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शुक्रवार, 10 मार्च 2017

कन थोरे कांकर घने-(संत मलूकदास)-प्रवचन-09



कन थोरे कांकर घने-(संत मलूकदास)
 
उधार धर्म से मुक्ति
नौवां प्रवचन
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक १९ मई, १९७७
सारसूत्र:
देवल पूजे कि देवता, की पूजे पाहाड़।
पूजन को जांता भला, जो पीस खाय संसार।।
मक्का, मदिना, द्वारका, बदरी अरु केदार।
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार।।
सब कोउ साहेब बंदते, हिंदू मुसलमान।
साहेब तिसको बंदता, जिसका ठौर इमान।।
दया धर्म हिरदे बसै, बोले अमरित बैन।
तेई ऊंचे जानिए, जिसके नीचे नैन।।
जेते सुख संसार के, इकट्ठे किए बटोर।
कन थोरे कांकर घने, देखा फटक पछोर।।
मलूक कोटा झांझरा, भीत परी महराए।
ऐसा कोई ना मिला, जो फेर उठावै आय।।
प्रभुताई को सब मरैं, प्रभु को मरै न कोई।
जो कोई प्रभु को मरै, तो प्रभुता दासी होइ।।


बाबा मलूकदास एक विद्रोही हैं। और विद्रोह धर्म की आत्मा है। विद्रोह का अर्थ है: समाज से, संस्कार से, शास्त्र से, सिद्धांत से, शब्द से मुक्ति।
आदमी का मन तो प्याज जैसा है, जिस पर पर्त-पर्त संस्कार जम गए हैं। और इन परतों के भीतर खो गया है--आदमी का स्व। जैसे प्याज को कोई उधेड़ता है, एक-एक पर्त को अलग करता है, ऐसे ही मनुष्य के मन की परतें भी अलग करनी होती हैं।
जब तक सार संस्कारों से छुटकारा न हो जाए, तब तक स्व का कोई साक्षात नहीं है। और संस्कारों से छुटकारा कठिन बात है। कपड़े उतारने जैसा नहीं, चमड़ी छीलने जैसा है। क्योंकि संस्कार बहुत गहरे गले गये है। संस्कारों के जोड़ का नाम ही हमारा अहंकार है। संस्कारों के सारे समूह का नाम ही हमारा मन हैं। विद्रोह का अर्थ ई--मन को तोड़ डालना। मन बना है: समाज से। मन है--समाज की देना। तुम तो हो परमात्मा से; तुम्हारा मन है--समाज से। और जब तक तुम्हारा मन सब तरह से समाप्त न हो जाए, तब तक तुम्हें उसका कोई पता न चलेगा, जो तुम परमात्मा से हो--जैसे तुम परमात्मा से हो।
इसलिए विद्रोह--समाज, संस्कार, सभ्यता, संस्कृति--इन सब से विद्रोह धर्म का मौलिक आधा है।
धर्म शुद्ध विद्रोह है। याद रहे: विद्रोह से अर्थ क्रांति का नहीं है। क्रांति--तो फिर संगठन। विद्रोह वैयक्तिक है। क्रांति में तो फिर संगठन है। क्रांति में तो फिर समाज का नया ढांचा बदलेगी क्रांति, लेकिन नए ढांचे को स्थापित कर देगी। पुराना समाज तोड़ेगी, लेकिन नए समाज को बना देगी। क्रांति में तो समाज फिर पीछे के द्वार से वापस आ जाता है।
परमात्मा के सामने तो अकेले होने का साहस करना होगा; भीड़-भाड़ नहीं चलेगी। परमात्मा के सामने तो नग्न और निपट अकेले खड़े होने का साहस करना होगा। परमात्मा के सामने तो तुम जैसे हो--अकेले असहाय--वैसा ही अपने को छोड़ देना होगा। कोई लाग-लगाव नहीं, कोई छिपाव नहीं, कोई पाखंड नहीं।
क्रांति समाज को बदलती है--व्यक्ति को नहीं बदलती; व्यक्ति वैसा का वैसा बना रहता है।
उन्नीस सौ सत्रह में रूस में बड़ी क्रांति हुई। समाज बदल गया; व्यक्ति वही के वही हैं। पहले व्यक्ति धर्म को मानता था, क्योंकि जार धर्म को मानता था। अब व्यक्ति धर्म को नहीं मानता, साम्यवाद को मानता था; क्योंकि सरकार साम्यवाद को मानती है। पहले व्यक्ति बाइबिल को पूजता था; अब दास कैपिटल को पूजता है। पहले मूसा और जीसस महत्वपूर्ण थे; अब माक्र्स, एन्जिल और लेनिन महत्वपूर्ण हो गये। मगर व्यक्ति उतना ही सोया हुआ है, जितना पहले था। उसकी नींद में कोई भेद नहीं हुआ है। शायद बिस्तर बदल गया--नींद जारी है। कमरा बदल गया--बेहोशी जारी है।
क्रांति से व्यक्ति नहीं बदलता; क्रांति से समाज बदलता है। और धर्म व्यक्ति के जीवन में बदलाहट का आधार है।
तो धर्म विद्रोह--वैयक्तिक विद्रोह है।
और एक विरोधाभासी
और एक विरोधाभासी बात याद रख लेना: परमात्मा एक है, इसलिए तुम एक हो कर ही उससे मिल सकोगे। परमात्मा दो नहीं है। परमात्माओं की कोई भीड़ नहीं है। इसलिए तुम भी भीड़ की तरह उससे न मिल सकोगे। उस जैसे ही हो जाओगे, तो मिल सकोगे।
यह भी ध्यान रखने के लिए जरूरी है कि परमात्मा समष्टि नहीं है; परमात्मा सार्वभौमता है। समष्टि तो व्यक्तियों के जोड़ का नाम है। परमात्मा निरवैयक्तिक है। परमात्मा में सब माया है। परमात्मा सब का जोड़ नहीं है। परमात्मा सब का आधार है। तुम्हारा भी उतना ही आधार है--जितना मेरा; जितना पहाड़ों का, जितना वृक्षों का। अगर हम अपनी जड़ों मग उतर जाएं, तो हम अपने आधार को पा लेंगे। व्यक्ति जब अपनी जड़ों में उतरता है, तो परमात्मा का साक्षात्कार होता है। स्वयं को जान कर ही सत्य जाना जाता है। स्वयं को ही ठीक से पहचान लिया, तो सब पहचान लिया। स्वयं के पहचानते पहचानते ही स्वयं मिट जाता है और सर्व प्रकट हो जाता है। इसलिए मैंने कहा--विरोधाभास। जो स्वयं को जानते नहीं और भीड़ के साथ अपने संबंध जोड़ते रहते हैं, वे बाहर ही बाहर भटकते रहते हैं। धर्म है--अंतर्यात्रा।
सभी संत विद्रोही थे; होना ही होगा। संत हो--और विद्रोही न हो, यह संभव नहीं है। क्योंकि धर्म से बचने की कई तरकीबें आदमी ने निकाल ली हैं और उन सब तरकीबों को तोड़ना पड़ेगा।
सब से बड़ी तरकीब तो आदमी ने यह निकाली है कि उसने झूठे धर्म गढ़ लिए है; उसने नकली सिक्के बना लिए हैं। नकली सिक्कों को हाथ में लेकर चलता रहता है, तो असली सिक्कों की याद भी नहीं आती। नकली परिपूरक हो गये हैं।
परमात्मा का तो कोई पता नहीं है, हमने मंदिर में एक प्रतिमा बना ली है। प्रतिमा हमारी बनाई हुई है। हमें-जिन्हें कि परमात्मा का कोई पता नहीं है। हम ही प्रतिमा को गढ़ लिए हैं; हमने प्रतिमा के सामने खड़े होने के नियम बना लिए हैं। कैसे प्रार्थना करनी, किन शब्दों में करनी, वे भी हमने गढ़ लिए हैं। हमने ही पुजारी तैनात कर रखा है। हम किस भ्रांति में पड़े हैं! न हमें परमात्मा का पता; न हमें स्तुति का पता। हमें अपना ही पता नहीं है। लेकिन यह जो मंदिर की झूठी प्रतिमा है, इस प्रतिमा के कारण एक भ्रम पैदा होता है कि शायद हमने पूजा कर ली, प्रार्थना कर ली। अब और क्या करें! परमात्मा को जाकर स्तुति कर आये, निवेदन कर आए और हम वैसे के वैसे बने रहते हैं, क्योंकि मिथ्या से कोई रूपांतरण नहीं होता; सत्य से रूपांतरण होता है।
ऐसा समझो कि अंधेरा कमरा है, और तुम एक दीया जलाओ, तो प्रकाश हो जाएगा। लेकिन तुम दीए को एक तस्वीर ले आओ, तो प्रकाश नहीं होगा। दीए की तस्वीर भला कितनी ही दीए जैसी लगे; दीए की तस्वीर तस्वीर है। मूर्ति मूर्ति है। मूर्ति भगवान नहीं है, तस्वीर है।
यह तो ऐसा ही हुआ कि तुम किसी होटल में जाओ और मेनू को ही खाने लगो! मेनू में भोजन के संबंध में जानकारी है; मेनू भोजन नहीं है।
शास्त्र में सत्य के संबंध में जानकारी है। शास्त्र में सत्य नहीं है। शब्दों और सिद्धांतों में तो केवल छाया है; बड़ी दूर की छाया है; उसी को सब कुछ मत मान लेना।
एक झेन फकीर रिंझाई अपने शिष्यों के साथ बैठा था और एक अजनबी, जो पहली दफा ही उसके दर्शन को आया था, उसने कहा कि मुझे एक सवाल पूछना है। बंधनों में पड़ता कौन है? क्योंकि आप सदा कहते हैं, बंधन से छुटो; मुक्त हो जाओ; निर्वाण खोजो यह बंधन में पड़ा कौन है?
रिंझाई ने कहा: दूसरा चांद। वह आदमी कुछ समझा नहीं। दूसरा चांद? उसने कहा: मैं कुछ समझा नहीं। तो रिंझाई ने कहा: तू बाहर जाकर देख।
रिंझाई का आश्रम एक झीन पर है। रात है और चांद निकला है। रिंझाई ने कहा: तू बाहर जाकर देख। एक चांद तो आकाश में है और एक दूसरा चांद झील में है। वह झील में जो चांद है, वही फंसा है। प्रतिबिंब उलझा है। असली तो उलझा ही नहीं है।
बड़ी अदभुत बात कही--दूसरा चांद!
तुमने जो, जहां-जहां दूसरे को पकड़ लिया है, वही-वही उलझन है। सत्य को तो तुमने पकड़ा नहीं है। सत्य को पकड़ो, तो मुक्त हो जाओ। तुमने सत्य की प्रतिध्वनियां पकड़ी ली हैं। तुमने परमात्मा को तो नहीं पकड़ा है; तुमने परमात्मा की प्रतिमाएं पकड़ा ली हैं। तुमने संतों को तो नहीं पकड़ा; तुमने संतों के शब्द पकड़ लिए हैं; शास्त्र पकड़ लिए हैं। तुम हमेशा नंबर दो को पकड़ लेते हो।
वह जो दूसरा चांद है, वही तुम्हारे जीवन में बंधन है। और दूसरे चांद से मुक्त होना होगा, अगर आंखें असली चांद की तरफ उठानी हो।
इसलिए सभी संत तुम्हारे तथाकथित धर्म के विपरीत हैं। तुम्हारे मंदिर, तुम्हारे मस्जिद, तुम्हारी काशी, तुम्हारा केदार, तुम्हारे मक्का-मदीना, तुम्हारे बाइबिल, तुम्हारे वेद, तुम्हारे कुरान--इनके विपरीत हैं। इनके विपरीत होने का कारण है। क्योंकि सभी संत चाहते हैं कि तुम्हें नारद धर्म उपलब्ध हो जाए। ये उधारी की क्या बातें कर रहे हो! और कब से कर रहे हो? और कब तक करते रहोगे? काफी हो चुका। झूठ के साथ काफी गंवा लिया। मूल को खोजो।
तो विद्रोह का अर्थ है: उधार धर्म से मुक्ति; नगद धर्म की खोज। विद्रोह का अर्थ है: औपचारिक धर्म से मुक्ति; वास्तविक धर्म की खोज।
एक औपचारिक धर्म है। तुम्हारी मां है, तो तुम पैर छूते हो, चाहे पैर छूने का कोई भाव हृदय में उठता न हो; चाहे पैर छूने की कोई भावना न हो। शायद पैर छूना तो दूर, क्रोध हो मन में। शायद मां को क्षमा करने की भी क्षमता तुममें न हो। लेकिन तुम पैर छूते हो। एक औपचारिक, एक व्यवहारिक बात है। छूना चाहिए--मां है।
ऐसी ही तुम मंदिर जाते हो। ऐसे ही तुम शास्त्र पढ़ लेते हो। ऐसे ही तुम प्रार्थना कर लेते हो। तुम्हारा हृदय अछूता ही रह जाता है। तुम्हारे हृदय में कोई तरंगें नहीं उठती; संगीत नहीं गूंजता; कोई नाद नहीं उठता। तुम्हारी हृदय की वीणा अकंपित ही रह जाती है। बस, औपचारिक; करना था--कर लिया--ऐसे करते जाते हो, जैसे तुम्हें प्रयोजन ही नहीं है।
तूने मंदिर जाते लोगों को देखा! तुमने अपने पर खुद विचार किया, जब तुम सुबह उठ कर बैठ कर गीत पढ़ लेते हो; या पूजा कर लेते हो; या घंटी बजा देते हो, पानी ढाल देते हो! सब यंत्रवत! न तो तुम्हें रोमांच होता परमात्मा पर पानी ढालते वक्त: न तुम्हारी आंख से आनंद के अश्रु बहते। भगवान को भोग लगाते वक्त तुम्हारे हृदय में कोई उत्सव होता; न तुम गीत गुनगुनाते। बस उपचार।
उपचार अगर धर्म है, तो तुम अधर्म को छुपा रहे हो। औपचारिक धर्म अधर्म को छिपाने की बड़ी कारगर तरकीब है। इस तरह पता भी नहीं चलता कि मैं अधार्मिक हूं और आदमी अधार्मिक बना रहता है।
धार्मिक होना हो, तो हार्दिक होना जरूरी है। विद्रोह का अर्थ है: जीवन में हार्दिकता आए। वही करो, जो तुम्हारा हृदय करना चाहता है। रुको; अगर अभी सच्ची प्रार्थना पैदा नहीं हुई है, तो कोई जरूरत नहीं है--झूठी प्रार्थना के साथ मन बहलाने का। किसको धोखा दोगे? परमात्मा को तो धोखा नहीं दे सकते। अपने को ही धोखा दे रहे हो। तो व्यर्थ क्यों समय खोते हो?
खतरा यह है कि कहीं झूठी प्रार्थना याद हो जाए, कंठस्थ हो जाए, तो फिर ऐसा न हो कि कंठ अवरुद्ध हो जाए--झूठी प्रार्थना से और असली प्रार्थना के जन्म का स्रोत ही न खुल सके; असली प्रार्थना को बहने की जगह न रहे। कम से कम स्लेट खाली रखो; झूठ तो मत लिखो। झूठ लिखी स्लेट तो खाली स्लेट बेहतर है। कम से कम सत्य किसी दिन उतरेगा, तो तुम उसको अंगीकार तो कर सकोगे।
इसलिए मैं कहता हूं कि पंडित परमात्मा को नहीं समझ पाए हैं।
ताहा हुसैन की एक छोटी-सी कहानी है कि भगवान ने सब जानकर बनाए, पृथ्वी बनाई, चांदत्तारें बनाए, तभी उसने गदहा भी बनाया। गदहा सीधा-सादा जानवर है; निर्दोष, भोला-भाला। और परमात्मा को गदहे से बड़ा प्रेम था। वह उसे अपने पास ही रखता था। उसकी सादगी उसे पसंद थी। और परमात्मा किताब लिख रहा था एक--मनुष्य-जाति को निर्दोष भेजने के लिए--कि कैसे आदमी जीए। वृक्ष के पत्तों पर वह किताब लिखता था और पत्तों को सम्हाल कर रखता जा रहा था। गहदा यह देखता था: गदहे को एक बात खयाल में आई कि अगर मैं ये सारे पत्ते चबा जाऊं, तो मैं परमज्ञानी हो जाऊंगा।
गदहा आखिर गदहा! परमात्मा एक दिन दोपहर में सोया था थका मांदा--किताब करीब-करीब पूरी हो गई थी--कि गदहा उस किताब को चर गया। अब परमात्मा ने आंख खोली, तो किताब तो नदारद थी और गदहा बड़ा प्रसन्न खड़ा था! उसने कहा: आप फिक्र मत करो, सब मेरे भीतर है। अब किताब के भेजने की जरूरत नहीं है; मुझे दुनिया में भेज दो।
वैसे भी परमात्मा नाराज था; उसे स्वर्ग से निकालना तो था ही; उसने कहा: अच्छा तू दुनिया में जा। गदहा बड़ा प्रसन्न पृथ्वी पर उतरा। सोचता था कि मेरी पूजा होगी। पूजा हुई--डंडों से हुई। क्योंकि जहां भी गदहा गया, उसने समझाने की कोशिश की लोगों को--कि सुनो, मैं धर्म लेकर आया हूं।
एक तो उसकी आवाज...! उसके रेंकने का स्वर। उसकी भाषा किसी को समझ में न आए। और दूसरा उसका यह दावा! उसने लाख समझाने की कोशिश की कि सब मेरे पेट में पड़ा है; पूरी किताब पी गया हूं पागलों ; सुनो तो सही। मगर कोई उसकी सुने ना। जिसको भी वह सुलझाने समझाने की कोशिश करे, वही उसको डंडे मारे। और कहते हैं--तभी से गदहे की यह हालत है। तब से वह भोला-भाला भी नहीं समझा जाता। अब तो उसको लोग गदहा ही समझते हैं।
ताहा हुसैन की इस कहानी का इशारा पंडित की तरफ है। पंडित का अर्थ है--जो किताब पी गया; किताब चबा गया, किताब जिसके पेट में पड़ी है--या जिसको खोपड़ी में पड़ी है। वह सोचता है। सब मुझे मालूम है और मालूम उसे कुछ भी नहीं है। किताब चबाने से कहीं कुछ मालूम पड़ता है! जीवन को जीने से, अनुभव से, अनुभूति से--शब्द जाल से नहीं, तर्क जाल से नहीं।
तो सारे संतों की बगावत किताबी लोगों के खिलाफ है। सारे संतों की बगावत बुद्धि से हृदय की तरफ जीवन-ऊर्जा को बदलने की है, विचार-मात्र से अनुभव की तरफ से ले जाने की है।
तुम्हारी ऊर्जा खोपड़ी में ही गूंजती रहे, तो तुम परमात्मा तक न पहुंच पाओगे। तुम्हारी ऊर्जा हृदय पर बरसे; तुम्हारा हृदय तुम्हारी जीवन-ऊर्जा का एक सरोवर बन जाए, तो कुछ घटना घट सकती है।
आज के सूत्र अंतिम सूत्र हैं; सीधे-सरल, पर बड़े महत्वपूर्ण।
देवल पूजे कि देवता, की पूजे पाहाड़।
पूजन को जांता भला, जो पीस खाए संसार।।
मलूकदास सीधे-सादे आदमी हैं--ग्रामीण, ग्राम्य; पढ़े-लिख भी नहीं। जो कहते हैं, वह लोक-भाषा है। देवल पूजे कि देवता...कि तुम मंदिर पूजो, कि तुम मंदिर में बैठे देवता को पूजो, इतने से ही कुछ नहीं--तुम चाहो, तो पूरे पहाड़ों को पूज डालो। मंदिर भी पत्थर से बना हैं; तुम्हारे देवता भी पत्थर से बने हैं; इनसे तो कुछ होगा ही नहीं। तुम चाहो तो पूरे हिमालय को पूजो; पूरे पहाड़ों को पूजो, तो भी कुछ न होगा।
पत्थर की पूजा से खतरा यही है कि कहीं तुम भी पथरीले न हो जाओ। यही हुआ है: पत्थर की पूजा करते-करते लोग पथरीले हो गए हैं। पत्थर की पूजा करते-करते लोग पत्थर हो गये हैं; उनके हृदय पाषाण हो गये हैं। इसीलिए तो हिंदू मुसलमान को काट सकता है; मुलाकात हिंदू  को काट सकता है। ईसाई मुसलमान को मार सकते हैं; मुसलमान ईसाई को मार सकते हैं।
मनुष्य जाति का पूरा इतिहास तुम्हारे तथाकथित धार्मिक आदमियों की कठोरता का इतिहास है; हिंसा और रक्तपात का इतिहास है। धार्मिक यह कैसे कर सके? पत्थर हो गये होंगे।
इसमें कुछ मनोवैज्ञानिक सत्य भी है। हम जिसको पूजेंगे, वैसे ही हो जाएंगे। हमारी पूजा हमें निर्मित करती है। जिसके साथ रहोगे, वैसे हो जाओगे। पत्थरों का बहुत संग-साथ मत करना। पत्थरों पत्थरों में ही रहे, तो धीरे-धीरे तुम भी पत्थर हो जाओगे। क्योंकि हम वैसे ही हो जाते हैं, जिनके हम साथ रहते हैं।
अपने से श्रेष्ठ का साथ खोजो। अगर पूजना ही हो,तो कहीं किसी जीवित संत को पूजना। किसी को पूजना, जिसकी तरफ आंखें ऊपर उठानी पड़ती हो। किसी को पूजना, जो तुमसे कहीं ज्यादा ऊंचाई पर हो। चाहे एक कदम ही आगे, तुमसे क्यों न हो। किसी को पूजना, जिसकी चेतना तुमसे ज्यादा प्रगाढ़ हो; तुमसे ज्यादा उज्ज्वलतर हो।
पत्थर! जड़--जहां चैतन्य नाम-मात्र को नहीं है, उसे तुम पूजने चले? तुमने परमात्मा की पूजा के लिए ठीक परमात्मा से विपरीत चीज खोज ली--पत्थर। इससे तो बेहतर था: वृक्ष को पूज लेते: कम से कम जीवंत तो था, बढ़ता तो था। लेकिन वह पूजा भी ठीक नहीं है। क्योंकि वृक्ष तुमसे बहुत पीछे है। पूजा करो अपने से आगे की। क्योंकि पूजा तो इशारा है। पूजा तो हम उसकी करते हैं, जो हम होना चाहते हैं। तुम पत्थर होना चाहते हो?--तो पत्थर की पूजा करो।
पूजा का तो अर्थ ही इतना हुआ कि यह हमारी अभिलाषा है; हम भी चाहेंगे कि कभी ऐसे हो जाएं। ठीक है, राम को पूजा, समझ में आया। कृष्ण को पूजा, समझ में आया। बुद्ध को पूजा, महावीर को पूजा--समझ में आया। लेकिन पत्थर को पूजा?
कोई बुद्ध मिल जाए, तो पूज लेना। लेकिन बुद्ध तो कभी-कभी होते हैं। और जब बुद्ध होते हैं, जब हमें पहचान में नहीं आते हैं। और जब बुद्ध होते हैं, तो हमें उनसे डर भी लगता है। क्योंकि बुद्ध के पास जाना, खतरे से खाली नहीं है। बुद्ध के पास जाने का मतलब ही यह हुआ कि बदलना पड़ेगा। गये--कि मिटे। बुद्धत्व संक्रामक है। जैसे रोग पकड़ता है, ऐसे अध्यात्म भी पकड़ता है। और रोग का तो इलाज है; अध्यात्म का कोई इलाज नहीं है। बुद्ध के पास जाने का मतलब हुआ कि तुम्हें वह दूर पार की पुकार पकड़ लेगी, प्यास पकड़ लेगी। फिर जब तक तुम पहुंच ही न जाओ उस मंजिल तक, तब तक तुम्हें रोना ही रोना है। विरह की अग्नि पकड़ लेगी। तब तुम जहां हो, वहां सब व्यर्थ दिखाई पड़ने लगेगा और जहां तुम्हें सार्थक दिखाई पड़ेगा, वह बहुत देर है। तब बेचैनी होगी ही। तब तुम रोओगे ही। तुम्हारा सब खूब-चैन छिन जाएगा। तुम्हारे सारे सपने टूट जाएंगे।
तुम तूफान समझ पाओगे?
गीले बादल, पीले रजकण
सूखे पत्ते, सूख तृण घन
ले कर चलता करता हर-हर
इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे?
गंध भरा यह मंद पवन था
लहराता इसमें मधुवन था
सहसा इसका टूट गया जो
स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे?
बुद्धों के पास होने का अर्थ है: तूफान के पास होना। और वह जो तुम सपना देख रहे थे: धन का, पद का, प्रतिष्ठा का, मद-मत्सर का--वह सब सपना टूट जाएगा। उस तूफान में तुम्हारी वासनाएं झकझोर कर बिखर जाएंगी। उस तूफान में तुम वही न रह जाओगे, जो तुम कल तक थे। तुम्हारे बनाए भक्त भूमिसात हो जाएंगे। तुम्हारी तैराई हुई नावें डूब जाएंगी। और तुमने अब तक जो जाना था, वह सब व्यर्थ और झूठा मालूम होगा। इसलिए बुद्धों से तो लोग बचते हैं। हां, बुद्ध जब मर जाते हैं, तो उनकी प्रतिमा बनाते हैं।
तुम जानकर चकित होओगे कि अरबी में, उर्दू में प्रतिमा के लिए जो शब्द है बुत , वह बुद्ध का ही रूपांतरण है। बुद्ध की इतनी प्रतिमाएं बनीं, कि जब पहली दफा मध्य एशिया के मूल्य बुद्ध की प्रतिमाओं से परिचित हुए, तो उन्होंने पूछा: यह क्या है? लोगों ने कहा: यह बुद्ध हैं। तुम बुत शब्द प्रतिमा का ही प्रतीक हो गया। बुत बुद्ध का ही रूपांतरण है।
करोड़ों प्रतिमाएं बनीं बुद्ध की। जिन्होंने कभी बुद्ध को उनके जीते जी नहीं पूजा, वे प्रतिमाओं को पूजने लगे।
प्रतिमा को पूजने में आसानी है। प्रतिमा तुम्हें नहीं बदलती; तुम्हें बदल नहीं सकती। प्रतिमा के तो तुम ही मालिक होते हो। जब चाहो, पट खोलो मंदिर के; और जब चाहो, तब आराध्य लगाओ। जब चाहो तब अर्चना करो। जब चाहो, तब भोग लगाओ; जो लगना हो--लगाओ। न लगाना हो--न लगाओ। नहलाना हो--नहला दो; न नहलाना हो--न नहलाओ। जो तुम्हारी मरजी; तुम्हारी मौज!
मैं पंजाब जाता था, तो घर में ठहरा हुआ था। सुबह उठकर जब मैं अपने कमरे से बाथरूम की तरफ पीछे उनके आंगन में जा रहा था, तो बीच के कमरे से गुजरा, तो मैंने देखा कि वहां गुरु-ग्रंथ साहब को एक प्रतिमा की तरह सजा कर रखा हुआ है। चलो, कोई हरजा नहीं। लेकिन सामने ही एक लोटा भर रखा है और एक दातौन रखी है! तो मैंने पूछा कि यह मामला क्या है! तो उन्होंने कहा कि गुरु-ग्रंथ साहब के लिए दातौन।
पानी भर के लोटा रख दिया है और दातौन रख दी है। तो मैंने कहा: भले मानुषों, कम से कम टूथ ब्रश रखा होता! कुछ तो सदव्यवहार करो। अब दातौन कौन करता है? तुम दातौन करते हो? उन्होंने कहा कि नहीं। तो मैंने कहा: तुम जो नहीं करते, कम से कम वह तो मत करवाओ। मगर तुम्हारी मौज है। गुरु-ग्रंथ से जो करवाना हो करवाओ। चाहे दातौन करवाओ; चाहे टूट ब्रश रखो। और न रखो, तो गुरु-ग्रंथ कुछ कर न लेंगे।
अब नानक ने प्रतिमा का विरोध किया है। लेकिन प्रतिमा से क्या होता है? हम किताब ही प्रतिमा बना लेंगे!
अब कोई राम की प्रतिमा के सामने अगर दातौन रखता हो, तो थोड़ी बात समझ में भी आती है; लेकिन किताब के सामने दातौन--तो बात ही बिलकुल मूढ़ता की हो गई। यह तो आखिरी हद्द हो गई। हो तो पंजाबी ही कर सकता है।
अगर आदमी कुछ ऐसा है...। प्रतिमा तुम्हारे वश में हो जाती है। तुम जो चाहो, जैसा चाहो--करो।
बुद्ध के पास जाओगे, तो तुम्हें बुद्ध के वश मग होना पड़ेगा।
अगर खयाल रखना: तुम जिसे पूजोगे, जाने अनजाने, तुम वही होने लगोगे। किताब पूजोगे, तो किताबी हो जाओगे। पत्थर पूजोगे, पथरीले हो जाओगे। अगर पूजना ही हो, तो चैतन्य को पूजो। पूजना ही हो, तो चेतना के नए-नए अवतारों को पूजो। पूजना ही हो, तो उठाओ आंख ऊपर की तरफ। कम से कम इतना तो होगा कि तुम्हारी पूजा तुम्हें ऊपर खींच सकेगी।
कहावत है: संग-साथ सोच कर करना चाहिए। जिनके साथ तुम रहते हो, उन जैसे हो जाते हो।
अकसर ऐसा होता है कि जो लोग मशीनों में ही काम करते हैं, वे मशीनों जैसे हो जाते हैं; यंत्रवत हो जाते हैं। पश्चिम में यह घट रहा है। लोग चूंकि मशीनों के साथ ही दिनभर काम में लगे रहते हैं; कभी एक मशीन, कभी दूसरी मशीन, तो धीरे-धीरे तुम्हारे चीत का मशीनी करण हो जाता है।
कलकत्ता मैं जाता था, तो एक घर में मेहमान होता था। जिनके घर मेहमान होता था, वे हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे। उनकी पत्नी ने मुझे कहा कि मेरे पति आपको इतना मानते हैं, आप कम से कम इनको इतना तो कहो कि कम से कम घर में आकर न्यायाधीशी न किया करें। दफ्तर में इन्हें जो करना हो--करें।
मैंने उनसे पूछा कि क्या ये घर में भी न्यायाधीश बने रहते हैं? उन्होंने कहा: आपसे क्या छिपाना। घर की तो बात छोड़ो, रात बिस्तर पर भी ये न्यायाधीश ही रहते हैं। आर हम सब ऐसे डरे रहते हैं, जैसे मुजरिम हैं! हर बात में कानून! और हर बात में वही अकड़, जो न्यायाधीश की--अदालत में होती है। हम तंग आ गये हैं। हम घबड़ा गये हैं। बच्चे इनको देखकर भाग जाते हैं बाहर। जब तक ये घर में रहते हैं, कोई बच्चा घर में खेलता नहीं। क्योंकि हर चीज में इनको गलती दिखाई पड़ती है। हर चीज में नियम का उल्लंघन दिखाई पड़ता है।
यह हो जाता है। जो आदमी जा कर आठ घंटे चौराहे पर पुलिस का काम करता है, वह घर लौट कर भी पुलिसवाला ही रहता है। इतना आसान थोड़े ही है; इतनी बुद्धिमत्ता कहां तुमसे कि तुम दफ्तर से आओ, दफ्तर को दफ्तर में ही छोड़ आओ। इतना आसान नहीं है। दफ्तर साथ चला आता है! क्लर्क के दिमाग में फाइलें चला आती हैं तैरती। वह घर भी बैठ कर फाइलों की ही सोचता है। भोजन भी करता है, तब भी भीतर  फाइलें पलटता रहता है। राम सोता भी है, तो सपने उन्हीं के देखता है।
हम जिनके साथ रहते हैं, वैसे हो जाते हैं। तो यह तो बड़ा खतरनाक और दुर्भाग्यपूर्ण चुनाव है कि आदमी ने भगवान पत्थर के बना लिए है। इससे आदमी पथरीला हो गया है।
कहते हैं मलूकदास: देवल पूजे की देवता, कि पूजे पाहाड़। तुम चाहो तो पहाड़ पूजने लगो, इससे कुछ भी न होगा। पूजन को जांता भला, जो पीस खाए संसार। लेकिन अगर पत्थर से बहुत मोह लग गया हो, कि पत्थर के बिना चलना ही न हो, तो फिर तुम चक्की के पत्थर को पूजो। कम से कम इतना तो होगा: पूजन को जांता भला, जो पीस खाए संसार। कम से कम पीस तो सकेंगे लोग उससे; कुछ तो हो सकेगा। कुछ काम तो आ जाएंगे।
तुम्हारे भगवान तो बिलकुल बेकाम हैं। बेकाम ही नहीं हैं, खतरनाक भी हैं। मंदिर, मस्जिद का सारा काम ही राजनीति है; उपद्रव है; आदमी आदमी को लड़ना है।
ठीक कहते हैं मलूक: पूजन को जांता भला जांता यानी चक्की। तो चक्की के दो पाट हैं, वे ही भले हैं। कम से कम इतना तो होगा: जो पीस खाए संसार अगर पत्थर ही पूजता है, तो चक्की पूजो; किसी काम आ जाएगी कम से कम लड़ाएगी तो ना; भूखे का पेट भर देगी। शायद चक्की को पीसते-पीसते तुम्हारे मन में भी भूखे के प्रति दया आ जाए। शायद तुम्हारे मन में भी प्रेम का अंकुरण हो। शायद प्यासे और भूखे के प्रति तुम्हारे मन में भी करुणा का आविर्भाव हो।
यह तो व्यंग में कह रहे हैं मलूकदास--कि अब तुम्हें पत्थर से ही मोह लग गया हो, तो चक्की के पत्थर अच्छे।
मगर आदमी अदभुत है। मैं जबलपुर बहुत वर्षों तक रहा। वहां एक मंदिर है, उसका नाम है--पिसनहारी की मढ़िया। मैं उत्सुक हुआ कि यह पिसनहारी की मढ़ियां क्या है! तो मैं गया। किसी पिसनहारी ने कभी पांच सात सौ साल पहले पीस-पीस के पैसे इकट्ठे करके यह मंदिर बनाया। तो लोगों ने उसकी याददाश्त में क्यों किया? उस मंदिर के शिखर पर उसकी चक्की लटका दी। अब उसकी पूजा हो रही है।
जब मैं पिसनहारी की मढ़िया गया, तो मैंने सोचा कि बाबा मलूकदास, तुमने अगर पिसनहारी की मढ़िया देखी होती, तो तुम कभी न कहते: पूजन को जांता भला, तो पीस खाए संसार!
लोग चक्की की भी पूजा कर रहे हैं; उसमें फूल चढ़ा रहे हैं! मंदिर में भोग लगता है; पुजारी है। चक्की की भी पूजा चल रही है!
तो बाबा मलूकदास शायद फिर व्यंग में भी कहने की यह हिम्मत न जुटाते। आदमी ऐसा मूढ़ है कि इस व्यंग को भी शायद समझे।
असली बात खयाल में लेने की है कि तुम्हारी भीतर परमात्मा बैठ है। तुम जब भी किसी की पूजा करोगे, तभी तुम अपने भीतर के परमात्मा का अपमान कर रहे हो। जब तक कि तुम्हें परमात्मा ही उपलब्ध न हो जाए, तब तक किसी की भी पूजा का कोई अर्थ नहीं है।
फिर अगर बिना पूजा किए चलता ही न हो, तो किन्हीं ऐसे व्यक्तियों का पूजन करना, जिनके भीतर से तुम्हें ज्योतिर्मय का कोई आविर्भाव होता हुआ मालूम पड़ता हो; जिनके भीतर दीया जलता हुआ मालूम पड़ता हो। इन्हीं को हमने तीर्थंकर कहा, अवतार कहा, भगवान कहा।
किसी ऐसे व्यक्ति को पूज लेना। मगर यह भी मजबूरी ही हो पूजने की तो। आवश्यक नहीं है। आवश्यक तो इतना ही कि तुम अपने भीतर ही देखना शुरू कर दो। तुम मंदिर हो। और तुम जिसकी तलाश कर रहे हो, वह तुम्हारे भीतर मौजूद है।
मक्का मदिना द्वारका, बदरी अरु केदार।
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार।।
तो मलूक कहते हैं: एक सूत्र की बात समझ लो कि दया सूत्र है। तुम्हारी पूजा-प्रार्थना से तुममें दया बढ़े, तो ठीक। तुम्हारे मंदिर मस्जिद से दया बढ़े, तो ठीक। तुम दया को कसौटी समझो, मापदंड समझो, यह तराजू है; इस पर तौल लेना।
दुनिया के सभी संतों ने यही कहा महावीर कहते हैं--अहिंसा। वह दया के लिए उनका नाम है। बुद्ध कहते हैं--करुणा। वह दया के लिए उनका नाम है। जीसस कहते हैं--सेवा। वह दया के लिए उनका नाम है। दया कहो, सेवा कहो, करुणा कहो, अहिंसा कहो--ये नाम भर के भेद हैं। लेकिन एक बात खयाल रखना: चारों शब्द स्त्री वाची हैं। दया, करुणा, अहिंसा, सेवा--सब स्त्रैण हैं। यह बात समझने जैसी है।
भाषा भी अकारण नहीं बनती। भाषा भी धीरे-धीरे किन्हीं कारणों से निर्मित होती है।
पुरुष का हृदय कठोर है। इसलिए कठोरता को हम पुरुषता कहते हैं। पुरुष का अर्थ होता है--कठोर। वह पुरुष ने बना हुआ शब्द है। पुरुष का चित्त आक्रामक है; हिंसात्मक है। पुरुष की सारी आकांक्षा दूसरों पर कब्जा कर लेने की है, मालकियत कर लेने की है। राज्य फैले, साम्राज्य बने।
पुरुष बड़ा मजा लेता है--शक्तिशाली होने में। उसकी सारी खोज शक्ति की है। कितनी मेरी सत्ता हो--कि प्रधानमंत्री, कि राष्ट्रपति--कि कितनी मेरी सत्ता हो, कि सारी पृथ्वी पर मेरा राज्य हो जाए--ऐसी पुरुष की आकांक्षा है। स्वभावतः जब तुम दूसरे पर सत्ता करोगे, तो दया न कर सकोगे। सत्ताधिकारी दयावान नहीं हो सकता--हो ही नहीं सकता। सत्ता के आधार ही हिंसा पर खड़े हैं। जब दूसरे की मालकियत करनी हो, तो दूसरे को मिटाना पड़ेगा।
दुनिया में दो ही बातें हैं: या तो तुम दूसरे के ऊपर चढ़ जाओ, नहीं तो दूसरा तुम्हारे ऊपर चढ़ जाएगा। इसके पहले कि दूसरा तुम्हारे ऊपर चढ़ जाए, तुम दूसरे पर चढ़ जाओ। यही तो मैक्यावेली ने कहा कि है कि अगर तुमने न लूटा तो लूटे जाओगे। इसके पहले कि कोई लूटे, तुम लूट लो: क्योंकि जो पहल लेता है, वही फायदे में रहता है।
पुरुष का शास्त्र तो मैक्यावेली का शास्त्र है। आक्रमण, हिंसा, बल, सत्ता, शक्ति। पुरुष तो धर्म में भी उत्सुक होता है, तो इसीलिए उत्सुक होता है कि शायद परमात्मा को पाकर सिद्धियां मिल जाए। शायद ध्यान लग जाए, तो चमत्कार की शक्ति आ जाए; जो अभी नहीं कर सकता हूं, कल कर सकूं। लेकिन उसका जोर सदा दुनिया को दिखलाने में है कि मैं कुछ हूं।
पुरुष का मौलिक आधार अहंकार है। जितने भी कोमल गुण हैं, वे स्त्री के गुण हैं: दया, ममता, करुणा, अहिंसा, सेवा--वे स्त्रैण गुण हैं। और तुम जान कर चकित होओगे कि हमने इस बात को स्वीकार किया--बहुत रूपों में।
तुमने बुद्ध के चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ देखी? या महावीर के चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ देखी? जैनों के चौबीस तीर्थंकरों में किसी को भी दाढ़ी-मूंछ नहीं है। न राम को, न कृष्ण की। तुमने दढ़ियल राम देखे? कि कृष्ण देखे? मामला क्या हुआ? इन सब में कुछ हार्मोन की कमी थी? मुखन्नस थे? क्या बात थी? इसमें कुछ कमी थी! एकाध में होती तो चल जाती। लेकिन ये सब के सब?
नहीं; इनको भी दाढ़ी थी। इनको भी मूंछें ऊगी थी। लेकिन हमने एक बात का प्रतीक चुना कि उनका चेहरा पुरुष जैसा हमने नहीं बनाया। क्योंकि इनके भीतर से पुरुषता समाप्त हो गई थी। इसके भीतर स्त्रैण तत्व का उदय हुआ था। इस सत्य की घोषणा के लिए हमने दाढ़ी-मूंछ बुद्ध, महावीर, कृष्ण, राम की नहीं बनाई। बहुत सोचकर...। ये यथार्थवादी मूर्तियां नहीं हैं; ये आदर्शवादी मूर्तियां हैं।
यह मत सोचना कि बुद्ध ऐसे लगते थे, जैसी उनकी मूर्ति है। न ऐसी बुद्धि के भीतर की अवस्था थी। उस भीतर की अवस्था को हमने चित्रित करने की को कोशिश की है। ये फोटोग्राफ नहीं हैं। इनका यथार्थ से कोई संबंध नहीं है। इनके भीतर जो घटना घटी थी, उसका इंगित है। इसलिए बुद्ध के चेहरे को देख कर तुम्हें स्त्रैण लगेगा। हाथ-पैर भी गोलाई लिए हैं, जैसे स्त्री के होते हैं। मस्कुलर नहीं है जैसे पुरुष का शरीर होता है, ऐसा नहीं है। क्षत्रिय थे; शरीर तो बलिष्ठ रहा होगा। सभी क्षत्रिय थे--कृष्ण, और राम, और बुद्ध, और महावीर, और सारे तीर्थंकर तो शरीर तो बलिष्ठ रहा होगा। शरीर तो जैसा पुरुष का शरीर होना चाहिए, वैसा रहा होगा। लेकिन हमने चित्रित किया है इस भांति, जैसे स्त्रैण हो। भीतर को कोमलता को इंगित किया है।
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार।
तुम्हारे भीतर जितने भी पुरुष गुण हैं, वे कठोर गुण हैं, वे शांत हो जाए और जितने स्त्रैण गुण हैं, वे जग जाए, बस, तो तुम्हारे जीवन में धर्म की शुरुआत हुई।
तो पत्थर की पूजा की जगह, फूल की पूजा ज्यादा अच्छी होगी। अब तू देखो, हम उलटा करते हैं। हम फूल तो तोड़ लेते हैं, पत्थर पर चढ़ा देते हैं। करना ऐसा चाहिए कि पत्थर को उठा कर फूल पर चढ़ा दें।
फूल कोमल है, उसको जा कर कठोर पर चढ़ा आते हैं। उस दिन बड़े सौभाग्य का दिन होगा, जिस दिन हम पत्थर को उठा कर फूल पर चढ़ा आएंगे। उस दिन हमने कोमल के प्रति ज्यादा सम्मान दिखाया। अभी हम कोमल को तोड़ते रहे हैं।
दया कसौटी है। तुम हिंदू हो या मुसलमान, कि ईसाई, कि जैन कि बौद्ध--दो कौड़ी की बात है। दयावान हो--तो बस, सब ठीक है: हिंदू हो, तो ठीक; मुसलमान हो, तो ठीक; ईसाई हो, तो ठीक। और दयावान नहीं हो, तो सब व्यर्थ है।
मोहम्मद एक गुफा में छिपने को आये हैं। उनका एक शिष्य उनके साथ है। दुश्मन उनके पीछे लगे हैं। बड़ा खतरनाक है क्षण। घोड़ों की आवाज पीछे से आ रही है। और वे गुफा के भीतर प्रवेश करने को ही हैं कि मोहम्मद ठिठक गये और उन्होंने अपने मित्र को भी कहा कि रुक, भीतर मत जा। उसने कहा: यह रुकने का वक्त नहीं है। भीतर चलें। किसी तरह छिप जाए। यह गुफा कारगर है; समय पर आ गई; भगवान की कृपा है।
मोहम्मद ने कहा: वह तो ठीक है। लेकिन देखता है--गुफा के द्वार पर मकड़ी ने अभी-अभी जाला बुना है--ताजा जाला है; मकड़ी अभी बुन ही रही है, उसे तोड़ना उचित नहीं है।
मित्र तो चकित हुआ। उसने कहा कि मकड़ी के जाले को मैं साफ किए देता हूं। इसमें तोड़ने की क्या बात है! पर मोहम्मद ने कहा: उसने बड़ी मेहनत से बनाया है। देखते हो! हम कोई आर गुफा खोज लेंगे। लेकिन मकड़ी के साथ कठोरता करना उचित नहीं है।
यह मुसलमान का लक्षण हुआ। यह ठीक अर्थों में धार्मिक का लक्षण हुआ। कठोरता जहां न रह जाए, जहां हृदय कोमल हो; पत्थर जैसा न हो, नवनीत जैसा हो--कोमल हो, फूल जैसा हो।
मक्का मदिना द्वारका, बदरी अरु केदार।
बिना दया सब झूठ है, कहे मलूक विचार।।
मलूक कहते हैं: तुम जाओ बदरी, तुम जाओ केदार--मक्का, मदीना, द्वारका, तुम भटको सारी दुनिया में--कुछ भी न होगा। तुम दया के मंदिर में प्रवेश कर जाओ और सब हो जाएगा।
कहै मलूक विचार, खयाल रखना: यहां विचार का वही अर्थ नहीं होता, जो तुम्हारे विचार का होता है। तुमने तो कभी विचार किया ही नहीं है। हां बहुत विचार तुम्हारी खोपड़ी से गुजरते हैं--यह बात सच है। मगर विचार तुमने कभी नहीं किया है। विचार करने के लिए जितना होश चाहिए, उतना होश तुममें नहीं है।
तुम्हारे भीतर तो दूसरों के विचार तैरते रहते हैं। किसी ने कुछ कह दिया, वह तुम्हारी खोपड़ी में समा जाता है। कहीं कुछ पढ़ लिया, वह समा गया। फिर इन्हीं के साथ तुम डांवाडोल होते रहते हो। तुमने कभी खुद कुछ विचारा है? तुम्हारे पास एक भी ऐसा विचार है, जो तुम्हारा हो? जो तुम कह सको प्रामाणिक रूप से--मेरा है!
तुम बड़े हैरान हो जाओगे; अगर तुम अपनी विचार की राशि में खोजने जाओगे तो तुम्हें शायद ही एकाध विचार मिले, जो तुम्हारा है--प्रामाणिक रूप से तुम्हारा है। तुम पाओगे--सब है; सब बासा है; सब किसी और का है। और अगर कभी तुम कोई एकाध विचार ऐसा भी पाओगे, जिसे तुम कह सको: मेरा है, तो वह भी तुम गौर करोगे, तो अनुभव में आ जाएगा कि वह भी दूसरों के विचारों का जोड़त्तोड़ है। कहीं से टांग ले ली, कहीं से हाथ ले लिया, कहीं से सिर ले लिया; एक पुतला खड़ा कर दिया।
लेकिन मौलिक विचार तो तभी संभव होता है, जब सब विचार रोकने की क्षमता तुममें आ जाती है; सब विचार रोक देने की क्षमता तुममें आ जाती है। जब तुम निर्विचार होने में कुशल हो जाते हो, तब तुम विचार करने में सफल होते हो। यह बात विरोधाभासी है, लेकिन ऐसा ही है।
जिस दिन तुम निर्विचार होने में समर्थ हो गये; जिस दिन तुम चाहो, तो समय बीतता जाए और तुम्हारे भीतर विचार की तरंग भी न उठेगी; जिस दिन तुम मालिक हो गए इस बात के...। अभी तो तुम मालिक नहीं हो। अभी तो तुम लाख चाहते हो--विचार न उठे, मगर विचार चलते चले जाते हैं। तुम उनसे कहते भी हो कि भाई, क्षमा करों; अब जाओ भी; अब जरा मुझे सो लेने दो। मगर वे तुम्हारी सुनते नहीं। वे मालिक बन बैठे हैं; तुम तो गुलाम हो। जब चले जाते हैं, तो ठीक। न जाए--तो न जाए; तुम्हारा कोई बस नहीं है। तुम बड़े बेबस हो।
जब मलूक कहते हैं--कहै मलूक विचार, तो वे यह कह रहे हैं कि जब निर्विचार शांत चित्त की दशा में मैंने देखा; जब मैंने आंख गड़ाई--जीवन के सत्य पर; जब मैंने निर्विचार चित्त के दर्पण में जीवन की झलक पाई, तो मैंने पाया: बिना दया सब झूठ है।
तो तुम्हारे मंदिर, मस्जिद, तुम्हारी पूजा-प्रार्थना-अर्चना सब झूठ  है; तुम्हारे शास्त्र, तुम्हारे वेद, कुरान--सब झूठ हैं। बिना दया सब झूठ है।
एक दया तुम्हारे भीतर आ जाए, तो परमात्मा का पहला चरण तुम्हारे भीतर पड़ा। एक दया तुम्हारे भीतर जा आए, तो तुम्हारा पहला संबंध परमात्मा से हुआ।
दया का अर्थ होता है: इस बात की प्रतीति कि जैसा मैं हूं, वैसे ही दूसरे भी है। जितना मूल्यवान मैं हूं, उतने ही मूल्यवान दूसरे भी हैं। अब मैं किसी का साधन की तरह उपयोग न करूंगा। सभी परम साध्य हैं; कोई साधन नहीं है। मैं अपनी पत्नी की उपयोग साधन की तरह अब न करूंगा। मैं अपने पति का उपयोग अब साधन की तरह न करूंगी। मैं अपने बेटे का उपयोग साधन की तरह न करूंगा। क्योंकि जिसका भी हमने साधन की तरह उपयोग किया, हमने उसके साथ अनैतिक संबंध जोड़े। जिसका हमने साधन की तरफ उपयोग किया, हमने उसके भीतर बैठे हुए परमात्मा की गरिमा स्वीकार नहीं की।
इमेनुएल कान्ट ने नीति की परिभाषा में यह कहा है कि वही कृत्य नैतिक है, जिसमें तुम दूसरे का साधन की तरह व्यवहार नहीं करते; जिसमें दूसरा स्वयं साध्य है--ऐण्ड इन इटसेल्फ; जिसमें दूसरा स्वयं साध्य है।
दया का अर्थ होता है: मैं जितना मूल्यवान, उतने ही मूल्यवान तुम हो--न जरा कम, न जरा ज्यादा। जिस दिन तुम देखते हो कि मेरा मूल्य सारे अस्तित्व का मूल्य है; जो मैं अपने लिए चाहता हूं, वही मैं दूसरे के लिए भी चाहूं।...
यहूदी फकीर हुआ--हिलले। एक नास्तिक हिलेल के पास आया और उस नास्तिक ने कहा कि सुनो...। और वह नास्तिक एक पैर पर खड़ा हो गया और उसने कहा। सुनो। मैंने सुना है कि तुम बड़े ज्ञानी हो। मैं ज्यादा बकवास में नहीं पड़ना चाहता। मैं नास्तिक हूं। मैं संक्षिप्त उत्तर चाहता हूं। मैं जितनी देर एक पैर पर खड़ा रहूं, उतनी देर में तुम उत्तर दे दो कि धर्म का सार क्या है?
हिलेल ने कहा: धर्म का सार इतना ही है--जैसा तुम अपने साथ व्यवहार करते हो, वैसा दूसरे के साथ करो। बस, इतना ही।
बात तो पूरी हो जाती है। इसमें ज्यादा धर्म का कोई सार नहीं है: बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार। फिर तुम भूल भी जाओ परमात्मा को, तो कोई हरजा नहीं; परमात्मा तुम्हें नहीं भूलेगा। और अभी तुम लाख परमात्मा को याद करो, तुम्हारे सब याद व्यर्थ है। परमात्मा तुम्हें याद नहीं करेगा। तुम्हारी एक ही पूजा स्वीकृत होगी; वही पूजा जिसमें दया सम्मिलित है। तुम्हारी एक ही पूजा अंगीकार होगी। फूलों के द्वारा नहीं; तुम्हारे हृदय की करुणा के द्वारा। करुणा के फूल तुम चढ़ाओ--परमात्मा के चरणों में। तुम्हारा जीवन ऐसा हो कि उससे किसी को चोट न पहुंचे।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हारा जीवन ऐसा हो कि तुम सदा इसका ही खयाल करते रहो कि किसी को चोट न पहुंच जाए। तुम्हारा जीवन ऐसा हो कि किसी को चोप न पहुंचे, तो भी दूसरों को चोट पहुंच सकती है, वह दूसरी बात है।
जीसस से बहुत लोगों को चोट पहुंची, नहीं तो वे सूली पर नहीं लटकाए जाते। यद्यपि जीसस ने किसी को चोट नहीं पहुंचानी चाही थी। बुद्ध पर भी लोगों ने पत्थर फेंके हैं, यद्यपि बुद्ध ने किसी को चोट नहीं पहुंचानी चाही थी।
तुम किसी को चोट न पहुंचाना चाहो, बस, इतना काफी है। तुम इतना ध्यान रखो कि सब का मूल्य आत्यन्तिक है। फिर भी किसी को चोट पहुंच सकती है। बहुत बार तो ऐसा होता है: तुम्हारा आनंदित होना ही दूसरों को चोट पहुंचाने के लिए काफी हो जाता है। लोग इतने दुःखी हैं कि तुम्हें आनंदित देखकर उनके बरदाश्त के बाहर हो जाता है। लोग इतने अंधेरे में खड़े हैं, और तुम्हारी आंखों में रोशनी? वे तुम्हारी आंखें फोड़ देने को उत्सुक होते हैं। लोग इतने परेशान हैं और तुम निश्चिंत बैठे हो--समाधिस्थ! यह बरदास्त के बाहर हो जाता है।
लोग नहीं कहते कि तुम उनकी नींद तोड़ो; वे अपने सपनों में खोए हैं। और तुम चाहते हो, उनके हित में--उनकी नींद टूट जाए। उनके ही हित के लिए तुम प्रयास करते हो!
बुद्ध का एक भिक्षु पूर्ण बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया। और बुद्ध ने उसे कहा: अब मेरे पास रहने की तुझे कोई जरूरत नहीं, क्योंकि अब तो तू वही हो गया है--जो मैं हूं। अब तू जा। दूर--दूर-जहां-जहां सोए लोग हैं, वहां-वहां जा। जागने की खबर ले जा। यह सुगंध, जो तुझे मिली है--बिखरा हवाओं में; पहुंचने दे अधिकतम लोगों तक। यह जो ज्योति तेरे भीतर जगी है, उसकी किरणें जितने लोगों को मिल जाए, उतना अच्छा। जा तू कहां जाना चाहेगा--पूर्ण!
तो उसे पूर्ण ने कहा...। बिहार का एक हिस्सा था, जहां कोई भिक्षु जाता नहीं था; दुष्ट लोग थे वहां के। उस हिस्से का नाम था--सूखा। भूखे लोग थे वहां के; जिनके हृदय बिलकुल सूख चुके थे; जिसमें रस-धार थी ही नहीं।
उसने कहा: मैं सूखा प्रांत जाऊंगा। बुद्ध ने कहा: वहां न जा, तो अच्छा। यहां के लोग बड़े दुष्ट हैं; वे तुझे सताएंगे। उसने कहा: इसलिए तो उनको मेरी जरूरत है; कोई जाए, उनको जगाए। बुद्ध ने कहा: तेरा इरादा तो अच्छा मेरी जरूरत है; कोई जाए, उनको जगाए। बुद्ध ने कहा: तेरा इरादा तो अच्छा है, लेकिन मैं तीन प्रश्न पूछना चाहता हूं। पहला प्रश्न--तू जा कर उनसे भली बातें कहेगा। लेकिन वे भली बातें उन्हें जैसी लगेगी। वे तुझे गालियां देंगे। वे तेरा अपमान करेंगे। वे तेरी दुर्दशा करेंगे। जब वे तुझे गालियां देंगे, तो तुझे क्या होगा पूर्ण ? पहल तू मुझे इसका उत्तर दे।
पूर्ण ने कहा: इसमें होने की क्या बात है! आप जानते हैं; उत्तर क्या देना है? दे मुझे गालियां देंगे, तो मैं सोचूंगा--कितने भले लोग हैं, गालियां ही देते हैं, मारते नहीं। मार भी सकते थे।
बुद्ध ने कहा: चल, दूसरे प्रश्न। अगर वे तुझे मारें, फिर? उसने कहा: आप भी क्या पूछते हैं! आपको पता है। जब वे मुझे मारेंगे, तो मैं उन्हें धन्यवाद दूंगा--कि कितने भले लोग हैं; सिर्फ मारते हैं--मार ही नहीं डालते! मार भी डाल सकते थे।
बुद्ध ने कहा: चल यह भी जाने दे। अब तीसरा आखिरी सवाल। अगर वे तुझे मार ही डालें, तो मरते-मरते मुझे क्या होगा? पूर्ण ने कहा: आप फिजूल की बातें पूछते हैं। आपको पता है कि मुझे क्या होगा। मरते वक्त मैं सोचूंगा--कितने भले लोग है; उस जीवन से छुटकारा दिला दिया, जिसमें कोई भूल चूक हो सकती थी।
यह दया की आखिरी पराकाष्ठा है।
तो जब मैं तुमसे कहता हूं कि दूसरे को चोट न पहुंचे, तो इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे को चोट नहीं ही पहुंचेगी। तुम मत पहुंचाना। तुम्हारा अभिप्राय न हो। बस, फिर भी पहुंच सकती है। पहुंचेगी ही। सुकरात से पहुंची। जीसस से पहुंची। मंसूर से पहुंची। पहुंचेगी ही।
लोग पागल हैं। और जब किसी व्यक्ति के जीवन में विक्षिप्तता समाप्त होती है, तो वह इतना अजनबी मालूम पड़ने लगता है--लोगों को कि कि उसे बरदाश्त करना मुश्किल हो जाता है। उसकी मौजूदगी खलने लगती है। अगर वह सही है, तो फिर हम सब गलत हैं। यह मुश्किल हो जाता है।
सुकरात जो जहर दिलाना पड़ा, क्योंकि सुकरात की मौजूदगी अखरने लगी। सुकरात अगर सच है, तो फिर सारे लोग झूठ हैं। यह बात ही स्वीकार करना बहुत कठिन होता है कि मैं झूठ हूं।
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार। तो तुम अपने जीवन में एक कसौटी पकड़ लो: तुम्हारा ध्यान, तुम्हारी पूजा-प्रार्थना, तुम्हारी भक्ति अगर दया बढ़ाती हो, तो समझना कि तुम मार्ग पर हो, तो इशारा ठीक जगह पड़ रहा है। अगर तुम्हारी दया घटती हो, तो समझना कि गलत हो रहा है।
मोहम्मद एक दिन युवक को लेकर मस्जिद गये। पहली दफा युवक मस्जिद गया। सुबह की प्रार्थना, नमाज पढ़ने के बाद जब वापस लौटने लगे, तो उस युवक ने कहा: हजरत देखते हैं कि लोग कितने पापी हैं--अभी तक बिस्तरों में पड़े हैं! कई तो अभी तक सो रहे हैं, घुर्रा रहे हैं। इनका क्यो होगा हजरत? ये लोग नरक में पड़ेंगे?
मोहम्मद ठिठक कर खड़े हो गये। उन्होंने कहा। मुझसे बड़ी भूल हो गई कि तुझे मैं मस्जिद ले गया। तू रोज सोया रहता था, तो कम से कम ऐसा तो नहीं सोचता था कि लोग पापी हैं। यह तो फायदा न हुआ, नुकसान हो गया। आज तू पहली दफा मस्जिद क्या हो आया, तेरे मन में यह खयाल उठने लगा कि लोग पापी है और तू पुण्यात्मा है! उस युवक से कहा: भाई, तू जा और सो जा और भूल जा यह बात, और फिर मस्जिद जाता हूं। उसने पूछा: अब आप किसलिए जाते हैं? उन्होंने कहा: मुझे दुबारा फिर नमाज पढ़नी पड़ेगी और परमात्मा से क्षमा भी मांगनी पड़ेगी कि मुझसे बड़ी भूल हो गई कि इस आदमी को मैं उठा लाया। यह अच्छा भला था--सोता था। कम से कम दूसरों के प्रति अनादर तो न था, कठोरता तो न थी। अब यह उनको नरक में डालने की सोच रहा है! इसने एक प्रार्थना की है और इसके इरादे देखो!
जब भी तुम किसी आदमी में ऐसा देखो कि उसका धर्म उसके अहंकार को बढ़ा रहा है, तो समझना--भूल हो गई। जब तू अपन भीतर ऐसा देखो कि तुम्हारा धर्म तुम्हारी दया को कम कर रहा है, तो समझना कि भूल हो गई। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम्हारे सौ तथाकथित महात्माओं में निन्यानबे महात्मा नहीं हैं। उनके इरादे बड़े गहरे हैं--तुमको नरक में डालने के। वे बड़े हिसाब लगा रहे हैं कि कैसी-कैसी आग में जलाए जाओगे। कैसे-कैसे कड़ाहों में डाले जाओगे।
जिन्होंने शास्त्रों में नरक के विवरण लिखे हैं, वे भले लोग नहीं हो सकते। उनके भीतर दृष्टता रही होगी। दया उनके भीतर नहीं होगी। अगर दया का जरा भी स्वर होता, तो नरक की धारणा ही नहीं बनती। स्वर्ग तो उन्होंने अपने लिए रखा है, और नरक सबके लिए रखा है। नरक उन सबके लिए, जो उनसे राजी नहीं हैं--वे सब नरक में सड़ाए जाएंगे। ये ऊपर से कितने ही महात्मा दिखाई पड़ते हों, भीतर ये शैतान के शिष्य हैं--महात्मा नहीं हैं।
अब यह दूसरी बात है कि तुम किस भांति लोगों से बदला लेते हो; किस तरह उन्हें सताते हो। नरक में डाल कर सताओगे, लेकिन सताने की इच्छा कायम है। दया तुम्हारे भीतर जरा भी नहीं है। इसको स्मरण रखना।
सब कोउ साहेब बंदते, हिंदू मुसलमान।
साहेब तिसको बंदता, जिसका ठौर इमान।।
और कहते मलूक: जिसके हृदय में दया आ गई, वह फिर परमात्मा को न भी बंदगी करे, तो चलेगा। उसकी बंदगी तो प्रतिक्षण हो रही है। उसकी दया ही उसकी बंदगी है। वही उसकी नमाज है। वह झुका ही है नमाज में।
और साहेब तिसको बंदता...। और एक अपूर्व घटना घटती है कि फिर भक्त भगवान को नहीं भजता; भगवान भक्त को भजता है--साहेब तिसको बंदता।
जिस दिन तुम्हारे जीवन में दया ही दया होती है, उस दिन परमात्मा तुम्हारी याद करता है।
तुम्हारे याद किए क्या होगा? जब तक तुम्हें याद नहीं करे--मिलन नहीं होगा। जब तक यह सारा अस्तित्व तुम्हारे लिए आतुर न हो जाए--स्वागत के लिए, तुमसे मिलने को तत्पर न हो जाए, तब तक कुछ भी न होगा।
सब कोउ बंदते, हिंदू मुसलमान। यह बंदगी तो चलती है--औपचारिक है। साहेब तिसको बंदता, जिसका ठौर इमान।
इन शब्दों पर ध्यान देना--जिसका ठौर इमान; जिसकी श्रद्धा ठहर गई; जिसके चित्त का दर्पण अब विचारों से चंचल नहीं होता; जिसका ईमान कंपित नहीं होता--अकंप हो गया; जिसके भीतर की चेतना निष्कंप जलती है। जिसका ठौर ईमान।
मन तो चंचल है। मन तो ऐसा है, जैसे हवा के झोंकों में दीए की ज्योति डोलती रहती है--कभी इधर, कभी उधर; डोलती ही रहती है; एक क्षण को भी थिर नहीं। इस अथिर मन के साथ कैसी शांति! इस अथिर मन के साथ कैसा सुख? इस अथिर मन के साथ जो जुड़े हैं, उनके जीवन में कभी आनंद का कोई स्वाद संभव नहीं है। दुःख ही वे पाएंगे।
पर एक ऐसी दशा भी है चैतन्य की, जब चित्त ठहर जाता है। जब कोई तरंगें नहीं उठती; झील शांत होती है। एक लहर भी नहीं उठती। झील बिलकुल शांत हो जाती है। उस शांत झील में ही प्रभु का प्रतिबिंब बनता है, प्रभु की छबि बनती, प्रभु की छबि उभरती।
मंदिरों में नहीं बैठा है प्रभु; तुम्हारी श्रद्धा जब ठहर जाएगी, तब तुम उसे अपने भीतर बैठा हुआ पाओगे।
और ठीक कहते हैं मलूकदास--साहेब तिसको बंदता--उस दिन तुम पाओगे कि साहब तुम्हारी बंदगी कर रहा है। क्योंकि तुम साहब ही हो। तुम एक क्षण को भी कुछ और नहीं हो। तुम्हारे अपना स्मरण भूल गया है अन्यथा तुम परमात्मा हो।
तुम्हें अपनी याद भूल गई है। तुम भूल ही गए कि तुम कौन हो। और जब तक यह मन कंप रहा है, तब तक तुम पहचान भी न सकोगे कि तुम कौन हो। इस कंपते मन पहचानना बहुत मुश्किल है।
ऐसा ही समझो कि तुम एक साथ में कैमरा लेकर यहां तस्वीर उतारने आ जाओ, और तुम्हारे दोनों हाथ कंप रहे हैं, तो तस्वीर तो बनेगी ही नहीं। और जब तुम फिल्म को साफ करके तैयार करोगे, तो तुम पाओगे: कुछ समझ में नहीं आता; रंग ही रंग छितरे हैं। सब खंड-खंड छितरे हैं। कोई तस्वीर साफ नहीं बनती।
मन इतना कंप रहा है, कि सत्य तो सामने खड़ा है, लेकिन तस्वीर कैसे बने! यह मन थोड़ा ठहरे, यह श्रद्धा थोड़ी रुके, थोड़ा शांत हो, तो तस्वीर अभी बन जाए।
तुमने देखा न, झील पर जब अंधड़ चलता है, और बहुत लहरें होती हैं; आकाश में चांद भी हो, तो भी चांद का प्रतिबिंब नहीं बनता। खंड-खंड चांद बिखर जाता है--पूरी झील पर। पूरी झीन पर चांदी हो जाती है। मगर तुम पकड़ न पाओगे कि चांद कहां है। जब झील शांत हो जाएगी, तब सारी चांदी सिकुड़ कर आ जायेगी एक जगह; चांद बन जाएगी।
परमात्मा सब तरफ छितरा हुआ मालूम पड़ता है, इसलिए उसे हम देख नहीं पाते हैं; उसकी प्रतिमा बन नहीं पाती।
परमात्मा को खोजने जाने की कहीं भी जरूरत नहीं है; सिर्फ चित्त की थिरता खोजनी है।
जिसका ठौर इमान...। कृष्ण ने जिसको स्थितप्रज्ञ कहा है--जिसकी प्रज्ञा ठहर गई, उसी के लिए मलूकदास कहते हैं: जिसका ठौर इमान।
दया धर्म हिरदे बसै, बोलै अमरित बन।
तेई ऊंचे जानिए, जिसके नीचे नैन।।
दया धर्म हिरदे बसै बोलै अमरित बैन। और जिसकी वाणी में अमृत है...। लेकिन अमृत होता तभी, जब दया धर्म हृदय में होता है। जब करुणा का सागर हृदय में होता है, तब वाणी में अमृत होता है।
वाणी का अमृत कोई वकृतत्व की कला नहीं है। वाणी के अमृत से अर्थ--कोई बहुत वक्ता है--ऐसा हनीं है। वाणी में अमृत का अर्थ होता है: जिसके शब्दों में निःशब्द का स्वर है; जिसके शब्द खाली देह-मात्र नहीं हैं, जिसके शब्द के भीतर आत्मा भी ज्योतिर्मय है। जिसके शब्द केवल शब्द नहीं हैं, जिसके शब्दों में छिपा शून्य भी है।
जैसे तुम्हारी देह है; आज भीतर विराजमान है परमात्मा, तो तुम जीवंत हो। कल सांस उड़ जाएगी, पखेरू जा चुका होगा, देह यही होगी, लेकिन प्रियजन जल्दी से अर्थी तैयार करने लगेंगे: सब कुछ वही है; जरा सी बात बदल गई: भीतर जो रहता था, अब नहीं है, तो लाश हो गई। कल तक प्यारी देह थी, आज अर्थी पर रखने योग्य हो गई।
शब्दों के साथ भी ऐसा ही है। पंडित बोलता है, तो उसके शब्दों में केवल लाश होती है। उसका अपना अनुभव तो नहीं होता, जिससे वह आत्मा डाल दे। ज्ञानी जब बोलता है, तो उसके शब्द में अमृत होता है। अमृत का अर्थ है: उसके शब्द निष्प्राण नहीं होते, सप्राण होता हैं। उसके शब्द धड़कते हैं। उसको शब्दों में श्वास होती है। उसके शब्दों में जीवन होता है। उसके शब्द को तुम छुओगे, तो तुम्हें पता चलेगा। उसके शब्द मुरदा नहीं हैं।
बोलै अमरित बैन, दया धर्म हिरदे बसै...। लेकिन यह तभी संभव होता है, जब भीतर करुणा का जन्म हो गया हो। तब उस करुणा में डूब कर आते हुए शब्द अमृत हो जाते हैं। इन्हीं अमृत वचनों को हमने शास्त्रों में इकट्ठा किया है--उपनिषद में, कुरान में, ताओत्तेह-किंग में, गीता में हमने इन्हीं अमृत वचनों को इकट्ठा किया है। लेकिन मुश्किल यह है कि जैसे ही तुम इकट्ठा करते हो, वह अमृत नहीं रह जाते।
कृष्ण ने जब अर्जुन से बोल, तब अमृत थे; कृष्ण के कारण अमृत थे। कृष्ण की मौजूदगी उन शब्दों में डोल रही थी। कृष्ण का रूप-रंग उन शब्दों को लगा था। कृष्ण के भीतर से अभी आए थे; अभी जाते थे। अभी कृष्ण की सुगंध उन शब्दों के आसपास तैर रही थी। अर्जुन ने जब उन्हें सुने, तो वे ताजे थे। अब जब तुम गीता में पढ़ते हो, तब मुरदा हैं।
इसलिए सदा से एक बात महत्वपूर्ण रही है कि अगर तुम जीवित सदगुरु को खोज सको, तो सब शास्त्रों को छोड़ कर जीवित सदगुरु को खोज लेना। क्योंकि वहां अभी शास्त्र जीवित है। सदगुरु का इतना ही अर्थ होता है कि जहां अभी शास्त्र जीवित है। और शास्त्र का इतना ही अर्थ होता है: किसी सदगुरु के वचन, जो अब जीवित नहीं रहे। लेकिन रह गई है, सांप चला गया है।
दया धर्म हिरदे बसै, बोलै अमरित बैन।
तेई ऊंचे जानिए, जिनके नीचे नैन।।
और उन्हीं को समझना कि पहुंच गए, जिनको पहुंचने का दंभ ही न हो। निरअहंकार में जो जीते हों...। अब इसे समझना। यह थोड़ा जटिल मामला है। क्योंकि आदमी ने इतने झूठे सिक्के पैदा किए हैं, इसलिए बातें बहुत उलझ गई हैं।
तीन शब्द खयाल करना। एक शब्द है अहंकार; दूसरा शब्द है विनम्रता; और तीसरा शब्द है--निरअहंकार। विनम्रता झूठा, थोथा शब्द है। विनम्र का आदमी होता है। विनम्र आदमी कहता है: मैं ना कुछ। लेकिन तुम्हारी आंखों की तरफ देखता है कि देखो, मैं ना कुछ! स्वीकार करो--कि मैं ना कुछ। सुनते हो--कि मैं ना कुछ। और अगर तुम उससे कहो कि मैं तो आपसे भी बड़ा ना कुछ, तो वही नाराज हो जाता है; वहीं परेशान हो जाता है।
ना कुछ में भी होड़ लगी है। ना होने के दावे में भी अहंकार पीछे के दरवाजे से प्रवेश कर रहा है।
विनम्र आदमी निरहंकारी नहीं होता। विनम्रता अहंकार को दबा लेती है, अहंकार की जहर पर खूब मीठी शक्कर को परतें चढ़ा देती है। इसलिए विनम्र आदमी में तुम सादा अहंकार पाओगे--छिपा हुआ, प्रकट, भूमिगत हो गया, अंडरग्राउंड चला गया; मगर मौजूद है।
निरहंकार का अर्थ होता है: न अहंकार रहा, न विनम्रता रही। क्योंकि अहंकार ही न रहा, तो अहंकार के साथ जुड़ी हुई विनम्रता भी नहीं रह जाएगी।
फिर मलूकदास क्यों कहते हैं: जिनके नीचे नैन? क्योंकि विनम्रता का आमतौर से हम यही अर्थ करते हैं--जो सदा नीचे देखते हैं, जो नीचा नैन रखते हैं। नीचे नैन अगर तुम इसलिए रखते हो कि चेष्टा कर रहे हो, तो विनम्रता। और नीचे नैन अगर सहज हो गए हैं--तो निरहंकार। दोनों में फर्क है।
अगर चेष्टा करके तुम नीचे नैन रख रहे हो, प्रयास करना पड़ रहा है, दबाए बैठे हो किसी चीज को, तो फिर झूठ बात है। अनायास सहज हो गया है...। और रखो भी कहां नैन को! नीचे न रखो? जैसे देखा, कभी वृक्ष पर जब फल लग जाते हैं। और फलों से डाल भर जाती है, तो डाल झुक जाती है। यह झुकना बड़ा और है। ऐसे ही आंख जब भर जाती है--प्रभु के दर्शन से, तो झुक जाती है।
जब आंख भरपूर हो जाती है प्रभु से, तो फिर अब क्या आंख उठाने को जगह रही! आंख झुक जाती है। यह झुकाव ऐसा ही है, जैसे वृक्ष की डाली झुक जाती है--फलों से लादकर। तेई ऊंचे जानिए, जिनके नीचे नैन।
जेते सुख संसार ले, इकट्ठे किए बटोर।
कन थोरे कांकर घने, देखा फटक पछोर।।
बड़ा प्यारा सूत्र है: जेते सुख संसार के, इकट्ठे किए बटोर। कहते मलूकदास: सब सुख देख लिए; सब बटोर कर देख लिए--यह बात खयाल रखना। बहुत लोग हैं--इस देश में कम से कम, खास करके--जो सदपुरुषों की वाणी सुनकर भाग खड़े होते हैं संसार से। अभी उन्होंने सब सुख बटोर कर देखे भी नहीं थे। ये जो कच्चे भाग जाते हैं, इनका मन बड़ा तड़फता है--वापस लौट आने को। ये चले जाए हिमालय पर, लेकिन सोचेंगे बाजार की। ये बैठ जाए गुफा में, लेकिन सोचेंगे--पत्नी-बच्चों की। ये कहीं भी चले जाए, कुछ फर्क न पड़ेगा।
मैं भर्तृहरि के जीवन में एक उल्लेख पढ़ता था। भर्तृहरि सम्राट हुए। सम्राट होते ही इन्होंने अपने वजीरों को बुलाया और एक बड़ी अनूठी आज्ञा दी। आज्ञा यह थी कि जितने भी सुख संभव हो संसार में, मैं सब भोगना चाहता हूं। वजीरों ने सोचा: खूब भोगी--सम्राट हो गया है। पहले दिन ही सिंहासन पर बैठा है और कहता है: जितने सुख हो संसार में, सब भोग लेना है! एक भी छोड़ना नहीं है।
उन्होंने कहा: महाराज, जो भी बन सकेगा, हम करेंगे। सब सुख जुटा देंगे। आप मालिक हैं। आप आज्ञा दें।
दूसरी बात भर्तृहरि ने कही; दूसरी यह कि एक सुख एक ही बार देखना है--दुबारा नहीं, क्योंकि फिर क्या सार है! तो खयाल रहे: जो वस्त्र मुझे एक दफा पहनने दिए जाए, दुबारा न दिए जाए। और जो स्त्री एक बार मेरे पास लाई जाए, दुबारा न लाई जाए। और जो भोजन मुझे एक बार परोसा जाए, दुबारा न परोसा जाए।
वजीरों ने कहा: ऐसा ही होगा। थोड़े तो दिक्कत में पड़े। और महीने दो महीने में दिक्कत बहुत साफ हो गई। अब कहां रोज-रोज नए भोजन लाओ! जो सब्जी दफे खाली--खतम हो गई। जो फल एक बार चख लिया--समाप्त हो गया।
साल बीतते-बीतते तो वजीर पागल होने लगे कि कहां से इंतजाम करो! लाओ कहां से? सब छान डाले उन्होंने। दूर-दूर प्रांत, जहां-जहां जो मिल सकता था। न मालूम कितनी स्त्रियां लाए; कितने वस्त्र लाए; न मालूम कितने भोजन लाए। लेकिन सब चुकने लगा। साल पूरा होते-होते वजीरों ने कहा: महाराज, क्षमा करें। हम पागल हुए जा रहे हैं। रोज-रोज नया कहां से लाए?
तो भर्तृहरि ने कहा: सब चुक गया? उन्होंने कहा: सब चुक गया। अब हमें कुछ नहीं सूझता। तो भर्तृहरि कहा कि बस, ठीक है; बात समाप्त हो गई; अब मैं जंगल जाता हूं।
उन्होंने कहा: क्यों? भर्तृहरि ने कहा: देख लिया। और एक दफा चख लिया; अब दुबारा उसी को चखने से क्या मिलेगा? जब एक बार चखने से नहीं मिला, तो दुबारा उसी को चखने से क्या मिलेगा? जो मिलना होता, तो पहली बार में मिल आता। अब दुबारा मैं वही हूं, चीज भी वही है, अब इसको पुनरुक्त करते रहने से क्या सार है? इस व्यर्थ की दौड?-धूप में कोई अर्थ नहीं है। अब मैं जंगल जाता हूं।
तब तो वजीर बड़े हैरान हुए। वे तो सोचते थे: कहां का भोगी राजा मिल गया! तब उनको पता चला कि इस भोग के पीछे कोई अनूठी त्याग की प्रक्रिया छिपी थी। किसी बड़े सूत्र पर भर्तृहरि काम कर रहा था।
भर्तृहरि ने दो शास्त्र लिखे हैं। पहला शास्त्र लिया--शृंगार शतक--शृंगार के सूत्र। ऐसे सूत्र किसी ने नहीं लिखे, क्योंकि किसी ने ऐसा शृंगार जाना नहीं।
मलूकदास यही कह रहे हैं: जेते सुख संसार के इकट्ठे किए बटोर। सब बटोर लिया और सब सुख भोग लिए--तो शृंगार शतक लिखा। और फिर जब सब छोड़ कर गए, तो दूसरा शास्त्र लिखा--वैराग्य शतक। शृंगार से ही वैराग्य का जन्म हुआ। भोग से योग का जन्म हुआ।
संसार को देखने से ही, पहचानने से ही परमात्मा की स्मृति आनी शुरू होती है। इसलिए मैं तुमसे कहता हूं: भागना मत। मैं अपने संन्यासी को कहता हूं--भाग कर कहीं जाना मत। जहां खड़े हो, वहां जो उपलब्ध है, उसे ठीक-ठीक भोग लो। भोग में ही मुक्ति है; भोग से ही मुक्ति है।
भोग ओर योग विपरीत नहीं हैं। योग का जन्म भोग की अंतरतम अवस्था में पैदा होता है। इसलिए भागो मत। भाग कर कहीं कोई सार नहीं है। भगोड़े मत बनो। भागो नहीं--जानो। जो भोग रहे हो--उसे जाग कर भोगो, ताकि पुनरुक्ति न हो; ताकि बार-बार उसी-उसी में न दोहराते रहो। गाड़ी के चाक की तरह मत घूमो। हर अनुभव से तुम बोध ले लो और जल्दी ही तुम पाओगे कि ठीक कहते हैं :
जेते सुख, संसार के, इकट्ठे किए बटोर।
कन थोरे कांकर घने, देखा फटक पछोर।।
खूब...जैसे स्त्रियां सूप में साफ करती है ना--चावल, गेहूं--देखा फटक पछोर; ऐसा सूप में--बुद्धि के, होश के सूप में सब फटक पछोर कर देख लिया: कन थोरे कांकर घने। कन तो कहीं-कहीं हैं, सुख तो कहीं-कहीं है और कंकड़ ही कंकड़ ज्यादा हैं। कन थोरे कांकर घने...। सूख तो क्षणभंगुर है, दुःख की लंबी कतारें लगी हैं।
यह बात भी समझने जैसी है कि मलूकदास की सचाई के प्रति ऐसी निष्ठा है कि अतिशयोक्ति नहीं करते। आमतौर से ज्ञानी कहेंगे: संसार से बिलकुल सुख नहीं है। मलूक ने यह नहीं कहा। यह एक बच्चे आदमी की परख है।
आमतौर से महात्मा कहते हैं: संसार में सुख है ही नहीं। अतिशयोक्ति हो गई यह। अगर संसार में सुख बिलकुल न हो, तो इतने लोग कब तक भटके रहें--कैसे भटके रहें! कुछ तो होना ही चाहिए। कन थोरे कांकर घने। माना कि कंकड़-पत्थर बहुत हैं, लेकिन यहां थोड़ी-थोड़ी सुख की भी बूंदें पड़ती हैं; ऐसा नहीं कि नहीं पड़ती। इसको मैं कहता हूं: बड़ी निष्ठा, बड़ी ईमानदारी। नहीं तो सहज यही होता है मन में कि अब क्या रखा है संसार में! सब व्यर्थ; सब दुःख।
इस दृष्टि से मलूकदास के वचनों में बुद्ध के वचनों से भी ज्यादा सचाई है। बुद्ध कहते हैं--सब दुःख है: जन्म दुःख, जरा दुःख, जीवन दुःख, मरण दुःख--सब दुःख। यहां दुःख ही दुःख है।
यह अतिशयोक्ति है। यह बात सच नहीं है। शायद उन्होंने करुणावश ही कही है; शायद तुम्हें देखकर कही है--कि तुमसे अगर यह कहा जाए कि थोड़ा भी यहां सुख है तो शायद तुम उस थोड़े के लिए अटके रह जाओ। तुम कहो: थोड़ा तो है न! तो फिर ठीक है, कन थोरे कांकर घने, तो कांकर अलग कर देंगे और कन-कन भोग लेंगे। तो ठीक से फटकेंगे, पछोरेंगे; तो बाबा मलूकदास, दिखता है: आपने ठीक से नहीं फटका-पछोरा! हम बीन लेंगे--ठीक से बीन लेंगे। कंकड़ कंकड़ अलग कर देंगे, कन कन बीन लेंगे सुख के और मजा कर लेंगे।
तो छोड़ने की क्या जरूरत है?
शायद बुद्ध ने इस करुणावश, इस बात को ध्यान में रखकर कहा होगे: सब दुःख है। लेकिन यह बात सच नहीं है। यहां सब दुःख नहीं है; थोड़ा-थोड़ा सुख भी है। उसी सुख के सहारे तो दुःख चल रहा है। अगर दुःख ही दुःख हो, तो सभी के सभी आदमी एकदम छलांग लगाकर बाहर हो जाए।
यहां कुछ न कुछ सुख की प्रतीति होती है। झलक ही सही, मगर मिलती है। क्षण भर को सही, मगर सुख उतरता है। पूरा सूरज न भी आता हो, तो भी किरण आती है। और उसी किरण की आशा मग आदमी बंधा रह जाता है। उसी एक किरण के सहारे सोचता है कि किरण आ गई, तो कल सूरज भी आ जाएगा। कण आया, तो सागर भी आ जाएगा। थोड़ी प्रतीक्षा करो; थोड़ा और श्रम करो; थोड़ा और आयोजन करो।
लेकिन मलूकदास का वचन सत्य के प्रति बिलकुल साफ है। वे कहते हैं: ऐसा नहीं है कि नहीं ही यहां सुख हैं; कन थोरे कांकर घने। लेकिन कंकड़ बहुत हैं; इतने ज्यादा हैं कि इतने थोड़े से कणों के लिए इतने कंकड़ झेलना नासमझी है।
और फिर अगर इनके जरा ऊपर उठो, तो आनंद ही आनंद है--जहां कंकड़ हैं ही नहीं।
एकाध फूल कभी, और हजारों-लाखों कांटे हैं। इस एक फूल के लिए इतने कांटे झेलना बुद्धिमानी नहीं है। फूल है; मगर एकाध और कभी कभार।
तुम जरा सोचो: तुम्हारी जिंदगी में कब सुख आया? पीछे लौट कर देखो। पचास साल जी लिए, चालीस साल जी लिए, कब सुख आया? धोखा मत देना; ऐसा मान मत लेना कि फलां दफा आया था। नहीं गौर से ही देख लेना। क्योंकि आदमी धोखा देने में भी कुशल है। यह सोचता है: देखो, उस बार आया था, इस बार आया था। सिर्फ इसलिए कह लेता है, ताकि अपने सामने कम से कम अपनी बुद्धिमानी तो बनी रहे; नहीं तो बड़े मूरख हो जाएंगे--कि पचास साल जिए और सूख आए ही नहीं! तो क्या कर रहे थे? तो क्यों सिर मारते रहे पचास साल?
मेरे पास लोग आते हैं। कोई कहता है कि मैं बीस साल से संन्यासी हूं। योग साधता, ध्यान साधता। मैं उनसे पूछता हूं: कुछ मिला? वे कहते हैं: हां, कुछ कुछ मिला। मैंने कहा: ईमानदारी से...? क्योंकि बीस साल जिसने योग साधा है, वह यह भी तो नहीं कह सकता कि कुछ नहीं मिला, नहीं तो बीस साल क्या...! बिलकुल जड़बुद्धि हो? क्यों बर रहे थे बीस साल?
नहीं, वह कहता है: कुछ कुछ। और जब मैं उसे कुरेदता हूं, खोदता हूं, तो थोड़ी देर में वह कह देता है कि नहीं, मिला तो कुछ भी नहीं। फिर क्यों कहते हो कि कुछ-कुछ?
तुम जरा लौट कर देखना अपने पीछे। पचास साल जी लिए कि साठ साल जी लिए, इसमें कितने क्षण आये थे, जिनको तुम सुख के कह सकोगे? और जो भी क्षण तुम्हें मालूम पड़े कि सुख के थे, उनकी खूब जांच-परख करना; सब तरफ से घूम कर जांच-परख करना। थे--या मान लिए थे? शायद कभी तुम एकाध दो क्षण पाओ। तब तुम्हें बाबा मलूकदास का वचन समझ में आएगा। और उन थोड़े क्षणों के लिए तुमने कितने कांटे झेले हैं। कितना दुःख पाया है! दोनों में कोई अनुपात नहीं है।
ऐसा ही समझा कि एक आदमी हजारों मील चले मरुस्थल में और फिर एक घास के पत्ते पर एक ओस की बूंद मिले पीने को। जरा चख भी न पाए कि गई! जीभ से लगी नहीं कि गई। कंठ तक भी पहुंच पाएगी। एक बूंद कहां तक पहुंचेगी! बस, जरा सा स्वाद आया, खयाल आया और गया!
संभोग में ऐसा ही सुख है। धन-पद प्रतिष्ठा में ऐसा ही सुख है। श्रम तो बहुत है; श्रम के अनुपात में कुछ नहीं मिलता। मगर है। मलूकदास की सत्य के प्रति निष्ठा अपूर्व है। कहते हैं: मगर है।
जेते सुख संसार के, इकट्ठे किए कटोर।
कन थोरे कांकर घने, देखा फटक पछोर।।
मलूक कोटा झांझरा, भीत परी भहराए।
ऐसा कोई ना मिला, जो फेर उठावै आए।।
मलूक कोटा झांझरा, भीत परी भहराय।
ऐसा कोई ना मिला, जो फेर उठावै आए।।
मलूक कोटा झांझरा...। और मलूक कहते हैं: इन सब थोड़े से कणों की खोज में मैं झांझरा हो गया, जर्जर हो गया। मलूक कोटा झांझरा--यह जो मलूक नाम का कमान था, यह खंडहर हो गया। दौड़ते-धापते आपा-धापी में मिला कुछ भी नहीं, हाथ कुछ भी न लगा। थोड़े सपने थे, थोड़ी झलक आई; दुःख बहुत भोगा।
मलूक कोटा झांझरा...। और अब हालत यह है कि मैं सिर्फ एक खंडहर हो कर रह गया हूं। भीतर परी भहराए--और दीवालें गिरनी जाती हैं। ऐसा कोई ना मिला...। और इस पूरे संसार में मित्र थे, सगे थे, संबंधी थे, अपने थे--ऐसा कोई ना मिला, जो फेर उठावै आए। और ये जो भीतर गिरती जा रही हैं, दीवालें गिरती जा रही हैं, यह जो भवन खंडहर होता जा रहा है, ऐसा कोई भी न मिला, जो इस खंडहर को फिर सहारा दे दे और उठा ले।
रूप की इस कांपती लौ के चले
यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा?
नील-सर में नींद को नीली लहर
खोजती है भोर का तट रात-भर
किंतु आता प्रात जब जाती उषी
बूंद बन कर हर लहर जाती बिखर
प्राप्ति ही जब मृत्यु है अस्तित्व की
यह हृदय-व्यापार कितने दिन चलेगा?
रूप की इस कांपती लौ के तले
यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा?
विश्व-भर में जो सुबह लाती किरण
सांझ देती है वही तम को शरण
ज्योति सत्य, असत्य तम फिर भी सदा
है किया करता दिवस निशि को वरण
सत्य भी जब थिर नहीं निज रूप में
स्वप्न का संसार कितने दिन चलेगा?
रूप की इस कांपती लौ के तले
यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा?
हम सभी जर्जर होते जाते हैं। रोज-रोज मौत करीब आती जाती है। जिनको तुम जन्म दिन कहते हो, वे तुम्हारे मौज के पड़ाव हैं। एक जन्म दिन आया, एक साल और रिक्त हो गया; हाथ से और इतना समय जा चुका। रोना चाहिए जन्म-दिन पर; उत्सव मनाते हो! जिंदगी कम हो गई। जीवन बढ़ता नहीं--जन्म-दिन पर। उतना और जीवन कम हुआ।
मौत रोज करीब आती है! प्रतिपल करीब आती है। यहां कुछ मिलने को नहीं है। मिलना है जो, वह बहुत सपने जैसा है; इंद्रधनुषों जैसा है। दूर के ढोल सुहावने लगते हैं; पास जाकर सब व्यर्थ हो जाते हैं। मिलता कुछ भी नहीं, जीवन खोता चला जाता है। और यह कुछ समय ऐसा है कि दुबारा इसे लौटाया न जा सकेगा। और यह जा खंडहर एक बार खंडहर हो गया, तो हो गया!
इसके पहले कि तुम खंडहर हो जाओ, इस मकान को परमात्मा का मंदिर बना लो। उसके साथ शाश्वत जीवन हो सकता है--उसके साथ ही शाश्वत जीवन हे सकता है। और तो सब जीवन क्षण-भंगुर है।
मत करो प्रिय! रूप का अभिमान
कब्र है धरती, कफन है आसमान।
हर पखेरू का यहां है नीड़ मरघट पर
है बंधी हक एक नैया मृत्यु के तट पर
खुद बखुद चलती हुई यह देह अर्थी है
प्राण है प्यासा पथिक संसार-पनघट पर
किसलिए फिर प्यास का अपमान?
जी रहा है प्यास पी-पी कर जहान।
मत करो प्रिय! रूप का अभिमान
कब्र है धरती, कफन है आसमान।
रंक-राजा, मूर्ख-खंडित, रूपवान-कुरूप
सांझ के आधीन सबकी जिंदगी की धूप
आखिरी सबकी यहां पर है चिता ही सेज
धूल ही शृंगार अंतिम अंत-रूप अनूप
किसलिए फिर धूप का अपमान?
धूल हम, तुम, धूल है सबकी समान।
 मत करो प्रिय! का अभिमान।
कब्र है धरती, कफन है आसमान।
प्राण! जीवन क्या क्षणिक बस सांस का व्यापार
देह की दुकान जिस पर काल का अधिकार
रात को होगा सभी जब लेन-देन समाप्त
तब स्वयं उठ जाएगा यह रूप का बाजार
किसलिए फिर रूप का अभिमान?
फूल के शव पर खड़ा है बागवान।
मत करो प्रिय! रूप का अभिमान
कब्र है धरती, कफन है आसमान।
जीवन को देखो। सुख से भागो मत; सुख के भीतर गहरी आंख डालो, तो तुम पाओगे: दुख बहुत, सुख ना कुछ। इतने से सुख के लिए इतना दुःख झेलना कुछ बुद्धिमान नहीं है।
मौत बहुत--जीवन ना कुछ। जीवन तो ऐसी, जैसी छोटी सी किरण; और मौत ऐसी, जैसी अंधेरी रात। इतनी अंधेरी रात में, इतनी सी किरण के लिए जीने का कोई प्रयोजन नहीं हैं। यह बहुत मूल्य चुकाना हो रहा है।
और फिर जब यह देह जर्जर हो जाएगी, और जब कोई सहारा देने वाला न मिलेगा, तब तुम परमात्मा को पुकारोगे भी। लेकिन अकसर बहुत देर हो गई होती है। क्योंकि परमात्मा को पुकारने के लिए भी जो ऊर्जा चाहिए, वह भी समाप्त हो गई होती है। उस ऊर्जा को तो धन को पुकारने में लगा दिया; पद को पुकारने में लगा दिया; पत्नी और पति को पुकारने में लगा दिया। उस ऊर्जा को तो न्योछावर कर दिया--व्यर्थ में। और जब परमात्मा को पुकारने की घड़ी, तुम सोचते हो: आई, तब ऊर्जा नहीं बचती; पंख टूट गए; अब उड़ने की क्षमता नहीं रही।
लोग बूढ़े हो कर धर्म की तरफ जाते हैं। तुम मंदिरों और मस्जिदों में बूढ़े बुढ़ियों को देखोगे। यह आकस्मिक नहीं है। जवान वहां दिखाई नहीं पड़ते। और जहां जवान न दिखाई पड़े, समझना कि वहां धर्म वास्तविक नहीं हो सकता। जवान ही दिखाई पड़े जहां, वहीं समझना कि धर्म जीवंत है।
जब बुद्ध चले पृथ्वी पर तो जवानों ने संन्यास लिया: जब महावीर चले पृथ्वी पर, तो युवक आए और संन्यस्त हुए। जो बूढ़े भी आए, वे बहुत युवा-मन लोग थे; वे भी बूढ़े नहीं थे। लेकिन बड़ी मात्रा युवकों की थी।
जब भी धर्म जीवंत होता है, तो युवक को आकर्षित करता है। युवक के पास क्षमता है, ऊर्जा है; अभी सब विकृत नहीं हो गया है; अभी कुछ पूंजी बची है। और पूंजी को परमात्मा के लिए दांव पर लगाया जा सकता है।
एक बात खयाल रखना:
जब न तूम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले व्यर्थ है।
एक बात खयाल रखना: परमात्मा न मिला, तो कुछ मिल जाए, व्यर्थ है।
जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले व्यर्थ है।
दीप को रात भर जल सुबह मिल गई
चिर कुमारी उषा की किरन-पालकी
सूर्य ने चल दिवस भर अग्नि पंथ पर
रात, लट चूम ली चांद के भाल की
जिंदगी में सभी को सदा मिल गया
प्राण का गीत और सारथी राह का
एक मैं ही अकेला जिसे आज तक
मिल न पाया सहारा किसी बांह का
बेसहारे हुई अब कि जब जिंदगी
साथ संसार सारा चले--व्यर्थ है।
जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिल--व्यर्थ है।
जिंदगी भर लोग साथ हैं, और अर्थी में भी सब तुम्हारे साथ जाएंगे मरघट तक; विदा कर आएंगे। मगर परमात्मा न मिला, तो कुछ भी न मिला। यह सब संग-साथ झूठा है; धोखा है।
बेसहारे हुई अब कि जब जिंदगी
साथ संसार सारा चले--व्यर्थ है।
जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले--व्यर्थ है।
नाश के इस नगर में तुम्हें एक थे
खोजता जिसे मैं आ गया था यहां
तुम न होते अगर तो मुझे क्या पता
तन भटकता कहां, मन भटकता कहां
वह तुम्हीं हो कि जिसके लिए आज तक
मैं सिसकता रहा, शब्द में गान में
वह तुम्हीं हो कि जिसके बिना शव बना
मैं भटकता रहा रोज शमशान में
पर तुम्हीं सब न मेरी पियो प्यास तो
ओठ पर भी हिमालय गले--व्यर्थ है
जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले--व्यर्थ है।
फूल से भी बहुत दिन किया प्यार पर
दर्द दिल का कभी मुस्कुराया नहीं
चांद से भी बहुत मन लगाया मगर
प्राण को चैन मेरे आया कहीं
किंतु उस रोज तुम पुकारा कि जब
मैं पड़ा था चिता पर, मगर गा उठा
एक जादू न जाने किया कौन सा
औ मुझे रोशनी अब तुम्हीं दो न तो
पास सारे सितारे जले--व्यर्थ हैं
जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले--व्यर्थ है।
इस जगत में जिसे हम जीवन कहते हैं, वह अंततः मृत्यु में परिणत हो जाता है। इस जगत में जिसे हम जीवन कहते हैं, वह मृत्यु ही है छिपी हुई; वह मौत का ही विस्तार है। और परमात्मा में जो आदमी प्रविष्ट होने को राजी होता है, उसे करीब-करीब मरने की तैयारी दिखानी पड़ती है।
पुराने दिनों में जब संन्यास देते थे लोगों को तो उन्हें चिता पर लिटाते थे। चिता सजाते थे। सिर मुंड़ देते थे, जैसा कि मुरदे का मुंड़ देते हैं। नए कपड़े पहनाते थे। नाम बदल देते थे। चिता पर लिटाते थे। गुरु चिता में आग लगाता था और कहता था कि तुम्हारा जो पुराना रूप था जल, गया; तुम मर गये। और उठाता था नए व्यक्ति को कि अब तुम उठा। अब तुम नए हुए।
इसलिए पुराना संन्यासी...। अगर तुम उससे पूछो: किस गांव के रहने वाले थे संन्यास के पहले, तो नहीं बताएगा। वह कहेगा--वह आदमी मर चूका। पूछो: किस घर से आए; क्या तुम्हारा नाम था!--नहीं बताएगा। कहेगा; वह आदमी मर चूका।
एक जीवन है, जिसे हम जीवन कहते हैं, वह मृत्यु ही सिद्ध होता है। एक मृत्यु है--परमात्मा में मृत्यु--जो परम जीवन का द्वार बन जाती है।
मैं पड़ा था चिता पर, मगर गा उठा
किंतु उस रोज तुमने पुकारा कि जब
एक जादू जाने किया कौन सा
आग की गोद में अश्रु मुस्का उठा
औ रोशनी अब तुम्हीं दो न तो
पास सारे सितारे जलें--व्यर्थ है।
जब न तुम ही मिलें राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले--व्यर्थ है।
खोजने जब चला मैं तुम्हें विश्व में
मंदिरों ने बहुत कुछ भुलावा दिया
खैर पर यह हुई, उम्र की दौड़ में
खयाल मैंने कुछ पत्थरों का किया
पर्वतों ने झुका शीश चूमे चरण
बांह डाली कली ने गले में मचल
एक तस्वीर तेरी लिए किंतु मैं
साफ दामन बचा कर गया ही निकल
और फिर भी न यदि तुम मिलो तो कहो
जन्म किस अर्थ है, मृत्यु किस अर्थ है।
जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले--व्यर्थ है।
इन पंक्तियों ध्यान करना:
खोजने जब चला मैं तुम्हें विश्व में
मंदिरों ने बहुत कुछ भुलावा दिया।
मंदिर भटकाते हैं; मस्जिद भटकाती है।
खैर पर यह हुई उम्र की दौड़ में
खयाल मैंने न कुछ पत्थरों का किया।
अगर तुम पत्थरों से बच गए, तो तुम सौभाग्यशाली हो।
पर्वतों ने झुका शीश चूमे चरण
बांह डाली कली ने गले में मचल
एक तस्वीर तेरी लिए किंतु मैं
साफ दामन बचा कर गया कि निकल।
बहुत उलझनें हैं। बहुत धोखे हैं। बहुत भुलावे हैं। तुम एक परमात्मा की याद को अपने हृदय में संजोए हुए बचा कर निकलते रहना।
एक तस्वीर तेरी लिए किंतु मैं
साफ दामन बचा कर गया ही निकल
और फिर भी न यदि तुम मिलो तो कहो
जन्म किस अर्थ है, मृत्यु किस अर्थ है
जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले--व्यर्थ है।
एक प्रार्थना तुम्हारे भीतर उठती रहे; जलती रहे एक ज्योति; और तुम उस ज्योति में और प्रार्थना में जीवन के अनुभवों को कसते रहो। देखते रहो--क्या कन है, क्या कंकड़? क्या सार है--क्या असार। क्या चिन्मय है--क्या मृण्मय है। क्या व्यर्थ है--क्या अर्थवान।
जेते सुख संसार के इकट्ठे किए बटोर।
कन थोरे कांकर घने देखा फटक पछोर।
मलूक कोटा झांझरा, भीत परी भहराए।
ऐसा कोई ना मिला, जो फेर उठावै आए।
प्रभुताई को सब मरैं, प्रभु को मरै न कोए।
जो कोई प्रभु को मरै, तो प्रभुता दासी होए।
इस अंतिम सूत्र को हृदय में खूब सम्हाल कर रख लेना।
प्रभुताई को सब मरैं...। सभी चाहते हैं कि प्रभुता मिले, पद मिले, सत्ता मिले, इसके लिए मारन को भी तैयार हैं, मारने को भी तैयार है। प्रभुताई को मरै न कोए। लेकिन प्रभु को पाने के लिए कोई चेष्टा करता हुआ नहीं मालूम पड़ता। और सूत्र ऐसा है: जो कोई प्रभु को मरै, तो प्रभुता दासी होए।। और जो प्रभु के लिए मरने को तैयार हैं, प्रभुता उसकी उदासी हो जा जाती है।
जो प्रभु को पा लेता, वह सब पा लेता। इक साधे सब सधे। जीसस से किसी ने पूछा है: मैं क्या करूं कि धनी हो जाऊं; मैं क्या करूं कि परवाना हो जाऊं? तो जीसस ने कहा कि तू एक काम कर--सीक यी फर्स्ट द किंगडम ऑफ गॉड दैन ऑल एल्स शैल बी एडेड अन टू यू--तू प्रभु का राज्य खोज और शेष सब अपने आप मिल जाएगा। एक प्रभु को खोज ले, शेष सब अपने से आ जाता है।
उस एक छोड़ कर हम सब खोजते हैं। सब तो मिलता ही नहीं; वह जो एक अपना था और मिल सकता था, वह भी खो जाता है।
जीवन को जाग कर जीओ। मलूकदास भगोड़े बनाने के पक्ष में नहीं हैं। इसलिए इन्होंने कहा: घर में रहे उदासी। हृदय में दया हो, धर्म हो। और अपने ही घर में चुपचाप संन्यस्त हो कर रहे। किसी को बताने की भी कोई जरूरत नहीं है।
भगवान सब जगह है; तुम्हारे घर में भी उतना ही, जितना काबा और काशी में है। अगर तुमने आंखें खोल कर देखा, तो कहीं भी मिल जाएगा।
एक ही बात याद रखना कि उसे पाना हो, तो अपने को गंवाने की तैयारी रखनी पड़ती है। जो उसे पाना चाहता है, उसे मिटाना होता है।
प्रभुताई को सब मरैं प्रभु को मरै न कोए।
जो कोई प्रभु को मरै, तो प्रभुता दासी होए।।

आज इतना ही।