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बुधवार, 1 मार्च 2017

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-05 (ओशो)



पांचवां प्रवचन
सत्य की खोज

मेरे प्रिय आत्मन्!
सत्य की खोज के संबंध में थोड़ी सी बात आपसे कहना चाहूंगा।
सत्य की क्या परिभाषा है? आज तक कोई परिभाषा नहीं हो सकी है। भविष्य में भी नहीं हो सकेगी। सत्य को जाना तो जा सकता है, लेकिन कहा नहीं जा सकता। परिभाषाएं शब्दों में होती हैं और सत्य शब्दों में कभी भी नहीं होता।
लाओत्से ने आज से कोई तीन हजार वर्ष पहले एक छोटी सी किताब लिखी। उस किताब का नाम है ताओ तेह किंग। उस किताब की पहली पंक्ति में उसने लिखा है: मैं सत्य कहने के लिए उत्सुक हुआ हूं, लेकिन सत्य नहीं कहा जा सकता है। और जो भी कहा जा सकता है, वह सत्य नहीं होगा। फिर भी मैं लिख रहा हूं, लेकिन जो भी मेरी इस किताब को पढ़े, वह पहले यह बात ध्यान में रख ले कि जो भी लिखा, पढ़ा, कहा जा सकता है, वह सत्य नहीं हो सकता।

बहुत अजीब सी बात से यह किताब शुरू होती है। और सत्य की दिशा में लिखी गई किताब हो, और पहली बात यह कहे कि जो भी लिखा जा सकता है वह सत्य नहीं होगा, जो भी कहा जा सकता है वह सत्य नहीं होगा, फिर लिखा क्यों जाए? फिर कहा क्यों जाए? जो हम भी कहेंगे वह अगर सत्य नहीं होना है, तो हम कहें क्यों?
लेकिन जिंदगी के रहस्यों में से एक बात यह है कि अगर मैं अपनी अंगुली उठाऊं और कहूं--वह रहा चांद! तो मेरी अंगुली चांद नहीं हो जाती है, लेकिन चांद की तरफ इशारा बन सकती है। अंगुली चांद नहीं है, लेकिन फिर भी चांद की तरफ इशारा बन सकती है। लेकिन कोई अगर मेरी अंगुली पकड़ ले और कहे कि मिल गया चांद, तो भूल हो जाएगी। अंगुली चांद नहीं है, लेकिन चांद की तरफ इशारा बन सकती है, और उनके लिए ही इशारा बन सकती है जो अंगुली को छोड़ दें और चांद को देखें। अंगुली को पकड़ लें, तो अंगुली इशारा न बनेगी, बाधा बन जाएगी।
शब्द सत्य नहीं है, न हो सकता है। लेकिन शब्द इशारा बन सकता है। लेकिन उन लोगों के लिए, जो शब्द को पकड़ न लें। जो शब्द को पकड़ लें, उनके लिए शब्द इशारा नहीं बनता, सत्य और स्वयं के बीच दीवाल बन जाता है। और हम सारे लोगों को शब्द दीवाल बन गए हैं; हमने जितने शब्द पकड़ रखे हैं वे सभी दीवाल बन गए हैं। शब्द के पास कुछ भी नहीं है। जो भी मैं कहूंगा, अगर मेरे शब्द ही सुने, तो कुछ भी नहीं पहुंचेगा आप तक। लेकिन अगर शब्द इशारा बन जाएं और उस तरफ आंख उठ जाए जिस तरफ शब्द इंगित करते हैं...। और जिस तरफ शब्द इंगित करते हैं, वह बहुत दूर है। शब्द पृथ्वी के हैं और जिस तरफ इशारा करते हैं वह आकाश में है, फासला बहुत है। शब्द और सत्य के बीच बहुत फासला है।
लेकिन कोई व्यक्ति गीता पढ़ता है और गीता के शब्दों को कंठस्थ कर लेता है और सोचता है: मिल गया धर्म, जान लिया धर्म। कोई आदमी कुरान पढ़ता है और आयतें कंठस्थ कर लेता है और सोचता है: जान लिया सत्य। सब शास्त्र हमारे हाथों में आकर, सत्य और हमारे बीच दीवाल बन गए। सब महापुरुष पकड़ लिए जाने के कारण इशारा नहीं रहे, पत्थर बन गए हैं। और ऐसी हालत हो गई है कि जिनसे हमने यात्रा की होती, उन्हें हमने रुकावट बना लिया है।
बुद्ध कहते थे, कुछ मित्र एक बार नदी पार किए एक नाव में बैठ कर। फिर जब वे नदी पार कर गए, तो वे सोचने लगे कि जिस नाव में हमने नदी पार की है, उस नाव को हम छोड़ कैसे दें? इस नाव का तो हम पर बड़ा उपकार है। अगर यह नाव न होती तो हम नदी पार न कर पाते। तो उन्होंने नाव को अपने सिरों पर उठा लिया और बाजार में चले। लोग उनसे पूछने लगे, यह क्या कर रहे हो? हमने कभी लोगों को सिर पर नाव उठाए नहीं देखा।
तो उन लोगों ने कहा, इस नाव के द्वारा हम नदी पार हुए। अब हम नाव के प्रति इतने अकृतज्ञ नहीं हो सकते हैं कि उसे नदी में ही छोड़ दें नाव को! हम नाव को अपने सिर पर ले जाएंगे। अब हम इस नाव को सदा अपने सिर पर रखेंगे। क्योंकि इस नाव ने हमें नदी पार करवा दी।
लोग कहने लगे, तुम पागल हो गए हो! नाव नदी पार करने के लिए है और फिर छोड़ देने के लिए है। और जो पागल नाव को सिर पर लेकर घूमेगा, उससे तो अच्छा था कि वह नदी ही पार न करता, कम से कम नाव की झंझट से तो बचता।
शास्त्र और शब्द भी इशारे हैं--किसी तरफ पार हो जाने के लिए। लेकिन उन इशारों को लोग सिर पर ले लेते हैं, फिर जिंदगी भर उन्हीं के नीचे दबते हैं और मर जाते हैं। और उसका कोई पता नहीं चलता, जिसके लिए इशारे थे।
इसीलिए दुनिया में हिंदू हो गए हैं, मुसलमान हो गए हैं, ईसाई हो गए हैं, जैन हो गए हैं, लेकिन सत्य के खोजी नहीं। हिंदू का क्या मतलब? हिंदू का मतलब है कि कुछ शास्त्रों को एक आदमी ने अपने सिर पर पकड़ रखा है और वह कहता है, यही सत्य है। मुसलमान का क्या मतलब है? मुसलमान का मतलब है: किन्हीं दूसरे शास्त्रों को, किन्हीं दूसरे इशारों को उसने अपने सिर पर रख लिया है और वह कहता है, यही सत्य है। और सारी दुनिया में सारे लोग शास्त्रों को सिर पर लिए हुए खड़े हैं। अन्यथा आदमी आदमी है, न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान है। हिंदू और मुसलमान बनाने वाला शास्त्र है।
हिंदू और मुसलमान के बीच फासला क्या है? शब्दों का फासला है। उसने एक तरह के शब्द सीखे हैं और मैंने दूसरे तरह के शब्द सीखे हैं, तो मैं हिंदू हूं, वह मुसलमान है, तीसरा आदमी ईसाई है। फर्क क्या है तीन आदमियों के बीच? तीन तरह के शब्दों की परंपराओं के अतिरिक्त और कोई फर्क नहीं है। एक आदमी ने अल्लाह सीखा है तो वह मुसलमान है, एक ने राम सीखा है तो वह हिंदू है। फर्क क्या है दोनों के बीच? दो शब्दों का! और अल्लाह भी एक इशारा है और राम भी एक इशारा है। मजे की बात यह है! और जिसकी तरफ इशारा है, वह न अल्लाह है, न राम है। मोहम्मद भी एक अंगुली बता कर कहता है, वह रहा सत्य। इसकी अंगुली को जिसने पकड़ लिया है, वह मुसलमान है। और कृष्ण भी अंगुली उठा कर कहता है, वह रहा सत्य। इसकी अंगुली को जिसने पकड़ लिया, वह हिंदू है। और जिस तरफ ये अंगुलियां उठती हैं--अंगुलियां हजार हो सकती हैं, चांद एक है। लेकिन फिर अंगुलियों को पकड़ने वाले लोग लड़ते हैं।
दुनिया में सिर्फ आदमी है, न कोई हिंदू, न कोई मुसलमान। शास्त्रों का फासला है। और शास्त्र इशारे हैं। शास्त्र पकड़ने के लिए नहीं, छोड़ देने के लिए हैं। नाव सिर पर ढोने के लिए नहीं, यात्रा में सहयोगी बनने के लिए है। सब शब्द सहयोगी की तरह शुरू होते हैं और दुश्मन की तरह छाती पर बैठ जाते हैं। कोई सोचे कि हमारे बीच शब्दों के अतिरिक्त और कोई फासला है? दुनिया में जितने झगड़े हैं, शब्दों के अतिरिक्त झगड़े का और कोई कारण है? जितनी आइडियोलॉजीज हैं, ये क्या हैं?
आइडियोलॉजीज हजार हो सकती हैं, लाख हो सकती हैं, करोड़ हो सकती हैं। एक-एक आदमी की एक-एक आइडियोलॉजी हो सकती है। जितने आदमी हैं, उतने विचार हो सकते हैं। लेकिन सत्य तो एक है। सत्य का अर्थ है: जो है।
लेकिन जो है, दैट व्हिच इज़, उसको अगर जानना है, तो मुझे सारे शब्द छोड़ देने पड़ेंगे। तो उसे मैं बिना शब्दों को छोड़े कभी नहीं जान सकता हूं। सत्य को जानने की दिशा में पहला जो बड़ा काम है, वह शब्दों को, शास्त्रों को, संप्रदायों को, सिद्धांतों को छोड़ देना है। जो इन्हें जितने जोर से पकड़ेगा, उतना ही मुश्किल हो जाएगा उसे जानना, जो है।
सत्य की इसलिए कोई परिभाषा नहीं हो सकती, क्योंकि सभी परिभाषाएं शब्दों में होती हैं। हम नहीं होंगे, तो भी सत्य होगा; पृथ्वी पर मनुष्य नहीं था, तो भी सत्य था; शब्द नहीं था लेकिन तब, सत्य था। कल यह हो सकता है कि सारे मनुष्य खो जाएं, न हों, तो भी सत्य होगा। चांद था, जब इशारे करने वाले नहीं थे, तब भी; और इशारे करने वाले नहीं रह जाएंगे, तो भी चांद होगा। इशारों से चांद के होने का कोई भी अनिवार्य संबंध नहीं है। हां, चांद न हो तो इशारे नहीं किए जा सकते। लेकिन इशारे न हों तो चांद हो सकता है। सत्य था, सत्य है, सत्य रहेगा; हम हों, न हों, इससे कोई भेद नहीं पड़ता। जो है, वह हमारे शब्दों से रूपांतरित नहीं हो जाता।
लेकिन हम अपने शब्दों के चश्मों से ही उसे देखना चाहते हैं। तब कठिनाई शुरू हो जाती है। हम सदा अपनी दृष्टि से देखना चाहते हैं। और तब हमारी दृष्टि सत्य को वैसा नहीं दिखने देती जैसा वह है, वैसा बना देती है जैसा हम देखना चाहते हैं। यह हमारे खयाल में नहीं है कि जब तक हमारी कोई दृष्टि...और दृष्टि का मतलब: हमारे सीखे हुए शब्द। दृष्टि का और कोई मतलब नहीं है। दृष्टि का मतलब है: हमारे सीखे हुए शब्द, हमारा सीखा हुआ ज्ञान, लघनग; वह जो हमने जान लिया है, जो हमने सुन लिया है, जो हमने पढ़ लिया है, वह हमारी दृष्टि को बनाता है। उस दृष्टि के माध्यम से जब हम देखने चलते हैं, तो सत्य सत्य नहीं रह जाता, बीच में एक परदा है और वह परदा विकृत कर देता है।
मैंने सुना है, एक गरीब आदमी एक गाय खरीद लाया था। लेकिन गाय थी एक सम्राट के घर की। गरीब आदमी की बड़े दिनों से इच्छा थी कि वह गाय खरीदे, और कोई बहुत बढ़िया गाय खरीदे। बहुत मुश्किल से रुपये इकट्ठे करके गाय खरीदी। लेकिन उसे पता नहीं था कि राजा के घर की गाय गरीब आदमी के घर में कैसे रह सकती है? गाय तो ले आया, लेकिन गाय ने उस गरीब के घर का सूखा भूसा, सूखा घास खाने से इनकार कर दिया। वह हरी घास खाने की आदी थी, वह कीमती घास खाने की आदी थी। वह गरीब बहुत परेशान हुआ। बहुत मनाया, समझाया। कहा, माता! सब तरह से उसके हाथ-पैर जोड़े। लेकिन गाय कहीं सुनती है? घबड़ा गया।
गांव में एक बूढ़ा आदमी था जानकार पशुओं के बाबत। उसके पास गया और कहा, मैं क्या करूं? मैं तो गरीब आदमी हूं, सूखा घास है मेरे पास। हरी घास मैं कहां से ला सकता हूं बेमौसम में! राजा के घर की गाय लेकर मुश्किल में पड़ गया। दो दिन से भूखी खड़ी है।
उस बूढ़े आदमी ने कहा, तू बाजार जा और एक हरे रंग का चश्मा खरीद ला, और चश्मा गाय की आंख पर चढ़ा दे। चीजें हरी हों या न हों, हरी दिख सकती हैं। फिर उसने कहा, गाय को क्या पता चलेगा कि घास हरी है या नहीं! सवाल गाय को हरी दिखनी चाहिए, बात खतम हो गई।
वह गरीब आदमी एक चश्मा खरीद लाया और उसने गाय की आंख पर चश्मा लगा दिया। गाय वह सूखे घास को खाने लगी, क्योंकि घास अब हरा दिखाई पड़ रहा था।
हम सारे लोग भी चश्मे चढ़ाए हुए हैं और चीजों को वैसा देख रहे हैं जैसी वे नहीं हैं। जरा सा चश्मा बदल लें, और चीजें दूसरी दिखाई पड़ने लगती हैं। लेकिन एक बात ध्यान रहे, जब तक चश्मा है, तब तक चीजें वैसी नहीं दिखाई पड़ सकतीं जैसी वे हैं। क्योंकि चश्मा कुछ न कुछ करेगा। और सब चश्मे रंगीन हैं। सब चश्मे रंगीन हैं, क्योंकि सब चश्मे किन्हीं व्यक्तियों, किन्हीं परंपराओं के द्वारा निर्मित हुए हैं। परंपराएं रंग देती हैं।
जब एक आदमी कहता है, मैं भारतीय! तो वह यह कहता है कि मैं एक खास तरह के देखने का मेरा ढंग है, जो और दूसरों का नहीं है। चीन के रहने वाले का नहीं है, जापान के रहने वाले का नहीं है। मैं भारतीय हूं, मेरा एक खास तरह का देखने का ढंग है। भारतीय होने का क्या मतलब है? जब एक आदमी कहता है, हिंदू, ईसाई, बौद्ध, तो वह यह कहता है कि मेरा एक खास ढंग है चीजों को देखने का--बौद्ध। उस परंपरा के चश्मे से मैं देखता हूं चीजों को। जब एक आदमी कहता है, इस्लाम, तो वह कहता है, मैं इस्लाम के चश्मे से देखता हूं चीजों को। लेकिन कोई आदमी चीजों को देखने को राजी नहीं है, चश्मों को स्थापित करने को राजी है। तो फिर सत्य को कभी भी नहीं जान सकता। इस्लाम से जो देखा जाएगा, वह वही होगा जो इस्लाम से देखा जा सकता है, वह वह नहीं होगा जो है।
जब तक हम चश्मों पर जोर देते हैं, दृष्टियों पर जोर देते हैं, सिद्धांतों पर जोर देते हैं, परंपराओं पर जोर देते हैं, तब तक हमारी सत्य की खोज शुरू नहीं हुई है। तब तक हम यह कहते हैं, सत्य को ऐसा होना चाहिए। यह हम पहले तय करते हैं सत्य को बिना जाने। यह हम पहले तय करते हैं कि सत्य को कैसा होना चाहिए और वह तय करके फिर हम सत्य के पास जाते हैं--सत्य वैसा ही हो जाता है, क्योंकि हमारा चश्मा जिस रंग का है वैसा हमें दिखाई पड़ने लगता है।
इसलिए दुनिया में कोई तीन सौ धर्म हैं, और तीन सौ ही धर्म के मानने वालों को सत्य वैसा दिखाई पड़ता है जैसा उनकी किताब में लिखा है। वह दिखाई पड़ेगा ही, इसमें सत्य का कोई कसूर नहीं है। इसमें अपनी आंख पर चढ़ा हुआ चश्मा है। जो आदमी यहां हरे रंग का चश्मा लगा कर खड़ा होगा, उसको सारी चीजें हरी दिखाई पड़ेंगी। और वह कहेगा कि मुझे दिखाई पड़ रही हैं, इसलिए मैं कैसे कहूं कि असत्य हैं? सत्य हैं! मुझे दिखाई पड़ रहा है वही सत्य है।
इसलिए ध्यान रहे, जो आदमी यह कहता है कि जो मुझे दिखाई पड़ता है वही सत्य है, वह सत्य से भी ज्यादा अपनी दृष्टि की कीमत बता रहा है।
और सत्य उसे दिखाई पड़ सकता है, जो अपनी दृष्टि को छोड़ने को राजी है। जो कहता है, जो मुझे दिखाई पड़ता है वह नहीं, जो है, उसकी मुझे फिकर है।
तो सत्य की खोज की पहली शर्त है: अपनी दृष्टि को छोड़ने की सामर्थ्य। अपने सीखे हुए शब्दों को छोड़ने की हिम्मत। अपने शास्त्र को, अपने पंथ को, अपने संप्रदाय को एक तरफ हटाने की हिम्मत। इसके लिए जो आदमी तैयार हो जाता है, वह आदमी सीधा देख सकता है कि क्या है। हम सीधे कभी भी नहीं देखते, हमारा देखना सब बंधा हुआ देखना है।
एक पत्थर रखा हुआ है। एक बच्चे को बचपन से सिखाया गया है--यह भगवान है। दूसरे बच्चे को बचपन से सिखाया गया है कि यह कुफ्र है। यह भगवान नहीं है, यह पाप है इसको भगवान मानना। ये दोनों बच्चे उस पत्थर के सामने से निकलते हैं। एक हाथ जोड़ कर नमस्कार करता है, दूसरा मौका मिलते ही उस पत्थर को लात मार कर तोड़ डालना चाहता है। ये दोनों ही उस पत्थर को नहीं देख रहे हैं जो है! एक देख रहा है--भगवान, जो उसने सीखा है। और एक देख रहा है--पाप, जो उसने सीखा है। इन दोनों की भूल एक है। ये दोनों अलग-अलग तरह के लोग नहीं हैं। हम कहेंगे, दोनों उलटे हैं। एक मारता है लात, एक करता है पूजा; दोनों उलटे हैं।
दोनों उलटे नहीं हैं, दोनों बिलकुल एक जैसे हैं। एक ने यह सीखा है, दूसरे ने वह सीखा है। दोनों अपने सीखने को मानते हैं। पत्थर को कोई देखने को राजी नहीं है कि वह क्या है।
पत्थर न तो पाप है और न भगवान है; पत्थर सिर्फ पत्थर है। लेकिन उस पत्थर की सीधी सच्चाई को देखने के लिए अपनी दृष्टि से छुटकारा बहुत जरूरी है। नहीं तो एक पत्थर को तोड़ने में जान गंवा देगा और दूसरा पत्थर को बचाने में जान गंवा देगा, और दोनों में से कोई उसको नहीं देखेंगे जो था। जो था, उसे देखते, तो शायद दोनों हंसते और कहते कि हम दोनों पागल हैं! पत्थर पत्थर है, न तो वह भगवान है और न ही वह पाप है कि तोड़ा जाए; न वह पूजने योग्य है, न तोड़ने योग्य है।
यह कभी आपने सोचा कि पूजा करने वाला और तोड़ने वाला, दोनों पत्थर नहीं देख रहे हैं, दोनों कुछ और देख रहे हैं! मूर्तिभंजक और मूर्तिपूजक, दोनों ही पत्थर नहीं देखते। एक मूर्ति देखता है भगवान की, दूसरा मूर्ति देखता है शैतान की कि तोड़ देने योग्य है, मिटा देने से पुण्य होगा। एक को पूजने से पुण्य होता है। लेकिन बेचारे पत्थर को कोई भी नहीं देखता। मूर्तिपूजक मर जाएगा, मूर्तिभंजक मर जाएगा, और तब भी वह पत्थर इस दुनिया में होगा। लेकिन तब वह क्या होगा? भगवान होगा कि कुफ्र होगा? तब वह सिर्फ पत्थर होगा। वह अभी भी वही है। उस पत्थर को पता भी नहीं है कि कोई मेरी पूजा करता है या कोई मुझे तोड़ने आता है। अगर पत्थर को पता होगा तो बहुत हंसता होगा हिंदू पर, बहुत हंसता होगा मुसलमान पर कि कैसे पागल हो! मैं सिर्फ पत्थर हूं, मैं जो हूं वह हूं।
लेकिन हम, जो है, उसे कभी देखते ही नहीं। हम तो जो देखने के लिए तैयार किए गए हैं, वही देखते हैं।
उन्नीस सौ बावन में, हिमालय की तराई में नीलगाय नाम का जानवर होता है, उसने खेतों में बहुत उत्पात कर रखा था। बहुत नुकसान कर रहा था। उसकी संख्या बहुत बढ़ गई थी। तो संसद में सवाल उठा कि नीलगाय को गोली मारनी जरूरी हो गई है, लेकिन गाय शब्द उसमें जुड़ा है, उसको गोली कैसे मारी जाए?
तो संसद में एक समझदार आदमी ने कहा कि इस बात को मत उठाइए, पहले उसका नाम नीलघोड़ा कर दीजिए, फिर गोली मारना आसान हो जाएगा। संसद ने तय किया कि उसका नाम नीलगाय नहीं है, नीलघोड़ा है। और उसके बाद उसको गोली मारी गई, धड़ाधड़ नीलगाय मारी गई, लेकिन किसी हिंदू ने एतराज नहीं उठाया। क्योंकि नीलघोड़ा के मरने से हिंदू को क्या मतलब? नीलगाय मरती तो झगड़ा होता। क्योंकि वह जो गाय का चश्मा था, वह दिक्कत ला देता, वह खड़ी कर देता फौरन झंझट। लेकिन कोई झंझट नहीं हुई। बड़े होशियार लोग! जरा...और वह नीलगाय बेचारी जो थी वही है, चाहे नीलघोड़ा कहो, चाहे नीलगाय। उसे पता भी नहीं चला होगा कि संसद ने हमारा नाम बदल कर मरने की तैयारी कर दी। उसको कोई पता नहीं चला होगा कि आदमी कैसे खेल खेलता है।
लेकिन उसी गांव में अगर वह नीलगाय होती तो झगड़ा खड़ा होता, नीलघोड़ा हो गई तो झगड़ा खड़ा नहीं होगा। क्योंकि हम उसे तो देखते ही नहीं जो है, हम तो वह देखते हैं जो हम चश्मा लगा लेते हैं। नीलगाय थी तो वह हमारे धर्म का प्रतीक थी। नीलघोड़ा हो गई तो बात खतम हो गई।
अगर हिंदू-मुस्लिम दंगा हो, तो आपकी टोपी उठा कर चोटी देखी जाएगी। अगर चोटी है तो मुसलमान मार डालेगा, अगर चोटी नहीं है तो हिंदू मार डालेगा। आपसे किसी को मतलब नहीं है, अपने प्रतीक से मतलब है। वह चोटी, वह जनेऊ, अपने प्रतीक से मतलब है। उस आदमी को कोई नहीं देख रहा कि जो वहां खड़ा है। उस आदमी से किसी का कोई संबंध नहीं है।
अपनी इमेज हम आदमी पर आरोपित करते हैं और उसके माध्यम से देखते हैं। हम कभी भी सत्य को नहीं जान सकते हैं। जो आदमी एक प्रतिमा के माध्यम से जीवन को देखता है, वह सत्य को कभी नहीं जान सकता।
अगर किसी आदमी ने कह दिया कि मैं--यह आदमी मुसलमान है। बस, आपने मुसलमान की एक धारणा बना रखी है, अब आप उसी धारणा से मुझे देखेंगे। अब जो मैं हूं, वह आप कभी देखने वाले नहीं हैं। अब मैं दिखूंगा ही नहीं आपको।
और यह ध्यान रहे कि मुसलमान नंबर एक, मुसलमान नंबर दो, एक से आदमी नहीं हैं; मुसलमान नंबर तीन, तीसरे तरह का आदमी है; मुसलमान नंबर चार, चौथे तरह का आदमी है। मुसलमान जैसा कोई भी आदमी नहीं है, एक-एक आदमी इंडिविजुअल है। लेकिन जैसे ही हमने कह दिया मुसलमान, इंडिविजुअल खत्म हो गया। व्यक्ति के अपने मूल्य हैं, एक टाइप, एक इमेज खड़ा हो गया कि मुसलमान यानी क्या। और मुसलमान यानी क्या, जो आपने सीखा है मुसलमान के बाबत वह। और अब यह आदमी आपको वैसा ही दिखाई पड़ेगा। वह वैसा ही दिखाई पड़ेगा। और इस आदमी के साथ आप जो व्यवहार करेंगे, वह इस आदमी के साथ नहीं है, वह उस आदमी के साथ है जिसको आप सोच रहे हैं कि यह है।
इसलिए दुनिया में हम आदमियों से भी नहीं मिल पाते, सत्य से मिलना तो बहुत दूर है। व्यक्ति और व्यक्ति के बीच भी मिलन नहीं हो पाता, हर आदमी अपनी इमेज से मिल रहा है। हर आदमी इमेजिनेशन से घिरा हुआ है, कल्पना से घिरा हुआ है। दुनिया सत्य की बहुत दूसरी है।
एक आदमी गेरुआ वस्त्र पहने खड़ा हुआ है, आप फौरन झुक कर उसके पैर छू लेंगे। यही आदमी गेरुआ वस्त्र पहने हुए नहीं खड़ा है, और आप भूल कर पैर छूने वाले नहीं हैं। आपने किसके पैर छुए? इस आदमी के जो यह है? या आपकी गेरुआ वस्त्र के प्रति एक धारणा है, उस धारणा के आप पैर छू रहे हैं? आदमियों से किसी को कोई मतलब नहीं है।
ठक्कर बापा के जीवन में मैं पढ़ता था, कि वे अहमदाबाद आ रहे हैं किसी मीटिंग में बोलने के लिए। एक थर्ड क्लास के डिब्बे में चढ़े हुए हैं। एक आदमी--पूरे डिब्बे में भीड़ है भारी--और एक आदमी पूरी बेंच पर कब्जा जमाए हुए लेटा हुआ है, आराम से अखबार पढ़ रहा है। ठक्कर बापा ने उससे कहा कि मेरे भाई, मैं बूढ़ा आदमी हूं, अगर मुझे थोड़ा बैठ जाने दो!
चुप रहो! बात मत करना बैठने-वैठने की। दूसरे डिब्बे में चले जाओ! उसने लौट कर भी नहीं देखा कि कौन है। अखबार पढ़ रहा है और बगल में बैठे हुए आदमी से थोड़ी देर में कहता है, ठक्कर बापा का भाषण है अहमदाबाद में। बड़ा अच्छा आदमी है, बड़ा अदभुत आदमी है, इसको सुनने मुझे भी जाना है, तुम भी चलोगे? और ठक्कर बापा पीछे खड़े हैं, जिनसे वह कहता है, बुङ्ढे बकवास मत कर, चुपचाप खड़ा रह!
यह किस ठक्कर बापा से मिलने की बात कर रहा है? किस ठक्कर बापा को देखने जा रहा है? और यह जाएगा। और पैर भी छू सकता है। और वहां प्रभावित होकर लौटेगा कि गजब का आदमी था। और वह आदमी बगल में खड़ा था, जिसको बैठने भी नहीं दे रहा है।
जो है, उसकी तरफ हमारी कोई नजर नहीं है। हमारी नजर वहां अटकी है जो हमने सोच रखा है। हम सब अपने चश्मों से बंधे हुए लोग हैं। जिंदगी के सब पहलुओं पर हमारे चश्मे महत्वपूर्ण हैं, सत्य महत्वपूर्ण नहीं है। और ध्यान रहे, जिसके लिए चश्मा महत्वपूर्ण है, वह सत्य को कभी भी नहीं जान सकता। सत्य की खोज में पहला त्याग है--चश्मे का त्याग।
बहुत मुश्किल है। क्योंकि दृष्टि का त्याग सबसे कठिन बात है। क्यों कठिन बात है? क्योंकि दृष्टि को हमने इतनी प्रगाढ़ता से सीखा है कि हम में और दृष्टि में कोई फर्क ही नहीं रह गया है। अगर आपसे आपकी दृष्टि छीन ली जाए, तो आप कहोगे कि मैं तो मिट गया, मैं तो बचा ही नहीं, फिर मैं क्या रहा! आप और आपकी दृष्टि बिलकुल एक हो गए हैं। तो दृष्टि को छोड़ना करीब-करीब मरने जैसा लगेगा। और इसलिए यह समझ लेना कि सत्य की दिशा में वही बढ़ते हैं जो अपने को छोड़ने और मरने के लिए तैयार हैं। जो कहते हैं कि हम तो वही जानेंगे जो है।
बड़ा कठिन है यह। कल एक मुसलमान ने आपको धोखा दे दिया था। फिर आज एक मुसलमान मिलता है, तो आपका मन करता है मानने का कि यह भी धोखा देगा, क्योंकि मुसलमान ने धोखा दिया था। लेकिन यह दूसरा आदमी है, यह दूसरा हिंदू है, दूसरा ईसाई है, दूसरा जैन है, यह वही आदमी नहीं है। इसका मतलब यह है कि कल जो आपने सीखा था, उसको बीच में मत लाइए, उसको हटाइए। क्योंकि यह बिलकुल दूसरा आदमी है। इससे उस आदमी का कोई संबंध नहीं जिसको आपने कल जाना था। उससे इसके बाबत कोई नतीजा नहीं लिया जा सकता।
बड़ी कठिन है दुनिया। दूसरा था वह आदमी, यह तो ठीक है; मैं आपसे कल मिला था, आज मिल रहा हूं, आज मैं दूसरा आदमी हूं, वही नहीं; चौबीस घंटे में बहुत कुछ बदल गया है, गंगा बहुत बह गई है।
बुद्ध के पास एक आदमी आया और उसने उनके ऊपर थूक दिया। बहुत गुस्से में था। बुद्ध ने अपनी चादर से थूक पोंछ लिया और उस आदमी से कहा, कुछ और कहना है?
बुद्ध के पास बैठे भिक्षुओं को तो आग लग गई। उन्होंने कहा, पागल हो गए हैं आप! वह आदमी थूक रहा है और आप उससे पूछ रहे हैं, और कुछ कहना है।
बुद्ध ने कहा कि जहां तक मैं समझता हूं, यह आदमी कुछ कहना चाहता है, लेकिन इतने तीव्र भाव हैं इसके कि शब्दों से नहीं कह पाता है, इसलिए थूक कर कहता है। मैं समझ गया हूं इसकी बात। इस आदमी को देखो, यह आदमी इतने जोर से भरा हुआ है किसी बात से कि बेचारा शब्दों से नहीं कह सकता, इसलिए थूक कर कह रहा है। मैं इसे देख रहा हूं।
अब यह आदमी जैसे बिना चश्मे के देख रहा है। जैसे सीधा देख रहा है। लेकिन बुद्ध का शिष्य आनंद बोला कि हमारे बरदाश्त के बाहर है।
वह आदमी तो हैरान हो गया जिसने थूका था। वह चला गया। रात भर सो नहीं सका। दूसरे दिन क्षमा मांगने आया। उसने बुद्ध के पैर पकड़ लिए, रोने लगा, आंसू टपकाने लगा। बुद्ध ने कहा, देखो-देखो! यह वही आदमी है जिस पर कल तुम नाराज हुए। गंगा में कितना पानी बह गया! कल यह थूकने आया था, आज यह पैर पकड़ कर आंसू गिरा रहा है। और मैं तुमसे कहता हूं, आनंद, आज भी इसका मन इतने भाव से भरा है कि यह कह नहीं पा रहा है, यह कुछ कहना चाहता है, आंसू टपका रहा है।
वह आदमी कहने लगा, मुझे माफ कर दें!
बुद्ध ने कहा, पागल, किसको कौन माफ करे? चौबीस घंटे में मैं भी बदल गया, तू भी बदल गया। अब वे दोनों घटनाएं जा चुकी हैं। अब वह कोई भी नहीं है इस दुनिया में, कौन किसको माफ करे! अब मैं वह नहीं हूं जो चौबीस घंटे पहले तू आया था तब था। अगर मैं अब भी वही हूं, तो मैं मरा हुआ आदमी हूं। सिर्फ मरा हुआ नहीं बदलता है, जिंदा तो बदल जाता है। जिंदगी का मतलब है बदल जाना। जिंदगी का मतलब है परिवर्तन। और तू भी अब वही नहीं है। सोच! लौट कर देख! तू अब वह कहां है जो थूक गया था मेरे ऊपर? तू बिलकुल दूसरा आदमी है। इसलिए छोड़ो। वे दोनों अब नहीं हैं, वे जा चुके। पानी पर खींची हुई लकीरों की तरह मिट गए। मैं तुझे देखूं, तू मुझे देख, ज्यादा उचित है। अब उनको, जो अब नहीं रहे, बीच में लाने की कोई भी जरूरत नहीं है।
लेकिन वह आदमी कहता है, नहीं, मुझे माफ कर दो!
तो बुद्ध अपने भिक्षुओं से कहते हैं, देखते हो, यह आदमी कल ही रुका हुआ है। यह मुझे नहीं देख रहा है, यह चौबीस घंटे पहले उस आदमी को देख रहा है जिसके ऊपर थूक गया था। यह अपने को भी नहीं जान रहा है जो यह अभी है। यह अपने को वहीं जान रहा है, चौबीस घंटे पहले, जब थूक गया था। यह दूसरा आदमी हो गया। तुझे मैं कैसे माफ करूं? तू वह है ही नहीं जो थूक गया था। क्योंकि थूक जो गया था, वह रो नहीं सकता है, वह आंसू नहीं बहा सकता है, वह पैर नहीं पकड़ सकता है। जिसने क्रोध किया था, वही क्षमा मांगने नहीं आया है। क्योंकि क्षमा मांगने का व्यक्तित्व ही दूसरा है, क्रोध का व्यक्तित्व ही दूसरा है।
एक आदमी और दूसरे आदमी में तो भेद है ही, एक आदमी में भी एक क्षण के बाद भेद है। लेकिन हम हमेशा वही देखते हैं जो हमने कल देखा था, जो हमने परसों देखा था। जो बीत गया, वह चश्मा हमारी आंखों पर लग जाता है, हम उसी से जिंदगी को देखते चले जाते हैं।
आप जिस पत्नी को विवाह करके ले आए थे बीस साल पहले, या जो पत्नी बीस साल पहले आपको पति बना कर ले आई थी, शायद ही आपने बीस साल में उसे गौर से देखा हो--कि वह औरत अब कहां है जो आप लाए थे? वह आदमी अब कहां है जो आप लाए थे? वे सब बह गए। लेकिन धारणा वहीं रुकी है, चीजें वहीं अटकी हैं। और हम उसी से तौल रहे हैं, और उसी के पास जी रहे हैं। वह सब जा चुका है, सिवाय स्मृति के और कहीं भी नहीं रह गया है। रोज सब बदल जाता है, रोज सब बदल जाता है, कोई भी ठहरा हुआ नहीं है। जिंदगी एक बहाव है।
सत्य को वे जान सकते हैं, जो बहाव के साथ खड़े हो जाते हैं और पिछली दृष्टि को बह जाने देते हैं, रुकने नहीं देते।
लेकिन हमारी सारी दृष्टियां अटकी हुई हैं। जीवन के सत्य को जानने के लिए, इतना निर्मल होने की जरूरत, इतना इनोसेंट, जैसे दर्पण। आपने फर्क देखा है? फोटोग्राफ और दर्पण में कुछ फर्क दिखता है?
फोटोग्राफ पकड़ लेता है जो भी उसे दिखाई पड़ता है, फिर उसे छोड़ता नहीं। फोटोग्राफ की दृष्टि होती है, इमेज होता है। फोटोग्राफ बहुत सेंसिटिव है, जो चीज दिख गई वह उसको एकदम पकड़ लेता है, फिर उसको छोड़ता नहीं। फिर वह उसको ही पकड़े जीता है। फिर जिंदगी भर अब वह इसी को पकड़े रहेगा। बहुत चित्र निकलेंगे फिर इसके सामने से--सूरज उगेंगे, और चांद निकलेगा, और पक्षी उड़ेंगे--लेकिन नहीं, अब वह नहीं पकड़ेगा। उसने जो पकड़ लिया वह पकड़ लिया। इसलिए फोटोग्राफ मर जाता है।
दर्पण मरता नहीं है। वह भी देखता है, फोटोग्राफ से भी ज्यादा साफ देखता है, लेकिन पकड़ता नहीं। चित्र सामने से बीत जाते हैं, दर्पण खाली हो जाता है। फिर नये चित्र आते हैं, उनको देखता है, फिर दर्पण खाली हो जाता है। दर्पण रोज खाली हो जाता है, प्रतिपल खाली हो जाता है, इसलिए रोज फिर से पकड़ने के लिए ताजा हो जाता है। दर्पण रोज दर्शन करता है, क्योंकि दर्पण दृष्टि नहीं बांधता, दर्पण पकड़ नहीं लेता।
हम सब फोटोग्राफ जैसे लोग हैं। हमारा जो माइंड है, वह जो पकड़ लेता है तो पकड़ ही लेता है, फिर उससे छूटता नहीं। और इसलिए हमें सत्य का कभी पता नहीं चलता; जो हमने पकड़ रखा है उसी के माध्यम से हम जिंदगी को देखते रहते हैं।
सत्य को जान सकते हैं वे, जो फोटोग्राफ की तरह व्यवहार नहीं करते खोपड़ी से, जो खोपड़ी से दर्पण की तरह का व्यवहार लेते हैं। जिनकी आंखें पकड़ती नहीं, खाली हैं। जिनकी आंखें मिरर लाइक हैं, चीजें बदल जाती हैं और आंखें खाली हो जाती हैं।
लेकिन नहीं, यह मुश्किल है बहुत। हम सब अटक जाते हैं। बूढ़ा आदमी बचपन की याद करता रहता है। कहता है, वे दिन! वह बूढ़ा हो गया, लेकिन स्मृति में वह बच्चा बना रहता है। वह बूढ़ा हो गया, लेकिन स्मृति में जवान बना रहता है। और उन जगह अटका रहता है जहां वह कभी था। अब वहां नहीं है, अब सब बदल चुका है, सब जा चुका है, सब खो चुका है।
नेपोलियन हार गया, तो उसे सेंट हेलेना के एक छोटे से द्वीप पर कैद कर दिया गया। सम्राट था, तो हाथ में जंजीरें नहीं डाली गईं, द्वीप पर कैद कर दिया। द्वीप के बाहर कहीं जा नहीं सकता था, द्वीप पर पहरा था पूरे पर। लेकिन द्वीप के भीतर घूम सकता था, फिर सकता था, जो भी करना हो कर सकता था। संगी-साथी दिए थे, डाक्टर दिया था, सब इंतजाम किया था।
दूसरे दिन ही सुबह, आज रात बंद किया गया, दूसरे दिन सुबह अपने डाक्टर को साथ लिए घूमने निकला है नेपोलियन। एक छोटी सी पगडंडी पर एक घासवाली औरत घास का गट्ठा लिए चली आती है। रास्ता संकरा है, डाक्टर चिल्ला कर कहता है, ओ घसियारिन, हट जा वहां से! देखती नहीं, कौन आ रहा है--नेपोलियन!
नेपोलियन डाक्टर को कहता है, पागल, तू कल के नेपोलियन का खयाल कर रहा है। अब नेपोलियन को देख कर कोई भी नहीं हटेगा। हटने की कोई जरूरत भी नहीं है। वह वक्त गया, जब मैं पहाड़ को कहता कि हट जाओ! तो पहाड़ हट जाता। अब हमें हट जाना चाहिए।
नेपोलियन पगडंडी से उतर कर नीचे खड़ा हो जाता है। वह डाक्टर कहता है, क्या कहते हो तुम? क्योंकि डाक्टर को पता नहीं है, सब कुछ बदल गया। लेकिन नेपोलियन का माइंड ज्यादा मिरर लाइक मालूम होता है। वह कहता है, वह बात गई। अब घासवाली के लिए मुझे हट जाना चाहिए। वह वक्त गया, जब मैं सम्राटों को कहता कि हट जाओ! यह दिमाग, यह चित्त की बात, जैसे पीछे सब पुंछ गया। अब नहीं है कुछ। अब हम चीजों को फिर सीधा-साफ देख सकते हैं।
सत्य कोई ऐसी चीज नहीं है कि कहीं रखी है और आप चले जाएंगे और देख लेंगे। इस भूल में मत पड़ना। सत्य है पूरे जीवन का सतत अनुभव। सत्य कोई ऐसी चीज नहीं है कि कहीं हम गए, उठाया परदा और दर्शन कर लिया सत्य का। सत्य का अर्थ है: पूरे जीवन का सार-संक्षेप। सत्य का अर्थ है: पूरे जीवन की अनुभूति की उपलब्धि। और पूरे जीवन की अनुभूति की उपलब्धि बहुत डायनेमिक है, स्टेटिक नहीं है। रोज-रोज जानना पड़ता है, रोज-रोज भूल जाना पड़ता है। रोज-रोज जानते-जानते एक क्षण ऐसा आता है कि जीवन के प्रत्यय का बोध हो जाता है कि क्या है जीवन। लेकिन उस जीवन के प्रत्यय के बोध के लिए जरूरी है कि हम जीवन के साथ हों। हम हमेशा जीवन से पीछे होते हैं। हम स्मृति में होते हैं, जीवन सदा आगे होता है।
सुकरात मरने के करीब था, उसको जहर दिया जा रहा था। अब जिस आदमी को जहर मिल रहा है, अगर आपको जहर मिल रहा होता तो आप क्या सोचते? क्या करते? आप पड़े हुए हैं खाट पर और जहर तैयार किया जा रहा है। बस आधी घड़ी में जहर आपको दे दिया जाएगा। आप क्या सोचते उस वक्त? सोचते बचपन की, सोचते जवानी की, सोचते मित्रों की, सोचते उस सब की जो था। बहुत घबड़ाते कि सब छूट जाएगा, सब छूट जाएगा! गया मैं, मरा मैं, अब जिंदगी हाथ से गई!
लेकिन सुकरात? मित्र रो रहे हैं उसके पास बैठ कर, उनकी आंखों से आंसू बंद नहीं होते। तो सुकरात कहता है, किसके लिए रोते हो? किसके लिए रोते हो? तो वे कहते हैं कि तुम्हारे लिए। सुकरात ने कहा कि जो मैं था, जिसके लिए तुम रोते हो, वह तो कभी का जा चुका, वह अब मरेगा नहीं, वह तो मर ही चुका, वह तो अब है ही नहीं। तुम्हारी जो स्मृतियां हैं मेरे संबंध में, वह तो कभी का खो चुका आदमी।
और सुकरात उठ कर बाहर जाता है और जहर पीसने वाले से पूछता है, कितनी देर और?
तो जहर वाला कहता है, पागल हो गए हो? मैं तुम्हारी वजह से धीरे-धीरे पीस रहा हूं। कि इतना अच्छा आदमी, थोड़ी देर और जी ले! तुम क्यों बार-बार पूछते हो? तुम्हारा मतलब क्या है?
तो सुकरात कहता है कि मैं तो जानने को आतुर हूं कि यह मौत क्या है? मैं बिलकुल तैयार हूं, तुम जहर ले आओ! मैं इस मौत को जानना चाहता हूं, यह मौत क्या है? मेरा मन बिलकुल तैयार है। मेरा मन बिलकुल खाली है। मेरे मन में कुछ भी नहीं है जो हो चुका, जो जा चुका। जो हो रहा है, उसको मैं जानना चाहता हूं। तुम जल्दी जहर ले आओ। मैं जान लूं कि यह मौत क्या है?
अब ऐसा आदमी कभी मर नहीं सकता, जो मौत के सत्य को जानने के लिए भी इतनी तैयारी दिखलाता है। लेकिन अधिक लोग मौत को बिना जाने मर जाते हैं। इसीलिए बार-बार जन्मते हैं और बार-बार मरते हैं। अधिक लोग मौत को बिना जाने मर जाते हैं, क्योंकि अधिक लोग जीवन को ही बिना जाने मर जाते हैं। मौत को जानना तो मुश्किल है, जो जीवन को ही नहीं जान पाता है।
जीवन को ही हम नहीं जान पाते हैं, क्योंकि हमारे माइंड का फोकस अतीत में लगा रहता है और जिंदगी हमेशा वर्तमान में है। लोग हमेशा पीछे देखते रहते हैं, और जिंदगी अभी है--हियर एंड नाउ! अभी और यहीं! इसी वक्त! हां, जब बीत जाएगा यह क्षण, तब हम फिर इस पर फोकस लगा लेंगे।
अभी आप मुझे सुन रहे हैं, तब आप और बातें सोच रहे होंगे। और मैं बोल कर गया कि मैंने जो बोला है, वह आप सोचना शुरू कर देंगे। यह अजीब सा मामला है। तब आप, जब मैं बोल रहा था, तब कुछ और सोच रहे थे। सोच रहे थे कि यह आदमी जो बोल रहा है, गीता से मेल खाता है कि नहीं; यह आदमी जो बोल रहा है, हिंदू धर्म के पक्ष में है कि विपक्ष में; यह आदमी जो बोल रहा है, यह ठीक है कि गलत; यह सब आप सोच रहे थे। तब आप चूक गए उससे जो मैं बोल रहा था। और मैं बोल कर यहां से गया तो फिर आप सोचेंगे: इस आदमी ने यह कहा, इस आदमी ने वह कहा, इस आदमी ने यह कहा। तब फिर माइंड पीछे लगा है।
और तब जिंदगी जहां से आती है वहीं से हमारा संपर्क नहीं हो पाता। हम अतीत में अटके रह जाते हैं और जिंदगी अभी है। ऐसा जीवन भर चलता है, हम जीवन भर चूक जाते हैं और नहीं जान पाते कि सत्य क्या है। फिर किताबों में पढ़ते हैं, फिर शास्त्रों से शब्द सीख लेते हैं और उन्हीं शब्दों को सत्य मान लेते हैं।
जीवन से जिन्हें सत्य नहीं मिला, उन्हें शास्त्रों से कैसे मिल सकता है? और जिन्हें जीवन से मिल जाता है, उन्हें शास्त्रों के सत्य की जरूरत क्या है? इतना विराट जीवन हमें सत्य नहीं दिखा पाता, तो किताबें आदमी की हमें सत्य दिखा देंगी?
रवींद्रनाथ ने एक संस्मरण लिखा है। लिखा है कि एक पूर्णिमा की रात मैं एक बजरे पर, एक नाव में एक किताब पढ़ता था। सौंदर्य-शास्त्र पर, एस्थेटिक्स पर एक शास्त्र पढ़ता था।
अब देखें मजा! पूरे चांद की रात है, झील है, सन्नाटा है, नाव है, अकेले हैं। बजाय इसके कि देखें कि सौंदर्य क्या है, पढ़ते हैं सौंदर्य-शास्त्र पर एक किताब! सौंदर्य चारों तरफ बरस रहा है। सौंदर्य पूरे वक्त झर रहा है। लेकिन बजरे में बंद करके द्वार-दरवाजा मोमबत्ती जला कर पढ़ रहे हैं सौंदर्य-शास्त्र की एक किताब। पढ़ रहे हैं सौंदर्य-शास्त्र की किताब में कि सौंदर्य क्या है, डेफिनीशन क्या है सौंदर्य की। और सौंदर्य बरस रहा है बाहर और बुला रहा है कि आओ-आओ, चिल्ला रहा है। लेकिन वे नहीं सुन रहे हैं। क्योंकि किताब पढ़ने वाला जिंदगी को कभी नहीं सुनता। इधर आंख गड़ाए हुए उस मद्दी सी रोशनी में, पीली सी रोशनी में, धुआं उठती मोमबत्ती में पढ़ रहे हैं--सौंदर्य क्या है?
दो बजे रात, थक गई हैं आंखें, किताब बंद कर दी है, फूंक मार कर मोमबत्ती बुझा दी है--और रवींद्रनाथ ने लिखा अपनी डायरी में कि दंग रह गया मैं! जैसे ही मोमबत्ती बुझी--रंध्र-रंध्र से, बजरे के द्वार-द्वार, खिड़की-खिड़की से, चांद की रोशनी भीतर भर आई। नाचने लगी चांद की रोशनी भीतर। मैं हैरान हुआ कि मोमबत्ती की रोशनी की वजह से चांद की रोशनी भीतर नहीं आ पाती! मोमबत्ती बुझी तो चांद भीतर आ गया। जरा-जरा से छेद से भी रोशनी आ गई भीतर। और रवींद्रनाथ ने लिखा है कि मैं भागा हुआ बाहर आया, क्योंकि वह जो छोटी सी रोशनी भीतर आई थी, उसने निमंत्रण दिया कि बाहर न मालूम और क्या होगा!
बाहर आकर देखा तो पूरा चांद सिर पर खड़ा है। सारे आकाश में मौन सन्नाटा है, सारी झील दर्पण बन गई है, सारी झील पर चांद बिखरा हुआ है। सौंदर्य था यहां! रवींद्रनाथ कहने लगे, मैंने अपना सिर ठोंक लिया कि मैं पागल, एक किताब खोल कर मोमबत्ती में पढ़ता था कि सौंदर्य क्या है!
फिर लिखा है कि उस दिन से सौंदर्य की किताब नहीं खोली, क्योंकि सौंदर्य की किताब खुल गई। फिर नहीं पढ़ने गया किताब में कि सौंदर्य कहां है, क्या है। फिर जी लिया सौंदर्य को, और देख लिया सौंदर्य को, और जान लिया सौंदर्य को। फिर नहीं उठाई किताब जो अधूरी रह गई थी, उसे अधूरा ही छोड़ दिया।
जिंदगी है सत्य। सत्य किन्हीं किताबों में नहीं है। सत्य किन्हीं गुरुओं के पास नहीं है। सत्य किन्हीं दुकानों में नहीं है। और सत्य किन्हीं मंदिरों और मस्जिदों में नहीं है। सत्य है जिंदगी में। जीवन ही सत्य है।
लेकिन उसे देखने में वे ही समर्थ हो पाते हैं जो किसी भी तरह का चश्मा, कोई धारणा, कोई कंसेप्ट, कोई अतीत की याददाश्त लेकर जिंदगी के पास नहीं जाते। जो जिंदगी के पास ऐसे जाते हैं जैसे कोरा दर्पण; और खड़े हो जाते हैं जिंदगी के सामने और जिंदगी के प्रतिफलन को बनने देते हैं अपने भीतर। और पकड़ते नहीं कोई प्रतिफलन; जो बीत जाता है, बीत जाता है। जो आ जाता है उसका स्वागत है, जो चला जाता है उसकी विस्मृति है। और जिनका मन ऐसे दर्पण की तरह जिंदगी को देखता हुआ गुजरता है, प्रतिपल--दुख में, सुख में, प्रेम में, घृणा में, क्रोध में, शांति में, अशांति में, तनाव में, जिंदगी में, मृत्यु में--जो प्रतिपल दर्पण की तरह गुजरते चले जाते हैं और जीवन की पूरी शृंखला को अनुभव करते हैं, वे जान लेते हैं कि सत्य क्या है।
सिवाय इसके कभी कोई सत्य नहीं जाना गया है। सत्य को जानने का अर्थ है: स्वयं को दर्पण की तरह बना लेना। और दर्पण की कोई दृष्टि नहीं है। दर्पण यह नहीं कहता कि ऐसे हो जाओ। दर्पण कहता है, जैसे हो हम वैसे ही देख लेंगे, हम नहीं कोई आग्रह करते। दर्पण का कोई आग्रह नहीं है।
इसलिए मैं कहता हूं, सत्याग्रह शब्द बड़ा झूठा शब्द है। सत्य का कोई आग्रह नहीं होता; अनाग्रह वृत्ति में ही सत्य का अनुभव होता है। सत्याग्रह शब्द बड़ा गलत शब्द है, बड़ा उलटा शब्द है। सत्य का आग्रह! सत्य का आग्रह होता ही नहीं। जहां आग्रह है, वहां सत्य नहीं होता। क्योंकि आग्रह का मतलब है कि मैं कहता हूं ऐसा।
सत्य है अनाग्रह। अनाग्रह चित्त, पक्षपातशून्य, अनप्रिज्युडिस्ड, जिसका अपना कोई मत नहीं, कोई पक्ष नहीं, कोई धारणा नहीं; जो कहता है, मैं एक खाली दर्पण हूं; उसके जीवन में उपलब्धि होती है सत्य की।
इस दर्पण की जो मैंने बात कही, इस दर्पण को ही समाधि कहते हैं। इस दर्पण जैसे चित्त का नाम समाधिस्थ चित्त है। और इस समाधिस्थ चित्त के द्वार से जो उपलब्ध हो जाता है, उसका नाम सत्य है।
यह प्रत्येक को अपना ही खोजना पड़ता है, यह उधार नहीं मिलता। यह ट्रांसफरेबल नहीं है, यह कमोडिटी ऐसी नहीं है कि कोई किसी को दे दे। प्रत्येक को स्वयं ही जानना पड़ता है। असत्य दूसरे से मिल सकता है, सत्य स्वयं से ही खोजना पड़ता है। बल्कि सच तो यह है कि दूसरे से जो मिलता है, वह दूसरे से मिलने के कारण असत्य हो जाता है। वह उसके पास सत्य रहा हो, यह हो सकता है। कृष्ण ने जो जाना वह सत्य हो; आपको जैसे ही मिलेगा, असत्य हो जाएगा। वह जो हस्तांतरण है, उसकी प्रक्रिया में ही वह नष्ट हो जाता है। इतना सूक्ष्म है, इतना तरल है, इतना जीवंत है कि देते-देते ही मर जाता है। दिया नहीं जा सकता, सिर्फ लिया जा सकता है। खुद व्यक्ति बने दर्पण की तरह तो जान सकता है, नहीं तो नहीं जान सकता है।
ऐसे ही जैसे कि हम किसी अंधे को प्रकाश के बाबत कुछ कहें। तो हम कह सकते हैं, लेकिन अंधे तक कुछ भी नहीं पहुंचता कि आपने क्या कहा। अंधे की समझ में कुछ भी नहीं आता कि प्रकाश यानी क्या? कैसे आ सकता है! आंख का अनुभव आंख ही देख सकती है। अंधी आंख को आंख का अनुभव नहीं समझाया जा सकता। तो हम इतना कर सकते हैं कि अंधे की आंख के इलाज का उपाय करें। यह तो हो सकता है। आंख वाले अंधे के लिए सहयोगी हो सकते हैं, इलाज की दिशा में। लेकिन प्रकाश का ज्ञान देने की दिशा में सहयोगी नहीं हो सकते।
इसलिए बुद्ध ने एक अदभुत बात कही है। बुद्ध ने कहा, मैं कोई उपदेशक नहीं हूं, एक उपचारक हूं, एक वैद्य हूं। इसलिए बुद्ध से कोई पूछने आता कि सत्य क्या है? तो वे कहते, यह मत पूछो। क्योंकि यह तो कहा नहीं जा सकता, और कहा भी जाए तो समझा नहीं जा सकता, और समझ भी लिया जाए तो हमेशा गलत समझ लिया जाता है। तुम यह मत पूछो कि सत्य क्या है। तुम तो यह पूछो कि आंख क्या है, जिससे सत्य जाना जाता है।
इसलिए जब मुझे आज कहा कि सत्य की खोज पर कुछ कहूं। तो सत्य की कोई खोज नहीं होती; आंख की खोज होती है। प्रकाश की कोई खोज नहीं होती; आंख की खोज होती है। आंख है तो प्रकाश है, आंख नहीं है तो प्रकाश नहीं है। होगा प्रकाश। लेकिन जिसके पास आंख नहीं है, उसके लिए प्रकाश का क्या मतलब है! सारी दुनिया कहे कि प्रकाश है, और मेरे पास आंख नहीं है, सुनूंगा, लेकिन कोई अर्थ नहीं रखती वह बात। इतनी कठिनाई है अंधे आदमी को जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते, क्योंकि हम अंधे नहीं हैं।
अंधे आदमी को प्रकाश तो बहुत दूर, अंधेरा भी दिखाई नहीं पड़ता है। अंधेरा देखने के लिए भी आंख चाहिए। अंधेरा भी आंख का अनुभव है। अंधे आदमी को अंधेरा भी नहीं दिखता। आप यह मत सोचना कि अंधा आदमी अंधेरे में रहता है। अंधेरा भी प्रकाश का ही अनुभव है। जिसको प्रकाश दिखता है, उसी को अंधेरा भी दिखता है। अंधे आदमी को अंधेरे का भी कोई पता नहीं है। क्योंकि पता होने के लिए आंख चाहिए। अंधेरे के पता होने के लिए भी आंख चाहिए।
तो जिसे अंधेरे का भी पता नहीं है, उसे प्रकाश का क्या हम ज्ञान दे सकते हैं? अगर हम उससे यह कहें कि अंधेरे से उलटा, तो भी कोई मतलब नहीं है। क्योंकि उसे अंधेरे का ही पता नहीं है कि अंधेरा क्या है।
तो जब हम सुनते हैं उन लोगों की बातें, जो कहते हैं कि परमात्मा असीम है; हमें सीमा का ही अनुभव नहीं है, असीम का क्या अनुभव होगा? वे कहते हैं, परमात्मा ज्योतिर्मय है, परमात्मा परम चैतन्य है। हमें पदार्थ का ही अनुभव नहीं है, हमें परम चैतन्य का क्या अनुभव होगा? वे कहते हैं, परमात्मा परम जीवन है। हमें मृत्यु का तक पता नहीं है, परम जीवन का हमें क्या पता होगा?
शब्द रह जाते हैं थोथे। चली हुई कारतूस जैसे होती है, कोई जान नहीं, बस दिखती है कारतूस। वैसे शब्द हमारे हाथ में रह जाते हैं थोथे, बेमानी। उन्हीं शब्दों को लेकर हम लड़ते-झगड़ते रहते हैं, और सोचते हैं कुछ निर्णय हो जाएगा। कितने ही अंधे आपस में लड़ें और तय करें, प्रकाश का कोई निर्णय नहीं होता है। आंख खुलनी चाहिए। और आंख--मिरर लाइक माइंड, एक दर्पण जैसा चित्त, वह है आंख सत्य के लिए। और जिसकी आंख खुल जाती है वह जान लेता है। और जानते ही जीवन दूसरा हो जाता है। सत्य को जानते ही जीवन सत्य हो जाता है। सत्य को बिना जाने जीवन असत्य ही रहता है, चाहे हम कितने ही उपाय करें।
इसलिए मैं कहता हूं कि सत्य को पाने के लिए आपका जीवन बदलना व्यर्थ है; आप जीवन बदल ही नहीं सकते सत्य को पाए बिना। सत्य को पाने से जीवन बदलता है। जीवन की बदलाहट से सत्य नहीं मिलता, सत्य के मिलने से जीवन बदलता है। और जो आदमी सत्य को बिना पाए जीवन को बदलने की कोशिश में लगता है, वह कितना ही जीवन को बदले, वह जीवन भी असत्य जीवन ही होता है।
अगर वह प्रेम भी प्रकट करे तो असत्य होगा। अगर वह अहिंसक भी बन जाए तो भीतर हिंसा होगी। अगर वह प्रेमी भी बन जाए तो पीछे वासना होगी, अगर वह ब्रह्मचर्य भी साधे तो चित्त में सेक्स ही चलता रहेगा। सत्य को जाने बिना सारा का सारा जीवन ही असत्य होता है, चाहे हम कुछ भी करें। अंधा आदमी कुछ भी करे, टकराएगा। चाहे बाएं टकराए और चाहे दाएं टकराए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। चाहे आगे टकराए, चाहे पीछे टकराए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अंधा आदमी टकराएगा ही। टकराहट बिलकुल स्वाभाविक है। आंख वाला आदमी नहीं टकराएगा। नहीं टकराना आंख वाले के लिए उतना ही स्वाभाविक है, जितना अंधे के लिए टकराना।
सत्य की उपलब्धि जीवन का रूपांतरण है, वह जीवन को सत्य कर जाती है। और जीवन जब तक सत्य नहीं है, तब तक आनंद भी नहीं है। असत्य के साथ कोई आनंद नहीं है, अंधेपन के साथ कोई आनंद नहीं है। अंधापन ही दुख है, असत्य ही दुख है।
लेकिन क्या करें फिर सत्य की खोज में?
जीवन को बदलने की बात मैं नहीं करता। जीवन को देखने की दृष्टि बदलने की बात है। और वह दृष्टि जितनी ताजी, साफ, पक्षपातरहित, दृष्टिमुक्त दृष्टि, शास्त्र-शब्द से मुक्त, अतीत से मुक्त, अभी और यहां जो है उसे देखने की जितनी निर्मलता हम साधते चले जाएं, उतनी ही वह आंख खुलेगी। वह आंख खुलेगी और हम उसे जान लेंगे जो है। जो है, उसी का नाम सत्य है।
ये थोड़ी सी बातें मैंने कहीं, फिर कल और आज कुछ और इस दिशा में बातें हो सकेंगी।
नहीं; मेरी बातों से लेकिन समझ में नहीं आ जाएगा। मेरी बातें किसी काम की नहीं हैं बहुत। हां, कुछ इशारे बन सकती हैं। और इशारे छोड़ देने के लिए होते हैं, उन्हें पकड़ा कि वे बेकार हो जाते हैं।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।