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मंगलवार, 10 नवंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादे--(अध्‍याय--4)

माइकल मेरे दोस्‍त(अध्‍यायचौथा)

साधना की राह पर जैसे—जैसे हम स्वयं पर काम करते हैं। अपने शरीर, मन और अचेतन पर विभिन्न साधनाओं का असर होने लगता है, तो तरह—तरह के अनुभव होते हैं। हमने पता नहीं कितने जन्मों से अपने भीतर की यात्रा नहीं की है। जब पहली बार अपने भीतर मुड़ते हैं, अपने भीतर के जगत के संपर्क में आते हैं, तो नई—नई चीजों से आमना—सामना होता है।

ओशो की ध्यान विधियां आधुनिक मन के लिए बहुत ही कारगर हैं। ओशो ने आधुनिक मन को, आज की समस्याओं को देख कर ठीक सटीक विधियों का निर्माण किया है। हर बुद्ध अपने समय में जैसे लोग उनके सामने होते हैं, जो समस्याएं उनकी होती हैं, उसके अनुसार ध्यान विधियों का निर्माण करता है। अब बुद्ध के जमाने में लोग आज की तरह इतने दमित, कुंठित और मन में जीने वाले नहीं थे। लोगों ने इतना मानसिक कचरा अपने भीतर इकट्ठा नहीं किया था। आज शिक्षा के नाम पर, संस्कार और सभ्यता के नाम पर हर व्यक्ति पता नहीं कितना बोझा अपने भीतर ढोये चला जा रहा है। ओशो की ध्यान विधियां इससे सहज ही मुक्ति दिला देती हैं। जब भार उतरता है या कम होता है तो बहुत राहत महसूस होती है, बहुत विश्रांति और आनंद आता है।
ध्यान साधना में होने वाली कुछ अनुभूतियां यहां पर सिर्फ इसलिए ताकि हमारे सहयात्री उससे फायदा ले सकें।
एक बार माथेरान में ओशो का ध्यान शिविर चल रहा था। यह बहुत शुरुआत के दिनों की बात है। तब मैंने संन्यास भी नहीं लिया था। सुबह ओशो सक्रिय ध्यान करवा रहे थे। मैं पूरी ऊर्जा और त्वरा से ध्यान में उतरा था। ध्यान के बाद अचानक मुझे लगा कि आकाश में कोई बडी दाढी वाला माइकल नामक व्यक्ति मुझे अपनी तरफ हाथ से इशारा कर रहा है। मैं उसके हाथ को पकड़ने की कोशिश करता हूं लेकिन मैं पकड़ नहीं पाता हूं। मैं उसकी तरफ दौड़ता हूं। मैं चिल्लाता जा रहा हूं ' माइकल, माइकल मेरे दोस्त तेने वादा किया था यहां मिलने का, तूने वादा किया था यहां मिलने का।इस तरह से चिल्लाते हुए मैं ओशो की तरफ तेजी से बढता हूं।
ओशो स्टेज पर विराजमान थे। वो जो माइकल में चित्र दिख रहा था वह ओशो का ही था। मैं ओशो की तरफ बढ़ा, लोगों ने मुझे रोकने का प्रयास किया लेकिन मैं इतना तेजी से जा रहा था कि कोई मुझे रोक नहीं पाया। मैं स्टेज पर जाकर ओशो से लिपट गया, उनकी दाढ़ी से खेलने लगा और होठों पर होठ रख कर चुंबन लिया। इस बीच ओशो ने धीरे से अपना हाथ मेरे कमर में डाल दिया और अपने साथ अपने कक्ष में ले गये। कमरे में जाकर उन्होंने अपनी हथेली से जरा सा मेरी तीसरी आख पर धक्का दिया। मैं धड़ाम से दूर जा गिरा।
मुझे कब होश आया पता नहीं, मैं उठा, मैं जब उठा तो मैं पाता हूं मैं पूरी तरह निर्भार हो गया हूं मेरा वजन है ही नहीं, मानो जमीन पांवों के नीचे है ही नहीं। बाहर निकल कर धीरे— धीरे गया और एक पेड़ के नीचे बैठ गया। फिर धीरे— धीरे अपना वजन फिर आने लगा। मैंने यह घटना लिख कर ओशो को दीया। ओशो ने कहा कि 'साधना में कई पड़ाव आते हैं, साधना जारी रखो।

आज इति