वह नीचे रखकर आराम से बैठ सकता था, उस बोझ को वह सिर पर रखे हुए है, इस खयाल से कि अपनी सेवा खुद ही करनी चाहिए! गाड़ी भाग रही है, वह उसको भी ले जा रही है, बोझ को भी ले जा रही है, लेकिन वह अपने बोझ को सिर पर ही रखे हुए है!
सारा जीवन चल रहा है, सारा जीवन चलता रहा है, सारा जीवन चलता रहेगा, लेकिन हम अपने-अपने बोझ को अपने सिर पर रखे हुए बैठे हैं! जिसे हम नीचे उतारकर रख सकते हैं, उसे हम अपने सिर पर रखे हुए हैं! और हम सबको भी वही खयाल है, जो उस भागती हुई गाड़ी के आदमी को है कि अपना बोझ अगर नहीं रखूंगा
तो कौन रखेगा। लेकिन वह बोझ प्रत्येक को दिखायी पड़ता है कि वह अपने सिर पर लिए हुए है, क्योंकि वह दिखने वाला बोझ था। और हम जो बोझ लिए हुए हैं, वह दिखने वाला बोझ नहीं है।
ऐसे बोझ हैं, जो दिखायी पड़ते हैं, वे बोझ बहुत खतरनाक नहीं हैं, उन्हें उतारकर बहुत आसानी से नीचे रखा जा सकता है। लेकिन ऐसे बोझ भी हैं, जो दिखायी नहीं पड़ते हैं, वह भी हम रखे हुए हैं! और चूंकि वे दिखाई नहीं पड़ते दूसरे को भी और हमें भी, इसलिए जीवन भर हम उन्हें बढ़ाते चले जाते हैं, वे कभी कम नहीं होते!
बच्चे और बूढ़े में अगर कोई अंतर है तो सिर्फ एक--बच्चे के ऊपर अभी कोई बोझ नहीं है और बूढ़े जीवन भर का बोझ इकट्ठा करते हैं। बुढ़ापे का मतलब है इतने बोझ से दब जाना कि जीना असंभव हो जाये। शरीर तो बूढ़ा होगा, लेकिन मन अगर निर्भार है तो आत्मा कभी बूढ़ी नहीं होती। और आत्मा अगर निर्भार है तो मरते क्षण भी व्यक्ति वैसा ही बच्चा होता है, वैसा ही सरल, वैसा ही निर्दोष, जैसा उस दिन था, जिस दिन पृथ्वी पर आया।
एक बाजार में बहुत भीड़ थी और जीसस उस बाजार में उस भीड़ के बीच खड़े थे। और किसी ने जीसस से पूछा कि तुम स्वर्ग के राज्य की बातें करते हो, कौन होगा अधिकारी उस राज्य को पाने का? तो जीसस ने उठाया एक छोटे बच्चे को अपने कंधे पर और कहा, वे, जो बच्चे की भांति होंगे!
लेकिन क्या मतलब है बच्चे की भांति होने का? जीसस ने यह नहीं कहा कि वे बच्चे होंगे, जीसस ने कहा, वे जो बच्चे की भांति होंगे।
बच्चे की भांति का मतलब यह है कि जो उम्र में आगे चले गये हैं, लेकिन आंतरिक बोझ जिन्होंने नहीं लादा है।
लेकिन बहुत अनजान-सा बोझ भी है, जो हम लिए बैठे हैं! और इन बोझों को लिए हुए अगर आप सोचते हों कि शांत हो जायेंगे तो असंभव है। उन बोझों को लिए हुए सोचते हों कि ध्यान के द्वार में प्रविष्ट हो जायेंगे तो असंभव है। उन बोझों को किसी ने आपके ऊपर रखा नहीं है। आपको पता ही नहीं है कि आप ही उन्हें रखकर चल रहे हैं! आज भी रखते चले जा रहे हैं, रोज रखते चले जायेंगे! वे बोझ इतने पैदा हो जायेंगे कि आप दब जायेंगे, बोझ ही रह जायेंगे। अंततः मरते-मरते आदमी तो कभी का मर चुका है, बोझ ही रह जाते हैं!
इन बोझों को थोड़ा समझ लेना जरूरी है। उस आदमी को जो गाड़ी में बैठकर सिर पर पेटी-बिस्तर लिए हुए है, अगर यह पता चल जाये कि नासमझी कर रहा है तो क्या उसे सिर पर से पेटी और बिस्तर उतार देने में कोई कठिनाई होगी? क्या वह यह पूछेगा कि मैं इसे उतारूं? उसे यह दिख भर जाये कि यह निहायत पागलपन है, फिर वह उतारने में देर नहीं लगायेगा, उतारकर नीचे रख देगा।
चित्त के बोझ हमारी समझ में आ जायें तो उन्हें उतारकर हमें नीचे रख देने में जरा भी कठिनाई नहीं होगी। लेकिन हमें पता ही नहीं कि हम किस तरह के बोझ लिए हुए हैं! उन बोझों की थोड़ी-सी झलक हमारे विचार में आनी चाहिए।
पहली तो बात, जो बीत गया, उसे हम इकट्ठा किये हुए हैं, वह बीत चुका है, अब वह कहीं भी नहीं है। सिर्फ हमारी स्मृति को छोड़कर वह सब बह चुका है। अब वह कहीं खोजे से नहीं मिलेगा, लेकिन हमारी स्मृति में संचित है! वह सारा का सारा पत्थर की तरह हमारे सिर पर बैठा हुआ है!
कल हुआ था कुछ, वह हो चुका। जैसे पानी में पड़ी हुई रेखाएं बन भी नहीं पातीं और मिट जाती हैं, वैसे ही इस जीवन की सतह पर बनी हुई रेखाएं बन भी नहीं पाती हैं और मिट जाती हैं। इन वृक्षों को कुछ भी पता नहीं कि कल यह हुआ था, न आकाश को कुछ पता है, न सूरज को कुछ पता है; सिर्फ आदमी को पता है!
आदमी को जो कल हुआ था, वह उसको जकड़कर बैठ गया है, उसे उसने पकड़ लिया है! कल किसी ने गाली दी और कल किसी ने प्रेम किया! कल किसी ने सम्मान किया था
और कल किसी ने अपमान किया था! और भीतर ये सारे कल अंतहीन हैं! और हमें तो याद है इस जन्म का, लेकिन जो जानते हैं, वे कहेंगे, अंतहीन जन्मों की कथाएं स्मरण में भीतर बैठी हैं, उन सबका बोझ है! एक आदमी पर अनंत जन्मों का बोझ है! अतीत का बोझ है। अतीत पत्थर बनता चला गया है, वह हमारी छाती पर है, वह हमारे सिर पर है, उसके नीचे हम दबे हैं, इसलिए निर्भार नहीं हो पाते। यह समझ लेना जरूरी है कि जो बीत गया, वह बीत गया, अब वह कहीं भी नहीं है, अब उसे मैं क्यों ढो रहा हूं।
एक सुबह एक आदमी बुद्ध के ऊपर आकर बहुत क्रोधित हुआ था, बहुत गालियां दी थीं। फिर बुद्ध के ऊपर क्रोध में उसने थूक दिया था! बुद्ध ने चादर से उस थूक को पोंछ लिया और उस व्यक्ति से कहा और कुछ कहना है!
बुद्ध तो किसी का अपमान नहीं करते हैं, लेकिन उनका होना ही बहुत से लोगों के लिए पीड़ा और अपमान का कारण हो जाता है, क्योंकि बुद्ध जैसे व्यक्ति का खड़ा होना ही हमारे अंधकार को दिखाने लगता है। बुद्ध जैसे व्यक्ति के भीतर से बहती करुणा, हमारे भीतर क्रोध और अहंकार को बहुत घबराने लगती है। बुद्ध का व्यक्तित्व हमारे व्यक्तित्व की भूमिका को जाहिर करने लगता है। हम क्रोधित हो जाते हैं तो बुद्ध पर थूकने का मन होता है! बिलकुल स्वाभाविक है।
समझ लें कि आप ही गये हैं, बुद्ध ने थूक को पोंछ लिया है, जैसे कुछ भी न हुआ हो! और क्या हो गया है! और बुद्ध ने पूछा है, और कुछ कहना है?
पास में बैठा हुआ भिक्षु आनंद बहुत क्रोधित हो उठा और कहने लगा, आप क्या कहते हैं, "कुछ कहना है'! उस आदमी ने थूका है! और हम आपकी वजह से सिर्फ चुप हैं, अन्यथा हमारे प्राणों में आग लग गयी है कि यह क्या किया है इस आदमी ने। आप पर थूकता है कोई, और आप यह कह रहे हैं कि और कुछ कहना है!
बुद्ध ने कहा, जहां तक मैं समझता हूं, इस आदमी के मन में इतना क्रोध है कि शब्दों को कहने में असमर्थ है, इसलिए थूककर कहता है। थूकना भी एक भाषा है, एक ढंग है, एक विधि है!
और कभी जब हम कुछ अभिव्यक्त न कर पाते हों, कुछ शब्द असमर्थ हो जाते हों तो फिर इसी तरह से कहते हैं। किसी का प्रेम बहुत बढ़ जाता है तो गले से लगा लेता है! अब गले से लगा लेने का वैसे कोई मतलब नहीं है। शब्द नहीं मिलते हैं। और कोई आदर से भर जाता है तो पैरों पर सिर रख देता है!
बुद्ध ने कहा, शब्द नहीं खोज पा रहा है वह आदमी! भाषा कमजोर है, इसलिए कुछ कहता है। और मैं समझ गया उसके भाव को। और इसलिए पूछा कि कुछ कहना है मित्र? आप होते उस जगह--क्या कहने को बच गया था?
वह आदमी वापस लौट गया है, उसकी आंखों में आंसू भरे हैं, रात भर वह सो नहीं सका। दूसरे दिन क्षमा मांगने आया है और बुद्ध से कहने लगा पैरों को पकड़कर, आंसू गिराकर, मुझे क्षमा कर दें! बुद्ध ने कहा, देखते हो आनंद, अब भी यह आदमी कुछ कहना चाह रहा है और शब्द नहीं मिल रहे हैं तो आंखों से आंसू गिराकर पैर पकड़ लेता है। आदमी की भाषा, आनंद, बहुत कमजोर है।
उस आदमी से कहा, मित्र, किस बात की क्षमा मांगते हो? उस कल की जो जा चुका! किससे क्षमा मांगते हो--मुझसे! मैं दूसरा आदमी हूं--बहती गंगा में बहुत धारा बह गयी है, बहुत पानी बह गया है।
कल तुम सुबह जिस गंगा के पास गये थे, अब वही गंगा वहां नहीं है। आज तुम जाओ और क्षमा मांगो तो गंगा कहेगी, किससे मांगते हो क्षमा? वह गया पानी, वह जिससे तुम कल मिल गये थे। अब वह कहां है, मैं जो कल था। न वृक्षों में पत्ते वही हैं, न आकाश में बादल वही हैं, न सूरज की किरणें वही हैं, कोई भी वही नहीं है, सब तो बह गया, सब तो बदल गया। किससे क्षमा मांगते हो?
लेकिन पागल हो, कल तुम नहीं बह पाये, तुम वहीं अटके, रुके हो। कल सुबह जो थूक गये थे, वहीं खड़े हो। बुद्ध ने कहा, मैं कैसे क्षमा करूं, मैं तो कल नहीं था। जो था, वह मैं नहीं हूं।
सिर्फ मरी हुई चीजें वही होती हैं, जो कल थीं। जिंदा चीजें रोज बदल जाती हैं। जीवन का मतलब है बदल जाना। मरे हुए का मतलब है न बदलना।
सुबह फूल खिलता है, उसी के नीचे एक पत्थर पड़ा है, वह पत्थर मन में हंसता होगा उन लोगों को देखकर, जो फूल की प्रशंसा करते हैं। क्योंकि वह कहता होगा कि पागल हो गये हो, अभी खिल भी नहीं पाया है, दोपहर मुरझा जायेगा, गिर जायेगा। मुझे देखो, मैं सुबह भी वही हूं, दोपहर भी वही हूं, सांझ भी वही हूं।
सिर्फ जो मरा हुआ है, वह वही होता है, जो था। असल में मरा हुआ अतीत में होता है, मरे हुए का कोई वर्तमान नहीं होता। अतीत का मतलब होता है मरा हुआ। मरे हुए का मतलब है दी पास्ट, बीत गया। सिर्फ अतीत नहीं बदलता है, वर्तमान प्रतिक्षण बदलता चला जाता है।
जो बदलता है, उसका नाम वर्तमान है। जो ठहरता नहीं, जो बदलता ही चला जाता है, उसी का नाम जीवन है।
लेकिन स्मृति बदलती नहीं, ठहर जाती है। हम जीवन हैं और हमारे सिर पर जीवन का बोझ है, जो नहीं बदलता! हम तो फूल की तरह हैं और स्मृति पत्थर की तरह है, जैसे एक फूल को पत्थर के नीचे दबा दिया हो, उससे आदमी विकृत हो जाता है। आदमी तो फूल है, जिंदगी तो फूल है। स्मृति पत्थर की तरह उस फूल को दबाये हुए है। सोचो, एक फूल पत्थर के नीचे दबा हो तो कैसे प्राण हो जायेंगे, वैसे ही आदमी की चेतना स्मृति के पत्थर के नीचे दब गयी है--परेशान, पीड़ित और तनाव से भरे जा रहे हैं!
ध्यान में प्रवेश होता है उनका, जो स्मृति के पत्थर हटा देते हैं।
लेकिन हम तो संभालते हैं। हम तो कहते हैं, पता है कि मैं कल कौन था? आदमी कभी एम. ऐल. ए. रहा हो तो भी अपने पैड पर लिखे रहता है भूतपूर्व एम. ऐल. ए.! वह जो भूतपूर्व है, वह पीछा नहीं छोड़ रहा है! गंगा का पानी बह गया--जो था वह, अब नहीं है। आप कल तक जो थे, सुबह वही नहीं होंगे। घंटे भर में सब बह जायेगा।
जैसे सांझ कोई एक दीया जलाये और सुबह जाकर कहे कि अब मैं उसी दीये को बुझाता हूं, जिसे सांझ जलाया था। हमें लगेगा सही कहता है, वही दीया बुझाता है, जो सांझ जला था। लेकिन कहां है वह दीया, जो सांझ जलाया था? वह ज्योति तो प्रतिक्षण बदलती चली गयी, वह ज्योति तो धुआं होती चली गयी, नयी ज्योति आती चली गयी। रात भर दीया बदला। रात भर दीया बदलता रहा, रात भर धारा ज्योति की बहती रही, नयी ज्योति आती चली गयी। सांझ जो दीया जलाया, वह तो सांझ ही बुझ गया और बह गया। दूसरे दीये जलते चले गये। एक श्रृंखला थी परिवर्तन की। सुबह जिस दीये को बुझाते हैं, वह बिलकुल और है। जिसे कभी नहीं जलाया था, उसे बुझाते हैं, श्रृंखला है, तेज धारा है, इसलिए पता नहीं चलता।
जो आदमी पैदा होता था, वही मरता है? आप जो पैदा हुए थे, क्या वही हैं? क्या वही रहेंगे?
ज्योति बदलती चली गयी, सब बदलता चला गया। एक बहाव है जिंदगी, लेकिन उस बहाव ने जो भी जाना, उस बहाव में जो भी अंकुर हुए, उस बहाव ने जो कुछ देखा, वह भी सभी स्मृति इकट्ठी करती चली गयी। जीवन की धारा है आगे की तरफ, स्मृति की पकड़ है पीछे की तरफ। स्मृति रुक जाती है अतीत पर। जीवन भागता है आगे, आगे और--अनजान, अज्ञात में। और स्मृति? स्मृति रुकती है ज्ञात पर। जीवन अज्ञात है।
और ज्ञात और अज्ञात के बीच जो खिंचाव है, वह मनुष्य का तनाव है। वह तनाव जब तक न उतरे, तब तक जीवन के द्वार में हम प्रवेश नहीं पा सकते। आप देखें अपनी तरफ, कितनी स्मृतियों को इकट्ठा किये बैठे हैं, क्या प्रयोजन है उन स्मृतियों का? क्या अर्थ है उन स्मृतियों का?
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप यह भूल जायें कि किस घर में आप रहते हैं। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि आप भूल जायें कि आप किस गांव के रहने वाले हैं। यह काम-चलाऊ स्मृति है, जिसका कोई बोझ नहीं।
स्मृतियां दूसरी हैं मनोवैज्ञानिक। अगर कल मैंने आपको गाली दी थी तो क्या आज आप मुझसे मिल सकेंगे उस गाली को बीच में लिए? क्या यह संभव होगा कि आप मुझसे मिलें और मैं जो कल जैसा आपको दिखायी पड़ा था, वह तसवीर बीच में न आये, वह स्मृति बीच में न बने। अगर यह हो सकता है तो आप एक जिंदा आदमी हैं, जिसके मन पर बोझ नहीं, और अगर यह नहीं हो सकता तो फिर बहुत कठिनाई है।
एक मित्र मेरे आये और उन्होंने कहा, आपकी अभी की बातें सुनीं और पहले की भी और इन बातों में थोड़ा विरोध मालूम पड़ा! लेकिन पहले की बातों को किस लिए पकड़कर बैठे हैं? वह सब बह गया। और अगर पहले की बातों को पकड़कर बैठे हैं तो जो मैं अभी कह रहा हूं, वह न आप सुन पायेंगे, न आप समझ पायेंगे। फिर विरोध दिखायी पड़ेगा, क्योंकि आप सुन ही नहीं पाये, समझ ही नहीं पाये। और जो मैं कह रहा हूं, उसे यदि ठीक से समझ लें तो कभी कोई विरोध नहीं दिखायी पड़ेगा। लेकिन मन में पकड़े हुए हैं कि कभी यह कहा था। न उसको सुना होगा कभी, क्योंकि तब पीछे का और कुछ पकड़े रहा होगा। मेरा नहीं तो कृष्ण का, बुद्ध का, महावीर का, गीता का, कुरान का पकड़े रहा होगा।
पीछे की तरफ स्मृति भागती रहती है और जीवन आगे की तरफ भागता रहता है। इन दोनों में मेल नहीं हो पाता है, ठीक वैसे ही जैसे एक ही बैलगाड़ी में दोनों तरफ बैल जोत दिये हों और वह दोनों तरफ बैलगाड़ी चली जा रही है! स्मृति के बैल पीछे की तरफ, जीवन-धारा के बैल आगे की तरफ। और वह बैलगाड़ी तकलीफ में पड़ गयी, पूरे समय कठिनाई में।
और पीछे के बैल मजबूत हैं, क्योंकि जीवन भर का बल उन्हें मिला है। वे जो अतीत के बैल हैं, स्मृति के बैल हैं, मजबूत हैं, क्योंकि जीवन भर की ताकत उन्हें मिली है। मुर्दा है, लेकिन मजबूत है; पत्थर है, लेकिन वजनी है।
हर आगे की, जीवन की धारा बहुत कोमल है। अभी होने को है, जैसे छोटा-सा अंकुर निकलता है बीज से, कमजोर और कोमल। अभी जरा-सा पत्थर इस पर रख दें तो मर जायेगा।
अतीत के बैल पीछे की तरफ गाड़ी को खींचते रहते हैं। गाड़ी पीछे जा नहीं सकती, सिर्फ आप खींच सकते हैं।
और तब जिंदगी रुक जाती है, ठहर जाती है, धारा नहीं रह जाती है, एक बांध बन जाती है, एक सरोवर बन जाती है। फिर हम सड़ते हैं, बोझ से मरते हैं। इसलिए आदमी की आंख में वह बात नहीं दिखायी पड़ती, जो झील में दिखायी पड़ती है। आदमी की आंख में वह बात भी नहीं दिखायी पड़ती है, जो एक गाय की आंख में दिखायी पड़ती है। आदमी की गति में वह बात दिखायी नहीं पड़ती, जो एक हिरन की गति में दिखायी पड़ती है। आदमी की जिंदगी में फूल जैसी प्रफुल्लता दिखायी नहीं पड़ती! वैसी चीजें खिलती दिखायी नहीं पड़तीं, जैसी पौधों में दिखायी पड़ती हैं। और आदमी भी इस प्रकृति का उतना ही हिस्सा है, जितना पशु है, जितने पौधे हैं, जितने पक्षी हैं, जितने चांदत्तारे हैं।
लेकिन आदमी में तोड़ने वाली कौन-सी बात है? वह अतीत का बोझ एक भारी दीवार की तरह खड़ा होकर आज हमको जीवन से तोड़ रहा है। यह बात समझ लेना जरूरी है कि जो हो चुका, हो चुका है। उसे मैं क्यों ढो रहा हूं, उसे बिदा कर दें।
एक फकीर खोजता हुआ निकला था, सत्य की खोज में। फिर वह एक संन्यासी के आश्रम में रुका। वह संन्यासी से मिला और उसको कहा कि मैं सत्य की खोज में आया हूं। जानना चाहता हूं कि जीवन का सत्य क्या है? जिस संन्यासी को उसने यह पूछा, उस संन्यासी ने कहा, ये बातें पीछे हो जायेंगी। कहां से आये हो? उस आदमी ने कहा, मैं पीकिंग से आया हूं। उस संन्यासी ने कहा, पीकिंग में चावल के क्या क्या दाम चल रहे हैं?
वह जो फकीर था, वह कहने लगा, महाशय, पीकिंग में जरूर चावल के दाम चल रहे होंगे, लेकिन मैं पीकिंग छोड़ चुका हूं। और जहां से मैं छोड़ चुका हूं, वहां लौटकर नहीं देखता हूं। जिन रास्तों से मैं गुजर जाता हूं, उन्हें भूल जाता हूं, क्योंकि मुझे और आगे के रास्ते पार करने हैं। और अगर आंखें पिछले रास्तों से भरी रहें तो आगे के रास्ते सिर्फ धुंधले दिखायी पड़ते हैं। आंखें एक समय में एक ही बात देख सकती हैं--या तो पीछे के रास्ते या आगे के रास्ते। होंगे पीकिंग में कुछ भाव, लेकिन मैं पीकिंग में नहीं हूं।
वह संन्यासी हंसा, उसने कहा, मैंने जानकर पूछा, अगर तुम पीकिंग में चावल के भाव बता देते तो मैं सत्य की तुमसे बात नहीं करता। ठीक है, अब तुमसे कुछ बातें हो सकती हैं, क्योंकि सत्य केवल उन्हीं के अनुभव में आ सकता है, जो अतीत से मुक्त हो जाते हैं। । लेकिन हमें तो पीकिंग में चावल के भाव बहुत अच्छी तरह याद हैं! आदमी बचपन की बातें बताता है कि चावल इतने सेर का बिकता था, इतना प्रचुर घी मिलता था, इतना यह होता था! यह सिर्फ बताना नहीं है, यह इसके चित्त पर बोझ की तरह बैठा हुआ है! तो जिंदगी जो आज है, उसे देखने में बाधा पड़ती है, क्योंकि जिंदगी जो कल थी, इतने जोर से मन को पकड़ हुए है।
कभी आपने खयाल किया है, मन दो तरह से काम करता है--एक तो फोटो- प्लेट की तरह। कैमरे में हम फोटो-प्लेट लगा देते हैं, बहुत संवेदनशील होती है, लेकिन बस एक फोटो निकालकर व्यर्थ हो जाती है। एक फोटो, पकड़ लिया, फोटो-प्लेट खराब हो गयी। फिर अब दूसरी फोटो नहीं पकड़ी जा सकती उस पर। मर गयी। जिंदा न रही अब।
एक दर्पण भी होता है, दर्पण पर रोज तस्वीर बनती है। जब सामने कोई होता है तो दर्पण उसकी पूरी तसवीर बना देता है। फिर वह बिदा हो जाता है, तसवीर भी बिदा हो जाती है। दर्पण फिर खाली हो जाता है। फिर कोई दूसरा सामने आता है। उसमें फिर तसवीर बनती है। फिर दर्पण यह नहीं कहता कि मैं बना चुका यह तसवीर। अब मैं दूसरी नहीं बनाऊंगा। दर्पण तसवीर पकड़ता नहीं है। दर्पण मरता नहीं है। तसवीर पकड़कर दर्पण जिंदा बनता है। तसवीर आती है, जाती है; बीत जाती है।
जो लोग स्मृति में जीने लगते हैं, वे लोग अपने चित्त का फोटो-प्लेट की तरह उपयोग कर रहे हैं। जहां एक के ऊपर दूसरी तसवीर इकट्ठी होती चली गयीं हैं। वहां बिदा नहीं होती तस्वीरें। खाली नहीं होतीं। फिर तस्वीरों पर तस्वीरें बैठती चली गयीं हैं, बोझ होता चला गया है।
लेकिन जो लोग ध्यान की दुनिया में गति करना चाहते हैं, वे मन को दर्पण की तरह उपयोग करते हैं। मन पर आती हैं चीजें, जाती हैं। आप उसे देखते हैं तो ठीक है। आप नहीं देखते तो गया। फिर आप कहीं भी नहीं हैं। जिस स्टेशन पर सवार होते हैं, लोगों को नमस्कार करते हैं। फिर वे गये, फिर वह स्टेशन गया। वह दुनिया में है भी या नहीं, इससे कोई मतलब नहीं रहा। फिर आगे और दुनिया है, आगे और लोग हैं, उनकी तसवीर बना ली है।
तो पिछली तस्वीरों को बिदा हो जाना चाहिए, अन्यथा फिर नये के साथ न्याय नहीं हो सकता है। पुराने के साथ जो बहुत ज्यादा पकड़ हो तो नये के साथ न्याय नहीं हो सकता।
अतीत के साथ बहुत जकड़ हो तो वर्तमान के साथ न्याय कैसे हो सकता है? और बीते कल से जो बंध गया, वह आज में जीयेगा कैसे? अभी कैसे जीयेगा? इस क्षण कैसे जीयेगा? यह--यह क्षण तो कभी भी नहीं था। अतीत का बोझ हमारे चित्त को, चित्त के दर्पण को धूमिल कर देता है।
एका व्यक्ति, एक संन्यासी के आश्रम में दीक्षित हुआ। बरसों तक साधना की उसने, लेकिन कुछ नहीं पा सका, वह जो पाने की इच्छा थी। फिर उसने अपने गुरु को कहा, वर्ष बीत गये, वह तो नहीं मिला, जिसे खोजने आया था। अब मैं कहां जाऊं?
तो उसके गुरु ने कहा कि एक सराय है नगर के बाहर, कुछ दिन वहां जाकर रह, सराय का वह जो मालिक है, वह जो रखवाला है, उसे ठीक से समझ, शायद जो यहां नहीं मिल सका, वह वहां मिल जाये।
वह युवा संन्यासी उस सराय में गया। आशा तो नहीं थी, क्योंकि एक बड़े संन्यासी से कुछ न मिला तो एक सराय के रखवाले से क्या मिलेगा? लेकिन कहा था गुरु ने तो चला गया।
सांझ जाकर जब वहां पहुंचा तो सराय का मालिक बरतन साफ कर रहा था। दिन भर जो लोगों ने किया था, यहां ठहरे और गये थे। उसने बरतन साफ किये। कमरों में बुहारी लगायी। द्वार झाड़ें। वह देखता रहा। फिर उसने कहा, मेरे गुरु ने आपके पास कुछ सीखने को भेजा है।
वह पहरेदार, वह सराय का मालिक कहने लगा, मेरे पास सीखने को क्या है! लेकिन आये हो, तो ठहरो। मैं कुछ सिखा नहीं सकता। तुम खुद सीख सकोगे तो बात दूसरी है। और दुनिया में कोई किसी को कुछ नहीं सिखा सकता। कोई सीख सके, तो बात दूसरी है।
लेकिन उसने कहा, जो आदमी कहता है, मैं कुछ सिखा नहीं सकता, उससे सीखने को क्या मिलेगा! लेकिन फिर आ गया हूं तो कम से कम रात रुक जाऊं और कम से कम एक दिन तो देख लूं कि यह आदमी क्या करता है।
दूसरे दिन सुबह से फिर वह देखता रहा। वह आदमी दिन भर लोगों की सेवाएं करता रहा। एक मेहमान आया, दूसरा मेहमान गया, तीसरा मेहमान आया। किसी के घोड़े बंधे, किसी के ऊंट ठहरे, किसी की गाड़ी बंधी। वह दिन भर काम करता रहा। भोजन देता रहा। सांझ फिर बरतन मलता था।
फिर उसने कहा, अब मैं जाऊं? क्योंकि मुझे कुछ सीखने जैसा नहीं दिखायी पड़ता। दिन भर लोग आये, गये, मैंने देखा। तुमने सेवा की, वह मैंने देखा। तुमने बरतन धोये, तुमने मकान साफ किया, वह मैंने देखा। सब मैंने देख लिया। सिर्फ मुझे पता नहीं कि आज तुम सुबह उठे, कब उठे, वह मुझे पता नहीं। उस वक्त तुमने क्या किया, वह तो मुझे और बता दो।
उसने कहा, कुछ नहीं किया। रात जिन बरतनों को साफ करके रख दिया था, उन पर थोड़ी धूल जम गयी थी। रात भर सोये रहा तो सुबह फिर उन्हें साफ किया।
उस आदमी ने कहा, अच्छा पागल है मेरा गुरु! किस आदमी के पास भेज दिया, जहां सीखने को कुछ भी नहीं! जो बरतन साफ करना, मकान साफ करना, लोगों की सेवा करना-- इसके सिवा कुछ भी नहीं जानता!
वह वापस लौट गया अपने गुरु के पास और कहा, कहां मुझे भेज दिया? वहां मैंने कुछ भी नहीं पाया।
तो उसके गुरु ने कहा, अब तुम कहीं भी कुछ नहीं पा सकोगे। क्योंकि वह पाने वाला चित्त ही तुम्हारे पास नहीं है। मैंने तुम्हें वहां भेजा था, जानकर भेजा था। क्योंकि मुझे वही मिला था। एक रात मैं भी उस सराय में ठहरा था।
मैंने भी उस आदमी को देखा कि एक मेहमान के साथ उसने वही व्यवहार किया, जो दूसरे मेहमान के साथ! मैंने देखा कि एक आदमी आया, तो जैसे वही आदमी दुनिया में उसके लिए सब कुछ हो गया! जैसे दुनिया मिट गयी, वही आदमी सब कुछ हो गया! वह उसकी इस तरह सेवा करने लगा, जैसे जीवन भर उसी की सेवा करता हो! फिर वह आदमी चला गया तो उसको लौटकर भी रास्ते पर नहीं देखा कि वह आदमी जा चुका है! दूसरा आ गया था, उसकी सेवा करने लगा!
मैंने देखा कि वह आदमी दर्पण की तरह है। उसके चित्त पर कोई तसवीर नहीं बनती। हजारों मेहमान आये और गये; वह सराय है, वहां कोई आता है, जाता है। लेकिन सराय का वह जो मालिक है, वह अदभुत है। वह किसी को पकड़ नहीं लेता। कोई पकड़ता नहीं, कोई जकड़ता नहीं। जब कोई सामने होता है तो ऐसे लगता है, जैसे इसका बड़ा प्रेम है! जीवन भर इसी को पकड़े बैठा रहेगा। जब कोई चला जाता है, तो वह लौटकर भी नहीं देखता! वे जो उसे छोड़कर जाते हैं, वे लौटकर देखते हैं, उस सराय के मालिक को? तूने देखा नहीं, वह दर्पण जैसा आदमी है? तूने उससे कुछ पूछा नहीं?
उसने कहा, मैंने पूछा था कि सुबह उठकर तुमने क्या किया? क्योंकि बाकी तो सब मैंने देख लिया था। सुबह का मुझे पता नहीं था। सिर्फ इतना ही कहा कि मैंने रात जो बरतन रख दिये थे साफ करके, उन पर थोड़ी धूल जम गयी थी, उन्हें सुबह फिर साफ कर दिया!
वही फकीर, वह गुरु हंसने लगा। उसने कहा, पागल, उसने ठीक कहा। रात को चित्त पर सपनों की धूल जम जाती है, रात भर सपने चलते हैं। सांझ साफ करके सो जाओ तो सपने चलते हैं। उनकी भी धूल जम जाती है। सुबह उसको भी साफ कर लिया है, यही उसने कहा है।
चित्त एक दर्पण है। और चित्त एक दर्पण हो जाये, तो बस, सब हो गया।
लेकिन चित्त पर तो हम धूल इकट्ठी करते हैं। इस धूल को समझ लेना जरूरी है। क्या प्रयोजन है अतीत की धूल का? बोझ को बांध रखने का क्या अर्थ है? कौन-सी सार्थकता है, उसके साथ बंधे रह जाने में? लेकिन हमें दिखायी ही नहीं पड़ता!
एक मित्र हैं, उनके घर मैं ठहरा था। आज से कोई सात साल पहले किसी युवती से प्रेम था, उसे विवाह कर लाये थे। उनसे मेरी बात हो रही है। मैंने उनसे अचानक पूछा कि आज तुम्हारी पत्नी कौन-सी साड़ी पहने हुए है, बता सकोगे?
वे कहने लगे, कौन-सी साड़ी पहने है! नहीं, खयाल नहीं किया! दिन भर पत्नी घर में है, दिन भर उन्होंने देखा है! लेकिन वह कौन-सी साड़ी पहने है, वह खयाल में नहीं है!
पड़ोस की पत्नी कौन-सी पहने हुए है, यह खयाल में हो सकता है। अब अपनी पत्नी को देखने की जरूरत नहीं रह गयी। उसको एक बार देख लिया था, वह सात साल पहले! तब से वही तसवीर काम कर रही है! सात साल में वह स्त्री रोज बदलती चली गयी। रोज नयी होती चली गयी, लेकिन फिर उसे नहीं देखा गया! मस्तिष्क जो है, फोटो-प्लेट की तरह काम कर रहा है।
मैंने उनसे पूछा, क्या तुम यह बता सकते हो कि जब तुमने पहली दफा इस लड़की को देखा था, तब यह कौन-सी साड़ी पहने हुई थी।
वे कहने लगे, वह तो तसवीर बिलकुल जिंदा है। वह मैं बता सकता हूं, उसने क्या-क्या पहन रखा था पहली बार, मैंने जब उसे देखा था। लेकिन वह सात साल पहले की बात है। वह सात साल पहले की तसवीर बिलकुल जिंदा है! और जब मैंने उन्हें याद दिलाया, तो उनके चेहरे की रोशनी बदल गयी! वे कुछ सोच में पड़ गये और खयाल में पड़ गये और कहने लगे, उसने ये-ये कपड़े पहन रखे थे! उसकी चप्पल भी बता सकते थे! उसने कान में क्या पहन रखा था, वह भी बता सकते थे! लेकिन आज वह क्या पहने हुए है, उसका उन्हें कोई भी पता नहीं है!
आपको भी पता नहीं होगा, क्योंकि आज तो आपने देखा ही नहीं है। देख लिया था एक दफे, वह तसवीर बैठ गयी है। वही उसी से रोज काम चला लेते हैं!
और किसी को रोज झंझट होती है। रोज जो झंझट है, वह इस बात की है कि पत्नी भी बदल गयी, पति भी बदल गया! लेकिन पत्नी तो समझ रही है कि सात साल पहले जो आदमी मिला था, वह वैसा ही होना चाहिए! पत्नी को पति भी समझ रहा है--कि वही सात साल पहले की मांग चल रही है!
रोज कलह है, क्योंकि रोज कोई किसी को नहीं देख रहा है कि बदलाहट हो रही है!
सब कुछ बदल गया, धारा बह गयी। गंगा में बहुत-सा पानी बह गया। मांग जारी है। वह पत्नी यह कह रही है कि पहले दिन तुमने जिस भांति मुझे प्रेम किया था, वह तुम आज क्यों नहीं करते? वह तसवीर जिंदा है और उसी में तौले चल रही है! वह आदमी जा चुका। अभी बिलकुल दूसरा आदमी है। यह वही आदमी नहीं है। लेकिन दोनों ठहरे हैं अपनी पुरानी स्मृतियों पर! हम सब वहीं ठहरे हुए हैं।
बेटा जवान हो जाता है। बाप को कभी पता नहीं चलता कि बेटा जवान हो गया है! वह वहीं ठहरा हुआ है, जब बेटा छोटा था। वह उसके साथ वही बातें किये चले जा रहा है, जो अपने छोटे बेटे से की थी! और उसको मारने को भी तैयार है, जो बेटे की समझ के बाहर है, क्योंकि बेटे को लगता है कि वह जवान हो गया है। बाप को लगता है कि कैसे जवान है, वह बेटा ही है।
चीजें बढ़ गयी हैं, बदल गयी हैं, लेकिन बाप पुरानी तसवीर पर रुका हुआ है! सब पीछे रुका हुआ है। सब चीजें बदल जाती हैं, सब चीजें पीछे रुकी मालूम होती हैं।
मां है। उसका बेटा नयी शादी कर लाया है। उसको पता नहीं है कि लड़का जवान हो गया है, वह किसी स्त्री के प्रेम में गिरेगा! मां अपनी पुरानी ही मांग जारी किये हुए है! वह समझती है, बेटा जब कभी आयेगा, उसकी गोद में सिर रखेगा! जब भी आये, उसके गले मिले! उसकी समझ के बाहर है कि वह किसी और स्त्री की गोद में सिर रखे। किसी और स्त्री को गले लगाये। यह उसकी समझ के बिलकुल बाहर है।
इसलिए सास और बहू की नहीं बन पा रही है। मां रुकी हुई है अपने बेटे के साथ, जब वह छोटा था। वह अब भी चाहती है कि वह जो आज्ञा दे, बेटा वही करे। जहां वह कहे, जाओ, वह जाये। जहां वह रोके, वहां रुके! उसे पता नहीं कि बेटा बड़ा हो गया है। गंगा का पानी बहुत बह गया। अब दूसरा आदमी है वहां। वही नहीं, जो उसकी गोद में लेटा था। वही नहीं, जो उसके पेट में रहा था। वह अब भी वही बातें कर रही है कि मैंने तो तुझे नौ महीने पेट में रखा था!
माता से पूछो, वह अब भी कह रही है कि हमने तुम्हें नौ महीने पेट में रखा था। हमने इतने कष्ट सहे और तुम हमारे साथ यह कर रहे हो! उसे पता नहीं कि जिसको उसने पेट में रखा था, वह कोई और था। यह था ही नहीं कभी। यह बिलकुल नया है। यह बिलकुल दूसरा है। जिंदगी की धारा, जिंदगी की ज्योति कहीं और ले आयी है। यह वह दीया नहीं है, जो उसने पेट में जलाया था। वह ज्योति निरंतर बदलती चली गयी। बिलकुल दूसरा आदमी है। लेकिन हम तो नये को नहीं देख पाते, वह पुराना हमारे चित्त को पकड़े हुए है!
दुनिया का एक ही कष्ट है, उसकी एक ही उलझन है--चाहे वह पति की हो, या पत्नी की, या चाहे मां की, चाहे बेटे की, चाहे मित्रों की जिंदगी की एक ही उलझन है कि हम सब पीछे रुक जाते हैं। आगे हम जाते ही नहीं! हम वहां नहीं हैं, जहां हम हैं। हम बहुत पहले कहीं रुक गये हैं। और जहां हम रुक गये हैं--और जहां हम रुक गये हैं, वहीं कठिनाई शुरू हो गयी है। हमें होना चाहिए वहां, जहां हम हैं। फिर ध्यान में बाधा नहीं होती।
हमें होना चाहिए दर्पण की भांति असंग, चीजें बनें और मिट जायें। असंग का मतलब, अनासक्ति मत समझ लेना। असंग का अर्थ बहुत अदभुत है।
असंग का अर्थ पूरी तरह जुड़े हुए और फिर भी नहीं जुड़े हुए।
जब किसी को प्रेम करो तो पूरा प्रेम करना, उस क्षण वह रह जाये, जिससे प्रेम किया है। और जितना प्रेम कर सको, पूरा कर लेना, क्योंकि जितना पूरा हो सकेगा, उतना ही मुक्त हो सकोगे। जितना अधूरा रह जायेगा, उतना ही अटका रह जायेगा। उतना ही पीछा करेगा। लौट-लौट कर पीछे की याद आयेगी उसे--और प्रेम कर लेता, और प्रेम कर लेता! और प्रेम कर लेता है। पूरा कर लो, जब प्रेम करो--प्रेम के क्षण हैं। और फिर पार हो जाना, क्योंकि जिंदगी कहीं नहीं रुकती। सब चीजें पार हो जाती हैं। जब दुबारा वह सामने आ जाये तो फिर प्रेम जग जायेगा, और वह बिदा हो जायेगा। तो मन खाली हो जायेगा और दर्पण बन जायेगा।
मन रोज-रोज खाली हो जाये और दर्पण बन जाये तो आदमी ने पा लिया जिंदगी का राज, पा लिया उसने परमात्मा का राज।
परमात्मा रुका हुआ नहीं है। इसीलिए तो रोज नयी चीजें पैदा कर पाता है। नहीं तो रामचंद्रजी को पैदा करता चला जाये रोज-रोज, कृष्ण भगवान को पैदा करता चला जाये, आपको पैदा ही नहीं करता कभी। क्योंकि आप बिलकुल नये हैं। वह तो पुरानी तसवीर ही पैदा करे कि देखो एक राम पैदा कर दिया है। जैसे फोर्ड की कारें आती हैं, बस वही कारें रोज निकलती चली जाती हैं! लाख कारें, एक-सी निकल आती हैं!
लेकिन लाख आदमी एक-से नहीं पैदा हो सकते। जो पौधा एक दफा हुआ, फिर दुबारा नहीं होगा। एक जैसे दो पत्ते भी नहीं खोजे जा सकते है। एक जैसे दो पत्थर भी नहीं खोजे जा सकते है। एक जैसे दो आदमी भी नहीं खोजे जा सकते हैं।
आप यूं ही नहीं हैं; किसी दिन यह पता चलेगा, मैं अनूठा हूं। कोई मेरे जैसा न कभी था, न होगा। उस दिन कितना अनुग्रह मन को मालूम होगा। मैं अनूठा हूं। इस अंतहीन जगत में अनंत लोग पैदा हुए हैं, लेकिन मैं कभी नहीं। और अनंत-अनंत लोग पैदा होंगे, लेकिन मैं फिर कभी नहीं पैदा होऊंगा।
एक-एक आदमी अनूठा है। आप दोहराये नहीं गये हैं और न ही दोहराये जायेंगे। बस आप बिलकुल आप हैं।
ईश्वर ने इतना सम्मान दिया है एक-एक आदमी को, जिसका कोई हिसाब नहीं! इस सम्मान के बदले में हम कुछ भी नहीं चुका सकते। कोई उपाय नहीं है इस सम्मान को चुकाने का। एक-एक आदमी को बनाया है अद्वितीय! एक-एक पत्ते को, एक-एक फूल को बनाया है अद्वितीय! अद्वितीयता छायी हुई है सब तरफ।
लेकिन हम अपने को पुराने करने पर लगे हुए हैं! हम अपने को नया नहीं होने देते! हम कहते हैं, मैं तो वही हूं, जो कल था! हम तो कहते हैं, मैं वही हूं, जो परसों था! हम तो कहते हैं, मैं वहीं हूं, जो सदा था!
हम अपने को पुराना करने में लगे हुए हैं और भगवान नया करने पर लगा है! इसलिए विरोध पैदा हो गया है। इस विरोध से तनाव है, बोझ है, परेशानी है। नहीं, पुराना तो नहीं हुआ जा सकता है, नया ही हुआ जा सकता है।
और फिर क्यों पीछे की तरफ पड़े हुए हैं, क्यों नहीं नये हो जाते क्यों नहीं खुल जाते, उसके लिए, जो है! क्यों नहीं बंद हो जाते हैं, उसके लिए, जो हो चुका है?
जो अतीत के प्रति मरता है, वही वर्तमान में जीता है।
जो अतीत के प्रति नहीं मर सकता, वह वर्तमान में नहीं जी सकता।
अतीत के प्रति मर जाना, ध्यान की अदभुत प्रक्रिया है। कम से कम हम एक प्रयोग करें कि हम मर जायें अतीत के प्रति, भूल जायें उसको जो आप थे, और जानें उसको जो आप हैं। और ये दोनों चीजें बिलकुल अलग हैं। और जो आप थे, वह आप नहीं हैं। और जो आप हैं, वह आप कभी नहीं थे। अतीत के प्रति प्रतिपल मरते चले जायें, एक-एक क्षण मरते चले जायें। जो बीत गया, बीत गया; जो "है', वह है। और उस "है' में पूरे जागें। उस "है' में पूरे जीयें तो बोझ हट जायेगा।
ट्रेन में आप बोझा लादे बैठे हैं और ट्रेन लिए चली जा रही है आपको। अपने सिर पर आप किसलिए रखे हुए हैं? उसे उतार दें, नीचे फेंक दें, इतना बड़ा सब चल रहा है। आप ही क्यों इस फिक्र में पड़े हैं कि मैं इस बोझ को न ले जाऊंगा तो पता नहीं दुनिया का क्या हो जायेगा।
मैंने सुना है, वे जो छिपकली हैं मकान पर, उलटी लटकी रहती हैं। उनको यही खयाल है कि मकान उन्हीं के सहारे थमा हुआ है! अगर वे हट गयीं तो मकान गिर जायेगा! पूछ लेना किसी छिपकली से, वह यही कहती पायी जाती है कि अगर हम हट गये तो मकान गिर जायेगा।
सुना है मुर्गी को, वे यही समझते हैं कि सुबह हम बांग देते हैं, इसलिए सूरज उगता है!
एक गांव में एक आदमी था। उसके पास एक मुर्गा था। उसी आदमी के पास! गांव के लोगों से उसका झगड़ा हो गया! उसने कहा, कि मरो, हम अपने मुर्गे को लेकर दूसरे गांव में चले जायेंगे। याद रखना, सूरज कभी नहीं निकलेगा।
वह आदमी अपने मुर्गे को लेकर चला गया दूसरे गांव। तो दूसरे गांव में उसके मुर्गे ने बांग दी। सूरज उगा, उसने कहा, अब सिर पीटते होंगे। सूरज इस गांव में उग आया है। अब रोयेंगे, पछतायेंगे, जो मुझसे झगड़ा करके मुसीबत ली। सूरज उस गांव में उगता है, जहां मेरा मुर्गा बांग देता है!
हम सब भी इसी खयाल के लोग हैं। सारी दुनिया को उठाये हुए हैं अपने सिर पर! हर आदमी को यही खयाल रहा है कि अगर मैं नहीं रहा तो न मालूम क्या हो जायेगा। कुछ भी नहीं होता है। कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिलेगा। कितने लोग रहे हैं पृथ्वी पर? अब नहीं हैं। क्या हो गया? सबको यही भ्रम रहता है! सभी यह भ्रम पालते हैं, बहुत बोझ लेकर चलते हैं अपने होने का। अपने होने का जो बोझ लेकर चलता है, वह "होने' ६को नहीं जान सकेगा। "होने' को जानने के लिए निर्बोझ होना जरूरी है। इसलिए पहला बोझ है अतीत का, उसे जाने दें।
दूसरा बोझ है इस बात का, जैसे मैं ही सारी दुनिया को चला रहा हूं! हर आदमी को खयाल है कि सारी दुनिया को चला रहा हूं! हर आदमी अपने को सेंटर माने हुए है! सारी दुनिया उसी कील पर चल रही है!
कोई भी सेंटर नहीं है। कोई भी केंद्र नहीं है। कोई भी दुनिया को नहीं चला रहा है। दुनिया चल रही है, उसमें हम चल रहे हैं। ट्रेन भाग रही है, उसमें हम बैठे हुए हैं। लेकिन यह खयाल कि मैं चला रहा हूं, पीछा नहीं छोड़ता!
मैंने एक पुरानी कहानी सुनी है। एक आदमी रोज-रोज भगवान के मंदिर में जाकर प्रार्थना करता था कि मुझे मोक्ष चाहिए, मुक्ति चाहिए! एक दिन भगवान घबरा गया। उस मंदिर के भगवान घबरा गये होंगे, आखिर भगवान भी मंदिर के घबरा जाते हैं। तो भगवान प्रकट हो गये और उन्होंने कहा, तुझे मुक्ति चाहिए तो अभी ले ले।
उस आदमी ने कहा, अभी, एकदम! अभी कैसे ले सकता हूं, अभी मेरा बच्चा छोटा है। जरा जवान हो जाये, उसकी मैं शादी कर लूं।
भगवान ने कहा, इतने दिनों से तू तुझे परेशान किए हुए है कि मोक्ष चाहिए, मोक्ष चाहिए!
उसने कहा, चाहिए जरूर मुझे, लेकिन ठीक अभी नहीं चाहिए! आगे चाहिए! आप मुझे आश्वासन दे दें। मेरा लड़का बड़ा हो जाये, मैं उसकी शादी कर लूं, क्योंकि मेरे बिना कौन उसकी शादी करेगा।
भगवान वापस चले गये। फिर उस लड़के की शादी हो गयी। वह शादी करके लौटा था घर और रात अपने कमरे में सोया था, भगवान प्रगट हुए और उन्होंने कहा, अब तेरे लड़के की शादी हो गयी?
उसने कहा, आप भी बड़ी जल्दी मचाये हुए हैं! कम से कम उसका बच्चा हो जाये, मैं थोड़ा उसके बच्चे को खिला लूं। उसका बच्चा होगा तो कौन खिलायेगा? अभी लड़का नासमझ है। बहू नासमझ है। घर में कोई अनुभवी नहीं है। मेरे बिना कैसे बच्चा उसका बड़ा होगा। जरा बच्चा उसका बड़ा हो जाये, मैं बिलकुल तैयार हूं।
भगवान वापस चले गये। निराश नहीं हुए, आशा बांधे रखी। फिर उसके लड़के का लड़का भी हो गया और वह लड़का बड़ा भी हो गया। फिर देखा कि अब तो वह लड़का स्कूल पढ़ने जाने लगा। भगवान फिर आये।
बुङ्ढे ने कहा, आप तो मेरे बिलकुल पीछे ही पड़ गये हैं! अब वह लड़का स्कूल जाने लगा है। पढ़ लिख ले, उसकी शादी कर दूं, शादी हुई कि फिर मैं चलूंगा।
भगवान ने कहा, लेकिन मामला बहुत मुश्किल है। फिर शर्त शुरू हो जायेंगी, उसकी शादी होगी, फिर उसका लड़का होगा।
तो उस बूढ़े ने कहा कि फिर क्षमा करिए, फिर वह मोक्ष रहने दीजिए। मैं ही आऊंगा, आपको आने की जरूरत नहीं है। मैं ही आकर बता दूंगा कि अब मुझे मोक्ष चाहिए।
हम सबको यही खयाल है कि हम चला रहे हैं! क्यों है यह खयाल? यह इसलिए है कि हम चला रहे हैं, इसमें बड़ा मजा आता है। लगता है कि हम कुछ हैं। यह हमारे अहंकार का पोषण है कि हम चला रहे हैं। मैं चला रहा हूं। अहंकार को तृप्ति मिलती है। सच्चाई यह नहीं है कि मैं चला रहा हूं। सच्चाई सिर्फ इतनी है कि मैं चला रहा हूं, इस खयाल से "मैं' मजबूत होता है! और जितना "मैं' मजबूत होता है, उतना ही ध्यान में प्रवेश असंभव है।
अतः दूसरी बात समझ लेना आवश्यक है कि आप कुछ चला नहीं रहे हैं। एक बड़ी चलती हुई दुनिया के आप सिर्फ एक हिस्से हैं। एक बड़े जगत के, एक बहुत बड़े चलते हुए ब्रह्मांड के, एक बहुत बड़ी गति के, आप सिर्फ एक हिस्से हैं।
अगर यह हाथ मेरा जानता हो, तो यह हाथ समझता होगा कि मैं हूं सब। जरूर समझता होगा, लेकिन इसे पता नहीं है कि यह एक बड़े शरीर का हिस्सा है। यह हाथ अगर जानता होगा तो सोचता होगा कि मैं उठा। ये आंखें अगर जानती होंगी तो सोचती होंगी कि हम देख रही हैं। लेकिन आंखों को पता नहीं कि आंखें नहीं देख रही हैं। ये एक बड़े शरीर का हिस्सा हैं। अगर पेट को पता होगा, तो वह सोचता होगा कि मैं भूख बना रहा हूं, भोजन पचा रहा हूं। लेकिन पेट कुछ भी नहीं पचा रहा है। वह एक बड़े शरीर का हिस्सा है।
यह जिंदगी इकट्ठी है। यह सारा जगत इकट्ठा है। इस इकट्ठे में हम टुकड़े की तरह काम कर रहे हैं। लेकिन हमको यही खयाल कि हम कर रहे है! इससे मुसीबत हो रही है। सब हो रहा है, हम उसके एक हिस्से हैं। अगर सूरज--दस करोड़ मील दूर है, वह ठंडा हो जाये तो हम यूं ही ठंडे हो जायेंगे, इसी वक्त। हमें पता ही नहीं चलेगा कि सूरज कब ठंडा हो गया है। क्योंकि पता होने के लिए तो हमें होना चाहिए। सूरज ठंडा हुआ कि हम ठंडे हुए। तब हमें पता चलेगा कि सूरज भी चला रहा था। वह सूरज चला रहा था, उसके साथ हम चल रहे थे। हमारे हृदय की धड़कन उस सूरज की धड़कन से जुड़ी थी। और कौन जाने कोई दूर का सूरज बड़े सूरज को चलाता हो।
सब जुड़ा हुआ है। उस सब जुड़े में यह खयाल पैदा हो जाना कि मैं कर रहा हूं, मैं चला रहा हूं, बोझ लेना है। व्यर्थ बोझ लेना है। चलती गाड़ी में क्यों अपना पेटी और बिस्तर सिर पर रखकर बैठ गये? जिंदगी चल रही है और हम भी उसमें चल रहे हैं। हम चला नहीं रहे हैं। वह है गति। उस गति के सिर्फ हम एक अणु मात्र हैं। ऐसी जो भाव दशा हो, उस भाव दशा में समर्पण हो जाता है। और समर्पण किया नहीं जाता। बस, यह समझ पैदा हो जाये, तो सरेंडर हो जाता है। समर्पण ही ध्यान है।
कुछ लोग कहते हैं कि मैं जाकर भगवान को समर्पण कर दूंगा। लेकिन भाषा समर्पण कभी नहीं कर सकती, क्योंकि अगर आपने कहा, कि मैं समर्पण कर दूंगा तो आपने समर्पण को भी एक कृत्य बना लिया है। कृत्य कभी समर्पण नहीं होता। वह चाहे तो कल कह दे, अच्छा वापस ले लिया। समर्पण कभी वापस लिया नहीं जा सकता। समर्पण हो जाता है। समझ का परिणाम है।
अगर हम समझें जीवन की व्यवस्था को तो समर्पण हो जायेगा। वह हमें करना नहीं पड़ेगा। और वह हो जाये तो ध्यान शुरू हो जायेगा।
ये दो तीन बातें कहीं। एक तो अतीत के बोझ को समझें। उसे व्यर्थ न उठाएं। दूसरा मैं कह रहा हूं, वहर् कत्ता का बोझ, उसे समझें। चीजें हो रही हैं, हम कर नहीं रहे हैं।
और चीजों का कितना विराट जाल है होने का। उसके ओर-छोर का भी हमें कोई पता नहीं! पता हो भी नहीं सकता, कभी। उस सब होने की विराट व्यवस्था में अपने को छोड़ दें, भूल जायें करना, भूल जायें कर्तव्य, भूल जायेंर् कत्ता, रह जाये वही, जो है।
और बस सब कुछ हो जायेगा। वह हो जाना, हमें "वहां' पहुंचा देता है, जहां हम हैं। जहां से हम कभी नहीं हटे, जहां से हम कभी डिगे नहीं, जहां से हम कहीं गये नहीं। लेकिन उस तक पहुंचने के लिए "करने की', "होने की', सारी बोझ-स्थिति से मुक्त हो जाना जरूरी है।