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शनिवार, 18 अगस्त 2018

तमसो मा ज्योतिर्गमय-(प्रवचन-06)

छठवां प्रवचन--फूल खिलने का क्षण

मेरे प्रिय आत्मन्!
पिछली चर्चाओं के संबंध में एक मित्र ने बहुत अजीब प्रश्न पूछा है। अजीब इसलिए कि पहली अजीब बात तो यह है कि वह प्रश्न ही नहीं है। उन्होंने पूछा है, प्रश्न भी पूछा है, साथ लिखा है, अगर आपको पता न हो, तो मैं इसका उत्तर आपको आकर दे सकता हूं।
उन्हें उत्तर पहले से पता है तो व्यर्थ पूछने की परेशानी नहीं करनी चाहिए। और अक्सर ऐसा होता है कि हम पूछते हैं लेकिन उत्तर हमें पता है तो हमारा पूछना झूठा हो जाता है, अॅाथेंटिक नहीं रह जाता। अगर पता ही है, तो बात खत्म हो गई। अगर पता नहीं है, तो ही पूछने में रस है, अर्थ है, खोज का आनंद है। लेकिन हम सभी को...

तमसो मा ज्योतिर्गमय-(प्रवचन-05)

पांचवां प्रवचन--जीवन का सम्मान

मेरे प्रिय आत्मन्!
बाहर एक जगत है पदार्थ का, उससे हम परिचित हैं। भीतर एक जगत है परमात्मा का, उससे हम अपरिचित हैं। पदार्थ दिखाई पड़ता है, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता है। पदार्थ छुआ जा सकता है, परमात्मा के स्पर्श का कोई उपाय नहीं है। शायद इसीलिए पदार्थ सब कुछ हो गया और परमात्मा कुछ भी नहीं।
कैसे इस भीतर के परमात्मा से संबंध हो सके? कैसे हम बाहर पकड़ गए हैं और रुक गए हैं? किसने हमें पदार्थ के पास बांध रखा है? पदार्थ ने? पदार्थ तो किसी को कैसे बांध सकेगा। हम ही बंध गए होंगे। बंधने की कड़ियां कुछ और होंगी, जो हमने ही निर्मित की होंगी।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

तमसो मा ज्योतिर्गमय-(प्रवचन-04)

चौथा प्रवचन--जीवन की भाषा

मेरे प्रिय आत्मन्!
बीती चर्चाओं के संबंध में और बहुत से नये भी प्रश्न मित्रों ने किए हैं। आज की सांझ मैं उन प्रश्नों पर बात करना चाहूंगा।
एक मित्र ने पूछा है कि पंद्रहवी अगस्त या इस तरह के और त्यौहार मनाना उचित है या नहीं, आप क्या कहते हैं?
सवाल पंद्रह अगस्त का ही नहीं है, सवाल जीवन के सब रिचुअल, सब क्रियाकांडों का है। चाहे क्रियाकांड धार्मिक हो, चाहे राजनैतिक, इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। मन के अंतरभाव से जो भी उठे, वह ठीक है। और जो भी मनाना पड़े, वह बिल्कुल ठीक नहीं है।
आजादी का एक आनंद अगर अनुभव हो, तो वह प्रकट होगा। स्वतंत्रता का एक बोध अगर अनुभव हो, तो वह प्रकट होगा। लेकिन वह बोध किसी को भी अनुभव नहीं होता। फिर एक मरा हुआ त्यौहार हाथ में रह जाता है। फिर हर वर्ष उसे हम दोहराए चले जाते हैं।

तमसो मा ज्योतिर्गमय-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन--अपना जीवन, अपना सत्य

अंधेरे से प्रकाश की ओर जाना तो दूर हम अंधेरे से और गहरे अंधेरे में उतरते चले जाते हैं। उपनिषद के किसी ऋषि ने कहा है: अज्ञान तो अंधकार में ले जाता है, ज्ञान महा अंधकार में ले जाता है। बहुत ही उलझी हुई और विरोधाभासी बात कही है। अज्ञान तो अंधकार में ले जाता है, ज्ञान और महा अंधकार में।
साधारणतः तो हमने यही सुना है कि ज्ञान प्रकाश में ले जाता है। निश्चित ही जो ज्ञान अंधकार में ले जाता होगा वह ज्ञान और ही तरह का ज्ञान होगा। और हम रोज-रोज गहरे से गहरे अंधकार में चले जाते हैं, तो निश्चय ही जिसे हम ज्ञान कहते हैं वह ऐसा ही ज्ञान होगा।

तमसो मा ज्योतिर्गमय-(प्रवचन-02)

दूसरा प्रवचन--जीवन का नियम

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक युवा संन्यासी किसी आश्रम में मेहमान था। आश्रम के वृद्ध फकीर से उसने आत्मा के संबंध में कुछ बातें पूछीं। लेकिन वह वृद्ध फकीर दिन भर हंसता रहा और कोई जवाब न दिया।
जो भी जानते हैं, उन्हें जवाब देना बहुत मुश्किल है। जो नहीं जानते हैं, उन्हें जवाब देना बहुत ही आसान है।
सांझ हो गई, अंधेरा घिरने लगा, वह युवक खोजी वापस लौटने को हुआ। द्वार पर आया, अमावस की रात है, सूरज ढल गया, अंधेरा घिर गया, जंगल का रास्ता है। सीढ़ियां उतरते समय वृद्ध फकीर से वह कहने लगा, बहुत अंधेरा है, कैसे जाऊं?

तमसो मा ज्योतिर्गमय-(प्रवचन-01)

पहला प्रवचन--परम का विज्ञान

सुबह सूरज उगता है और हम मान लेते हैं कि रात मिट गई। वह मानना बड़ा झूठा है। एक रात तो बाहर है जो मिट जाती है, लेकिन एक रात भीतर भी है जो किसी सूरज के उगने से कभी नहीं मिटती। रात के अंधेरे में भी हम दीया जला लेते हैं और सोचते हैं प्रकाश हो गया, लेकिन एक अंधेरा ऐसा भी है जहां हम कभी कोई दीया नहीं जलाते और जहां कभी कोई प्रकाश नहीं पहुंचता। लेकिन शायद उस अंधेरे का ही हमें कोई पता नहीं है। और जब तक उस अंधेरे का पता न हो, तब तक प्रकाश की आकांक्षा भी कैसे पैदा हो सकती है?
उपनिषदों के किसी ऋषि ने गाया है, परमात्मा से प्रार्थना की है: मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चल, अंधेरे से प्रकाश की ओर ले चल। यह प्रार्थना हमने सुनी है और यह भी हो सकता है कि यह प्रार्थना किन्हीं क्षणों में हमने भी की हो। लेकिन जिन्हें यह भी पता नहीं कि किस अंधेरे को मिटाना है, उनकी प्रकाश के लिए की गई प्रार्थना का क्या अर्थ हो सकता है?

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

जीवन क्रांति की दिशा-(प्रवचन-04)

जीवन क्रांति की दिशा-(शून्य समाधि)

चौथा प्रवचन--मैं कौन हूं?

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक गांव में एक आदमी पागल हो गया था, वह जगह-जगह खड़े होकर पूछने लगा था कि मैं कौन हूं? एक ही बात पूछने लगा था कि मैं कौन हूं? सारे गांव के लोगों ने समझ लिया था कि वह पागल हो गया है। मैं भी उस गांव में गया था। उस आदमी को मैंने भी चिल्लाते सुना कि मैं कौन हूं? दिन में, रात में, सुबह-सांझ, मकान में, सड़क पर, बाजार में वह आदमी यही चिल्लाता घूमता था कि मैं कौन हूं? कोई मुझे बता दे कि मैं कौन हूं?
मैंने लोगों से पूछा: इसे क्या हो गया है? उन्होंने कहा: यह आदमी पागल हो गया है, क्योंकि इसे यह भी पता नहीं है कि यह कौन है। मैंने उन लोगों से कहा: अगर पागल होने का यही लक्षण है कि जिसे पता न हो कि वह कौन है, तो फिर सभी मनुष्य पागल हैं। फिर पूरी मनुष्य-जाति ही पागल है।
लेकिन अगर सभी लोग पागल हों, तो पता चलना बहुत कठिन हो जाता है कि कोई पागल है। एक आदमी पागल हो, तो पता पड़ जाता है। और सभी लोग एक ही बीमारी से ग्रसित हो जाएं, तो पता चलना बहुत कठिन हो जाता है।

जीवन क्रांति की दिशा-(प्रवचन-03)

जीवन क्रांति की दिशा-(शून्य समाधि)

तीसरा प्रवचन--जीवन में जागरूकता

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा आरंभ करूंगा।
एक पूर्णिमा की रात में एक छोटे से गांव में बड़ी अदभुत घटना घट गई थी। कुछ जवान लड़कों ने शराबखाने में जाकर शराब पी ली थी, और जब वे शराब के नशे में मदमस्त हो गए थे, और शराब-गृह से बाहर निकले थे, तो उन्हें ऊपर चांद की बरसती हुई चांदनी में यह ख्याल आ गया कि हम जाएं नदी पर और नौका विहार करें।
रात बड़ी सुंदर थी और मन उनके नशे से भरे हुए थे। वे गीत गाते हुए नदी के किनारे पहुंच गए। नाव वहां बंधी थी। मछुवे नावें बांध कर अपने घर जा चुके थे। रात आधी हो गई थी। वे युवक एक नाव में सवार हो गए। उन्होंने पतवारें उठा लीं और नाव को खेना शुरू कर दिया। फिर वे देर रात तक नाव खेते रहे। सुबह होने के करीब आ गई।

जीवन क्रांति की दिशा-(प्रवचन-02)

जीवन क्रांति की दिशा-(शूूूून्य समाधि)

दूसरा प्रवचन--जीवन में रहस्य-भाव

मेरे प्रिय आत्मन्!
जीवन ही परमात्मा है। जीवन के अतिरिक्त कोई परमात्मा नहीं। जीवन को जीने की कला जो जान लेते हैं वे प्रभु के मंदिर के निकट पहुंच जाते हैं। और जो जीवन से भागते हैं वे जीवन से तो वंचित होते ही हैं, परमात्मा से भी वंचित हो जाते हैं। इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं। पहला सूत्र मैंने कल आपसे कहा है: जीवन के प्रति अहोभाव, जीवन के प्रति आनंद और अनुग्रह की भावना।

जीवन क्रांति की दिशा-(प्रवचन-01)

जीवन क्रांति की दिशा-(शूून्य समाधि)

पहला प्रवचन--जीवन के प्रति अहोभाव

मेरे प्रिय आत्मन्!
मैं एक नये बनते हुए मंदिर के पास से निकलता था। मंदिर की दीवालें बन गई थीं। शिखर निर्मित हो रहा था। मंदिर की मूर्ति भी निर्मित हो रही थी। सैकड़ों मजदूर पत्थर तोड़ने में लगे थे। मैंने पत्थर तोड़ते एक मजदूर से पूछा: मित्र क्या कर रहे हो? उस मजदूर ने बहुत गुस्से से मुझे देखा और कहा: क्या आपके पास आंखें नहीं हैं? क्या आपको दिखाई नहीं पड़ता? मैं पत्थर तोड़ रहा हूं। कोई क्रोध होगा उसके मन में, कोई निराशा होगी। और पत्थर तोड़ना कोई आनंद का काम भी नहीं हो सकता है।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-11)

ग्यारहवां प्रवचन--गांठ परी पिया बोले न हमसे

सारसूत्र:

गांठ परी पिया बोले न हमसे।
माल मुलुक कछु संग न जैहे, नाहक बैर कियो है जग से।।
जो मैं जनितिउं पिया रिसियैहे, नाहक प्रीति लगाती न जग से।।
निसुवासर पिया संग मैं सूतिऊं, नैन अलसानी निकरि गए घर से।।
जस पनिहार धरे सिर गागर, सुरति न टरे बतरावत सब से।।
धरमदास बिनवै कर जोरी, साहेब कबीर को पावै भाग से।।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-10)

दसवां प्रवचन--तुम मेरे पास रहो खुशबू की तरह

प्रश्न-सार

॰ परमात्मा की चाह और परमात्मा की प्यास में क्या फर्क है?
॰ न सोचा न समझा न सीखा न जाना
मुझे आ गया खुद-ब-खुद दिल लगाना
॰ आप कहते हैं, प्रार्थना मांग नहीं, अहोभाव प्रकट करना है। और धरमदास कहते हैं, ‘अर्जी सुनो, कर दो भव पार।’ क्या यह प्रार्थना मांग नहीं है?
॰ मैं आपकी हो गई हूं और आपकी विशाल आंखों में डूब जाने को आतुर हो उठी हूं।
॰ आप इस कदर मेरे भीतर उतर गए हैं कि किन शब्दों में कहूं?
॰ भजन क्या होता है?

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-09)

नौवां प्रवचन--बिन दरसन भई बावरी

सारसूत्र:

बिन दरसन भई बावरी, गुरु द्धौ दीदार।।
ठाढ़ि जोहों तोरी बाट मैं, साहैब चलि आवो।
इतनी दया हम पर करौ, निज छवि दरसावो।।
कोठरी रतन जड़ाव की, हीरा लागे किवार।
ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावो।।
बंदा भूला बंदगी, तुम बकसनहार।
धरमदास अरजी सुनो, कर द्यो भवपार।।

बुधवार, 15 अगस्त 2018

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-08)

आठवां प्रवचन--परमात्मा सबरंग है

प्रश्न-सार

॰ क्या हम वासना करने और नहीं करने के लिए स्वतंत्र हैं?
॰ कबीर और धरमदास को लाल रंग पसंद था, मोहम्मद को हरा और नानक को नीला रंग पसंद था। कृपा कर इसका रहस्य समझाएं।
॰ कबीर और धरमदास जैसे परम भक्त भी रोने-धोने के गीत लिखें, यह समझ में नहीं आता।
॰ दस साल से शराब पीना, धूम्रपान, जुआ खेलना, आदि व्यसन जुड़े थे। संन्यास लेते ही सब तिरोहित हो गए। अब तो बिना पीए नशा चढ़ा रहता है।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-07)

सातवां प्रवचन--पिया बिन नींद न आवै

सारसूत्र:

साहेब, तेरी देखौं सेजरिया हो।
लाल महल के लाल कंगूरा, लालिनि लागि किवरिया हो।।
लाल पलंग के लाल बिछौना, लालिनि लागि झलरिया हो।।
लाल साहेब की लालिनि मूरत, लालि लालि अनुहरिया हो।।
धरमदास बिनवै कर जोरी, गुरु के चरन बलिहरिया हो।।

पिया बिन मोहि नींद न आवै।।
खन गरजे खन बिजुली चमके, ऊपर से मोहि झांकि दिखावै।
सासु ननद घर दारूनि आहैं, नित मोहि बिरह सतावै।
जोगिन व्हैके मैं बन-बन ढूंढूं, कोऊ न सुधि बतलावै।
धरमदास बिनवै कर जोरी, कोई नेरे कोई दूर बतावै।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-06)

छठवां प्रवचन--धर्म आग्नेय होता है

प्रश्न-सार

॰ धर्म की परिभाषा के अनुसार धर्म परम नियम है। और आप कहते हैं धर्म विद्रोह है। यह परम नियम विद्रोही कैसे हो सकता है?
॰ मैं बहुत कम पढ़ा-लिखा आदमी हूं, फिर भी आप मुझे पंडित की डिग्री क्यों देते हैं?
॰ सदगुरु से आंतरिक निकटता का क्या अर्थ होता है?
॰ अतीत तूफान बन कर घेर लेता है; आगे नहीं जाने देता। इससे छुटकारा कैसे हो?
॰ क्या प्रेम को दूसरे के सहारे की जरूरत होती ही है?
॰ आपके चरणों में बैठना ही इतना मधुर लगता है कि मोक्ष जाने की इच्छा नहीं होती।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-05)

पांचवां प्रवचन--का करत गुमान!

सारसूत्र:

कहो केते दिन जियबो हो, का करत गुमान।।
कच्चे बांसन का पिंजरा हो, जा में पवन समान।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन में उड़ि जान।।
कच्ची माटी के घडुवा हो, रस-बूंदन सान।
पानी बीच बतासा हो, छिन में गलि जान।।
कागद की नइया बनी, डोरी साहब हाथ।
जौने नाच नचैहें हो, नाचब वोही नाच।।

धरमदास एक बनिया हो करे झूठी बाजार।
साहब कबीर बंजारा हो करै सत्त व्यापार।।
सतगुरु आवो हमरे देस निहारौं बाट खड़ी।
वाही देस की बतिया रे लावै संत सुजान।।
उन संतन के चरण पखारूं तन-मन करि कुर्बान।
वाही देस की बतिया हमसे सतगुरु आन कही।।
आठ पहर के निरखत हमरे नैन की नींद गई।
भूल गई तन-मन-धन सारा व्याकुल भया शरीर।।
विरह पुकारै विरहिनी ढरकत नैनन नीर।
धरमदास के दाता सतगुरु पल में कियो निहाल।।
आवागमन की डोरी कट गई मिटे भरम जंजाल।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-04)

प्रवचन चौथा--दर पे जमी यह नजर

प्रश्न-सार

॰ आप कभी कहते हैं कि परमात्मा के समक्ष भिखारी की तरह जाओ और कभी कहते हैं, सम्राट की तरह जाओ। इस विरोधाभास को समझाने की कृपा करें।
॰ ध्यान की अंतर्यात्रा और भक्ति की अंतर्यात्रा में आधारभूत भिन्नता क्या है?
॰ हम तो साधारण जन हैं और नाटक-सिनेमा, आदि सामान्य सुखों के भी पार नहीं उठ पाते, तो हम श्रद्धा कैसे कर सकेंगे?
॰ दूसरे गुरु के पास जाने पर आपने हमारी जो आलोचना की, उसमें आपका प्रेम तो प्रकट हुआ लेकिन हमारी स्वतंत्रता खंडित हुई।
॰ मैं प्रेम के संबंध में बहुत सोचता हूं। आपकी बातें कभी ठीक लगती हैं, कभी ठीक नहीं भी लगतीं।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन--हम सतनाम के वैपारी

सारसूत्र:

हम सतनाम के वैपारी।
कोई कोई लादे कांसा पीतल, कोई कोई लौंग सुपारी।
हम तो लाद्यो नाम धनी को, पूरन खेप हमारी।।
पूंजी न टूटे नफा चैगुना, बनिज किया हम भारी।
हाट जगाती रोक न सकिहै, निर्भय गैल हमारी।।
मोती बूंद घटहिं में उपजे, सुकिरत भरत कोठारी।
नाम-पदारथ लाद चला है, धरमदास वैपारी।।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-02)

दूसरा प्रवचन--माधव जन्म तुम्हारे लेखे!

प्रश्न-सार

॰ शिष्यों का चोरी-छिपे दूसरे गुरु को सुनने जाना क्या है--जिज्ञासा, अवज्ञा या और अधिक खोज?
॰ आपकी बातें सीधी और साफ होने के बावजूद भी शिक्षाशास्त्रियों तथा राजनीतिज्ञों की समझ में क्यों नहीं आतीं?
॰ भगवान, मैं कितना भाग्यवान हूं कि मुझे आप मिले!
॰ सभी भक्त अपने-अपने धर्मगुरु की प्रशंसा में अतिशयोक्ति क्यों करते हैं?

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-01)

पहला प्रवचन--गुरु मिले अगम के बासी

(दिनांक 31 जनवरी 1978 से 10 फरवरी 1979 तक ओशो आश्रम पूना)

सूत्र:

गुरु मिले अगम के बासी।।
उनके चरणकमल चित दीजै सतगुरु मिले अविनासी।
उनकी सीत प्रसादी लीजै छुटि जाए चैरासी।।
अमृत बूंद झरै घट भीतर साध संत जन लासी।
धरमदास बिनवे कर जोरी सार सबद मन बासी।।
वो नामरस ऐसा है भाई।।

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-03)

क्या सोवै तू बावरी-तीसरा प्रवचन 

प्रश्न: सारे विश्व की दौड़ ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुख को प्राप्त करने के लिए लगी हुई है। लेकिन लोग फिर भी स्थिर नहीं हैं और अशांत हैं--भौतिक सुखों को प्राप्त कर लेने पर भी। इस संबंध में आपकी क्या धारणा है?
ऐसा है अब मेरी धारणा बहुत अजीब है। उसको समझ लें तो एक दृष्टि खुल सकती है। जब एक आदमी धन की तलाश कर रहा है, तो आमतौर से हम सोचते हैं कि वह ईश्वर के विपरीत तलाश कर रहा है। मैं नहीं सोचता। मैं सोचता हूं, वह ईश्वर की ही तलाश कर रहा है। जब एक आदमी पद की तलाश कर रहा है, तो लोग सोचते हैं, वह ईश्वर के विपरीत खोज रहा है। मैं नहीं सोचता, मैं सोचता हूं, ईश्वर को ही खोज रहा है। और इसको मैं यूं लेता हूं।
एक आदमी को हम कल्पना में ले लें--आपको ही ले लूं। मैं आपसे कहूं, आप कितने धन पर तृप्त हो जाएंगे? तो आपका मन एक आंकड़ा तय करेगा, तत्काल और आगे निकल जाएगा कि इससे काम नहीं चलेगा। मैं कोई भी आंकड़ा आपको कहूं, कोई भी संख्या, आपका मन कहेगा: "इससे काम नहीं चलेगा!' इसका क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ हुआ अनंत धन न मिले, तब तक काम नहीं चल सकता।

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-02)

क्या सोवै तू बावरी-प्रवचन-दूसरा 

दिनांक २४ फरवरी, १९६९; के. ई. एम. हास्पिटल, बंबई. 
मेरे प्रिय आत्मन् ,
एक परिवार में मैं मेहमान था। उस परिवार के द्वार पर ही एक पक्षी को, एक सुंदर पक्षी को पिंजड़े में बंद रखा गया। उस पिंजड़े की कांच की दीवालें थीं। शायद उस पक्षी को पता भी नहीं होगा कि उसके और दुनिया के बीच में कोई दीवाल है! कांच की दीवाल तो ट्रांसपेरेंट थी। उसके पार दिखाई पड़ता था। और इसीलिए पक्षी को शायद पता भी नहीं चलता हो कि उसे और आकाश को रोकने वाली कोई बीच में, कोई बाधा है।

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-01)

ओशो द्वारा दिए गए सात प्रवचनों का संकलन।‘अगर कोई भी विचार पहुंचाना हो, लगता हो कि प्रीतिपूर्ण है, पहुंचाने जैसा है, तो उसके लिए बल इकट्ठा करना, संगठित होना, उसके लिए सहारा बनना एकदम जरूरी है। तो उसके लिए तो डिटेल्स में सोचें, विचार करें। लेकिन ये सारी बातें जो मुझे सुझाई हैं, ये सब ठीक हैं।
(दिनांक 1 फरवरी 1969 ओर 27 नवम्बर 1968 के बीच प्रश्नोत्तर चर्चा)

क्या सोवै तू बावरी-प्रवचन-पहला 

दिनांक १ फरवरी, १९६९; ईश्वर भाई के निवास स्थान पर विचार-गोष्ठी, बंबई
तो पहली बात, सबसे पहले तो जैसा कि धीरू भाई ने कहा, जरूर एक ऐसा संगठन चाहिए युवकों का जो किसी न किसी रूप में सैन्य ढंग से संगठित हो। संगठन तो चाहिए ही। और जैसा काकू भाई ने भी कहा, जब तक एक अनुशासन, एक डिसिप्लेन न हो, तब तक कोई संगठन आगे नहीं जा सकता है--युवकों का तो नहीं जा सकता है।
तो काकू भाई का सुझाव और धीरू भाई का सुझाव दोनों उपयोगी हैं। चाहे रोज मिलना आज संभव न हो पाए तो सप्ताह में तीन बार मिलें। अगर वह भी संभव न हो तो दो बार मिलें। एक जगह इकट्ठे हों। एक नियत समय पर, घंटे-डेढ़ घंटे के लिए इकट्ठे हों। और जैसा कि एक मित्र ने कहा कि "मित्रता कैसे बढ़े?'

क्या ईश्वर मर गया है?-(प्रवचन-04)

चौथा प्रवचन--(प्रेम की भाषा)

ईश्वर मर गया है। कैसे पुनरुज्जीवित हो सकता है, इस संबंध में पिछले तीन दिनों में थोड़ी-सी बात मैंने आपसे कही। उस बारे में बहुत से प्रश्न यहां आए हैं। उनमें से थोड़े-से प्रश्नों का, जो कि सभी प्रश्नों के प्रतिनिधि प्रश्न हैं, मैं आपको उत्तर दूंगा।
सबसे पहले तो बहुत-से मित्रों ने यह पूछा है--यह बात सुनकर कि ईश्वर मर गया है, हमें बहुत दुख हुआ है?
आपको दुख हुआ इस बात से, मुझे बहुत खुशी हुई है, क्योंकि मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूं, जिनसे मैंने कहा कि ईश्वर मर गया है तो उन्होंने कहा, मर जाने दो, हर्जा क्या है? मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूं जिनसे मैंने कहा कि ईश्वर मर गया है तो उन्होंने कहा--ईश्वरलाल ठेकेदार? अच्छा आदमी था बेचारा, कैसे मर गया?

क्या ईश्वर मर गया है?-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन--(ज्ञान की पहली किरण)

आज की चर्चा मैं एक छोटी-सी घटना से प्रारंभ करूंगा। एक सराय में मुझे ठहरना था। सराय में बहुत-से लोग ठहरे थे, जगह भी न थी। फिर भी मुझे एक कमरा मिल गया। आधी रात गए, वहां मैं आ गया।
हमेशा ही सभी सरायों  में ऐसे मेहमान आ जाते हैं। इसलिए कोई जगह नहीं होती, लेकिन फिर जगह बनानी पड़ती है। मैं जिस कमरे में था, उस कमरे में ही नए मेहमान को, लाकर ठहरा दिया गया था। कमरा छोटा था और मेहमान ज्यादा हो गए। लेकिन देख कर मैं हैरान हो गया। आधी रात हो गई थी, वह थका हुआ मेहमान, अपनी पगड़ी भी उसने अलग नहीं की, अपने जूते भी नहीं खोले और बिस्तर पर लेट गया, फिर वह करवटें बदलने लगा। फिर भी उसे नींद आने की संभावना मुझे नहीं दिखाई पड़ी तो मैंने उससे पूछा--मित्र! क्या उचित नहीं होगा कि तुम अपने कपड़े उतार दो पगड़ी और जूते अलग कर दो, ताकि आराम से सो सको?

क्या ईश्वर मर गया है?-(प्रवचन-02)

दूसरा प्रवचन--(जो मिटेगा, वही पायेगा)

कल संध्या एक बात मैंने आपसे कही थी। उस संबंध में बहुत-से प्रश्न उपस्थित हुए हैं। मैंने कल आपको कहा कि ईश्वर मर गया है और वह घटना सौभाग्यपूर्ण है, क्योंकि जो ईश्वर मर गया है, वह ईश्वर ही नहीं था। जो मर सकता है, वह ईश्वर ही नहीं है। जो अविरत है। सदा है और शाश्वत है, वही ईश्वर है। उस शाश्वत ईश्वर को जानने के लिए, मनुष्य को स्वयं ही मिटना पड़ता है, ईश्वर को बनाना नहीं पड़ता है। उस शाश्वत ईश्वर को पाने के लिए मनुष्य को ईश्वर निर्मित नहीं करना होता है, वरन स्वयं को ही प्रेरणा देनी होती है और स्वयं को मिटा देना होता है। मनुष्य मिटता है तो ईश्वर उपलब्ध होता है। मनुष्य जब स्वयं को खोता है तो परमात्मा को पाता है। जो ईश्वर मर गया है, वह मनुष्य के द्वारा निर्मित ईश्वर था। मनुष्य ने जिसे बनाया है, वह मिटेगा। उस अनबनाए को, अनिक्रियेटेड को जानना है, जो कि नहीं मिटता है तो मनुष्य को स्वयं को खोना जरूरी है।

क्या ईश्वर मर गया है?-(प्रवचन-01)

क्या ईश्वर मर गया है-(पहला-प्रवचन)

जो मर जाए वह ईश्व
र ही नहीं

एक छोटी सी कहानी से मैं आज की चर्चा प्रारंभ करना  चाहूंगा।
एक सुबह की बात है।
एक पहाड़ से एक व्यक्ति गीत गाता हुआ नीचे उतर रहा था। उसकी आंखों में किसी बात को खोज लेने का प्रकाश था। उसके हृदय में किसी सत्य को जान लेने की खुशी थी। उसके कदमों में उस सत्य को दूसरे लोगों तक पहुंचा देने की गति थी। वह बहुत उत्साह और आनंद से भरा हुआ प्रतीत हो रहा था।
अकेला था वह पहाड़ के रास्ते पर और नीचे मैदान की ओर उतर रहा था। बीच में उसे एक बूढ़ा आदमी मिला, जो पहाड़ की तरफ, ऊपर को चढ़ रहा था।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-11)

ग्यारहवां प्रवचन--(अलोभ की दृष्टि)

 लाभ की दृष्टि से जाना ही छोटी चीज के लिए जाना है। यह बड़ा सवाल नहीं है कि आप किस लाभ की दृष्टि से जाते हैं। आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से जाना भी लोभ ही ले जा रहा है।
प्रश्नः थोड़ा लोभ ही है।
हां। और इसलिए साधु के पास आप पहुंच न पाएंगे। साधु के पास तो आप जब अत्यंत सहज, बिना किसी कारण के जाते हैं, तभी आप लाभांवित होते हैं। लाभ का कारण भी मन में हो, तो भी बाधा पड़ जाती है। असल में, जैसे हम किसी को प्रेम करते हैं, तो कोई भी दृष्टि नहीं होती, लाभ की दृष्टि भी नहीं होती। लाभ मिलता है, यह दूसरी बात है। हम प्रार्थना करते हैं, तो लाभ की दृष्टि हो, तो प्रार्थना नहीं हो पाएगी।
साधु के पास हम जाते हैं, पहुंच नहीं पाते। वह लाभ चाहे धन का हो, चाहे स्वास्थ्य का हो, चाहे अध्यात्म का हो। इतना ही मैं कहूंगा कि आप छोटे लाभ को इनकार कर रहे हैं बड़े लाभ को इनकार नहीं कर रहे हैं। लेकिन छोटा लाभ अगर लोभ है तो बड़ा लाभ बड़ा लोभ है।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-10)

दसवां प्रवचन--(सफलता नहीं, सुफलता)

मैं सीढ़ियां चढ़ रहा हूं, तो मुझे एक सीढ़ी पर पैर रखना पड़ता है ताकि मैं वहां रहा आऊं कम से कम जहां था। और एक पैर उठाता हूं वहां पहुंचने के लिए जहां मुझे पहुंचना है। जब मैं वहां पहुंच जाता हूं तब मैं दूसरा उठाता हूं, क्योंकि यह पैर अब आश्वस्त हो गया है, एक जगह मिल गई है। अब मैं दूसरा उठा लेता हूं, नहीं तो अधर में हो जाऊंगा। अधर का डर इतना ज्यादा है कि दोनों एक साथ नहीं उठा सकता, नहीं तो गिर जाऊंगा। और दोनों एक साथ उठाऊंगा, तो यह भी डर है कि जहां था हो सकता है उससे भी पीछे गिर जाऊं। इसलिए उसको तो मैं पकड़े रहता हूं।
अगर मेरे पास दस हजार हैं तो दस हजार को मैं बचाता हूं और मुझे बीस हजार चाहिए तो मैं बीस हजार के लिए कदम उठाता हूं। दोहरे काम करता हूं। दस हजार को प्रिजर्व करता हूं और बीस हजार की आकांक्षा करता हूं। यह दोनों एक साथ चलेगा।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-09)

नौवां प्रवचन--(प्रयास रहित प्रयास)

हमारा व्यक्तित्व कोई एकदम सरल चीज नहीं है, बहुत जटिल है। बहुत हिस्से हैं, बहुत पहलू हैं। और एक पहलू देखता रहे और दूसरा पहलू रोता रहे, यह भी संभव है। जैसे हम लोग कहते हैं तो ऐसा नहीं है--सजग है पूरी तरह से, साक्षी है पूरी तरह से। उसका अर्थ यह है कि उसकी पूरी चेतना जागी हुई है। लेकिन उसमें फियर रहेगा। वह मन का हिस्सा है। पुराने अनुभव हैं वे मिट गए। मिट नहीं गया, वह मौजूद है। सिर्फ वह हावी नहीं रह गया साक्षी के ऊपर। जैसे कि कल तुझे चोट लगी थी हाथ में और घाव बन गया। उसमें दर्द हो रहा है। और तू साक्षी है। इसका यह मतलब नहीं कि दर्द मिट जाएगा साक्षी होने से। साक्षी होने से दर्द और तेरे बीच में एक फासला हो जाएगा। तो ही तू यह जानेगी कि दर्द हो रहा है, लेकिन कहीं, समव्हेयर। मैं दर्द से घिरा हूं ऐसा नहीं, मैं दर्द हूं ऐसा नहीं, दर्द कहीं हो रहा है, किसी बाउंडरी लाइन पर दर्द हो रहा है।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-08)

आठवां प्रवचन--(जीते-जी मरने की कला)  

प्रश्नः शरीर में कुछ सूक्ष्म शरीर जैसा भी है या नहीं?
एक ही रास्ता है कि जीते-जी शरीर और शरीर की चेतना अलग हो सके। मरने पर तो होती ही है। लेकिन फिर, फिर कोई, फिर कुछ हमारे पास जानने का उपाय नहीं रह जाता। हमारे पास तो एक ही उपाय है कि उसके पीछे केंद्र हैं। और कोई व्यक्ति भावुक...शरीर के बाहर होने को अनुभव कर सके। यह जो अनुभव है, बहुत बार आकस्मिक रूप से हो जाता है, और बहुत लोगों को। सामान्य अनुभव हैं ऐसे ही ये। बहुत असामान्य नहीं हैं। बहुत लोगों को कभी आकस्मिक रूप से हो जाता है--किसी गहरी बीमारी में, कभी कोई गहरी चोट लगने पर, कभी कोई एक्सीडेंट में, कभी कोई बहुत गहरे आघात में, कई बार अनायास यह घटना घट जाती है। प्रयास से भी घट सकती है। और रास्ते भी हैं उस प्रयोग को कर लेने के।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-07)

सातवां प्रवचन--(उपासना का मतलबः पास बैठना)

उपासना का मतलब होता हैः उसके पास बैठना। और जितना द्वैत होगा उतनी आसन से दूरी रहेगी। उतनी उपासना कम होगी। जितना अभेद होगा उतने ही उसके निकट हम बैठ पाएंगे। उपवास का भी वही अर्थ होता है, उपासना का भी वही अर्थ होता है। उपवास का मतलब होता हैः उसके निकट रहना। उसका मतलब भी भूखे मरना नहीं होता।
तो उसके निकट हम कैसे पहुंच जाएं?
और अगर उसकी निकटता में थोड़ी भी दूरी रही तो दूरी रही। तो उसके निकट तो हम वही होकर ही हो सकते हैं। कितनी भी निकटता रही, तो भी दूरी रही। निकटता भी दूरी का ही नाम है। या कम दूरी का नाम ज्यादा दूरी का नाम। तो ठीक निकट तो हम तभी हो सकते हैं जब हम वही हो जाएं। तो यह तो हम जितना साक्षीभाव में जाएंगे, उतना ही हम वह जो द्वैत है उसको छोड़ते हैं और वह तो एक है, वह जो मैं ही हूं, उसमें बैठते हैं।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-06)

छठवां प्रवचन --(मन के पार)

न सुख है, न इतना दुख है और जितना है वह बहुत ध्यान देने योग्य नहीं है। लेकिन हम उसे बहुत बड़ा करके देखते हैं। दोनों को जाग कर देखिए तो दोनों खत्म हो जाते हैं।
प्रश्नः जागना ही सबसे बड़ी चीज है।
हूं।
प्रश्नः पहला ही आपका प्रवचन मैंने सुना, वह राजकुमार वाली बात थी, तलवार से, लकड़ी की तलवार से। बहुत बढ़िया इंट्रेस है। वह पहला प्रवचन। गुरु से किसी भी वक्त मार पड़ सकती है। हर वक्त चैतन्य रूप है, हर वक्त चेतन है। आज भी यही बात का और सिलसिला था, लेकिन यही बात थी।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-05)

पांचवां प्रवचन--(निर्विचार परिपूर्ण शक्ति हेेे)

 (प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
बीस साल में आप रुपया कमा पाए उतना जिससे आप सुख और शांति से रह सकते हैं। लेकिन बीस साल मन का तनाव और चिंता इस हालत में आपको ला दिया कि अब आपके पास कितना ही रुपया हो आप सुख और शांति से नहीं रह सकते। बीस साल में मन को इतना श्रम करना पड़ा, इतनी चिंता करनी पड़ी, उसकी वह आदत हो गई।
प्रश्नः चिंता करने की?
चिंता करने की, बेचैन होने की। वे रूट्स बन गईं चिंता की। जैसे बैलगाड़ी चलती है तो एक रास्ता बन गया। अब बैलगाड़ी के चकों को उसी में फंस कर चलना पड़ेगा। अब इधर-उधर थोड़ी-बहुत देर चलेगी फिर उसी में आ जाएगी। रट बन गई।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-04)

प्रवचन --चौथा --जीवन क्या है?

 प्रश्नः जीवन क्या है?
जब भी कोई पूछता है, जीवन क्या है? तो वह ऐसी बात पूछ रहा है जैसे अंधा आदमी पूछे, प्रकाश क्या है? या कोई आदमी पूछे, स्वाद क्या है? या कोई आदमी पूछे सुगंध क्या है? अगर तुमसे कोई पूछे स्वाद क्या है, तो क्या कहोगे? पूछे सुगंध क्या है, तो क्या कहोगे? जब कोई पूछे, स्वाद क्या है, तो तुम ज्यादा से ज्यादा यह कह सकते हो कि लिया जा सकता है लेकिन कहा नहीं जा सकता। स्वाद चखा जा सकता है, जीया जा सकता है, जाना जा सकता है, लेकिन कहा नहीं जा सकता। और स्वाद तो जीवन का एक अनुभव है, सुगंध जीवन का दूसरा अनुभव है, प्रेम जीवन का तीसरा अनुभव है, पीड़ा जीवन का चैथा अनुभव है, आनंद पांचवां अनुभव है। जीवन के हजार-हजार अनुभव हैं। एक अनुभव को भी नहीं कहा जा सकता और जीवन समग्र अनुभव का जोड़ है। तो एक अनुभव को भी नहीं कहा जा सकता कि क्या है तो समग्र जोड़ को तो कहने का कोई उपाय नहीं रह जाता कि क्या है।

सोमवार, 13 अगस्त 2018

उपासना के क्षण-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन--(श्रद्धा, अश्रद्धा और विश्वास)

अचानक, और कोई बात भी नहीं करता है, आकर हिलाया, आंख खोली तो पूछा कि ईश्वर को जानते हैं? थोड़े झिझक गए। वे झिझके, विवेकानंद वापस कूद गए। उन्होंने चिल्ला कर कहा कि रुको जरा, बात क्या है? विवेकानंद ने कहाः आपकी झिझक ने सब कुछ कह दिया, अब पूछने को मुझे कुछ है नहीं। आपकी झिझक ने सब कह दिया।
रामकृष्ण के पास गए, तो रामकृष्ण से भी वही पूछाः ईश्वर को जानते हैं? तो रामकृष्ण ने कहा कि तुझे जानना है? तू जानेगा?
इसमें, यह जो फर्क है। एक महर्षि देवेंद्रनाथ हैं। रामकृष्ण कुछ भी नहीं जानते देवेंद्रनाथ के मुकाबले। कुछ भी नहीं जानते हैं। जहां शब्द और शास्त्र के जानने का संबंध है। लेकिन यह आदमी है जो शब्द और शास्त्र को नहीं जानता, लेकिन कुछ जानता है। जो एक अलग आयाम है, एक अलग दिशा है चित्त के जानने की।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-02)

 दूसरा प्रवचन--विसर्जन की कला

प्रश्नः आज सबेरे जो आपने बात किया, उस ईश्वर ने का योग जो गीता का मूल-मंत्र जो है उसमें इनसे पहली यही बात बताई है कि जिसका यह सुख और दुख इससे जो ‘पर’ होने की बुद्धि है वह ‘पर’ से जो आसक्ति उठा सकता है और जो उसमें भी समान भाव रख सकता है वही बड़ा पात्र बनता है, यह तत्व-ज्ञान है। यह आत्मा का पात्र ही वहां से शुरू होता है।
ये जो मन में विचारते हैं वही बात आती है। हमारे मन में जो मंथन चल रहा है वही बात आपके लेक्चर में आती है।
हूं, आपके प्रश्न भी दोहरा लें, हां।...
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
हां, आप भी बोलिए।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
ठीक।
हूं, और कोई प्रश्न हों तो वे सब पूछिए।...
हूं, पूछिए, पूछिए।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

हूं-हूं, और कुछ तो नहीं है न अब बात?

उपासना के क्षण-(प्रवचन-01)

पहला प्रवचन -(उपासना के क्षण)
आध्यात्मिक भौतिकवाद
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
इतने चिंतायुक्त हैं कि जो अंतरधारा चिंता की चल रही है वह दिखाई नहीं पड़ रही है। और जब हम इस ऊपर की सतह पर शांत हो जाएंगे, तो अंतरधारा बड़ी चिंता की चलती हुई मालूम होगी, उससे घबड़ाहट होगी और लगेगा यह क्या हो रहा है। उस वक्त भी बिलकुल शिथिल होकर, उस वक्त भी चुपचाप साक्षीभाव रखना चाहिए। उस वक्त भी देखते रहना चाहिए, कुछ नहीं करना चाहिए। कुछ किया कि गड़बड़ शुरू हुई।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
नहीं, कुछ भी मत करिए। वह जो मैंने आज किया, नाॅन-कोआपरेशन करिए। किसी तरह का भी सहयोग मत दीजिए विचार को, चुपचाप बैठे देखें और चले जाएंगे।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं ।)
असल योग ही समझने जैसी बात है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
हां, विचार तो हैं, चल रहे हैं, लेकिन विचार अपने में शक्तिहीन हैं जब तक कि मेरा उसे सहयोग न मिले। जब तक कि मैं उसको शक्ति न दूं। उसमें अपनी कोई शक्ति नहीं है। तो मुझे विचार से कुछ नहीं करना है, मैं जो शक्ति उसे देता हूं, वह भर नहीं देनी है। अभ्यास कुल इतना ही है कि मैं अपनी तरफ से शक्ति न दूं। वे आएं, आने दें; जाएं, जाने दें।

सोमवार, 6 अगस्त 2018

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--1) प्रवचन--04

मन के पार है बोध—प्रवचन—चौथा

      दिनांक 28 दिसम्‍बर, 1973; संध्‍या।
      वुडलैण्‍डस, बम्‍बई।
     
प्रश्न सार:

      1—मनुष्य के लिए दो ही विकल्प हैं—पागलपन या ध्यान। तो क्या मनुष्य अब तक वहाँ पहुंच चुका है? 

2—यदि सम्यक ज्ञान का केंद्र मन के भीतर है, तो उससे वास्तविक तथ्यो का स्‍पष्‍ट—दर्शन कैसे संभव है? और यह केंद्र सम्बोधि के पश्चात सक्रिय होता है या पहले?

3—ध्यान में घटित होने वाले दिव्य अनुभवों की प्रमाणिकता कैसे जांची जाए?

4— क्या जागरूकता भी मन की ही वृत्ति है?

 5—विचारों के स्रोत मस्तिष्क की कोशिकाओं में अंकित संस्कार हैं। कृपया समझाएं कि साक्षी का प्रयोग इनसे मुक्ति कैसे लाता है।

 6—ताओ, तंत्र, भक्ति और योग आदि विषयों पर आप इतनी आत्मीयता से कैसे बोल पाते हैं?

बुधवार, 1 अगस्त 2018

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-028) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय--3)  प्रवचन-दसवां

वासना की धूल, चेतना का दर्पण

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।। ३८।।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।। ३९।।
जैसे धुएं से अग्नि और मल से दर्पण ढंक जाता है (तथा) जैसे स्निग्ध झिल्ली से गर्भ ढंका हुआ है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढंका हुआ है।
और हे अर्जुन! इस अग्नि (सदृश) न पूर्ण होने वाले कामरूप ज्ञानियों के नित्य वैरी से ज्ञान ढंका हुआ है।
कृष्ण ने कहा है, जैसे धुएं से अग्नि ढंकी हो, ऐसे ही काम से ज्ञान ढंका है। जैसे बीज अपनी खोल से ढंका होता है, ऐसे ही मनुष्य की चेतना उसकी वासना से ढंकी होती है। जैसे गर्भ झिल्ली में बंद और ढंका होता है, ऐसे ही मनुष्य की आत्मा उसकी कामना से ढंकी होती है। इस सूत्र को ठीक से समझ लेना उपयोगी है

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-027) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय--3 )   प्रवचन-9

परधर्म, स्वधर्मऔर धर्म

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। ३५।।
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से,
गुणरहित भी, अपना धर्म अति उत्तम है।
अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी निजता, अपनी इंडिविजुएलिटी है। प्रत्येक व्यक्ति का कुछ अपना निज है; वही उसकी आत्मा है। उस निजता में ही जीना आनंद है और उस निजता से च्युत हो जाना, भटक जाना ही दुख है।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-026) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय --3)  प्रवचन-आठवां

श्रद्धा है द्वार

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्तेऽपिकर्मभिः।। ३१।।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्व ज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः।। ३२।।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेज्र्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।। ३३।।
और हे अर्जुन जो कोई भी मनुष्य दोषबुद्धि से रहित और श्रद्धा से युक्त हुए सदा ही मेरे इस मत के अनुसार बर्तते हैं, वे पुरुष संपूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं। और जो दोषदृष्टि वाले मूर्ख लोग इस मेरे मत के अनुसार नहीं बर्तते हैं, उन संपूर्ण ज्ञानों में भ्रमित चित्त वालों को तू कल्याण मार्ग से भ्रष्ट हुए ही जान। क्योंकि सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव से परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा!

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-025) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय-- 3)   प्रवचन-सातवां

अहंकार का भ्रम

तस्वविसु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते।। २८।।
परंतु हे महाबाहो, गुण-विभाग और कर्म-विभाग को जानने वाला ज्ञानी पुरुष, संपूर्ण गुण गुणों में ही बर्तते हैं, ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता है।
जीवन को दो प्रकार से देखा जा सकता है। एक तो, जैसे जीवन का केंद्र हम हैं, मैं हूं और सारा जीवन परिधि है। कील मैं हूं और सारा जीवन परिधि है। अज्ञान की यही मनोदशा है। अज्ञानी केंद्र पर होता है, सारा जगत उसकी परिधि पर घूमता है। सब कुछ उसके लिए हो रहा है और सब कुछ उससे हो रहा है। न तो वह यह देख पाता है कि प्रकृति के गुण काम करते हैं, न वह यह देख पाता है कि परमात्मा की समग्रता कर्म करती है।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-024) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय -3)  -प्रवचन-छठवां

वर्ण व्यवस्था की वैज्ञानिक पुनर्स्थापना

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।। २२।।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। २३।।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।। २४।।
इसलिए हे अर्जुन, यद्यपि मुझे तीनों लोकों में कुछ भी कर्तव्य नहीं है तथा किंचित भी प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्त नहीं है, तो भी मैं कर्म में ही बर्तता हूं। क्योंकि यदि मैं सावधान हुआ कर्म में न बर्तूं, तो हे अर्जुन, सब प्रकार से मनुष्य मेरे बर्ताव के अनुसार बर्तने लग जाएं। तथा यदि मैं कर्म न करूं, तो ये सब लोग भ्रष्ट हो जाएं और मैं वर्णसंकर का करने वाला होऊं तथा इस सारी प्रजा का हनन करूं अर्थात इनको मारने वाला बनूं।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-023) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय --3) प्रवचन-पांचवां

पूर्व की जीवन-कला: आश्रम प्रणाली

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।। १६।।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।। १७।।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।। १८।।
हे पार्थ, जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार चलाए हुए सृष्टि-चक्र के अनुसार नहीं बर्तता है (अर्थात शास्त्र के अनुसार कर्मों को नहीं करता है), वह इंद्रियों के सुख को भोगने वाला पाप-आयु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-022) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय --3 ) प्रवचन-चौथा

समर्पित जीवन का विज्ञान

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्तेस्तेन एव सः।। १२।।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुग्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।। १३।।
तथा यज्ञ द्वारा प्रेरित हुए देवता लोग तुम्हारे लिए, बिना मांगे ही प्रिय भोगों को देंगे। उनके द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनके लिए बिना दिए ही भोगता है, वह निश्चय चोर है।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-021) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय --3) -प्रवचन-तीसरा 

परमात्म समर्पित कर्म

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽनर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।। ७।।
और हे अर्जुन, जो पुरुष मन से इंद्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ कर्मेंद्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।
मनुष्य के मन में वासना है, कामना है। उस कामना का परिणाम सिवाय दुख के और कुछ भी नहीं है। उस वासना से सिवाय विषाद के, फ्रस्ट्रेशन के और कभी कुछ मिलता नहीं है। लगता है, मिलेगा सुख, मिलता है सदा दुख। लगता है, मिलेगी शांति, मिलती है सदा अशांति। लगता है, उपलब्ध होगी स्वतंत्रता, लेकिन आदमी और भी गहरे बंधन में बंधता चला जाता है। कामना मनुष्य का दुख है, तृष्णा मनुष्य की पीड़ा है।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-020) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय -3)  प्रवचन-दूसरा --कर्ता का भ्रम

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म प्रकृतिजैर्गुणैः।। ५।।
सर्वथा कर्मों का स्वरूप से त्याग हो भी नहीं सकता है, क्योंकि कोई भी पुरुष किसी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता है। निःसंदेह सभी पुरुष प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों द्वारा परवश हुए कर्म करते हैं।
जीवन ही कर्म है। मृत्यु कर्म का अभाव है। जन्म कर्म का प्रारंभ है, मृत्यु कर्म का अंत है। जीवन में कर्म को रोकना असंभव है। ठीक से समझें, तो जीवन और कर्म पर्यायवाची हैं। एक ही अर्थ है उनका। इसलिए जीते-जी कर्म चलेगा ही। इस संबंध में मनुष्य की कोई स्वतंत्रता नहीं है।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-019) ओशो

गीता दर्शन, (अध्याय- 3)  प्रवचन-पहला

स्वधर्म की खोज

श्रीमद्भगवद्गीता

अथ तृतीयोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।। १।।
अर्जुन ने कहा, हे जनार्दन, यदि कर्मों की अपेक्षा ज्ञान आपको श्रेष्ठ मान्य है, तो फिर हे केशव, मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
जीवन का सत्य कर्म से उपलब्ध है या ज्ञान से? यदि कर्म से उपलब्ध है, तो उसका अर्थ होगा कि वह हमें आज नहीं मिला हुआ है, श्रम करने से कल मिल सकता है। यदि कर्म से उपलब्ध होगा, तो उसका अर्थ है, वह हमारा स्वभाव नहीं है, अर्जित वस्तु है। यदि कर्म से उपलब्ध होगा, तो उसका अर्थ है, उसे हम विश्राम में खो देंगे। जिसे हम कर्म से पाते हैं, उसे निष्कर्म में खोया जा सकता है।