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बुधवार, 1 मार्च 2017

नेति-नेति-(सत्‍य की खोज)-प्रवचन-04



प्रवचन-चौथा

नेति-नेति-ओशो

प्रिय आत्मन,
मनुष्य के जीवन में जो सबसे बड़ा दुर्भाग्य है, वह शायद यही कि जीवन से उसकी आत्म-एकता, उसकी एकतानता टूट गयी है। जीवन से हम कुछ दूर-दूर खड़े हो गये हैं। जीवन और हमारे बीच कोई सेतु नहीं रहा, कोई संबंध नहीं रहा
मां के पेट से बच्चे का जन्म होता है, तब शरीर तो टूट जाता है मां से अलग। तब एक भेद एक पृथकता की यात्रा शुरू होती है; जो मां के साथ संयुक्त और इकट्ठा था, वह पृथक हो जाता है। शायद उसी पृथकता से यह भ्रम पैदा होता है कि शरीर अलग हो गया, इसलिए प्राण भी अलग हो गये होंगे। शायद शरीर अलग हो गया, इसलिए भीतर के जीवन में भी भेद पड गया होगा।

मां के शरीर से बच्चे का शरीर अलग होता है, लेकिन आत्मा एक और अपृथक है, समस्त जीवन से। वहां कोई भेद नहीं, वहां कोई भिन्नता नहीं। लेकिन उस अभेद का, उस अद्वैत का, हमें कोई अनुभव नहीं होता, कोई स्मरण नहीं होता, कोई बोध नहीं होता!
मनुष्य के जीवन में यही दुर्भाग्य है। इस दुर्भाग्य को ही पार कर जाना साधक कि लिए दूसरा चरण है।
पहले चरण में मैंने आपसे कहा, ज्ञान मिथ्या है, ज्ञान असत्य है। सीखे हुए शब्द, सिद्धांत और शास्त्रों से ज्यादा नहीं। अज्ञान, इग्नोरेंस मनुष्य की वस्तु-स्थिति है। अज्ञान को जो स्वीकार कर लेता है और इस स्मरण से भर जाता है कि मैं नहीं जानता हूं, जीवन और उसके बीच की पहली दीवाल गिर जाती है।
लेकिन एक दूसरी दीवाल भी है। उसके संबंध में ही आज सुबह मुझे आपसे बात करनी है। वह भी गिर जानी चाहिए, जो ही व्यक्ति परमात्मा के सत्य को अनुभव कर सकता है। जो परमात्मा का सत्य है, वही स्वयं का सत्य भी है। उसे कोई जीवन कहे, उसे कोई मोक्ष कहे, उसे कोई ईश्वर कहे, इससे कोई भी भेद, कोई भी फर्क नहीं पड़ता है। दूसरे दुर्भाग्य की दीवाल पहले दुर्भाग्य की दीवाल ज्ञान की दीवाल है। दूसरे दुर्भाग्य की दीवाल क्या है?
जो भी जीया जा सकता है। जो भी जाना जा सकता है, उसके साथ एक हो जाना अनिवार्य है।
एक छोटी-सी घटना से मैं समझाने की कोशिश करूंगा।
कोई डेढ़ हजार वर्ष पहले चीन के एक सम्राट ने सारे राज्य के चित्रकारों को खबर की कि वह राज्य की मुहर बनाना चाहता है। मुहर पर एक बांग देता हुआ, बोलता हुआ मुर्गा, उसका चित्र बनाना चाहता है। जो चित्रकार सबसे जीवंत चित्र बनाकर ला सकेगा, वह पुरस्कृत भी होगा, राज्य का कलागुरु भी नियुक्त हो जायेगा। और बड़े पुरस्कार की घोषणा की गयी।
देश के दूर-दूर कोनों से श्रेष्ठतम चित्रकार बोलते हुए मुर्गे के चित्र बनाकर राजधानी में उपस्थित हुए। लेकिन कौन तय करेगा कि कौन-सा चित्र सुंदर है? हजारों चित्र आये थे। राजधानी में एक बूढ़ा कलाकार था। सम्राट ने उसे बुलाया कि वह चुनाव करे, कौन-सा चित्र श्रेष्ठतम बना है। वही राज्य की मुहर बन जायेगा।
उस चित्रकार ने उन हजारों चित्रों को एक बड़े भवन में बंद कर लिया और स्वयं भी उस भवन के भीतर बंद हो गया! सांझ होते-होते उसने खबर दी कि एक भी चित्र ठीक नहीं बना है! सभी चित्र गड़बड़ हैं! एक से एक सुंदर चित्र आये थे। सम्राट स्वयं देखकर दंग रह गया था। लेकिन उस बूढ़े चित्रकार ने कहा, कोई भी चित्र योग्य नहीं हैं!
राजा हैरान हुआ। उसने कहा, "तुम्हारे मापदंड क्या हैं, तुमने किस भांति जांचा कि चित्र ठीक नहीं है। '
उसने कहा, मापदंड एक ही हो सकता था और वह यह कि मैं चित्रों के पास एक जिंदा मुर्गे को ले गया और उस मुर्गे ने उन चित्रों के मुर्गों को पहचाना भी नहीं, फिक्र भी नहीं की, चिंता भी नहीं की! अगर वे मुर्गे जीवंत होते चित्रों में तो वह मुर्गा घबराता या बांग देता, या भागता, या लड़ने को तैयार हो जाता! लेकिन उसने बिलकुल उपेक्षा की, उसने चित्रों की तरफ देखा भी नहीं! बस एक ही क्राइटेरियन, एक ही मापदंड हो सकता था। वह मैंने प्रयोग किया। कोई भी चित्र मुर्गे स्वीकार नहीं करते हैं कि चित्र मुर्गों के हैं।
सम्राट ने कहा, यह तो बड़ी मुसीबत हो गयी। यह मैंने सोचा भी नहीं था कि मुर्गों से परीक्षा करवायी जायेगी चित्रों की! लेकिन उस बूढ़े कलागुरु ने कहा कि मुर्गों के सिवाय कौन पहचान सकता है कि चित्र मुर्गे का है या नहीं?
राजा ने कहा, "फिर अब तुम्हीं चित्र बनाओ। '
उस बूढ़े ने कहा, "बड़ी कठिन बात है। इस बुढ़ापे में मुर्गे का चित्र बनाना बहुत कठिन बात है। '
सम्राट ने कहा, "तुम इतने बड़े कलाकार, एक मुर्गे का चित्र नहीं बना सकोगे?'
उस बूढ़े ने कहा, "मुर्गे का चित्र तो बहुत जल्दी बन जाये, लेकिन मुझे मुर्गा होना पड़ेगा। उसके पहले चित्र बनाना बहुत कठिन है। '
राजा ने कहा, "कुछ भी करो। '
उस बूढ़े ने कहा, "कम से कम तीन वर्ष लग जायें, पता नहीं मैं जीवित बचूं या न बचूं। '
उसे तीन वर्ष के लिए राजधानी की तरफ से व्यवस्था कर दी गयी और वह बूढ़ा जंगल में चला गया। छह महीने बाद राजा ने लोगों को भेजा कि पता लगाओ, उस पागल का क्या हुआ? वह क्या कर रहा है?
लोग गये। वह बूढ़ा जंगली मुर्गों के पास बैठा हुआ था!
एक वर्ष बीत गया। फिर लोग भेजे गये। पहली बार जब लोग गये थे, तब तो उस बूढ़े चित्रकार ने उन्हें पहचाना भी लिया था कि वे उसके मित्र हैं और राजधानी से आये हैं। जब दोबारा वे लोग गये तो वह बूढ़ा करीब-करीब मुर्गा हो चुका था। उसने फिक्र भी नहीं की और उनकी तरफ देखा भी नहीं, वह मुर्गों के पास ही बैठा रहा!
दो वर्ष बीत गये। तीन वर्ष पूरे हो गये। राजा ने लोग भेजे कि अब उस चित्रकार को बुला लाओ, चित्र बन गया हो तो। जब वे गये तो उन्होंने देखा कि वह बूढ़ा तो एक मुर्गा हो चुका है, वह मुर्गे जैसी आवाज कर रहा है, वह मुर्गों के बीच बैठा हुआ है, मुग उसके आसपास बैठे हुए हैं। वे उस बूढ़े को उठाकर लाये। राजधानी में पहुंचा, दरबार में पहुंचा।
राजा ने कहा, "चित्र कहां है?'
उसने मुर्गे की आवाज की! राजा ने कहा, "पागल, मुझे मुर्गा नहीं चाहिए, मुझे मुर्गा का चित्र चाहिए। तुम मुर्गे होकर आ गये हो। चित्र कहां है?'
उस बूढ़े ने कहा, "चित्र तो अभी बन जायेगा। सामान बुला लें, मैं चित्र बना दूं। ' और उसने घड़ी भर में चित्र बना दिया। और जब मुर्गे कमरे के भीतर लाये गये तो उस चित्र को देखकर मुर्गे डर गये और कमरे के बाहर भागे।
राजा ने कहा, "क्या जादू किया है इस चित्र में तुमने?'
उस बूढ़े ने कहा, "पहले मुझे मुर्गा हो जाना जरूरी था, तभी मैं मुर्ग को निर्मित कर सकता था। मुझे मुर्गे को भीतर से जानना पड़ा कि वह क्या होता है। और जब तक मैं आत्मसात न हो जाऊं, मुर्गे के साथ एक न हो जाऊं, तब तक कैसे जान सकता हूं कि मुर्गा भीतर से क्या है, उसकी आत्मा क्या है?'
आत्म-ऐक्य के बिना, जीवन के साथ एक हुए बिना, जीवन के प्राण को, जीवन की आत्मा को भी नहीं जाना जा सकता। जीवन का प्राण ही प्रभु है। वही सत्य है। जीवन के साथ एक हुए बिना कोई रास्ता नहीं है कि कोई जीवन को जान सके।
और जिसे हम जानते नहीं, उसे हम जी भी कैसे सकते हैं? इसीलिए तो हम सिर्फ नाममात्र को जीवित मालूम होते हैं--नाममात्र को। इसीलिये तो हम मृत्यु से भयभीत प्रतीत होते हैं, क्योंकि जो व्यक्ति एक बार जीवन के स्वाद को चख लेगा, उसके लिए मृत्यु बचती ही नहीं, उसके लिए कोई मृत्यु नहीं रह जाती। मृत्यु का भय इस बात की खबर है कि हमें जीवन का कोई भी पता नहीं है।
जीवन का पता होगा भी नहीं। हमने जीवन के साथ कभी एकता, एकतानता नहीं साधी, कभी हम लयबद्ध नहीं हुए। यह कैसे टूट गयी है लय, यह संगीत हमारा विच्छिन्न कैसे हो गया? जीवन के और हमारे बीच यह दरार, यह खाई कैसे पैदा हो गयी? इसे समझ लेना जरूरी है तो शायद यह खाई इसी क्षण पूरी भी की जा सकती है।
यह खाई पैदा हो गयी है मनुष्य-जाति में--आज तक मनुष्य को समझाने वाले कुछ ऐसे लोगों के कारण, जिन्होंने जीवन की निंदा की है, जीवन का विरोध किया है, जीवन को असार कहा है, जीवन को दुख कहा है, जीवन को छोड़ देने योग्य कहा है, जीवन से मुक्त हो जाने के लिए कहा है।
जिन लोगों ने भी, जिन शिक्षाओं ने भी जीवन की निंदा की है, जीवन का कंडेमनेशन किया है, उन शिक्षाओं ने ही मनुष्य और जीवन के बीच एक खाई खड़ी कर दी है। जिसकी निंदा हो, जिसका विरोध हो, जो असार हो, व्यर्थ हो, उसके साथ संबंधित होने का मार्ग कहां रह जाता है?
और हमने जीवन की सब भांति निंदा की है। शरीर की निंदा की है, क्योंकि शरीर जीवन का प्रकट रूप है। संसार की निंदा की है, क्योंकि संसार परमात्मा का प्रगट रूप है। पदार्थ की निंदा की है, क्योंकि पदार्थ प्राण का प्रकट रूप है। जो भी प्रकट है, उस सबकी हमने निंदा की है!
और अप्रकट की प्रशंसा की है! अप्रगट पर न मुट्ठी बांधी जा सकती है, न अप्रगट को छुआ जा सकता है, न अप्रगट को देखा जा सकता है। अदृश्य की तो केवल बातें की जा सकती हैं, दिखायी तो पड़ता है दृश्य। अरूप की तो केवल चर्चा हो सकती है, पकड़ में तो आता है रूप। और रूप की, आकार की, दृश्य की निंदा की गयी है! स्वभावतः अरूप की सिर्फ चर्चा रह गयी है हमारे हाथों में।
और स्मरण रहे कि रूप को जो जान ले, वह अरूप से परिचित हो सकता है। जो पदार्थ को जान ले, वह अपदार्थ से परिचित हो सकता है। जो शरीर को पहचान ले, वह आत्मा से भी संबंधित हो सकता है। लेकिन जो रूप का ही विरोध कर दे, वह अरूप तक जाने की अपनी सीढ़ी ही तोड़ देता है, इसका उसे कुछ पता ही नहीं है।
लेकिन रूप की, और आकार की और जीवन की, पदार्थ की और शरीर की, और संसार की इतनी निंदा की गयी है, इतना विरोध किया गया है, इतनी घृणा जाहिर की गयी है, जिसका हिसाब लगाना आज कठिन है।
काश, जीवन की इतनी प्रशंसा की गयी होती! काश, इतने लोगों ने जीवन के आनंद के गीत गाये होते! काश, इतने मुखों से, इतनी वाणियों से जीवन की गरिमा और गौरव अभिव्यक्त हुआ होता! तो आज पृथ्वी दूसरी होती, आज पृथ्वी धर्म से भरी होती, आज जीवन आनंद से भरा होता, आज जीवन एक संगीत बन गया होता।
लेकिन मनुष्य-जाति के अब तक के शिक्षकों ने जीवन की निंदा की है, विरोध किया है। यह जो विरोध है, यह जो जीवन की बुनियादी रूप से निंदा है, कंडेमनेशन है,उसने हमारे और जीवन के बीच अगर एक दीवाल खड़ी कर दी हो तो बिलकुल स्वाभाविक है।
धर्म का विचार करते ही यह ख्याल आना शुरू हो जाता है कि जीवन व्यर्थ है, जीवन छोड़ देना है, जीवन से हट जाना है, जीवन से मुक्त हो जाना है, आवागमन से मुक्त हो जाना है! धर्म का चिंतन ही कुछ मरणोन्मुखी, कुछ स्युसाइडल, कुछ आत्महत्यावादी, कुछ जीवन-निषेध का बन गया है। जीवन के आनंद में सम्मिलित होने का आमंत्रण नहीं मालूम होता। धर्म जीवन पर आंख बंद कर लेने का, जीवन से हट जाने का, उदासीन हो जाने का निमंत्रण मालूम होता है।
और जब हम चित्त से उदासीन हों और चित्त से असार समझें और चित्त हमारा यह कहे कि सब व्यर्थ है। और हम जन्मे, यह हमारे पापों का कारण है। और जिस दिन हमारे पाप नष्ट हों जायेंगे, उस दिन हमारे जन्म का भी कोई कारण न रह जायेगा। हम मोक्ष में उस जगह, जहां कोई जन्म नहीं, कोई मृत्यु नहीं; जहां कोई देह नहीं; जहां कोई इंद्रियां नहीं; जहां कोई रूप नहीं, उस अरूप में प्रविष्ट हो जायेंगे। यह जो भाव-दशा न हो तो फिर जीवन की इस वृहत लीला से संबंधित नहीं हुआ जा सकता है।
यह बात सबसे पहले समझ लेने जैसी है कि मनुष्य को अधार्मिक बनाने वाले लोग, वे लोग नहीं हैं, जिन्होंने ईश्वर को इंकार किया है। वे लोग भी नहीं, जिन्होंने आत्मा को अस्वीकार किया है। बल्कि वे लोग, जिन्होंने रूप का खंडन किया है और निंदा की है और जीवन की प्रकट अभिव्यक्ति को असार कहा है।
एक स्मरण मुझे आता है। एक मित्र, एक संन्यासी, मेरे पास कुछ दिन मेहमान थे। आते ही मेरे आसपास जो बड़ी बगिया थी, जिसमें बहुत फूल थे; आते ही उन्होंने फूलों को ऐसे देखा है, जैसे कोई शत्रु को देखता हो। और उन्होंने मुझसे कहा, आपको भी फूलों से प्रेम है! आपको भी फूलों से कोई लगाव है!
मैं चुप रह गया, क्योंकि जो फूलों को भी न समझ पा रहा हो, वह फूलों की प्रशंसा में कही किसी बात को समझ पायेगा, इसकी कोई आशा न थी। फिर रात हुई। और एक मित्र कुछ गीत सुनाने आये थे तो मैं गीत सुनने बैठ गया। उन संन्यासी ने कहा, आपको गीतों से भी लगाव है, गीतों से भी प्रेम है!
मैं फिर हंसा और चुप रह गया, क्योंकि जो गीत ही न समझ पा रहा हो, गीत की प्रशंसा में कही गयी बात को समझ सकेगा, इसकी कोई आशा न थी।
फिर रात हम खाना खाने बैठे। वे इस भांति खाना खाने लगे, जैसे कोई एक बोझ भरा काम कर रहे हों, कोई एक जबरदस्ती, कोई एक नेसेसरी ईविल, कोई एक आवश्यक बुराई है, जो करनी पड़ रही है, मजबूरी है कि भोजन खाना पड़ रहा है, वैसे वे भोजन करने लगे! मैंने उनसे कहा, "आप यह क्या कर रहे हैं?'
उन्होंने कहा, "मैं अस्वाद का व्रती हूं, अस्वाद का व्रत लिया हुआ है। भोजन ऐसे करना है, जैसे कोई मिट्टी खा रहा हो! कोई स्वाद नहीं लेना है!'
मैंने कहा, यह तो मैं समझ गया था। जब फूलों को देखकर आपके हृदय में जो भाव उठा, जब गीत को सुनकर, जो भाव उठा, तभी मैं समझ गया था। क्योंकि अगर हम ठीक से देखें तो फूल आंख का आहार है और गीत और संगीत कान का आहार है। सब भोजन है।
जीवन चारों तरफ एक भोजन है, एक आहार है।
आंख जब भरे वृक्ष को देखकर आनंदित होती है तो आंख को भोजन मिल गया और कान जब वीणा को सुनकर प्रफुल्लित हो उठते हैं, तो उन्हें भी भोजन मिल गया। चौबीस घंटे सभी इंद्रियों से आहार चल रहा है। परमात्मा बहुत द्वारों से प्रवेश पा रहा है। परमात्मा के ये सभी प्रवेश आनंद से गृहीत हों; स्वागत से, अनुग्रह से, ग्रेटीटयूड से भरे हुए हों तो वैसे आदमी का संबंध जीवन से हो सकता है।
लेकिन जो इन सभी द्वारों पर घृणा का भाव लिये खड़ा हो, विरोध, शत्रुता लिए खड़ा हो; जो कान इसलिए बंद कर लेता हो कि संगीत न सुनायी पड़ जाये; जो स्वाद का इसलिए शत्रु हो जाता हो, जो आंख इसलिए बंद कर लेता हो। आंख फोड़ लेने वाले लोग भी हुए हैं, उन्होंने अपनी आंख फोड़ ली! इसके तो वे मालिक थे, लेकिन उनके प्रभाव में सारी मनुष्य-जाति की आंखें धुंधली हो गयी हैं--इसका उनको कोई हक नहीं था।
आंखें फोड़ ली हैं लोगों ने कि कहीं रूप आकर्षित न कर ले! जीवन जहां-जहां से प्रवेश पा सकता है मनुष्य के भीतर, वे सारे द्वार बंद कर लेने हैं! ऐसे बंद द्वारों वाला व्यक्ति अहंकार को तो उपलब्ध हो सकता है, ब्रह्म भाव को कभी भी उपलब्ध नहीं हो सकता है। ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे इस भाव से तो भर सकता है कि मैं कुछ हूं, लेकिन जीवन क्या है, इसका उसे कोई ओर-छोर नहीं मिल सकता है।
जीवन को जानने की संभावना तो तभी है, जब हमारा सारा व्यक्तित्व एक ओपनिंग, एक द्वार बन जाये। गीत के लिये, हवाओं के लिए, सौंदर्य के लिए, संगीत के लिए, स्वाद के लिए, सुगंध के लिए, सब तरफ हमारा जीवन एक द्वार बन जाये।
साधक मेरी दृष्टि में एक द्वार बन जाता है। सब भांति से एक द्वार बन जाता है। जीवन का जो क्षुद्रतम है, वह भी उसे विराट का ही अंग प्रतीत होता है। वह जो छोटे-छोटे अणु हैं, वह भी उसे ब्रह्मांड प्रतीत होते हैं। यह जो छोटा-सा फूल खिल जाता है, यह जो कोयल कहीं बोल रही है अनजान में, यह सब उसके प्राणों के अंतर्गीत बन जाते हैं, अंतर्नाद बन जाता है। वह सब स्वीकार कर लेता है। जीवन जो भी देता है, सभी को अनुग्रह से स्वीकार कर लेता है। भोजन करना भी उसे प्रार्थना के तुल्य है, स्नान करना भी उसे पूजा की भांति है। हवाओं में सांस लेना भी उसे भगवान के लिए धन्यवाद है।
जीवन से संबंध और आत्म-ऐक्य तभी हो सकता है, जब जीवन के प्रति निंदा का भाव गिर जाये।
कल मैंने आपको ज्ञान छोड़ने को कहा। आज मैं आपसे जीवन के प्रति निंदा के भाव छोड़ने के लिए कहना चाहता हूं। लेकिन गहरे, बहुत गहरे हमारे चित्त में कंडीशनिंग, बहुत गहरे संस्कार बैठ गये हैं जीवन की हर चीज की निंदा के। अगर आपको बुद्ध कहीं हंसते हुए मिल जायें तो आप बड़े चिंतित हो जायेंगे। अगर महावीर आपको कहीं वीणा सुनते हुए मिल जायें तो आप बड़े हैरान हो जायेंगे।
क्रिश्चियंस कहते हैं, "जीसस नेवर लाफ--जीसस कभी हंसे नहीं!' हम उदास संतों को देखने के आदी हो गये हैं।
जीवन से जिन्होंने मृतक का भाव ले लिया है; जीवन के प्रति जो जीते-जी मर जाने की कोशिश में लग गये हैं, उनकी छाया मनुष्य के चित्त पर गहरी हो गयी हैं, बहुत अंधकारपूर्ण हो गयी है। हंसता हुआ संत हमारी कल्पना में भी नहीं आता है! हम बुरे आदमी को हंसता हुआ देख सकते हैं, भले आदमी को नहीं! भले आदमी के साथ हंसी का कोई संबंध नहीं! जीवन के आनंद का कोई संबंध नहीं!
धार्मिक लोग वे ही हो सकते हैं, जो किसी भांति रुग्ण हों, उदास हों, बीमार हों! धार्मिक लोग वे ही हो सकते हैं, जो जीवन के प्रति शत्रुता का भाव लेकर किसी कोने में खड़े हो गये हों! रंगों का, स्वरों का, सुगंधों का धार्मिक आदमी से क्या संबंध है? लेकिन नहीं, मैं आपसे कहना चाहता हूं, ठीक धार्मिक व्यक्ति और ही तरह का व्यक्ति होगा।
तीन संतों के बाबत मैंने सुना है। वे तिब्बत में हुए। और "तीन हंसते हुए संत', ही उनका नाम था उनका कोई और नाम न था--थ्री लाफिंग सेंट्स। इसी तरह ही वे जाने जाते हैं। वे जिस गांव में जाते, उस गांव में हंसी की, खुशी की एक लहर पहुंच जाती। वे हंसते, वे इतना हंसते कि हंसना संक्रामक हो जाता और धीरे-धीरे पूरा गांव हंसने लगता! वे जिस चौराहे पर खड़े हो जाते, वहां हंसी के फव्वारे छूट जाते।
लोग उनसे पूछते, आपका कोई उपदेश नहीं है? वे कहते, एक ही हमारा उपदेश है कि जीवन को हंसी के भाव से स्वीकार कर लो। जीवन को रोते हुए, जो स्वीकार करेगा, जीवन से उसका कोई संबंध नहीं हो सकता। वे लोगों से कहते कि न कभी रोते हुए आंसुओं से भरे हुए, कोई आदमी प्रभु के मंदिर में प्रविष्ट हुआ है, और न कभी हो सकेगा। मुस्कुराहटें तो उसका मार्ग बन सकती हैं। मुस्कुराहटों के इंद्रधनुष तो उस तक पहुंचने के सेतु हो सकते हैं, लेकिन रोती हुई सूरतें नहीं। एक ही हमारा संदेश है कि लोग प्रफुल्लित मन से जीवन को अंगीकार करना सीख जायें।
वे तीनों बूढ़े हो गये और गांव-गांव भटकते रहे। मुझे पता नहीं, वैसे संत कहीं और भी हुए हों। काश, वैसे संत और कहीं भी होते तो यह दुनिया आज दूसरी होती। फिर उन तीनों में से--वे तीनों बूढ़े हो गये--एक संत की मृत्यु हो गयी। जिस गांव में एक संत की मृत्यु हुई, गांव के लोगों ने कहा, अब तो रोयेंगे वे जरूर, अब तो दुखी होंगे, आज हम उनकी आंखों में आंसू देख लेंगे।
गांव के लोग इकट्ठे हो गये झोपड़े के पास, लेकिन वे दोनों हंसते हुए अपने मृतक साथी को लेकर बाहर निकले। और उन्होंने गांव के लोगों से कहा कि आओ और देखो, कितना अदभुत आदमी था यह। लोगों ने देखा, उसकी लाश पड़ी है, लेकिन उसके होंठ मुस्करा रहे हैं! वह जो आदमी मर गया है, वह हंसते हुए ही मर गया है! और मरते वक्त कह गया है अपने मित्रों को कि एक कृपा करना, मुझे जब ले जाकर, मेरी अर्थी को तुम जलती हुई लकड़ियों पर रखो तो मेरे वस्त्र मत निकालना, मुझे स्नान मत कराना।
तिब्बत में वैसा रिवाज था कि आदमी मर जाये तो कपड़े निकालना, स्नान कराना, नये कपड़े पहना देना। एक नयी यात्रा पर कोई जाता है तो उसे नये कपड़े तो कम से कम पहना ही देने चाहिए। लेकिन वह आदमी कह गया है कि नहीं, मेरे कपड़े मत बदलना, मुझे स्नान मत कराना, इन्हीं कपड़ों में चिता पर चढ़ा देना!
फिर वह सारा गांव लेकर संत की अर्थी को मरघट पहुंच गया। हजारों लोग इकट्ठे हो गये हैं, चिता जल गयी है, अर्थी रख दी गयी है। जैसे ही आग लगी है, शरीर जलना शुरू हुआ है--उस अर्थी को चिता पर चढ़ा दिया गया है। आग लग गयी है, लोग उदास खड़े हैं। हजारों की भीड़ है, लेकिन फिर एकदम धीरे-धीरे भीड़ में हंसी छूटने लगी! लोग हंसने लगे! हंसी फैलती चली गयी, हंसी बिलकुल संक्रामक हो गयी! क्या हो गया था?
जैसे ही लाश में आग लगी, लोगों को पता चला कि वह आदमी अपने कपड़ों के भीतर पटाखे, फुलझड़ी छिपाकर मर गया है। कपड़े में उसने भीतर पटाखे, फुलझड़ी छिपा रखे हैं! लाश में आग लग गयी है, पटाखे फूटने लगे हैं, फुलझड़ियां छूटने लगी हैं और लोग हंसने लगे हैं और वे कहने लगे कि अदभुत था वह आदमी! वह मरा हंसता हुआ, जीया हंसता हुआ और मरने के बाद भी लोग उसे हंसते ही विदा दें, इसकी भी व्यवस्था, इसका भी आयोजन कर गया!
उस गांव में लोगों को पता चला, हंसते हुए जीया जा सकता है, हंसते हुए मरा जा सकता है। मरने के बाद भी पीछे हंसी की संभावना पैदा की जा सकती है। ऐसे व्यक्ति को मैं धार्मिक व्यक्ति कहता हूं।
रोते, उदास लोगों को विदा कर दें। धर्म उनसे बहुत पीड़ित हो चुका। मनुष्य के जीवन में मनुष्यता के ऊपर जो सबसे बड़े दुर्भाग्य गिरे, वह रोते हुए लोगों का प्रभाव है। रोते हुए लोगों से हम पीड़ित हैं, रुग्ण और उदास लोगों से हम पीड़ित हैं। जो लोग जीवन की खुशी को उपलब्ध नहीं कर पाते, उनकी स्थिति वैसी ही है, जैसी उस लोमड़ी की आपने सुनी होगी, जो अंगूरों के एक वृक्ष के नीचे थी। और लटके थे अंगूर , पके हुए और वह छलांग लगाने लगी। लेकिन वृक्ष था ऊंचा और लोमड़ी नहीं पहुंच सकी वहां तक तो वह वापस लौट पड़ी और रास्ते में कहती गयी, खट्टे अंगूर हैं, उन्हें पाने की भी क्या जरूरत है!
जीवन के आनंद को, जीवन के फूलों को और जीवन के गीतों को, जो उपलब्ध नहीं कर पाते, वे कहते हैं, जीवन खट्टा है, अंगूर खट्टे हैं; जीवन बुरा है, जीवन असार है। अपनी असफलता को वे जीवन की निंदा में छिपा लेते हैं। और जिन्हें जीवन के ही अंगूर नहीं मिल पाये, उन्हें परमात्मा के अंगूर मिल जायेंगे, इसकी कोई उम्मीद नहीं है।
जीवन के रस से तो यह पता मिल सकता था कि परमात्मा कहां है, लेकिन जीवन से विरस होकर तो उसका पता-ठिकाना भी नहीं मिल सकेगा। जीवन के भीतर जाकर तो वह खबर मिल सकती थी कि रास्ता कहां ले जाता है, प्रभु तक कैसे जायेगा; लेकिन जीवन को ही पीठ करके, जो खड़े हो गये हों, उनके लिए कोई रास्ता नहीं।
प्रभु कहीं भी है अगर, तो जीवन के भीतर; जीवन के विरोध में नहीं, जीवन के विपरीत नहीं।
लेकिन अस्वस्थ, रुग्ण, हारे हुए लोग, पराजित लोग अपने को दोष न देकर जीवन को ही दोष दे देते हैं। हारा हुआ आदमी हमेशा इसी कोशिश में होता है कि कोई बहाना मिल जाये, खुद को दोष न देना पड़े। हारे हुए लोग--स्मरण रखिये, हारे हुए लोग अब तक धर्म में उत्सुक होते रहे हैं। हारे हुए लोगों की जमात धर्म के आसपास इकट्ठी हो गयी है। मंदिरों और मस्जिदों में जाइये, वहां हारे और पराजित लोग दिखायी पड़ेंगे। आदमी जब मरने के करीब पहुंचने लगता है, जब जीवन पर सारी अंगुलियां छूट जाती हैं, बूढ़ा होने लगता है, लगता है जीवन अब गया, तब गया; तब वह मंदिर की यात्रा शुरू कर देता है। तब वह सोचता है कि अब मंदिर का वक्त आ गया है।
जब जीवन का वक्त गुजर जाता है, तब मंदिर का वक्त आता है!
अगर कहीं कोई मंदिर है तो जीवन के घनेपन में है।
यह जो उदास, यह जो निराश, यह जो असफल लोगों का समूह है, इसने धर्म को आक्रांत कर रखा है। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं इस दूसरी चर्चा में, अपने को उदास और रोते हुए लोगों से मुक्त कर लीजिये। रुग्ण, अस्वस्थ, विक्षिप्त लोगों से मुक्त कर लीजिये। अगर जीवन के अंगूर न मिलते हो तो खट्टे मत कहिये। यह कहिये कि मेरी छलांग छोटी है।
छलांग बड़ी की जा सकती है। साधक छलांग बड़ी करने का प्रयास करता है। पलायनवादी एस्केपिस्ट कहता है, अंगूर खट्टे हैं और लौट जाता है।
छलांग बड़ी करिये। जीवन हाथ में न आता हो तो हाथ और बढ़ाये। आंखें न देख पाती हों तो आंखों को और खोलिये। कान न सुन पाते हों तो कानों को और प्रशिक्षण दीजिये। भोजन में न मिल पाता हो परमात्मा, तो अस्वाद पर मत लौट जाइये। क्योंकि अस्वाद अंगूरों को खट्टा कहने की दलील है। तो स्वाद को और शिक्षित कीजिये, स्वाद को और साधिये, क्योंकि जो लोग जानते थे, उन्हें अन्न में भी ब्रह्म दिखायी पड़ सका है। जो लोग जानते हैं, उन्हें स्वर में भी ब्रह्म दिखायी पड़ सका है। जो लोग जानते हैं, उन्हें रूप में भी उसके ही दर्शन हो सके हैं। सौंदर्य भी उन्हें उसकी ही खबर बन गयी है। सब कुछ उसकी ही खबर बन गया है। शरीर का सौंदर्य भी भीतर छिपे परमात्मा की खबर बन जाता है, लेकिन देखने वाली आंख चाहिए।
आंख मत फोड़िये। आंख को शिक्षित करिये।
इंद्रियों की शिक्षा साधना। इंद्रियों का विरोध नहीं, दमन नहीं, सप्रेशन नहीं। एक-एक इंद्रिय ऐसी साधी जा सकती है कि उसके द्वार से प्रभु तक पहुंचने का मार्ग बन जाये।
तो मैं आपसे कहूंगा, स्वाद है तो पूर्ण स्वाद लीजिये, अस्वाद नहीं। भोजन कर रहे हों तो ऐसे करिये कि भोजन करना ही एकमात्र कृत्य रह जाये। सारा प्राण, सारी देह, सारी शक्ति, समग्र चेतना भोजन करे। जरा-सा स्वाद छूट न जाये। स्वाद में इतनी लीनता, इतनी तल्लीनता, इतना आत्मभाव! फिर आपको पता चलेगा कि अन्न ब्रह्म हो जाता है। फिर आपको पता चलेगा कि स्वाद भी उसकी खबर है। और तब भोजन करके अगर आपका हृदय धन्यवाद से भर जाये परमात्मा के लिये तो आश्चर्य नहीं। तब सौंदर्य को भी देखिये और परिपूर्ण तल्लीनता से, परिपूर्ण एकात्मभाव से। और तब आपको सौंदर्य के पीछे अरूप के दर्शन होने लगें तो आश्चर्य नहीं।
रूप तो केवल ऊपर की खोल है, भीतर अरूप छिपा है।
जब आपको कोई फूल सुंदर लगता है तो क्या सुंदर लगता है वहां? क्या आपको फूल की पंखुड़ियां, उनमें दौड़ते हुए केमिकल्स, खनिज--क्या सुंदर लगता है? नहीं, फूल की पंखुड़ियां भी नहीं, फूल का पदार्थ भी नहीं, फूल के खनिज भी नहीं, फूल का रसायन भी नहीं। लेकिन उन सबके मेल से जो अरूप है, उसकी झलक मिलनी शुरू हो जाती है। वह जो पीछे छिपा है, उस सबके मेल से वह जो पीछे छिपा है, उसकी खबर मिलनी शुरू हो जाती है।
जब आप वीणा सुनते हैं तो तारों की टंकार अच्छी लगती है, या हाथों का प्रभाव--क्या अच्छा लगता है? नहीं, लेकिन स्वरों के माध्यम से, वह जो स्वरों के बीच में अस्वर छिपा हुआ है, शून्य छिपा हुआ है, स्वरों के बीच-बीच में, वह जो शून्य छिपा हुआ है, उसकी खबर मिलनी शुरू हो जाती है। वह जो संगीत के पीछे निशब्द छिपा हुआ है, संगीत से वह प्रकट होने लगता है।
जीवन की यह अदभुत लीला है कि यहां जीवन में जो कुछ भी प्रकट होता है, वह कंट्रास्ट में, विरोध में, प्रकट होता है।
स्कूल में हम बच्चों को पढ़ाते हैं तो काला तख्ता लगा लेते हैं। सफेद खड़िया से लिखते हैं इस पर। सफेद खड़िया काले की पृष्ठभूमि में प्रकट होती है, पूर्णता से प्रकट होती है। सफेद तख्ते भी बना सकते हैं, लेकिन तब पढ़ना मुश्किल हो जायेगा। सफेद खड़िया लिखेगी, सफेद तख्तों पर कुछ भी दिखायी नहीं पड़ेगा।
जीवन हमेशा कंट्रास्ट में प्रकट होता है। आत्मा को प्रकट होना है तो शरीर में प्रकट होती है। शरीर काले ब्लैक बोर्ड की तरह भूमि बन जाता है, आत्मा के प्रकट होने के लिए। सौंदर्य को प्रकट होना है तो रूप में प्रकट होता है, ताकि अरूप कंट्रास्ट ले ले, वह दिखायी पड़ सके। शून्य को प्रकट होना है तो संगीत में प्रकट होता है। उलटी है बात। संगीत तो ध्वनि है। शून्य निर्ध्वनि है। लेकिन निर्ध्वनि को प्रकट होना हो तो ध्वनि का माध्यम, ध्वनि का बैक-ग्राउंड, ध्वनि की पार्श्वभूमि चाहिए।
परमात्मा को प्रकट होना है तो पदार्थ का संसार चाहिए।
जीवन हमेशा पृष्ठभूमि मांगता है अभिव्यक्ति के लिए। अगर पृष्ठभूमि न हो तो जीवन प्रकट नहीं हो सकता। जीवन की सारी अभिव्यक्ति कंट्रास्ट में है।
लेकिन अगर हम तख्ते को मिटा दें तो फिर सफेद अक्षर भी विलीन हो जायेंगे। अगर हम शरीर के शत्रु हो जायें तो आत्मा भी हमसे दूर हो जायेगी। अगर हम संसार के दुश्मन हो जायें तो हम परमात्मा की तरफ जाना भी बंद हो जायेंगे। यह सीधा-सा गणित दिखायी नहीं पड़ सकता। यह अत्यंत दो और दो चार जैसी बात दिखायी नहीं पड़ सकी! क्यों नहीं दिखायी पड़ सकी? न पड़ने के कुछ कारण हैं।
हमें भी वही बात स्वीकृत हो जाती है--वही बात, जो हमारी जीवन-स्थिति के अनुकूल पड़ती है। हम सब भी हारे हुए लोग हैं, इसलिए हारे हुए लोगों का संदेश हमें ठीक सुनायी पड़ जाता है। हम सब भी पराजित लोग हैं, इसलिए पराजित लोग जब कहते हैं कि जीवन असार है, तब हमें भी यह बात बिलकुल ही ठीक मालूम पड़ने लगती है। जो हमारी आदत का हिस्सा हो जाती है, वही हमारी समझ में आता है, शेष हमें समझ में नहीं आता।
मैंने सुना है, एक मछुआ जीवन भर मछलियों को मारने का धंधा करता रहा था। एक बार देश की राजधानी में पहुंच गया। वह राजधानी घूम-घूम कर देखने लगा--चकित, विमुग्ध। फिर वह उस रास्ते पर पहुंच गया, जहां देश के, राजधानी के इत्र बिकते थे, सुगंधियां बिकती थीं। वह सुगंधियों का बाजार था, वह वहां पहुंच गया। जाते ही उसे अपनी नाक बंद कर लेनी पड़ी, क्योंकि उसे बड़ी बदबू मालूम पड़ी! उसने मछलियों की सुगंध को ही जाना था। उसी को वह सुगंध कहता था।
वह बहुत हैरान हो गया है लेकिन। भागने की भी कोशिश की उसने कि बाजार से निकल जाये। लेकिन लंबा बाजार था। राजधानी का बाजार था। वहां दुनिया की श्रेष्ठ से श्रेष्ठ सुगंधियां थीं। आखिर वह बेहोश होकर गिर पड़ा। गंध इतनी तेज मालूम होने लगी कि वह बेहोश होकर गिर पड़ा। भीड़ इकट्ठी हो गयी। पास के दुकानदार कीमती से कीमती सुगंधें लेकर आ गये कि शायद सुगंध सुंघाने से उसे होश आ जाये। उन्हें पता भी नहीं कि वह सुगंधों की वजह से ही बेहोश हो गया है। वे उसे सुगंधियां सुंघाने लगे। वह तड़फड़ाने लगा, हाथ-पैर फेंकने लगा! उसको तो बोलते भी नहीं बन रहा है! वह और बेहोश हो गया!
और तभी उस भीड़ में एक आदमी बाहर आया, जो पहले मछुआ रह चुका था। उसने कहा कि मित्रो, तुम बड़ा गड़बड़ किये दे रहे हो। यह आदमी मर जायेगा। आप हटो, अपनी सुगंधियां दूर हटाओ। इन्हीं के कारण वह बेहोश हो गया है!
लेकिन उसके पास उसका झोला था, जिसमें वह मछलियां बाजार बेचने लाया था। उस पर पानी थोड़ा छिड़का और उस आदमी की नाक के पास वह झोला रख दिया। उसने गहरी सांस ली, आंख खोली और उसने कहा, ""दिस इज रियल परफ्यूम''--यह है असली सुगंध!
स्वाभाविक है, हमें वही बात ठीक मालूम पड़ती है, जिसके हम आदी हैं। हमें वही सुगंध मालूम पड़ती है, जिसे हम जानते हैं। चूंकि सभी मनुष्य जीवन की कला में दीक्षित नहीं है, और इसीलिए पराजित हो जाते हैं। इसलिए जब कोई पराजित व्यक्ति खड़े होकर कहता है, असार है सब, व्यर्थ है सब, छोड़ देने जैसा है सब, तो हाथ हमारे भी उठ जाते हैं कि आप ठीक कहते हैं, बिलकुल ठीक कहते हैं। जीवन की कला ही नहीं सिखायी गयी!
जीवन एक कला है।
जन्म के साथ ही जीवन नहीं मिल जाता। जीवन एक लंबा प्रशिक्षण है। और सूक्ष्मतम कला है जीवन की।
इस जीवन-कला का दूसरा सूत्र मैं आपसे कहना चाहता हूं।
जो भी है, जो भी उपलब्ध है, इंद्रियों से जो भी आता है, उस सबको अत्यंत आनंद से, अत्यंत ग्रेटिटयूड से स्वीकार करें और आप पायेंगे कि जीवन से आपका संबंध होना शुरू हो गया है।
हमारे भाव तोड़ते हैं। हमारे भाव जोड़ सकते हैं। हमारा दुर्भाव तोड़ देता हैं, हमारा सदभाव जोड़ देता है। जीवन के प्रति सदभाव! मैं उन सारे लोगों को परमात्मा का शत्रु कहता
हूं, एनीमीज ऑफ गॉड, जो जीवन के प्रति दुर्भाव सिखाते हैं।
कल ही एक मित्र आये। उन्होंने कहा कि मैं तो साठ बरस का हो गया हूं, लेकिन अब भी सुंदर स्त्री को देखता हूं तो बेचैन और परेशान हो जाता हूं। जिंदगी भर मैंने कोशिश की है कि अपने मन को स्त्री से अलग कर लूं, अलग कर लूं, अलग कर लूं। लेकिन इस उम्र में भी स्त्री मेरा पीछा कर रही है!
मैंने कहा, वह पीछा करती ही चली जायेगी। वह आप कब्र में चले जायेंगे और वह पीछा करती चली जायेगी। आप पीछा करवा रहे हैं। जीवन की कला स्त्री से भागना नहीं सिखाती, सौंदर्य से आंखें फेरना नहीं सिखाती, बल्कि इस जिज्ञासा में और ऊपर उठ आती कि जो सौंदर्य दिखायी पड़ रहा है, वह कहां से आ रहा है? वह सौंदर्य क्या है?
और अगर एक स्त्री में भी सौंदर्य दिखायी पड़ा हो--दिखायी पड़ सकता है। फूल में दिखायी पड़ सकता है तो स्त्री में क्यों नहीं, पुरुष में क्यों नहीं, आंखों में क्यों नहीं, शरीर में क्यों नहीं? क्योंकि फूल भी एक शरीर है, चांद भी एक शरीर है, तारे भी एक शरीर हैं, सागर भी एक शरीर है, वृक्ष भी एक शरीर है। तो आदमी के शरीर का ही कसूर क्या है?
लेकिन अगर सौंदर्य का विरोध न होता, अगर निंदक की दृष्टि न होती, तो शायद उस सौंदर्य में और गहरे प्रवेश होता है। वह सौंदर्य की ध्वनि पर सवार होकर मन और आगे जाता
और उस जगह पहुंच जाता, जहां से सारा सौंदर्य आता है। उस रूप पर पहुंच जाता, जहां से जीवन के सारे आनंद और सारी खुशियां आती हैं। तो शायद फिर एक स्त्री मंदिर बन जाती, उसके भीतर परमात्मा दिखायी पड़ जाता। फिर चाहे एक पुरुष प्रभु बन जाता, उसके भीतर परमात्मा दिखायी पड़ जाता।
तो मैं नहीं कहता हूं कि आप भागें इस सौंदर्य से, रूप से, संगीत से, सुगंध से, सुवास से, स्वाद से--किसी से भी मत भागें। सभी के भीतर खोज करें कि जो आकर्षित कर रहा है, जरूर वहां कहीं भीतर परमात्मा होगा।
जहां भी आकर्षण है, जहां भी ग्रेविटेशन है, स्मरण रखें कि वहां कहीं कोई परमात्मा का केंद्र होगा, अन्यथा कोई आकर्षण संभव नहीं। तो आकर्षण को सूचना समझें और भीतर और भीतर और गहरे और गहरे प्रवेश करें। चित्त को जाने दें और धीरे से आप पायेंगे कि सारी खबरें उसकी खबरें हैं। फूल से भी वही झांकता है, सागर से भी वही, चांदत्तारों से भी वही, आदमी से भी वही, स्त्री से भी वही, बच्चों से भी वही--सबसे वही झांकता है। उसकी खोज करनी है तो द्वार खुले होने चाहिए। रिसेप्टिविटी, ग्राहकता, पूर्ण होनी चाहिए कि सब तरफ से जो संदेश आयेगा, उसे मैं अपने हृदय तक ले जाने को हमेशा तैयार हूं।
यह मनुष्य-जाति बिलकुल दूसरी मनुष्य की जाति हो सकती है। यह पूरी ह्युमैनिटी एक ट्रांसफार्मेशन से गुजर सकती है। एक रूपांतरण हो सकता है। लेकिन नहीं, निंदकों का प्रभाव हमारे ऊपर बहुत ज्यादा है। जीवन के प्रशंसकों का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं!
तो यह दूसरी बात आपसे कहना चाहता हूं। इन तीन दिनों में तो आप प्रयोग करेंगे ही। द्वार खोलें मन का। समस्त आकर्षण के लिए द्वार खोल दें। जीवन के समस्त स्वाद के लिए द्वार खोल दें। और जीवन के प्रत्येक अनुभव में आनंद की गहरी से गहरी खोज और आत्मलीनता खोजें,तल्लीनता खोजें और जीवन की जो मधु-वर्षा हो रही है, उसमें डूब जायें, उसमें एक हो जायें, उससे जुड़ जायें, उसके और अपने बीच कोई फासला न रखें। जैसे एक सूखा पत्ता हवाओं में उड़ता है, हवायें पूर्व ले जाती हैं तो पूर्व चला जाता है, हवायें पश्चिम ले जाती हैं तो पश्चिम चला जाता है। हवायें जमीन पर गिरा देती हैं तो जमीन पर गिर जाता है, हवायें आकाश में उठा देती हैं तो बादलों में उठ जाता है।
एक सूखा पत्ता हो जायें और जीवन के सारे रस, जीवन का सारा आनंद, जीवन के सारे अनुभवों को गुजरने दें। कोई बाधा न डालें; कहीं कोई बैरियर खड़ा न करें, कहीं कोई दीवाल न बनायें। जीवन के सागर में बह जायें। तो, स्मरण रखें कि वह सागर अंततः परमात्मा तक ले जाने वाला बन जाता है।
जीवन में जो बहते हैं, वे तो कभी पहुंच जाते हैं। लेकिन जीवन के विरोध में पीठ करके, जो खड़े हो जाते हैं, वे न कभी पहुंचे हैं, न कभी पहुंच सकते हैं, न कभी पहुंच सकेंगे। यह दूसरी बात आपसे कहना चाहता हूं।
तीसरे सूत्र पर कल सुबह हम बात करेंगे। इसे थोड़ा प्रयोग करें तो ही पता चलेगा। वह जो भीतर निंदक बैठा है, वह बहुत इनकार करेगा, कि बहुत खतरा हो सकता है। वह जो भीतर कंडेमनेशन बैठा है, वह कहेगा, भूलकर मत पड़ना, इसमें तो मुश्किल हो जायेगी, इसमें तो सब गड़बड़ हो जायेगी, इसमें तो साधना सब भ्रष्ट हो जायेगी।
वह निंदक बहुत जोर से कहेगा भीतर, क्योंकि वह आज का नहीं है। वह हमारे "कलेक्टिव माइंड' का हिस्सा है, वह हमारे समूह-मन का हिस्सा है, वह कोई पांच हजार वर्ष से हमारे भीतर बैठा है और उसकी वजह से जीवन एकदम विषाक्त पायजनस हो गया है। जीवन की कोई खुशी अंगीकृत नहीं रही, कोई गीत अंगीकृत नहीं रहा। लाइफ निगेटिव है, वह हमारा जो दृष्टिकोण है।
और "लाइफ अफरमेशन चाहिए। ' "रिवरेंस फार लाइफ' चाहिए। जीवन के प्रति आदर-सम्मान, जीवन के प्रति प्रेम, अनुग्रह का भाव चाहिए।
धन्य हैं वे लोग, जो जीवन के प्रति अनुग्रह से भरते हैं, क्योंकि जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, सुंदर है, शुभ है, वह सभी उनको उपलब्ध हो जाता है।
इसके बाद हम सुबह के ध्यान के लिए बैठेंगे, तो दो-चार बात समझ लें। फिर हम अलग-अलग ध्यान के लिए बैठेंगे। मेरे लिए तो ध्यान भी जीवन की स्वीकृति है, अंगीकार है। ये हवाएं हैं, ये आयेंगी, ये गुजर जायेंगी। आवाजें हैं, पैदा होंगी, विलीन हो जायेंगी। सागर का गर्जन चलता रहेगा। कोई पक्षी बोलेगा। इस सबको परमात्मा का आशीर्वाद समझकर अंगीकार कर लेना है। इसे स्वीकार कर लेना है।
अब तक ध्यान के नाम से जो भी सिखाया गया है, वह रेसिस्टेंस है, वह प्रतिरोध है। अब तक यही सिखाया गया है कि कोई आवाज न सुनायी पड़े, चींटी काटे तो पता न चले। पत्थर की तरह हो जाना है, कुछ पता न चले! ये मर जाने की प्रक्रियाएं है। आदमी मर जाता है, तब चींटी भी काटती है तो पता नहीं चलता। हवा भी चलती है तो पता नहीं चलता है। बच्चा भी रोता है तो पता नहीं चलता।
जिंदा आदमी को तो पता चलेगा और जितना ज्यादा जिंदा होगा, उतना ज्यादा पता चलेगा, उतनी सेन्सीटिविटि बढ़ जायेगी उसकी, उतनी उसकी संवेदना बढ़ जायेगी। जितना शांत होगा, जितना जीवंत होगा--जरा-सी ध्वनि और उसके प्राणों में आंदोलन होगा। जरा-सी आवाज उसे सुनायी पड़ेगी। एक सुई गिर जायेगी तो भी उसे सुनायी पड़ेगी। जीवन का लक्षण तो संवेदना है। मृत्यु का लक्षण संवेदना नहीं है।
लेकिन अब तक हमको इस तरह की बातें ही सिखायी गयी हैं कि जैसे डेड हो जाओ, मुद की तरह हो जाओ। नहीं, मैं आपको और भी जीवंत देखना चाहता हूं, इतना जीवंत कि वृक्ष का एक छोटा-सा पत्ता भी हिले तो पता चले।
अब तक रेसिस्टेंस बताया गया है ध्यान का अर्थ--प्रतिरोध!अपने को दबाओ, हटाओ, कुछ सुनायी न पड़े, कुछ ज्ञात न हो, सब तरफ से अपने को बंद कर लो--एक क्लोजिंग।
मैं कह रहा हूं, ध्यान है एक ओपनिंग--द्वार का खोलना, बंद करना नहीं।
खोल दें द्वार और जो भी आता है, चुपचाप देखते रहें। बस, एक साक्षी रह जायें, एक विटनेस रह जायें। जितने शांत होंगे, जितने साक्षी होंगे, उतना ही पायेंगे कि जीवन के द्वार टूटते जा रहे हैं। एक मेल होता जा रहा है, सब जुड़ता जा रहा है। धीरे-धीरे पता चलेगा, सारी परिधि टूटती जा रही है। सारी सीमाएं गिरती जा रही हैं और असीम के साथ मिलन होता चला जा रहा है।
असीम के साथ मिलन है समाधि, और असीम की तरफ बढ़ने के प्रयास का नाम है ध्यान।
लेकिन असीम की तरफ वही बढ़ सकता है, जो सारा विरोध छोड़ दे, क्योंकि विरोध सीमा बनाता है। रेसिस्टेंस सीमा बनाता है। कोई रेसिस्टेंस नहीं। सब स्वीकार। एक स्वीकृति भर मन में रह जाये, टोटल एक्सेप्टेंस रह जाये मन में। सब स्वीकृत है और मैं मौन बैठा हुआ हूं, देख रहा हूं, देख रहा हूं; जान रहा हूं, केवल साक्षी हूं।
अब हम यहां बैठेंगे। सब एक दूसरे से थोड़े फासले पर बैठ जायें। और रात के छह घंटे, सात घंटे, अगर शांत निद्रा में बीत जायें, आपके चौबीस घंटे शांत हो जायेंगे, ताजे हो जायेंगे, नये हो जायेंगे। जो लोग ध्यान के साथ निद्रा में गये हैं, जो लोग जाते हैं, वे मुझे कहते हैं फिर कि ऐसी नींद हमने जीवन में कभी भी नहीं जानी। ध्यान के साथ नींद संयुक्त हो जाये तो एक अभूतपूर्व घटना घट जाती है।
यह रात्रि का ध्यान नींद के पहले करने का है। अंतिम, बिस्तर पर जब सो जायें, सब काम से निपट जायें, अब कुछ भी करने को शेष नहीं रहा, तब पंद्रह मिनिट के लिए इस ध्यान को करें। और ध्यान करने के बाद चुपचाप सो जायें, फिर उठें नहीं, फिर कुछ भी न करें। ध्यान के बाद चुपचाप सो जायें, ताकि ध्यान में जो धारा शुरू हो, वह नींद में प्रविष्ट हो जाये। उसकी अंडर करेंट पूरी नींद में प्रविष्ट हो जाये। इस प्रयोग को लेटकर ही करने का प्रयोग है। बिस्तर पर लेट जायें और इसको करें। प्रयोग करने में दोत्तीन बातें खयाल में लेनी जरूरी हैं।
एक बात, सारे शरीर को शिथिल छोड़ देना जरूरी है। रिलेक्स छोड़ देना जरूरी है। शरीर पर कोई तनाव न हो, बिलकुल ढीला छोड़ दें, जैसे शरीर में कोई प्राण ही नहीं रहे हों। एक-एक अंग ढीला छोड़ दें, कोई तनाव न रखें, कोई तनाव-खिंचाव शरीर पर न हो। बिलकुल ढीला छोड़ दें और आराम से लेट जायें। फिर आहिस्ता से आंख बंद कर लें। फिर शरीर की शिथिलता के लिए थोड़े से सुझाव, थोड़े से सजेशंस शरीर को दें। सिर्फ यह भाव थोड़ी देर करते रहें--एक मिनिट, दो मिनिट कि शरीर शिथिल हो रहा है। शरीर शिथिल हो रहा है। शरीर शिथिल हो रहा है।
एक दोत्तीन मिनिट भाव करने से, दस-पांच दिन में ही आप पायेंगे, शरीर बिलकुल शिथिल हो जायेगा। और जब शरीर शिथिल होता है, तो बाडीलेसनेस पैदा हो जाती है। जब शरीर बिलकुल शिथिल हो जाता है तो अशरीरी भाव का अनुभव होता है। पता चलता है शरीर है ही नहीं।
शरीर का पता तनाव के कारण चलता है, स्ट्रेन के कारण चलता है। शिथिल शरीर का कोई पता नहीं चलता। आपको पता होगा, पैर में कांटा गड़ जाये तो पैर का पता चलता है। सिर में दर्द हो तो सिर का पता चलता है। अगर पैर में कांटा नहीं तो पैर का कोई पता नहीं चलता कि पैर है भी या नहीं । सिर में दर्द न हो तो फिर सिर का कोई पता नहीं चलता कि सिर है या नहीं । जहां शरीर में तनाव होता है, वहीं शरीर का बोध होता है। स्वस्थ आदमी का एक ही लक्षण है कि उसे शरीर का कहीं भी पता न चलता हो, हेल्थ का और कोई लक्षण नहीं होता। बीमारी का पता चलता है, स्वास्थ्य का कोई पता नहीं चलता।
तो ध्यान के पहले शरीर को इतना शिथिल छोड़ देना है कि उसका पता ही न चले। और एक पंद्रह दिन के प्रयोग में और जो लोग ठीक ईमानदारी से, सिनसियरटि से प्रयोग करें, आज ही हो सकता है। कि आज ही जब हम यहां प्रयोग करें तो आपको पता चले कि जैसे शरीर समाप्त हो गया है, शरीर है ही नहीं।
तो दोत्तीन मिनिट तक ये सुझाव देना है, कि शरीर शिथिल हो रहा है। फिर श्वास को ढीला छोड़ देना है, रोकना नहीं है, शिथिल छोड़ देना है। --जितनी जाये, जाये; आये, आये। और दोत्तीन मिनिट तक यह भाव करना है कि श्वास भी शांत हो रही है, शांत हो रही है, शांत हो रही है। भाव करते-करते ही श्वास शांत हो जायेगी। बहुत अल्प आती-जाती मालूम पड़ेगी। थोड़े दिन प्रयोग करने पर पता भी नहीं चलता कि श्वास आ रही है कि नहीं आ रही है। इतनी शांत हो जाती है।
शरीर शिथिल होता है, तो श्वास अपने आप शांत होती है। श्वास शांत होती है तो विचार क्षीण हो जाते हैं। फिर तीसरा सुझाव मन को देना है कि विचार भी शांत हो रहे हैं। ये तीन सुझाव देने हैं।
और सुबह जो हमने ध्यान किया था चौथी बात वही है कि फिर चुपचाप पड़े रह जाना है--सुनते रहना है हवाओं को, दरख्तों को, समुद्र को; कोई आवाज आती हो, आवाजों को। रास्ते पर लोग निकलते होंगे, वाहन निकलते होंगे, टैक्सी चलती होगी, ठेला चलता होगा। सब चुपचाप सुनते रहना है।
तीन बातें--शरीर, श्वास और विचार, इनको शांत छोड़ देना है और फिर चुपचाप जो सुबह हमने प्रयोग किया था, वह लेटकर करते रहना है, एक दस मिनिट। फिर उसके बाद चुपचाप करवट लेकर सो जाना है।
यहां तो हम प्रयोग को करेंगे, ताकि आप समझ लें। फिर प्रयोग को जाकर अपने स्थान पर सोते समय करें और सो जायें। यहां तो प्रयोग आप समझ लें, इसलिए करना जरूरी है। और यहां परिणाम भी उसका बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। वह उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है, जितनी हमारी तैयारी, जिज्ञासा, खोज, आकांक्षा हो।
तो अब हम प्रयोग करेंगे। तो सब लोग इतने फासले पर हो जायें कि आप लेट सकें। फिर प्रकाश अलग कर दिया जायेगा। और आपको मैं आज तो सुझाव दूंगा, ताकि आपको ख्याल में आ जाये कि क्या सुझाव देने हैं। फिर अपने कमरे पर जाकर आप प्रयोग को करें और सो जायें।
तो अपने-अपने लिए जगह बना लें, थोड़े फासले पर हट जायें, कोई किसी को छूता हुआ नहीं रहेगा और सब लोग लेट सकें, ऐसी अपनी जगह बनाकर चुपचाप बिना बातचीत किये
हां, थोड़े हट जायें, क्योंकि लेटना पड़ेगा, इसलिए हट जायें
बातचीत बिलकुल भी न करें, क्योंकि बातचीत से कोई संबंध नहीं है
जरा भी बातचीत नहीं, किसी को भी बाधा न हो। अपनी-अपनी जगह बना लें, कहीं भी हट जायें
हां, मैं मान लेता हूं, आप जल्दी जगह बना लें, बिलकुल अकेले में हो जायें, वहां आराम से लेट जायें, ताकि आप पूरा प्रयोग कर सकें। और गहरे जा सकें
ठीक है। अपनी-अपनी जगह लेट जायें अपनी-अपनी जगह लेट जायें
इस मौके का पूरा फायदा लें, इस अवसर का पूरा उपयोग करें। इतनी अदभुत रात मिले, न मिले। इतना एकांत, ऐसा स्वर्ण अवसर आये, न आये। बिलकुल लेट जायें। आंख बंद कर लें, शरीर ढीला छोड़ दें
आंख बंद कर लें, शरीर ढीला छोड़ दें
फिर मैं सुझाव देता हूं, मेरे साथ अनुभव करें। भाव के साथ ही साथ परिणाम होने शुरू हो जायेंगे।
इसके बाद सारे सुझाव पूर्व-प्रवचन जैसे हैं। शरीर को शिथिल करना है, श्वास को शांत करना है, मन को मौन करना है और अंत में दस मिनिट के लिए पूर्ण विश्राम में चले जाना है।