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गुरुवार, 23 अगस्त 2018

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-09)

नौवां-प्रवचन-(यहि नगरी में होरी खेलौं री)

सारसूत्र:

रंगि-रंगि चंदन चढ़ावहु, सांईं के लिलार रे।।
मन तें पुहुप माल गूंथिकै, सो लैकै पहिरावहु रे।
बिना नैन तें निरखु देखु छवि, बिन कर सीस नवावहु रे।।
दुइ कर जोरिकै बिनती करिकै, नाम कै मंगल गावहु रे।
जगजीवन विनती करि मांगै, कबहुं नहीं बिसरावहु रे।।

यहि नगरी में होरी खेलौं री।।
हमरी पिया तें भेंट करावौ, तुम्हरे संग मिलि दौरौं री।।
नाचौं नाच खोलि परदा मैं, अनत न पीव हंसौ री।
पीव जीव एकै करि राखौं, सो छवि देखि रसौं री।।
कतहूं न वहौं रहौं चरनन ढिग, मन दृढ होए कसौं री।।

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-08)

आठवां-प्रवचन-(गुरु है शमा, शिष्य परवाना)

प्रश्न-सार

01-॰ गुरु तो सदैव मुमुक्षु की आध्यात्मिक स्थिति जान सकते हैं, परंतु मुमुक्षु कैसे जाने कि गुरु सत्य को उपलब्ध है अथवा नहीं?
02-और क्या शिष्य दूसरे गुरु के पास जा सकता है?
03-॰ तेरे द्वार खड़ी भगवान,
 04-ओशो भर दे रे झोली!
05-॰ कृष्ण का नाम ही सुना है, शिव को जाना भी नहीं, किंतु कुंडलिनी ध्यान में ऐसा क्यों लगा कि यहीं शिव का नृत्य हो रहा है और यहीं की मधुर आवाज कृष्ण की बांसुरी की आवाज है?

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-07)

सातवां-प्रवचन-(साध से बड़ा न कोई)

सारसूत्र:

गऊ निकसि बन जाहीं। बाछा उनका घर ही माहीं।।
तृन चरहिं चित्त सुत पासा। गहि जुक्ति साध जग-बासा।।
साध तें बड़ा न कोई। कहि राम सुनावत सोई।।
राम कही, हम साधा। रस एकमता औराधा।।
हम साध, साध हम माहीं। कोउ दूसर जानै नाहीं।।
जन दूसर करि जाना। तेहिं होइहिं नरक निदाना।।
जगजीवन चरन चित लावै। सो कहिके राम समुझावै।।

साध कै गति को गावै। जो अंतर ध्यान लगावै।।
चरन रहे लपटाई। काहू गति नाहीं पाई।।
अंतर राखै ध्याना। कोई विरला करै पहिचाना।।

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-06)

छठवां-प्रवचन-(अंतर्यात्रा है परमात्मा

प्रश्न-सार

01-॰ प्रभु की पुकार कैसे सुनाई दे?
02-॰ सत्यबोध और आत्मानुभूति हेतु साधना से कार्य-कारण-संबंध नहीं बनता, फिर पद्धतिबद्ध साधन-ध्यान करने की क्या आवश्यकता है?
03-॰ प्रवचन से पहले जगजीवन के पदों का पाठ किया गया तो अकस्मात मेरा दिल भर आया और सारे समय आंसू बहते रहे। पदों का पाठ रुका तो मेरे आंसू बंद हुए। इन पदों का मतलब मैं आपके प्रवचन के बाद समझा। भगवान, ऐसा क्यों हुआ?
04-॰ उठूं ऊपर या मनुहार करूं पता नहीं पाता हूं जितना मुट्ठी को कसता हूं दूर चला जाता हूं क्या करूं प्रभु? मार्ग दीजिए!
05-॰आप राजनेताओं का सदा मजाक क्यों उड़ाते हैं? और राजनेता चूड़ीदार पाजामा ही क्यों पहनते हैं?

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-05)

पांचवां-प्रवचन-(गगन-मंदिल दृढ़ डोरि लगाव हु)

सारसूत्र:

अरी, मैं तो नाम के रंग छकी।।
जब तें चाख्या बिमल प्रेमरस, तब तें कछु न सोहाई।
रैनि दिना धुनि लागि रहीं, कोउ केतौ कहै समुझाई।।
नाम पियाला घोंटिकै, कछु और न मोहिं चही।
जब डोरी लागी नाम की तब केहिकै कानि रही।।
जो यहि रंग में मस्त रहत है, तेहि कैं सुधि हरना।
गगन-मंदिल दृढ़ डोरि लगावहु, जाहि रहौ सरना।
निर्भय ह्वैकै बैठि रहौं अब, मांगौं यह बर सोई।।
जगजीवन विनती यह मोरी, फिरि आवन नहिं होई।।

बुधवार, 22 अगस्त 2018

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-04)

चौथा-प्रवचन-(महासुखः फैलना और फैलते जाना)

प्रश्न-सार

01-॰ हम खुदा के तो कभी कायल न थे
तुम्हें देखा तो खुदा याद आया।
 शवूर सिजदा नहीं है मुझको, तू मेरे सिजदों की लाज रखना
यह सिर तेरे आस्तां से पहले, किसीके आगे झुका नहीं है।
02-॰ भगवान,
मेरी पत्नी के मन में कोई प्रश्न नहीं उठता! क्या कारण है?

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-03)

तीसरा-प्रवचन-(तुम जानत तुम देत जनाई)

सारसूत्र:

जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय।
कब मोरा जियरा जुड़इहौ आय।।
अस मन ललकै, मिलौं मैं धाय।
घर-आंगन मोहिं कछु न सुहाय।।
अस मैं ब्याकुल भइउं अधिकाय।।
जैसे नीर बिन मीन सुखाय।।
आपन केहि तें कहौं सुनाय।
जो समुझौं तौ समुझि न आय।।
संभरि-संभरि दुख आवै रोय।
कस पापी कहं दरसन होय।।
तन मन सुखित भयो मोर आय।
जब इन नैनन दरसन पाय।।
जगजीवन चरनन लपटाय।
रहै संग अब छूटि न जाय।।

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-02)

दूसरा--प्रवचन-(सत्संग सरोवर, भक्ति स्नान)

प्रश्न-सार

॰ मनुष्य क्या है?
॰ परमात्मा की पहली झलक क्या है? यह कब घटित होती है?
॰ क्या सत्संग और भक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं?
॰ प्रभु जग से नाता तोड़ी रे
मैं तुझसे नाता जोड़ी...
॰ यदि सब परमात्मा के हाथ में है, तो फिर व्यक्ति की स्वतंत्रता बेमानी हो जाती है। कृपया समझाएं।

पहला प्रश्नः मनुष्य क्या है?

एक अभीप्सा--स्वयं के अतिक्रमण की। जैसे बीज मिट जाना चाहे ताकि वृक्ष हो सके, ऐसा ही मनुष्य एक बीज है--मिट जाने को आतुर, ताकि परमात्मा हो सके।
मनुष्य बीज है परमात्मा के फूल का। इसलिए जिस मात्रा में जो मिटने को राजी है, उतना ही ज्यादा मनुष्य है। और जो मिटने में जितना सफल हो गया, उतना ही धन्यभागी है।

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(प्रवचन-01) 

अरी मैं तो नाम के रंग छकी-(जगजीवन दास) 

पहला-प्रवचन-(चाहत खैंचि सरन ही राहत)

सारसूत्र:

साईं, जब तुम मोहि बिसरावत।
भूलि जात भौजाल-जगत मां, मोहिं नाहिं कछु भावत।।
जानि परत पहिचान होत जब, चरन-सरन लै आवत।
जब पहिचान होत है तुमसे, सूरति सुरति मिलावत।।
जो कोई चहै कि करौं बंदगी, बपुरा कौन कहावत।
चाहत खैंचि सरन ही राखत, चाहत दूरि बहावत।।
हौं अजान अज्ञान अहौं प्रभु, तुमतें कहिकै सुनावत।
जगजीवन पर करत हौ दाया, तेहिते नहिं बिसरावत।।

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-10)

अपने माहिं टटोल-(साधना-शिविर)

दसवां प्रवचन-सत्य है अनुसंधान-- मुक्त और स्वतंत्र

इधर तीन दिनों में सत्य की खोज में और उस रास्ते पर किन बाधाओं को मनुष्य दूर करे, किन सीढ़ियों को चढ़े और किन बंद द्वारों को खोले, उस संबंध में बहुत सी बातें हुई हैं। बहुत से प्रश्न भी उस संबंध में पूछे गए हैं। आज की रात उन सारे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर मैं चर्चा करूंगा जो शेष रह गए हैं।
सबसे पहले, अनेक प्रश्न पूछे गए हैं कि हजारों वर्षों से हजारों लोग जिन बातों को मान रहे हैं, मैं उन बातों को गलत क्यों कहता हूं? और जिन बातों को इतने लोग सही मानते हों, क्या वे बातें गलत हो सकती हैं? क्या इतनी पुरानी परंपराएं, रूढ़ियां, जिन्हें हम सदा से मानते रहे हैं, भूल भरी हो सकती हैं?

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-09)

अपने माहिं टटोल-(साधना-शिविर)

नौवां प्रवचन-नई संस्कृति की खोज

मेरे प्रिय आत्मन्!
पिछली चर्चाओं के संबंध में बहुत से प्रश्न मेरे पास आए हैं। सभी प्रश्न बहुत अर्थपूर्ण, बहुत महत्व के हैं। कुछ थोड़े से प्रश्नों पर अभी और कुछ पर रात में विचार करेंगे। प्रश्न चूंकि बहुत हैं, मैं बहुत थोड़े संक्षेप में एक-एक का उत्तर देने की कोशिश करूंगा।
सबसे पहले, एक मित्र ने पूछा है, और वैसी बात करीब-करीब पूरे मुल्क में जगह-जगह पूछी जाती है। आप सबके मन में भी वह प्रश्न उठता होगा। उन्होंने पूछा हैः आजकल की दुनिया खराब हो गई है। अभी यह जो गीत गाया, उसमें भी यह बात है कि आजकल की दुनिया खराब हो गई है। इस खराब दुनिया को ठीक रास्ते पर कैसे लाया जाए?
इस प्रश्न में दो बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो यह कहना कि आजकल की दुनिया खराब हो गई है, इस बुनियादी भ्रम पर खड़ा हुआ है कि पहले की दुनिया अच्छी थी। यह बात इतनी बुनियादी रूप से गलत है जिसका कोई हिसाब नहीं। पहले की दुनिया भी आज से अच्छी नहीं थी। आज का आदमी खराब हो गया है, इससे ऐसा ख्याल पैदा होता है कि पहले का आदमी बहुत अच्छा था। शायद आपको पता नहीं कि इस तरह के ख्याल के पैदा हो जाने का कारण क्या है।

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-08)

अपने माहिं टटोल-(साधना-शिविर)

आठवां प्रवचन-अहंकार का भ्रम

मेरे प्रिय आत्मन्!
बीते दो दिनों में, मनुष्य के मन पर कौन सी जंजीरें हैं, उन जंजीरों में से दो जंजीरों की हमने बात की है। और आज तीसरी जंजीर की बात करेंगे।
पहली जंजीर इस बात की है, यह बोध, यह भ्रम, यह ख्याल कि मैं जानता हूं। ज्ञान का भ्रम मनुष्य के मन की कारागृह की पहली ईंट है। दूसरा, मैं कर्ता हूं, कर्म का मालिक हूं, अपना मालिक हूं, यह भाव भी एकदम भ्रांत और झूठा है। ये दोनों बातें हमने विचार कीं। आज तीसरी और सर्वाधिक कठिन बात पर हम विचार करेंगे।

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-07)

 अपने माहिं टटोल-(साधना-शिविर) 


सातवां प्रवचन-तुम ही हो परमात्मा

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से आज के प्रश्नोत्तरों की यह चर्चा शुरू करूंगा।
एक बहुत अंधेरी रात थी और एक रेगिस्तानी पहाड़ी पर एक छोटी सी सराय में एक बड़ा काफिला आकर रुका। उस काफिले में कोई सौ ऊंट थे। व्यापारी यात्रा कर रहे थे और थके-मांदे आधी रात को उस छोटी सी पहाड़ी सराय में पहुंचे थे विश्राम को। उन्होंने जल्दी-जल्दी खूंटियां गाड़ीं, ताकि वे अपने ऊंटों को बांध सकें, और फिर विश्राम कर सकें। लेकिन आखिरी ऊंट को बांधते वक्त उन्हें पता चला कि उनकी खूंटियां और रस्सियां कम पड़ गई हैं। निन्यानबे ऊंट तो बंध गए थे, एक ऊंट को बांधने के लिए रस्सी और खूंटी खो गई थी। उस ऊंट को उस अंधेरी रात में बिना बंधा छोड़ना खतरनाक था, भटक जाने का डर था।

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-06)

अपने माहिं टटोल-(साधना-शिविर)

छटवां प्रवचन-एक ही मंगल है--जागरण

मेरे प्रिय आत्मन्!
कल और आज, मनुष्य के चित्त पर जो बंधन हैं, उनमें से दो बंधनों के तोड़ने के संबंध में हमने विचार किया।
एक बंधन तो ज्ञान का बंधन है। हमेशा से यह कहा गया है कि मनुष्य अगर अपने अज्ञान को छोड़ सके, तो वह सत्य को पा सकेगा। लेकिन मैंने आपसे यह कहा कि इसके पहले कि मनुष्य अपने अज्ञान को छोड़े, जिस ज्ञान को उसने दूसरों से सीख लिया है, उस ज्ञान को छोड़ना और भी जरूरी है। उधार ज्ञान अज्ञान से भी ज्यादा घातक है। जो ज्ञान स्वयं का नहीं है, वह मुक्त नहीं करता, बल्कि बांध लेता है। इस संबंध में कल हमने चर्चा की।

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-05)

अपने माहिं टटोल--(साधना-शिविर)

पांचवां प्रवचन-यांत्रिक जीवन से मुक्ति

मेरे प्रिय आत्मन्!
मनुष्य के सत्य की खोज में जो पहली बाधा, जो पहला अटकाव, जो पहला बंधन है, उसे तोड़ने की बात हमने कल की। वह ज्ञान, जो हमें दूसरों से मिलता है, हमारे अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक है। वह इसलिए ज्यादा खतरनाक है कि उसके द्वारा हमारा अज्ञान मिटता तो नहीं, छिप जरूर जाता है, ढंक जाता है। और वह बीमारी जो ढंकी हो, उस बीमारी से खतरनाक होती है, जो खुली हो, उघड़ी हो, स्पष्ट हो। दूसरों के ज्ञान से, दूसरों के शब्दों और विचारों से, शास्त्रों और सिद्धांतों से हम कुछ जानते नहीं, लेकिन जानने लगे हैं, इस भ्रम में जरूर पड़ जाते हैं। शब्द सीख लिए जाते हैं और यह भ्रम पैदा हो जाता है कि सत्य सीख लिया गया है। ऐसे शब्दों, ऐसे ज्ञान, ऐसे उधार बासे विचारों पर मस्तिष्क मुक्ति तो नहीं खोज पाता, और नये-नये भ्रमजाल, और नई-नई कल्पनाओं, और नये-नये बंधनों में ग्रसित हो जाता है।

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-04)

अपने माहिं टटोल-(साधना-शिविर)

चौथा प्रवचन-जीवन का लक्ष्य

मेरे प्रिय आत्मन्!
बहुत से प्रश्न मेरे सामने हैं। उनमें से थोड़े से प्रश्नों पर अभी बात करूंगा।
सबसे पहले, एक मित्र ने पूछा हैः जीवन का लक्ष्य क्या है?
यह प्रश्न तो बहुत सीधा-सादा मालूम पड़ता है, लेकिन शायद इससे जटिल और कोई प्रश्न नहीं है। और प्रश्न की जटिलता यह है कि इसका जो भी उत्तर होगा, वह गलत होगा। इस प्रश्न का जो भी उत्तर होगा, वह गलत होगा। ऐसा नहीं कि एक उत्तर गलत होगा और दूसरा सही हो जाएगा। इस प्रश्न के सभी उत्तर गलत होंगे। क्योंकि जीवन से बड़ी और कोई चीज नहीं है जो लक्ष्य हो सके। जीवन खुद अपना लक्ष्य है। जीवन से बड़ी और कोई बात नहीं है जिसके लिए जीवन साधन हो सके और जो साध्य हो सके। और सारी चीजों के तो साध्य और साधन के संबंध हो सकते हैं, जीवन का नहीं। जीवन से बड़ा और कुछ भी नहीं है। जीवन ही अपनी पूर्णता में परमात्मा है, जीवन ही। वह जो जीवंत ऊर्जा है हमारे भीतर, वह जो जीवन है पौधों में, पक्षियों में, आकाश में, तारों में, वह जो हम सबका जीवन है, वह सबका समग्रीभूत जीवन ही तो परमात्मा है।

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-03)

अपने माहिं टटोल-(साधना-शिविर)

तीसरा प्रवचन-चित्त मौन हो

शब्दों से, विचारों और शास्त्रों से मुक्त होना, सत्य की या परमात्मा की खोज में जरूरी है, यह मैंने आपसे कहा। उस संबंध में दो-तीन प्रश्न पूछे गए हैं।
एक तो पूछा है कि यदि शब्दों से सत्य नहीं जाना जा सकता तो फिर आप शब्दों का उपयोग क्यों कर रहे हैं?
साधारण सोचने पर जरूर ऐसा प्रश्न उठेगा। लेकिन थोड़ा जल्दी सोचने पर ऐसा उठेगा और थोड़ा विचार करेंगे तो नहीं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मैं जो कह रहा हूं उससे आपको सत्य का ज्ञान हो जाएगा। मेरे शब्द आपके लिए सत्य का ज्ञान नहीं बन सकते। किसी के भी शब्द नहीं बन सकते हैं। तो फिर शब्द की क्या उपादेयता है?

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-02)

अपने माहिं टटोल-(साधना-शिविर)

दूसरा प्रवचन-बोध की पहली किरण

एक सम्राट बूढ़ा हो गया था। उसके तीन लड़के थे। और तीनों के बीच में उसे निर्णय करना था कि किसे राज्य को सौंप दे। बड़ी कठिनाई थी। वे तीनों लड़के सभी भांति एक-दूसरे से ज्यादा योग्य थे। तय करना कठिन था-- किसकी क्षमता, किसकी योग्यता ज्यादा है। तो उस सम्राट ने अपने बूढ़े नौकर को पूछा, जो कि गांव का एक किसान था। उससे पूछाः मैं कैसे इस बात की पहचान करूं, कैसे इस बात को जानूं कि कौन सा युवक राज्य को सम्हाल सकेगा और विकसित कर सकेगा?
उस किसान ने कहाः सरल और छोटी सी तरकीब है। और उसने कोई तरकीब सम्राट को बतलाई।

अपने माहिं टटोल-(प्रवचन-01)

पहला प्रवचन--चित्त का दर्पण

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से आने वाले तीन दिनों की चर्चाओं का मैं प्रारंभ करूंगा।
एक युवा फकीर सारी पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकला। उसने सारी जमीन घूमी। पहाड़ों और रेगिस्तानों में, गांव और राजधानियों में, दूर-दूर के देशों में वह भटका और घूमा। और फिर सारे जगत का भ्रमण करके अपने देश वापस लौटा। जब यात्रा पर निकला था, तो जवान था; जब वापस आया, तो बूढ़ा हो चुका था।
अपने देश की राजधानी में आने पर उसका बड़ा स्वागत हुआ। उस देश के राजा ने उसके चरण छुए और उससे कहा कि धन्य है हमारा भाग्य कि तुम हमारे बीच पैदा हुए। और तुमने हमारी सुगंध को सारी दुनिया में पहुंचाया। तुम्हारी कीर्ति के साथ हमारी कीर्ति गई। तुम्हारे शब्दों के साथ, हमने जो हजारों वर्षों में संगृहीत किया था, वह लोगों तक पहुंचा।

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-36)

आत्म पूजा उपनिषद-भाग-2

अठारहवां प्रवचन- साधना-पथ का सहज विकास

प्रश्न

  1. ग्रीक, वैज्ञानिक खोज सत्य के लिए है, तथा पूर्वीय, धार्मिक खोज मोक्ष के लिए है।
  2. ध्यान में प्रगति की ओर इंगित करने वाले कौन-कौन से लक्षण हैं?
  3. क्या किसी संसारी व्यक्ति को भक्ति का मार्ग चुनना चाहिए और योग का मार्ग त्यागियों के लिए छोड़ देना चाहिए?
भगवन्! साधारणतः ऐसा विश्वास किया जाता है कि धर्म सत्य की खोज के लिए है। किन्तु एक रात्रि प्रवचन में आपने कहा कि यूनानी मन, वैज्ञानिकता की ओर झुका हुआ न, सत्य की खोज करता है और पूर्वीय धार्मिक मन के लिए मोक्ष यानी मुक्ति खोज की वस्तु है। परन्तु आपने पीछे यह भी कहा है क सत्य ही केवल मुक्त करता है?
क्या आप कृपा कर इस विरोधाभास को समझायेंगे?

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-35)

आत्म पूजा उपनिषद--भाग-2

सत्रहवां -प्रवचन

सत्रहवाँ सूत्र

सर्व निरामय परिपूर्णोऽहमस्मीति मुमुक्षणां मोक्षैक सिर्द्धिभवति इत्युपनिषद्।
‘मैं ही वह परिपूर्ण शुद्ध ब्रह्म हूँ’-ऐसा जान लेना ही मोक्षोपलब्धि है।
अस्तित्व दो में बँटा है। अस्तित्व जैसा कि हम देखते हैं, द्वैत है। जैविकरूप से मनुष्य दो में विभाजित है : पुरुष तथा स्त्री। ओण्टोलोजिकली, शुद्ध स्वरूप के सिद्धान्त के आधार पर भी, अस्तित्व दो में बँटा है-मन तथा पदार्थ। चीनियों ने इसे यिन तथा यांग कहा है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-34)

आत्म पूजा उपनिषद--भाग-2 

सोलहवां प्रवचन -दो ध्रुवों का मिलन

प्रश्न

  1. क्या विज्ञान और धर्म की ध्रुवतायें मिल सकती हैं?
  2. क्या पश्चिम प्रज्ञा को उपलब्ध होने के लिये तैयार है? और पूर्व किस तरह से ऐण्टी-फिलोसोफिक है, यानी तर्क-विरोधी है?

भगवन्। हम ऐसा समाज क्यों नहीं बना सके जो कि दोनों ध्रुवों को मिलाता हो-दार्शनिकता तथा काव्य को, और विज्ञान तथा धर्म को?
क्या इन ध्रुवताओं की समग्ररूप से मिलन की कोई संभावना है? इस मिलन के लिये कौन-सी भूमि अधिक उपजाऊ है-पूरब या पश्चिम?
क्या यह मिलन सिर्फ व्यक्तिगत ही संभव है, अथवा क्या यह साथ ही समाज में भी संभव है?
किस भांति ‘ध्यान’ इस मिलन के लिये उपयोगी हो सकता है?
वे कौन-कौन सी आवश्यक बातें हैं जो मनुष्य को विज्ञान तथा धर्म इन दोनों आयामों में विकसित होने में सहयोगी हो सकती हैं?

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-33)

आत्म-पूजा उपनिषद्--भाग-2

पंद्रहवाँ प्रवचन--विसर्जन : आकार-मुक्ति का उपाय

प्रश्न: 

पहले मूर्ति बनाकर उसे विसर्जित करने का क्या अर्थ है?
एक साधक अपने असंतोष के साथ कैसे तालमेल बिठाये?
भगवन्! कल रात्रि आपने एक हिन्दू-प्रथा के बारे में बताया जिसमें कि पहले एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई जाती है और उसे फिर नदी या समुद्र में विसर्जित कर दिया जाता है। यह बात बाहर भौतिक तल पर होती है।
इस बाह्य क्रिया-काण्ड का मनोवैज्ञानिक तथा आंतरिक अर्थ क्या है? वह क्या है जिसे कि भीतर निर्मित करना ही चाहिये? और उसे कब विसर्जित करना चाहिये?
दूसरे, कृपया यह भी बतलायें कि क्या यह विसर्जन एक क्रमिक प्रक्रिया है अथवा कि एक अचानक होने वाली घटना। और क्या यह एक सजगता की क्रिया है अथवा मात्र छोड़ना है-लेट-गो?
जीवन सीखना भी है और अनसीखा करना भी है। किसी को भी बहुत-सी चीजें सीखनी पड़ती है और फिर उसे उन्हें अनसीखा भी करना पड़ता है और दोनों ही आवश्यक है। यदि तुम सीखो नहीं, तो तुम अनभिज्ञ रह जाओगे यदि तुम सीख लो और फिर उससे चिपक जाओ, तो तुम पंडित तो हो जाओगे लेकिन तुम अज्ञानी ही रह जाओगे। यदि जो भी तुमने सीख लिया है और यदि तुम उसे अनसीखा भी कर सको, तो तुम ज्ञानी हो पाते हो।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-32)

आत्म पूजा उपनिषद--भाग-2

चौदहवां प्रवचन

सोलहवाँ सूत्र
सर्व सन्तोषोविर्सनमिति स एवं वेद।
पूर्ण सन्तोष विसर्जन है, अर्थात पूजा की क्रिया की समाप्ति है। जो ऐसा जानता है वही ज्ञान को उपलब्ध है।
पूर्ण संतोष ही ज्ञान है।
तीन बातें समझ लेनी हैं। पहली बात, पूर्ण संतोष? दूसरी प्रज्ञा, ज्ञान क्या है? ज्ञानी हो जाना, ज्ञान को उपलब्ध हो जाने का क्या अर्थ है? और तीसरी बात, कि संतोष ज्ञान क्यों है? जो कुछ भी हम संतोष के बारे में जानते हैं वह सब नकारात्मक बात है। जीवन दुःख है, भारी दुःख है, और हमें अपने को सांत्वना देनी पड़ती है। ऐसे क्षण होते हैं कि आदमी कुछ भी नहीं कर सकता, इसलिए उसे संतोष की कोई धारणा पैदा करनी पड़ती है, अन्यथा जीना कठिन हो जायेगा।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-31)

आत्म पूजा उपनिषद--भाग-2

तेरहवाँ प्रवचन

संतोष तथा स्वीकार सेविकास

प्रश्न

  1. क्या विकास असन्तोष तथा अस्वीकार का परिणाम नहीं है?
  2. व्यक्ति अथवा परिस्थिति-कौन जिम्मेवार है, तथा क्या धार्मिक व्यक्ति की समाज को बदलने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए?
भगवन! कल रात्रि आपने कहा कि समग्र स्वीकार से कोई विकसित रह गया जबकि पश्चिम अस्वीकार व संतोष के कारण ही विकसित हुआ।
इसलिए, क्या यह स्पष्ट नहीं है कि असंतोष व अस्वीकार ही विकास और आगे बढ़ने के लिए एकमात्र सिद्धान्त है?

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-30)

आत्म पूजा उपनिषद--भाग-2

बाहरवां-प्रवचन --आंतरिक एकालाप का भंजन

पंद्रहवाँ सूत्र

मौनं स्तुतिः।
मौन ही प्रार्थना है।
मौन ही प्रार्थना है। प्रार्थना से हमारा मतलब सदा परमात्मा से कुछ कहने का होता है। लेकिन उपनिषद कहते हैं कि जो कुछ भी तुम कहोगे वह प्रार्थना नहीं है। प्रार्थना की नहीं जा सकती। तुम प्रार्थना नहीं कर सकते, वह कोई कृत्य नहीं है। वह तुम्हारा करना नहीं है। इसलिए वस्तुतः तुम प्रार्थना नहीं कर सकते। तुम केवल प्रार्थना ‘हो’ सकते हो। प्रार्थना तुम्हारे कुछ भी करने से संबंधित नहीं है। वह तुम्हारे अस्तित्व का किसी खास स्थिति में होना है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-29)

आत्म पूजा उपनिषद--भाग-2

ग्यारहवाँ-प्रवचन--संतुलन का मध्यबिंदु

प्रश्न

  1. ज्ञान और भक्ति में क्या अंतर है?
  2. यदि धर्म निषेधात्मक तथा विधायक दोनों विरोधी ध्रुवों को समाविष्ट कर लेता है तो फिर रूपान्तरण का क्या अर्थ हुआ?
  3. आप अंतर्राष्ट्रीय नव-संन्यास के अन्तर्गत क्या कर रहे हैं?

भगवान सोऽहं-‘मैं ही वह हूँ’ अथवा ‘अहम ब्रह्मास्मि’ अर्थात ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ या ‘अनलहक’-ये सारे कथन ज्ञानी के कथन मालूम पड़ते हैं। कल रात्रि का सूत्र कहता है, ‘ सोऽहं-मैं ही वह हूँ-यही नमस्कार है। इसका दूसरा भाग भवन का कथन प्रतीत होता है, जबकि पहला भाग ज्ञानी का मालूम पड़ता है। ऐसा जोड़ मुश्किल से ही कभी होता है। कृपया, बतायें कि क्यों एक ज्ञानी और भक्त के कथन को साथ-साथ रखा गया है?
  1. इस संदर्भ में कृपया यह भी बतलायें कि ज्ञानी व भक्त में क्या अन्तर है?
  2. किस भाँति कपिल ऋषि व शंकर जैसे ज्ञानी चैतन्य व मीरा जैसे भक्तों से भिन्न हैं?
  3. क्यों महान भक्तों ने अपने को भगवान से अलग रखा, जैसे मीरा ने कृष्ण से?
  4. क्या ज्ञान भक्ति में परिणत होता है और भक्ति ज्ञान में?

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-28)

आत्म पूजा उपनिषद--भाग-2

दसवाँ प्रवचन--मैं ही ‘‘वह’’ हूँ

सूत्र:

सोऽहं भावो नमस्कारः।
मैं वही हूँ, यह भाव ही नमस्कार है।
अस्तित्व एक है। या कि कहें कि अस्तित्व एकता है, वन-नेस्ं। अलहिलाज मन्सूर को जिन्दा काट डाला गया क्योंकि उसने कहा कि मैं ही वह हूँ, मैं ही ब्रह्म हूँ, मैं ही परमात्मा हूँ, मैं ही हूँ वह-जिसने इस जगत का निर्माण किया। इस्लाम इस तरह की भाषा से बिल्कुल परिचित नहीं था। यह भाषा बुनियादी रूप से हिन्दू है। जब भी, जहाँ भी मनुष्य ने चिन्तन किया है मनुष्य एक द्वैत पर पहुँचा है : परमात्मा-सर्जक और संसार-सृजन। हिन्दू धर्म ने सबसे बड़ी हिम्मत का कदम उठाया यह कहकर कि जो सृजन है, वही सर्जक है। दोनों में बुनियादी भेद नहीं है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-27)

आत्म पूजा उपनिषद--भाग-2

नवाँ प्रवचन--दुःख-जागरण की एक विधि

प्रश्नसार:

यद्यपि ज्ञान दुःख के प्रति सजग करता है क्या फिर भी वह जीवन को एक गहराई नहीं देता?क्या बुद्ध की भाँति जीसस ने आंतरिक पूर्णचन्द्र चैतन्य की उस स्थिति को उपलब्ध कर लिया था?
भगवन्! आपने एक रात्रि कहा कि सजगता से ज्ञान होता है और ज्ञान आदमी को उसके भीतर की बहुत-सी समस्याओं, दुःखों के प्रति सजग करता है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि सजगता और ज्ञान मनुष्य के जीवन को अधिक समृद्ध करते हैं, बढ़ाते हैं और एक गहराई देते हैं?

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-26)

आत्म-पूज़ा उपनिषद--भाग-2

आठवाँ प्रवचन --मौनके तीन आयाम

प्रश्न

  1. कृपया, आंतरिक स्थिरता को आंतरिक मौन के अलावा किसी और आयाम से भी समझायें?
  2. आज के मनुष्य के लिए आंतरिक स्थिरता कठिन क्यों हो गई है और उसके लिए क्या मार्ग है?

भगवन! कल रात्रि आपने आंतरिक स्थिरता को आंतरिक मौन के आयाम से समझाया। कृपया आंतरिक स्थिरता को किसी अन्य आयाम से भी समझाने की अनुकंपा करें?
स्थिरता के बहुत से आयाम हैं। एक है मौनः यह ध्वनि का विपरीत ध्रुव है। यह ध्वनि न होना है। दूसरा आयाम है अ-गति यह गति का विपरीत धूव है। मन एक गति है जैसे कि मन एक ध्वनि है। ध्वनि यात्रा करती है और मन भी। मन सतत चलता रहता है, बिना जरा भी रुके।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-25)

आत्म-पूज़ा उपनिषद-भाग-2

सातवाँ-प्रवचन

अन्तस्थ केन्द्र के मौन की ओर

तेरहवाँ सूत्र

निश्चलत्वं प्रदक्षिणम्।
निश्चलता ही प्रदक्षिणा है, अर्थात ‘उसकी’ पूजा के हेतु घूमने की प्रक्रिया है।
मौन ही ध्यान है। और मौन आधारभूत है किसी भी धार्मिक अनुभव के लिए। क्या है मौन? तुम उसे निर्मित कर सकते हो, तुम उसका अभ्यास भी कर सकते हो, तुम उसे आरोपित कर सकते हो। लेकिन तब वह केवल ऊपरी होगा, झुठा, कृत्रिम होगा। तुम उसका अभ्यास कर सकते हो, तुम उसका अभ्यास कर सकते हो और तुम उसे अनुभव करने लगोगे, तुम्हें उसकी प्रतीति होने लगेगी। परन्तु तुम्हारा अीयास उसे आत्म-सम्मोहन बना देता है। वह वास्तविक मौन नहीं होता। वास्तविक मौन तो तभी आता है जबकि तुम्हारा मन खो जाता है-किसी प्रयत्न के द्वारा नहीं, वरन समझ के द्वारा किसी अीयास के कारण नहीं, बल्कि एक आंतरिक सजगत के कारण।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-24)

आत्म-पूजा उपनिषद्-भाग-2

छठवाँ प्रवचन

बुद्धत्व मानव की परम स्वतंत्रता

प्रश्न

  1. ऐसा क्यों है कि कुछ ही लोग आंतरिक रूपान्तरण के लिए उत्सुक होते हैं?
  2. क्या आज का युग बुद्ध-पुरुषों को जन्म देने में सक्षम हैं?
भगवान! क्या कारण है कि बहुत थोड़े-से लोग ही जगत में आंतरिक ताप को आध्यात्मिक प्रकाश में रूपान्तरित करने के लिए उत्सुक होते हैं? क्या आपको ऐसा प्रतीत होता है कि आज का युग व पीढ़ी कृष्ण, लाओत्से व क्राइस्ट जैसे बुद्ध-पुरुषों को पैदा करने में सक्षम है?

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-23)

आत्म-पूजा उपनिषद-भाग-2

पांचवा-प्रवचन-- पूर्ण चन्द्रमा का नैवेद्य

सूत्र- भीतर के पूर्ण चन्द्र के अमृत को इकट्ठा करना ही नैवेद्य है।

तुमने ताओ की धारणा यिन तथा यांग के बारे में सुना होगा-जो कि एकही सत्य में दोध्रुवीय विरोधों की धारणा है। अस्तित्व ध्रुवीय विरोधों में जीता है-विधायक व निषेधात्मक विरोधों में, पुरुष वस्त्री में, यिन व यांग में।
सत्य अस्तित्व की एक द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया है। और जब मैं कहता हूँ द्वन्द्वात्मकप्रक्रिया तो मेरा मतलब है कि यह कोईसाधारण प्रक्रिया नहीं है। यह बडी जटिलप्रक्रिया है। एक सामान्य प्रक्रिया का मतलब होता है कि एक ही तत्त्व काम कररहा हैं, एक द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया का अर्थ है कि दोहैविपरीत ध्रुवों की शक्तियाँ एकही दिशा में कामकर रही हैं। और यद्यपि वे विरोधी दिखलाई पंड़ती है फिरभी वे एक सामंजस्य, एक संगीतपूर्ण लयबद्धता पैदा करती हैं। और वह लयबद्धताही अस्तित्व है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-22)

आत्म-पूज़ा उपनिषद-भाग-2

चौथा- प्रवचन

मनुष्य-चेतना के विकास में बुद्ध का योगदान

भगवन! मनुष्य की आंशिक चेतन ज़ीवन के पूर्ण विकास में एक तत्त्व है। उसकी चेतना को बढाने के लिए उसके ऐच्छिक प्रयासों का क्या महत्त्व हो सकता है?
कृपया यह भी समझायें कि मानव चेतना की वृद्धि के लिए बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्तियों का वया योगदान होता हैं?
विकास मूर्च्छा का हिस्सा है, वह अचेतन है। किसी इच्छा की आवश्यकतानहीं है, किसी सचेतन प्रयास की ज़रूरत नहीं है। वह बिल्कुल प्राकृतिक है। लेकिन, ज़ब एक बार चेतना विकसित ही ज़ाती है, तब दूसरी ही बात होज़ातीहैं। एक बार चेतना का प्रादुर्भाव हुआ कि विकास रुक ज़ाता है। विकास चेतनाके प्रादुर्भाव तक ही होता है, विकास का काम ही इतना है कि वह चेतना कोज़न्म दे दे। एक बार चेतना आ गई, कि विकास ठहर ज़ाता है। तब सारी ज़िम्मेवारीचेतना की होज़ाती है। इसलिए इसे कईं तरह से समझना पड़ेगा।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-21)

आत्म-पूजा उपनिषद-भाग-2 

प्रवचन-इक्कीसवां- सजगता के दीप

चैतन्य के सूर्य में स्थित होना ही एक मात्र दीपक है
एक दिन एक स्त्री मुल्ला नसरुद्दीन की पाठशाला में आई। उसके साथ उसका एक छोटा बच्चा भी था। उस स्त्री ने मुल्ला को उस लड़केको डराने के लिए कहा। वह लड़काबिगड़गया था और किसी की नहीं सुनता था। उसे किसी बड़ेअधिकारी के द्वारा डराने की जरूरत थी। मुल्ला वाकई अपने गाँव में एक बडा अघिकारी था। उसने एक बडी भयावह भाव-भंगिमा बनाई। उसकी आँखें बाहर निकल आईं और-उनसे आग निकलने लगी और वह स्वयं भी कूदने लगा, उस स्त्री ने देखा कि अब मुल्ला को रोकना असंभव है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-20)

आत्म-पूजा उपनिषद, (भाग-2)

तीसरा-प्रवचन-

ज्ञानवृक्ष का निषिद्ध फल : काम

प्रश्न:

  1. ज्ञान के वृक्ष के फल के लिए निषेध का गहरा अर्थ क्या है?
  2. केन्द्रित होने व आंतरिक रिक्तता में क्या संबंध है?
पहला प्रशन:
भगवान, ज्ञान के वृक्ष का फल खा लेने के बाद, आदम और ईव ने पहली बार अपनी नग्नता का अनुभव किया और लज्जित हुए। इस अनुभव के पीछे क्या गहरा अर्थ हैं? और, दूसरा, यह कहा जाता है कि ज्ञान के वृक्ष का निषेधित फल यौन का ही ज्ञान हैं, आपका इस संबंध में वया दृष्टिकोण है?
प्रकृति स्वयं अपने में निर्दोष हैँ, किन्तु जिस क्षण भी मनुष्य उसके प्रति जागता है बहुत-सी समस्याएँ उठ खड़ी होती है। और जो भी प्राकृतिक है और निर्दोष है, उसे अर्थ देने शुरू ही जाते हैं, तो फिर न वह प्राकृतिक रहता है और न ही निर्दोष। प्रकृति अपने-आप में निर्दोष है। परन्तु जब मनुष्यता होश से भरकर उसकी विवेचना करने लगती है, तो वह विवेचना ही बहुत-से दोषों, पापों, अनैतिकताओ के सिद्धान्त पैदा करने लगती है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-19)

आत्म-पूजा उपनिषद-भाग-2

प्रवचन-पहला

दसवाँ सूत्र

चिदग्नि स्वरूपं धूमः

स्वयं के भीतर चौतन्य की अग्नि कौ जलाना ही धूप है1

दर्शनशास्त्र के लिए बहुत-सी समस्याएँ हैं-अंत्तहीन। किन्तु घर्म के लिए सिर्फ एक ही समस्या है और वह समस्या है-स्वयं आदमी। ऐसा नहीं है किआदमी की समस्याएँ हैं, परन्तु आदमी स्वयं हो एक समस्या है। तब प्रश्न उठताहै कि आदमी समस्या क्यों है?
पशु समस्याएँ नहीं हैं। वे इतने मूच्छित्त हैं, आनन्दपूर्वक बेहोश हैं, अचेत हैं कि उनके लिए समस्याओं के प्रति सजग होने की कोई संभावना ही नहीं है। समस्याएँ तो हैं, किन्तु पशुओ को उसका कोई भी पता नहीं। देवताओं के लिए भी कोई समस्याएँ नहीं हैं क्योंकि वे पूर्णरूप से सजग हैं। जब मन पूर्णरूप सेजाग जाता है, तब समस्याएँ ऐसे ही विलीन हो जाती हैं जैसे कि प्रकाश होने पर अन्धकार। लेकिन आदमी के लिए पीड़ा है। आदमी का होना ही, उसका अस्तित्वही एक समस्या है, क्योंकि आदमी इन दो के बीच जीता है, वह पशु भी हैऔर देवता भी।

सोमवार, 20 अगस्त 2018

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-18)

प्रवचन-अट्ठारवां  

प्रश्न एवं उत्तर

पहला प्रश्नः भगवान, हमें ऐसा अनुभव होता है कि अचेतन की गहरी परतों में प्रवेश करना व उन्हें केवल सजगता के द्वारा रूपांतरित करना कठिन है, और पर्याप्त भी नहीं है, इसलिए सजगता के अलावा और क्या अभ्यास करें? कृपया इसके बारे में इसके प्रायोगिक आयाम को अधिक ध्यान में रखते हुए समझाए।
अचेतन को रूपांतरित केवल सजगता से ही किया जा सकता है। यह कठिन है, किंतु दूसरा कोई मार्ग नहीं है। सजग होने के लिए कितनी ही विधियां हैं। परंतु सजगता अनिवार्य है। आप विधियां का उपयोग जागरण के लिए कर सकते हैं; किंतु आपको जागना तो पड़ेगा ही।
यदि कोई पूछता है कि क्या कोई विधि है अंधकार को मिटाने की सिवा प्रकाश के, तो वह चाहे कितना ही कठिन हो, किंतु वही एकमात्र उपाय है, क्योंकि अंधकार केवल अभाव है, प्रकाश का। इसलिए आपकोप्रकाश का उपस्थित करना होगा और तब अंधकार वहां नहीं होगा।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-17)

प्रवचन-सत्रहरवां 

चेतना की पूरी खिलावट

बंबई, रात्रि, दिनांक 5 जून, 1972
चिदाषितः पुष्पम।
कौन से फूल हैं जो कि पूजा के लिए हो सकते हैं? चेतना से भरे होना ही-वे फूल हैं।
आदमी एक बाज है-एक संभावना-एक प्रसुप्त संभावना। मनुष्य इतना ही हनीं है जितना कि वह है; वह वह भी है जो कि वह हो सकता है। जो कुछ भी मनुष्य है, जैसा भी वह है वह एक स्थिति है, एक द्वार है, एक संभावना है होने की। उसमें बहुत कुछ छिपा हुआ है, और जो हिस्सा छिपा हुआ है, वह प्रकट हिस्से से बहुत यादा है। इसलिए मैं कहता हूं मनुष्य एक बीज है। वह उग सकता है, बड़ सकता है और वह मनुष्य तभी हो सकता है जब कि वह बड़े, विकसित हो।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-16)

प्रवचन-सौहलवां 

बंबई, रात्रि, दिनांक 4 जून, 1972

प्रश्न एवं उत्तर

पहला प्रश्नः भगवान, कल रात्रि आपने कहा कि मन दो बातें एक साथ कर सकता यानी विचार करना व साक्षी होना। इससे ऐसा लगता है कि साक्षी होना एक मानसिक प्रक्रिया है, मन का एक कृत्य है। क्या सचमुच ऐसा है? कृपया इसे समझाएं। क्या आंशिक व समग्र रूप से साक्षी होना-ऐसी भी कोई चीज है?
साक्षी होना कोई मानसिक क्रिया नहीं है; विचार करना एक मानसिक प्रक्रिया है। बल्कि अच्छा हो कि यूं कहें कि विचार करना ही मन है। जब मन नहीं होता अर्थात मन अनुपस्थित होता है, विलीन हो गया होता है, केवल तभी आप साक्षी भाव को उपलब्ध होते हैं। वह मन के परे की चीज है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-15)

प्रवचन-पंद्रहवां 

साक्षी होनाः सब विधियों का आधार

बंबई, रात्रि, दिनांक 3 जून, 1972

दृक स्वरूपे अवस्थानं अक्षताः।
अपने स्वयं के साक्षी स्वभाव के स्थिर हो जाना ही अक्षत है, वही है बिना निखारा व बिना टूटा हुआ चांवल जो पूजा के लिए काम में लिया जाता है।
साक्षी होना एक विधि है केंद्र पर होने के लिए। हमने सेंटरिंग, केंद्र पर होने की बात की है।
एक आदमी दो तरीकों से रह सकता है। वह अपनी परिधि पर रह सकता है और वह अपने केंद्र पर भी रह सकता है। किंतु परिधि अहंकार से संबंधित हैं, और केंद्र हमारे स्वरूप से जुड़ा है। यदि आप अहंकार से जीते हैं, तो आप सदैव दूसरे से संबंधित रहेंगे, परिधि दूसरों से जुड़ी होती है। आप कुछ भी करें वह कृत्य नहीं होगा, वह सदैव एक प्रतिक्रिया होगी। वह आप किसी कृत्य के प्रत्युत्तर में करते हैं, जो कुछ भी आपके साथ किया गया है। परिधि से कोई क्रिया नहीं होती। प्रत्येक बात प्रतिक्रिया ही होती है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-14)

प्रवचन-चौहदवां

बंबई, रात्रि, दिनांक 2 जून, 1972

प्रश्न एवं उत्तर

पहला प्रश्नः भगवान, आपने कल रात्रि कहा कि उसे जानने के लिए जो कि भावातीत सत्य है सब कहीं, सर्वप्रथम स्वयं के केंद्र पर ही उसकी प्रतीति होनी चाहिए। फिर आपने कहा कि इसके लिए सेंटरिंग की, केंद्रगत होने की आवश्यकता पड़ती है। क्या यह केंद्रण वही है, जिसको कि गुरजिएफ ने क्रिस्टलाइजेशन कहा है?
कृपया हमें यह भी बतलाएं कि किस तरह यह सेंटरिंग अथवा क्रिस्टलाइजेशन (केंद्रीकरण) स्वयं के अहंकार से भिन्न है और किस भांति यह उस भावातीत सत्य की और ले जाता है?
आदमी सेल्फ के साथ, स्व के साथ पैदा होता है, न कि ईगो(अहंकार) के साथ। अहंकार समाज द्वारा निर्मित है और बाद की उत्पत्ति है। अहंकार बिना संबंधों के नहीं हो सकता। आप हो सकते हैं, स्व हो सकता है, परंतु अहंकार अपने आप नहीं हो सकता। वह दूसरों के साथ संबंधों की उप-उत्पत्ति है। अहंकार मेरे और तेरे के बीच होता है। यह एक रिलेटा, एक अंर्तसंबंध है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-13)

प्रवचन-तैहरवां--भावातीत की अनुभूति

बंबई, रात्रि, दिनांक 1 जून, 1972
सर्वत्र भावना गंधः।
सब जगह उसी की अनुभूति ही एकमात्र गंध है।
भारतीय दर्शन अस्तित्व को दो भागों में बांटता है। एक तो है यह-जिसकी तरफ कि संकेत किया जा सके। और दूसरा है-वह-जो कि इसके पार है, जिसकी और कि संकेत न किया जा सके। ट्रुथ के लिए, वास्तविकता के लिए संस्कृत में एक शब्द है-सत्य-यह संस्कृत का शब्द बड़ा ही अर्थपूर्ण और बड़ा ही सुंदर है। यह दो शब्दों से मिल कर बना हैः सत और तत। सत का मतलब होता है यह और तत का अर्थ होता है वह। सत्य का अर्थ होता हैः यह  धन  वह।। इसलिए पहले हम यह समझ लें कि यह और वह क्या हैं।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-12)

प्रवचन-बाहरवां 

बंबई, रात्रि, दिनांक 26 फरवरी, 1972

प्रश्न एवं उत्तर

पहला प्रश्नः भगवान, जब कभी कोई ध्यान में भिन्न-भिन्नप्रकाश की आकृतियां व रंग अनुभव करता है जैसे कि लाल, पीला, नीला, गेरुआ आदि, तो कैसे वह जाने कि वे स्वरूप की किन परतों से संबंधित हैं?
इसके पहले कि कोईप्रकाश के अंतिम अनुभव को उपलब्ध हो, क्या क्रमशः होने वाले व प्रकाश के अनुभव की कोई श्रंखला है?
प्रकाश स्वयं रंगहीन है। सारे रंग प्रकाश के हैं, परंतु प्रकाश का कोई रंग नहीं है। प्रकाश मात्र रंगों का अभाव है। प्रकाश सफेद है। सफेद कोई रंग नहीं होता। जब प्रकाश विभाजित किया जाता है, विश्लेषित, किया जाता है अथवा प्रि म में से गुजारा जाता है, तो वह सात रंगों में बंट जाता है। मन भी प्रि म की तरह ही काम करता है-एक आंतरिक प्रि म की भांति। बाहर का प्रकाश यदि प्रि म में से निकाला जाए, तो सात रंगों में बंट जाता है। आंतरिक प्रकाश भी यदि मन से निकाला जाए, तो सात रंगों में बंट जाता है। इसलिए आंतरिक यात्रा में रंगों का अनुभव हो, तो इसका मतलब है कि आप अभी भी मन में ही है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-11)

प्रवचन-ग्याहरवां

परमात्मा की ओर-प्रकाश अथवा प्रेम से

बंबई, रात्रि, दिनांक 25 फरवरी, 1972
सदा दीप्तिः अपार अमृत वृत्तिः स्नान्म।
‘अंतस प्रकाश में तथा अंतस अमृत में निरंतर केंद्रित रहना ही पूजा की तैयारी के लिए स्नान है।’
प्रकाश सर्वाधिक रहस्यमय चीज है इस जगत में-कई कारणों से। आपने चाहे ऐसा अनुभव न किया हो, किंतु पहली बात जोप्रकाश के संबंध में है, वह यह है कि प्रकाश शुद्धतम ऊर्जा है। भौतिक-शास्त्र का कहना है कि प्रत्येक चीज जो कि भौतिक है, वस्तुतः पदार्थ नहीं है, केवल ऊर्जा है; ऊर्जा ही वास्तविक है। पदार्थ नहीं है। वह अतीत में भी नहीं था सिवाय हमारी धारणाओं के। पदार्थ लगता है कि है, परंतु वह है नहीं। केवल प्रकाश है-अथवा कहें कि ऊर्जा, अथवा विद्युत। जितने गहरे हम पदार्थ में उतरते हैं, उतना ही कम पार्थिव वह मिलता है। गहनतम में जाने पर, पदार्थ बिल्कुल अ-पदार्थ हो जाता है। किंतु प्रकाश रहता है, ऊर्जा रहती है।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-10)

प्रवचन-दसवां

बंबई, रात्रि, दिनांक 24 फरवरी, 1972

प्रश्न एवं उत्तर

पहला प्रश्नः भगवान, परमात्मा को समर्पित करने के संदर्भ में, कृपया बतलाएं कि संकल्प व समर्पण का क्या महत्व है? संकल्प और समर्पण की क्या भिन्नताएं और समानताएं हैं?
अंत तो सदैव एक ही होता है, किंतु प्रारंभ भिन्न-भिन्न होता है और जितनी भी भिन्नताएं हैं, वे प्रारंभ की हैं। जितने ही करीब आप पहुंचते हैं, उतना ही मार्गों में अंतर कम होता जाता है।
प्रारंभ में संकल्प और समर्पण एक दूसरे के पूरी तरह विरोधी हैं। समर्पण का अर्थ होता हैः ‘संपूर्ण संकल्प-शून्यता’। आपका अपना कोई संकल्प नहीं है; आप बिल्कुल निःसहाय अनुभव करते हैं। आप ऐसा महसूस करते हैं कि आप कुछ नहीं कर सकते। आप इतने निःसहाय हैं कि आप इतना भी नहीं कह सकते कि संकल्प जैसी कोई चीज होती भी है। संकल्प की पूरी धारणा ही भ्रांतिपूर्ण है। आपका कोई संकल्प नहीं है, बल्कि, इसके विपरीत, आपकी नियति है, न कि संकल्प। अतएव आप केवल समर्पण कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि समर्पण आप करते हैं, वरन तथ्य ऐसा है कि आप कुछ और कर ही नहीं सकते।

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-09)

प्रवचन-नौवां-परमात्मा को क्या अर्पित करें

 बंबई, रात्रि, दिनांक 23 फरवरी, 1972
सदॉमनस्कं अर्ध्यम्।
‘मन के तीर का निरंतर उसी की तरफ लक्ष्य होना ही अर्ध्य है, अर्पण है।’
मनुष्य क्या अर्पण कर सकता है? क्या दे सकता है वह? क्या हो सकती है उसकी ऑफरिंग, उसकी भेंट? हम वही तो भेंट दे सकते हैं, जो कि हमारा है। जो हमारा है ही नहीं, उसे अर्पित भी नहीं किया जा सकता। और आदमी ने सदैव भेंट में वही चड़ाया है, तो जरा भी उसका नहीं है। आदमी ने उसी का बलिदान किया है, जो कि बिल्कुल भी उसका अपना नहीं है।
धर्म एक क्रिया-कांड होकर रह जाता है यदि आप वह अर्पित करें जो कि आपका नहीं है। किंतु धर्म एक प्रामाणिक अनुभूति बन जाता है, जब आप वह चड़ाते हैं जो कि आप ही है। रिचुअल्स, क्रिया-कांड वस्तुतः प्रामाणिक धर्म से बचने की विधियां हैं। आप इस प्रामाणिक धर्म के बदले किसी परिपूरक का पता तो लगा सकते हैं, किंतु आप तब किसी और को नहीं वरन स्वयं को ही धोखा दे रहे होते हैं, क्योंकि कैसे आप उसका बलिदान कर सकते हैं जो कि आपका है ही नहीं? आप एक गाय की बलि दे सकते हैं; आप एक घोड़े की बलि दे सकते हैं। आप जमीन या अन्य संपत्ति दे सकते हैं, किंतु इनमें कुछ भी तो आपका नहीं है। अतएव धर्म के नाम पर ये सब देना चोरी है। जो आपका है ही नहीं, उसे कैसे आप परमात्मा को अर्पण कर सकते हैं?

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-08)

प्रवचन-आठवां

बंबई, रात्रि, दिनांक 22 फरवरी, 1972

प्रश्न एवं उत्तर

पहला प्रश्नः भगवान, आपने कल रात्रि कहा कि मन को ऊपर की ओर बहाने के लिए किसी को पिछली पाशविक वृत्तियों और आदतों के विरुद्ध सतत प्रयत्न करना पड़ता है। कृपया बतलाएं कि आदतों के विरुद्धप्रयत्न करने में और दमन में क्या अंतर है?
मन का रूपांतरण एक विधायक प्रयास है। मन का दमन निगेटिव है, निषेधात्मक है। अंतर यह है कि जब आप अपने मन को दबा रहे होते हैं, तो आपका प्रयास किसी के विरुद्ध होता है। अब आप अपने मन का रूपांतरण कर रहे होते हैं, तो आप सीधे किसी चीज के विरुद्ध नहीं होते। आप विधायक रूप से किसी चीज के पक्ष में होते हैं। आपका प्रयत्न किसी के पक्ष में होता है, न कि किसी वस्तु के विरुद्ध।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-07)

आत्म पूजा उपनिषद--(प्रवचन-सातवां) आत्म पूजा उपनिषद

भगवान श्री रजनीश

भूमिका
मैं प्रमाण हूं
ऐसा संयोग कभी-कभी ही घटित होता है जब अस्तित्व और भगवत्ता किसी व्यक्ति में स्वयं को पूर्णता में अभिव्यक्त करती है। भगवान श्री रजनीश में भगवत्ता की अभिव्यक्ति इस विरल संयोग की नवीनतम घटना है!
‘भगवान श्री रजनीश’ आज एक उत्सव का नाम है। वे मनुष्य के सौभाग्य का पर्याय है। चेतनाओं के भाग्योदय का निमित्त हैं वे। वे एक सुअवसर हैं। उनको चूकना परम दुर्भाग्य है-उन्हें उपलब्ध करना और उनको उपलब्ध होना जीवन की सार्थकता एवं परम धन्यता!
असंखय प्रकार के सत्यान्वेषकों को अलग-अलग भिन्न-भिन्न अनुकूल बोध और मार्गदर्शन देने की क्षमता उन्हीं की प्रज्ञा में है। इतने विराट और विशाल समूह को मुक्ति-पथ पर ले जाने का उत्तरदायित्व उन्हीं की करुणा में है। प्रज्ञा और करुणा का ऐसा मिलन अभूतपूर्व है-अद्वितीय है!

तमसो मा ज्योतिर्गमय-(प्रवचन-08)

आठवां प्रवचन--आध्यात्मिक साम्यवाद

चार दिनों की चर्चाओं के संबंध में बहुत सारे प्रश्न इकट्ठे हो गए हैं। आज ज्यादा से ज्यादा प्रश्नों पर चर्चा कर सकूं ऐसी कोशिश करूंगा। और इसलिए बहुत थोड़े में उत्तर देना चाहूंगा।
एक मित्र ने पूछा है: क्या आप प्रच्छन्न साम्यवादी हैं?
प्रच्छन्न होने की कोई जरूरत नहीं है, मैं स्पष्ट ही साम्यवादी हूं। किसने कहा कि प्रच्छन्न साम्यवादी हूं? मेरी दृष्टि में जो भी आदमी धार्मिक है वह साम्यवादी हुए बिना नहीं रह सकता। सिर्फ अधार्मिक आदमी साम्यवादी हुए बिना रह सकता है। जिस व्यक्ति को भी यह ख्याल है कि सबके भीतर एक ही परमात्मा का वास है, वह यह मानने को राजी नहीं हो सकता कि समाज में अर्थ की इतनी असमानताएं हों, इतनी गरीबी, इतनी अमीरी, इतने फासले हों। वह यह भी मानने को राजी नहीं हो सकता कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति को विकास का समान अवसर न मिल सके।

तमसो मा ज्योतिर्गमय-(प्रवचन-07)

सातवां प्रवचन--ज्योति का स्पर्श

सम्राट बूढ़ा हो गया था, और जैसे-जैसे मृत्यु की पगध्वनि सुनाई पड़ने लगी और जैसे-जैसे मृत्यु की छाया गहरी होने लगी उसे स्मरण आया कि मैं जी तो लिया लेकिन जीवन को अभी जान नहीं पाया हूं। शायद बहुत अधिक लोगों को मृत्यु के आने पर ही पहली बार बोध होता है कि जीवन अपरिचित, अनजाना छूट गया है। मौत करीब आने लगी, मौत की छाया घिरने लगी, तो उसे लगा जीवन तो हाथ से निकल गया और मैं जीवन को जान नहीं पाया।
जो बाहर ही जीते हैं वे जीवन को जान भी नहीं पा सकते हैं; क्योंकि जीना तो बाहर है, जीवन भीतर है। और बहुत लोग जीने मात्र को ही जीवन समझ लेते हैं, तो बड़ी भूल हो जाती है।