(सदमा - उपन्यास)
उधर
ये खबर सून कर सोनी बहुत खुश हुई की नेहालता आ रही है। उसने जाते हुए भी पेंटल के
मुख से जो सूना था। ये सब बाते जान कर उसे एक उम्मीद थी। की जरूर ये लड़की अपने
अंदर एक साहास रखती है। इनमें एक संकल्प है, इतना
साहास कम ही व्यक्तियों में पाया जाता है। कौन भला दूसरे की आग में अपना हाथ जलाना
चाहेगा। देखना मेरा मन कहता है कि एक दिन ये जरूर अपने लक्ष्य को पा लेगी। जब मन
प्रसन्न होता है तो मानव का तन भी कैसा उड़ान भरने लग जाता है। मानो वह आनंद उत्सव
के पंखों पर बैठ कर उड़ रहा है। उस लड़की (नेहलता) की तारीफ कर के जब पेंटल उसे
फोन पर बता रहे थे तो उसे कोई जलन नहीं हो रही थी। उन दोनों का प्रेम कैसा अनूठा
और विचित्र था। न जानते हुए भी एक दूसरे को कितना अधिक जान गए थे। एक ही मिलन में
कैसे प्यास बूझ गई थी सोनी की जैसे स्वाती की एक बूंद का इंतजार सागर किनारे वह
सीप कर रही थी। की जैसे ही स्वाती की वो बूंद आये और वह पूर्ण हो अपने को तृप्त
पाये। और मोती बनने तक नीचे सागर की तलहटी में चली जाये। एक खामोश गहरी नींद में। इसी
सब का नाम तृप्ति है जहां होता है केवल मिलन का अनुभव व रसा स्वाद जो उसे गहरे-और
गहरे खिंचता ही रहता है। सोनी का मन गुनगुना रहा था.....
जब
से साजन मोह अंग लगाया, तन मन की
प्यास बुझाई।
आनंद
उत्सव आँगन उतरा,
नव जीवन न ली अंगडाई।
जहाज का टिकट ले कर जितनी देर में नेहालता पहुंचे, उससे कुछ ही देर पहले उनके पिता घर पहुंचे थे। सब ने पहले हाथ मूंह धोकर खाना खाया। फिर सब लोग जब कुछ विश्राम के बाद श्याम को उठे तो सबका मन भारी था। परंतु नेहालता को अपने अंदर कुछ नया पन लग रहा था। कि वह किसी अंजाने पथ पर जा रही है। जहां आपका अपना जानने वाला कोई नहीं है, आप उस परिवार का एक सदस्य बनने जा रही हो बिना किसी नाते रिश्ते के। जिसे उसके माता पिता से स्वीकार किया है। ये उनके लिए बहुत बड़ी बात है।




























