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मंगलवार, 23 सितंबर 2014

गीता दर्शन (भाग--3) प्रवचन--26


 प्रकृति और परमात्मा—(प्रवचन—छबीसवां)

अध्याय-7

ये चैव सात्त्विा भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धित्वहं तेषु ते मयि।। 12।।

और भी जो सत्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजोगुण से तथा तमोगुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू मेरे से ही होते हैं ऐसा जान, परंतु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं।

प्रकृति परमात्मा में है, लेकिन परमात्मा प्रकृति में नहीं है। यह विरोधाभासी, पैराडाक्सिकल सा दिखने वाला वक्तव्य अति गहन है। इसके अर्थ को ठीक से समझ लेना उपयोगी है।
कृष्ण कहते हैं, सत्व, रज, तम, तीनों गुणों से बनी जो प्रकृति है, वह मुझमें है। लेकिन मैं उसमें नहीं हूं।
ऐसा करें कि एक बड़ा वर्तुल खींचें अपने मन में, एक बड़ा सर्किल। उसमें एक छोटा वर्तुल भी खींचें। एक बड़ा वर्तुल खींचें, और उसके भीतर एक छोटा वर्तुल खींचें, तो छोटा वर्तुल तो बड़े वर्तुल में होगा, लेकिन बड़ा वर्तुल छोटे वर्तुल में नहीं होगा।

प्रकृति तो हमें दिखाई पड़ती है कि असीम है, बहुत विराट; ओर-छोर का कुछ पता नहीं चलता; लेकिन परमात्मा के खयाल से प्रकृति ना-कुछ है। बहुत छोटा वर्तुल है, बहुत सीमित घटना है। ऐसी अनंत प्रकृतियां परमात्मा में हो सकती हैं, होती हैं; बनती हैं, बिखर जाती हैं। परमात्मा के भीतर ही सब कुछ घटित होता है। इसलिए यह ठीक है कहना, सब कुछ मुझमें है, लेकिन मैं उस सब कुछ में नहीं हूं।
विराट क्षुद्र में नहीं होता, क्षुद्र तो विराट में होता ही है। लहर सागर में होती है, तो सागर कह सकता है, सब लहरें मुझमें हैं, लेकिन मैं लहरों में नहीं हूं। क्योंकि लहरें न रहें तो भी सागर रहेगा, लेकिन सागर न रहे तो लहरें न बचेंगी। हम सोच सकते हैं, सागर का होना बिना लहरों के, लेकिन लहरों का होना नहीं सोच सकते बिना सागर के। लहरें सागर में ही उठती हैं, सागर में ही होती हैं, फिर भी इतनी छोटी हैं कि उस सागर में उठकर भी सागर को घेर नहीं पातीं। घेर भी नहीं सकती हैं।
इस वक्तव्य को देने के कुछ कारण हैं। और साधक के लिए बहुत अनिवार्य है।
कृष्ण जब कहते हैं, यह सारी प्रकृति मुझमें है, फिर भी मैं इस प्रकृति में नहीं हूं, तो दो बातें ध्यान में रख लेने जैसी हैं। एक तो यह कि जो परमात्मा में प्रवेश कर जाए, उसमें प्रकृति होगी। लेकिन जो प्रकृति में ही खड़ा रहे, उसमें परमात्मा नहीं होगा।
जैसे कि कृष्ण को भी भूख लगती है, और कृष्ण को भी नींद आती है, और कृष्ण के भी पैर में चोट लगती है, तो दर्द और पीड़ा होती है। कृष्ण की मृत्यु हुई; पैर में तीर लगने से हुई। प्रकृति अपना पूरा काम करती है--कृष्ण में भी, महावीर में भी, बुद्ध में भी, जीसस में भी। जब जीसस को सूली पर लटकाया गया, तो प्रकृति ने पूरा काम किया।
हम में भी प्रकृति काम करती है। हम भी खाना खाते हैं, हमारे पैर में भी दर्द होता है, पीड़ा होती है। हमें भी कोई सूली पर लटका दे, तो हम भी मर जाएंगे। लेकिन हमारा सूली पर लटकना और क्राइस्ट के सूली पर लटकने में बुनियादी फर्क होगा। क्योंकि जब क्राइस्ट से प्रकृति छूट रही होगी, तब क्राइस्ट परमात्मा में प्रवेश कर रहे होंगे। और जब हमसे प्रकृति छूट रही होगी, तो हम कहीं प्रवेश नहीं कर रहे होंगे, सिर्फ प्रकृति छूट रही होगी।
इसलिए तो मरते समय हम इतने पीड़ित और परेशान हो जाते हैं। क्योंकि प्रकृति के अतिरिक्त हमने कुछ और जाना नहीं। और जब शरीर छूटता है, तो प्रकृति छूट रही है। हम मरे, हम मिटे।
जब क्राइस्ट की प्रकृति छूट रही है, वह छोटा वर्तुल छूट रहा है, तो क्राइस्ट भयभीत नहीं हैं, आनंदित हैं, क्योंकि वे बड़े वर्तुल में प्रवेश कर रहे हैं। लहर मिट रही है, और सागर में प्रवेश हो रहा है। जब हमारी लहर मिटती है, तो सिर्फ लहर मिटती है; सागर का हमें कुछ पता नहीं है। सागर में कोई प्रवेश नहीं होता।
जब आपको भूख लगती है, तो आपको भूख लगती है। और जब कृष्ण को भूख लगती है, तो प्रकृति को भूख लगती है। और जब आपके पैर में पीड़ा होती है, तो आपको पीड़ा होती है। और जब कृष्ण के पैर में पीड़ा होती है, तो प्रकृति को पीड़ा होती है। कृष्ण तो साक्षी ही होते हैं।
जिस व्यक्ति ने परमात्मा को जाना, वह प्रकृति का साक्षी मात्र रह जाता है। वह छोटा वर्तुल उसे दिखाई पड़ता है, लेकिन वह स्वयं बड़े वर्तुल के साथ एक हो जाता है। लेकिन जिसने परमात्मा को नहीं जाना, उसे तो छोटा वर्तुल ही सब कुछ दिखाई पड़ता है। उसके पार कुछ भी नहीं है। और जब हमारा ध्यान प्रकृति में अतिशय लग जाता है, तो अतिशय लग जाने के कारण ही परमात्मा की तरफ ध्यान जाना मुश्किल हो जाता है।
अठारह सौ अस्सी में यूरोप में अल्तामिरा की गुफाएं खोजी गईं और उन गुफाओं की खोज के वक्त एक बहुत मजेदार घटना घटी। एक बहुत बड़े जमींदार डान मार्शिलानो की जमीन पर अचानक पहाड़ियों में ये गुफाएं मिल गईं। एक कुत्ता भूल से गुफा के भीतर कूद गया। वर्षा में कुछ मिट्टी गलकर गिर गई; गङ्ढा हो गया; और कुत्ता उसके अंदर चला गया, फिर निकल न पाया। वहां उसने बहुत शोरगुल मचाया। तब मार्शिलानो के किसान, मजदूर जाकर किसी तरह खोदकर कुत्ते को निकाले। कुत्ता तो निकल आया, साथ में गुफाओं का आविष्कार हो गया। बड़ी गहरी और बड़ी अदभुत गुफाएं थीं। मनुष्य के पूरे इतिहास की दृष्टि उन गुफाओं ने बदल दी।
मार्शिलानो को पता चला, तो वह इतिहास का विद्यार्थी था, उसने तत्काल सब इंतजाम किया। विशेषकर वह मनुष्य की हड्डियों का अध्ययन कर रहा था वर्षों से। तो उसने सोचा कि ये गुफाएं न मालूम कितनी पुरानी होंगी, तो हड्डियां, कीमती हड्डियां इसमें मिल सकती हैं, और किसानों ने खबर दी कि बहुत अस्थिपंजर हैं।
तो मार्शिलानो ने सर्चलाइट लेकर गुफाओं को खुदवाया और उनमें प्रवेश किया। छः दिन तक रोज घंटों वह सरककर गुफाओं में जाता, एक-एक हड्डी पर नजर रखता। हड्डियां खोजीं उसने बहुत। सातवें दिन उसकी छोटी लड़की ने, जो सात-आठ साल की लड़की थी, उसने कहा, मैं भी अंदर चलना चाहती हूं। वह लड़की को ले गया।
आप जानकर हैरान होंगे कि अल्तामिरा की असली गुफाएं उस लड़की ने खोजीं सात साल की। सर्चलाइट लेकर वह जो इतिहासज्ञ पिता था, वह नहीं खोज पाया। बड़ी अदभुत घटना घटी। जब वह लड़की को लेकर गया, तो वह अपना सरककर अपनी हड्डियों की जांच-पड़ताल में लग गया कि जमीन में एक हड्डी भी चूक न जाए; सर्चलाइट पास था। अचानक लड़की चिल्लाई, पिताजी, पिताजी, ऊपर देखिए!
छः दिन से वह जा रहा था रोज, लेकिन उसने ऊपर आंख ही नहीं उठाई थी। वह नीचे हड्डियां बीनने में इतना व्यस्त था कि गुफाओं के ऊपर सीलिंग पर क्या है, उसने नजर न डाली थी। सीलिंग पर तो इतने अदभुत चित्र थे, जैसे कल रंगे गए हों। और ठेठ बीस हजार साल पुराने चित्र निकले।
अल्तामिरा की गुफाएं सारे जगत में प्रसिद्ध हो गईं उन चित्रों के कारण। इतने अदभुत चित्र थे कि जिसने भी उन्हें बनाया होगा, पिकासो से कम सामर्थ्य का चित्रकार नहीं था। तो सारा इतिहास बदलना पड़ा। क्योंकि खयाल था कि पुराने जमाने में तो किसी आदमी के पास इतनी बड़ी कला नहीं हो सकती। लेकिन पाया यह गया कि वे जो अल्तामिरा की गुफाओं पर जो जानवरों के चित्र हैं, सांड के चित्र हैं, वे इतने कलात्मक हैं और इतने अदभुत हैं कि आज भी कोई चित्रकार उनका मुकाबला नहीं कर सकता।
हैरान हुआ मार्शिलानो कि वह छः दिन से रोज सर्चलाइट लेकर आ रहा था, लेकिन सर्चलाइट उसका जमीन पर लगा था। वह हड्डियां खोज रहा था कि कोई हड्डी चूक न जाए। तो ऊपर नजर नहीं गई।
यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि हम सब भी जब तक प्रकृति में हड्डियां खोजते रहते हैं...। बड़ा सर्चलाइट हमारे पास है। लेकिन ऊपर सीलिंग की तरफ नहीं उठ पाता, वह परमात्मा की तरफ नहीं उठ पाता। टू मच आक्युपाइड जमीन पर सरकने में और प्रकृति में खोज करने में। हड्डियों की ही खोज है; कुछ और बहुत खोज नहीं है। जब आप कामवासना में खोज रहे हैं, तो हड्डियों से ज्यादा कुछ भी नहीं खोज रहे हैं। और जब आप सिंहासनों पर चढ़ने में खोज कर रहे हैं, तब भी हड्डियों से ज्यादा कुछ नहीं खोज रहे हैं। हड्डियों को ही चढ़ा रहे हैं सिंहासनों पर। जब आप धन खोज रहे हैं, तो सिर्फ हड्डियों की सुरक्षा खोज रहे हैं; और कुछ भी नहीं खोज रहे हैं। जब आप शक्ति खोज रहे हैं, तो हड्डियों के लिए केवल इंतजाम कर रहे हैं सिक्योरिटी का; और कुछ भी नहीं कर रहे हैं।
प्रकृति में उलझा हुआ मन ऊपर की तरफ नहीं उठ पाता। उसे नहीं देख पाता वह, जो वृहत वर्तुल है, वह जो ग्रेटर सर्किल है। जिसकी कृष्ण बात कर रहे हैं, मुझमें है प्रकृति, लेकिन मैं प्रकृति में नहीं हूं। उस तरफ नजर नहीं उठ पाती है।
तो जो प्रकृति में उलझा है, वह कृष्ण के वचन से ठीक से समझ ले, क्योंकि इस बात की भ्रांति है कि अगर कृष्ण यह कहते कि मैं प्रकृति में हूं और प्रकृति मुझमें है, तो भी गलत नहीं था। क्योंकि छोटा वर्तुल अगर बड़े वर्तुल में है, तो बड़ा वर्तुल भी किसी न किसी अर्थ में छोटे वर्तुल में है। अगर लहर सागर में है, तो सागर कितने ही क्षुद्रतम अर्थों में, लहर के भीतर है। तर्क किया जा सकता है। क्योंकि यह असंभव है कि बड़ा वर्तुल छोटे वर्तुल में न हो, तो छोटा वर्तुल बड़े वर्तुल में कैसे हो सकेगा? माना कि पूरा बड़ा वर्तुल छोटे वर्तुल में नहीं हो सकेगा, अंश ही होगा; लेकिन होगा तो ही।
लेकिन कृष्ण उस तर्क को मद्दे-नजर कर रहे हैं, जानकर। क्योंकि एक बार आदमी को यह पता चल जाए और यह खयाल में आ जाए कि प्रकृति में परमात्मा है और परमात्मा में प्रकृति है, तो शायद हम प्रकृति से ऊपर नजर उठाने को कभी राजी न हों। कभी राजी न हों। क्योंकि हम कहें कि जब प्रकृति में ही परमात्मा है--खाने-पीने में, कपड़े पहनने में, मकान बनाने में--तो फिर और परमात्मा की खोज की जरूरत क्या है? जब इस शरीर में ही परमात्मा है, तो फिर शरीर ही परमात्मा हो जाएगा। हम तत्काल इस बात को अपने मतलब की तरफ झुका लेंगे।
और आदमी बड़ा कुशल है, वह सब चीजों के अर्थ अपनी तरफ झुका लेता है। क्योंकि दो ही रास्ते हैं। या तो अर्थ की तरफ आप झुकिए, या तो सत्य की तरफ आप झुकिए; या सत्य को अपनी तरफ झुका लीजिए। अन्यथा बेचैनी अनुभव होगी।
जिस दिन कोई जानेगा बड़े वर्तुल को, परमात्मा को, उस दिन वह शायद यह भी जान ही लेगा कि प्रकृति भी उसमें ही है, वह भी प्रकृति में है। लेकिन हमसे यह कहना, यह सत्य कहना, खतरनाक है। कहना इसलिए खतरनाक है कि अगर हमें यह बात पक्की हो जाए कि हम जो कर रहे हैं, उसमें भी परमात्मा है, तो फिर शायद परमात्मा की तरफ नजर उठाने का खयाल ही मिट जाए। जरूरत भी नहीं रह जाती।
इसलिए कृष्ण बहुत सोच-विचारकर कहते हैं, प्रकृति मुझमें है अर्जुन, लेकिन मैं प्रकृति में नहीं हूं। तो तू प्रकृति में कितना ही खोजता रहे, मुझे न पा सकेगा। हां, मुझे पा ले, तो प्रकृति तो पाई ही हुई है।
यह भी बहुत मजे की बात है। कोई आदमी कितना ही धन खोजे, धनी नहीं हो पाता। लेकिन कोई आदमी परमात्मा को खोज ले, तो दरिद्रता भी धन हो जाती है।
जीसस का वचन है, सीक यी फर्स्ट दि किंगडम आफ गॉड, देन आल एल्स विल बी एडेड अनटु यू। खोज लो पहले प्रभु के राज्य को, और फिर सब--सब--साथ में मिल जाएगा।
लेकिन हम सबको खोजने चलते हैं, प्रभु को छोड़कर। तब प्रभु तो मिलता ही नहीं, सबमें से भी कुछ नहीं मिलता है। सिर्फ दौड़-धूप; और आखिर में राख हाथ में लगती है--सपनों की राख, आशाओं की राख। यश कोई कितना ही खोजे, यश हाथ लगेगा नहीं। और कोई परमात्मा को खोज ले, तो यशस्वी हो जाता है, तत्क्षण। कोई कितना ही प्रेम खोजे, प्रेम मिलेगा नहीं। और कोई प्रार्थना को खोज ले, तो जीवन प्रेम की सुगंध से भर जाता है; ऐसी सुगंध से, जो फिर कभी चुकती नहीं।
हम कुछ भी खोजें प्रकृति में, हमारे हाथ में कुछ लगेगा नहीं; मिट्टी-पत्थर ही लगेंगे। यद्यपि प्रत्येक मिट्टी-पत्थर के भीतर परमात्मा छिपा है। लेकिन जो प्रकृति में खोजने चला है, वह परमात्मा के प्रति अंधा होता है। वह नैरोड, उसकी कांशसनेस तो हड्डियों में अटकी रहती है, नीचे। वह ऊपर की तरफ नहीं उठ पाता है।
कितनी निकट थीं अल्तामिरा की वे चित्रावलियां! जरा-सा तो सर्चलाइट ऊपर उठाना था। सर्चलाइट हाथ में था। जरा तो आंख ऊपर करनी थी। लेकिन जो नीचे खोजने में लगा है, उसकी आंख ऊपर नहीं उठ पाती।
इसलिए कृष्ण कहते हैं, सत्व, रज, तम, सब मुझमें हैं अर्जुन, लेकिन मैं उनमें नहीं हूं।
बड़ी मजेदार बात है। अगर कोई आदमी परमात्मा के बिना सात्विक भी हो जाए, तो भी धार्मिक नहीं हो सकता। अगर कोई व्यक्ति परमात्मा के बिना सात्विक भी हो जाए, परम सात्विक हो जाए, तो भी धार्मिक नहीं हो सकता। और कोई व्यक्ति कितना ही तामसिक और कितना ही राजसिक हो, अगर परमात्मा में प्रवेश कर जाए, तो तत्काल सात्विक हो जाता है।
अगर आदमी अपने ही बल से सात्विक हो जाए, तो सिवाय अहंकार के और कुछ निर्मित नहीं होता। पायस, पवित्र अहंकार निर्मित होता है। और कोई व्यक्ति कितना ही बुरा हो, दीन हो, हीन हो, पापी हो, और परमात्मा में छलांग लगा जाए, तो तत्काल, जैसे आग में कचरा जल जाए, ऐसे परमात्मा की आग में सब पाप जल जाते हैं।
और परमात्मा में जब कुछ जलता है, तो अहंकार नहीं बचता, वह भी जल जाता है। और आदमी जब कुछ भी जलाए, कुछ भी मिटाए, कुछ भी बनाए, एक चीज पीछे बची रह जाती है--मैं पीछे बचा रह जाता है।
इसलिए सात्विक से सात्विक व्यक्ति भी एक सूक्ष्म अहंकार से पीड़ित रहता है। और परमात्मा तभी उपलब्ध होता है, जब अहंकार की पतली से पतली, बारीक से बारीक दीवाल भी बीच में न रह जाए। और कोई बाधा नहीं है।
कृष्ण का भी मतलब वही है, जो क्राइस्ट का है, कि पहले तू परमात्मा को खोज।
अर्जुन क्या कह रहा है? अर्जुन यह कह रहा है कि मुझे इस युद्ध से जाने दो। यह तामसिक, राजसिक मालूम पड़ता है। मैं सात्विक होना चाहता हूं। मुझे हट जाने दो। यह सब बात बड़ी गड़बड़ मालूम पड़ती है। यह लोगों को मारना--यश के लिए, धन के लिए, राज्य के लिए--क्षुद्र मालूम पड़ता है। यह मेरे सात्विक मन को प्रीतिकर नहीं लगता; यह श्रेयस्कर नहीं है। मुझे जाने दो कृष्ण, मुझे हट जाने दो, इस युद्ध से। इससे तो बेहतर भीख मांगकर जी लेना होगा। इससे तो बेहतर भिखारी हो जाना होगा। इससे तो बेहतर किसी वृक्ष के नीचे, किसी अरण्य में बैठ जाऊंगा, प्रार्थना में डूब जाऊंगा। यह सब मैं नहीं करना चाहता हूं। यह बड़ा तामसिक मालूम पड़ता है।
कृष्ण कहते हैं, सत्व, रज, तम, सब मुझमें हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं हूं। इसलिए अगर तू सात्विक भी हो जाए मेरे बिना, मुझे समर्पित हुए बिना, तो तेरे सत्व से भी कुछ हल न होगा। अगर तू अपने ही हाथ से स्वर्ग में भी पहुंच जाए, तो तेरा अहंकार साथ होगा और सब स्वर्ग नर्क हो जाएंगे। क्योंकि असली नर्क तेरे पीछे ही चलता रहेगा; तेरे साथ ही चलता रहेगा। तू पहले मुझे पा ले और फिर तू बात करना सत्व, रज और तम की; फिर तू बात करना प्रकृति की। पहले तू मुझे पा ले।
धर्म की और नीति की यही बुनियादी दूरी है। नीति कहती है, सात्विक हो जाओ। धर्म कहता है, धार्मिक हो जाओ। नीति कहती है, पहले अपने कर्म बदलो, आचरण बदलो। धर्म कहता है, पहले प्रभु में प्रवेश कर जाओ। क्योंकि तुम क्या आचरण बदलोगे और तुम्हारा बदला हुआ आचरण तुम्हारा ही बदला हुआ होगा। वह तुमसे बड़ा नहीं हो सकता। तुम क्या सदाचरण करोगे? वह तुमसे ही निकलेगा। वह तुमसे महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। जैसे कोई आदमी अपने जूते के बंद पकड़कर खुद को नहीं उठा सकता, ऐसे ही कोई आदमी अपने ही द्वारा सदाचरण को उपलब्ध नहीं हो सकता। आप ही तो सदाचरण करेंगे--आप ही। यह थोड़ा समझने जैसा है।
एक आदमी चोर है। और वह चोर कहता है कि मैं कोशिश कर रहा हूं कि अचोर हो जाऊं, चोरी छोड़ दूं। अब चोर ही तो चोरी छोड़ने की कोशिश करेगा! चोर ही कोशिश करेगा चोरी छोड़ने की। यह जूते के बंद पकड़कर अपने को उठाने से भी कठिन काम है। यह होने वाला नहीं है। क्योंकि अगर चोर इस योग्य होता कि चोरी उससे न होती होती, तब तो बात ही और थी, लेकिन यह बात नहीं है।
चोर चोर है। और कसम खा रहा है कि मैं चोरी नहीं करूंगा। वह अपने साथ भी चोरी कर जाएगा।
एक आदमी क्रोधी है और वह कह रहा है, मैं क्रोध नहीं करूंगा। लेकिन उसे पता नहीं है कि जो यह कह रहा है, नहीं करूंगा, यह भी उसका क्रोधी स्वभाव है, जो कसम ले रहा है, जो संकल्प बांध रहा है कि मैं क्रोध नहीं करूंगा। सौ में सौ ही मौके इस बात के हैं कि यह क्रोध ही बोल रहा हो कि मैं क्रोध नहीं करूंगा। अब वह दिक्कत में पड़ेगा।
जैसे कभी-कभी कुत्ते को आपने देखा हो कि अपनी पूंछ पकड़ने की दिक्कत में पड़ जाता है। जोर से छलांग लगाता है। पूंछ बिलकुल पास मालूम पड़ती है। जरा सा मुंह पास पहुंच जाए, तो पूंछ पकड़ में आ जाए। लेकिन बेचारे कुत्ते को पता नहीं; कुत्ते को क्या, हमारे तथाकथित तपस्वियों, नैतिक साधकों को भी पता नहीं, तो कुत्ते का तो कोई कसूर नहीं है।
जब पूंछ बिलकुल करीब दिखाई पड़ती है, तो कुत्ता सोचता है कि जरा ही मुंह बढ़ा लूं, तो पूंछ पकड़ में आ जाए। मुंह बढ़ाता है, लेकिन तब तक पूंछ हट जाती है। क्योंकि वह मुंह से ही पीछे जुड़ी है, यह उसे पता नहीं है। जब छूटती है, तो और जोर से कूदता है। सोचता है कि शायद थोड़ा कम कूदा, इसलिए पूंछ पकड़ में नहीं आ सकी। पर जितने जोर से कूदता है, पूंछ भी उतने ही जोर से कूदती है। अब एक विसियस सर्किल, एक दुष्टचक्र पैदा होता है, जिसमें कुत्ता दिक्कत में पड़ेगा, थकेगा, परेशान होगा; कभी पूंछ पकड़ में आएगी नहीं।
जब कोई हिंसक आदमी कहता है कि अब मैं अहिंसक होने की कोशिश करूंगा, तब वह आदमी कुत्ते के तर्क पर चल रहा है। नहीं; आप अपने में बदलाहट न ला सकेंगे। क्योंकि लाएगा कौन बदलाहट? आप ही!
इसलिए कृष्ण कहते हैं, या क्राइस्ट कहते हैं, कि परमात्मा की तरफ पहले नजर उठा लो, फिर बदलाहट आ जाएगी। क्योंकि तब तुम परमात्मा के हाथ में होओगे, और उसके हाथ में पड़ते ही बदलाहट शुरू हो जाती है। उसकी तरफ आंख उठाते ही बदलाहट शुरू हो जाती है, क्योंकि आप दूसरे ही आदमी हो जाते हैं। उसकी तरफ नजर पड़ते ही सब कुछ बदल जाता है। क्योंकि जैसे ही विराट दिखाई पड़ता है, वैसे ही हमारी क्षुद्रताएं गिर जाती हैं, कि हम भी कैसे पागल थे! हम खोज क्या रहे थे? हम पाने की कोशिश क्या कर रहे थे?
बुद्ध के पास एक स्त्री सुबह-सुबह आई है। उसका लड़का मर गया है और बुद्ध गांव में रुके हैं। तो वह छाती पीटती हुई आई और उसने कहा कि मैं तुम्हारी बातें तभी सुनूंगी, जब तुम मेरे लड़के को जिंदा कर दो। लोग कहते हैं, तुम भगवान हो। तो भगवान ने तो इतना बड़ा जगत बनाया, तुम मेरे इस लड़के को ही जिंदा कर दो।
बुद्ध के संन्यासी, भिक्षु मुश्किल में पड़ गए। अब क्या होगा! बुद्ध ने कहा, कर दूंगा सांझ तक। एक छोटा-सा काम तू पहले मेरे लिए कर ला। गांव में जा--मैं इसे जिंदा करने की दवाई बुला रहा हूं--और किसी भी घर से सरसों के बीज ले आ, उस घर से, जिसमें कोई कभी मरा न हो। जा, सांझ तक लेकर आ जाना। बस, तू सरसों के बीज ले आना उस घर से जिसमें कोई कभी न मरा हो; मैं इसे सांझ जिंदा कर दूंगा।
औरत खुशी से भागी पागल होकर, जरूर किसी न किसी के घर में सरसों के बीज मिल जाएंगे, और उसका बेटा जिंदा हो जाएगा। लेकिन एक-एक घर के द्वार पर उसने दस्तक दी। जिस घर में भी गई, वहीं लोगों ने कहा, सरसों के बीज तो हैं। अभी-अभी फसल कटी है। तो बुद्ध ने कोई बड़ी कठिन दवाई नहीं मांगी है। लेकिन हमारे घर के सरसों के बीज काम न पड़ेंगे। हमारे घर में तो बहुत लोग मरे हैं।
सांझ तक एक-एक घर छान डाला। और सांझ तक हर घर पर यही बात सुनकर कि हर घर में कोई मरा है, और मृत्यु जीवन का नियम है, वह स्त्री सुबह रोती हुई आई थी, सांझ हंसती हुई आई।
बुद्ध ने कहा, ले आई सरसों के बीज? उस स्त्री ने कहा, सरसों के बीज तो नहीं लाई, लेकिन बड़ी बुद्धिमत्ता लेकर आई हूं। बच्चे को लौटा दें। मैं अपनी प्रार्थना वापस लेती हूं। उसे जिंदा करने की कोई जरूरत नहीं। बुद्ध ने कहा, इतनी जल्दी कैसे तू बदल गई?
उस स्त्री ने कहा कि जिस तथ्य की तरफ मेरी कभी आंख ही न उठी थी, उस तथ्य का दर्शन होते ही सब बदल गया। जब सभी मरते हैं, और जब सभी को मरना है, तो मेरे बेटे के साथ भी अपवाद कैसे हो सकता है! नहीं; अब मैं दुखी नहीं हूं। और अब मैं लड़के को जिलाने की प्रार्थना वापस लेने आई हूं। और आपसे यह भी प्रार्थना करने आई हूं कि आज से मैं भी समझिए कि मर गई, क्योंकि मर ही जाऊंगी। मरने के पहले जीवन को जानने की कोई विधि हो, तो मुझे बताएं। अब सदा जीने की कोई आकांक्षा नहीं है, क्योंकि मृत्यु तथ्य है; इसलिए अब मृत्यु का कोई भय भी नहीं है। लेकिन जब तक जी रही हूं, तब तक जीवन को जानने की कोई विधि हो, तो मुझे बताएं।
बुद्ध ने कहा, दिनभर में तेरी इतनी बड़ी बदलाहट! वह तो सांझ संन्यासिनी हो गई। उसने बुद्ध से उसी सांझ दीक्षा ली।
किस बात से यह बदलाहट हुई? एक तथ्य की तरफ दृष्टि उठी--एक बड़े तथ्य की तरफ--कि मृत्यु जीवन का हिस्सा है।
जिस दिन परमात्मा की तरफ दृष्टि उठेगी, कि प्रकृति परमात्मा का हिस्सा है; जिस दिन ऊपर की तरफ देखेंगे, उस विराट की तरफ, जिसमें सारी प्रकृति समाई हुई है; उस दिन आप दूसरे आदमी हो जाएंगे। उस दिन चोरी असंभव होगी। उस दिन क्रोध असंभव होगा। उस दिन बेईमानी मुश्किल हो जाएगी। उस दिन बेईमानी ऐसी ही होगी, जैसे कोई आदमी अपने एक खीसे से रुपए चुराकर दूसरे खीसे में रख ले। बस! ऐसे कुछ लोग हैं कि अपने ही एक खीसे से चुराकर अपने ही दूसरे खीसे में रख लेते हैं। सभी लोग ऐसे हैं, अगर सत्य दिखाई पड़े तो। क्योंकि आपका खीसा भी सिर्फ थोड़ी दूर, मेरा ही खीसा है।
जिस दिन परमात्मा दिखाई पड़े, उस दिन चोरी असंभव है, क्योंकि सबमें ही परमात्मा दिखाई पड़ेगा। अपनी ही चोरी कौन करता है? वह तो चोरी हम करते इसलिए हैं कि दूसरा दूसरा है। और जिस दिन परमात्मा दिखाई पड़े, उस दिन सब मालकियत का खयाल खो जाता है। क्योंकि जब असली मालिक का पता चल गया, तो हमें पता चल जाता है कि हम मालिक नहीं हैं, और हम मालिक नहीं हो सकते। जब मालकियत ही नहीं हो सकती, तो क्या चोरी? क्योंकि चोरी तो मालकियत की व्यवस्था है, किसी तरह मालकियत कायम करने की चेष्टा है।
कृष्ण कहते हैं, मुझमें तो सारी प्रकृति है, लेकिन मैं प्रकृति में नहीं हूं। तू मुझे खोज ले, तो पूरी प्रकृति तुझे मिल जाए। और तूने प्रकृति खोजी, तो तू मुझे न पा सकेगा। इसलिए तू सत्व गुण की बात मत कर। तू यह तम और रज की निंदा मत कर। ये तीनों मुझमें हैं। पर तू मेरी बात कर; तू मेरी शरण आ। टुकड़ों की बात मत कर; पूरे की बात कर। खंडों की बात मत कर; पूर्ण की बात कर।
खंडों में पूर्ण है, लेकिन पूर्ण में खंड नहीं है। यह आध्यात्मिक गणित का एक कीमती सूत्र है। कहां से शुरू करनी है यात्रा, उसे स्मरण दिलाने के लिए कृष्ण ने ऐसा कहा है।
एक छोटी-सी घटना मुझे याद आती है। सुना है मैंने कि कनफ्यूसियस के जमाने में चीन में दो चीनियों ने आमने-सामने दुकान खोली, होटल। एक का नाम था यिन और दूसरे का नाम था यांग; उन दोनों ने दुकानें खोलीं। दोनों की दुकानें अच्छी चलने लगीं, बहुत जोर से चलने लगीं। धन इकट्ठा होने लगा, तिजोड़ी भरने लगी। लेकिन दोनों का दुख भी बड़ा होने लगा, जैसा कि अक्सर होता है। सफलता के साथ न मालूम कैसी गहरी उदासी आने लगती है। क्योंकि आप अकेले ही सफल नहीं होते, दूसरा भी सफल हो रहा होता है।
दोनों परेशान हो गए। दोनों की दुकान अच्छी चलती है। भीड़-भड़क्का होता है। ग्राहक काफी आते हैं। लेकिन दोनों परेशान हो गए। दोनों का हृदय-चाप बढ़ गया। दोनों की नींद हराम हो गई। अनिद्रा पकड़ गई। दोनों चिकित्सकों का चक्कर लगाने लगे, लेकिन कोई रास्ता न सूझे। धन बढ़ता गया और बेचैनी बढ़ती चली गई। बेचैनी यह थी कि दोनों अपने-अपने काउंटर पर बैठकर देखते थे कि दूसरे की दुकान में कितने ग्राहक जा रहे हैं, उनकी गिनती करते थे। रात परेशान होते थे कि इतने ग्राहक चूक गए; अपने पास भी आ सकते थे।
चिकित्सकों ने कहा कि हम तुम्हारा इलाज न कर पाएंगे, क्योंकि यह बीमारी शारीरिक नहीं है। तुम कनफ्यूसियस के पास चले जाओ। उन्होंने कहा, कनफ्यूसियस इसमें क्या करेगा? वह उपदेश देगा। उपदेश से कुछ होने वाला नहीं है। सवाल असल यह है कि दूसरे की दुकान पर ग्राहक बहुत जा रहे हैं, और उन्हें हम देखते हैं। आंख बंद कर नहीं सकते हैं। सामने ही दुकान है। छाती पर चोट लगती है। हर बार एक आदमी भीतर प्रवेश करता है, फिर छाती पर चोट लगती है। नींद न जाएगी, तो होगा क्या!
फिर भी, चिकित्सकों ने कहा, तुम कनफ्यूसियस के पास जाओ। वह आदमी होशियार है, और वह आदमी की गहरी बीमारियों को जानता है।
वे दोनों गए। कनफ्यूसियस ने तरकीब बताई और वह काम कर गई और दोनों स्वस्थ हो गए। बड़ी मजेदार तरकीब थी। शायद ही इस जमीन पर किसी और होशियार आदमी ने ऐसी तरकीब कभी बताई हो।
कनफ्यूसियस ने कहा, पागलो। बड़ा सरल-सा इलाज है। दुकानें चलने दो, तुम एक-दूसरे के काउंटर पर बैठने लगो। यिन यांग के काउंटर पर बैठे, यांग यिन के काउंटर पर बैठे, तब तुम दोनों का चित्त बड़ा प्रसन्न होगा। दूसरे की दुकान में जो घुस रहे हैं, वे अपनी ही दुकान में जा रहे हैं! तुम ऐसा कर लो।
और कहते हैं, उन दोनों ने ऐसा कर लिया और उस दिन से उनकी सब बीमारियां समाप्त हो गईं। वे दिनभर बैठे मजा लेते रहते कि ठीक! काफी लोग जा रहे हैं अपनी दुकान में! वह दूसरे की दुकान अपनी हो गई अब।
जिस दिन कोई परमात्मा को झांक लेता है, उस दिन सब दुकानें अपनी हो जाती हैं, सब कुछ अपना हो जाता है। उस दिन भीतर की प्रफुल्लता का कोई अंत नहीं है। उस दिन फूल खिलते हैं भीतर के। सहस्र पंखुड़ियों वाला फूल उस दिन खिलता है भीतर का, क्योंकि उस दिन हम परम आनंद में विराजमान हो जाते हैं। सब अपने हैं। सब अपना है। सारा विराट अपना है।
लेकिन जो प्रकृति में खोजने जाएगा, वह न खोज पाएगा इसे। इसे तो परमात्मा में कोई खोजने जाएगा, तो प्रकृति में भी पा लेगा।
टेनिसन ने कहा है, एक वृक्ष के पास से निकलते हुए, एक दीवाल के पास से निकलते हुए, जिसमें एक छोटा-सा घास का फूल खिला है; निकलते वक्त उसने कहा है कि अगर मैं इस छोटे-से फूल के राज को समझ लूं, तो मुझे सारी दुनिया का राज समझ में आ जाए।
लेकिन अगर वह कृष्ण से पूछे, तो कृष्ण कहेंगे, तू कभी इस फूल के राज को न समझ पाएगा। अगर तुझे सारी दुनिया का राज समझ में आ जाए, तो इस फूल का राज समझ में आ सकता है।
धर्म की दृष्टि पूर्ण से नीचे की तरफ यात्रा करती है। अधर्म की दृष्टि खंड से ऊपर की तरफ यात्रा करती है। धर्म अवतरण है पूर्ण से नीचे की ओर। और हमारी सब सोच-समझ, हमारी तथाकथित सांसारिक समझ, नीचे से ऊपर की तरफ चढ़ाव है--एक-एक कदम, एक-एक सीढ़ी।
ध्यान रहे, पर्वत से उतरना सदा आसान है; पर्वत पर चढ़ना बहुत कठिन है। सबसे बड़ी कठिनाई तो यही होती है पर्वत पर चढ़ने में कि जिस कदम पर आप खड़े होते हैं, वहां आपने जो इकट्ठा कर लिया होता है, वही अगले कदम उठाने में बाधा बनता है। और हर कदम पर आप कुछ इकट्ठा करते चले जाते हैं। यश, धन, मान, सम्मान, मित्र, प्रियजन इकट्ठा करते हैं हर कदम पर। फिर हर अगले कदम पर यही फांसी बन जाते हैं; यही बोझ की तरह चारों तरफ लटक जाते हैं। ये कहते हैं, कहां जाते हो? हमें छोड़कर कहां जाते हो? ये सब तिजोड़ियां छाती से अटक जाती हैं।
ऊपर से नीचे की तरफ उतरना बड़ा ही सुगम है, जैसे सूरज की किरण उतरती है। नीचे से ऊपर की तरफ जाना बहुत कठिन है।
कृष्ण यह कह रहे हैं कि प्रकृति की तरफ अगर तूने ध्यान दिया, तो तू मुझ तक न आ पाएगा। यद्यपि प्रकृति मुझमें है, फिर भी तू मुझ तक न आ पाएगा, क्योंकि मैं छिपा हूं। और जो तुझे दिखाई पड़ेगा, वह मैं नहीं हूं; जो नहीं दिखाई पड़ेगा, वह मैं हूं। हां, तू मुझे देख ले, अदृश्य को; जब तू अदृश्य को देख लेगा, तो दृश्य में देख लेना तो बहुत सरल है।
जब कोई आदमी ध्वनिरहित ध्वनि को सुन ले, तो फिर ध्वनि को सुनना कठिन नहीं है। और जब कोई शब्दरहित शब्द को जान ले, तो फिर शब्दों को पहचानना कठिन नहीं है। और जब कोई विराट को देख ले, तो क्षुद्र को देखने में क्या अड़चन है!
इसलिए कृष्ण का तर्क, या कृष्ण की पद्धति पूर्ण से शुरू करने की है। समस्त धर्म की पद्धति पूर्ण से शुरू करने की है। समस्त विज्ञान की पद्धति खंड से, टुकड़े से शुरू करने की है, फ्राम दि पार्ट। और धर्म की पद्धति, फ्राम दि होल। वही विज्ञान और धर्म की पद्धतियों का बुनियादी भेद है।
विज्ञान शुरू करता है एटम से, अणु से। और अणु से छोटी चीज मिले, तो उससे। और भी छोटी चीज मिल जाए, तो उससे। जितनी क्षुद्र मिल जाए, विज्ञान उससे शुरू करेगा। क्योंकि जितनी क्षुद्र हो, आदमी अपने हाथ में उसे उतनी ही आसानी से ले सकता है। जितनी क्षुद्र हो, उतना ठीक से विश्लेषण हो सकता है। जितनी क्षुद्र हो, प्रयोगशाला में प्रयोग हो सकता है। जितनी क्षुद्र हो, आदमी उसका मालिक हो सकता है।
और धर्म शुरू करता है विराट से। निश्चित ही फर्क पड़ेगा। विराट को आप अपने हाथ में नहीं ले सकते। अगर विराट को जानना है, तो आपको स्वयं ही विराट के हाथों में गिर जाना होगा। क्षुद्र को आप अपने हाथ में ले सकते हैं। प्रयोगशाला की परखनली में जांच सकते हैं। काट-पीट कर सकते हैं। क्षुद्र के आप मालिक हो सकते हैं। लेकिन विराट के मालिक आप नहीं हो सकते हैं। विराट को ही आपको अपना मालिक बना लेना होगा।
इसलिए पूर्ण से जब धर्म शुरू होता है, तो समर्पण उसकी विधि हो जाती है। और चूंकि विज्ञान क्षुद्र से शुरू होता है, इसलिए संघर्ष उसकी विधि होती है। इसलिए विज्ञान सोचता है इन टर्म्स आफ कांकरिंग, जीतने की भाषा में। और धर्म सोचता है हारने की भाषा में, आदमी कैसे हार जाए परमात्मा के चरणों में।
इसलिए कृष्ण कहते हैं कि मैं तो छिपा हूं इस सब क्षुद्र में भी, लेकिन तू मुझसे शुरू कर।


त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्।। 13।।

गुणों के कार्यरूप सात्विक, राजस और तामस, इन तीनों प्रकार के भावों से यह सब संसार मोहित हो रहा है, इसलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को तत्व से नहीं जानता।

प्रकृति के मोह में सारे ही लोग हैं। अलग-अलग कारण होंगे मोह के, अलग-अलग बहाने होंगे। बस, बहाने ही अलग-अलग होते हैं, मोह का परिणाम एक ही होता है।
बड़ा क्रांतिकारी सूत्र है! सत्व, रज, तम, तीनों से ही जो मोहित हैं, वे मेरे तत्व को न जान पाएंगे, क्योंकि मैं बियांड हूं, मैं पार हूं तीनों के।
इसको समझना पड़ेगा। क्योंकि हमें लगता है, चोर नहीं जान पाएगा, बेईमान नहीं जान पाएगा; लेकिन हमें लगता है, सज्जन तो जान लेगा! सज्जन तो सत्व से मोहित है। हम कहते हैं, वह आदमी नहीं जान पाएगा, जो सिर्फ धन कमा रहा है। वह आदमी तो जान लेगा, जो जाकर मरीजों की सेवा कर रहा है! हम कहते हैं, वह आदमी भला न जान पाए, जो आदमी सिर्फ राजनीति की सीढ़ियां चढ़ रहा है। लेकिन वह आदमी तो जान लेगा, जो दीन-दुखियों के पैर दाब रहा है।
कृष्ण कहते हैं, सत्व, रज, तम, तीनों ही! वह जो बुरा दिखाई पड़ता है, वह तो मोहित है ही। वह जो भला दिखाई पड़ता है, वह भी मेरी ही प्रकृति के सत्व गुण से हिप्नोटाइज्ड है, वह भी मोहित है। यह बड़े मजे का है, और कठिन है थोड़ा; और थोड़ा जटिल है जानना ।
समझिए कि आप अपनी दुकान पर बैठे हैं, और आज अगर ग्राहक न आए, तो आप दुखी होते हैं। लेकिन आपको पता है कि किसी सेवक को अगर कोई सेवा करवाने वाला न मिले, तो आपसे कम दुख नहीं होता। इतना ही दुख हो जाता है। फर्क क्या हुआ? माना कि वह काम अच्छा कर रहा था, लेकिन परिणाम तो एक ही है।
अगर समाज इतना सुखद हो जाए, इतना मंगल को उपलब्ध हो जाए कि किसी व्यक्ति को समाज में समाज-सुधार के काम करने का मौका न मिले, तो आप जानते हैं, समाज-सुधारकों की कैसी हालत हो जाए! बड़ी मुश्किल में पड़ जाएं, बड़ी बेचैनी में। वह बेचैनी ठीक वैसी ही होगी, जैसे अचानक धंधा डूब जाए; ग्राहक न आएं; फैशन बदल जाए; आपकी दुकान की चीजें बिकनी बंद हो जाएं। वह पीड़ा उतनी ही होगी।
सत्व भी, अच्छा काम भी बिना परमात्मा को समर्पित हुए सिर्फ एक मोह है, और उससे भी अहंकार ही निर्मित होता है। इसलिए जिनको हम सात्विक लोग कहते हैं, वे भी अपने ढंग से अपनी अस्मिता को मजबूत करने में लगे रहते हैं।
परमात्मा के अतिरिक्त--वह जो पार है, वह जो परा है प्रकृति के ऊपर, उसके अतिरिक्त--सभी सम्मोहन है। सभी मोह के आधार बन जाते हैं; सभी मन को पकड़ लेते हैं, और सभी मन को मूर्च्छित कर देते हैं।
कृष्ण को यह कहने की जरूरत क्या है अर्जुन से? अर्जुन सत्व से मोहित हो रहा है, इसलिए कहने की जरूरत है।
बुद्ध के पास एक आदमी आया है एक सुबह और बुद्ध के चरणों में सिर रखकर उसने कहा, मुझे कुछ बताएं कि मैं दुनिया का कल्याण कर सकूं। बुद्ध ने उसकी तरफ नीचे देखा और कहा कि तू अपना ही कर ले, तो काफी है। तू दुनिया को क्यों मुसीबत में डालना चाहता है! तू अपना ही कर ले तो काफी है। तेरा कल्याण हो चुका? उसने कहा कि मैं कोई स्वार्थी आदमी नहीं हूं। मुझे मेरी फिक्र ही नहीं है; मुझे तो दुनिया की फिक्र है। बुद्ध ने कहा, जिसका खुद का दीया बुझा हो, वह किसके दीए जला सकेगा!
मगर वह आदमी कह रहा है, मैं स्वार्थी नहीं हूं, मुझे दुनिया की फिक्र है। लेकिन यह आदमी अगर कल्याण करने जाए, तो किसी के जले दीए और बुझा देगा। इससे कल्याण हो नहीं सकता।
परमात्मा के सिवाय कल्याण हो नहीं सकता। आदमी कैसे कल्याण करेगा? आदमी होना ही एक बीमारी है, एक डिसीज। और वह कहता है कि नहीं, मेरी उत्सुकता मुझमें, अपने आपमें नहीं है। मेरी उत्सुकता तो यह है कि दूसरों का भला कैसे हो!
बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को कहा कि देखो, यह एक पवित्र अहंकारी है। इसको यह भी अहंकार है कि यह स्वार्थी नहीं है। तो बुद्ध ने कहा, पहले तू अपना स्वार्थ तो साध ले। तू पहले स्वयं को तो जान ले। उसने कहा कि इन सब बातों में मुझे मत डालें। दुनिया में बड़ी तकलीफ चल रही है और मुझे सब बदलना है और सब ठीक कर देना है।
ये ठीक करने वाले हजारों साल से ठीक कर रहे हैं, दुनिया की तकलीफ बढ़ती जाती है, कम नहीं होती। अब तो ऐसा लगने लगा है कि किसी तरह समाज का समाज-सुधारकों से छुटकारा हो जाए, तो थोड़ी राहत मिले।
असल में दूसरे को बदलने और ठीक करने का भी एक रस है। और सारी दुनिया को ठीक कर देने में भी एक बड़ी मौज है, बड़ा रस है। और हरेक इस खयाल से जीता है कि मैं सारी दुनिया को ठीक कर दूंगा।
खुद को ठीक करना बहुत मुश्किल पाकर लोग दुनिया को ठीक करने निकल जाते हैं! खुद से बचने के लिए लोग हजार उपाय खोज लेते हैं। खुद की बीमारियां दिखाई न पड़ें, खुद की परेशानियां दिखाई न पड़ें, खुद की परेशानियों से पलायन हो जाए, तो दूसरे की परेशानियों में लग जाते हैं। भुलाने की तरकीबें हैं; लेकिन सात्विक हैं बातें, इसलिए मजा भी है।
चोर को तो आप कह भी दें कि तू बुरा काम कर रहा है, नष्ट कर रहा है अपने को। साधु को कैसे कहिएगा? वह तो सेवा कर रहा है। वह तो कोई बुरा काम कर नहीं रहा है। वह तो स्कूल खोल रहा है; धर्मशाला बना रहा है; अस्पताल बना रहा है। कोई बुरा काम नहीं कर रहा है। कोढ़ियों की मालिश कर रहा है; कोई बुरा काम नहीं कर रहा है।
लेकिन कृष्ण कहते हैं, सत्व, रज, तम, तीनों! चाहे कोई ऐसा कृत्य, जो बुरा हो; और चाहे कोई ऐसा कृत्य, जो भला हो; और भले और बुरे की तरफ दौड़ने की जो प्रवृत्ति है, वे तीनों ही प्रकृति हैं। और अर्जुन, तू ठीक से समझ ले कि जब तक इन तीन से कोई मोहित हुआ जी रहा है, तब तक वह मुझ पार को, वह जो अतीत है, वह जो अतिक्रमण कर जाता है, उसको उपलब्ध नहीं हो सकेगा।
इसका अर्थ? इसकी निष्पत्ति?
इसकी निष्पत्ति यह हुई कि परमात्मा को पाने के लिए बुरे के तो ऊपर उठना ही पड़ता है, भले के भी ऊपर उठ जाना पड़ता है। परमात्मा को पाने के लिए असदवृत्तियों को तो छोड़ ही देना पड़ता है, सदवृत्तियों को भी छोड़ देना पड़ता है। असल में उस परम स्वतंत्रता के लिए लोहे की जंजीरें तो तोड़नी ही पड़ती हैं, सोने की जंजीरें भी तोड़ देनी पड़ती हैं।
और ध्यान रहे, लोहे की जंजीरों से अक्सर ही सोने की जंजीरें ज्यादा जंजीरें सिद्ध होती हैं। क्योंकि लोहे की जंजीर को तो तोड़ने का मन भी होता है; सोने की जंजीर को बचाने का भी मन होता है। सोने की जंजीर आभूषण मालूम पड़ने लगती है। इसलिए बुराई से तो कोई आदमी उठने की तैयारी दिखलाता है, लेकिन भलाई से तो उठने की तैयारी भी नहीं दिखलाता।
तो कृष्ण कहते हैं, तू सत्व की बातों में मत पड़ अर्जुन। तू यह साधुता की बातें मत कर। क्योंकि मुझे पाए बिना कोई भी साधु नहीं है। उसके पहले सिर्फ धोखा है मन का। कुछ लोग बुरे ढंग से अपने को धोखा देते हैं, कुछ लोग भले ढंग से अपने को धोखा देते हैं। कुछ लोग दूसरों को नुकसान करके अपने को धोखा देते हैं, कुछ लोग दूसरों को लाभ पहुंचाकर अपने को धोखा देते हैं। लेकिन धोखा तब तक जारी रहता है, जब तक कोई प्रकृति के गुणों के ऊपर न उठ जाए।
नहीं; चित्त ऐसी अवस्था में चाहिए जहां न बुरा खींचता हो, न भला खींचता हो। न आकर्षित करती हों बीमारियां--क्रोध, काम, लोभ; न आकर्षित करते हों तथाकथित फूल--सेवा, सदभाव, मंगल, कल्याण। नहीं; कोई भी आकर्षित न करता हो।
और जब दोनों में से कोई भी आकर्षित नहीं करता, तो चित्त ठहर जाता है। नहीं तो दौड़ता रहता है। कभी बुरे के लिए, कभी भले के लिए; कभी साधु होने के लिए, कभी असाधु होने के लिए; दौड़ जारी रहती है। चित्त तो रुकता ही तब है, जब दोनों से मुक्त हो जाता है। और जब चित्त दोनों से मुक्त होता है, तब एक नए आयाम में यात्रा शुरू होती है, अंतर्यात्रा या ऊर्ध्वयात्रा शुरू होती है। तब व्यक्ति प्रकृति के ऊपर उठकर परमात्मा को अनुभव कर पाता है।
इसलिए हमने इस देश में साधु को वह मूल्य नहीं दिया, जो संत को दिया। साधु और असाधु ठीक है; एक ही दुनिया के रहने वाले लोग हैं। एक के हाथ में लोहे की जंजीरें हैं। एक के हाथ में सोने की जंजीरें हैं। एक बुरे कामों में उलझा है, लेकिन व्यस्त है उसी तरह, जैसा दूसरा भले कामों में उलझा है और व्यस्त है, आक्युपाइड है। लेकिन दोनों की नजरें जमीन पर लगी हैं। दोनों में से कोई आकाश की तरफ नहीं देख रहा है।
हमने उसे संत कहा है, जो न भले में उलझा है, न बुरे में। जो उलझा ही नहीं है; जिसने जमीन से नजर ऊपर उठा ली; जिसने आकाश को देखा है; जिसने परमात्मा को पहचाना है।
इसका यह मतलब नहीं है कि परमात्मा को पहचानने के बाद वह साधु नहीं होगा। वह साधु होगा। वही साधु होगा। लेकिन बुनियादी अंतर पड़ जाएंगे।
जिसने परमात्मा को नहीं पहचाना, उसकी साधुता असाधुता के खिलाफ एक संघर्ष होती है, एक सतत संघर्ष। असाधु भीतर मौजूद रहता है। वह तमस भीतर मौजूद रहता है। सत्व की लड़ाई चलती रहती है।
साधु का मतलब है, जिसने क्रोध को भीतर दबाया है; अक्रोधी हुआ। जिसने चोरी को भीतर दबाया; अचोर हुआ। जिसने परिग्रह को दबाकर छोड़ा; अपरिग्रही हुआ। जिसने अहंकार को दबाया, और विनम्र हुआ। लेकिन वे सब भीतर बीमारियां कतारबद्ध मौजूद हैं, और प्रतीक्षा कर रही हैं कि कब आप विश्राम करिएगा! कब! कब थोड़ा-सा अवकाश लेंगे अपने संघर्ष से!
इसलिए साधु रात सोने तक में डरते हैं, क्योंकि सोने में विश्राम हो जाता है। और जिस-जिस को दिन में दबाया है, वह सब सपना बनकर छाती पर घूमने लगता है। इसलिए साधु जरा भी विश्राम लेने में डरते हैं कि कहीं भी जरा विश्राम लिया और वह संघर्ष अगर थोड़ा भी शिथिल हुआ, तो मालूम है उन्हें भलीभांति कि दुश्मन मौजूद है।
सब साधु अपने भीतर असाधु को दबाए हुए हैं। और जब तक असाधु मौजूद है, साधु सिर्फ सतह है। भीतर तो सब उबल रहा है लावे की तरह। ज्वालामुखी की तरह भीतर आग लगी है। अभी धुआं दिखाई नहीं पड़ रहा; अभी ज्वालामुखी फूटा नहीं; लेकिन इससे ज्वालामुखी नहीं है, ऐसा कहने की कोई जरूरत नहीं। ज्वालामुखी भीतर तैयारी कर रहा है।
संत हम उसे कहते हैं, जो असाधुता से लड़कर साधु नहीं है। संत हम उसे कहते हैं, जिसने परमात्मा को देखा, और परमात्मा को देखने से साधु हो गया। कोई संघर्ष नहीं है। किसी को दबाया नहीं, किसी से लड़ा नहीं। इसलिए संत विश्राम से नहीं डरेगा। डरने का कोई सवाल ही नहीं है। उसे विपरीत की संभावना ही नहीं है। उसके भीतर से, परमात्मा को देखने से, असाधुता गिर गई।
संत वह है, जिसकी असाधुता गिर गई; और साधुता पनपी, प्रकट हुई। और साधु वह है, जिसने असाधुता को दबाया, और साधुता को कल्टिवेट किया, साधुता का अभ्यास किया; साधुता को थोपा, आरोपित किया। साधु की तरह अपने को नियोजित किया, संयमित किया; अपने को बनाया, तैयार किया। साधु की तरह जिसने अपने ऊपर मेहनत की। इसमें आदमी की मेहनत है। आदमी की मेहनत ज्यादा दूरगामी नहीं हो सकती। आदमी हमेशा प्रकृति से हार जाएगा। आदमी प्रकृति से बहुत कम है।
मैंने आपसे कहा, अब मैं एक और छोटा वर्तुल आपसे बनाने को कहता हूं। मैंने कहा, एक बड़ा वर्तुल खींचें, वह परमात्मा है। उसमें एक छोटा वर्तुल खींचें, वह प्रकृति है। उसमें और एक छोटा-सा वर्तुल खींचें, वह आदमी है।
मैंने आपसे कहा कि प्रकृति परमात्मा में है, लेकिन परमात्मा प्रकृति में नहीं है। अब मैं आपसे दूसरी बात कहता हूं। आदमी प्रकृति में है, लेकिन प्रकृति आदमी में नहीं है। वह आदमी और छोटा वर्तुल है।
तो आदमी प्रकृति के खिलाफ लड़ेगा अगर, तो हारेगा। प्रकृति से लड़ नहीं सकता; वह बड़ी है, उससे विराट है। प्रकृति आदमी में है, छिपी पूरी भीतर, गहरे में। आदमी उसका छोटा-सा हिस्सा दबाए हुए है। इसलिए आप रोज प्रकृति से हारते हैं, लेकिन आपको खयाल नहीं आता कि आप अपने से बड़ी शक्ति से लड़ रहे हैं; हारेंगे ही।
जब आप क्रोध से हारते हैं, तो आपको पता है, आप किससे लड़ रहे हैं? आप सोचते हैं कि क्रोध छोटी-मोटी चीज है। क्रोध छोटी-मोटी चीज नहीं है; प्रकृति का हिस्सा है। उसकी जड़ें गहरी हैं; आपके खून से ज्यादा गहरी; आपकी हड्डियों से ज्यादा गहरी; आपकी बुद्धि से ज्यादा गहरी। इसलिए आप हजार दफे तय कर लेते हैं बुद्धि से कि अब क्रोध नहीं करूंगा, और जब क्रोध आता है, तो पता नहीं बुद्धि कहां फिंक जाती है, और क्रोध आ जाता है। क्रोध गहरा है। आप ऊपर-ऊपर निर्णय करते रहते हैं, भीतर प्रकृति आपकी फिक्र नहीं करती।
अगर प्रकृति से आपने अपने ही भरोसे जीतने की कोशिश की, तो आप रोज हारेंगे। कभी-कभी साधु मालूम पड़ेंगे, फिर असाधुता प्रकट हो जाएगी। फिर साधु बनेंगे, फिर असाधुता प्रकट हो जाएगी। प्रकृति आपको हराती ही रहेगी।
अगर प्रकृति को हराना है, तो आदमी के भरोसे नहीं, बड़े वर्तुल, परमात्मा के भरोसे हराया जा सकता है। आदमी के भरोसे नहीं। तब सहारा उसका लें; उस बड़े वर्तुल के साथ सहारा लें। उसके साथ तत्काल जीत हो जाती है। उसके साथ प्रकृति उसी तरह हार जाती है, जैसे आपके साथ प्रकृति से आप हार जाते हैं।
प्रकृति से आप लड़ेंगे, तो आप हारेंगे। अगर परमात्मा को लड़ाएंगे, तो प्रकृति हारी ही हुई है; कोई सवाल नहीं है। कोई सवाल नहीं है, क्योंकि परमात्मा और भी प्रकृति के गहरे में है।
आप, जैसा मैंने कहा, सागर, सागर पर उठी लहरें, लहरों पर तैरता हुआ एक तिनका, ऐसा समझ लें। सागर परमात्मा, लहरें प्रकृति, और आप एक छोटे-से तिनके हैं लहरों के ऊपर। आप लहरों से भी नहीं लड़ सकते हैं। लहर से भी हार जाएंगे। आप कितना ही निर्णय करें कि हम तो लहर के ऊपर रहेंगे; लहर की मर्जी कि कब नीचे गिरा दे। लेकिन सागर का सहारा ले लें, तो फिर लहर कुछ भी नहीं है। क्योंकि सागर के सामने लहर की क्या औकात! क्या वश!
परमात्मा में निष्ठा का अर्थ, या परमात्मा के प्रति परायण होने का अर्थ, या परमात्मा में समर्पित होने का इतना ही अर्थ है कि प्रकृति से मनुष्य की सीधी लड़ाई असंभव है। हम परमात्मा में समर्पित होते हैं, समर्पित होते ही लड़ाई समाप्त हो जाती है। परमात्मा को देखते ही प्रकृति शांत हो जाती है--देखते ही।
यह करीब-करीब ऐसा ही घटित होता है, जैसे कि स्कूल के क्लास के बच्चे खेल रहे हैं, शोरगुल कर रहे हैं, और शिक्षक भीतर आया, और सब शांति हो गई। बच्चे अपनी जगह बैठ गए हैं; उन्होंने किताबें खोल लीं; अपना काम करने लगे। अभी शोरगुल था, अब सब शांत हो गया।
ठीक ऐसे ही परमात्मा की तरफ आंख उठते ही प्रकृति एकदम शांत हो जाती है। मालिक आ गया। प्रकृति का कोई उपाय नहीं रह जाता। लेकिन आप! आप तो प्रकृति के एक छोटे-से टुकड़े हैं, तिनके, और प्रकृति से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
सात्विक होने की चेष्टा बिना धार्मिक हुए, बिना परमात्मा में समर्पित हुए, प्रकृति से लड़ने की चेष्टा है। इन तीनों के पार है प्रभु। जब आपके चित्त में तीन चीजें न हों, तब आपका चित्त परमात्मा की तरफ उठेगा; सत्व न हो, तम न हो, रजस न हो। इनको थोड़ा-सा समझ लें कि कैसी स्थिति होगी, जब ये तीनों न होंगे।
बुरा करने की भावना न हो, भला करने की भावना न हो, जब ये दोनों भावनाएं नहीं होतीं, तो वह जो करने वाली ऊर्जा है, वह जो रजस है, वह जो शक्ति है...। ये दो काम करने के केंद्र बिंदु हैं। वह जो शक्ति है, जो करती है, जब ये दोनों नहीं रहते--बुरा करने का भाव नहीं, भला करने का भाव नहीं--तब वह जो शक्ति है, वह कहां जाए? और शक्ति तो कहीं जाएगी ही। अगर आप मार्ग न देंगे, तो भी जाएगी। अब न बुरे की तरफ जा सकती है, न भले की तरफ जा सकती है, तो अब कहां जाए?
जब दोनों दिशाएं बंद हो जाती हैं, तो शक्ति ऊपर की तरफ, तीसरे, थर्ड डायमेंशन में, तीसरी यात्रा पर उठने लगती है। और वह तीसरी यात्रा पर परमात्मा है, जहां न शुभ है, न अशुभ है। जहां दोनों नहीं, जहां द्वंद्व नहीं; जहां अद्वय है, जहां अद्वंद्व है, जहां अद्वैत है। उसकी एक झलक, और सारी प्रकृति शांत हो जाती है।
फिर कृष्ण कहते हैं कि तू उस झलक को पा ले और फिर तू बात करना साधुता की। करने की जरूरत न रहेगी; तू साधु हो जाएगा। तू साधु हो ही जाएगा। उसकी नजर पड़ी, कि तू बदला; तेरी नजर उस पर पड़ी, कि तू बदला। एक दफा उस दर्शन को...।
यह दर्शन शब्द बड़ा अदभुत है। इसका अर्थ है, एक दफा उसका दीदार, उसका दर्शन, एक दफे वह दिख जाए, बस। और उसे देखने के लिए इन तीन के ऊपर जाना जरूरी है।
इसलिए कृष्ण कहते हैं, मैं इन तीनों के पार हूं। इन तीनों तक प्रकृति है, ऐसा तू जानना। और जब इन तीनों के पार उठे, तब तू मुझे देख, और जान पाएगा।


दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। 14।।

यह अलौकिक अर्थात अति अदभुत त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है, परंतु जो पुरुष मेरे को ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात संसार से तर जाते हैं।

दुस्तर है, कठिन है, आर्डुअस है, अलौकिक है, बड़ी शक्ति है प्रकृति की, क्योंकि है तो परमात्मा की ही शक्ति। कठिन है, क्योंकि हम उसी शक्ति से निर्मित हैं, हमारा सब कुछ। सिर्फ हमारे भीतर जो परमात्मा है, उसे छोड़कर।
हमारा शरीर, हमारा मन, हमारी बुद्धि, हमारा सब कुछ प्रकृति से ही निर्मित है। जब हम मिट्टी से लड़ते हैं, तो हम मिट्टी को ही लड़ा रहे हैं। हम प्रकृति से ही प्रकृति को लड़ा रहे हैं। तो हम न जीत पाएंगे। बहुत दुस्तर हो जाएगी बात।
कृष्ण कहते हैं, विचित्र है, अदभुत है, अलौकिक है, असाधारण है यह शक्ति! क्योंकि शक्ति तो आखिर परमात्मा की ही है। माना कि कितनी ही छोटी लहरें हों, फिर भी हैं तो सागर की। यह सोचकर कि लहरें हैं, उनसे जूझ मत जाना। हमें डुबाने को तो वे लहरें भी काफी हैं। क्योंकि हम तो लहरों में भी और छोटी लहर हैं। कठिन है, अगर आदमी अपने बलबूते लड़े। कठिन है, अगर अपने पर ही भरोसा रखकर लड़े। अगर सोचता हो कि मैं ही पार कर लूंगा, तो कठिन है।
लेकिन कृष्ण कहते हैं, कठिन नहीं भी है, संभव भी है, अगर कोई मेरा सहारा ले ले। अगर कोई दिन-रात मुझे ही भजे, अगर कोई दिन-रात मुझको ही समर्पित रहे, अगर कोई मेरे ही हाथ में सारी बात छोड़ दे और कहे कि ठीक, अब तुम्हीं नाव को खेओ। अब मैं छोड़ता हूं; अब तुम मुझे ले चलो, जहां ले चलना हो। अगर कोई मुझ पर भरोसा कर सके, ट्रस्ट कर सके, तो बड़ी सरल है।
विराट शक्ति के साथ भरोसा हो, तो लड़ाई बहुत आसान है। खुद आदमी लड़ने की कोशिश करे, तो लड़ाई बहुत कठिन है; जीतना करीब-करीब असंभव है; हारना ही सुनिश्चित है। विराट के साथ हार असंभव है; विराट के साथ जीत सुनिश्चित है।
लेकिन विराट के हाथों में अपने को छोड़ने के लिए कृष्ण कहते हैं, दिन-रात मुझे ही भजे। क्या मतलब होगा दिन-रात भजने का? क्या कोई आदमी कृष्ण-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण कहता रहे? कई लोग कह रहे हैं। कुछ दिखाई नहीं पड़ता कि कुछ हुआ हो।
नहीं; भजना इतनी साधारण बात नहीं है। इसका यह मतलब भी नहीं है कि कोई कृष्ण-कृष्ण न कहे। भजना बहुत भाव की दशा है। भजने का अर्थ है, एक अंतःस्मरण। जहां भी, जो भी दिखाई पड़ जाए, उसमें कृष्ण का ही स्मरण। फूल दिखे, तो पहले फूल का खयाल न आए, पहले खयाल कृष्ण का आए। फिर कृष्ण फूल में खिल जाए; फिर फूल कृष्णरूप हो जाए। भोजन को बैठें, तो पहले खयाल भोजन का न आए, कृष्ण का आए। पेट में भूख लगे, तो पहले खयाल यह न आए कि मुझे भूख लगी है; पहले खयाल आ जाए, कृष्ण को भूख लगी है। ऐसा रोएं-रोएं में, उठते-बैठते, चलते-सोते; सांझ जब रात बिस्तर पर गिरने लगें, तो ऐसा खयाल न आए कि मैं सोने जा रहा हूं; ऐसा खयाल आए कि मेरे भीतर वह जो कृष्ण है, अब विश्राम को जाता है।
और यह शब्द से नहीं, यह भाव से। मैं तो आपसे कहूंगा, तो शब्द से ही कहूंगा। लेकिन यह भाव से खयाल आए। घर में आपके एक बच्चा पैदा हो, तो ऐसा न लगे कि बच्चा पैदा हुआ है; ऐसा लगे कि कृष्ण आए, या परमात्मा आया। कोई भी नाम से कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि सभी नाम उसी के हैं। लेकिन भाव यह हो कि परमात्मा है। सभी स्थितियों में--सुख में, दुख में, विपदा में, संपदा में--सभी स्थितियों में उसका ही स्मरण बना रहे। सभी कुछ उसको ही समर्पित हो जाए।
ऐसा जो दिन-रात भजे कोई, तो विराट से सम्मिलन शुरू हो जाता है। क्योंकि हमारी चेतना उसी तरफ बहने लगती है, जिस तरफ हमारी स्मृति होती है। स्मृति चेतना के लिए चैनेलाइजेशन है।
जैसे हम नहर बनाते हैं नदी में। नहर नहीं बनाते, तो नदी बहती है, जहां उसे बहना होता है। नहर बना देते हैं, तो फिर नदी नहर से बहती है। और जहां हमें ले जाना होता है, नदी वहां पहुंच जाती है।
स्मरण या जिसे संतों ने स्मृति कहा है, सुरति कहा है, बुद्ध ने राइट माइंडफुलनेस कहा है, सम्यक स्मृति; या और कोई सुमिरन या और भी नाम हैं हजार। भाव में प्रवेश कर जाए यह बात। सुबह जब नींद खुले, तो ऐसा न लगे कि मैं जग रहा हूं; ऐसा लगे कि मेरे भीतर परमात्मा जागा। और यह शब्द से नहीं; ऐसा आप सुबह उठकर कहें कि मेरे भीतर परमात्मा जागा, उससे बहुत अर्थ नहीं है। क्योंकि कहने का मतलब ही यह है कि आपको भाव पैदा नहीं हो रहा है। भाव पैदा हो, तो कहने की जरूरत नहीं है।
भाव और शब्द में फर्क है। शब्द धोखा देते हैं। एक आदमी बार-बार किसी से कहता है, मैं बहुत प्रेम करता हूं; मैं बहुत प्रेम करता हूं। तब वह धोखा देने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि जब प्रेम होता है, तो प्रेम शब्द-शून्य होता है; कहने की भी जरूरत नहीं होती पूरे प्राणों से प्रकट होता है; रोएं-रोएं से प्रकट होता है।
मां बच्चे से कह भी नहीं सकती कि मैं तुझे प्रेम करती हूं। कैसे कहेगी! बच्चा भाषा भी नहीं जानता। फिर भी बच्चा पहचानता है। रोएं-रोएं से, मां के चारों तरफ, प्रेम बहने लगता है। कोई भाषा नहीं है।
और बड़े मजे की बात है, मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर बच्चे को मां के पास बड़ा न किया जाए, तो फिर वह जिंदगी में किसी को भी प्रेम न कर पाएगा--किसी को भी। और मजा यह है कि मां कभी बच्चे से कहती नहीं कि मैं तुझे प्रेम करती हूं, क्योंकि वह तो भाषा भी नहीं जानता; उससे कहने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन उसे छाती से लगा लेती है। भाव की कोई धारा दोनों की छातियों के बीच आदान-प्रदान हो जाती है। उसकी आंखों में झांकती है। भाव की कोई धारा एक-दूसरे की आंख से उतर जाती है। उसका हाथ हाथ में लेती है, और भाव की कोई धारा हाथ-हाथ के पार चली जाती है। शब्द नहीं।
इसलिए मनोवैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी से तृप्त नहीं हो पाएगा। उसका कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति उस प्रेम को खोज रहा है, जो उसने मां से पाया था। मनोवैज्ञानिक इसको ऐसा कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी पत्नी में अपनी मां को खोज रहा है, जो कि बहुत मुश्किल मामला है। मिल नहीं सकता! इसलिए कभी तृप्ति नहीं हो सकती।
वह जो अनूठा प्रेम था--शब्दहीन, निःशब्द, मौन; जाना था जिसे, किसी ने कहा नहीं था कभी; किसी ने दावा नहीं किया था; लेकिन फिर भी बहा था और पहचाना था--उसी प्रेम की तलाश चल रही है जिंदगीभर। वह प्रेम फिर दुबारा नहीं मिलेगा, इसलिए बेचैनी है, इसलिए कठिनाई है, इसलिए अड़चन है।
मां की खोज चल रही है। वह नहीं मिलती। वह नहीं पकड़ में आती फिर कभी। वह कहां मिलेगी? वह कैसे मिल सकती है? उसका उपाय भी न के बराबर है। फिलहाल तो नहीं है। पर उसने तो कभी कहा नहीं था। पत्र नहीं लिखे थे; कोई प्रेम-पत्र नहीं लिखे थे, बड़े दावे नहीं किए थे। लेकिन फिर दावे करने वाले लोग आते हैं। दावे बहुत होते हैं, और भीतर कुछ भी नहीं होता।
सुना है मैंने कि एक प्रेमी अपनी प्रेमिका से कह रहा है कि अगर आग भी बरसती हो, तो भी तुझे बिना देखे मैं नहीं रह सकता। अगर प्रलय भी आ जाए, तो भी तुझे बिना देखे मैं नहीं रह सकता। अगर एटम बम भी बरसता हो, तो भी मैं तुझे देखे बिना नहीं रह सकता। फिर उसकी प्रेयसी ने, जब वह विदा हो रहा था, उससे पूछा कि कल आने वाले हो या नहीं? उसने कहा कि देखो; अगर सांझ वर्षा न हुई, तो मैं जरूर आ जाऊंगा
वह जो बेचारा कह रहा था, प्रलय आ जाए, आग बरसती हो, वह कह रहा है, कल अगर वर्षा न हुई, तो जरूर आ जाऊंगा! दावे हैं फिर, लेकिन दावों के पीछे कोई भाव नहीं है।
यह जो स्मरण है, यह जो प्रभु-परायण होने की बात है, यह जो कृष्ण कहते हैं, मुझे ही जो भजे चौबीस घंटे, इसका अर्थ? इसका अर्थ है, जो भाव से मुझमें जीए। उठे-बैठे कहीं भी, भाव से मुझमें रहे। चले-फिरे कहीं भी, भाव से मुझमें रहे। करे कुछ भी, भाव से मुझमें रहे। एक अंतर्धारा भाव की मेरी तरफ बहती रहे, बहती रहे, बहती रहे। धीरे-धीरे वह नहर खुद जाती है, जिससे व्यक्ति और परमात्मा के बीच सेतु बन जाता है।
और एक बार वह सेतु निर्मित हो जाए, फिर इस प्रकृति से ज्यादा निर्बल कोई चीज नहीं है। यह बहुत निर्बल है। बहुत दीन है प्रकृति। लेकिन जब तक वह सेतु न बने, महाशक्तिशाली है प्रकृति। क्योंकि ये सब तुलनात्मक वक्तव्य हैं। हमारी तुलना में प्रकृति बहुत शक्तिशाली है। परमात्मा की तुलना में कोई सवाल ही नहीं उठता। कोई प्रश्न ही नहीं है।
इसलिए आदमी अगर अपने पर भरोसा करे, तो उलझाएगा अपने को। और जब से आदमियत ने, पूरी आदमियत ने अपने पर भरोसा करना शुरू किया है, और जब से ऐसा लगा है कि ईश्वर को बीच में आने की कोई भी जरूरत नहीं है, हम काफी हैं; मैन इज़ इनफ, पर्याप्त है आदमी; तब से हमने आदमी की समस्याएं करोड़ गुना गहरी और गहन कर दी हैं। और सुलझाव कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। रोज उलझाव बढ़ता चला जाता है।
एक समस्या सुलझाते हैं, तो सुलझाने में पच्चीस नई समस्याएं खड़ी कर लेते हैं। उनको सुलझाने जाते हैं कि और हरेक समस्या से पच्चीस समस्याएं खड़ी होती हैं। सारा मनुष्य एक समस्या हो गया है; सिर्फ एक समस्या; जिसे कहीं से भी छुओ, और समस्या! जैसे सागर को कहीं से भी चखो, और नमकीन, नमक। ऐसे आदमी को कहीं से भी छुओ, और समस्याएं निकल आती हैं। कुछ भी करो, और समस्याएं। सब तरफ समस्याएं फैल गई हैं। क्या बात हो गई है?
असल में प्रकृति से लड़कर हम जो कर रहे हैं, उससे यही होना निश्चित था। प्रकृति दुस्तर है, उससे लड़ा नहीं जा सकता। उससे लड़कर हम सिर्फ अपने ऊपर मुसीबत बुला सकते हैं। हां, थोड़ी देर हम अपने को भ्रम में रख सकते हैं कि हम लड़ रहे हैं, और जीत जाएंगे। हम थोड़ी देर आशाएं बांध सकते हैं। लेकिन सब आशाएं धूल-धूसरित हो जाती हैं; सब मिट्टी में मिल जाती हैं।
फिर भी आदमी अजीब है, अब तक उसे खयाल नहीं आया। और हम एक-दूसरे को हिम्मत बढ़ाए चले जाते हैं। बाप बेटे को कहता है, कोई फिक्र नहीं; मैं नहीं जीता, तू जीत जाएगा। जरा परिस्थितियां ठीक न थीं। शिक्षक विद्यार्थी को कहे जाता है, कोई फिक्र नहीं। हम नहीं जान पाए कि सत्य क्या है, लेकिन तुम जान लोगे, क्योंकि अब ज्ञान और काफी विकसित हो गया है।
सुना है मैंने, एक आदमी एक रास्ते से गुजर रहा है, एक गरीब गधे को लिए हुए है। उसके ऊपर सामान काफी लादा हुआ है। जितना गरीब गधा हो, उतना ज्यादा सामान लाद देते हैं लोग! लेकिन रास्तेभर के लोग बड़े हैरान हैं, क्योंकि वह चिल्ला-चिल्ला कर कई नाम ले रहा है, और गधा एक है। कभी कहता है, शाबाश कल्लू! कभी कहता है, शाबास हीरा! कभी कहता है, शाबास माणिक! गधा एक है, और नाम इतने ले रहा है!
एक आदमी का आखिर धीरज टूट गया और उसने जाकर पास पूछा कि माफ करना, इस गधे का नाम क्या है? उसने कहा, इसका नाम कल्लू है। तो इतने नाम क्यों ले रहे हो? उसने कहा, ताकि इसको भरोसा बना रहे कि और भी गधे लदे हैं। और सब चल रहे हैं, तो मैं भी क्यों परेशान! चलता रहूं। उस कुम्हार ने कहा कि जरा मास-साइकोलाजी का उपयोग कर रहा हूं, भीड़ का मनोविज्ञान।
अगर गधे को पता चले कि अकेले कल्लू ही चल रहे हैं, तो बहुत मुश्किल में पड़ जाएंगे। वे बैठ जाएं, कि नहीं चलते! कोई दुनिया में नहीं चल रहा है, हम ही क्यों परेशान हों! लेकिन चारों तरफ गधे चल रहे हैं--माणिक भी, हीरा भी--सब चल रहे हैं, तो कल्लू भी चल रहे हैं। वे प्रसन्न हैं, क्योंकि अकेले तो लदे नहीं; सब लदे हैं। और जरूर कहीं पहुंच जाएंगे।
कहीं पहुंचना नहीं है। कहीं पहुंचना नहीं है।
अरब में एक छोटी-सी कहावत है। एक बूढ़े ऊंट से किसी ने पूछा कि तुम पहाड़ पर जाते वक्त ज्यादा आनंद अनुभव करते हो कि पहाड़ से नीचे जाते वक्त? उसने कहा, ये दोनों बातें फिजूल हैं। असली सवाल यह है कि मेरे ऊपर बोझ है या नहीं। ऊपर-नीचे का कोई सवाल नहीं है। मेरा दोनों वक्त एक ही काम रहता है। चाहे पहाड़ के नीचे जाऊं, तो बोझ ले जाता हूं। चाहे पहाड़ के ऊपर जाऊं, तो बोझ ले जाता हूं। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सदा बोझ ही ढोता हूं।
लेकिन हमें फर्क लगता है। कभी हम जब सफलता की तरफ जा रहे होते हैं, तो बोझ हम आसानी से ढोते हैं, क्योंकि हमें लगता है, पहाड़ उतार पर है। जल्दी पहुंच जाते हैं। पर हमें पता नहीं कि पहाड़ के नीचे जाकर करना क्या है? फिर नया बोझ लादना है, फिर पहाड़ पर चढ़ना है!
हर सफलता नई असफलता का बोध देगी। हर सफलता नई सफलता के लिए यात्रा बनेगी। हर सफलता पड़ाव होगी, मंजिल तो नहीं। मगर जब सफल होता है मन, तो हम ज्यादा बोझ ढो लेते हैं; और जब असफल होता है, तो जरा पीड़ित अनुभव करते हैं। लेकिन हम जिंदगीभर करते क्या हैं? शाबाश कल्लू! शाबास हीरा! शाबास माणिक! और चले जा रहे हैं।
यह जो हमारी, आदमी की आज की दशा है। और हम सब एक-दूसरे को कहे चले जाते हैं कि बढ़े जाओ, मंजिल बहुत पास है। बढ़े जाओ, मंजिल बहुत पास है। न हमें कोई मंजिल मिली है; न जिनसे हम कह रहे हैं, उन्हें कोई मिलेगी; लेकिन चलाए चले जाते हैं।
कृष्ण कह रहे हैं, मुझको परायण को उपलब्ध हो जा, मेरे प्रति समर्पित हो जा। इस दौड़ से बच। ये तीन प्रकृति के गुण और यह प्रकृति का पूरा का पूरा सम्मोहन का जाल, यह मेरी योगमाया है। यह मेरे हिप्नोसिस, यह मेरे सम्मोहन की शक्ति है। और इस सब में सारा जगत चल रहा है और दौड़ा चला जा रहा है। शाबास कल्लू! और दौड़े चले जा रहे हैं। रुक। और तू मेरे स्मरण में लग। अगर तुझे सम्मोहन के बाहर आना है, तो परमात्मा के स्मरण में लग।
परमात्मा का सम्मोहन डी-हिप्नोटाइजिंग है; वह सम्मोहन को तोड़ता है, वह एंटीडोट है। देखें, उदाहरण के लिए मैं आपको कहूं कि वह कैसे एंटीडोट है।
रास्ते पर एक खूबसूरत स्त्री आपको दिखाई पड़ी। आपने अपने मन में कहा, शाबाश कल्लू! और चले। चल पड़े आप। उस वक्त थोड़ा स्मरण करें। स्मरण करें कि वह जो स्त्री है सामने, वहां भी कृष्ण हैं। और स्मरण करें अपने भीतर कि वहां जो, जिसको आप कल्लू कह रहे हैं, वहां भी कृष्ण हैं। और फिर देखें कि बीच में वह जो सम्मोहन पैदा हुआ था वासना का, वह एकदम गिर जाता है या नहीं!
फौरन गिर जाएगा। अचानक आप पाएंगे कि कोई अंधेरा बीच से उठ गया; कोई पर्दा बीच से हट गया। कोई चीज बीच से टूट गई, सरक गई, तत्काल।
एक आदमी ने आपको गाली दी है और आपके भीतर क्रोध का धुआं उठा। वह सम्मोहन है प्रकृति का। बटन दबा दी उसने आपकी। बस, अब आपका पंखा भीतर चलने लगा। उस वक्त जरा स्मरण करें, उस ओर भी कृष्ण हैं, इस ओर भी कृष्ण हैं। और तब आप अचानक पाएंगे कि भीतर क्रोध जो पंख फैलाता था उड़ने के लिए, उसने पंख सिकोड़ लिए।
डी-हिप्नोटाइजिंग है स्मरण। परमात्मा का स्मरण सम्मोहन- तोड़क है। और अगर परमात्मा को भूले और अपना ही स्मरण रखा कि मैं ही सब कुछ हूं, तो यह मैं जो है, यह बहुत मादक है। और यह सम्मोहन को गहन करता है, और मूर्च्छित करता है, बेहोश करता है। फिर हम दौड़े चले जाते हैं। यह तीन का खेल चलता रहता है चारों तरफ। यह प्रकृति की तीन की लीला चलती रहती है; ट्राएंगल; हम दौड़ते रहते हैं उसमें।
इससे कब ऊपर उठेंगे? इससे उठने का द्वार कहां है? इससे उठने का द्वार है, प्रभु-स्मरण। कहीं से भी स्मरण मिलता हो! कहीं से भी स्मरण मिलता हो!
लेकिन हमारी तो बड़ी अजीब हालतें हैं। यहां कुछ संन्यासी मेरे नाम के साथ भगवान लगाकर चिल्ला देते हैं। मैं चुप रह जाता हूं यह सोचकर कि आज नहीं कल वे मेरा नाम भी छोड़ देंगे और सिर्फ भगवान का नाम ही उच्चारित करेंगे। क्योंकि उसमें भगवान शब्द झूठ नहीं है, उसमें मेरा नाम ही झूठ है।
लेकिन मेरे पास चिट्ठियां आती हैं लोगों की कि आप लोगों को मना क्यों नहीं करते कि भगवान लगाना बंद करें; सिर्फ रजनीश कहें; आचार्य रजनीश कहें; भगवान लगाना बंद करें। लोगों की चिट्ठियां आती हैं! वे समझते हैं बहुत होशियार लोग हैं, जो मुझे चिट्ठियां भेजते हैं।
एक आदमी ने चिट्ठी नहीं भेजी कि वह कहता कि रजनीश कहना बंद कर दें, क्योंकि दोनों बात एक साथ नहीं हो सकतीं। जब तक रजनीश हूं, तब तक भगवान होना मुश्किल। जब भगवान हो जाऊं, तो रजनीश होना मुश्किल। ये दोनों कंट्राडिक्टरी हैं।
लेकिन वे चिट्ठियां, होशियार लोग जो हैं--होशियार का मतलब कि जिनके पास कोई यूनिवर्सिटी का कागज का टुकड़ा वगैरह है--वे फौरन चिट्ठी भारी...। मुझे कई चिट्ठियां, दस-पांच चिट्ठियां आईं कि फौरन बंद करवाइए! यह क्या हो रहा है?
अक्ल के तो हम जैसे दुश्मन हैं। लट्ठ लेकर अक्ल के पीछे पड़े हुए हैं। चलो, यही बहाना अच्छा; भगवान का ही तो नाम ले लेते हैं। खूंटी मेरी भी सही, तो क्या हर्जा! खूंटी तुड़वा लेंगे। खूंटी कोई बड़ी चीज नहीं है। भगवान जैसा भजन रखोगे, खूंटी कितनी देर बचेगी! खूंटी गिर ही जाएगी। लेकिन नहीं; जिनको यह तकलीफ होती है, उनकी तकलीफ का कारण है। स्मरण जैसी चीज का उन्हें कोई पता नहीं है।
एक और मजे की बात है कि मैं सदा आपके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता रहा। तब किसी ने मुझे चिट्ठी लिखकर नहीं भेजी कि हमको आप परमात्मा क्यों कहते हैं? किसी आदमी ने चिट्ठी लिखकर नहीं भेजी मुझे कि आप हमको परमात्मा क्यों कहते हैं? मैंने बहुत दिन कहकर देख लिया। मैंने सोचा कि वह कुछ सुनाई नहीं पड़ता आपको। मैंने बंद कर दिया।
अब यह दूसरे छोर से इन लोगों ने शुरू कर दिया। यह छोर दूसरा है; बात वही है। लेकिन अब उनको बड़ी बेचैनी हो रही है। उन्हीं सज्जनों को, जिनको कि मैं निरंतर कहता रहा कि आपके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। उन्होंने बड़े मजे से स्वीकार किया था। उनको अब बड़ी अड़चन हो रही है कि ये भगवान का नाम क्यों ले रहे हैं?
स्मरण का हमें कोई पता नहीं है। अच्छा ही है, इस बहाने आपके कान में पड़ गया।
कल तो एक मित्र ने आकर कहा कि अगर अब दोबारा इन्होंने लिया, तो मैं सुनने ही नहीं आऊंगा। बहुत मजेदार है। वे मुझे सुनने आते हैं। कहते हैं, सुनना मुझे प्रीतिकर है। आपकी बात ठीक लगती है। लेकिन यह भर नहीं होना चाहिए, यह भगवान का नाम।
भगवान से ऐसी क्या दुश्मनी है? मुझसे तो दुश्मनी नहीं मालूम पड़ती उनकी। क्योंकि कहते हैं, आपको सुनने में अच्छा लगता है। हम रोज आना चाहते हैं। भगवान से दुश्मनी मालूम पड़ती है।
मत आएं। बिलकुल न आएं। और पिछली दफे भी जो आए हों, उसको बिलकुल भूल जाएं। क्योंकि वह बेकार है। क्योंकि मैं जो बोल रहा हूं, वह सिर्फ इसलिए बोल रहा हूं कि मुझमें ही नहीं सब जगह, जहां भी कभी कुछ दिखाई पड़े, भगवान ही दिखाई पड़े; उसके लिए बोल रहा हूं। और मुझे सुनने का कोई प्रयोजन नहीं है। आप बिलकुल मत आएं। क्या जरूरत है? यहां कोई शाबाश कल्लू, आपको कोई दौड़ तो लगवानी नहीं है मुझे।

आज इतना ही।

लेकिन उठना मत। जो उठ जाएगा मैं समझूंगा, शाबाश कल्लू! आप बैठे रहेंगे अपनी जगह। थोड़ा हम भगवान का स्मरण करते हैं। उसमें आनंदित हों।