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सोमवार, 10 दिसंबर 2018

नहीं सांझ नहीं भोर-(प्रवचन-09)

नौवां प्रवचन

मुक्ति का सूत्र

सारसूत्र:

बहु बैरी घट में बसैं, तू नहिं जीतत कोय।
निस-दिन घेरे ही रहैं, छुटकारा नहिं होय।।
या मन के जाने बिना, होय न कबहूं साध।
जक्त-वासना ना छुटै, लहै न भेद अगाध।।
सरकि जाय बिष ओरहिं, बहुरि न आवै हाथ।
भजन माहिं ठहरै नहीं, जो गहि राखूं नाथ।।
इन्द्री पलटैं मन विषै, मन पलटै बुधि माहिं।
बुधि पलटै हरि-ध्यान में, फेरि होय लय जाहिं।।
तन मन जारै काम हीं, चित कर डांवाडोल।
धरम सरम सब खोय के, रहै आप हिय खोल।।
मोह बड़ा दुख रूप है, ताकूं मारि निकास।
प्रीत जगत की छोड़ दे, जब होवै निर्वास।।

जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों अम्बुज सर माहिं।
रहै नीर के आसरे, जल छूवत नाहिं।।
जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों जिहवा मुख माहिं।
घीव घना भच्छन करै, तो भी चिकनी नाहिं।।
जा घट चिन्ता नागिनी, ता मुख जप नहिं होय।
जो टुक आवै याद भी, उहीं जाय फिर खोय।।
आसा नदिया में चलै, सदा मनोरथ-नीर।
परमारथ उपजै, बहै, मन नहिं पकरै धीर।।
अभिमानी मींजे गए, लूट लिए धन बाम।
निर अभिमानी हो चले, पहुँचे हरि के धाम।।
चरनदास यों कहत हैं, सुनियो संत सुजान।
मुक्तिमूल आधीनता, नरकमूल अभिमान।

अनाहत
एक गीत
मन में है तुम्हारे
एक तार पर सितार के
एक
नदी की लहर में है
एक प्राण में बयार के
एक
घास के मैदान में
हर-हर है
एक
जर्जर है
पीले गिरे पत्ते में
एक बीज में भी है
वैसा ही
जैसा तुम्हारे मन में है
फूटेगा उतना ही
बीज के उर से वह अंकुर में
निकल कर मन से
लहर रहा है जितना
सितार के तार पर।

मनुष्य एक वीणा है। अपूर्व संगीत की संभावना हे। लेकिन जहां संगीत की संभावना है, वहां विसंगीत की भी संभावना है।
सितार कुशल हाथों में हो, तो गीत पैदा होगा। अकुशल हाथों में हो, तो शोरगुल। सितार वही है, हाथ की कुशलता चाहिए कला चाहिए।
जीवन तो वही है; सभी के पास वही है। बुद्ध के पास वही, तुम्हारे पास वही; कृष्ण के पास वही, क्राइस्ट के पास वही। एक सा वीणा मिली है, और एक सा संगीत मिला है। लेकिन वीणा से संगीत उठाने की कला सीखनी जरूरी है। उस कला का नाम ही धर्म है।
तुम्हारे जीवन को जो संगीतमय कर जाए, वही धर्म। तुम्हारे जीवन में जो फूल खिला जाए, वही धर्म। तुम्हारे जीवन का जो कीचड़ से कमल बना जाए, वही धर्म।
और ध्यान रखना; क्षण भर को भी न भूलनाः बीज तुम में उतना ही है, जितना बुद्ध में। हो तुम भी वही सकते हो। न हो पाए, तो तुम्हारे अतिरिक्त कोई जिम्मेवार नहीं।
संभावना मिली है; संभावना को वास्तविक में बदलना ही साधना हेै। और क्या साधना है? जो बीज की तरह पड़ा है तुम्हारे भीतर, वह फूटे, अंकुर बने, बड़ा वृक्ष बने। उसमें फूल आएं, उसमें पक्षी घर बनाएं; आकाश के बादल उसकी उत्तुंग शाखाओं से गुफ्तगू करें; चांद-तारे उसके साथ रास रचाएं।
बीज तो कंकड़ जैसा मालूम होता है। लेकिन मालूम ही होता है कंकड़ जैसा। कंकड़ को बोओगे, तो कुछ पैदा न होगा। बीज कंकड़ जैसा दिखाई पड़ता है, लेकिन एक संसार भीतर छिपा है, एक पूरा विश्व भीतर छिपा है।
वनस्पति शास्त्री कहते हैंः एक बीज मिल जाए, तो सारी पृथ्वी को हरियाली से भरा जा सकता है--इतना उसमें छिपा पड़ा है। एक बीज पर्याप्त है। एक बीज के वृक्ष में हजारों-लाखों बीज होंगे। फिर एक-एक बीज में फिर लाखों बीज होंगे। थोड़े ही दिनों में सारी पृथ्वी--सारी पृथ्वी क्या--सारा ब्रह्मांड--एक बीज, हरियाली और फूलों से भर दे सकता है।
छोटा सा बीज छोटा नहीं है। अण में विराट समाया है, ऐसा ही मनुष्य में परमात्मा छिपा है। तुम छोटे नहीं हो। तुम छोटे दिखाई पड़ते हो। दिखाई पड़ने की भ्रांति में मत पड़ जाना। जो दिखाई पड़ता है, वही सच नहीं होता। जितना दिखाई पड़ता है, उतना ही सच नहीं होता। सच तो वह है, जो तुम हो सकते हो। वही तुम्हारा वास्तविक होना है--जो तुम हो सकते हो। तुम्हारे भीतर अनंत भविष्य छिपा है।
‘अनाहत एक गीत, मन में है तुम्हारे।’ और ऐसा है यह गीत--अनाहत है; आहत नहीं है। कुंवारा है। सदा से कुंवारा है। सदा से शुद्ध है, शुद्ध है। जरा भी कोई कालिख उस पर न लगी है, न लग सकती है। जरा भी पाप उसे न छुआ है, न छू सकता है। लेकिन अप्रकट पड़ा है। उसकी अभिव्यंजना नहीं हुई। तुमने उसे पुकारा नहीं। तुमने उसका आहवान नहीं किया। तुमने उसे निमंत्रण नहीं दिया। तुमने उसकी तरफ आँख ही नहीं की।
तुम ऐसे ही जीए चले जा रहे हो, जैसे बाहर ही सब है। धन में, पद में, मद में, तुम ऐसे जीए चले जा रहे हो, जैसे बाहर ही सब है। बाहर कुछ भी नहीं है। बाहर तो बस, राख ही राख है। जो है--भीतर है।
सोना भीतर है, मिट्टी बाहर है। और जो बाहर में ही भटका रहा, उसे यह अनाहत गीत कभी सुनाई न पड़ेगा। और जिसने यह अनाहत गीत न सुना, उसने परमात्मा को न सुना। जिससे यह अनाहत गीत न सुना, उसके जीवन में उत्सव आया ही नहीं; वसंत आया ही नहीं। आने को तत्पर था, उसने बुलाया ही नहीं। आ भी गया था, द्वार पर भी खड़ा था, तो द्वार न खोले।
तुम पतझड़ में जाओगे, अगर तुमने भीतर के संगीत को न उठाया, न जगाया।
उस संगीत को कैसे जगाया जाए, उसकी ही कला के सारे सूत्र आज के चरणदास के पदों में है इन पर ध्यान देना।
बहु बैरी घट में बसैं, तू नहिं जीतत कोय।
निस-दिन घेरे ही रहें, छुटकारा नहिं होय।।
पहली बात, मित्र भी भीतर है और शत्रु भी भीतर है। मित्र एक है, शत्रु अनेक है। इसे समझो।
सत्य तो एक होता है, असत्य अनेक होते है। असत्य तो जितने चाहो ग. लो। असत्य तो तुम ग.ते हो, सत्य को तो ग.ा नहीं जाता। सत्य को तो केवल अनुभव किया जाता है। सत्य तो है ही; उघाड़ना होता है, आविष्कार करना होता है--ग.ना नहीं होता।
झूठ ग.े जाते हैं। झूठ तुम बनाते हो। तो जितने चाहो, बना लो। लेकिन सत्य तो तुम्हारे हाथ के बाहर है; तुम उसे बना नहीं सकते--उघाड़ सकते हो, परदा उठा सकते हो।
और यह बात ख्याल में लेना कि सत्य एक है और असत्य अनेक हैं, जैसे स्वास्थ्य एक और बीमारियाँ अनेक हैं।
तुमने दोे तरह के स्वास्थ्यों की बात सुनी? कोई भी स्वस्थ हो, स्वास्थ्य एक है। बच्चा हो कि बू.ा, स्त्री हो कि पुरुष, पशु हो कि पक्षी, जो भी स्वस्थ है, स्वास्थ्य का कोई विशेषण नहीं; बस स्वस्थ है। तुम उसे नाम न दे सकोगे। जब एक ही है, तो नाम कैसे दोेगे? नाम की जरूरत तो तब पड़ती है, जब अनेक हों। बहुत हों, तो नाम देने पड़ते है, ताकि भेेद हो सके। इसलिए तो परमात्मा का कोई नाम नहीं है।
परमात्मा एक है, उसका नाम कैसे हो? बहुत होते, तो नाम हो जाता। बहुत होते, तो नाम रखना ही पड़ता।
तो हम जो परमात्मा के नाम रख लिए हैं, वे तो हमारे कामचलाऊ नाम हैं। राम कहो, हरि कहो, अल्लाह कहो, खुदा कहो, रहमान कहो, रहीम कहो--जो कहना हो; पर सब नाम हमारे ही ईजाद किए हुए हैं। उसका कोई भी नाम नहीं। वह अनाम है।
सत्य अनाम है, क्योंकि एक है। स्वास्थ्य अनाम है, क्योंकि एक है।
बीमारियों के बड़े नाम हैं। रोज-रोज खोज होती जाती है, नई-नई बीमारियां पकड़ में आती जाती हैं। बीमारियों को याद करना पड़ता है।
चिकित्सक प.ता है विश्वविद्यालय में, तो कितनी हजारो बीमारियों के नाम याद रखने पड़ते है! हजारों बीमारियों के लक्षण याद रखने पड़ते हैं। स्वास्थ्य का न तो कोई लक्षण है, न कोई परिभाषा है। स्वास्थ्य की परिभाषा तो बस, इतनी ही है--कि कोई बीमारी न हो। वह जो हजारो-हजारों बीमारियाँ हैं, वे न हों तो आदमी स्वस्थ होता है।
स्वास्थ्य की सीधी परिभाषा भी नहीं है। स्वास्थ्य की परिभाषा यही है कि क्षयरोग न हो, कैंसर न हो, मलेरिया न हो--यह न हो, वह न हो--जब नहीं हो कोई बीमारी, तो जो शेष रह जाता है, वही स्वास्थ्य है।
स्वास्थ्य तो ऐसे है, जैसे शून्य। कमरे में कुछ भी न हो, फर्नीचर न हो, दीवाल घड़ी न हो, कपड़े-लते न हों, आलमारी न हो--कुछ भी न हो, तो शून्य होता है। ऐसे ही तुम्हारे भीतर जब कोई भी बीमारी नहीं होती, तो जो शून्य रह जाता है, वही स्वास्थ्य है।
और ऐसे ही जब तुम्हारे चित्त में कोई भी विचार नहीं रह जाता, तो जो शून्य रह जाता है, वही बुद्धत्व है। आत्मिक-स्वास्थ्य का नाम बुद्धत्व है। आत्मिक-स्वास्थ्य का नाम परमात्म-स्थिति है।
पहला सूत्र चरणदास काः ‘बहु बैरी घट में बसै, तू नहीं जीतत कोय।’ और बहुत शत्रओं का वास है भीतर। जन्मों-जन्मों मे न मालूम कितने रोग पाल लिए हैं। न मालूम कैसे-कैसे रोगों से दोेस्ती बना ली है। न मालूम कैसे-कैसे रोग आदत के हिस्से बन गए हैं। तोः ‘बहु बैरी घट में बसै, तू नहीं जीतत कोय।’ और वह जो तू है, वही एक मित्र है। वह जो भीतर चैतन्य है, वही एक मित्र है। और वह चैतन्य न मालूम कितने शत्रुओं में घिरा है। काम है, क्रोध है, लोभ है, मोह है, ईष्र्या, मद-मत्सर--और न मालूम क्या-क्या। उन सब में घिरा है।
मित्र तो तुम्हारा एक ही है--चैतन्य, चेतना, बोध, साक्षी। लेकिन साक्षी बहुत रोगों में घिरा है। जहाँ भी तादात्म्य हो जाता है, वहीं साक्षी खो जाता है, वहीं रोग पकड़ गया।
क्रोध की लहर उठी, तुम क्रोध नहीं हो। तुम कभी क्रोध नहीं हो सकते। तुम तो जानने वाले हो,
देखने वाले हो, जिसके सामने क्रोध उठता है, क्रोध का धुआं जिसके सामने फैलता है। जैसे आकाश में
बादल उठे। आकाश बादल नहीं है। या जैसे सूरज को चारों तरफ से काली बदलियों ने घेर लिया। सूरज
बदलियां नहीं है। ऐसे ही तुम क्रोध की बदलियां से घिर जाते हो।
लेकिन जब तुम क्रोध से घिरते हो, तो तुम यह भूल ही जाते हो कि मैं अलग-थलग, भिन्न हूं, कि मैं चैतन्य हूं। क्रोध के साथ एक ही हो जाते हो। तुम मान ही लेते हो कि यही मैं चैतन्य हूं। तुम क्रोध हो जाते हो। क्रोधमय हो जाते हो। तुम पर क्रोध की छाया ऐसी पड़ती है कि तुम्हें स्मरण ही नहीं रह जाता--अपने अलग-थलग होने का, अपने भिन्न होने का। तादात्म्य हो जाता है क्रोध से। यही रोग है। रोग अनेक हैं। लेकिन सभी रोगों से जुड़ने का ंग एक है। चाहे क्रोध से जुड़ो, चाहे मोह से, चाहे अहंकार से, चाहे किसी और बीमारी को पकड़ो, लेकिन पकड़ने का ंग एक है। वह ंग है--तादात्म्य।
जिस रोग के साथ तुम्हारा संबंध बन जाता है, तुम समझते हो--यही मैं हूं। बस, इस तादात्म्य को तोड़ने लगो, तो जीत शुरू हो जाती है। तादात्म्य ब.ता जाए, तो हार होती चली जाती है।
‘बहु बैरी घट में बसै, तू नहीं जीतत कोय।’ बड़े दुश्मन घर में बसे हैं और तू बाहर जीतने के लिए चला है! औैर घर भी हारा हुआ है। घर में ही पराजय छिपी है।
घर में ही विजय नहीं हो सकी है और तुम बाहर जीतने चले हो। संसार पर राज्य करने की आकांक्षा है!
आदमी के पागलपन ऐसे हैं। चाँद को जीतना है; मंगल को जीतना है; तारों पर जाना है। और अभी आदमी अपने भीतर गया नहीं। अभी आदमी ने अपने को जाना नहीं। अभी यह जो भीतर रोशनी है, यह भी पहचानी नहीं।
लेकिन दूर के ोेल सुहावने लगते हैं, और दूर की यात्रा मन को पकड़ती है। दूर को यात्रा इसलिए मन को पकड़ती है, क्योंकि मन के बैरी जो तुम्हारे भीतर छिपे हैं, उस यात्रा में जो छिपे हुए रोग हैं, इन सब से छूटना ही होता है। येे छूट ही जाते हैं।
धीरे-धीरे मन मरने लगता है। एक-एक रोग मरा--कि मन मरा। जब सब रोग मर जाते हैं, तो तुम अ-मन की दशा में पहुंच जाते हो; मनातीत हो जाते हो। अतिक्रमण हो गया। भावातीत अवस्था आ गई। उस भावातीत अवस्था में ही तुम जानोगे कि मित्र कौन है।
महावीर ने कहा हैः ‘शत्रु भी तुम हो, मित्र भी तुम हो। शत्रु हो तुम--जब तुमने गलत से अपने को जोड़ दिया। शत्रु हो तुम--जब तुमने अन्य से अपने को जोड़ लिया। शत्रु हो तुम, जब तुम जो नहीं थे, वैसा अपने को मान लिया।
जैसे दर्पण के सामने तुम जा कर खड़े हो गए और दर्पण मान ले कि तुम्हारा चेहरा जो दर्पण में प्रतिफलित हो रहा है, वही मैं हूं। ऐसी भ्रांति हो रही है।
चित्त तो दर्पण है, चैतन्य तो प्रतिफलन है। वहां तो जो भी सामने आ जाता है, उसी की छाया बनती है। लेकिन तुम हर छाया को पकड़ लेते हो। और छाया को पकड़ते रहते हो, इसलिए माया में बने रहतेे हो। इन छायाओं से जागना होगा।
फिर इन्हीं छायाओं में दबते दबते तुम्हारा चैतन्य बिल्कुल खो जाता है। फिर तुम्हें याद ही नहीं रहती अपनी, सुधि नहीं आती।

 वह जिंदगी का अजीब अी गरीब मौसम था।
बहारें टूट पड़ी थी, सुहाने जिस्मों पर।।
नफस नफस में फुसूं था, नजर नजर में जुनू।
तसुव्वरे मए की सीमा में चूर-चूर बदन।।
नजू में ििफकर अी नजर टिमटिमा कर डूब गए,
खुमार जहन पे छाया तो जिस्म जाग उठे।।
अँधेरा गहरा हुआ, कायनात बहरी हुई।
उभर कर सायों ने एक दूसरे को पहचाना।।
वह जिंदगी का अजीब औ गरीब मौसम था।
जब आदमी छायाओं में खो जाता है, जब छायायों को सत्य मान लेता है; वह जिंदगी कीे बड़ी अजीब घड़ी है। उसी को हम जवानी कहते हैं। उसी को हम संसार कहते हैं। उसी को हम अंधापन कहते हैं। ‘वह जिंदगी का अजीब औ गरीब मौसम था।’
जब कभी जागोगे, तब पाओगे कि वह भी कैसी घड़ी आई थी। कैसे दुर्भाग्य की घड़ी थी और कैसी विचित्र घड़ी थी कि जो मैं वहीं था, वह मैंने अपने को समझ लिया था। कैसा मैं तो गया था--कि छायाओं को सत्य समझ लिया और सत्य मेरे हाथ से छूट गए!
जो जिंदगी का अजीब-औ-गरीब मौसम था।
बहारें टूट पड़ी थी, सुहाने जिस्मों पर।।
तुम कितने मूर्चिछत हो जाते हो, उतने ही तुम्हें सपने दिखाई पड़ने लगते हैं। सपना देखना हो, तो सोना जरूरी है।
सपने की पहली शर्त है--नींद। और जिसे तुम संसार कहते हो, यह सपना है। इस संसार के सपने को देखने के लिए तुम्हें सोया होना जरूरी है।
बहारें टूट पड़ी थी, सुहाने जिस्मों पर
नफस-नफस में फुसूं था...।
श्वास-श्वास में जादू छा जाता है, जब कामना का ज्वर पकड़ता है। जब वासना का ज्वर पकड़ता है, जब आँखे अंधी हो जाती है, वासना से तादात्म्य बन जाता है।
‘नफस नफस में फुसूं था, नजर-नजर में जुनू।’--और एक उन्माद, एक पागलपन छा जाता है।
‘तसुव्वरे मए की सीमा से चूर-चूर बदन।’ और फिर पाप की मदिरा में शरीर बिल्कुल डूब गया।
‘नजू में फिकर औ नजर टिमटिमा के डूब गए।’ और वह जो पाप की मदिरा थी, वह जो वासना की मदिरा थी, उसमें जब डूब गए, तो स्वभावतः दृष्टि और चिंतन के जो टिमटिमाते तारे थे, फिर दिखाई नहीं पड़ते थे।
तसव्वुरे मए की सीमा से चूर-चूर बदन
नजू में ििफकर और नजर टिमटिमा के डूब गए।
फिर बोध के दिए बुझ गए।
‘खुमार जिहनों पे छाया तो जिस्म जाग उट्ठे।’ और फिर जब दिमाग, मस्तिष्क, बोध बेहोश हो जाएः ‘खुमार जिहनों पे छाया तो जिस्म जाग उट्ठे।’
जितनी ही आत्मा सो जाती है, उतना ही शरीर जग जाता है; उसी मात्रा में। जिस मात्रा में आत्मा सो जाती है, उसी मात्रा में तुम शरीर हो जाते हो। जिस मात्रा में तुम परमात्मा नहीं रह जाते, उसी मात्रा में तुम पृथ्वी के वासी हो जाते हो।
खुमार जिहन पे छाया तो जिस्म जाग उट्ठे
अंधेरा गहरा हुआ कायनात बहरी हुई
और जैसे-जैसे ये छायाएं घनी होती गई और वासना की मदिरा ब.ती गई, ‘अँधेरा गहरा हुआ, कायनात बहरी हुई।’ वैसे-वैसे पूरा ब्रह्मांड जैसे बहरा हो गया। सब बहरापन हो गया।
‘उभर के सायों ने इक दूसरे को पहचाना।’ और फिर छायाएं एक दूसरे के प्रेम में पड़ी। फिर छायाओं ने एक दूसरे से संबंध बनाए। इन्ही को तुम गृहस्थी कहो, घर कहो, पियजन कहो, परिजन कहो--जो भी तुम नाम देना चाहो। यह छायाओं की दोेस्ती है।
तुम अपने को नहीं जानते, अपनी पत्नी को कैसे जानोगे? तुम अभी भीतर बुझे हो, तुम बाहर कैसे देख सकोगे? निकटतम को भी नहीं देख पाए, अपने को नहीं पाए, तो किसको देख पाओगे और? बेटे को कैसे देखोगे? बेटी को कैसे देखोगे? तुम खुद भी अभी छाया हो, क्योंकि तुम खुद अभी सोए हो।
इस नींद में, इस मदिरा में दबे-दबे न तो चिंतन के कोई दीये जलते भीतर, न ध्यान के कोई दीए जलते भीतर। तुम छायाओं के साथ खेल में लग जाते हो।
इस छाया के खेल को हमने माया कहा है। माया का अर्थ हैः जैसा है, वैसा दिखाई नहीं पड़ता। और जैसा नहीं है, वैसा दिखाई पड़ता है। माया यानी भ्रांति।
बहु बैरी घट में बसै, तू नहिं जीतत कोय।
निस दिन घेरे ही रहैं, छुटकारा नहिं होय।।
यह कौन हूं मैं? यह तू कौन है? यह प्रश्न जिस दिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, उसी दिन जीत की तरफ पहला कदम उठता है।
सब से पहली खोज, सबसे बुनियादी खोज यही है कि मैं इस प्रश्न का उत्तर पा लूं कि मैं कोन हूं। इस खोज के पहले तुम जो भी करोगे, गलत होगा। इस खोज के पहले तुम जहां भी जाओगे, गलत जाओगे। इस खोज के पहले कोई यात्रा हो ही नहीं सकती, सिर्फ भटकाव हो सकता है।
अंधेरी रात हो, तो सब से पहला काम हैः दीये को जला लेना। और रात बड़ी अंधेरी है और जिंदगी एकदम अंधेरे में भटक रही है। कुछ सूझता नहीं। दीये को जलाओ। और दीया एक ही काम आएगा--जिंदगी के अंधेरे में, वह तुम्हारे चैतन्य का दीया है।
शरीर तो केवल मिट्टी है। मिट्टी से उठा, मिट्टी में गिर जाएगा। ‘राख ही राख है।’ लेकिन शरीर को इस राख में संभावना छिपी है--एक ज्योति जगमगा सकती है। मिट्टी के दीये में भी ज्योति उतर सकती है--ऐसी ही तुम्हारे भीतर ज्योति उतर सकती है।
उस ज्योति को खोज लो, तो मित्र को खोज लिया। लेकिन वह ज्योति बड़े शत्रुओं से घिरी है। ‘निस-दिन घेरे ही रहैं छुटकारा नहिं होय।’
एक क्षण को भी मौका नहीं मिलता। एक से छूटे नहीं कि दूसरा पकड़ लेता है।
अपने चित्त की दशा का जरा ख्याल करना। कभी धन का सोचते, कभी पद का सोचते, कभी क्रोध से भर जाते, कभी लोभ से भर जाते। कभी मोह से भर जाते, कभी काम से भर जाते। खाली कभी होते हो? कभी क्षण भर का आकाश है? कभी थोड़ा विराम देते हो? ये बादल घेरे ही रहते हैं! ऐसा कभी तो हो कि थोड़ी देर के लिए कोई बादल न घिरे या थोड़ी सी संध मिल जाए।
देखते हो न, हिंदू अपनी प्रार्थना को संध्या कहते हैं। संध्या का मतलब होता है--संधि। थोड़ा सी खिड़की खुल जाए; थोड़ी सी संधि मिल जाए, तो संध्या हो गई।
एक बादल आए, दूसरा आए, उसके पहले थोड़ी-सी जगह खाली छूट जाए, चित्त थोड़ी देर के लिए विराम में हो, ताकि अपनी पहचान हो सके।
बादल न हो, तो सूरज अपने को जान ले। बादल होते हैं, तो बादलों को ही जानता रहता है।
दर्पण थोड़ी देर को खाली हो--कोई प्रतिबिंब न बने, तो दर्पण अपने को जान ले कि मैं कौन हूं? लेकिन प्रतिबिंब का धारा की तरह बहाव चलता है। एक गया नहीं--कि दूसरा आया। रेला-पेल, धक्कम-धक्का मचा है। कोई न कोई दरवाजे पर खड़ा ही है। कोई न कोई छाया बनती ही रहती है।
ध्यान का इतना ही अर्थ है कि चैबीस घड़ी में कभी थोड़ी देर के लिए कुछ क्षण निकाल लो, जब न क्रोध पकड़े, न मोह पकड़े, न माया, न लोेभ पकड़े।
कुछ घड़ी निकल लो, जब तुम खाली बैठ जाओ, कुछ भी न करो। बैठते-बैठते किसी दिन वह घड़ी आ जाती है--क्षण भर को ही सही, संध ही सही, छोटी सी संधि--जब तुम पाते होः रास्ता बंद है, रास्ते पर कोई नहीं गुजर रहा। एकदम सन्नाटा है। उसी सन्नाटे में चेतता अपनी करफ लौट आती है। उसी सन्नाटे में अपनी झलक मिल जाती है।
जब कोई सामने नहीं होता, तभी अपनी झलक मिलती है। जब तक कोई सामने होता है, आँखे उससे अटकी रहती हैं। जब कोई विषय भीतर नहीं होता, तब तुम अपने को जानते हो।
जब तक तुम कुछ और जानने को है, तब तक तुम्हारा जानना उसी में उलझा रहता है। जब कुछ भी जानने को नहीं, तो जानना अपने पर लौट आता है।
उस जानने का अपने पर लौट आना ध्यान है। इसलिए महावीर ने ध्यान को प्रतिक्रमण कहा है--अपने पर लौट आना। जीसस ने कनवर्शन कहा है--अपने पर लौटा आना। सुफी ‘तौबा’ कहते हैं--अपने पर लौट आना।
तुम हो, लेकिन बदलियों से धिरे हो। और एक बार तुम्हें इस बात का अनुभव होना ही चाहिए कि बदलियों के अतिरिक्त तुम क्या हो। बदलियां न हों, तो तुम क्या हो। वही अनुभव तुम्हारे भीतर छिपे मित्र को प्रकट करता है।
उस अनुभव के बाद फिर शत्रु तुम्हें धोखा न दे सकेंगे। फिर तुम्हें पहचान आ जाएगी।
बहु बैरी घट में बसै, तू नहिं जीतत कोय।
निस-दिन घेरे ही रहैं, छुटकारा नहिं होय।।
या तो अपने को पा लो, तो शत्रुओं पर विजय हो गई। या शत्रुओं पर विजय पा लो, तो मित्र से मिलना हो गया। यह एक ही सिक्के के दोे पहलू हैं। इन्हें अलग-अलग मत सोचना। ए एक ही साथ घटने वाली घटनाएँ हैं। यह एक ही घटना को दोे ंग से देखना है।
ऐसा समझो कि दीया, जलाया अँधेरा चल गया। अब चाहे तुम ऐसा कहो कि अंधेरा चल गया,
दीया जल गया। या ऐसा कहो कि दीया जल गया, अंधेरा चल गया। मगर दोेनों एक साथ घट हैं। ऐसा थोड़े ही होता है कि दीया जला, और फिर थोड़ी देर अंधेरा रुकता है; विचार करता है कि जाऊं कि न जाऊं; कि थोड़ी देर और रुकूं; कि मैं इतने दिन का वासी और यह दीया अभी-अभी आया और कब्जा करने लगा इस स्थान पर! कि अदालत में मुकदमा लडूं; कि शोरगुल मचाऊं कि मेरे घर में कोई कब्जा किए ले रहा है। और मैं इतना पुराना वासी!
नहीं, अंधेरा कुछ भी नहीं कहता। दीया जला, अंधेरा नहीं हुआ। उसी क्षण; तत्क्षण; एक क्षण की भी देरी नहीं होती।
ये एक ही घटना के दोेे पहलू हैं। एक ही सिक्के के दोेे पहलू हैं।
ऐसा ही भीतर भी होता है। इधर शत्रु गए, इधर मित्र मिला। इधर मित्र मिला, वहां शत्रु गए, दोेनों एक साथ कभी नहीं होते--यह तुम याद रखना। काम है, मोह है, लोभ है, क्रोध है--ये हैं, तो तुम्हेें मित्र का कोई पता नहीं। मित्र है, तो शत्रु का कोई पता नहीं।
जैसे-जैसे तुम जाओगे--अपने भीतर के असली मित्र में--वैसे-वैसे तुम पाओगेः शत्रु गए।
बुद्ध ने कहा हैः चोर घुसते है उस घर में, जिसमें मालिक सोया होता है। दिन में चोरी करने नहीं आते, रात में आते है। मालिक का सोया होना जरूरी है। मालिक सोया हो, तो ही चोरी हो सकती है। मालिक जागा हो, तो फिर नहीं आते। ऐसे ही तुम जब जागे होते हो, तो शत्रु नहीं आते।
तुम्हारे जागरण में ही तुम्हरी जीत है। जागरण ही जीत है। इसलिए ‘जीत’ शब्द से कुछ गलती मत समझ लेना।
‘जीत’ शब्द में खतरा है। आदमियों के सभी शब्दोे में खतरा है। शब्द बोले--कि जोखम। अब जैसे सुन लिया कि जीतता है। लड़ने लगे क्रोध से। भूल हो जाएगी। फिर तुम समझे नहीं। वह जीतने का रास्ता नहीं है।
क्रोध से लड़े, तो क्रोध से और उलझ जाओगे। जिससे लड़ोगे, उसी जैसे हो जाओगे। शत्रु बहुत सोच-विचार कर चुनना। जिससे लड़ते हो, उसी जैसे हो जाओगे। अगर क्रोध से लड़े, तो क्रोधी हो जाओगे। अगर काम से लड़े, तो कामी हो जाओेगे। क्योंकि जिससे लड़ोगे, उसका रंग तुम्हारी देह से लग जाएगा। जिससे जूझागे सतत, उससे भिन्न नहीं रह जाओगे।
यह बड़े मजे की घटना है। तुम अकसर पाओगे कि अगर दोे दुश्मन जिंदगी भर एक दूसरे से लड़ते रहे, तो आखिर में उनका चरित्र एक जैसा हो जाता है।
यह तो राजनीति के जगत में रोज घटता है। एक पार्टी सत्ता में होती है; दूसरी पार्टी उसके खिलाफ लड़ती है। वर्षो लग जाते है उसको, सत्ता से हटाने में। लेकिन जब तक हटाने का मौका आता है, तब तक
दूसरी पार्टी उसी जैसी हो गई।
इंदिरा में और मोरारजी में कोई फर्क देखते हो? इन पांच महीनों में कुछ भी फर्क हुआ? वे ही के वे ही लोग! वैसे के वैसे लोग। और आश्चर्य की बात है कि जयप्रकाश नारायण इसको पूर्ण क्रांति कहते हैं!
यह कैसी पूर्ण क्रांति है? वे ही के वे ही लोग। वैसे के वैसे ंग। वैसा का वैसा रंग। वही व्यवस्था--वही सरंजाम। सब वही का वही है और पूर्ण क्रांति हो गई? कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिला और पूर्ण क्रांति हो गई?
तीस साल जो लोग कांग्रेस से लड़ते रहे, वे कांग्रेस जैसे हो गए। उनमें कुछ भेद नहीं रहा। ऐसा यहीं हुआ, ऐसा नहीं है।
रूस में क्रांति हुई। वर्षों तक संघर्ष चला। और चमत्कार की बात यह थी कि जो लोग जार के खिलाफ लड़े--लेनिन, स्टैलिन, ट्राटस्की--जब उनके हाथ में सत्ता आई, तो वे जार जैसे ही सिद्ध हुए। जरा भी फर्क नहीं। जार की ही प्रतिमाएं हैं--प्रतिलिपियां! शायद जार से भी ज्यादा खतरनाक सिद्ध हुए। क्योंकि जार से लड़ते-लड़ते जार का ंग सीख लिया। उससे लड़ना है, तो उसका ंग सीखना ही होगा।
जब तुम किसी से लड़ोगे, तो उसके दॉव-पेंच सीखने होंगे; नहीं तो लड़ोगे कैसे? उसकी चालें सीखनी होंगी; नहीं तो लड़ोगे कैसे? धीरे-धीरे तुम उसी जैसे हो जाओगे। इसलिए दुनिया में क्रांति नहीं हो पाती।
कितनी क्रांतियाँ हुई--और सब असफल गईं! आज तक कोई सफल क्रांति नहीं हुई। और कारण? कारण बड़ा मनोवैज्ञानिक हैः जिससे लड़ते हो उसी जैसे हो जाते हो, इसलिए तुम अकसर पाओगे कि जो आदमी अहंकार से लड़ेगा, बड़ा अहंकारी हो जाएगा। हालांकि वह कहेगा कि मैं विनम्र हूं मैं विनीत हूं। लेकिन उसकी विनम्रता की घोषणा में भी अहंकार को ही घोषणा होगी।
और जो आदमी क्रोध से लड़ेगा--और क्रोधी हो जाएगा। जो आदमी अशांति से लड़ेगा--और अशांत हो जाएगा। तुम जानते हो...।
तुम चारों तरफ आंख खोल कर देखो। जो आदमी जिससे लड़ रहा है, वैसा ही हो जाता है। लड़ने में जुड़ना पड़ता है, पास आना पड़ता है। लड़ना एक तरह का गहरा संबंध है। इसलिए जीत का अर्थः लड़ना मत समझना। जीत का अर्थ है--जागना। लड़ना तो है ही नहीं।
लड़ने का मतलब यह है कि तुमने यह स्वीकार कर लिया कि दुश्मन का तुम पर बल है, तो ही लड़ना होता है। छाया से तो कोई लड़ता नहीं।
माया से तो लड़ोगे कैसे? जो है ही नहीं, उससे लड़ना क्या है? जागने का अर्थ हैः जानना है--लड़ना नहीं। पहचानना है--लड़ना नहीं। प्रत्यभिज्ञा करनी है कि क्या क्या है।
यह क्रोध वस्तुतः क्या है--इसको जाग कर देखना है। उसी जागने में तुम्हारे भीतर जो शिखर उठता है--होश का--क्रोध का धुआं विसर्जित हो जाता है।
क्रोध के लिए बेहोश होना जरूरी है। होश में तुम क्रोध कर ही न पाओगे। कोशिश करना। यह असंभव है। कभी अब तक कोई कर नहीं पाया। अगर तुम कर लो, तो तुमने चमत्कार किया।
होशपूर्वक क्रोध होता ही नहीं। जैसे ही होश आएगा, क्रोध सरक जाएगा। और जैसे ही क्रोध आएगा, होेश सरक जाएगा। दोेनों साथ नहीं होते। जैसे दीया और अंधेरा दोेनों साथ नहीं होते।
इसलिए लड़ना क्या है! होश को जगा लेना है। होशपूर्ण बनना है।
तो मेरे इस शब्द को खूब हृदय में सम्हाल कर रखनाः जागने में जीत है। लड़ने में तो हार है।
बहु बैरी घट में बसै, तू नहिं जीतत कोय।
निस दिन घेरे ही रहैं, छुटकारा नहिं होय।।
या मन के जाने बिना, होय न कबहूं साध।
जक्त-वासना ना छुटे, लहै न भेद अगाध।।
सुननाः ‘या मन के जाने बिना’... तो जीतने का सूत्र है--जानना।
‘या मन के जाने बिना, होय न कबहूं साध।’ कोई साधु नहीं हो सकता--इस मन को जाने बिना। साधु यानी सरल। साधु यानी सुंदर। साधु यानी निर्दोेष। साधु यानी पवित्र। कोई साधु नहीं हो सकता--मन को जाने बिना।
मन से लड़ना नहीं है; जीतना जरूर है। लेकिन जीतना तो तभी हो सकता है, जब जानना हो--जागना हो। लड़ने से नहीं...।
‘जक्त-वासना ना छुटे, लहै न भेद अगाध।’ और जब तक जगत् की वासना न छूट जाए, तब तक उस अगाध का, अपरंपार का, असीम का कोई भेद पता नहीं चलता।
जगत् यानी क्षुद्र की वासना--कि थोड़े पैसे और हो जाएं। कि थोड़ी जमीन और बड़ी हो। कि थोड़ा मकान और बड़ा हो जाए।
क्षुद्र की वासना यानी जगत की वासना। विराट की वासना यानी प्रार्थना--अगाध।
दुनिया में दोे ही तरह के लोग हैंः क्षुद्र के चाहने वाले--जिनका प्रेम क्षुद्र से हैं। दस रुपये हैं, तो ग्यारह कैसे हो जाए। जो निन्यानबे के चक्कर में हैं। और यह निन्यानबे का चक्कर कितना ही चलाते रहो, यह कभी पूरा नहीं होता। यह हो ही नहीं सकता। इसीलिए इसको ‘चक्कर’ कहते हैं। यह चाक है, जो घूमता ही चला जाता है। इसका कोई अंत नहीं है।
आज दस रुपये हैं, तो ग्यारह चाहिए। कल दस हजार होंगे, तो ग्यारह हजार चाहिए। और कल दस लाख हो जाएंगे, तो ग्यारह लाख चाहिए। बात वैसी की वैसी बनी रहेगी। तुम्हारी बेचैनी वही की वही बनी रहेगी। तुम्हारा तनाव वैसा का वैसा। तुम्हारी दौैड़ वैसी की वैसी। तुम्हारा पागलपन वैसा का वैसा।
यह मत सोचना कि ग्यारह होने से हल हो जाएगा। ग्यारह होने के पहले ही बारह की आकांक्षा आ जाएगी। इसलिए उसको ‘निन्यानबे की चक्कर’ कहते हैं। यह कहानी तुम्हें पता है?
एक सम्राट बड़े सोच-विचार में था कि उसके पास इतना सब कुछ है, लेकिन चैन नहीं। और उसकी मसाज करने, मालिश करने रोज जो नाई आता था, वह बड़ा मस्त आदमी था। उसको एक रुपया मिलता था रोज। उन जमानों में एक रुपया बहुत बड़ी बात थी। खुद खाता था, पड़ोेसियों को खिलाता था। मित्रों को निमंत्रण देता था। एक रुपया बहुत था।
रोज एक रुपया मिल जाता था। सुबह घंटे भर आकर सम्राट की मालिश कर जाता था; एक रुपया लेकर घर चला जाता था। कोई चिंता फिकर न थी। मस्त रहता था। दूसरे दिन फिर आ जाएगा सुबह। फिर मेहनत कर लेगा घंटे भर। फिर एक रुपया मिल जाएगा।
शतरंज जमी रहती उसके घर में। कहकहा लगा रहता। सामने ही रहता था सम्राट के। सम्राट को बड़ी बेचैनी होती थी कि ऐसा कहकहा मैं भी नहीं लगा पाता। ऐसे मित्रों को मैं भी नहीं बुला पाता। चिंता है, ििफकर हे और इस गरीब के पास कुछ भी नहीं है। बस, एक रुपया इसको मिलता है--वही है। दूसरे दिन के लिए भी कुछ इंतजाम नहीं है।
उसने अपने वजीर से कहा, ‘इसका राज क्या है--खुशी का? ’ वजीर ने कहा, ‘जल्दी जाहिर हो जाएगा।’
वजीर गया और निन्यानबे रुपये एक थैली में रख कर उस गरीब से घर में फेक आया।
दूसरे दिन सुबह जब वह आया, तो वह मस्ती न थी। हाथ-पैर तो दाबे, लेकिन वह ताकत न थी। सम्राट ने पूछा, ‘आज उदास हो, ऐसी उदासी कभी देखी नहीं। कुछ चिंतित मालूम पड़ते हो। रात सोए नहीं? आंख कुछ लाल-लाल, थकी-थकी...? ’ अब आप पूछते हैं, तो बता दूं। बड़ी झंझट में पड़ गया हूं। न मालूम कौन मेरे आंगन में निन्यानबे रुपये, रख कर एक थैली में, फेंक गया। तो रातभर मैं सो न पाया। बार-बार सोचताः निन्यानबे रुपये! आह! मजा आ गया। पर विचार मन में उठता है कि अब निन्यानबे को सौ कैसे कर ले। तो मैंने यही तय किया कि कल सुबह जो एक रुपया मिलेगा, अब कल दावत इत्यादि नहीं देंगे। बचा लेंगे। पूरे सौ तो हो जाए।’
मन की ऐसी आदत है कि निन्यानबे हों, तो सौ करना चाहता है। जैसे सौ होने से कुछ हो जाएगा!
‘इसलिए रातभर सो नहीं पाया और आज थका-थका हूं। सम्राट ने कहाः ठीक।
दो चार दिन में ही वह आदमी तो सूखने लगा। सम्राट ने कहा, ‘बात क्या है? तुम्हारा सब मौज, तुम्हारा सब रस सूखा जाता है? ’ उसने कहा, ‘वह थैली मेरी जान ले रही है। एक रुपया बचा लिया, तो मन में ख्याल उठा कि अब सौ तो हो ही गए। अब मैं भी कोई छोटा-मोटा धनी तो हो ही गया। अब धीरे से एक सौ एक कर लूं। फिर एक सौ दोेे कर लूं। ऐसे मेरा मन ब.ता जा रहा है--कि कब दोेे सौ हो जाए।’
महीना पूरा होते-होते तो वह आदमी अधमरा हो गया। सम्राट ने उससे कहा, ‘पागल, अब तो तेरी हालत मुझसे भी ज्यादा खराब हो गई! अब तो तू मालिश करता है, तो तेरी ताकत का पता हो नहीं चलता। अब तेरे घर से कहकहे नहीं उठते? अब तेरे घर में बांसुरी नहीं बजती? अब रात तेरे घर में दीया भी नहीं जलता? ’
उसने कहा, ‘कैसे जलाऊं मालिक। तेल खर्चा हो जाता है--फिजूल का। मित्र भी नहीं आते, क्योंकि उनको खिलाओ-पिलाओ। बांसुरी भी रख दी है। अब तो फिकर एक ही लगी है--कि कैसे हजार रुपये हो जाए।’
इस कहानी से यह शब्द प्रसिद्ध हो गया--‘निन्यानबे का चक्कर।’ और सभी निन्यानबे से चक्कर में है।
या मन के जाने बिना, होय न कबहूं साध।
जक्त वासना ना छुटै, लहै न भेद अगाध।।
जो क्षुद्र की वासना में पड़ गया, वह फिर अगाध के भेद को नहीं जान पाता। वह फिर परमात्मा से अपरिचित रह जाता है। और अभागा है वह, जो परमात्मा से अपरिचित रह जाए। क्योंकि वही है महोत्सव, वही है आनंद; वही है सत्य, वही है सुंदर, वही है अमृत।
चांदी के ठीकरों में, कि कागज के नोटों सें, कि जमीन-जायदाद के झगड़ों मेें उसे गंवा दोगे? मगर जब तक तुम मन को न समझ लो, मन की चालें न समझो, तब तक गँवा ही दोगे।
तो पहला सूत्र हुआः मन को जानना है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी बेटी की शादी की। बेटी की शादी पूरी हो गई, तो शादी के बाद उसने अपने दामाद को गले से लगा लिया और बड़े प्रेम से कहा, ‘आह! बेटे, आज तुम संसार के दूसरे नंबर के सुखी आदमी हो, क्योंकि तुमने मेरी बेटी से शादी करनी चाही और हो गई।’
दामाद थोड़ा चैंका। आश्चर्य से उसने पूछा, ‘जी, मैं पहले नम्बर का सुखी क्यों नहीं? ’ मुल्ला ने कहा, ‘वह तो न पूछो तो अच्छा। क्योंकि पहले नम्बर का सुखी तो मैं हूं, जो यह बला टाल सका।’
इस दुनिया में पहले नंबर के सुखी हो, तो ही सुखी हो। यह संसार की बला टल सके तो। नम्बर दो का सुखी, तो दुखी ही है। नंबर दो में कुछ मजा नहीं है।
यह संसार की वासना, जगत-वासना, मेरे पास ज्यादा हो, यह जगत-वासना है। मैं होऊं--यह जगत-वासना से मुक्ति है।
ज्यादा की दौैड़--जगत। और ज्यादा--और ज्यादा। और--और की दौैड--जगत। इसका कोई अंत नहीं है। यह ब.ती ही जाती है। तुम कितना ही इकट्ठा कर लो, यह कम नहीं होती।
इस दौड़ से जो जाग गया, जिसने यह देख लिया कि यह तो मन का ंग ही है, यह तो मन की चाल ही है कि वह मांगता है--और। जिसे यह समझ में आ गया कि मन तो और मांगता ही जाएगा; और ‘और’ के कारण मैं दूखी हो होता रहूंगा, उसके जीवन में एक नई क्रांति का सूत्रपात होता है।
चांदी का यह देश, यहां के छलिया राजकुमार,
सोच-समझ कर करना पंथी, यहां किसी से प्यार, हृदय व्यापार
यहां किसे अवकाश, सुने जो तेरी करुणा-कराहें,
तुझ पर करें बयार, यहां खाली हैं किसकी बाहें,
बादल बन कर खोज रहा तू, किसको इस मरुथल में
कौन यहां व्याकुल हो जिसकी, तेरे लिए निगाहें,
फूलों की यह हाट, लगा है मुसकानों का मेला,
कौन खरीदेगा तेरे, घायल आंसू दो चार।
सोच-समझ क करना पंथी, यहां किसी से प्यार।।
यहां प्रीति की मांग घृणा से ही पूरी हो जाती है,
हाय हृदय देकर भी दुनिया, अंगारे पाती है,
सर्वस लेकर भी, न शलम को शमा कफन तक देती है
रोज कली के लिए भ्रमर की अरथी अकुलाती है
यहां सूर्य के शव पर दीपावली मनाती संध्या
और सांझ की बुझी चिता पर, करता चांद विहार।
सोच-समझ कर करना पंथी, यहां किसी से प्यार, हृदय व्यापार।।
देख हलाहल बांट रही है, मधु कह कर मधुबाला,
और आग के फूल छिपाए लहरों की हर माला,
बुलबुल का दिल चीर, देख वह छली गुलाब खड़ा है,
लिए निशा की लाश, आ रहा है हंसता उजियाला,
पीने ही को प्यास धरा की, घिरती यहां घटाएं,
लाने को पतझार चमन में, करती नित्य बहार।
सोच समझ कर करना पंथी, यहां किसी से प्यार।।
डाले हुए रूप का घूंघट कड़ी खड़ी यहां निष्ठुरता,
पिए प्रणय का रक्त थिरकती इठलाती सुंदरता,
अरे कली की भोली चोली में विषधर बैठा है,
और प्यार की सरल गोद में छिप छल अभिनय करता,
एक किरण दे यहां हजारों दीप बुझाती ऊषा
एक बूूंद बरसा करता घन सौ सौ वज्र प्रहार
सोच-समझ कर करना पंथी, यहां किसी से प्यार।।
चांदी का यह देश, यहां के छलिया राजकुमार।
सोच-समझ कर करना पंथी, यहां किसी से प्यार हृदय व्यापार।।
मन को समझो। मन की समझ से ही तुम्हें संसार के बाबत समझ पैदा होगी। क्योंकि वस्तुतः तुम्हारे मन का फैलाव ही संसार है।
संसार की जड़ें तुम्हारे मन में हैं। इसलिए संसार से मत लड़ने लगना। उस भूल में मत पड़ना।
संसार की जड़ें तुम्हारे मन में हैं। संसार से लड़ना ऐसे होगा, जैसे वृक्ष को कोई ऊपर से काट दे और जमीन में जड़ें, तो छिपी पड़ी हैं। फिर नये अंकुर निकलेंगे। फिर नया वृक्ष पैदा होगा।
इसलिए जो लोग संसार से लड़ते हैं, वे मूल से नहीं लड़ते। वे पत्तों से उलझते रहते हैं।
इसलिए मैं अपने संन्यासियों को नहीं कहता कि संसार से छोड़कर भागो। न चरणदास कहते हैं। मैं कहता हूंः छोड़ कर कहीं जाना नहीं है। अपने मन को समझ लेना है।
और संसार में मन को समझने की जितनी सुविधा है, उतनी हिमालय की गुफाओं में नहीं। क्योंकि हिमालय की गुफाओं में मन को प्रकट होने का मोका न रह जाएगा। समझोगे कैसे? समझने के लिए मन की अभिव्यक्ति चाहिए। यहां रोज-रोज मौका है। यहां प्रतिपल मौका है। यहां कदम-कदम मौका है।
कोई गाली दे गया, और मन क्रोध से भर जाता है। एक मौका मिला ध्यान का। अगर तुम में जरा भी समझ हो, तो तुम उस आदमी पर नाराज न होओगे। उसे धन्यवाद देने जाओगे--कि तुने मुझे ध्यान का मौका दिया। क्रोध भीतर पड़ा था, तू गाली न देता, तो मुझे पता ही न चलता। वह भीतर ही पड़ा रहता और सदा-सदा उस जहर का मेरे भीतर फैलाव होता रहता। तूने गाली दे दी; जो भीतर दबा था, बाहर आ गया। मुझे उसका होश आया। मुझे मौका मिला। मैं जाग कर देख सका। और छुटकारे की संभावना बनी।
किसी संुदर स्त्री को देख कर मन में वासना उठ गई। किसी का बड़ा भवन देख कर मन में कामना उठ गई। ये अवसर हैं। इन अवसरों को ध्यान में बदलने की कला ही संन्यास है।
या मन के जाने बिना, होय न कबहूं साध।
जक्त वासना ना छुटै, लहै न भेद अगाध।।
और मन समझाएगा कि मुझे समझो मत। समझने में क्या सार है? मुझे जीयो। मन कहेगाः मैं जो कहूं--मानो। मैं जो कहूं--मेरी सुनो। मुझे समझने इत्यादि की झंझट में न पड़ो।
आज वसंत की रात,
गमन की बात न करना!
धूल बिछाए फूल बिछौना,
बगिया पहने चांदी-सोना
कलियां फेके जादू-टोना,
महक उठे सब पात
हवन की बात करना!
आज वसंत की रात
गमन की बात न करना!
मन ऐसे ही समझाएगाः ‘आज वसंत की रात’...अभी कहां मृत्यु की बात उठा दी। अभी तो जवान हूूं, अभी कहां संन्यास की बात उठा दी? अभी तो जिंदगी में बहुत करना है, अभी कहां ध्यान की बात उठा दी?
मन हजार-हजार तरह समझाएगा कि अभी तो भोग लो। थोड़ा तो भोग लो। जागना ही हो, तो बाद में जाग जाना। इतनी जल्दी भी क्या है।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैंः संन्यास तो लेना है, लेकिन अभी नहीं। अभी तो मेरी उम्र केवल पचास वर्ष है!’
लोग मुझसे आकर कहते हैं कि ‘शास्त्रों में तो लिखा हैः संन्यास लेना चाहिए अंतिम समय में। आप क्यों युवा लोगों को भी संन्यास दे देते हैं? संन्यास तो लेना चाहिए वृद्धावस्था में। वह तो अंतिम आश्रम है!’
आदमी हजार बहाने खोजता है--सत्य को झुठलाने के।
कल का भरोसा नहीं है। संन्यास लेंगे, जब वे पचहत्तर साल के हो जाएंगे! कल का भरोसा नहीं है।
इस असुरक्षित जीवन में मन की बातों को मान कर मत रुक जाना।
मन तुम्हारा शत्रु है; मन तुम्हारा मित्र नहीं है। अब तक तुम भटके हो, क्योंकि शत्रु की मान कर चले हो।
मन रोशनी नहीं चाहता। मन अंधेरा है। मन रोशनी से डरता है। मन रोशनी के पास नहीं जाना चाहता। मन रोशनी से भागता है। स्वाभाविक है।
अगर मन अंधेरा है, तो रोशनी से डरेगा। इसलिए मन सब तरह के उपाय करेगा। तर्क देगा, योजनाएं बताएगा। कहेगा--कि ठीक है, संन्यास भी लेना है, तो ले लेना। अभी क्या जल्दी है?
आज वसंत की रात,
गमन की बात न करना!
धूल बिछाए फूल बिछौना,
बगिया पहने चांदी-सोना
कलियां फेके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना!
आज वसंत की रात,
गमन की बात न करना!
लेकिन यह वसंत आ भी नहीं पाएगा और चला जाएगा। और यह वसंत पतझड़ अपने में छिपाए है। और यह जवानी बु.ापे को अपने में लिए बैठी है। और यह जिंदगी मौत का आवरण है।
पत्थर पर बिछी हुई
सूरज की किरन
फूल में जाने कहां से आकर
फूटा हुआ रंग
शिवालय के स्वर्ण कलश पर
काफी अरसे बैठी
निश्चल चील
और इन सब के साथ
मन में लहराती हुई-सी
एक झील
जी होता है
इन सब को अपना कहूं
या समय के डर के मारे
इन सब को सपना कहूूं?
दोनों ही बातें प्रतिपल सामने खड़ी है। या तो इस संसार को अपना कहो। ... मन कहता हैः अपना कहो। या मौत आती है; समय हाथ से छूटा जा रहा है; इन सबको सपना कहो।
अगर अपना कहा, सांसारिक रह जाओगे। अगर सपना कहा, संन्यासी हो जाओगे।
सपना ही है। टूट ही जाएगा। पूरी जिंदगी भी देखोगे, तो भी सत्य न होगा। सत्य को सपना नहीं बनाया जा सकता। सपने को सत्य नहीं बनाया जा सकता।
तुम कितनी देर तक देर तक देखते हो सपना, इससे कुछ भेद न पड़ेगा। सब का सपना टूटता है। धन्यभागी वे हैं; जिनका मौत के पहले टूट जाता है। अभागे वे हैं, जिनका मौत के क्षण में टूटता है। तब कुछ किया नहीं जा सकता। तब अवसर खो गया। तब चूक हो गई; फिर आना पड़ेगा। और जितनी बार चूक करोगे, उतनी ही चूक की आपद बनती जाती है। इसीलिए तो इतनी बार आए और इतनी बार गए, फिर भी कुछ हाथ नहीं लगा। कुछ सम्पदा हाथ नहीं आई।
या मन के जाने बिना, होय न कबहूूं साध।
जक्त-वासना ना छुटै, लहै न भेद अगाध।।
सरकि जाय विष ओरहीं, बहुरि न आवै हाथ।
सरक-सरक जाता है यह मन; हाथ में आता नहीं यह मन। लाख समझाओ, फिर मौका मिला, फिर सरक जाता है।
कितनी बार तुमने तय नहीं कियाः अब क्रोध न करेंगे। और फिर किसी ने गाली दे दी। और फिर कोई अपमान कर गया। फिर याद ही नहीं आती--कि कितनी बार तय किया था कि नहीं करेंगे क्रोध। सरक गए। फिर हो जाता है। फिर-फिर हो जाता है। फिर पछताने से क्या होगा?
यह सरकने की व्यवस्था तोड़नी होगी। यह सरकने की व्यवस्था ही मिटानी होगी। अन्यथा तुम पछताते रहोगे--और मन बार-बार सरक जाता रहेगा।
सरकि जाय विष ओरहीं, बहुरि न आवै हाथ।
भजन माहिं ठहरै नहीं, जो गहि राखूं नाथ।।
अगर ठहर जाए, तो पकड़ में भी आ जाए। ठहरता-ही नहीं, तो पकड़ में नही आता। पकड़ना ही किसी को, तो ठहराना जरूरी है। इसलिए ध्यान की प्रक्रियाओं में मन को ठहराने की व्यवस्था है।
चैबीस घड़ी में एक घड़ी तो निकल ही लेना। इतना गरीब कोई भी नहीं है कि एक घंटा ध्यान न कर सके। और इतना अमीर भी कोई नहीं है कि जिसे एक घंटा ध्यान की जरूरत न हो।
एक घंटा तो निकल ही लेना। एक घंटा बैठ ही जाना--मन को देखने, मन को समझने। मन का खेल, मन का प्रपंच--यह जो मन का नाटक चलता है--इसको दर्शक की भांति, द्रष्टा की भांति देखने बैठ जाना।
और ऐसा नहीं कि एक दिन देखने से बंद हो जाएगा खेल। सच तो यह हैः जब तुम बैठागे देखने, तो मन पूरी ताकत से हमला करेगा। मन यह बरदाश्त नहीं करेगा कि तुम, और मन से छूटने का उपाय कर रहे हो? कौर बरदाश्त करता है?
जब तुम जंजीरें तोड़ते हो, तो जंजीरें भी नाराज होंगी। और जब तुम काराग्रह से बाहर निकलना चाहते हो, तो काराग्रह भी खुश नहीं होता।
तुम जब किसी की गुलामी से छूटना चाहते हो, तो वह क्यों खुश होगा? उसकी ताकत कम हुई जा रही है। उसका अधिकार टूटा जा रहा है। उसका साम्राज्य बिखरा जा रहा है। एक गुलाम और छूटा।
तो मन पूरी कोशिश करेगा तो जब तुम ध्यान करने बैठोगे, तब तुम चकित होओगे कि मन इतना कभी नहीं सताता, जितना ध्यान करने बैठो, तब सताता है। एकदम हमला बोल देता है! चारों दिशाओं से हमला बोल देता है। सब तरह की उधेड़-बुन खड़ी कर देता है। इतना तूफान मचाता है, इतना अंधड़ उठाता है कि तुम्हें सावधान कर देता है कि इस झंझट में पड़ने में कोई सार नहीं। दुबारा बैठने की कोई जरूरत नहीं। यह तो और बुरी हालत हो गई!
मुझसे लोग आ कर कहते हैंः ऐसे मन शांत ही रहता है। ज्यादा कुछ अशांत नहीं होता है। लेकिन जब भी ध्यान करने बैठो, तब एकदम अशांत हो जाता है।
ऐसे भी अशांत होता है, लेकिन तुम उलझे हो, पता नहीं चलता। जब ध्यान करने बैठते हो, तब पता चलता है। और जब पता चलता है, और मन को ख्याल में आता है कि तुम छूटने की कोशिश कर रहे हो, तो वह सब तरह के जाल फेंकता है। बिल्कुल स्वभाविक है।
तुम इन जालों को भी देखते रहना। मन के इस प्रपंच को भी देखते रहना। मन में ये जो इतने अंधड़ उठें, इसको भी देखते रहना। तुम देखते ही रहना। तुम निष्पक्ष देखते रहना। यह भी मत कहना कि ‘बुरा है।’ बुरा कहा कि चूक गए। यह भी मत कहना कि ‘बंद हो जा।’ क्योंकि तुम्हारे ‘बंद हो जा’ कहने से मन सुन नहीं लेगा।
अब तक तो मन ने तुम्हें आज्ञा दी है। तुमने कभी आज्ञा नहीं दी। तो आज तुम अचानक आज्ञा
दोगे, तो सुनेगा नहीं। उसका अभ्यास ही नहीं है उसे।
मन यद्यपि तुम्हारा गुलाम है, लेकिन मालिक हो गया है। लंबे अभ्यास से मालिक हो गया है। मन बहुत मुंह-लगा हो गया है। एक दिन में यह न हो जाएगा।
लेकिन अगर तुम बैठते ही रहे...। इसकी फिकर ही मत करना कि कुछ परिणाम हो रहा है कि नहीं। चलो, एक घंटा मन की उधेड़बुन ही देखेंगे। एक घंटा मन का उपद्रव ही देखेेंगे। देखते ही रहना।
तुम धीरे-धीरे पाओगेः संधियां आने लगीं। कभी-कभार ऐसा अपूर्व क्षण आ जाता है कि एक क्षण को कोई विचार नहीं।
उस सन्नाटे में पहली दफा तुम्हें पता चलेगा--धर्म क्या है। उसी सन्नाटे में तुम्हें पता चलेगा--ईश्वर है। उसी सन्नाटे में प्रमाण मिलेगा--वेद का, कुरान का, बाइबिल का। उसी क्षण में सारे धर्म सत्य हो जाएंगे। क्योंकि धर्म सत्य हो जाएगा।
सरकि जाय विष ओरहिं, बहुरि न आवे हाथ।
भजन माहिं ठहरै नहीं, जो गहि राखूं नाथ।।
इन्द्री पलटै मन विषै, मन पलटै बुधि माहिं।
बुधि पलटे हरि-ध्यान में, फेरि होय लय जाहिं।।
यह सूत्र अपूर्व है; हीरों में तौला जाए--ऐसा है।
‘इन्द्र पलटै मन विषै...।’ यह अंतर्यात्रा का पूरा शास्त्र इस सूत्र में छिपा हुआ है।
आंख से तुमने अब तक बाहर देखा है, अब आंख से भीतर देखना शुरू करो। ‘इन्द्री पलटै मन विषै।’
अभी तक आंख से संसार देखा है, अब आंख से मन को देखना शुरू करो। अब तक कान से बाहर की ध्वनियां सुनी हैं, अब बाहर की ध्वनियों को छोड़ो; भीतर की धुन सुनो।
‘इन्द्री पलटै मन विषै।’ अब मन को विषय बनाओ--अपने बोध का।
...‘मन पलटै बुधि माहिं।’ जब यह घट जाए कि तुम मन को देेखने में समर्थ हो जाओ, मन को सुनने मे समर्थ हो जाओ, दूसरा तो कदमः ‘मन पलटै बुधि माहिं।’ फिर मन के भी भीतर छिपा हुआ एक तत्व है--बोध, उसके प्रति जागना।
पहले मन के प्रति जागो। फिर जागा है जो--उसके प्रति जागना। ये तीन बातें हुईं।
संसार है--तुम्हारे बाहर फैला हुआ। और मन है--तुम्हारे भीतर फैला हुआ। संसार तो बाहर है ही तुम से, मन भी तुमसे बाहर है। तुम तो इसके केंद्र पर बैठे हो। तुम तो मन के द्रष्टा हो।
तो एक-एक कदम उठाओ। पहले इंद्रियां--जो बाहर मुड़ी हैं, उन्हें भीतर मोड़ लो। आंख बंद कर लो--और भीतर देखो। कान बंद कर लो--और भीतर सुनो। यह पहला कदम ध्यान का।
धीरे-धीरे धीरे-धीरे तुम पाओगेः बाहर तो भूल गया। बाहर तो मिट ही गया। बस मन की ही तरंगे रह गयीं--चारों तरफ। इन्हीं को देखते-देखते देखते-देखते मन शांत हो जाएगा।
कुछ करना नहीं पड़ता है। किया तो भूल हो जाएगी। कृत्य का काम ही नहीं है, सिर्फ साक्षी का काम है। कर्ता की जरूरत ही नहीं है। सिर्फ द्रष्टा का काम है। सिर्फ देखते-देखते...।
यह तुम्हें कठिन लगेगा, क्योंकि संसार में तो बिना कुछ किए, कभी कुछ होता नहीं। संसार में तो कुछ करो, तो कुछ होता है।
संसार का नियम हैः यहां करने वाला जीतता है। यहां आलसी हार जाता है। जो नहीं करता, वह कैसे जीतेगा?
मन का नियम बिल्कुल उलटा है। वहां कर्मठ हार जाता है--वहां अकर्म जीतता है। वहां करने की कोई जरूरत ही नहीं है। वहां देखना काफी है। वहां देखने से ही क्रांति होती है। वहां कर्ता नहीं--द्रष्टा जीतता है। सिर्फ देखो।
‘इन्द्री पलटै मन विषै।’ तो पहले देखने की क्षमता को मन पर लगा दो। ‘मन पलटै बुधि माहिं।’ फिर दूसरा कदम आएगा। जब मन शांत होने लगेगा; विचार की तरंगे लीन होने लगेंगी। पहले संसार भूल जाएगा, फिर मन भूल जाएगा। जब मन भूल जाए, तो ‘मन पलटै बुधि माहिं।’ तब बोध की जो क्षमता है, द्रष्टा की जो क्षमता है, साक्षी भाव है--उसपर जागो--उसके प्रति जागो। अब साक्षी को अपना ही साक्षी बनने दो।
ज्ञानी यहीं रुक जाते हैं। भक्त एक कदम और उठाते हैः ‘बुधि पलटै हरि-ध्यान में।’ क्योंकि भक्त कहते हैं कि साक्षी के भी भीतर छिपी हुई एक चीज है। द्रष्टा के भीतर भी छिपी हुई एक चीज है, वही हरि है, वही परमात्मा है। आत्मा का भी एक केंद्र है, वही परमात्मा है।
शरीर का केंद्र है मन। मन का केंद्र है आत्मा। आत्मा का केंद्र है--परमात्मा।
तो साधारणतः ज्ञानी जहां रुक जाता है, भक्त एक कदम और लेता है। यह चरणदास ने बड़ी अपूर्व बात कही हैः
इन्द्री पलटै मन विषै, मन पलटै बुधि माहिं।
बुधि पलटै हरि-ध्यान में, फेरि हो लय जाहिं।।
और फिर उसी घड़ी लय हो जाती है। फिर विसर्जन हो गया। घर आ गया। विश्राम आ गया। इसे मोक्ष कहो, निर्वाण कहो; जो नाम देना चाहो--दो।
मगर यही है खोज सब की। यही है, तुम्हारे भीतर छिपे हुए बीज की क्षमता। यही है स्वर छिपा--तुम्हारी वीणा में। इसे जगाए बिना तुम कृतार्थ न हो सकोगे। यह जगे, तो ही जीवन धन्य है। यह न जगे, तो व्यर्थ गया, असार गया।
‘तन मन जारै काम हीं, चित कर डांवाडोल।’ देखते होः सागर में लहरें उठती हैं? ये लहरें हवा के झोकों से उठती हैं। हवा दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन दिखाई पड़ने वाले जल की डांवाडोल कर जाती है। ऐसी ही तुम्हारे भीतर जो लहरें उठती हैं--वे काम से उठती हैं।
‘तन मन जारै काम हीं।’ काम का अर्थ हैः कामना--कुछ पाने की आकांक्षा। कुछ होने की आकांक्षा--वही काम है। जैसा हूं--वैसे में तृप्ति नहीं; कुछ और हो जाऊं। जो है--उसमें तृप्ति नहीं। कुछ और मिल जाऐ। यह जो काम का ज्वर है...। ‘तन मन जारै काम हीं।’ वह तन को भी जराता, मन को भी जराता है। ‘चित कर डांवाडोल।’ और उसके कारण ही सारी तरंगे उठती हैं।
‘धरम सरम सब खोय के, रहै आप हिय खोल।’ और सब धर्म और सब शर्म उसी कामवासना के कारण खो जाती है।
कामी आदमी को कुछ दिखाई नहीं पड़ता। न उसे यह दिखाई पड़ता है कि क्या ठीक है; न उसे यह दिखाई पड़ता है कि क्या शिष्ट है।
एक आदमी पकड़ा गया अदालत में। क्योंकि वह एक शराफ की दुकान से एक सोने की ईंट ले कर भागा--भरे बाजार में, भरी दुपहरी में। ग्राहक दुकान पर थे। फौरन पकड़ा गया। पुलिसवाला चैरस्ते पर खड़ा था। मजिस्ट्रेट ने पूछा, ‘यह भी हद्द हो गई! चोरी तो हमने बहुत सुनी। चोर रोज यहां आते हैं। मगर लोग रात में, आधी रात में अब सब सोया हो संसार, तब चोरी करते हैं। भरी दुपहरी? भरे बाजार में? दुकार पर ग्राहक; दुकानदार जागा हुआ; नोकर-चाकर सब चल रहे, फिर रहे...। सड़क पर पुलिसवाला खड़ा है। तू ने चोरी करने की हिम्मत की! तुझे कुछ दिखाई नहीं पड़ता? तू बिल्कुल अंधा है।
वह चोर हंसने लगा। उसने कहा कि ‘हालत यही है। सोने की मेरे मन में ऐसी वासना है कि जब मुझे सोना दिखाई पड़ता है, तो फिर मुझे कुछ और दिखाई नहीं पड़ता। जब मैंने यह ईंट देखी सोने की--इसकी दुकान पर रखी--फिर मुझे न यह दुकानदार दिखाई पड़ा, न ग्राहक दिखाई पड़े, न पुलिसवाला दिखाई पड़ा। कुछ नहीं दिखाई पड़ा। बस, सोने की ईंट दिखाई पड़ी।
कामी को कुछ दिखाई नहीं पड़ता। कामी को वही दिखाई पड़ता है, जो उसकी नजर में है, जो उसकी वासना में है।
‘धरम सरम सब खोय के, रहै आप हिय खोल।’ और जहां परमात्मा को बसना चाहिए, वहां हम काम को बसा लेते हैं--अपने हृदय में। जहां राम को बसना चाहिए, वहां काम को बसा लेते हैं। यही हमारी दुर्गति है।
‘मोह बड़ा दुखरूप है, यही हमारा दुख है।’
मोह बड़ा दुखरूप है, ताकूं मारि निकास।
प्रीत जगत की छोड़ दे, जब होवै निर्वास।।
अगर वासना रहित होना हो, तो बाहर की वस्तुओं के साथ लगाव लगाना छोड़ दो। और ध्यान रखनाः फिर याद दिला दूँ कि चरणदास यह नहीं कह रहे हैं कि भाग जाओ। चरणदास इतना ही कह रहे हैं कि यह क्रांति तुम्हारे अंतर्जगत में होनी है। तुम जाग जाओ।
‘जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों अंबुज सर माहिं।’ जैसे कमल रहना है सरोवर में, वैसे जगत् में रहो।
जग माहीं ऐसे रहो, ज्यो अंबुज सर माहिं।
रहै नीर के आसरे, जल छूवत नाहिं।।
रहता जल में है और जल छूता नहीं। ऐसे संसार में रहो और संसार न छूए।
जल में कमलवत--यही संन्यास की परिभाषा है। जल छोड़ कर भाग गए, फिर जल न छूए--इसमें क्या गुणतत्ता? जल में रहे और जल न छूए--तो गुणवत्ता।
रहो जगत् में और राम तुम्हारे भीतर रहे--तो गुणवत्ता।
जैसे हो वैसे ही, जहां हो वैसे ही। कुछ और करना नहीं है। बाहर तो कुछ चीज भी उठा कर यहां-वहां नहीं रखनी है। पत्नी अपनी जगह है। बच्चे अपनी जगह हैं। काम अपनी जगह है। वह सब होता रहे, जैसा हो रहा है। नाटक समझो।
जैसे अभिनेता काम कर आता है। अभिनेता राम बन जाता है। सीता चोरी चली जाती है, तो रोता है। मंच पर झाड़ों से पूछता है कि मेरी सीता कहां? आंसू बहाता है। लेकिन यह कुछ भी छूता नहीं। क्योेंकि सीता से क्या लेना-देना उसे? यह तो नाटक है। परदा गिरेगा, अपने घर चला जाएगा और मजे से सोएगा। एक बार भी ख्याल न आएगा। रात सपना भी नहीं देखेगा कि मेरी सीता खो गई। रात उधेड़बुन में भी नहीं रहेगा--कि क्या करूं, क्या न करूं; कहां से पाऊं?
सीता से कुछ लेना-देना नहीं है। यद्यपि नाटक में पूरा-पूरा काम कर आया है। काम पूरी कुशलता से कर दिया है।
मैं उस को संन्यस्त कहता हूं, जो जगत् में अभिनय पूर्वक रहे। काम पूरा कर दे। पति हो, तो पति का अभिनय पूरा कर दो। पत्नी हो, तो पत्नी का अभिनय पूरा कर दो।
और मजा यह है कि अगर अभिनय समझ कर करो, तो ज्यादा कुशलता से पूरा कर सकोगे; क्योंकि कोई चिंता नहीं, कोई फिकर नहीं।
कर्ता बने--कि चिंता-फिकर आती है। असली राम को भी चिंता-फिकर आई होगी। सीता खो गई, तो चिंतित हुए होंगे, परेशान हुए होंगे। मगर यह जो रामलीला का राम है, इसको कोई चिंता नहीं आती। इसे कोई फिकर ही नहीं। यह तो नाटक ही है।
अभिनय सीखो! अभिनय में निष्णात बनो--और तुम जल में कमलवत रह सकोगे। ‘रहे नीर के आसरे, जल छूवत नाहिं।’
‘जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों जिहवा मुख माहिं।’ जैसे जीभ रहती है मुंह में। ‘घीव घना भच्छन करै, तो भी चिकनी नाहिं।’
कितना घी पीते रहते हो, लेकिन फिर भी जीभ चिकनी नहीं होती; जल में कमलवत् रहती है।
‘जा घट चिंता नागिनी, ता मुख जप नहिं होय।’ और चिंता पकड़ती हो इसलिए है कि तुमने अपने को कर्ता मान लिया; नहीं तो चिंता क्या है। रामलीला के राम को चिंता नहीं पकड़ती; तुम्हें चिंता पकड़ती है। चिंता पकड़ती है, क्योंकि कर्ता हो गए।
कर्ता हुए--कि चिंता पकड़ी। कर्ता मत बनो। कर्ता तो एक राम है। कर्ता तो एक भगवान है। कर्ता का का उसी पर छोड़ दो।
तुम तो अपने को इतना ही जानो कि एक अभिनय मिला है, इसे पूरा कर देना है। जो उसने दे दिया है अभिनय, वही पूरा कर देना है। पूरी कुशलता से पूरा कर देना। अपना पूरा कौशल्य, अपनी पूरी प्रवीणता, अपनी पूरी बुुद्धि--सब से पूरा कर देना। मगर ध्यान रखना है कि मैं कर्ता नहीं हूं।
तब तुम चकित हो जाओगे। चह जगत फिर पकड़ेगा नहीं। यह जगत पास-पास रह कर भी दूर-दूर रहेगा। यह जगत सब तरफ से तुम्हें घेरे हुए भी तुम्हें छूएगा नहीं। तुम अस्पर्शित रह जाओगे। तुम इस पर कमलवत तैरने लगोगे।
इस देश ने इससे बड़ी कोई महिमा नहीं मानी--कि मनुष्य जगत में रह कर कमलवत तैर जाए। इसलिए हमने कृष्ण को पूर्णावतार कहा। क्योंकि बुद्ध तो छोड़ कर चले गए।
कृष्ण जगत में ही रहे। सारे खेल में खड़े रहे--भागे नहीं। और जगत में रह कर भी अछूते रहे। इसलिए कृष्ण को पूर्णावतार कहा है।
बुद्ध तो छोड़ कर चले गए। अवतार तो हैं, लेकिन छोड़ कर चले गए--यह बात थोड़ी सी खटकती है। इसका मतलब यह हुआ कि थोड़े डरे।
रवींद्रनाथ ने एक कविता लिखी है। रवीन्द्रनाथ बुद्ध से राजी नहीं थे। रवींद्रनाथ का मन तो कृष्ण के साथ रंगा था। रवींद्रनाथ को बुद्ध का छोड़ कर जाना खटकता था।
तो रवींद्रनाथ ने एक कविता लिखी है कि बुद्ध जब बुद्धत्व पाकर घर वापस लौटे, तो उनकी पत्नी यशोधरा ने उनसे पूछा है कि ‘मैं एक ही सवाल पूछना चाहती हूं।’...(वह सवाल यशोधरा ने पूछा या नहीं, यह सवाल नहीं है। रवींद्रनाथ ने पूछवाया है कि) ‘मैं एक ही सवाल पूछना चाहती हूं कि जो तुम्हें जंगल में जाकर मिला, वह क्या यहीं इसी राजमहल में नहीं मिल सकता था? और बुद्ध चुप खड़े रह गए।
रवींद्रनाथ ने उनसे जवाब नहीं दिलवाया। उनको चुप रखा है। बुद्ध जवाब भी क्या दें? इसलिए चुप रखा है।
बात तो सच ही है। जो वहां मिला, यहां भी मिल सकता था। सत्य का स्थान से क्या संबंध है? सत्य की कोई शर्त थोड़े ही है कि झोपड़ी में मिलेगा; महल में नहीं मिलेगा। सत्य की कोई शर्त थोड़े ही है कि जंगल में मिलेगा; बस्ती में नहीं मिलेगा। यह भी क्या बात है!
तो बुद्ध चुप रह गए हैं। बुद्ध ने उत्तर नहीं दिया है। रवींद्रनाथ ने जान कर उत्तर नहीं दिलवाया है कि बुद्ध के पास उत्तर नहीं है। यशोधरा ने प्रश्न ऐसा पूछा है कि बुद्ध मौन रह गए। उत्तर नहीं है।
बात तो यशोधरा ठीक ही पूछती हैः कि जो वहां मिला, यहां नहीं मिल सकता था?
अब आज बुद्ध यह भी नहीं कह सकते है कि यहां नहीं मिल सकता था। क्योंकि मिलने के बाद तो यह बात समझ में आ गई कि यहां भी मिल सकता था। कहीं भी मिल सकता था।
जहां हो--उसे ही प्रभु का प्रसाद समझ कर वहीं रहो, और वहीं अपने को अलिप्त करने लगो, तो संसार एक पाठशाला हो जाती है।
संसार पाठशाला है और इसमें जो संन्यासी होकर जी लेता है, वह उत्तीर्ण हो गया; उसने पाठ सीख लिया। इसलिए इस जगत में जो संन्यस्त हो कर जी लेता है, दुबारा संसार में नहीं आता। जब पाठ ही सीख लिया, तो इसी स्कूल में जाने की दुबारा जरूरत न रही। असफल होते, तो फिर भेजे जाते।
असफल होता है आदमी, तो बार-बार फिर भेजा जाता है। जैसे ही कोई जगत में ठीक-ठीक जी लिया, पूरा-पूरा जी लिया, जान कर जी लिया, और अपने को अलिप्त रख कर जी लिया--पूर्ण हो गया। उसका काम पूरा हो गया। उसने अपनी नियति पूरी कर ली। अब उसका दुबारा आना नहीं।
‘जा घट चिंता नागिनी, ता मुख जप नहिं होय।’ लेकिन कर्ता के भाव से चिंता पैदा होती है--कि कल सुबह क्या करूं? कैसे दुकान चलाऊं? कैसे पैसा कमाऊं? मिलेगाः नहीं मिलेगा? ऐसा करना है, वैसा करना है?
लेकिन जिसने कर्ता परमात्मा को मान लिया...। और ध्यान रखना, जिसने अपने को अकर्ता माना, उसने परमात्मा को कर्ता मान ही लिया। क्योंकि हो तो रहा ही है। अब मैं कर्ता नहीं हूं, तो कोई तो कर्ता होगा। कृत्य तो हो ही रहा है। परमात्मा कर्ता है।
दो ही स्थितियां हैंः या तो तुम अपने को कर्ता मानो या अपने को साक्षी मानो।
अब ध्यान रखनाः तुमसे बहुत से धर्मों ने यह बात कही है; बहुत से धर्म गुरुओं ने यह बात कहीं है--कि ‘जो भी करो, सोच समझ कर करना; परमात्मा देख रहा है।’ इसका मतलब हुआ कि तुम कर्ता हो, परमात्मा साक्षी है। यह एक दशा है। यह संसारी की दशा है।
दूसरी दशा, जो मैं तुमसे कहता हूंः तुम साक्षी बनो; परमात्मा कर्ता है। तुम देखो--उसे करने दो। यह संन्यासी की दशा है।
मैं पहली बात से राजी नहीं। परमात्मा साक्षी--तो फिर कर्ता कौन है? फिर कर्ता तुम हो जाओगे। और तुम कर्ता हुए कि चिंता आई। हजार चिंताएं आ जाएंगी। दुकान चलेगी कि नहीं! पैसा आएगा कि नहीं? पत्नी बीमार है--ठीक होगी कि नहीं? बेटा परीक्षा दे रहा है--पास होगा कि नहीं? ऐसा होगा कि नहीं; वैसा होगा कि नहीं?
चिंता का अर्थ क्या है? चिंता का अर्थ ही यह है कि बोझ मुझ पर है। पूरा कर पाऊंगा? नहीं; तुम साक्षी हो जाओ।
कृष्ण ने गीता में यही बात अर्जुन से कही है कि तू कर्ता मत हो। तू निमित्त-मात्र है; वही करने वाला है। जिसे उसे मारना है, मार लेगा। जिसे नहीं मारना है, नहीं मारेगा। तू बीच में मत आ। तू साक्षी भाव से जो आज्ञा दे, उसे पूरी कर दे।
परमात्मा कर्ता है--और हम साक्षी। फिर अहंकार विदा हो गया। न हार अपनी है, न जीत अपनी है। हारे तो वह, जीते तो वह। न पुण्य अपना है, न पाप अपना है। पुण्य भी उसका, पाप भी उसका। सब उस पर छोड़ दिया। निर्भार हो गए। यह निर्भार दशा संन्यास की दशा है।
‘जा घट चिंता नागिनी, ता मुख जप नहिं होय।’ और जब तक चिंता है, तब तक जप नहीं होगा। तब तक कैसे करोगे ध्यान? कैसे करोगे हरि-स्मरण? चिंता बीच-बीच में आ जाएगी। तुम किसी तरह हरि की तरफ मन ले जाओगे, चिंता खींच-खींच संसार में ले आएगी।
तुमने देखा न कि जब कोई चिंता तुम्हारे मन में होती है, तब बिल्कुल प्रार्थना नहीं कर पाते। बैठते हो, ओठ से राम-राम जपते हो और भीतर चिंता का पाठ चलता है।
चिंता और प्रभु-चिंतन साथ-साथ नहीं हो सकते। चिंता यानी संसार का चिंतन।
व्यर्थ का कूड़ा-कचरा तुम्हारे मन को घेरे रहता है। तो उस कूड़े-कचरे में तुम परमात्मा को बुला भी न सकोगे। उसके आने के लिए तो शांत और शून्य होना जरूरी है। और शांत और शून्य वही हो जाता है, जिसने कर्ता का भाव छोड़ दिया।
जा घट चिंता नागिनी ता मुख जप नहिं होय।
जो टुक आवै याद भी, उन्हीं जाय फिर खोय।।
और कभी क्षणभर को--टुक--जरा सी याद भी परमात्मा की आती है खिसक-खिसक जाती है। फिर मन संसार में चला जाता हैै। फिर सोचने लगता है कि ऐसा करूं, वैसा करूं? क्या करूं, क्या न करूं? ऐसा होगा--नहीं होगा?
इतना ही नहीं, मन इतना पागल है कि अतीत के संबंध में भी सोचता है कि ऐसा क्यों न किया? ऐसा क्यों कर लिया?
अब अतीत तो गया हाथ के बाहर। अब कुछ किया भी नहीं जा सकता। किए को अनकिया नहीं किया जा सकता। अब अतीत में कोई तरमीम, कोई सुधार, कोई संशोधन नहीं हो सकता। मगर मन उसका भी सोचता है कि फलां आदमी ने ऐसी बात कही थी, काश! हमने ऐसा उत्तर दिया होता!
अब तुम क्यों समय गंवा रहे हो? वक्त जा चुका। जो उत्तर दिया--दिया। जो कहना था--हो गया। जो करना था--हो गया। अब तुम क्या कर सकते हो? अतीत को बदला नहींं जा सकता। लेकिन आदमी अतीत की भी चिंता करता है।
बैठे हैं लोग; सोच रहे हैं कि ऐसा किया होता, वैसा किया होता। इस स्त्री से विवाह न किया होता, उस स्त्री से विवाह कर लिया होता। और उस स्त्री से किया होता, तो भी तुम यही सोचते होते। कोई फर्क न पड़ता।
अतीत की चिंता तो बिल्कुल व्यर्थ है। क्योंकि जो हो ही चुका--हो ही चुका। उसकी क्या चिंता? और भविष्य की चिंता भी व्यर्थ है, क्योंकि जो अभी नहीं हुआ--अभी हुआ ही नहीं--उसकी क्या चिंता? उसकी चिंता से क्या होगा?
तुम्हारे हाथ में क्या है? एक श्वास भी तुम्हारे हाथ में नहीं। कल सूरज उगेगा भी कि नहीं उगेगा--इसका भी कुछ पक्का नहीं। कल सुबह होगी भी या नहीं होगी--इसका भी कुछ पक्का नहीं। तुम होओगे कल या नहीं होओगे--कुछ पक्का नहीं। मगर बड़ी योजनाएं, बड़ी चिंताएं, कर्ता के भाव के साथ-साथ चली आती है।
‘जो टुक आवै याद भी, उन्ही जाय फिर खोय।’ बार-बार खो जाती है
‘आशा नदिया में चलै सदा मनोरथ-नीर।’ और मन की वासनाओं की धारें पर धारें; जल का प्रवाह--आशा की नदिया में बहता चला जाता है।
सपने पर सपने हैं। कतार बंधी हैं। पंक्तिबद्ध चले आते हैं। एक सपना चुकता नहीं कि दूसरा पकड़ लेता है।
आशा नदिया मे चलै, सदा मनोरथ नीर।
परमारथ उपजै बहै, मन नहिं पकरै धीर।।
और कभी कभी अगर उस परमार्थ की याद भी आ जाती हैः ‘जो टुक आवै याद भी’--कभी प्रभु का स्मरण भी आ जाता है; कभी सत्संग भी मिल जाता है, कभी शुभ घड़ी भी आ जाती है। कभी ऐसा मुहूर्त आ जाता है कि क्षण भर को उसकी याद घनी होने लगती है। ‘परमारथ उपजै, बहै। लेकिन उपज भी नहीं पाता, कि यह जो ‘आशा नदिया में मनोरथ का नीर’ बह रहा है, उसमें बह जाता है।
‘परमारथ उपजै, बहै, मन नहीं पकरै धीर।’ और मन उसमें स्थिर नहीं हो पाता। मन ठहर नहीं पाता।
ऐसा नहीं है कि परमात्मा तुम्हारे भीतर कभी-कभी नहीं उपजता। उपजता है। जो तुम्हारी आत्यंतिक नियति है, वह कैसे न उपजेगा!
तुम्हारे सारे शोरगुल के बाद भी, बावजूद भी कभी-कभी उसकी आवाज तुम्हारे भीतर सुनाई पड़ती है। तुम्हारे सारे अंधकार के बीच भी कभी-कभी उसकी किरण आती है।
तुम उसे भूल गए हो, लेकिन वह तुम्हें नहीं भूला है। वह तुम्हें खोजता आता है। वह अपना हाथ तुम्हारे हाथ की तरफ फैलाता है।
तुम चाहे अपनी मुट्ठी में कूड़ा-कबाड़ रखे हुए हो; और तुम्हारा हाथ तैयार भी नहीं है उसके हाथ को पकड़ने को, लेकिन उसका हाथ कभी-कभी तुम्हें छू जाता है--तुम्हारे बावजूद छू जाता है। तुम नहीं चाहते, तो भी छू जाता है।
‘परमारथ उपजै बहै, मन नहीं पकरै धीर।’ लेकिन यह बीज रुप नहीं पाता। यह परमार्थ का, यह अध्यात्म का बीज रुप नहीं पाता, क्योंकि ‘आशा नदिया में चलै, सदा मनोरथ-नीर।’
जैसे नदी में कोई फसल उगाने चले, तो फसल टिक नहीं पाएगी। बीज ही नहीं टिक पाएगा। तुम डालोगे नहीं--कि नदिया बहा ले जाएगी। ऐसी ही मन की दशा है।
‘अभिमानी मीजे गए।’ तो जिन-जिन को कर्ता होने का अभिमान है, वे तो मींजे जाएंगे। बुरी तरह टूटेंगे। अपने अभिमान के कारण ही टूटेंगे।
‘अभिमानी मींजे गए, लूट लिए धन बाम।’ और कितना ही धन इकट्ठा करो, और कितनी ही
सुंदरियां इकट्ठी करो, कितने ही मकान बनाओ, कितनी ही पद-प्रतिठा--सब लुट जाएगा। मौत आएगी--सब छीन लेगी।
अभिमानी मींजे गए, लूट लिए धन बाम।
निर अभिमानी हो चले, पहुंचे हरि के धाम।।
और जिसने अहंकार छोड़ा, कर्ता का भाव छोड़ा, जिसने मैं की अकड़ छोड़ी, जो झुका, जिसने समर्पण किया--‘निर अभिमानी हो चले, पहुंचे हरि के धाम।’ वे ही केवल प्रभु के घर तक पहुंच पाते हैं; प्रभु-मंदिर तक पहुंच पाते हैं--हरि-धाम तक।
‘चरनदास यूं कहत हैं, सुनियो संत सुजान।’ चरणदास कहते हैं कि वे ही सुन सकेंगे जो शांत हैं, सरल हैं और बोधवान हैं। ‘सुनियो संत सुजान।’
‘मुक्तिमूल आधीनता, नरकमूल अभिमान।’
एक ही मौलिक सूत्र है--‘मुक्तिमूल आधीनता।’ तुम परमात्मा के आधीन हो जाओ, उसके चरण गह लो।
‘नरकमूल अभिमान।’ कर्ता होने का अहंकार छोड़ो। कर्ता होने का अहंकार ही नरक ले जाएगा। ले जाएगा--यह कहना भी ठीक नहीं है। ले ही गया।
कर्ता नरक में ही जीता है। कहां सुख? दुख ही दुख है। विक्षिप्त रहता है। पागल की तरह दौड़ा रहता है। हजार बार हारता है, फिर भी उठ-उठ कर दौड़ने लगता है। हार से भी कुछ नहीं सीखता। और जीत से भी कुछ नहीं सीखता। हारता है, तो भी यही सोचता है कि इस बार हार गया, कोई बात नहीं। अगली बार जीत जाऊँगा।
हार से भी कुछ नहीं सीखना। और सब जीत जाता है, तब भी कुछ नहीं सीखता। क्योंकि जीत से भी क्या जीत मिलती है? जीत कर भी तो हार ही होती हैं।
इस जगत में हार ही लिखी है। जीतो--तो हार जाते हो। हारो--तो हार जाते हो।
जीत कर भी क्या मिलेगा? एक दिन सब मिट्टी में मिल जाते हैं, कब्र में मिल जाते है।
‘मुक्तिमूल आधीनता, नरक मूल अभिमान।’ इसलिए अगर मुक्ति चाहनी हो--परम सौभाग्य स्वातंत्र का, मोक्ष का रस भोगना हो, तो एक बात छोड़ दोः अहंकार छोड़ दो। मैं हूं--यह भाव छोड़ दो।
और भक्ति ‘मैं’ को छोड़ने में जितनी सहयोगी है, ज्ञान का मार्ग उतना सहयोगी नहीं है। क्योंकि ज्ञान के मार्ग पर ‘मैं’ बना ही रहता है। ऐसा लगता ही रहता है कि ‘मैं जागने वाला’।
तपश्चर्या के मार्ग पर मैं बना ही रहता है। मैं तपस्वी; मैं तप करने वाला; मैंने इतने उपवास किए, इतने वत किए, इतना जीवन को अनुशासित किया!
लेकिन भक्त यह सब छोड़ देता है। वह कहता हैः मेरा क्या? सब तेरा। तू सम्हाल। बुरा हूं, तो तेरा। भला हूं--तो तेरा। जो काम लेना हो, ले ले। राम बनाना हो तो राम बना दे। और रावण बनाना हो, तो रावण बना दे। मैं कौन चुनने वाला? जो तू दे देगा, आज्ञा, वही पूरी कर दूंगा। तेरी मरजी पूरी हो। मैं नहीं हूं--तू है। मैं तेरी छाया। मैं तेरे पीछे-पीछे डोलूंगा। ‘मुक्तिमूल आधीनता।’
यह है अर्थ आधीनता का--कि मैं तेरी छाया की तरह डोलूंगा। तू जहां जाएगा, वहीं जाऊंगा।
तुझसे अन्यथा मेरा कोई होना नहीं। तुझसे भिन्न मेरी कोई आवाज नहीं। मेरा अपना कोई स्वर नहीं; मेरा कोई हस्ताक्षर नहीं। मैं बस, तेरी गूंज हूं--तेरी प्रतिगूंज। मैं तो बांस की पोली पोंगरी हूं; तू जो गीत गाएगा--गाना। न गाना हो--न गाना। बांसुरी बनाना हो, बांसुरी बना देना। और बाँस की पोंगरी ही रहने
देना हो, तो बांस की पोंगरी ही रहने देना। मैं हर हाल राजी हूं।
इस स्वीकृति में मुक्ति है; इस आधीनता में मुक्ति है। ‘मुक्तिमूल आधीनता, नरकमूल अभिमान।’
चरणदास के ए सूत्र बड़े प्यारे हैं। चरणदास के साथ यह यात्रा अगर तुम्हें करनी हो, तो चरणदास हो जाओ।
और जल्दी करो।
शीत से
वसंत जितना दूर है
बूंद से दूर है जितना
मोती
या कहो
दूर है जितना फूल से फल
उतनी ही दूर है अब
मेरी देह से आग
आग से राख
राख से गंगा-जल
ज्यादा देर नहीं है, गंगाजल में विसर्जित हो जाओगे। इसके पहले जागो। इसके पहले असली गंगा को पुकारो। भगीरथ बनो। असली गंगा को उतारो। ‘राम की गंगा’ को उतारो।
‘शीत से वसंत जितना दूर है।’ ज्यादा दूर क्या!
शीत से
वसंत जितना दूर है
बूंद से दूर जितना है
मोती
या कहो
दूर है जितना फूल से फल
कितनी दूर? कोई ज्यादा दूर नहीं। आया ही आया है। आ ही रहा है। उतनी ही दूर हैः ‘अब मेरी देह से आग। आग से राख, राख से गंगाजल।’
इसके पहले कि गंगाजल में तुम्हारी राख विसर्जित हो, अपने को परमात्मा में विसर्जित कर लो।
तुमने कहानी तो सुनी है न। दो गंगाएं हैंः एक तो स्वर्ग में ही है--स्वर्ग-गंगा। एक पृथ्वी पर उतरी है। इसके पहले कि पृथ्वी पर उतरी है। इसके पहले कि पृथ्वी की गंगा में तुम्हारी राख विसर्जित कर दी जाए, अपने अहंकार को स्वर्ग की गंगा में डूबा लो।
‘मुक्तिमूल आधीनता, नरकमूल अभिमान।’
चरणदास तुम्हें पुकार रहे हैं।
लाओ, अपना हाथ मेरे हाथ में दो
नये क्षितिजों तक चलेंगे
हाथ में हाथ डाल कर
सूरज से मिलेंगे
इसके पहले भी
चला हूं, लेकर हाथ में हाथ
मगर वे हाथ
किरणों के थे, फूलों के थे
सावन के
सरिता में कूलों के थे
मैं तुम्हारा हाथ
अपने हाथ में लेना चाहता हूं
नये क्षितिज
तुम्हें देना चाहता हूं
दो अपना हाथ मेरे हाथ में
नये क्षितिजों तक चलेंगे
साथ-साथ सूरज से मिलेंगे।
सुनो यह पुकार। किसी गुुरु के हाथों में हाथ दो, ताकि किसी दिन परमात्मा का हाथ भी तुम्हें मिल जाए।
लांओ, अपना हाथ मेरे हाथ में दो
नये क्षितिजों तक चलेंगे
हाथ में हाथ डाल कर
सूरज से मिलेंगे।
सूरज से मिलना है। प्रकाश से मिलता है। बहुत रह लिए अंधेरे में, अब और कितना? इतना बहुत नहीं है क्या?
बहुत काफी हो चुका। अंधेरे में जी लिए, कुछ पाया नहीं। अब रोशनी मे जीने की आकांक्षा करो।
प्रकाश की अभीसा करो।
मैं तुम्हारे हाथ
अपने हाथ में लेना चाहता हूं
नये क्षितिज
तुम्हें देना चाहता हूं
दो अपना हाथ मेरे हाथ में
नये क्षितिजों तक चलेंगे
साथ-साथ सूरज से मिलेंगे।
यही सदा से सभी सदगुरुओं का आश्वासन रहा है।

आज इतना ही।

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