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बुधवार, 1 मार्च 2017

तृषा गई एक बूंद से-प्रवचन-04 (ओशो)



चौथा प्रवचन
सत्य की छाया है शांति

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक मित्र ने पूछा है कि क्या मैं साम्यवादी हूं? कम्युनिस्ट हूं?

बहुत मजेदार बात पूछी है। अगर परमात्मा कम्युनिस्ट है तो मैं भी कम्युनिस्ट हूं। और परमात्मा जरूर कम्युनिस्ट होना चाहिए, क्योंकि उसकी नजर में कोई भी असमान नहीं है, सभी समान हैं। और जिसकी नजर में सभी समान हैं, वह चाहता भी होगा कि सभी समान अगर न हों दूसरों की नजरों में, तो धीरे-धीरे समान हो जाएं।
महावीर कम्युनिस्ट रहे होंगे, और बुद्ध भी, और जीसस भी। हालांकि किसी ने उनसे कभी पूछा नहीं। और गांधी तो निश्चित ही कम्युनिस्ट रहे होंगे। गांधी से तो किसी ने पूछा भी, तो गांधी ने कहा कि मैं किसी भी कम्युनिस्ट से ज्यादा कम्युनिस्ट हूं।

अगर सर्व मंगल की कामना, अगर सबके उदय की कामना, अगर सबका हित हो यह आकांक्षा कम्युनिज्म है, तो कोई भी धार्मिक आदमी बिना कम्युनिस्ट हुए कैसे रह सकता है?
लेकिन दूसरे अर्थों में मैं कम्युनिस्ट बिलकुल भी नहीं हूं।
सच बात तो यह है कि मैं किसी वाद में, किसी संप्रदाय में, किसी शास्त्र में विश्वास नहीं करता हूं। कम्युनिज्म भी एक वाद है, एक शास्त्र है, एक विश्वास है, एक मत है, एक संप्रदाय है। वह दुनिया में पैदा हुआ नये से नया धर्म है। उसके भी पुरोहित हैं, उसके भी मंदिर हैं, उसका भी मक्का, काबा, काशी सब है। वह जो क्रेमलिन है, वह कम्युनिस्ट के लिए वही है, जो मुसलमान के लिए मक्का और हिंदू के लिए काशी। माक्र्स की किताब कैपिटल उसके लिए वही है, जो किसी के लिए गीता और किसी के लिए बाइबिल और किसी के लिए कुरान।
उस अर्थ में मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं। मैं किसी वाद में विश्वास नहीं करता। न मैं कम्युनिस्ट हूं, न सोशलिस्ट, न फासिस्ट, न गांधी-इस्ट। और न मैं चाहता हूं कि कोई आदमी किसी वाद में अपने को कभी बांटे। आदमी वाद में बंधा कि गुलाम हुआ। वाद गुलामी का लक्षण है। जो आदमी वाद में बंधा, उसके चित्त की स्वतंत्रता समाप्त हुई। जिस आदमी ने ऐसा समझा कि मेरा यह मत है, उस आदमी का सत्य से संबंध टूटना उसी क्षण शुरू हो जाता है। या तो आप सत्य के हो सकते हैं या मत के। या तो आप धर्म के हो सकते हैं या संप्रदाय के। और संप्रदाय चाहे धार्मिक हों और चाहे राजनैतिक, सब संप्रदाय मनुष्य के चित्त को गुलाम करने में सहयोगी होते हैं।
तो किसी वाद से मेरा कोई भी संबंध नहीं है। अगर ठीक से कहूं और वाद शब्द ही पूछना हो, तो मैं अराजकवादी हूं, अनार्किस्ट हूं। हालांकि अनार्किज्म शब्द बड़ा गलत है, क्योंकि अराजकवाद का कोई वाद नहीं होता। अराजकवाद का अर्थ होता है: जिसका कोई वाद नहीं।
लेकिन मेरी बातों से बहुत बार भ्रांति पैदा होती है। मेरी बातों से इसी तरह भ्रांति पैदा होती है, जैसे मुझे बुद्ध के जीवन में एक घटना याद आती है उससे मैं समझाऊं।
बुद्ध एक दिन सुबह एक गांव से निकले। साथ में उनका भिक्षु आनंद था। रास्ते पर एक आदमी मिला और उसने कहा कि मैं आस्तिक हूं, मैं ईश्वर को मानता हूं, आप भी ईश्वर को मानते हैं या नहीं?
बुद्ध ने कहा, ईश्वर? ईश्वर है ही नहीं, मानने का सवाल क्या!
वह आदमी बहुत चौंका, उसने मन में समझा: यह बुद्ध नास्तिक मालूम पड़ता है। आनंद जो उनके साथ था, वह भी चौंका कि बुद्ध ने एकदम से कह दिया कि ईश्वर है ही नहीं, मानने का सवाल नहीं! लेकिन वह चुप रहा।
दोपहर को एक दूसरा आदमी आया उस गांव में और बुद्ध से कहने लगा कि मैं नास्तिक हूं, ईश्वर को नहीं मानता हूं, आपका क्या खयाल है--ईश्वर है?
बुद्ध ने कहा, ईश्वर ही है, और कुछ भी नहीं है!
उस आदमी ने समझा: यह बुद्ध आस्तिक है। और आनंद बड़ी मुश्किल में पड़ गया। क्योंकि आनंद ने दोनों उत्तर सुन लिए थे। पहला आदमी भी निश्चिंत होकर चला गया कि यह नास्तिक है, दूसरा आदमी समझ लिया आस्तिक है, लेकिन आनंद क्या समझे? फिर भी वह चुप रहा कि रात एकांत में पूछ लूंगा।
सांझ को एक और घटना घट गई! एक तीसरे आदमी ने आकर पूछा कि मुझे कुछ भी पता नहीं है कि ईश्वर है या नहीं, आपका क्या खयाल है?
बुद्ध चुप रह गए और कोई भी उत्तर न दिया।
रात आनंद ने कहा, मेरी नींद हराम कर दी है, मैं सो नहीं पा रहा हूं। यह मामला क्या है? सुबह यह कहा, दोपहर यह कहा, सांझ चुप रह गए। इन तीनों उत्तरों में बड़ा विरोध है!
बुद्ध ने कहा, मैंने तुझे कोई भी उत्तर नहीं दिया था, तूने सुना क्यों? उत्तर मैंने दूसरों को दिए थे।
पर आनंद कहने लगा, मैं मजबूर हूं, मैं साथ था, मुझे तीनों उत्तर सुनाई पड़ गए। वे तीनों तो निश्चिंत गए, लेकिन मेरी बड़ी मुसीबत हो गई है। आप हैं क्या?
बुद्ध ने कहा, मैं बस मैं हूं।
पर आपने तीन उत्तर क्यों दिए?
बुद्ध ने कहा, अगर तू समझेगा तो समझ आ सकता है। जो आदमी मेरे पास आकर कहता है--ईश्वर नहीं है, आपका क्या खयाल है? वह अपनी नास्तिकता में मेरा समर्थन चाहता है, ताकि लौट कर निश्चिंत हो जाए। जो मानता है, उसको और जोर से मान ले। मैं तो हर एक की मान्यता तोड़ना चाहता हूं। तो मैंने उससे कह दिया--ईश्वर? ईश्वर है! मैं उसकी मान्यता तोड़ना चाहता हूं, क्योंकि जिसकी मान्यता है वह आदमी गुलाम है, वह सत्य को कभी नहीं जान सकेगा, वह मान्यता चाहे कुछ भी हो! वह जो दूसरा आदमी आया, वह कहता है--ईश्वर है, आप मानते हैं? वह भी अपनी मान्यता के लिए मुझसे समर्थन लेने आया है। मैंने कहा--ईश्वर? ईश्वर बिलकुल नहीं है, मानने का सवाल क्या है! मैं उसकी भी मान्यता को हिलाता हूं, ताकि वह मान्यता से मुक्त हो जाए और सत्य की खोज कर सके। और तीसरा जो आदमी आया उसकी कोई भी मान्यता नहीं थी। उसने कहा--मुझे पता नहीं है कि ईश्वर है या नहीं, आप क्या कहते हैं? तो मैंने कहा--यह बहुत अच्छा है कि पता नहीं है। अब तुम चुप रह जाओ, तो पता हो सकता है। इसलिए मैं चुप रह गया।
आज तक भी तय नहीं हो पाया है कि बुद्ध आस्तिक थे कि नास्तिक। पंडित अभी भी विचार करते हैं। और यह कभी तय नहीं हो पाएगा; क्योंकि बुद्ध न आस्तिक हैं, न नास्तिक। बुद्ध का कोई मत नहीं है। बुद्ध चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक मत से मुक्त हो जाए। क्योंकि जो मत से मुक्त हो जाता है, वह सत्य को उपलब्ध हो जाता है।
इसी तरह की झंझट मेरे साथ भी सुबह से लेकर सांझ तक हो जाती है। एक बात आप सुन लेते हैं और फिर परेशान हो जाते हैं कि जरूर यह आदमी इससे उलटा होगा। अगर पूंजीवाद के खिलाफ में बोला है, तो फिर कम्युनिस्ट होना चाहिए।
लेकिन मैं पूंजीवाद के भी खिलाफ हूं और साम्यवाद के भी खिलाफ हूं। मैं वाद मात्र के खिलाफ हूं। मैं एक ऐसा समाज चाहता हूं जो वाद से घिरा हुआ समाज न हो। वाद मात्र के मैं विरोध में हूं, संप्रदाय मात्र के मैं विरोध में हूं। मेरा कोई संप्रदाय नहीं है। इसलिए मैं एक झंझट में भी पड़ गया हूं कि जिनके भी संप्रदाय हैं, वे सब मुझे अपना दुश्मन समझ लेते हैं। और ऐसा आदमी कोई भी नहीं है जिसका संप्रदाय न हो। इसलिए मुझसे दोस्ती बनानी ही मुश्किल होती चली जाती है।
नहीं; मैं न कम्युनिस्ट हूं, न कोई और हूं। आंखें खुली रखता हूं, देखता हूं, जो मुझे ठीक लगता है वह कहता हूं। वह ठीक चाहे किसी का हो। और जो मुझे गलत लगता है, कहता हूं वह गलत है। चाहे वह गलत किसी का भी हो। और यही मैं चाहता हूं कि आप भी किसी वाद में कभी न बंधें।
मेरा वाद भी हो सकता है, मेरे वाद में भी बंध सकते हैं। कुछ मित्रों को यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मेरे अनुयायी हैं। वे बड़ी गलती में हैं। मेरा अनुयायी कोई भी नहीं है। और न मैं चाहता हूं कि कोई मेरा अनुयायी हो। क्योंकि वह फिर एक वाद है। फिर वह मुझसे बंध जाना है।
मैं चाहता हूं आदमी सबसे छूट जाए। आदमी हमेशा बंधा रहा है आज तक। किसी न किसी से बंधा हुआ है। खूंटी का नाम क्या है, इससे मुझे प्रयोजन नहीं; मुझे प्रयोजन है: क्या आप खूंटी से बंधे हैं? चाहे वह खूंटी गांधी की हो, चाहे वह खूंटी माक्र्स की हो, चाहे वह खूंटी मेरी हो। खूंटी से बंधा हुआ आदमी ठीक आदमी नहीं है। और मैं खूंटी से मुक्त आदमी चाहता हूं। तो जिस खूंटी के खिलाफ बोलता हूं, उस खूंटी वाला समझता है कि ठीक, यह आदमी किसी उलटी खूंटी के पक्ष में होगा! यहां से छोड़ कर वहां बांधने की कोशिश में लगा है।
मैं आपको कहीं बांधने की किसी कोशिश में नहीं लगा हुआ हूं। मैं चाहता हूं, छूट जाए मन। जो मन सबसे छूट जाता है, वह परमात्मा को उपलब्ध हो जाता है। एक अनक्लिंगिंग चाहिए, एक मुक्त-चित्तता चाहिए।
तो मैं किसी वाद में नहीं हूं। न मेरा कोई संबंध किसी वाद से कभी है, न हो सकता है। मैं वाद मात्र के विरोध में हूं। मैं किसी वाद के भी विरोध में नहीं हूं--वाद मात्र के विरोध में हूं। और जहां भी वाद है, वहीं मुझे दासता की दुर्गंध आनी शुरू हो जाती है। चाहे वह गांधीवाद हो, चाहे वह साम्यवाद हो, चाहे उसका नाम कुछ और हो--हिंदूवाद हो, इस्लामवाद हो कि जैनवाद हो--इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
मेरी बात आप समझ लें। मन जब भी किसी वाद को पकड़ता है, तभी उसकी अनंत की यात्रा बंद हो जाती है। बस पत्थर पड़ गया उसके ऊपर, अब वह उड़ नहीं सकेगा, अब उसके पंख कट गए। अगर चाहते हैं कि आपकी चेतना में पंख हों, तो कभी बंधना मत; किसी से भी मत बंधना। और इसीलिए मैं दुनिया के महापुरुषों के संबंध में भी कभी कुछ खिलाफ कह देता हूं तो आपको बड़ी बेचैनी होती है। आप समझते हैं मैं महापुरुषों का विरोधी हूं।
मैं अगर महापुरुषों का विरोधी हूं, तो महापुरुषों को प्रेम करने वाला आदमी खोजना बहुत मुश्किल हो जाएगा। महापुरुषों का मैं विरोधी नहीं हूं। मैं तो गोडसे तक का विरोधी नहीं हूं, तो गांधी का विरोधी कैसे हो सकता हूं? लेकिन जब मैं विरोध करता हूं किसी महापुरुष का, तो महापुरुष का विरोध नहीं कर रहा हूं, वह जो आपकी खूंटी है, जिससे आप बंधे हैं, उसको हिलाने की कोशिश कर रहा हूं, आप छूट जाएं इसलिए। और आप खूंटी की इतनी प्रशंसा करते हैं कि वही प्रशंसा आपके बंधने का कारण हो जाती है। इसलिए आपकी प्रशंसा को भी तोड़ने की कोशिश करता हूं। भूल कर यह मत समझ लेना कि मेरी कोई दुश्मनी है।
लेकिन हमारी समझ इतनी कम है, इतनी कम है समझ...और समझ कम होती है उस आदमी की जो कहीं बंधा होता है, प्रिज्युडिस्ड होता है। जिसका कोई मत है, उसकी कोई समझ नहीं होती। जिसका कोई सिद्धांत है, उसकी कोई अंडरस्टैंडिंग नहीं होती। क्योंकि वह पहले से बंधा है। और उस बंधी दुनिया की तरफ से ही, उसी चश्मे से देखना शुरू करता है। उसे कठिनाई शुरू हो जाती है। वह समझ ही नहीं पाता कि बात क्या है। उसे खयाल ही नहीं आ पाता कि मतलब क्या है, प्रयोजन क्या है, इशारा क्या है।
इशारा कुल इतना है कि सबसे छूट जाएं, ताकि अपने में आ सकें। कहीं बाहर बंधे न रहें, ताकि वह फूल खिल जाए जो अपना है और भीतर है।
बाहर जो बंधा है, वह भीतर नहीं पहुंच पाता है। और जो कहीं भी बंधा है, वह बंधा है। और बंधन परमात्मा तक पहुंचने में बाधा है। उस खुले आकाश में जो प्रभु का है, उस खुले आकाश में जो सत्य का है, उस खुले आकाश में जो ज्ञान का है--केवल वे ही उड़ते हैं, जिनके पास, जिनकी छातियों पर मत के, सिद्धांत के, शास्त्र के पत्थर नहीं हैं।
इसलिए एकबारगी यह ठीक से समझ लें कि किसी वाद से मेरा कोई भी संबंध नहीं है। और अच्छी दुनिया अगर बनानी है, तो एक निर्विवाद दुनिया बनानी पड़ेगी, जहां वाद का कोई आग्रह न हो।
मुझे तो निरंतर ऐसा मालूम पड़ता है कि वाद का आग्रही, जीवन के तथ्यों को समझने में असमर्थ ही हो जाता है। उसकी पूरी चेष्टा यह होती है कि मेरा जो वाद है, वह वाद जीवन के तथ्यों से सही सिद्ध होना चाहिए। उसे वाद ज्यादा महत्वपूर्ण है, जीवन के तथ्य ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं। जीवन के तथ्य गौण हैं, वाद प्रमुख है। तथ्यों को सिद्ध करना चाहिए वाद को।
लेकिन स्थिति उलटी है। कोई वाद प्रमुख नहीं है, जीवन के तथ्य प्रमुख हैं। जीवन के तथ्यों को देख कर चलना है, वादों को देख कर नहीं।
हजारों साल से आदमी वादों को देख कर चल रहा है। पुराने किस्म के वाद अब जरा पुराने और बासे पड़ गए हैं, तो नये किस्म के वाद आ गए हैं। पुरानी जंजीरें थोड़ी जंग खा गई हैं, तो हमने नई चमकदार जंजीरें बना ली हैं। और हम सोचते हैं कि पुरानी जंजीरें तोड़ दो और झट से नई जंजीर बांध लो और अकड़ से निकल जाओ कि मैं जंजीर से मुक्त हो गया हूं।
अगर हिंदू होने से बचे और कम्युनिस्ट हो गए, तो मामला वही है, सिर्फ जंजीर का नाम बदल गया, और कोई फर्क नहीं हुआ। इधर जैन होने से बचे और उधर जाकर गांधीवादी हो गए, तो अपने हाथ से बुद्धू बन गए। एक वाद छूटा, दूसरे वाद में घुस गए। बच नहीं पाए, वाद से नहीं बच पाए; आत्मा मुक्त नहीं रह सकी, स्वतंत्र नहीं रह सकी। व्यक्ति नहीं बचता वाद में, वाद में बचता है संप्रदाय, व्यक्ति का अंत हो जाता है।
और मैं चाहता हूं: एक-एक व्यक्ति एक खिला हुआ मुक्त फूल हो। अपनी हैसियत से खिला हुआ फूल हो। इसलिए मेरा किसी वाद से कोई भी संबंध नहीं है। कोई दूर का संबंध नहीं है।
एक अच्छी दुनिया के निर्माण में, स्वतंत्र और मुक्त चेतना की जरूरत है।
एक और मित्र ने पूछा है कि आप सबको छोड़ कर, सिर्फ गांधी के विरोध में क्यों बोलते हैं?

क्योंकि गांधी से महत्वपूर्ण आदमी मुझे कोई भी नहीं मालूम पड़ता है। और इसलिए भी कि मैं सोचता था कि गांधी के विरोध में कुछ बात बोलने से देश में चिंतन पैदा होगा। लेकिन मैं निराश हो गया। चिंतन पैदा नहीं हुआ, सिर्फ गाली-गलौज पैदा हुई। और मैं बहुत चकित हो गया! मैंने सोचा था कि गांधी को मानने वाले अहिंसक लोग हैं। वह मेरी भ्रांति सिद्ध हुई। मैंने सोचा था कि गांधी के ऊपर आलोचना शुरू करूंगा, तो गांधीवादी मुझे कहेंगे कि आप आएं, हमसे बात करें, हमें समझाएं, हमसे चर्चा करें। क्या सही है, क्या गलत है, हम विचार करें। एक गांधीवादी ने मुझसे यह नहीं कहा। बल्कि गांधीवादी कभी-कभी मुझे सुनने भी दिखाई पड़ता था, वह एकदम नदारद हो गया। उसका कहीं पता नहीं चलता कि वह कहां चला गया।
यह मुझे आशा नहीं थी कि गांधी ने तीस-चालीस वर्ष श्रम करके भारत में जो विचार की प्रक्रिया को जगाने की कोशिश की थी, वह इस भांति एकदम समाप्त हो गई होगी। लेकिन हमारी समझ इतनी कम है कि मैं जो गांधी की आलोचना भी किया, जो समझदार हैं वे जानते हैं कि मैंने गांधी के काम को ही आगे बढ़ाया है। लेकिन नासमझों का कोई क्या हिसाब रख सकता है!
गांधी का काम गांधी के मरने के साथ ही ठप्प हो गया। सच तो यह है कि गांधी के मरने के पहले ही ठप्प हो गया। और गांधी की पूरी आकांक्षा हो गई थी कि मैं कब मर जाऊं, कब मर जाऊं। वह बात ही खतम हो गई।
उस बात को फिर से गति देनी जरूरी है कि हम फिर सोचें! तो मैंने सोचा था कि एक शॉक उपयोगी होगा, मुल्क चिंतन करेगा। लेकिन मैंने पाया कि मुर्दों को शॉक देने से कोई फायदा नहीं, कोई फायदा नहीं। इधर दोत्तीन महीने में मुझे जो अनुभव आया, वह बहुत रिवीलिंग है, उससे बड़ा उदघाटन हुआ मेरे सामने--कि इस देश ने चिंतन की क्षमता ही खो दी है। हमने विचार करना ही बंद कर दिया है।
और फिर मेरे जैसे आदमी के साथ तो विचार करना बहुत सरल है, क्योंकि मैं कभी कहता नहीं कि जो मैं कहता हूं वही सत्य है। तो मुझसे तो झगड़े का बहुत कम उपाय है, क्योंकि मैं यह कहता हूं कि जो मैं कहता हूं वह मैं कहता हूं, वह सच हो भी सकता है, गलत भी हो सकता है। बातचीत की जा सकती है, निर्णय लिए जा सकते हैं। सोच-विचार, एक डायलाग पैदा हो जाए मुल्क में चिंतन का, वह मैं चाहता हूं।
लेकिन वह पैदा नहीं होता। मैं कुछ अगर आलोचना करता हूं, तो दूसरी तरफ से गाली-गलौज शुरू हो जाती है। बजाय इसके कि जो मैंने कहा है उस पर विचार चले और तय किया जाए कि क्या सही है, वह तो बात ही एक तरफ छोड़ दी जाती है, कुछ दूसरी ही बातें शुरू हो जाती हैं।
यह इतना दुखद है और भारत के भविष्य के लिए इतना चिंतनीय है, जिसका बहुत हिसाब लगाना कठिन है। लेकिन आज नहीं कल हमें यह सोचना ही पड़ेगा।
मेरा गांधी से बहुत प्रेम है, शत्रुता का तो कोई सवाल ही नहीं है। तो मित्र पूछते हैं कि आप उनके शत्रु हैं? शत्रु तो मैं किसी का भी नहीं हूं, शत्रु तो होने में असमर्थ हूं। और शत्रु नहीं हो सकता हूं इसलिए खुली-सीधी बात कर लेता हूं जो मुझे ठीक लगती है। कम से कम अपनों के बाबत तो खुली और सीधी बात की जा सकती है।
लेकिन हम कुछ ऐसे भयभीत हो गए हैं कि अपनों के संबंध में खुली और सीधी बात भी नहीं कर सकते। वह बात नहीं चल सकी। चली बहुत बात, जोर से चली, न मालूम क्या-क्या लिखा और पढ़ा और बोला गया। लेकिन विचार जो पैदा होना चाहिए था, वह पैदा नहीं हो सका। भारत के पास विचार खो गया है। लोग समझे कि शायद मैं गांधी की प्रतिमा को अलग करके अपनी प्रतिमा बिठालना चाहता हूं।
मैं जो प्रतिमा-विरोधी हूं, वह अपनी प्रतिमा किसलिए बिठालना चाहूंगा? और किसी की प्रतिमा मिटाने की जरूरत होती है बैठ जाने के लिए? इतनी दुनिया में जगह पड़ी है कि अपनी मढ़िया अलग बना लो, कहीं भी अपनी प्रतिमा खड़ी कर लो। किसी की दूसरे की प्रतिमा गिराने की क्या जरूरत है? और इतने पागल पड़े हैं दुनिया में कि किसी एक के पूजने वाले से कोई पूजने वालों की कमी पड़ जाती है? दूसरे पूजने वाले मिल जाएंगे।
इतने भगवान पूजे जाते हैं, कोई कमी है? दुनिया में कोई तीन सौ धर्म हैं, और एक-एक धर्म के न मालूम कितने देवी-देवता और भगवान हैं। हिंदुस्तान में तो तैंतीस करोड़ देवी-देवता हैं। एक-एक आदमी का एक-एक है। यहां कोई दिक्कत है अपनी प्रतिमा पुजवाने के लिए? यहां किसी की प्रतिमा गिराने की जरूरत है? गिराने में और झंझट हो जाती है। क्योंकि देवी-देवता नाराज हो जाएं, तो आपकी प्रतिमा का जमाना बहुत मुश्किल हो जाए। यहां तो उचित यह है कि सब देवी-देवताओं की प्रशंसा करो और छोटी सी जगह अपने लिए भी बना लो, तो बहुत आसानी पड़ती है।
लेकिन मुझे कोई जगह नहीं बनानी, मुझे कोई पंथ नहीं बनाना, कोई संप्रदाय नहीं बनाना, मुझे कोई पूजा नहीं चाहिए। चाहता कुल इतना हूं कि देश में चिंतन जग जाए, देश में विचार जग जाए। लोग सोचने लगें, लोग विचार करने लगें, लोग देखना शुरू कर दें, अंधे न रह जाएं।
लेकिन अंधे रहने की मालूम होता है हमने कसम खा रखी है। और अगर कोई आकर हमारी आंखें खोलने की कोशिश करे, तो हम उस पर नाराज होते हैं--कि हमारी नींद तोड़ते हो! हम आराम से सो रहे हैं, सुंदर सपना देख रहे हैं और तुम हमारी नींद खराब करते हो!
ऐसा ही मुझे अनुभव हो रहा है निरंतर कि किसी को भी सोचने के लिए कहना, दुश्मनी मोल लेनी मालूम पड़ती है। वह आदमी नाराज होता है। क्योंकि बिना सोचे एक सुविधा है, सोचते ही असुविधा शुरू होती है। क्योंकि जैसे ही सोचना शुरू किया कि जिंदगी गलत दिखाई पड़ने लगती है और बदलाहट जरूरी हो जाती है। अगर कोई भीतर के संबंध में सोचेगा तो स्वयं को बदलना पड़ेगा! और अगर कोई बाहर के संबंध में सोचेगा तो समाज को बदलना पड़ेगा! चिंतन क्रांति की प्रक्रिया है। चिंतन शुरू हुआ कि बदलाहट अनिवार्य है।
इसलिए बदलाहट की झंझट से बचना हो तो पहला काम जरूरी है--सोचना कभी मत! इसको मूलमंत्र मान लेना--सोचना कभी मत! इससे बड़ी सुविधा रहती है। इससे नींद गहरी आती है और आदमी को जीने की कठिनाई नहीं उठानी पड़ती; मरा-मरा जी लेता है और मर जाता है।
यह हमारी हजारों साल की प्रक्रिया रही है। यह हमारी आधारशिला रही है कि सोचो मत! इसलिए कोई भी बात जो सोचने को मजबूर करे, वह हमें क्रोध से भर देती है, आनंद से नहीं, अहोभाव से नहीं, धन्यवाद से नहीं--कि कोई व्यक्ति सोचने के लिए धक्के देता है तो हम धन्यवाद दें कि उसने सोचने को हमें मजबूर किया।
जो आदमी हमें सोने की सुविधा देता है, हम उसको धन्यवाद देते हैं। जो आकर अफीम की गोली दे देता है कि यह ले लो और मजे से सो जाओ! हम कहते हैं कि तुमने बड़ी कृपा की, अफीम की गोली ला दी, अब हम मजे से सो सकते हैं। अफीम की गोलियों को धन्यवाद दिया जा रहा है।

एक मित्र ने मुझसे और एक बात पूछी है, जो मैं सोचता था कि छोड़ दूं, लेकिन शायद इस संदर्भ में छोड़नी उचित नहीं है। उन्होंने पूछा है कि आपका गांधी से कभी कोई संबंध रहा?

जब वे जिंदा थे तब बहुत ज्यादा संबंध नहीं रहा। लेकिन जब से मर गए हैं तब से बहुत संबंध है। जब वे जिंदा थे तब मैं छोटा था। सिर्फ एक बार छोटा सा संबंध हुआ था, थोड़ा सा मिलना हुआ था, लेकिन उस मिलने का कोई हिसाब रखना उचित नहीं है। लेकिन मर जाने के बाद उनसे मेरा निरंतर संबंध है। सिर्फ विचार में ही संबंध नहीं है कि मैं उनके बाबत सोचता हूं, और भी गहरे अर्थों में संबंध है। सोचता था इस बात को छोड़ दूं, क्योंकि यह समझ के परे हो जाएगी बात। लेकिन पूछी है इसलिए मैं कहना चाहता हूं। मानने की उसे कोई जरूरत नहीं है।
हम आमतौर से सोचते हैं कि जिनके शरीर हैं, उनसे ही हमारे संबंध हो सकते हैं। हम यह भी सोचते हैं कि जो सामने मौजूद हैं, उन्हीं से संबंध हो सकते हैं। ये बातें बुनियादी रूप से गलत और अवैज्ञानिक हैं। संबंध बहुत लंबी बात है। दो दूर पर मौजूद लोगों के बीच हजारों मील का फासला हो, और संबंध हो सकता है, वैसे ही जैसे दो आदमी आस-पास बैठे हों तब हो सकता है।
और अब तो विज्ञान ने इसको प्रमाणित किया। पहले तो यह सिर्फ उन लोगों की बात थी, इजोटेरिक, जो भीतर की दुनिया में काम करते थे। वे जानते थे कि हजारों मील का फासला कोई फासला नहीं है। अगर भीतर से संबंधित होने की कला का पता हो, तो आदमी हजारों मील के फासले से संबंधित हो सकता है। और हजारों वर्ष से लोग संबंधित होते रहे थे। लेकिन अब, अब तो विज्ञान ने भी स्वीकृति दे दी है कि यह संभावना नहीं है, सत्य है! और इस जगह से स्वीकृति मिली है जहां से आप आशा भी नहीं करेंगे। सबसे पहले रूस से स्वीकृति मिली है इस बात की कि हजारों मील का फासला कोई फासला नहीं है, टेलीपैथिक, विचार के अंतर्संबंध हो सकते हैं।
फयादेव नाम के एक वैज्ञानिक ने डेढ़ हजार मील दूर के फासले पर संबंध स्थापित करने के प्रयोग में सफलता पाई। मास्को में बैठ कर दूर तिफलिस में एक बगीचे में बैठे आदमी को संदेश भेजने में वह सफल हुआ।
हजार मील दूर आदमी तिफलिस के बगीचे में एक बेंच पर बैठा हुआ है। उसका निरीक्षण किया जा रहा है। अजनबी आदमी, सड़क पर चलता हुआ, बेंच पर विश्राम करने को बैठा है। समझ लें ग्यारह नंबर की बेंच पर बैठा है। और मास्को से फयादेव और उसके साथी उस बगीचे में फोन से बात कर रहे हैं कि एक आदमी आकर बैठा है, इतना बजा है, तुम वहां से संदेश दो कि वह आदमी इसी वक्त सो जाए। और फयादेव ने वहां से अंतर-संदेश दिया--मन में ही--उस आदमी को सुझाव दिया, उसका ध्यान करके कि सो जाओ, सो जाओ, सो जाओ...। डेढ़ हजार मील दूर और वह आदमी थोड़ी देर में आंख बंद करके लेट गया।
लेकिन यह भी हो सकता है कि वह आदमी थका-मांदा हो और सो गया हो। तो मित्रों ने कहा, वह सो तो गया; इस वक्त इतना बजा है, अब तुम उसे इसी वक्त उठा दो। तब हमें पक्का लगे। नहीं तो हो सकता है ऐसे ही सो गया हो। और फयादेव ने वहां से सुझाव दिए कि उठ जाओ! और उस आदमी ने आंख खोली और उठ गया।
उन मित्रों ने उससे पूछा कि आपको कुछ भिन्नता तो नहीं मालूम हुई?
उसने कहा, भिन्नता मुझे जरूर मालूम हुई। जब मैं सोया तब मुझे कुछ ऐसा लगा कि जैसे कोई कहता है--सो जाओ। लेकिन मैंने सोचा कि मैं ही थका-मांदा हूं, इसलिए खुद का मन कहता होगा। मैं सो गया। लेकिन उठते वक्त भी मुझे ऐसा सुनाई पड़ा कि जैसे कोई कहता है--उठ जाओ।
फिर तो फयादेव ने और भी प्रयोग किए। वे असल में प्रयोग कर रहे हैं इसलिए ताकि अंतरिक्ष यानों से संबंध टेलीपैथी के द्वारा, विचार के द्वारा तय किया जा सके। क्योंकि अंतरिक्ष यानों में यंत्रों के कभी भी बिगड़ जाने की संभावना है, और तब सारे संबंध टूट जाएंगे। अगर एक बार यंत्र बिगड़ गया तो अंतरिक्ष में जो गया यात्री है, उससे हमारा कोई संबंध नहीं रह गया। वह कहां भटक जाएगा, कहां खो जाएगा अनंत में, उसका पता लगाना भी मुश्किल हो जाएगा। तो जरूरी है कि यंत्र के बिगड़ जाने पर भीतर के यंत्र से काम लिया जाए। अन्यथा अंतरिक्ष की यात्रा बहुत कठिन हो जाएगी। उसके लिए वे काम कर रहे हैं।
लेकिन एक ही समय में दूर पर व्यक्तियों से तो संबंध स्थापित किए ही जाते हैं, जो मर जाते हैं उनसे भी संबंध स्थापित करने के उपाय हैं। लेकिन वह हमें और भी कठिन मालूम पड़ेगा।
यह जान कर आपको हैरानी होगी कि महावीर के मर जाने के पांच सौ वर्ष बाद तक, महावीर अपने प्रेमियों से, कुछ लोगों से संबंध स्थापित किए रहे। और इसीलिए पांच सौ वर्ष बाद महावीर के ग्रंथ लिखे गए। और तब लिखे गए ग्रंथ, जब इसकी संभावना खतम हो गई कि अब कोई आदमी इस योग्य नहीं है जिससे अंतर्संबंध रखे जा सकें। और वाणी खो जाएगी, इसलिए लिख ली जाए।
हजारों साल तक ग्रंथ लिखे ही नहीं गए। और वे इसीलिए नहीं लिखे गए कि जब तक इस बात की संभावना थी कि मरे हुए व्यक्ति और मरे हुए ज्ञानी से भी संबंध स्थापित रखा जा सकता है, तब तक किताब लिखने की कोई जरूरत न थी। यह जान कर आप हैरान होंगे कि किताब लिखना सिर्फ विकास ही नहीं है, एक लिहाज से पतन भी है। हजारों साल तक वेद लिखा नहीं गया था। हजारों वर्ष तक कोई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे नहीं गए थे। ग्रंथ लिखे गए मजबूरी में! महावीर के मरने के पांच सौ साल तक किताब लिखने की जरूरत नहीं पड़ी। क्योंकि महावीर से पूछा जा सकता था। लेकिन जब उस योग्यता के व्यक्ति खो गए, फिर उन ग्रंथों को लिख लेना जरूरी हो गया।
बुद्ध के मरने के डेढ़ सौ वर्ष बाद ग्रंथ लिखे गए। और जीसस के संबंध में तो बात और भी अदभुत है। और यह भी मैं कहना चाहता हूं कि आज महावीर से संबंध स्थापित करने वाला महावीर के साधुओं में एक भी आदमी नहीं है। लेकिन बुद्ध से संबंध स्थापित करने वाले साधु आज भी मौजूद हैं। और जीसस से संबंध स्थापित करने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। और जिस धर्म के मूलस्रोत से संबंध स्थापित करने की संभावना रहती है, वह धर्म तब तक जीवित मालूम पड़ता है। और जैसे ही संबंध नष्ट हो जाता है, वह जीवित संबंध नष्ट हो जाता है।
यह भी मैं आपसे कहना चाहता हूं कि गांधी जिंदगी भर मेहनत किए, लेकिन उन्होंने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया कि उनके पास एक भी आदमी नहीं है, जिससे मर जाने के बाद वे संबंध स्थापित कर सकें।
लेकिन ऐसा नहीं है कि यह महावीर-बुद्ध ने ही किया, आज भी जारी है। ब्लावट्स्की के मर जाने के बाद एनीबीसेंट से ब्लावट्स्की के संबंध जारी रहे। एनीबीसेंट के मर जाने के बाद भी जे. कृष्णमूर्ति से एनीबीसेंट के संबंध आंतरिक जारी हैं। लेकिन कृष्णमूर्ति थियोसॉफी के बाहर पड़ गए। और थियोसॉफी का मूवमेंट मर गया, क्योंकि थियोसॉफी के भीतर किसी आदमी से एनीबीसेंट के, ब्लावट्स्की के संबंध आज जारी नहीं हैं।
मरे हुए व्यक्तियों से भी संबंध जारी रखे जा सकते हैं। बल्कि जिंदा व्यक्तियों से संबंध रखने में बहुत अड़चन होती है, क्योंकि शरीर हमेशा बाधा की तरह खड़ा हो जाता है। पूछ ही लिया है, इसलिए मैं कहता हूं कि जिंदा में गांधी से मेरे कोई संबंध नहीं थे। लेकिन मरने के बाद, इधर मैंने संबंध जारी रखने की पूरी कोशिश की है। और यह भी मैं आपसे कह देना चाहता हूं कि थोड़ा सा प्रयोग करें तो किसी भी व्यक्ति से संबंध जारी रखे जा सकते हैं।
और यह भी मैं आपको बताना चाहता हूं कि गांधी का अभी कोई जन्म नहीं हो गया है। और जन्म होना बहुत मुश्किल है। क्योंकि कोई गर्भ इस योग्य नहीं कि उस व्यक्ति को जन्म दे सके। बहुत लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।
लेकिन ये दूसरी बातें हैं। और इसलिए इनकी बात कभी नहीं करता हूं, क्योंकि इन बातों के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता, कुछ भी नहीं सोचा जा सकता और इन बातों के संबंध में कोई प्रमाण नहीं दिया जा सकता है। इसलिए इनको छोड़ देता हूं। लेकिन पूछ लिया गया इसलिए मैंने कहा। और यह मैं कह देना चाहता हूं कि मैंने गांधी की आलोचना, गांधी से बिना पूछताछ के नहीं की है। अन्यथा मैं कभी नहीं करता; उसकी बात भी नहीं उठाता। और जब मुझे यह पक्का मालूम हो गया कि आलोचना की जानी चाहिए और गांधी की सहमति हो सकती है, तभी उस पर बात की।
लेकिन इधर मुझे ऐसा लगता है कि बेकार है मेहनत करनी! गांधी के साथ मेहनत करनी बेकार मालूम पड़ती है! उनके शिष्यों ने उस आदमी को बिलकुल मरा हुआ समझ लिया है। इसलिए अब मरे हुए आदमी की बात करनी शायद उचित नहीं है। क्योंकि वे बार-बार मुझे लिखते हैं कि जो आदमी मर गया, उसकी आप बात क्यों उठाते हैं?
गांधी जैसे आदमी मर नहीं जाते! लेकिन समझ में नहीं आता लोगों को कि ऐसे लोगों को भी मरा हुआ मान लेते हैं। और उसका कारण है, क्योंकि कोई भी उनके साथ जीवित संपर्क स्थापित नहीं कर सकता है, तो लगता है कि वे मर गए।
इधर मेरी पूरी चेष्टा है कि कुछ लोग तैयार हों, तो जो मैं कह रहा हूं, उनको प्रायोगिक प्रमाण उसके दिलवाए जा सकें, उनके संबंध स्थापित करवाए जा सकें। लेकिन तैयारी तो बहुत दूर की बात है, बहुत दूर की बात है, मेरे पास आने में ही हजार बाधाएं खड़ी करने की कोशिश की जाएगी। तो बहुत गहरे तल पर जो इजोटेरिक वर्क हो सकता है, जो बहुत गहरे तल पर नये संवेदना के स्रोत खोले जा सकते हैं, उनसे कोई संबंध ही स्थापित नहीं हो पाता है।
यह पृथ्वी रोज-रोज दरिद्र होती चली जाती है, क्योंकि इस पृथ्वी के पास अपनी ही श्रेष्ठतम आत्माओं से, जो अब भी मौजूद हैं, संबंध के सारे स्रोत शिथिल हो गए हैं। वे संबंध के स्रोत पुनरुज्जीवित किए जाने जरूरी हैं। लेकिन हमें तो सब ऊपर से दिखाई पड़ता है, भीतर से हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि भीतर की हमारी कोई दुनिया ही नहीं है। वहां देखने का कोई सवाल नहीं है।
अब जो बात मैंने कही, वह बात वैसी है जैसे हम अंधे के पास जाकर कहें कि मुझे रोशनी दिखाई पड़ती है, सूरज से मेरा संबंध है। वह कहेगा, कैसा सूरज? कैसी रोशनी? आप पागल हो गए! कहां है सूरज? कहां है रोशनी?
वह अंधा यह नहीं मानेगा कि मेरे पास आंख नहीं है। कोई आदमी यह मानने को राजी नहीं होता कि मेरे पास कोई अभाव है, कोई कमी है। वह कहेगा कि सूरज वगैरह कुछ भी नहीं है, आप गलतफहमी में पड़ गए हैं।
इसलिए कई बार यह होता है कि अंधे के सामने वे बातें ही मत करो जो आंख वालों की हैं, क्योंकि आंख वालों की बात वह समझ नहीं सकेगा और मुश्किल में पड़ जाएगा। मेरी तो इतनी कठिनाई है कि जो मैं आपसे कहना चाहता हूं, नहीं कह पाता हूं। जो कहता हूं वह मुझे लगता है अधूरा है। क्योंकि किससे बात कही जाए? और बात का क्या मतलब लिया जाएगा, यह और भी मजे की बात है। और क्या उसके अर्थ निकाले जाएंगे, यह और भी मजे की बात है। तब मुझे धीरे-धीरे लगता है कि जो लोग चुप रह गए होंगे जान कर, उनके चुप रह जाने में आप ही कारण रहे होंगे। क्योंकि कब तक दीवाल के साथ सिर फोड़ा जा सकता है!
एक बोधिधर्म भिक्षु था भारत में। और दुनिया के कुछ अदभुत लोगों में से एक! वह कभी भी लोगों के सामने मुंह करके नहीं बोलता था। आप अगर उससे मिलने जाते--पहली तो बात यह है कि आप मिलने जाते ही नहीं; और बोधिधर्म बंबई आता नहीं; और आप जाते नहीं मिलने--अगर जाते तो आप हैरान हो जाते कि वह आपकी तरफ पीठ रखता और दीवाल की तरफ मुंह रखता। कई लोगों ने उससे कहा कि यह आपने कौन सी तजवीज निकाली है कि दीवाल की तरफ मुंह किए बैठे हैं! हम आपसे कुछ पूछने आए हैं।
बोधिधर्म कहता, इसी में सुविधा रहती है।
लोग उससे पूछते, लेकिन इसका मतलब क्या है?
तो बोधिधर्म कहता, इसका मतलब यह है कि तुम्हारी तरफ देख कर जब बोलता हूं तब भी मुझे ऐसा लगता है कि दीवाल के साथ सिर फोड़ रहे हैं। मगर दीवाल की तरफ देखने से कम से कम एक भरोसा रहता है कि दीवाल सुनेगी नहीं, यह तो पक्का है; लेकिन गलत नहीं समझेगी, यह भी पक्का है। यह आदमी की तरफ देख कर बोलने से बड़ी मुश्किल है। दीवाल तो पक्की है वहां भी; लेकिन दीवाल खतरनाक है, वह गलत भी समझती है।
बोधिधर्म ने कहा कि जब कोई आदमी आएगा जो दीवाल नहीं होगा, तो मैं जरूर उसकी तरफ मुंह कर लूंगा।
नौ साल तक वह आदमी दीवाल की तरफ ही मुंह किए रहा! बड़ी हिम्मत का आदमी रहा होगा! क्योंकि आदमी की तरफ से मुंह फेरने में बड़ी कठिनाई है, बड़ी कठिनाई है। आदमी पर दया भी आती है कि उससे कुछ कह दो जो कहने जैसा है। और फिर परेशानी भी होती है, कहने के बाद पता चलता है--वह तो सुना ही नहीं गया, उसने कुछ और सुन लिया है, जो कभी नहीं कहा गया था वह उसने सुन लिया है।
नौ वर्ष तक वह दीवाल की तरफ ही देखता रहा। नौवें वर्ष में...हिंदुस्तान में तो नहीं यह घटना घट सकी। दीवाल की तरफ ही देखता रहा। हिंदुस्तान से चला गया पीछे वह चीन। चीन में एक आदमी आया और उस आदमी ने आकर कहा कि सिर इस तरफ घुमाते हो कि मैं अपना सिर काट दूं? वह एकदम बोधिधर्म लौट कर बैठ गया और उसने कहा, आ गया क्या वह आदमी!
सिर काट देगा जो आदमी, वह सुन सकता है। क्योंकि सच बात यह है कि सत्य को सुनने में, आपके पुराने सिर के कट जाने की पूरी संभावना और उम्मीद है। वह जो पुराना सिर है, वह जो पुराना अहंकार है, वह जो पुरानी धारणा है--कि मैं जानता हूं, मेरा मत, मेरा शास्त्र, मेरा यह, मेरा वह, मैं--उसके गिर जाने की संभावना है।
बोधिधर्म ने कहा, आ गया वह आदमी जो सिर काट सकता है, उससे अब सीधा मुंह करके बात करनी पड़ेगी।
लेकिन आदमी खोते चले गए हैं। जिंदा आदमी की बात ही सुनने वाला कोई नहीं है, तो मरे हुए आदमियों से क्या संबंध स्थापित किया जा सकता है?
यह दुनिया इतनी ही नहीं है जितनी आपको दिखाई पड़ती है। यह दुनिया इतनी ही नहीं है जितनी आंख-कान से दिखाई और सुनाई पड़ती है। आंख-कान से भी दुनिया बहुत बड़ी है, बहुत कुछ है दुनिया में। आपके चारों तरफ बहुत से और प्राण और आत्माएं भी हैं, जो निकट आपके मौजूद हैं। लेकिन आपको दिखाई भी नहीं पड़ सकते, आपका संबंध भी नहीं हो सकता। आपको पता भी नहीं चल सकता कि चारों तरफ और भी कोई मौजूद है।
अगर कभी महावीर की जिंदगी की घटना पढ़ी हो, तो महावीर की घटनाओं में एक अदभुत बात आती है। ऐतिहासिक बड़े चौंक जाते हैं कि यह बात सरासर झूठ होगी। क्योंकि इतिहास तो उसी को अंकित करता है जो आंख से देखा जाता है। और आंख से भी उसको ही अंकित करता है जो हजार आदमियों की आंख से हजार तरह देखा जाता है। इतिहास का कोई भरोसा है!
एडमंड बर्क एक किताब लिख रहा था दुनिया के इतिहास पर। आधी किताब पूरी कर ली थी। कोई डेढ़ हजार पृष्ठ लिख चुका था। इतना बड़ा इतिहास शायद पहले किसी आदमी ने कोशिश नहीं की थी। दिन-रात लगा था लिखने में, तीस साल खराब किए थे। बैठ कर लिख रहा था कि एकदम पीछे से भगदड़ हुई, पड़ोस की गली से कुछ लोग दौड़ते हुए दिखाई पड़े। बर्क बाहर आया और उसने पूछा कि क्या हो गया? उन्होंने कहा, आपके मकान के पीछे हत्या हो गई।
बर्क भागा गया। लाश पड़ी थी, हत्यारा पकड़ लिया गया था, भीड़ लगी थी। एक आदमी से पूछा कि क्या हुआ? उसने एक बात कही। दूसरे आदमी से पूछा, उसने दूसरी बात कही। तीसरे आदमी से पूछा, उसने तीसरी बात कही। वे सब चश्मदीद गवाह थे, सबकी आंखों की देखी बात थी। बर्क कहने लगा, तुम्हारी आंख के सामने ही हुआ है; कोई दो आदमी का मत एक नहीं है! मेरे घर के पीछे हुआ, लाश पड़ी है, खून बह रहा है, हत्यारा पकड़ लिया गया है, भीड़ मौजूद है, लेकिन दो आदमियों का मंतव्य एक नहीं है! हर आदमी कहता है, ऐसे हुआ, यह हुआ।
बर्क अंदर गया, उसने अपनी तीस साल की मेहनत पर आग लगा दी किताब पर। उसने कहा कि मैं दो हजार साल पहले क्या हुआ, उसका हिसाब लगा रहा हूं। मेरे घर के पीछे क्या हुआ, और आंख से देखने वाले लोग नहीं कह सकते कि क्या हुआ! बेकार है इतिहास, कुछ सार नहीं! उसमें उसने आग लगा दी।
समझदार आदमी था। और इतिहासज्ञों को भी अकल आ जाए तो वे भी आग लगा दें, उसमें कुछ मतलब नहीं है।
महावीर की जिंदगी में यह बात बार-बार कही गई है: इतने हजार लोग सुन रहे थे, इतने हजार देवता सुन रहे थे। अब वे देवता तो किसी को दिखाई नहीं पड़ेंगे; वे कहां सुन रहे थे? ऐतिहासिक कहेगा: हम भी मौजूद थे, आदमी तो कुछ दिखाई पड़ते थे, देवता कोई दिखाई नहीं पड़ता था वहां। कैसे दिखाई पड़ेगा! लेकिन यह बात सच है कि आदमी से ऊपर की योनियां हैं। और महावीर जैसा आदमी जब बोलता है तो सिर्फ आदमी नहीं सुनते, देवताओं को भी सुनना पड़ता है।
लेकिन वह जिनको दिखाई पड़ता है, उनकी बात है। अंधों के लिए वह बात करने का कोई अर्थ नहीं है। बहुत सी बातें छोड़ देनी पड़ती हैं कि उनकी बात नहीं की जा सकती। लेकिन मैं चाहता हूं कि कभी वे सब बातें की जा सकें। और उसके लिए चाहता हूं कि लोग तैयार हो जाएं, तो शायद वे बातें की जा सकें।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे भी ऐसा लगता है कि जिस मामले में बहुत लोग असफल हुए, वही मेहनत मैं भी कर रहा हूं। वह असफलता बहुत पुरानी है।
लेकिन बार-बार हिम्मत ऐसी होती है कि कोशिश फिर एक करनी चाहिए। जानता हूं कि जीसस को लोग सूली पर लटका देते हैं, गांधी को गोली से मार देते हैं। वे अपनी पुरानी आदत जारी रखेंगे। कोई मेरे संबंध में अपवाद नहीं हो सकते। लेकिन फिर भी मन होता है कि चलो एक कोशिश और सही, हर्ज भी क्या है? जो चीज मिट ही जानी है, उसको, ऐसे ही मिटती है कि कोई मिटा देता है, इससे फर्क क्या पड़ता है! इसलिए एक कोशिश में लगा हूं।
गांधी से मेरा क्या विरोध हो सकता है? उन जैसे प्यारे आदमियों से किसी का भी क्या विरोध हो सकता है? लेकिन यह कोशिश और ही तरह की है, वह शायद किसी दिन आपको समझ में आ सके। मैं तो कोशिश, हैमर करता ही रहूंगा आपकी खोपड़ी को कि कहीं से शायद किसी को कुछ बुद्धि थोड़ी मालूम हो और खयाल आ जाए कि हां, कुछ बात हो सकती है। लक्ष्य मेरा सिर्फ एक है।
वह किसी मित्र ने पूछा है कि आपका लक्ष्य क्या है इस सारी बातचीत का?

लक्ष्य मेरा सिर्फ एक है कि वह जो सोई धारा है चिंतन की, वह प्रबुद्ध हो जाए और जग जाए। और उसके सिवाय किसी का भी लक्ष्य कभी दूसरा नहीं रहा है। जिन लोगों ने भी चेष्टा की है मनुष्य के साथ, उनका एक ही लक्ष्य है कि वह जो सोया हुआ व्यक्तित्व है, वह जो सोई हुई आत्मा है, जग जाए। हजार कोशिशों से उसे जगाने की कोशिश करते हैं वे। उनकी कोशिश में विरोध दिखाई पड़ सकता है। विरोध बिलकुल नहीं है।
महावीर और बुद्ध एक ही बिहार में, एक ही समय में घूमते रहे। और अगर आपने सुना होता या जिन लोगों ने उन्हें सुना था...और आप में भी बहुत लोग होंगे जिन्होंने सुना होगा। क्योंकि हम पहली बार यह जमीन पर नहीं हैं; हम बहुत बार जमीन पर हुए हैं, बहुत बार होते रहे हैं, बहुत बार होते रहेंगे। बहुत लोग होंगे जिन्होंने बुद्ध और महावीर को सुना होगा। यहां भी होंगे, लेकिन उनको कुछ पता नहीं हो सकता है।
एक ही बिहार में बुद्ध और महावीर घूमते रहे और एक-दूसरे के खिलाफ बोलते रहे। बड़े चौंके होंगे लोग कि बड़ी अजीब बात है--बुद्ध और महावीर एक-दूसरे के खिलाफ बोलें! इनको क्या जरूरत है एक-दूसरे के खिलाफ बोलने की? और सख्त बातें कहते रहे। यह मत सोचना कि कुछ नरम-नरम बातें कहीं, बड़ी सख्त बातें कहीं। बड़ा मजाक बुद्ध ने उड़ाया महावीर का।
बुद्ध ने कहा है कि एक है निगंथनाथ पुत्त महावीर। लोग कहते हैं वह सर्वज्ञ है; और मुझे पक्का पता है कि वह भिक्षा मांगने में ऐसे द्वार पर खड़ा हो जाता है, जिसके घर में कोई है ही नहीं भीख देने वाला। बाद में पता चलता है आवाज देने से कि घर में कोई रहता ही नहीं है। और उसके शिष्य कहते हैं कि वह सर्वज्ञ है, सब कुछ जानता है, तीन काल जानता है।
और एक-दूसरे के खिलाफ और इस तरह की बातें कहीं कि हैरानी होगी।
महावीर कहते हैं कि आत्मा ही ज्ञान है, आत्मा ही सत्य है, आत्मा ही धर्म है, आत्मा ही परमात्मा है, आत्मा ही सब कुछ है।
और बुद्ध क्या कहते हैं? बुद्ध कहते हैं, आत्मा अज्ञान है। जो आत्मा को मानता है, भटक जाएगा। जिसने आत्मा को माना वह डूबा। आत्मा से बड़ा मानना अज्ञान का और कुछ भी नहीं है।
बड़ी अजीब बात है! एक कहता है, आत्मा ही ज्ञान। एक कहता है, आत्मा अज्ञान। अब हम बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे कि बड़ी मुश्किल हो गई। लेकिन जो जानते हैं, वे जानते हैं कि मुश्किल नहीं हो गई। बुद्ध की एक डिवाइस है, बुद्ध का एक ढंग है आपके चिंतन को जगाने का। महावीर का ढंग दूसरा है आपके चिंतन को जगाने का। दोनों का इरादा एक है, रास्ते अलग हैं।
महावीर कहते हैं कि आत्मा ही ज्ञान है, आत्मा ही सब कुछ है। साथ में कहते हैं, लेकिन आत्मा का पता कब चलेगा? कहते हैं, जब अहंकार गिर जाएगा तब पता चलेगा। अहंकार गिर जाएगा तब पता चलेगा कि आत्मा क्या है। और बुद्ध कहते हैं, आत्मा अज्ञान है; क्योंकि आत्मा ही अहंकार है। जब आत्मा मिट जाएगी, तब पता चलेगा कि क्या है। अब इसमें कोई फर्क नहीं है।
इधर हिंदुस्तान के सारे शिक्षक चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि अनंत-अनंत जन्म हैं। अनंत-अनंत जन्मों से तुम भटक रहे हो, भटक रहे हो, सड़ रहे हो, बार-बार उसी चक्कर में घूम रहे हो। कब तक घूमते रहोगे? अब जागो! उधर जीसस और मोहम्मद कहते हैं, अनंत जन्म वगैरह नहीं हैं, एक ही जन्म है! एक ही मौका है, अगर जाग गए तो जाग गए; नहीं जागे तो खो गए हमेशा के लिए। इसलिए जाग जाओ!
अब यह बड़े मजे की बात है। इधर हमारा शिक्षक कहता है कि अनंत-अनंत जन्मों से भटक रहे हो, रिपीटेडली एक ही चक्कर में घूम रहे हो। कब तक घूमते रहोगे? ऊब नहीं गए? ऊब जाओ अब और जाग जाओ! उधर जीसस और मोहम्मद कहते हैं, कोई अनंत जन्म वगैरह नहीं हैं, एक ही जन्म है। अगर चूक गए तो सदा के लिए चूक गए, फिर कोई उपाय नहीं है। इसलिए जागना है तो जाग जाओ! अब ये दोनों बातें बड़ी उलटी मालूम पड़ती हैं। लेकिन जो जानते हैं उनके लिए उलटी नहीं हैं। वे कहेंगे, आदमी को जगाने की दोनों कोशिश हैं।
दुनिया के सारे शिक्षकों के शब्दों में विरोध है, रहेगा। लेकिन दुनिया के किसी शिक्षक के मन और मंशा में कोई भी विरोध नहीं है। नहीं हो सकता है। लेकिन आदमी की समझ बहुत कम है, शब्द पकड़ता है और परेशान हो जाता है। भीतर तक प्रवेश नहीं है; देख सके तथ्य को कि तथ्य क्या है!

एक मित्र ने पूछा है कि मैं मना करता हूं कि मेरे पैर मत छुएं! लेकिन मैं क्यों मना करता हूं?

मैं इसलिए मना करता हूं कि आप किसी के भी पैर छुएंगे, तो उसके पैर छूने से वंचित रह जाएंगे जो सबमें है। और भी पैर हैं, जो सब जगह हैं और कहीं भी नहीं हैं। नजर उन पैरों की तरफ उठनी चाहिए। चांदत्तारों में भी उन पैरों की पगध्वनियां हैं। फूल-तितलियों में भी उन पैरों की पगध्वनियां हैं। आदमी में भी, पत्थरों में भी उन पैरों की पगध्वनियां हैं। हाथ जुड़ने चाहिए उन पैरों की तरफ जो अनंत में विस्तीर्ण हैं। किसी एक आदमी के पैरों की तरफ हाथ झुकाने की कोई भी जरूरत नहीं।
क्यों? इसलिए नहीं कि झुकना बुरा है। झुकना बहुत अदभुत है। जो झुकना नहीं जानता वह दो कौड़ी का आदमी है, उसकी कोई कीमत नहीं है। लेकिन जब झुकना ही है तो ऐसे चरणों में झुको जिनसे फिर उठना न पड़े। अब मेरे चरण में झुकोगे भी, एक मिनट बाद फिर उठना पड़ेगा, मामला खतम हो गया। झुके भी, बेकार मेहनत हुई, फिर उठ गए। इसमें कोई सार न हुआ, इसमें कोई अर्थ न हुआ।
रामकृष्ण के पास एक आदमी गया। रामकृष्ण से कहने लगा, गंगा-स्नान को जा रहा हूं। सुना है मैंने, परमहंसदेव, कि वहां नहाने से पाप बह जाते हैं।
परमहंस ने कहा, बिलकुल बह जाते हैं। लेकिन गंगा से बाहर मत निकलना! निकले कि फिर चढ़ जाते हैं। वे जो झाड़ देखे हैं न किनारे पर खड़े हुए, जब तक तुम डुबकी लगाते हो, गंगा तो पवित्र है, जब तुम डुबकी लगाओगे, वे झाड़ पर बैठ जाएंगे। वे बड़े-बड़े झाड़ इसीलिए हैं गंगा के किनारे, पता है आपको? वे उस पर बैठे रहेंगे कि बेटा, कब निकलते हो! और आखिर बेटा कब तक डूबा रहेगा? थोड़ी-बहुत देर में निकलेगा कि निकल गए पाप, वे फिर उतर कर सवार हो जाएंगे।
तो रामकृष्ण ने कहा, ऐसी गंगा में डूबो जहां से निकलना न पड़े। ऐसी भी गंगा है परमात्मा की, जहां डूबो तो निकलना न पड़े। निकलने को जगह ही नहीं है फिर वहां, डूबे तो डूबे ही, वही-वही है। फिर निकलना भी चाहो तो कहीं भागने का उपाय नहीं है, क्योंकि वही-वही है।
तो मैं भी कहता हूं कि चरण ऐसे भी हैं कि जहां झुको तो झुक ही जाओ, फिर उठना न पड़े। उन्हीं चरणों में झुकने का अर्थ है। जिन चरणों में झुको और उठो, तो बेकार की कवायद हो जाती है, कोई मतलब नहीं होता।
इसलिए कहता हूं, कोई झुकने की जरूरत नहीं है। झुको जरूर! यह मत सोच लेना...क्योंकि यह बड़ा डेलीकेट, बहुत नाजुक बात है। क्योंकि जब मैं कहता हूं कि मेरे चरणों में मत झुको, तो कुछ हैं जो बड़े खुश होंगे कि बहुत बढ़िया बात कही। इसलिए नहीं कि वे किन्हीं और चरणों में झुकेंगे परमात्मा के, बल्कि इसलिए कि झुकने में उनको बड़ी बेचैनी मालूम पड़ती है, झुक नहीं सकते कहीं भी। वे कहेंगे, बिलकुल दुरुस्त, एकदम ठीक बात कही। जहां भी भीतर अहंकार मजबूत है, वे कहेंगे कि बिलकुल ठीक बात कही। झुकना नहीं चाहिए!
लेकिन मैंने झुकने को मना नहीं किया है, मैंने मेरे चरणों में झुकने को मना किया है। इस भूल में मत पड़ जाना कि मैंने झुकने को मना किया है। मैंने तो बेकार झुकने को मना किया है। यह बिलकुल बेकार झुकना है। एक आदमी के चरणों में झुकने का क्या मतलब है? कोई भी मतलब नहीं है। यह शरीर बिलकुल मिट्टी है। इस मिट्टी में झुकने का कोई मतलब नहीं है। यह मिट्टी की पूजा है। फिर यहीं से आदतें बिगड़नी शुरू हो जाती हैं। फिर यह आदमी खत्म हो जाए तो एक पत्थर की मूर्ति बना कर उसमें झुकना शुरू हो जाता है। वह झुकने की गलत आदत हो गई।
नहीं; एक चिन्मय जीवन है चारों तरफ, उसके चरण चारों तरफ हैं, उसके चरणों में झुकने के लिए हाथ-पैर बांध कर सिर नहीं झुकाना पड़ता; उसके चरणों में झुकना एक आंतरिक लोच, एक आंतरिक समर्पण, एक भीतरी समर्पण है। झुक गया आदमी!
और यह बड़े मजे की बात है कि जो झुक जाता है उसके चरणों में, उसका फिर झुकना बंद हो जाता है, फिर और झुकने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। जो झुक जाता है उसके चरणों में, उससे ऊंचा कोई नहीं रह जाता, वह सबसे ऊंचा हो जाता है। वे चरण इतने ऊंचे हैं कि उनमें झुकने में आप नीचे नहीं हो जाते, उनमें झुक कर आप ऊंचे हो जाते हैं, वे चरण इतने ऊंचे हैं।
लाओत्से कहता था: धन्य हैं वे जो झुके हुए हैं, क्योंकि उनको झुकना नहीं पड़ेगा।
इसे मैं फिर दोहरा दूं, यह आदमी बहुत अदभुत बात कहता है। वह कहता है, धन्य हैं वे जो झुके हुए हैं, क्योंकि फिर उनको कोई झुका नहीं सकता। अब झुके आदमी को कैसे झुकाइएगा?
लाओत्से कहता है, धन्य हैं वे जो हारे हुए हैं, क्योंकि उनको कोई हरा नहीं सकता। अब हारे हुए आदमी को कैसे हराइएगा? जीते हुए आदमी को हमेशा हार का डर होता है। इसलिए जीता हुआ आदमी पूरा जीता हुआ कभी नहीं है, क्योंकि हार का डर मौजूद है।
लाओत्से कहता है, धन्य हैं वे जो हारे हुए हैं--वे पहले से ही हारे हुए हैं--क्योंकि उनको अब कोई हरा नहीं सकता। धन्य हैं वे जो पीछे खड़े हैं, क्योंकि अब और पीछे हटाने का कोई उपाय नहीं है।
लेकिन ये किससे पीछे खड़े हैं? किससे हारे हुए हैं? किससे झुके हुए हैं? जो अनंत के प्रति झुके हुए हैं--वे उठ गए, उठा लिए गए। जो अनंत के प्रति हारे हुए हैं--वे जीत गए, जीत गए, अब हार की कोई संभावना न रही।
जरूर मैं कहता हूं कि मेरे चरणों में मत झुकना। क्योंकि ये मेरे और तेरे के जो चरण हैं, यह मेरे और तेरे का जो भाव है, यही भाव झुकने में बाधा है। जहां मेरात्तेरा नहीं रह जाता, वहीं झुकना शुरू हो जाता है, वहीं झुकना आ जाता है।
तो नाराज मत हो जाना। कुछ मित्रों ने मुझसे कहा कि हम बहुत...ऐसी बात आपने कह दी, हम तो छुएंगे पैर!
हमारे मुल्क में आदतें भी तो बड़ी अजीब हैं न। अगर कोई आदमी कहे, मेरे पैर मत छुओ! यह पैर छुलाने की अच्छी तरकीब भी है। यह बहुत बढ़िया तरकीब है। अगर लोगों से कहो, पैर मत छुओ! तो लोग पैर छूने और भी आ जाएंगे। लोगों से कहो, दूर रहो! तो वे और पास आएंगे। अगर लोगों को गाली दो, तो वे समझेंगे कि परमहंस है यह आदमी। यह हमारी गलत आदत हजारों वर्ष की है। और होशियार और चालाक लोग इसका फायदा भी उठा रहे हैं। क्योंकि लगता है कि जो आदमी कहता है, मेरे चरण मत छुओ! बड़ा महापुरुष है। इसके तो चरण जरूर छूने चाहिए।
इसलिए नहीं कहा है मैंने। कहा है मैंने इसलिए कि जरूर झुको कहीं, लेकिन गलत जगह मत झुक जाना। झुको जरूर, झुको जरूर, झुकना ही कला है धर्म की; टूट जाओ, मिट जाओ, बिखर जाओ, बह जाओ। लेकिन कहां? अनंत के लिए। सर्व के लिए। सबके लिए। वह जो व्यापक है, वह जो विराट है, वह जो फैला है, उसके लिए। सीमित के लिए, क्षुद्र के लिए, क्षण के लिए, जो आज है और कल नहीं होगा, उसके लिए मत झुको।
लेकिन ध्यान रहे, झुकने के मैं विरोध में नहीं हूं। झुकना ही तो राज है, मिट जाना ही तो राज है। जब तक हम अपने को मजबूती से पकड़े हुए हैं और झुक नहीं सकते, टूट नहीं सकते, तब तक हम पहुंच नहीं सकते वहां जहां पहुंचना है। मिट जाना ही पा लेने का सूत्र है। खो जाना ही पा लेने का मार्ग है। झुक जाना ही उठ जाने की कला है।
लेकिन ध्यान रहे, कहां?
बुद्ध ने अपने पिछले जन्म की एक कहानी कही है। कहा है कि पिछले जन्म में, जब मैं बुद्ध नहीं था, जब ज्ञान नहीं था, जब नहीं जाना था और अंधेरे में जीता था, उस समय एक बुद्ध थे, एक बुद्ध पुरुष थे। मैं उन बुद्ध पुरुष के पास गया। मैंने उनके चरण छुए, सिर रख दिया चरणों पर। जब मैं उठा तो मैं चौंक कर रह गया! मैं उठ भी नहीं पाया था कि वे मेरे चरणों में झुके और मेरे चरणों में उन्होंने सिर रख दिया। मैं तो बहुत घबड़ा गया! मैंने उनसे कहा, यह आपने कैसा किया? यह तो मुझे पाप लगेगा। मैं आपके चरणों में झुकूं, यह तो ठीक है, क्योंकि मैं अज्ञानी! आप मेरे चरणों में झुकें--आप, जो कि जानते हैं; आप, जो कि पा गए; आप, जो कि पहुंच गए--यह तो मुझको पाप हो गया! यह क्या पागलपन किया आपने?
वे बुद्ध हंसने लगे, वह बुद्ध पुरुष हंसने लगा और उसने गौतम बुद्ध को उस पिछले जन्म में कहा, तू समझता है कि तू अज्ञानी है; जब से मुझे ज्ञान हुआ, तब से सभी मुझे ज्ञानी दिखाई पड़ते हैं! तू समझता है कि तू कुछ नहीं है; जब से मैंने जाना, तब से सब जगह मुझे वही-वही हो गया है! तूने मेरे पैर पड़े, अगर मैं तेरे पैर न पडूं, तो बड़ी हंसी होगी मेरी उन लोगों में जो मुझे जानते हैं। वे कहेंगे, परमात्मा से पैर पड़वा लिए और खुद परमात्मा के पैर न पड़े!
और फिर वह बुद्ध ने कहा कि यह आज तू समझता है; लेकिन आज नहीं कल तू भी जाग जाएगा और तू भी पहुंच जाएगा वहीं। देर समय की है, सपने की है, देर ज्यादा नहीं है।
फिर बुद्ध को, दूसरे जन्म में बुद्ध ने कहा, आज मैं जानता हूं कि कैसी बात कही थी उन्होंने। जब से मैं जागा, तब से मुझे कोई सोया हुआ नहीं दिखाई पड़ रहा है। जब से मैंने जाना, तब से हर आदमी मुझे वही दिखाई पड़ रहा है।
आप पूछते हैं कि मैं क्यों मना करता हूं?
अब एक ही रास्ता है--एक ही रास्ता है कि आपको मना न करूं--वह यह कि आप मेरे पैर छुएं और मैं आपके पैर छुऊं। अब यह इतना उपद्रव हो जाएगा, यह इतनी परेशानी होगी और इतना समय लेगा, जिसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि यह बड़ी अशोभन बात है कि आप हाथ जोड़ कर मुझे नमस्कार करें और मैं हाथ न जोड़ सकूं। अगर हाथ जोड़ कर आप नमस्कार करें और मैं हाथ न जो॰? सकूं, तो बड़ी अशोभन बात है।
हालांकि हमारे मुल्क के साधु किसी को हाथ नहीं जोड़ते, पता है आपको? आप हाथ जोड़िए, वे ऐसे आशीर्वाद देंगे। और एक कैमरा मैन को पास रखेंगे, जो तत्काल फोटो निकाल लेगा। फिर कैलेंडर छपवा कर बैठेंगे कि फलां ऋषि, फलां आचार्य, फलां महात्मा पंडित नेहरू को आशीर्वाद दे रहे हैं। और गलती कुल इतनी हो गई कि वह बेचारे पंडित नेहरू ने भद्रता से हाथ जोड़ा है और उन्होंने हाथ ऊपर उठा दिया, उन्होंने भद्रता से हाथ भी नहीं जोड़े।
हाथ आप जोड़ें और मैं हाथ न जोड़ सकूं, तो कैसी अभद्रता है यह, कैसी असाधुता! ठीक यही बात है, आप मेरे पैर पड़ें और मैं आपके पैर न पडूं, यह भी तो अभद्रता है। यह भी तो अभद्रता है, उत्तर मेरी तरफ से भी चाहिए। तो अब दो ही उपाय हैं, या तो आप राजी हो जाएं, या फिर मुझसे भी मेहनत करवाएं।
कोई अर्थ नहीं है उसमें। व्यक्तियों की पूजा नहीं करनी है। व्यक्तियों की पूजा नहीं करनी है, नहीं होने देनी है। व्यक्तियों की पूजा बहुत हो चुकी। उसके कारण सत्य की पूजा नहीं हो पाती है। व्यक्तियों से बचें। एक व्यक्ति से छूटते हैं, दूसरा पकड़ जाता है। व्यक्तियों से बचें, व्यक्तियों को जाने दें। व्यक्ति का कोई भी मूल्य नहीं है, मूल्य है सत्य का।
मैं चांद को इशारा करके बताऊं कि वह चांद है ऊपर। आप मेरा हाथ पकड़ लें कि यह हाथ बड़ा अदभुत है, इसकी पूजा करनी चाहिए। हो गया पागलपन! हम दिखाए थे चांद को, आपने पकड़ लिया हाथ को। चांद एक तरफ रह गया, हाथ की पूजा शुरू हो गई।
महावीर इशारा करते हैं कि वह रहा सत्य! जीसस चिल्लाते हैं, वह रहा दरवाजा! मोहम्मद कहते हैं, वह रहा मार्ग, वह रहा रास्ता! आओ!
हाथ पकड़े है मुसलमान; हाथ पकड़े है जैन; हाथ पकड़े है हिंदू; हाथ पकड़े है ईसाई। हाथ की पूजा किए चला जा रहा है, दीये जला रहा है, धूप जला रहा है, फूलमाला चढ़ा रहा है कि धन्य हैं आप!
रोते होंगे बेचारे, सब रोते हैं! बुद्ध, महावीर, कृष्ण, सब रोते हैं! उधर मिलते हैं ऊपर, तो बैठ कर, बड़ी बैठक जमा कर रोते हैं इकट्ठे! सिर फोड़ते हैं अपना कि जिनको हम समझा आए थे वे क्या कर रहे हैं!
इसको खत्म करें, इसको मिटा दें, अब इसकी कोई जरूरत नहीं। किसी व्यक्ति को पूजा देने की जरूरत नहीं। इशारों को छोड़ें, चांद को देखने का सवाल है। और जो चांद को देखना चाहता है, उसे इशारा छोड़ ही देना पड़ेगा; क्योंकि या तो मेरे हाथ को देखें, और या फिर आंखों को चांद की तरफ उठाएं। आंख चांद की तरफ उठेंगी, हाथ छूट ही जाएगा।
परमात्मा की तरफ जो जाएगा--महावीर भी छूट जाएंगे, बुद्ध भी छूट जाएंगे, कृष्ण भी छूट जाएंगे, राम भी छूट जाएंगे--सब छूट जाएंगे। ये तो इशारे थे। रास्ते के किनारे लगे हुए इशारे थे कि यह जा रहा है रास्ता। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं--बुद्धिमान लोग--वे उसी पत्थर पर, जिस पर लिखा है कि यह रहा बंबई का रास्ता, उस पत्थर को छाती से लगा कर बैठ जाते हैं, कि प्यारे तुम बहुत अच्छे हो, तुमने पहुंचा दिया बंबई।
वह बेचारा सिर्फ रास्ता था, जो इशारा करता था कि वह रही बंबई। आगे बढ़ जाना मुझे छोड़ कर कि पहुंच जाओ वहां जहां इशारा है। वे बैठे हैं पत्थर को छाती से लगाए। और अगर कोई उनको कहे कि भाईजान उठो! तो वे कहेंगे, हमारे धर्म में बाधा डाल रहे हो! हम प्रार्थना कर रहे हैं, हम पूजा कर रहे हैं।
नहीं, व्यक्ति को जाने दें, ताकि सत्य आ सके। छोड़ दें सब, ताकि उस तरफ आंख उठ सके, जो सिर्फ उन्हीं आंखों में दिखाई पड़ता है जो सब छोड़ कर उठती हैं। जिस आंख से व्यक्तियों का, शब्दों का, शास्त्रों का धुआं हट जाता है, जिस आंख से रोकने वाले आंसू उड़ जाते हैं, जिस आंख से पर्दे गिर जाते हैं, वही आंख निर्दोष होकर उसे देखने में समर्थ हो जाती है जो सत्य है।
और उस सत्य की उपलब्धि, उस सत्य की उपलब्धि की छाया का नाम शांति है। जो उस सत्य को पा लेता है वह शांत हो जाता है। सत्य का परिणाम है शांति। सत्य मिला, शांति छाया की तरह पीछे चली आती है। सत्य की छाया है शांति।
इसलिए शांति को सीधा मत खोजना कभी भी। अगर मैं आपके घर आऊंगा, तो मेरी छाया बिना निमंत्रण दिए आपके घर आ जाएगी, अलग से निमंत्रण देने की जरूरत नहीं है। और अगर मेरी छाया को निमंत्रण दे गए, तो आप जानें, आपका काम जाने। मैं तो आऊंगा नहीं; छाया आने वाली नहीं है।
जो लोग शांति को निमंत्रण देते हैं, शांति कभी नहीं आती। शांति सत्य की छाया है। सत्य आता है, शांति पीछे छाया की तरह चली आती है।

इन चार दिनों में उस सत्य की खोज के लिए मैंने कुछ कहा, ताकि शांति की खोज हो सके। मेरी बातों को इतने प्रेम और इतनी शांति से सुना, उससे बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।