प्रवचन-नौवां-परमात्मा को क्या अर्पित करें
बंबई, रात्रि, दिनांक 23 फरवरी, 1972
सदॉमनस्कं अर्ध्यम्।
‘मन के तीर का
निरंतर उसी की तरफ लक्ष्य होना ही अर्ध्य है,
अर्पण है।’
मनुष्य क्या अर्पण कर सकता है? क्या दे सकता है वह? क्या हो सकती है उसकी ऑफरिंग, उसकी भेंट? हम वही तो भेंट दे सकते हैं, जो कि हमारा है। जो हमारा है ही नहीं, उसे अर्पित भी नहीं किया जा सकता। और आदमी
ने सदैव भेंट में वही चड़ाया है,
तो जरा भी उसका नहीं है। आदमी ने उसी का बलिदान किया है, जो कि बिल्कुल भी उसका अपना नहीं है।
धर्म एक क्रिया-कांड होकर रह
जाता है यदि आप वह अर्पित करें जो कि आपका नहीं है। किंतु धर्म एक प्रामाणिक
अनुभूति बन जाता है, जब आप वह
चड़ाते हैं जो कि आप ही है। रिचुअल्स,
क्रिया-कांड वस्तुतः
प्रामाणिक धर्म से बचने की विधियां हैं। आप इस प्रामाणिक धर्म के बदले किसी
परिपूरक का पता तो लगा सकते हैं,
किंतु आप तब किसी और को नहीं वरन स्वयं को ही धोखा दे रहे होते हैं, क्योंकि कैसे आप उसका बलिदान कर सकते हैं
जो कि आपका है ही नहीं? आप एक गाय की
बलि दे सकते हैं; आप एक घोड़े की
बलि दे सकते हैं। आप जमीन या अन्य संपत्ति दे सकते हैं, किंतु इनमें कुछ भी तो आपका नहीं है। अतएव
धर्म के नाम पर ये सब देना चोरी है। जो आपका है ही नहीं, उसे कैसे आप परमात्मा को अर्पण कर सकते
हैं?