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रविवार, 22 नवंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--21)

ओशो के कार्य को समर्पित होना—(अध्‍याय—इक्‍कीसवां)

शो के साथ रहते, उनको सुनते, ध्यान करते, धीरे— धीरे दिखाई देने लगा था कि अब मेरे लिए व्यवसाय की दुनिया में बने रहना मुश्किल होता जा रहा है। जोड़—तोड़, मारा—मारी, भागम— भाग, महत्वाकांक्षा, जितना है उतना पर्याप्त नहीं है, दौड़ते रहो, प्रतियोगिता, इसके पहले कि कोई दूसरा आगे निकल जाए या हमसे अधिक कमा ले हमें सबसे आगे निकलना है...। इस अंधी दौड़ को ओशो संदेश के उजाले में जीवन में जारी रखना मुश्किल होता जा रहा था। यह स्पष्ट ही दिखाई देने लगा कि जीवन में अर्थ की जरूरत होती है लेकिन इतनी भी नहीं कि सारा जीवन ही उसके लिए दांव पर लगा दिया जाए। अर्थ तो माध्यम मात्र है, अर्थ लक्ष्य तो हो ही नहीं सकता।
इस सरल—सी समझ के साथ जब मैं यह देखता कि ओशो हमें उस यात्रा पर ले जा रहे हैं जहां अंतिम लक्ष्य हासिल हो सकता है, जहां पहुंचकर और कुछ पाना शेष नहीं रहता है। ओशो की अज्ञात की यात्रा का आमंत्रण हृदय में गहरे तक उतरता जा रहा था।
मैं पूरे मन से अर्थ कमाने के सभी कामों में लगा रहने की कोशिश करता लेकिन जो कर रहा हूं उसकी निरर्थकता और जो करना चाहिए, उसकी सार्थकता इतनी जोर पकड़ती जा रही थी कि दोनों नावों पर सवारी दिन पर दिन मुश्किल हो गई। तब मैंने निर्णय लिया कि अब पूरी ऊर्जा एक ही दिशा में लगानी चाहिए। संसार के आकर्षण अपनी जगह है लेकिन ओशो का बुलावा अधिक आकर्षक लगने लगा।
मैंने अपना निर्णय अपने प्रियजनों को सुना दिया कि अब मैं ओशो के कार्य में संलग्न होना चाहता हूं। स्वाभाविक ही सभी को अजीब लगा, समझाने की कोशिश की, लेकिन जब मेरा निर्णय नहीं बदला तो मैंने हमारा कोरेगांव पार्क वाला बंगला 'मल्होत्रा भवन' छोड़ दिया और अपने परिवार को लेकर येरवडा स्थित छोटे से घर में आ गया। जितनी भी मेरे ऊपर जिम्मेदारियां थीं, जो काम मैं कर रहा था, धीरे— धीरे उन्हें छोडता चला गया। एक दिन बाहर से पूरी तरह से मुक्त हो कर ओशो के पास आ गया। मैंने ओशो को लिखा कि 'मैं अपना जीवन आपको समर्पित करता हूं आपको मेरे से जो करवाना हो करवाएं।और इस तरह से ओशो के कार्य में स्वयं को डुबा दिया।
मुझे आश्रम में सबसे पहले किताबों के गोडाउन में कार्य मिला। वहां मैं स्वामी सुभाष के साथ काम करता था। दिन भर किताबों को जमाना, जो किताबें छप कर आती, उन्हें गाडी से खाली करना, हिसाब—किताब रखना। वहां मैंने अनुभव किया कि कार्य कितना सरल, सहज और आनंद देने वाला हो सकता है। काम करते जरा भी थकान का आना या यह भाव आना कि काम करना पड रहा है, ऐसा जरा भी नहीं होता। इसके विपरीत कब दिन निकल जाता और सारा दिन काम करने के बाद भी यूं लगता कि अभी भी तरोताजा हैं, जैसे कि कुछ किया ही ना हो।
एक और बात वहां मैंने अनुभव की कि जो हमसे काम लेने वाले मित्र थे। वे बहुत ही प्यार से काम लेते थे। मैंने पाया कि काम लेने का यह भी तो एक मानवीय ढंग होता है। मुझे याद आया कि मैं किस तरह से अपनी फैक्ट्री में मजदूरों से काम लेता था, उन्हें डांटना—डपटना, चिल्लाना, उनसे जितना हो सके उतना काम लेना, उनसे ऐसे व्यवहार करना मानो कि वो इंसान ही ना हों और यहां कितने प्यार से, अपनेपन से काम लिया जाता है और यहां काम अधिक होता है।
एक दिन स्वामी सुभाष ने बुलाकर मुझे बोला कि 'स्वभाव ये किताबों के जेकैट्स हैं, इनकी गिनती करना है।मैंने थोड़ी देर तो उनको गिना फिर सुभाष को बोला ' स्वामी जी, यदि मैं सौ जेकैट्स की गिनती कर लूं और उन्हें तोल लूं कि उनका वजन कितना है तो मैं इन हजारों जेकैट्स को बहुत आसानी से गिन सकता हूं।पहले तो सुभाष ने ना की फिर बोला 'ठीक है ऐसा कर लो।और मैंने दो दिन लाखों जेकैट्स के गिनती कर ली। इन छोटे—छोटे से लगने वाले कामों को करते बहुत आनंद आता था। तन—मन व आत्मा सभी तलों पर अत्यंत तृप्ति मिल रही थी। ओशो की बातें स्मरण आती कि 'इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या करते हो, फर्क इससे पड़ता है कि तुम कैसे करते हो।जितना प्रेम, समग्रता और आनंद के भाव से काम करो उतना ही काम, काम नहीं रह जाता पूजा हो जाता है। यह मैं स्वयं अनुभव कर रहा था।
एक बात ओशो के साथ यह भी है कि वे हमें कहीं भी रुकने नहीं देते। क्योंकि जैसे ही हम किसी भी तल शरीर या मन पर रुकते हैं और हम जड़ होने लगते हैं, मृत होने लगते हैं, हमारी आसक्तिया और पकड़ बनने लगती है। तो बाहरी स्थितियां—परिस्थितियां भी ओशो बदलते रहते। जब तक ओशो शरीर में रहे, उन्होंने अपने पूरे कार्य को, सभी संन्यासियों को चलाये रखा। चरैवेति—चरैवेति बुद्ध का वचन ओशो ने हमेशा ही यथार्थ बनाये रखा। एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब कोई नया परिवर्तन, कोई नया मोड़ या कोई नई ऊंचाई नहीं आती। मन पुराने को पकड़ता है, कोई भी काम हम कर रहे हों तो समय के साथ उसकी आदत बन जाती है, पकड बन जाती है, जब उस काम से हमें अलग किया जाए तो बड़ी बेचैनी होती है, लेकिन विकास के लिए नई—नई राहें बहुत सहयोगी होती हैं।
ओशो के आसपास बहुत शुरू से ही सभी के काम बदलते रहते थे। जब मैं डिस्पैच में अच्छे से काम करने लगा तो एक दिन मुझे लक्ष्मी ने बुलाकर बताया कि पुणे के ही नजदीक सासवड नामक स्थल पर 294 एकड़ जमीन ली है। ओशो चाहते हैं कि आप वहां जाएं और उस जगह का रखरखाव व निर्माण कार्य देखें। मैं दस—पंद्रह मित्रों के साथ सासवड़ चला गया। वहां एक पुराना किला था उसमें हम रहने लगे। वहां पर अमरुद, जामुन और सीताफल के बड़े—बड़े वृक्ष थे। एक कूआ खुदवायां। वहां पास ही स्थित पहाड़ी पर ओशो का भवन बनना था तो वहां तक के लिए रास्ता बनवाया। जिस दिन इस कार्य का शिलान्यास होना था, उस दिन करीब दस हजार मित्रों को आमंत्रित किया गया कि आज ओशो के आवास के निर्माण का प्रारंभ होना है। दस हजार से अधिक मित्र अपने—अपने संसाधनों से वहां आ गए। सभी मित्रों के लिए भोजन बनवाया गया, बड़े—बड़े दरवाजे बनवाये गए। उनका स्वागत किया गया। चारों तरफ भगवा कपड़ों में नाचते—गाते संन्यासी, भजन—कीर्तन, ढोल—ढमाके बज रहे थे। बड़ा ही सुहाना उत्सव था। उसी दिन स्थानीय लोगों ने इस सारे प्रोजेक्ट का विरोध भी किया। लेकिन कितने ही अवरोधों के बावजूद वहां कार्य तेजी से चलता रहा।
हम सभी मित्र जंगल में मंगल मनाने लगे। रोज सुबह ओशो का प्रवचन सुनने हम सभी गाड़ी में आ जाते और प्रवचन के पश्चात वहां चले जाते। संध्या दर्शन के लिए भी आना हो जाता था।
आज इति।