कुल पेज दृश्य

रविवार, 8 मार्च 2015

गीता दर्शन--(भाग--6) प्रवचन--154

समत्‍व और एकीभावप्रवचनचौथा

अध्‍याय—13 
सूत्र—154
असक्‍तिरभिष्‍वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समीचत्‍तत्‍वमिष्टानिष्टोययीत्तषु।। 9।।
मयि चानन्ययोगेन भाक्तईरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसोईख्वमरतिर्जनसंसदि।। 10।।
अध्यात्‍मज्ञाननित्यन्वं तत्‍वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानीमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोउन्यथा।। 11।।

तथा पुत्र, स्त्री, घर और धनादि में आसक्‍ति का अभाव और ममता का न होना तथा प्रिय—अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही मिल का सम रहना अर्थात मन के अनुकूल और प्रतिकूल के प्राप्त होने पर हर्ष— शोकादि विकारों का न होना। और मुझ परमेश्वर में एकीभाव से स्थितिरूप ध्यान— योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकांत और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्‍त मनुष्यों के समुदाय में अरति, प्रेम का न होना।
तथा अध्यात्म— ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्‍वज्ञान के अर्थरूय परमत्मा को सर्वत्र देखना,  यह सब तो ज्ञान है; और जो हमसे विपरीत है, वह अज्ञान है, ऐसा कहा जाता है।



पहले कुछ प्रश्न। एक मित्र ने पूछा है, मैं बहुत बेचैन हूं और मेरे पास इतनी बेचैनी है कि सारी शक्ति इस बेचैनी में ही समाप्त हो जाती है। तो मैं इस बेचैनी का क्या उपयोग कर सकता हूं और इस बेचैनी का कारण क्या है?

 नुष्य का होना ही बेचैनी है। कम या ज्यादा, लेकिन ऐसा मनुष्य खोजना कठिन है, जो बेचैन न हो। मनुष्य बेचैन होगा ही।
नीत्शे ने कहा है कि मनुष्य ऐसे है, जैसे एक पुल, दो किनारों पर टिका हुआ, बीच में अधर लटका हुआ। पीछे पशु का जगत है और आगे परमात्मा का आयाम, और मनुष्य बीच में लटका हुआ है। वह पशु भी नहीं है और अभी परमात्मा भी नहीं हो गया है। पशु होने से थोड़ा ऊपर उठ आया है। लेकिन उसकी जड़ें पशुता में फैली हुई हैं। और किसी भी मूर्च्छा के क्षण में वह वापस पशु हो जाता है। और आगे विराट परमात्मा की संभावना है। उसमें से दिव्यता के फूल खिल सकते हैं।
भविष्य है; वह भविष्य भी खींचता है। अतीत खींचता है, क्योंकि अतीत में हमारा अनुभव है, हमारी जड़ें हैं। और भविष्य भी खींचता है, क्योंकि भविष्य में हमारी संभावना और आशा है। और मनुष्य भविष्य और अतीत के बीच में एक तनाव है।
कोई जानवर इतना बेचैन नहीं है, जितना मनुष्य। पशुओं की आंखों में झांकें; कोई बेचैनी नहीं है, कोई अशांति नहीं है। पशु अपने होने से राजी है। कुत्ता कुत्ता है। बिल्ली बिल्ली है। शेर शेर है। और आप किसी शेर से यह नहीं कह सकते कि तू कुछ कम शेर है या किसी कुत्ते से भी नहीं कह सकते कि तू कुछ कम कुत्ता है। लेकिन आदमी से आप कह सकते हैं कि तू कुछ कम आदमी है। सभी आदमी बराबर आदमी नहीं हैं, लेकिन सभी कुत्ते बराबर कुत्ते हैं। कुत्ता जन्म से ही कुत्ता है। आदमी जन्म से केवल एक बीज है। हो भी सकता है, न भी हो।
आदमी को छोड्कर सभी पशु पूरे के पूरे पैदा होते हैं; आदमी अधूरा है। उस अधूरे में बेचैनी है। और पूरे होने के दो रास्ते हैं। या तो आदमी वापस नीचे गिरकर पशु हो जाए तो थोड़ी राहत मिलती है। क्रोध में आपको जो राहत मिलती है, हिंसा में जो राहत मिलती है, संभोग में जो राहत मिलती है, शराब में जो राहत मिलती है, वह नीचे पशु हो जाने की राहत है। आप वापस गिरकर यह खयाल छोड़ देते हैं कि कुछ होना है। आप राजी हो जाते हैं, नीचे गिरकर।
लेकिन वह राहत बहुत थोड़ी देर ही टिक सकती है। वह राहत इसलिए थोड़ी देर ही टिक सकती है, क्योंकि पीछे गिरने का प्रकृति में कोई उपाय नहीं है। कोई बूढ़ा बच्चा नहीं हो सकता वापस। थोड़ी देर को अपने को भुला सकता है; बच्चों के खिलौनों में भी डूब सकता है थोड़ी देर को, गुड्डा—गुड्डी का विवाह भी रचा सकता है। और थोड़ी देर को शायद भूल भी जाए कि मैं का हूं। लेकिन यह भूलना ही है। कोई बूढ़ा वापस बच्चा नहीं हो सकता।
और यह भूलना कितनी देर चलेगा? यह विस्मरण कितनी देर चलेगा? यह थोड़ी देर में टूट जाएगा। असलियत ज्यादा देर तक नहीं भुलाई जा सकती। और जैसे ही यह टूटेगा, बूढ़ा वापस बूढ़ा हो जाएगा।
आदमी पशु हो सकता है। आप क्रोध में थोड़ी देर मजा ले सकते हैं, लेकिन कितनी देर? और जैसे ही क्रोध के बाहर आएंगे, पश्चात्ताप शुरू हो जाएगा। आप शराब पीकर थोड़ी देर को भूल सकते हैं, लेकिन कितनी देर? शराब के बाहर आएंगे और पश्चात्ताप शुरू हो जाएगा।
जितनी भी मूर्च्छा की विधियां हैं, वे पशु होने के मार्ग हैं। आदमी, आदमी जैसा है, वैसा रहे, तो बेचैन है। या तो पीछे गिरे, तो चैन मिलता है। लेकिन चैन क्षणभर का ही होता है। जिनको हम सुख कहते हैं, वे पशुता के सुख हैं। और इसलिए सुख क्षणभंगुर होता है। क्योंकि हम पशु सदा के लिए नहीं हो सकते। पीछे लौटने का कोई उपाय नहीं है। आगे जाने का ही एकमात्र उपाय है।
और दूसरा उपाय है कि आदमी बेचैनी के बाहर हो जाए कि वह परमात्मा के साथ अपने को एक होना जान ले। उसके भीतर जो छिपा है, वह पूरा प्रकट हो जाए। मनुष्य अपना भविष्य बन जाए। वह जो हो सकता है, वह हो जाए। तो वैसी ही शांति आ जाएगी, जैसी गाय की आंख में दिखाई पड़ती है। इसलिए संतों की आंखों में अक्सर पशुओं जैसी सरलता वापस लौट आती है। लेकिन वह पशुओं जैसी है, पाशविक नहीं है।
पशु भी शांत है। इसलिए शांत है कि अभी उसे बेचैनी का बोध ही नहीं हुआ। अभी विकास का खयाल पैदा नहीं हुआ। अभी आगे बढ़ने की आकांक्षा पैदा नहीं हुई। अभी आकाश को छूने और स्वतंत्रता की तरफ उड़ने के पंख नहीं लगे। अभी स्वप्न नहीं पैदा हुआ सत्य का। वह सोया हुआ है। जैसा सोया हुआ आदमी शांत होता है, ऐसा पशु भी शांत है।
संत भी शांत हो जाता है। लेकिन स्वप्न पूरा हो गया, इसलिए। सत्य पा लिया, इसलिए। संत पूरा हो गया। अब वह अधूरा नहीं है। अधूरे में बेचैनी रहेगी।
तो आप अकेले बेचैन हैं, ऐसा नहीं है। मनुष्य ही बेचैन है। और इस बेचैनी का, पूछा है, क्या उपयोग करें? इस बेचैनी का उपयोग करें, वह जो भविष्य है उसको पाने के लिए; वह जो आप हो सकते हैं, वह होने के लिए। इस बेचैनी में मत उलझे रहें। और इस बेचैनी को ढोते मत रहें। इसका उपयोग कर लें।
हम भी बेचैनी का उपयोग करते हैं, लेकिन हम उपयोग दो ढंग से करते हैं। दोनों ढंग से खतरा होता है। या तो हम बेचैनी का उपयोग करते हैं बेचैनी को निकाल लेने में। क्रोध में, हिंसा में, घृणा में, ईर्ष्या में, प्रतिस्पर्धा में, संघर्ष में हम बेचैनी को निकालने का उपयोग करते हैं। उससे बेचैनी समाप्त नहीं होगी, क्योंकि बेचैनी का वह कारण नहीं है।
जब तक आपके भीतर की मूर्ति नहीं निखरती, और जब तक आपके भीतर का स्वभाव प्रकट नहीं होता, और जब तक आप में छिपा हुआ बीज फूल नहीं बनता, तब तक आपकी बेचैनी दूर नहीं होगी। है।, थोड़ी देर को आप किसी पर बेचैनी उलीच सकते हैं। उस उलीचने में राहत मिलेगी। लेकिन आप अपनी शक्ति को व्यर्थ खो रहे हैं। जिस शक्ति से बड़ी यात्रा हो सकती थी, उससे आप केवल लोगों को और स्वयं को दुख दे रहे हैं। एक तो हम यह उपयोग करते हैं।
और दूसरा हम यह उपयोग करते हैं कि जब हम बेचैनी को नहीं निकाल पाते और बेचैनी को नहीं फेंक पाते, तो फिर हम बेचैनी को भुलाने के लिए उपयोग करते हैं। तो कोई शराब पी लेता है, कोई सिनेमाघर में जाकर बैठ जाता है। कोई संगीत सुनने लगता है। हम कोशिश करते हैं कि यह जो भीतर चलता हुआ तूफान है, यह भूल जाए, यह याद में न रहे। यह भी समय और शक्ति का अपव्यय है। एक तीसरा और ठीक मार्ग है। और वह यह है, इस बेचैनी को समझें, और इस बेचैनी को साधना में रूपांतरित करें। यह बेचैनी साधना बन सकती है। इसे भुलाने की कोई जरूरत नहीं है। और न इसे रुग्ण और हिंसा के मार्गों पर प्रेरित करने की जरूरत है। इस बेचैनी का आध्यात्मिक उपयोग हो सकता है। यह बेचैनी सीढ़ी बन सकती है। यह बेचैनी शक्ति है, यह उबलता हुआ ऊर्जा का प्रवाह है २ इस प्रवाह को आप ऊपर की तरफ ले जा सकते हैं। छोटे—से प्रयोग करें।
आपको खयाल नहीं होगा। आपको क्रोध आ जाए, तो आप सोचते हैं, एक ही रास्ता है कि क्रोध को प्रकट करो। या एक रास्ता है कि क्रोध को दबा लो और पी जाओ। लेकिन पी लिया गया क्रोध आगे—पीछे प्रकट होगा। पी लिया गया क्रोध पीया नहीं जा सकता, वह जहर उबलता ही रहेगा और कहीं न कहीं निकलेगा। और तब खतरे ज्यादा हैं। क्योंकि वह उन लोगों पर निकलेगा, जिनसे उसका कोई संबंध भी नहीं था। और कहीं न कहीं उसकी छाया पड़ेगी और जीवन को नुकसान पहुंचेगा।
माइकलएंजलो ने लिखा है कि जब भी मुझे क्रोध पकड़ लेता है, तब मैं छैनी उठाकर अपनी मूर्ति को बनाने में लग जाता हूं पत्थर तोड्ने लगता हूं। और लिखा है माइकलएंजलो ने कि मैं हैरान हो जाता हूं कि पांच—सात मिनट पत्थर तोड्ने के बाद मैं पाता हूं कि मैं हलका हो गया; क्रोध तिरोहित हो गया। किसी आदमी को तोड्ने की जरूरत नहीं रही।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जब आपको क्रोध आए, तो आप छोटे—से प्रयोग करें। और आप हैरान होंगे कि क्रोध नई यात्रा पर निकल सकता है। माइकलएंजलो मूर्ति बना लेता है क्रोध से। सृजनात्मक हो जाता है क्रोध।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि आपको क्रोध आए, तो आप इतना ही करें कि जोर से मुट्ठी बांधें पांच बार और खोलें। और आपका क्रोध तिरोहित हो जाएगा। आप कहेंगे, इतना आसान नहीं है। लेकिन करके देखें। जितनी जोर से मुट्ठी बांध सकते हों, पूरी ताकत लगा दें, और खोलें, फिर बांधें और खोलें—पांच बार। और फिर लौटकर अपने भीतर देखें कि क्रोध कहां है! आप हैरान होंगे कि क्रोध हलका हो गया, या खो भी गया, या समाप्त भी हो गया।
जापान में वे सिखाते हैं बच्चों को कि जब भी क्रोध आए तब तुम गहरी श्वास लो और छोड़ो। आप एक पंद्रह—बीस श्वास गहरी लेंगे और छोड़ेंगे, और आप पाएंगे कि क्रोध विलीन हो गया। न तो उसे दबाना पडा, और न किसी पर प्रकट करना पड़ा। और बीस गहरी श्वास स्वास्थ्य के लिए लाभपूर्ण है। वह सृजनात्मक हो गया।
जो बंधे हुए रास्ते हैं, वे ही आखिरी रास्ते नहीं हैं। अध्यात्म, जीवन की समस्त बेचैनी का नया उपयोग करना लिखा है। जैसे जब आपको क्रोध आए, तो आप आंख बंद कर लें और क्रोध पर ध्यान करें। मुट्ठी बांधकर भी शक्ति व्यर्थ होगी। श्वास लेंगे, तो थोड़ा—सा उपयोग होगा स्वास्थ्य के लिए। मूर्ति बनाएंगे, तो थोड़ा—सा सृजनात्मक काम होगा।
लेकिन क्रोध जब आए, तो आंख बंद करके क्रोध पर ध्यान करें। कुछ भी न करें, सिर्फ क्रोध को देखें कि क्रोध क्या है। क्रोध का दर्शन करें। साक्षी बनकर बैठ जाएं। जैसे कोई और क्रोध में है और आप देख रहे हैं। और अपनी क्रोध से भरी प्रतिमा को पूरा का पूरा निरीक्षण करें।
थोड़े ही निरीक्षण में आप पाएंगे, क्रोध समाप्त हो गया, क्रोध विलीन हो गया। जैसा मुट्ठी बांधने से विलीन होता है, पत्थर तोड्ने से विलीन होता है, वैसा निरीक्षण से भी विलीन होता है।
लेकिन निरीक्षण से जब विलीन होता है क्रोध, तो क्रोध में जो शक्ति छिपी थी, वह आपकी अंतर—आत्मा का हिस्सा हो जाती है। जब मुट्ठी से आप क्रोध को विलीन करते हैं, तो शक्ति बाहर चली जाती है। जब आप पत्थर तोड़ते हैं, तो भी बाहर चली जाती है। लेकिन जब आप सिर्फ शुद्ध निरीक्षण करते हैं, सिर्फ एक विटनेस होकर भीतर रह जाते हैं कि क्रोध उठा है, मैं इसे देखूंगा। और कुछ भी न करूंगा, इस क्रोध के पक्ष में, विपक्ष में कुछ भी न करूंगा, सिर्फ देखूंगा। यह भी न कहूंगा कि क्रोध बुरा है। यह भी न कहूंगा कि क्रोध नहीं करना चाहिए। यह भी न कहूंगा कि मुझे क्रोध क्यों होता है। मैं सिर्फ देखूंगा। जैसे आकाश में एक बादल जा रहा हो, ऐसे भीतर क्रोध के बादल को देखूंगा। जैसे रास्ते से कोई गुजर रहा हो, ऐसे भीतर से गुजरते क्रोध को देखूंगा। सिर्फ देखूंगा, कुछ करूंगा नहीं।
और आप चकित हो जाएंगे। कुछ ही क्षणों में, देखते ही देखते, क्रोध शांत हो गया है। और वह जो क्रोध की शक्ति थी, वह आपको भीतर उपलब्ध हो गई है।
इतनी जीवन की समस्त बेचैनी को, निरीक्षण और साक्षी के द्वारा अंतर्यात्रा के उपयोग में ले आता है। वह स्थूल बन जाती है, वह ईंधन बन जाती है। और इसलिए कई बार ऐसा हुआ है कि महाक्रोधी क्षणभर में आध्यात्मिक हो गए हैं।
हमने वाल्मीकि की कथा सुनी है। ऐसी बहुत कथाएं हैं। और हमें हैरानी होती है कि इतने क्रोधी, हिंसक, हत्यारे तरह के व्यक्ति क्षणभर में कैसे आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर गए? राज, उसका रहस्य यही है।
असल में अगर आपके पास क्रोध की शक्ति भी नहीं है, तो आपके पास ईंधन भी नहीं है, आप उपयोग क्या करिएगा? इसलिए साधारण क्रोधी आध्यात्मिक नहीं हो पाता। खयाल करना। साधारण कामवासना से भरा व्यक्ति आध्यात्मिक नहीं हो पाता। साधारण दुष्टता से भरा व्यक्ति आध्यात्मिक नहीं हो पाता। उसके पास जो कुछ भी है, उसमें वह कुनकुना ही हो सकता है, उबल नहीं सकता। उसके पास शक्ति क्षीण है।
इसलिए आप घबड़ाना मत। अगर बेचैनी ज्यादा है, सौभाग्य है। अगर कामवासना प्रगाढ है, सौभाग्य है। अगर क्रोध भयंकर है, बड़ी परमात्मा की कृपा है। इसका अर्थ है कि आपके पास ईंधन है। अब यह दूसरी बात है कि ईंधन से आप यात्रा करेंगे कि घर जला लेंगे। इसमें जल मरेंगे या इस ऊर्जा का उपयोग करके यात्रा पर निकल जाएंगे, यह आपके हाथ में है।
परमात्मा ने जो भी दिया है, वह सभी उपयोगी है। चाहे कितना ही विकृत दिखाई पड़ता हो, और चाहे कितना ही खतरनाक और पापपूर्ण मालूम पडता हो, जो भी मनुष्य को मिला है, उस सबकी उपयोगिता है। और अगर उपयोग आप न कर पाएं, तो आपके अतिरिक्त और कोई जिम्मेवार नहीं है।
कुछ लोग हैं, जिनको अगर खाद दे दिया जाए, तो घर में ढेर लगाकर गंदगी भर लेंगे। उनका घर दुर्गंध से भर जाएगा। और कुछ लोग हैं, जो खाद को बगीचे में डाल लेंगे। और उसी खाद से फूल निकल आएंगे, और उनका घर सुगंध से भर जाएगा। जो खाद को ही सम्हालकर बैठ जाएंगे, वे भगवान को गाली देंगे कि हम पर यह किस भांति का अभिशाप है कि यह खाद हमारे ऊपर डाल दिया है! जो जानते हैं, वे खाद से फूल निर्मित कर लेते हैं।
फूलों की जो सुगंध है, वह खाद की ही दुर्गंध है। फूलों में जो रंग है, वह खाद का ही है, वह सब खाद ही रूपांतरित हुआ है। मनुष्य के पास क्रोध, घृणा, हिंसा खाद है; अध्यात्म का फूल खिल सकता है। अगर आप थोड़े—से साक्षी को जगाने की कोशिश करें। साक्षी— भाव माली बन जाता है।
तो बेचैनी से घबडाएं मत, अशांति से घबडाएं मत। भीतर पागलपन उबलता हो, भयभीत न हों। उसका उपयोग करें। उसके साक्षी होना शुरू हो जाएं। और जब भी कोई चीज भीतर पकड़े, तो उसको अवसर समझें, कि वह ध्यान का एक मौका है, उस पर ध्यान करें।
लेकिन हम उलटा करते हैं। जब क्रोध आ जाए, तो हम राम—राम जपते हैं। हम सोचते हैं कि हम ध्यान कर रहे हैं। राम—राम जपना तो सिर्फ डायवर्शन है। वह तो क्रोध उबल रहा है, आप अपने मन को कहीं और लगा रहे हैं, ताकि इस क्रोध में न उलझना पड़े। यह तो इस तरह राम—राम जपकर आप सिर्फ अपने को थोड़ी देर के लिए बचा रहे हैं, मस्तिष्क को हटा रहे हैं।
लेकिन क्रोध वहा पड़ा है, वह बदलेगा नहीं। आपके हटने से नहीं बदलेगा, आपके जम जाने से और देखने से बदलेगा। आप पीठ कर लेंगे, तो क्रोध और घाव बना देगा भीतर, और जड़ें जमा लेगा। आप अपनी दोनों आंखें क्रोध पर गड़ा दें। और यह क्षण है कि आप होशपूर्वक क्रोध को देख लें।
कामवासना मन को पकड़े, तो भागें मत। घबडाएं मत। राम—राम मत जपें। कामवासना को सीधा देखें। सीधा साक्षात्कार जरूरी है वासनाओं का। लेकिन आदमी को भागना सिखाया गया है। उसको कहा गया है, जहां भी कुछ बुरा दिखाई पड़े, भाग खड़े होओ।
लेकिन भागोगे कहां? बुरा तुम्हारे भीतर है, वह तुम्हारे साथ चला जाएगा। अपने से भागने का कोई भी रास्ता नहीं है। अगर बुराई कहीं बाहर होती, तो हम भाग भी जाते। वह हमारे भीतर खड़ी है, उसको बदलना पड़ेगा। इस खाद का उपयोग करना पड़ेगा। और इसका उपयोग करना बहुत कठिन नहीं है।
कठिनाई सिर्फ दो हैं। एक, कि हम पहले से ही दुर्भाव बनाए बैठे हैं। जो आदमी खाद का दुश्मन बना बैठा है, वह खाद का उपयोग न कर पाएगा। हम पहले से ही माने बैठे हैं, क्रोध बुरा है, घृणा बुरी है, सब बुरा है। और उस सबसे हम भरे हैं। बुरे की जो धारणा है, वह देखने नहीं देती। बुरे की जो धारणा है, वह निष्पक्ष विचार नहीं करने देती। बुरे की जो धारणा है, वह समझने के पहले ही भागने और लड़ने में लगा देती है।
तो एक तो धारणाएं छोड़े। निर्धारणापूर्वक देखना शुरू करें। तथ्य उन्हीं के सामने प्रकट होते हैं, जो बिना धारणा के उन्हें देखते हैं। जो धारणा से देखते हैं, वे तो अपनी ही धारणा को परिपुष्ट कर लेते हैं।
दूसरी बात, भागने की आदत छोड़े। पूरी पृथ्वी पर हमें पलायन सिखाया गया है, भागो, बचो। भागने से कोई भी कभी जीत को उपलब्ध नहीं होता। तो क्रोध आ गया है, तो आप रेडियो खोल लेते हैं। मन में कामवासना उठी है, तो रामायण पढ़ने लगते हैं। घृणा मन में उठ गई है, हिंसा का भाव आता है, तो मंदिर चले जाते हैं। भागें मत। भागने से कुछ भी न होगा। वह जो छिपा है भीतर, वह मजबूत होता रहेगा। न तो उसे मंदिर मिटा सकता है, न रामायण मिटा सकती है। कोई भी उसे मिटा नहीं सकता। सिवाय आपके साक्षात्कार के कोई उसे मिटा नहीं सकता। आपको उसे आंख गड़ाकर देखना ही पड़ेगा। अपने भीतर जो है, उसका नग्न दर्शन जरूरी है।
लेकिन भागने वाला दर्शन नहीं कर पाता। और भागने वाला धीरे— धीरे कमजोर हो जाता है। और जितना भागता है, उतने ही शत्रु उसका पीछा करते हैं। क्योंकि वे शत्रु बाहर नहीं हैं। वे आपके साथ हैं, आपमें ही हैं। आपके हिस्से हैं।
दो बातें, एक तो पक्ष छोड़े। पक्ष के कारण बड़ी कठिनाई है। मैंने सुना है कि आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में एक फुटबाल मैच हो रहा था। और दो दल थे। प्रोटेस्टेंट ईसाई, उनका एक दल था, और कैथोलिक ईसाई, उनका एक दल था। हजारों लोग देखने इकट्ठे हुए थे, प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक दोनों ही, क्योंकि दोनों के दल थे। और मामला सिर्फ फुटबाल का नहीं था, धर्म का हो गया था। जो जीतेगा.. .फुटबाल का ही सवाल नहीं है कि फुटबाल में जीत गया। अगर कैथोलिक पार्टी जीत गई, तो कैथोलिक धर्म जीत गया। और अगर प्रोटेस्टेंट पार्टी जीत गई, तो प्रोटेस्टेंट धर्म जीत गया।
तो भारी कशमकश थी, और भारी उत्तेजना थी, और दोनों दलों के लोग दोनों तरफ मौजूद थे अपने—अपने दल को प्रोत्साहन देने के लिए। और तब कैथोलिक दल ने बहुत अच्छा खेल लिया। विजय के करीब आते मालूम पड़े। एक आदमी उछल—उछलकर उनको प्रोत्साहन दे रहा था। वह इतनी खुशी में आ गया था कि अपनी टोपी भी उछाल रहा था। उसके पास के लोगों ने समझा कि यह कैथोलिक मालूम पड़ता है।
फिर हवा बदली और प्रोटेस्टेंट दल तेजी से जीतता हुआ मालूम पड़ने लगा। लेकिन' वह जो आदमी टोपी उछाल रहा था, वह अब भी टोपी उछालता रहा और नाचता रहा।
तब आस—पास के लोग जरा चिंतित हुए। तो पड़ोसी ने पूछा कि माफ करें, आप कैथोलिक हैं या प्रोटेस्टेंट? आप किसके पक्ष में नाच रहे हैं? किसकी खुशी में नाच रहे हैं? क्योंकि पहले जब कैथोलिक जीत रहे थे, तब भी आप टोपी उछाल रहे थे। तब भी बड़े आप आनंदित हो रहे थे। और अब जब कि कैथोलिक हार रहे हैं और प्रोटेस्टेंट जीत रहे हैं, तब भी आप आनंदित हो रहे हैं। तो आप किसके पक्ष में आनंदित हो रहे हैं?
उस आदमी ने कहा, मैं किसी के पक्ष में आनंदित नहीं हो रहा हूं मैं तो खेल का आनंद ले रहा हूं। जिस आदमी ने पूछा था, उसने अपनी पत्नी से कहा कि यह आदमी नास्तिक मालूम होता है।
खेल का आनंद ले रहा हूं उस आदमी ने कहा। बड़ी कीमत की बात कही। उसने कहा, मुझे इससे मतलब नहीं कि कौन जीत रहा है। लेकिन खेल इतना आनंदपूर्ण हो रहा है कि मैं उसका आनंद ले रहा हूं। मैं किसी पक्ष में नहीं हूं। तो उस आदमी को लगा कि यह नास्तिक होना चाहिए, क्योंकि जो कैथोलिक भी नहीं है और प्रोटेस्टेंट भी नहीं है।
आप मन का थोड़ा आनंद लेना सीखें। लेकिन आप पहले से ही या तो कैथोलिक हैं या प्रोटेस्टेंट हैं। पहले से ही माने बैठे हैं और मन की शक्तियों का आनंद नहीं ले पाते हैं। पहले से ही मान लिया है कि क्रोध बुरा है, कामवासना पाप है, लोभ बुरा है। यह बुरा है, वह बुरा है; यह अच्छा है। सब माने बैठे हैं। पता आपको कुछ भी नहीं है। क्योंकि अगर आपको ही पता हो कि क्या बुरा है, तो बुरा फौरन बंद हो जाए। अगर आपको ही पता हो कि क्या भला है, तो भला आपकी जिंदगी में आ जाए। आपको कुछ पता नहीं है। सुना है, लोगों ने कहा है; हजारों—हजारों साल की हवा और संस्कार है। तो बस, आप उनको मानकर बैठे हैं। और उससे बड़ी अड़चन में पड़े हुए हैं।
क्रोध बुरा है, यह मालूम है, और क्रोध होता है। इसलिए अड़चन दोहरी हो गई है। क्रोध का दुख तो भोगना ही पड़ता है, फिर क्रोध किया, इसका भी दुख भोगना पड़ता है। यह दोहरा दुःख गया। क्रोध ही काफी था आदमी को परेशान करने के लिए। अब आप एक और दुश्मन खड़ा कर लिए कि क्रोध बुरा है। तो पहले क्रोध करें, उसका दुख भोगें; और फिर क्रोध किया, इसका दुख भोगें। कामवासना बुरी है, पहले कामवासना का दुख भोगें। और फिर कामवासना में उतरे, यह पाप किया, इसका दुख भोगें। और इस तरह जीवन और जटिल हो गया है।
कामवासना क्या है? क्रोध क्या है? मन की सारी ऊर्जाएं क्या हैं? इनका निष्पक्ष दर्शन सीखें। और आप बड़े आनंदित होंगे। और उस आनंद से ही आपके जीवन में बेचैनी बदलनी शुरू हो जाएगी और चैन निर्मित होने लगेगा।
दूसरी बात, भागना बंद कर दें।
वैज्ञानिक कहते हैं कि दो ही उपाय हैं, या तो भागो या लड़ो। जिंदगी में यही है। अगर एक शेर आप पर हमला कर दे, तो दो ही उपाय हैं, या तो भागो या लड़ों। अगर लड़ सकते हो, तो ठीक। नहीं तो भाग खड़े होओ। दो ही उपाय हैं।
बाहर की जिंदगी में अगर संघर्ष की स्थिति आ जाए, तो दो ही विकल्प हैं, लड़ो या भागो। लेकिन भीतर की जिंदगी में एक तीसरा विकल्प भी है, जागो। वह तीसरा विकल्प ही धर्म है।
बाहर की जिंदगी में तो कोई उपाय नहीं है। दो ही मार्ग हैं। अगर शेर हमला कर दे, तो क्या करिएगा? या तो लडिए या भागिए। दो में से कुछ चुनना ही पड़ेगा।
लेकिन भीतर दो विकल्प की जगह तीन विकल्प हैं। या तो लड़ो, या भागो, या जागो। न लड़ो, और न भागो, सिर्फ खड़े होकर जाग जाओ। जो भी हो रहा है, उसे देख लो। जागते ही ऊर्जा रूपांतरित होती है। और बेचैनी आनंद की यात्रा पर निकल जाती है। वह नाव बन जाती है।

 एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि मन—वाणी की सरलता अर्थात भीतर—बाहर एक जैसा होना, धार्मिकता व ज्ञान का लक्षण आपने कहा। यदि व्यक्ति जैसा भीतर है, वैसा ही व्यवहार बाहर भी करने लगे, तो वर्तमान समाज व नीति व्यवस्था में बड़ी अराजकता का आना अवश्यंभावी दिखता है। इस अराजकता से बचने का क्या कोई मध्य मार्ग या किसी नैतिक अनशासन को आप जरूरी नहीं मानते?

 हली तो बात यह समझ लेनी चाहिए कि इसके पहले कि आप समाज के संबंध में सोचें, स्वयं के संबंध में सोचें। तत्‍क्षण लोग समाज के संबंध में सोचना शुरू कर देते हैं कि समाज में क्या होगा। पहली विचारणा तो यह है कि आप में क्या हो रहा है। दूसरी विचारणा समाज की हो सकती है। तो पहले तो यह ठीक से समझ लें कि जब तक जो आपके भीतर है, आप बाहर प्रकट नहीं करते, तो आप झूठे होते जा रहे हैं, आप झूठे हो गए हैं। एक कागज की प्रतिमा हो गए हैं। असली आदमी भीतर दबा है। और झूठा आदमी ऊपर आपकी छाती पर चढ़ा है। यह झूठा आपके लिए बोझ हो गया है। इस झूठ की पर्त बढ़ती चली जाती है। और जितनी इस झूठ की पर्त बढ़ती है, जिंदगी उतनी बुरी, बेहूदी, निराश, उबाने वाली हो जाती है। क्योंकि केवल स्वभाव के साथ ही रस का संबंध हो सकता है। झूठ के साथ जीवन में कोई रस, कोई अर्थ नहीं जुड़ पाता।
तो पहले तो यह देखें कि आप भीतर जो है, उसे बाहर न लाकर आप झूठे हो गए हैं। और आप ही झूठे नहीं हो गए हैं, सभी झूठे हो गए हैं।
इसलिए हमने एक समाज निर्मित किया है, जो झूठ का समाज है। जब व्यक्ति झूठा होगा, तो समाज भी झूठा होगा। और जब व्यक्ति का आधार ही झूठ होगा, तो समाज की सारी की सारी व्यवस्था झूठ हो जाएगी। फिर हम लाख उपाय करें कि समाज अच्छा हो जाए, वह अच्छा नहीं हो सकता। क्योंकि ईंट गलत है, तो मकान अच्छा नहीं हो सकता। इकाई गलत है, तो जोड़ अच्छा नहीं हो सकता।
तो पहले तो व्यक्ति को सहज, स्वाभाविक कर लेना जरूरी है। तो पहली तो बात यह खयाल रखें कि अगर समाज भी आप अच्छा चाहते हैं, तो उसके लिए सच्चा व्यक्ति जरूरी है। सच्चे व्यक्ति के बिना अच्छा समाज नहीं होगा। और अच्छाई अगर झूठ है, तो समाज ऊपर से कितना ही अच्छा दिखाई पड़े, भीतर सडता रहेगा। सड़ रहा है। सब अच्छी—अच्छी बातें ऊपर हैं। और सब बुरी—बुरी बातें नीचे बह रही हैं।
ऐसा लगता है कि बुरी बातें तो हमारी आत्मा हो गई हैं और अच्छी बातें हमारे वस्त्र हो गई हैं। उन वस्त्रों से हम किसको धोखा दे रहे हैं? कोई उससे धोखे में नहीं आ रहा है, क्योंकि सभी भी वही धोखा कर रहे हैं।
दूसरी बात यह खयाल में ले लेनी जरूरी है कि समाज में अराजकता फैल सकती है, उसका कारण यह नहीं है कि सत्य से अराजकता फैलती है। उसका कारण यह है कि असत्य का अगर समाज हो, तो सत्य से अराजकता फैलती है। अगर सभी लोग झूठ बोलते हों, तो वहां कोई आदमी सच बोले, तो उससे अराजकता फैलेगी। जहां सभी लोग बेईमान हों, वहां कोई आदमी ईमानदार हो जाए, तो उससे अराजकता फैलेगी।
आपने वह कहानी सुनी होगी कि एक सम्राट नग्न रास्ते पर निकला है, लेकिन एक आदमी ने उसे भरोसा दिलवा दिया है कि वह देवताओं के वस्त्र पहने हुए है। एक धोखेबाज आदमी ने उससे लाखों रुपए ले लिए, और उससे कहा है कि मैं तुझे देवताओं के वस्त्र ला दूंगा। और एक दिन वह देवताओं के वस्त्र लेकर आ गया है। और उसने सम्राट को कहा कि आप अपने वस्त्र उतारते जाएं, मैं देवताओं के वस्त्र निकालता हूं।
सम्राट ने अपनी टोपी निकाली। उसने पेटी में से खाली हाथ बाहर निकाला। सम्राट ने देखा कि टोपी तो हाथ में नहीं है। उसने कहा, तुम्हारा हाथ खाली है! उस आदमी ने सम्राट के कान में कहा कि मैं जब चलने लगा, तो देवताओं ने मुझ से कहा था, ये वस्त्र केवल उसी को दिखाई पड़ेंगे, जो अपने ही बाप से पैदा हुआ हो।
उस सम्राट को तत्‍क्षण टोपी दिखाई पड़ने लगी। क्योंकि अब यह झंझट की बात हो गई। उसने कहा, अहा, ऐसी सुंदर टोपी तो मैंने कभी देखी नहीं! और उसने टोपी सिर पर रख ली, जो थी ही नहीं। लेकिन टोपी का ही मामला नहीं था। फिर उसके बाकी वस्त्र भी निकलते चले गए। दरबारी घबडाए; क्योंकि वह सम्राट नग्न हुआ जा रहा था। लेकिन जब आखिरी वस्त्र भी निकल गया, तब उस आदमी ने जोर से कहा कि दरबारियो, अब तुम्हें मैं एक और खबर बताता हूं। जब मैं चलने लगा, तो देवताओं ने कहा था कि ये वस्त्र उसी को दिखाई पड़ेंगे, जो अपने ही बाप से पैदा हुआ हो।
सम्राट ने कहा कि कितने सुंदर वस्त्र हैं! दरबारी आगे बढ़ आए एक—दूसरे से वस्त्रों की तारीफ करने में। क्योंकि अगर कोई पीछे रह जाए तो कहीं शक न हो जाए कि यह कहीं किसी और से तो पैदा नहीं हुआ। एक— दूसरे से बढ़—बढ़कर तारीफ करने लगे।
जो थोड़े डर भी रहे थे तारीफ करने में, क्योंकि राजा बिलकुल नग्न था, उन्होंने भी देखा कि जब इतने लोग तारीफ कर रहे हैं, तो गलती अपनी ही होगी। जब इतने लोग कह रहे हैं कि ऐसे वस्त्र कभी देखे नहीं, अदभुत, अलौकिक! तो शक अपने पर ही हुआ आदमियों को, कि इसका मतलब यही है कि मेरी मां मुझे धोखा दे गई! मैं अपने ही बाप का बेटा नहीं मालूम पड़ता। अब इसको बताने से क्या सार है! वह भी आदमी आगे बढ़कर तारीफ करने लगा। यह हालत सभी की थी। लेकिन उस बेईमान आदमी ने कहा कि देवताओं ने कहा है कि पहली दफा पृथ्वी पर ये वस्त्र जाते हैं, तो इनका जुलूस निकलना जरूरी है। रथ तैयार करवाएं? और राजधानी में जुलूस निकलेगा।
राजधानी में हवा की तरह खबर फैल गई कि सम्राट को देवता के वस्त्र मिले हैं। लेकिन एक शर्त है। वे उसी को दिखाई पडते हैं, जो अपने ही बाप से पैदा हो।
लाखों लोग रास्तों के किनारे खड़े थे। सभी को वस्त्र दिखाई पड़ते थे। सिर्फ एक छोटा बच्चा, जो अपने बाप के कंधे पर बैठा हुआ था, उसने अपने बाप के कान में कहा, लेकिन पिताजी, राजा नंगा है! उसने कहा, चुप रह नासमझ। अभी तेरी उम्र नहीं है। जब तू बड़ा होगा, तो अनुभव से तुझे भी वस्त्र दिखाई पड़ने लगेंगे। वह लड़का अराजकता फैला रहा था। सारे नगर को, सबको वस्त्र दिखाई पड़ रहे थे। अगर सारा समाज झूठ को पकड़े हो, तो सत्य अराजकता लाता है। लेकिन ऐसी अराजकता स्वागत के योग्य है। संन्यासी का अर्थ ही यही है कि वह समाज के झूठ को मानने को राजी नहीं है। संन्यासी अराजक है, असामाजिक है। वह यह कह रहा है कि तुम्हारे झूठ मानने को मैं राजी नहीं हूं। मैं उसी ढंग से जीऊंगा, जिस ढंग से मुझे ठीक लगता है। चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी कष्ट झेलना पड़े। वह कष्ट तपश्चर्या है।
आप यह मत सोचें कि सत्य की यात्रा पर कोई कष्ट न होगा। अगर ऐसा होता कि सत्य की यात्रा पर कोई कष्ट न होता, तो दुनिया में इतना झूठ होता ही नहीं। सत्य की यात्रा पर कष्ट है। इसीलिए तो लोग झूठ के साथ राजी हैं। झूठ सुविधापूर्ण है। सत्य असुविधापूर्ण है। झूठ में कनवीनिएंस है। क्योंकि चारों तरफ झूठ है।
वह बाप अपने बेटे से क्या कह रहा था? वह यही कह रहा था कि उपद्रव खड़ा मत कर। यही सुविधापूर्ण है। जब सबको वस्त्र दिखाई पड़ रहे हों, तो अपने को भी वस्त्र देखना ही सुविधापूर्ण है। झंझट खड़ी करनी उचित नहीं है।
यह जो कृष्ण का सूत्र है कि मन—वाणी की सरलता, सहजता, यह आपको खतरे में तो ले ही जाएगी। खतरे में इसलिए ले जाएगी, क्योंकि चारों तरफ जो लोग हैं, वे मन—वाणी से सरल नहीं हैं, जटिल हैं, छद्म, झूठ, चालाकी से भरे हैं। वे वही नहीं कहते हैं, जो कहना चाहते हैं। वे वही नहीं प्रकट करते हैं, जो प्रकट करना चाहते हैं। और ये इतनी परतें हो गई हैं झूठ की कि उनको खुद भी पता नहीं है कि वे क्या कहना चाहते हैं; उनको खुद भी पता नहीं है कि वे क्या करना चाहते हैं; उनको खुद भी पता नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं।
तो निश्चित ही, जब कोई व्यक्ति यह निर्णय और संकल्प करेगा कि मैं सरल हो जाऊंगा, तो अड़चनें आएंगी, कठिनाइयां खड़ी होंगी। उन कठिनाइयों के डर से ही तो लोग झूठ के साथ राजी हैं। साधक का अर्थ है कि वह इन कठिनाइयों को झेलने को राजी होगा।
इसका यह अर्थ नहीं है कि आप जान—बूझकर समाज में अराजकता फैलाएं। इसका यह भी अर्थ नहीं है कि आप जान—बूझ कर लोगों को परेशानी में डालें। इसका कुल इतना अर्थ है कि जब भी आपके सामने यह सवाल उठे कि मैं अपनी आत्मा को बेचूं और सुविधा को खरीदूं या सुविधा को तोड्ने दूं और आत्मा को बचाऊं, तो आप आत्मा को बचाना और सुविधा को जाने देना।
यह कोई जरूरी नहीं है कि आप चौबीस घंटे उपद्रव खड़ा करते रहें। लेकिन इतना खयाल रखना जरूरी है कि आत्मा न बेची जाए किसी भी कीमत पर। सुविधा के मूल्य पर स्वयं को न बेचा जाए, इतना ही खयाल रहे, तो आदमी धीरे— धीरे सरलता को उपलब्ध हो जाता है। और कठिनाई शुरू में ही होगी। एक बार आपका सत्य के साथ तालमेल बैठ जाएगा, तो कठिनाई नहीं होगी।
सच तो यह है, तब आपको पता चलेगा कि झूठ के साथ मैंने कितनी कठिनाइयां झेली और व्यर्थ झेली, क्योंकि उनसे मिलने वाला कुछ भी नहीं है।
सत्य के साथ झेली गई कठिनाई का तो परिणाम है, फल है। झूठ के साथ झेली गई कठिनाई का कोई परिणाम नहीं है, कोई फल नहीं है। एक झूठ बोलो, तो दस झूठ बोलने पड़ते हैं। क्योंकि एक झूठ को बचाना हो, तो दस झूठ की दीवाल खड़ी करनी जरूरी है। और फिर दस झूठ के लिए हजार बोलने पड़ते हैं। और इस सिलसिले का कोई अंत नहीं होता। और एक झूठ से हम दूसरे पर पोस्टपोन करते जाते हैं, कहीं पहुंचते नहीं।
सत्य के लिए कोई इंतजाम नहीं करना होता। सत्य के लिए कोई दूसरे सत्य का सहारा नहीं लेना पड़ता।
वाइल्ड ने लिखा है कि झूठ बोलना केवल उन्हीं के लिए संभव है, जिनकी स्मृति बहुत अच्छी हो। जिनकी स्मृति कमजोर है, उन्हें भूलकर झूठ नहीं बोलना चाहिए। क्योंकि झूठ में बहुत हिसाब रखना पड़ेगा। एक झूठ बोल दिया, तो फिर उसका हिसाब रखना पड़ता है सदा। फिर उसी झूठ के हिसाब से सब बोलना पड़ता है।
तो वाइल्ड ने लिखा है कि मेरी चूंकि स्मृति कमजोर है, इसलिए मैं सत्य का ही भरोसा करता हूं। क्योंकि उसे बोलने में याद रखने की कोई जरूरत नहीं है।
झूठ के लिए स्मृति तो मजबूत चाहिए। इसीलिए अक्सर ऐसा हो जाता है कि जो समाज अशिक्षित हैं, वहां झूठ कम प्रचलित होता है। क्योंकि झूठ के लिए शिक्षित होना जरूरी है। जो समाज असभ्य हैं, वे कम बेईमान होते हैं। क्योंकि बेईमानी के लिए जितनी कुशलता चाहिए, वह उनके पास नहीं होती। जैसे ही लोगों को शिक्षित करो, बेईमानी बढ़ने लगती है उसी अनुपात में। लोगों को शिक्षा दो, उसी के साथ झूठ बढने लगता है, क्योंकि अब वे कुशलता से झूठ बोल सकते हैं। झूठ के लिए कला चाहिए। सत्य के लिए बिना कला के भी सत्य के साथ जीया जा सकता है। झूठ के लिए आयोजन चाहिए।
हम जिस समाज में जी रहे हैं, वह सब आयोजित है। इस आयोजन के बीच से छूटना हो, तो कठिनाई शुरू में होगी, लेकिन कठिनाई अंत में नहीं होगी।
इस बात को ऐसा समझें कि असत्य के साथ पहले सुविधा होती है, बाद में असुविधा होती है। सत्य के साथ पहले असुविधा होती है, बाद में सुविधा होती है। जिनको हम संसार के सुख कहते हैं, वे पहले सुख मालूम पड़ते हैं, पीछे दुख मालूम पड़ते हैं। और जिनको हम अध्यात्म की तपश्चर्या कहते हैं, वह पहले कष्ट मालूम पड़ती है और पीछे आनंद हो जाता है।
इसको सूत्र की तरह याद कर लें। पहली ही घटना को सब कुछ मत समझना, अंतिम घटना सब कुछ है।
तो पहले अगर असुविधा भी हो, तो उसकी फिक्र न करके यही ध्यान रखना कि बाद में क्या होगा, अंतिम फल क्या होगा, अंतिम परिणाम क्या होगा। नहीं तो लोग जहर की गोली भी शक्कर में लिपटी हो तो खा लेते हैं। क्योंकि पहले स्वाद मीठा मालूम पड़ता है। पहले स्वाद से सावधान होना जरूरी है। अंतिम स्वाद को ध्यान में रखना जरूरी है।

 अंतिम प्रश्न।

एक और मित्र ने पूछा है कि अनेक सदगुरूओं के व्यवहार व जीने के ढंग में श्रेष्ठता का अभिमान और दंभाचरण दिखाई पड़ता है। तथाकथित ज्ञानी व वास्तविक धार्मिक व्यक्ति को बाहर से कैसे पहचाना जाए? क्योंकि भीतर से पहचानना अत्यंत कठिन है!

 ह थोड़ा समझने जैसा है कि जब भी आपको समझने के लिए कुछ कहा जाता है, तत्काल आप दूसरों के संबंध में सोचना शुरू कर देते हैं। कृष्ण ने यह नहीं कहा है कि ज्ञानी का लक्षण यह है कि वह पता लगाए कि कौन दंभाचरण में है और कौन नहीं है। कृष्ण ने यह नहीं कहा है कि ज्ञानी इसका पता लगाने निकलता है कि कौन गुरु दंभी है और कौन गुरु दंभी नहीं है। कृष्ण ने कहा है कि तुम दंभाचरण में हो या नहीं, इसकी फिक्र करना।
लेकिन हम? हमें अपनी तो फिक्र ही नहीं है। हम जैसे निस्वार्थ आदमी खोजना बहुत कठिन है! हमें अपनी बिलकुल फिक्र नहीं है। हमें सारी दुनिया की फिक्र है। कौन सदगुरु दंभाचरणी है, इसका कैसे पता लगाएं! मुझे एक कहानी याद आ गई।
मैंने सुना, एक गांव में शराब के खिलाफ बोलने के लिए एक महात्मा का आगमन हुआ। उनका देश शराब के विपरीत सप्ताह मना रहा था। तो महात्मा ने बहुत समझाया, शराब के खिलाफ बहुत—सी बातें समझाई। और फिर जोर देने के लिए उसने कहा कि तुम्हें पता है कि गांव में सब से बड़ी हवेली किसकी है? शराब बेचने वाले की। और पैसा उसका कौन चुकाता है? तुम। और तुम्हें पता है कि गांव में किसकी स्त्री सबसे ज्यादा कीमती गहने पहनती है? शराब बेचने वाले की। और उसका मूल्य तुम अपने खून से चुकाते हो।
जब सभा पूरी हो गई, तो एक जोड़ा, पति—पत्नी, उसके पास आया और महात्मा के चरणों में सिर रखकर उन्होंने कहा कि आपकी बड़ी कृपा है। आपने जो उपदेश दिया, उससे हमारा जीवन बदल गया। तो महात्मा ने कहा कि बड़ी खुशी की बात है। क्या तुमने शराब न पीने का तय कर लिया? उन्होंने कहा कि नहीं, हमने एक शराब की दुकान खोलने का तय कर लिया है। आपने ऐसी हृदय को चोट पहुंचाने वाली बातें कहीं कि अब हम सोचते हैं, सब धंधा छोड्कर शराब ही बेचने का धंधा कर लें।
सुना है मैंने, एक गांव में एक बहुत बड़ा कंजूस धनपति था। उससे कभी कोई दान मांगने में सफल नहीं हो पाया था। और गांव में बड़ी तकलीफ थी। कोई प्लेग फैल गई थी। कोई बीमारी आ गई थी। तो मजबूरी की वजह से दान मांगने लोग उसके घर भी गए। उन्होंने दान की प्रशंसा में बहुत बातें कहीं। और उन्होंने कहा कि दान से बड़ा धर्म जगत में दूसरा नहीं है। और यह समय ऐसी असुविधा का है कि आप जरूर कुछ दान करें।
उस कंजूस ने कहा कि मुझे दान के संबंध में थोड़ा और समझाओ। जो चंदा मांगने आए थे, बड़े प्रसन्न हुए, क्योंकि यह बड़ा शुभ लक्षण था। क्योंकि पहले तो वह दरवाजा ही नहीं खोलता था। भीतर भी आ जाए कोई दान मांगने, तो तत्काल बाहर निकालता था। उसने कहा कि बैठो प्रेम से। मुझे जरा दान के संबंध में और थोड़ा समझाओ।
उन्होंने कहा, कुछ आशा है। यह पहला मौका था कि उसने दान मांगने वालों को इतने प्रेम से बिठाया। फिर तो उसने पानी वगैरह भी बुलाकर पिलाया। और कहा कि जरा और, मुझे दान के संबंध में पूरा ही समझा दो। वे समझे कि अब कोई दिक्कत नहीं रही। कहीं और दान मांगने न जाना पड़ेगा। सभी कुछ यह आदमी दे देगा। इसके पास इतना है कि यह अकेला भी काफी है गाव की बीमारी के मुकाबले में।
जब वे सारी बात कह चुके, तो उस कृपण कंजूस ने कहा कि मैं तुम्हारी बात से इतना प्रभावित हो गया हूं कि जिसका कोई हिसाब नहीं! तो उन्होंने कहा, अब आपका क्या इरादा है? दान मांगने वाले एकदम मुंह बा के बोले कि अब आपका क्या इरादा है? उसने कहा, इरादा क्या! मैं भी तुम्हारे साथ दान मांगने चलता हूं। जब दान इतनी बड़ी चीज है, तो मैं भी लोगों को समझाऊंगा।
कृष्ण कह रहे हैं कि दंभाचरण ज्ञानी का लक्षण नहीं है। आप पूछ रहे हैं कि कई दंभाचरणी हैं, उनका कैसे पता लगाएं? कृष्ण का उनसे कुछ लेना—देना नहीं है। कृष्ण आपसे कह रहे हैं।
और आप दूसरे का पता लगाएंगे कैसे? पहले तो कोई जरूरत नहीं है। दूसरा अपने दंभ के लिए कष्ट खुद पाएगा; आप कष्ट नहीं पाएंगे। अपने दंभ के कारण दूसरा नरक में जाएगा; आपको नहीं जाना पड़ेगा। अपने दंभ के कारण दूसरे के स्वर्ग का द्वार बंद होगा; आपका द्वार बंद नहीं होगा। आप क्यों परेशान हैं? दूसरा दंभी है या नहीं, यह उसकी चिंता है। आप कृपा करें और अपनी चिंता करें। अपने पर थोड़ी कृपा करनी जरूरी है।
फिर अगर आप पता लगाना भी चाहें, तो लगाने का कोई उपाय नहीं है। जब तक कि आप पूरी तरह दंभ—शून्य न हो जाएं, तब तक आप दूसरे में दंभ है या नहीं, इसका कोई पता नहीं लगा सकते। क्योंकि आपका जो दंभ है, वह व्याख्या करेगा। आपके भीतर जो दंभ बैठा है, वह व्याख्या करेगा। आपके भीतर जो अहंकार है, उसके कारण आप दूसरे में भी कुछ देख लेंगे, जो दूसरे में शायद न भी हो।
समझें ऐसा, कि अगर आप कृष्ण के पास खड़े हों दंभ से भरे हुए, तो आपको कृष्ण की बातें बहुत दंभपूर्ण मालूम होंगी। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, सब छोड्कर मेरी शरण आ। अब इससे ज्यादा अहंकार की और क्या बात हो सकती है! सब छोड—सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं वज—सब धर्म—वर्म छोड़, मेरे चरण में आ जा, मेरी शरण आ जा।
अगर आप ईमानदारी से कहें; आप खड़े हों कृष्ण के पास, तो आप कहेंगे कि यह आदमी हद का अहंकारी है। इससे ज्यादा अहंकारी और कोई मिलेगा, जो अपने ही मुंह से अपने ही चरणों में आने का प्रचार कर रहा है!
आपके भीतर दंभ हो, तो कृष्ण का यह वचन दंभपूर्ण मालूम होगा। और आपके भीतर दंभ न हो, तो कृष्ण का यह वचन करुणापूर्ण मालूम होगा। यह सिर्फ करुणा है कृष्ण की कि वे अर्जुन से कह रहे हैं, तू व्यर्थ यहां—वहां मत भटक। और यहां जोर चरणों का नहीं है, यहां जोर समर्पण का है। लेकिन दंभी आदमी को सुनाई पड़ेगा कि कृष्ण अपने पैरों का प्रचार कर रहे हैं कि मेरे पैरों में आ जा। कृष्ण सिर्फ इतना कह रहे हैं उससे कि तू झुकना सीख ले। पैरों में आना तो सिर्फ बहाना है। तू समर्पण की कला , सीख ले, तू झुक जा।
लेकिन आपको दंभपूर्ण मालूम पड़ेगा। आपके भीतर का दंभ होगा, तो अड़चन देगा। इसलिए जब तक आपके भीतर का अहंकार न मिट जाए तब तक आप न जान पाएंगे कि कौन अहंकार—शून्य है, और कौन अहंकार—शून्य नहीं है।
पर इस चिंता में पड़ने की कोई भी जरूरत नहीं है। थ्यप अपनी ही चिंता कर लें, पर्याप्त है। सदगुरुओं को सदगुरुओं पर छोड़ दें। उनका नरक—स्वर्ग उनके लिए है। उनकी तकलीफें वे भोगेंगे। न तो उनके पुण्य में आप भागीदार हो सकते हैं, न उनके पाप में। आप सिर्फ अपने में ही भागीदार हो सकते हैं। आप अकेले हैं। और दायित्व आपका आपके ऊपर है। समय मत खोए, अवसर मत खोए, शक्ति को व्यर्थ मत लगाएं।
फिर सदगुरुओं के ढंग हैं अपने, उनकी अपनी व्यवस्थाएं हैं, जिनको पहचानना बड़ी जटिल बात है।
मुसलमान फकीर हुआ, बायजीद। तो बायजीद, अक्सर नए लोग आते थे, तो उनके साथ बड़ा बेरुखा व्यवहार करता था। बड़ा बेरुखा, जैसे कि वे आदमी ही न हों। बायजीद बहुत विनम्र आदमी था। उससे विनम्र आदमी खोजना कठिन है। लेकिन नए आगंतुक लोगों से वह बड़ा बेरुखा और बड़ा बुरा व्यवहार करता था।
उसके शिष्य उससे कहते थे कि तुम अचानक, जब भी कोई नए लोग आते हैं, तो तुम इतने सख्त क्यों हो जाते हो? हम तुम्हें जानते हैं भलीभांति, जैसे ही नए लोग जाते हैं, तुम एकदम पिघल जाते हो, तुम नवनीत जैसे कोमल हो। लेकिन तुम पत्थर जैसे कठोर क्यों हो जाते हो नए लोगों के लिए? और फिर नए लोग तुम्हारे संबंध में बड़ी बुरी धारणा ले जाते हैं। वे सारी जगह खबर करते हैं कि यह आदमी बहुत दुष्ट मालूम होता है, अहंकारी मालूम होता है, क्रोधी मालूम होता है।
तो बायजीद कहता था, इसीलिए, ताकि व्यर्थ की भीड़— भड़क्का मेरी तरफ न आने लगे। मेरे पास समय कम है, काम ज्यादा है। और मैं केवल चुने हुए लोगों के ऊपर ही काम करना चाहता हूं। मैं पत्थरों को नहीं घिसना चाहता, सिर्फ हीरों को निकालना चाहता हूं। जिसमें इतनी भी अकल नहीं है कि जो मेरे झूठे अहंकार को पहचान सके, उसके साथ मेहनत करने को मैं राजी नहीं हूं।
लेकिन कोई—कोई बायजीद का यह दंभ और क्रोध देखकर भी रह जाते थे। क्योंकि जो समझदार हैं, वे कहते थे कि पहला ही परिचय काफी नहीं है। थोड़ी निकटता से, थोड़ा रुककर, थोड़े दिन ठहरकर। जल्दी निर्णय नहीं लेना है। जो थोड़े दिन रुक जाते थे, वे सदा के लिए बायजीद के हो जाते थे। अगर आप गए होते, तो आप लौट गए होते।
ऐसे फकीर हुए हैं, हमारे मुल्क में हुए हैं, जो बेहूदी गालियां देते हैं। उनमें कुछ परम ज्ञानी हुए हैं। आप उनके पास जाएंगे, तो वे मां—बहन की और भद्दी गालियां देंगे, जो आप कभी सोच ही नहीं सकते कि संत पुरुष देगा।
खुद रामकृष्ण गालियां देते थे। और कारण कुल इतना था कि जो इतनी जल्दी निर्णय ले ले, कि यह आदमी गलत है, क्योंकि गाली दे रहा है, इस आदमी के साथ मेहनत करनी उचित नहीं है।
जो इतनी जल्दी निर्णय ले लेता है, वह ओछा आदमी है। उसके साथ मेहनत करने की कोई जरूरत नहीं है।
जो आदमी समझदार है, वह सोचेगा कि जब रामकृष्ण गाली दे रहे हैं, तो गाली में भी कोई मतलब होगा। थोड़ा रुकना चाहिए। जल्दी करने की जरूरत नहीं है। रामकृष्ण जैसा आदमी अकारण गाली नहीं देगा; अगर गाली दे रहा है, तो कोई प्रयोजन होगा, कोई मतलब होगा। तो जरा मैं रुकूं और निर्णय करने की जल्दी न करूं। जो रुक जाता, वह सदा के लिए रुक जाता। जो भाग जाता, वह सदा के लिए भाग जाता।
सदगुरुओं के अपने ढंग हैं, अपनी व्यवस्थाएं हैं। कहना कठिन है कि वे किस लिए क्या कर रहे हैं। आप उस झंझट में पड़ना ही मत। अगर आपको गुरु खोजना हो, तो धैर्यपूर्वक, बिना निर्णय लिए निकट रहने की क्षमता जुटाना। और जितना बड़ा गुरु होगा, उतनी ज्यादा धैर्य की परीक्षा लेगा। क्योंकि उतनी ही बड़ी संपदा देने के पहले वह आपकी पात्रता को पूरी तरह परख लेना चाहेगा। कोई छोटा—मोटा गुरु होगा, तो आपकी कोई परीक्षा भी नहीं लेगा। क्योंकि उसको डर है कि कहीं भाग न जाओ। वह आपको फांसने ही बैठा है।
छोटा—मोटा गुरु तो ऐसा है, जैसे कि मछली को पकड़ने के लिए आटा लगाकर काटे में बैठा हुआ है। वह बड़े प्यार से कहेगा, आइए बैठिए। आपको सिर आंखों पर लेगा। आपके अहंकार को फुसलाएगा। आप राजी होंगे। लगेगा कि बढ़िया बात है, यह आदमी ऊंचा है। कितना विनम्र है! कि मुझसे कहा, आइए बैठिए। जिसे कोई नहीं कहता, आइए बैठिए; इतने बड़े आदमी ने मुझसे कहा, आइए बैठिए!
आपको शायद पता न हो, रूजवेल्ट जब अमेरिका का इलेक्शन जीता प्रेसिडेंट का। इलेक्‍शन जीतने के बाद उसने अपने पहले वक्तव्य में, किसी ने उससे पूछा कि आपके जीतने की जो विधियां आपने उपयोग कीं, उसमें खास बात क्या थी? तो उसने कहा, छोटे आदमियों को आदर देना। उसने दस हजार आदमियों को निजी पत्र लिखे थे। उनमें ऐसे आदमी थे, कि जैसे टैक्सी ड्राइवर था, जिसकी टैक्सी में बैठकर वह स्टेशन से घर तक आया होगा।
रूजवेल्ट की आदत थी कि वह टैक्सी ड्राइवर से उसका नाम पूछेगा, पत्नी का नाम पूछेगा, बच्चे का नाम पूछेगा। वह टैक्सी ड्राइवर तो आगे गाड़ी चला रहा है, पीछे देख नहीं रहा है। लेकिन रूजवेल्ट नोट करता रहेगा, पत्नी का नाम, बच्चे का नाम; बच्चे की तबियत कैसी है; बच्चा किस क्लास में पढ़ता है। टैक्सी ड्राइवर फूला नहीं समा रहा है। पंडित नेहरू आपसे पूछ रहे हों तो...।
और फिर दो साल बाद एक पत्र आएगा टैक्सी ड्राइवर के नाम, कि तुम्हारी पत्नी की तबीयत खराब थी पिछली बार तुम्हारे गांव जब आया था, अब उसकी तबीयत तो ठीक है न? तुम्हारे बच्चे तो ठीक से स्कूल में पढ़ रहे हैं न? और इस बार मैं चुनाव में खड़ा हुआ हूं? थोड़ा खयाल रखना।
वह किसी भी पार्टी का हो, पागल हो गया। अब उसको दल—वल का कोई सवाल नहीं है। अब रूजवेल्ट से निजी संबंध हो गया। अब वह यह कार्ड लेकर घूमेगा।
छोटे आदमी के अहंकार को फुसलाना राजनीतिज्ञ का काम है, संतों का काम नहीं है। संत आपके अहंकार को तोड़ना चाहते हैं, फुसलाना नहीं चाहते हैं।
तो रामकृष्ण गाली देते हैं, रूजवेल्ट कहता है, आइए बैठिए। वह फर्क है। पर कहना मुश्किल है कि संत का क्या प्रयोजन है। आप जल्दी मत करें। निर्णय सदा अपने बाबत लें, दूसरे के बाबत कभी मत लें।
और संत तो खतरनाक हैं, उनके बाबत तो निर्णय लें ही मत। उनको उनके निर्णय पर छोड़ दें। अगर आपको कुछ लाभ उनसे लेना हो, तो धैर्यपूर्वक, बिना निर्णय के लाभ ले लें। निश्चित ही, अगर आपने धैर्य रखा, तो आप जिस गुरु के पास हैं, उस गुरु की वास्तविक प्रतिमा प्रकट हो जाएगी। अगर आपने जल्दी की, तो आप हो सकता है, कभी किसी बुद्ध के पास आकर भी किनारे से निकल जाएं और वंचित रह जाएं।
अब हम सूत्र को लें।
तथा पुत्र, स्त्री, घर और धनादि में आसक्ति का अभाव और ममता का न होना तथा प्रिय— अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना अर्थात मन के अनुकूल तथा प्रतिकूल के प्राप्त होने पर हर्ष—शोकादि विकारों का न होना।
इस संबंध में एक बात खयाल ले लेनी चाहिए। समता! दुख हो या सुख, प्रिय घटना घटे या अप्रिय, सफलता हो या असफलता, यश या अपयश, दोनों का बराबर मूल्य है। दोनों में से किंचित भी एक को वांछनीय और एक को अवांछनीय न मानना तानी का लक्षण है। समत्व ज्ञानी की आधारशिला है।
लेकिन यह होगा कैसे? क्योंकि जब सफलता मिलती है, तो प्रीतिकर लगती है। कोई हम तय थोड़े ही करते हैं कि जब सफलता मिले तो हम खुश हों। हम सफलता मिलते ही खुश हो जाते हैं। यह हमें खुश होने के लिए कुछ करना थोड़े ही पड़ता है, यह हमारा कोई निर्णय थोड़े ही है।
जब प्रियजन घर आए, तो हम प्रसन्न हो जाते हैं। कोई प्रसन्न होने के लिए चेष्टा थोड़े ही करनी पड़ती है। और जब कोई गाली दे, अपमान करे, तो हम दुखी हो जाते हैं। दुखी होने के लिए हमें सोचना थोड़े ही पड़ता है। चुनाव का मौका कहा है? जो होता है, वह जब हो जाता है, तब हमें पता चलता है। जब हम दुखी हो जाते हैं, तब पता चलता है कि दुखी हो गए।
कृष्ण कहते हैं, समता। यह समता कैसे घटेगी? इसके घटने की प्रक्रिया है। वह प्रक्रिया खयाल में लेनी चाहिए।
कोई भी अनुभव भीतर पैदा हो, उसे अचेतन पैदा न होने दें। उसमें सजगता रखें। कोई गाली दे, तो इसके पहले कि क्रोध आए, एक पांच क्षण के लिए बिलकुल शांत हो जाएं। क्रोध को कहें कि पांच क्षण रुको। दुख को कहें, पांच क्षण रुको। पांच क्षण का अंतराल देना जरूरी है। तो आपके पास पर्सपेक्टिव, दृष्टि पैदा हो सकेगी। पांच क्षण बाद सोचें कि मुझे दुखी होना है या नहीं। दुख को चुनाव बनाएं। दुख को मूर्च्छित घटना न रहने दें। नहीं तो फिर आप कुछ भी न कर पाएंगे।
गुरजिएफ ने लिखा है कि मेरे पिता ने मरते क्षण मुझे एक मंत्र दिया, उसी मंत्र ने मेरे पूरे जीवन को बदल दिया। मरते वक्त—गुरजिएफ तो बहुत छोटा था, नौ साल का था—पिता ने कहा, मेरे पास देने को तेरे लिए कुछ भी नहीं है। लेकिन एक संपत्ति मेरे पास है, जिससे मैंने जीवन में परम आनंद अनुभव किया। वह मैं कुंजी तुझे दे जाता हूं। अभी तो तेरी समझ भी नहीं है कि तू समझ पाए। इसलिए अभी जो मैं कहता हूं तू सिर्फ याद रखना। किसी दिन समझ आएगी, तो उस दिन समझ लेना।
तो गुरजिएफ के पिता ने कहा कि तू एक ही खयाल रखना, कोई भी प्रतीति, दुख की या सुख की, तत्‍क्षण मत होने देना। थोड़ी जगह। अगर कोई गाली दे, तो उससे कहकर आना कि चौबीस घंटे बाद मैं जबाब दूंगा। और चौबीस घंटे के बाद बराबर जवाब देना। अगर तुझे लगे कि छुरा भोंकना हो, तो चौबीस घंटे बाद छुरा भोंक देना जाकर। लेकिन चौबीस घंटे का बीच में अंतराल देना।
गुरजिएफ ने लिखा है कि मेरी पूरी जिंदगी बदल दी इस बात ने। क्योंकि मरते बाप की बात थी। इसके बाद बाप मर गया। तो मन पर टंकी रह गई। और एक आश्वासन दिया था बाप को, तो पूरा करना था। तो किसी ने अगर गाली दी, तो मैं कहकर आया कि क्षमा करें। बाप को एक वचन दिया है, चौबीस घंटेभर बाद आपको जवाब दूंगा।
और चौबीस घंटेभर बाद न तो गाली का जवाब देने योग्य लगा, न गाली में कोई मूल्य मालूम पड़ा, बात ही व्यर्थ हो गई। चौबीस घंटे बाद जाकर गुरजिएफ कह आता कि आपने गाली दी, बड़ी कृपा की। लेकिन मेरे पास कोई जवाब देने को नहीं है।
गाली का जवाब तो तत्काल ही दिया जा सकता है। ध्यान रखना, गाली की प्रक्रिया है, उसका जवाब तत्काल दिया जा सकता है। उसमें देरी की, कि आप चूके।
डेल कार्नेगी ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि एक स्त्री ने उसे पत्र लिखा। वह रेडियो पर बोला लिंकन के ऊपर। लिंकन की कोई जन्मतिथि थी, उस पर व्याख्यान दिया। और व्याख्यान में उसने लिंकन के संबंध में कुछ गलत तथ्य बोल दिए। तो एक स्त्री ने उसे पत्र लिखा कि जब तुम्हें लिंकन के संबंध में कुछ भी पता नहीं, तो कम से कम व्याख्यान देने की जुर्रत तो मत करो। वह भी रेडियो पर! सारे मुल्क ने सुना। और लोग हंसे होंगे। अपनी भूल सुधार करो और क्षमा मांगो। उसने बहुत क्रोध से पत्र लिखा था।
डेल कार्नेगी ने उसी वक्त क्रोध से जवाब लिखा। जितना जहरीला पत्र था, उतना ही जहरीला जवाब लिखा। लेकिन रात देर हो गई थी, तो उसने सोचा, सुबह पत्र डाल देंगे। पत्र को वैसे ही टेबल पर रखकर सो गया।
सुबह उठकर डालते वक्त दुबारा पढ़ना चाहा। तो पत्र को दुबारा पढ़ा तो उसे लगा कि यह जरा ज्यादा है, इतने क्रोध की कोई जरूरत नहीं। वह गरमी कम हो गई, लोहा ठंडा हो गया। तो उसने सोचा, दूसरा पत्र लिखूं यह उचित नहीं है। उसने दूसरा पत्र लिखा, उसमें थोड़ी—सी क्रोध की रेखा रह गई थी। तब उसे खयाल आया कि अगर रात के बारह घंटे में इतना फर्क हो गया, तो मैं बारह घंटे और रुकूं। जल्दी क्या है जवाब देने की! और देखूं कि क्या फर्क होता है।
बारह घंटे बाद पत्र को पढ़ा, तो उसे लगा कि यह भी ज्यादा है। उसने तीसरा पत्र लिखा। लेकिन तब उसने तय किया कि मैं सात दिन रोज सुबह—सांझ पत्र को पढूंगा और सातवें दिन पत्र को लिखूंगा—फाइनल।
सातवें दिन जो पत्र लिखा, वह प्रेमपूर्ण था, क्षमायाचना से भरा था। उसमें उसने लिखा कि आपने मेरी गलती दिखाई, उसके लिए मैं जितना अनुगृहीत होऊं, उतना कम है। और आगे भी कभी मेरी कोई गलती दिखाई पड़े, तो मुझे खबर देना। वह स्त्री उससे मिलने आई। और सदा के लिए मित्रता खड़ी हो गई।
क्या होता है—फासला। हम जल्दी में होते हैं। जो भी होता है, मूर्च्छा में कर लेते हैं। समता अगर चाहिए हो, तो फासला पैदा करने की कला सीखनी चाहिए। लेकिन हम होशियार लोग हैं। हम फासले में भी धोखा दे सकते हैं।
मैंने सुना है, एक बाप ने देखा कि उसका बेटा एक दूसरे बच्चे को, पड़ोसी के बच्चे को दबाए हुए लान में, छाती पर बैठा हुआ है। तो उसने चिल्लाकर कहा कि मुन्ना, कितनी दफा मैंने तुझे कहा कि किसी से भी झगड़ने, मार—पीट करने के पहले सौ तक गिनती पढ़ा कर। तो उसने कहा, वही मैं कर रहा हूं। सौ तक गिनती पढ़ रहा हूं। लेकिन यह निकलकर भाग न जाए सौ तक गिनती जब तक मैं पढुं इसलिए इसको दबाकर रखा हुआ है। सौ की गिनती पूरी होते ही इसे ठिकाने लगा दूंगा।
सौ की गिनती कही इसलिए थी कि फासला पैदा हो जाए। किसी को मारने के पहले सौ तक गिनती पढ़ना। मुन्ना होशियार है। वह उसको दबाकर बैठा है बच्चे को, कि अगर सौ तक गिनती हमने पढ़ी, तब तक यह निकल गया, तो मारेंगे किसको!
तो आप भी ऐसी होशियारी मत करना। अन्यथा कोई सार नहीं है। फासला पैदा करना है इसलिए, ताकि समता आ जाए। फासला हो जाए, तो दुख दुख नहीं देता, और सुख सुख नहीं देता। सुख और दुख दोनों मूर्च्छित अनुभव हैं। तत्‍क्षण हो जाते हैं, मूर्च्छा में हो जाते हैं।
जैसे कोई बिजली का बटन दबाता है, ऐसे ही आपके भीतर बटन दब जाते हैं। आप सुखी हो जाते हैं, दुखी हो जाते हैं। बिजली का बटन दबाने पर बिजली कह नहीं सकती कि मैं नहीं जलूंगी। मजबूर है, यंत्र है। लेकिन आप यंत्र नहीं हैं।
जब कोई गाली दे, तो क्रोधित होना? तत्‍क्षण बिजली की बटन की तरह काम हो रहा है। आप यंत्र की तरह व्यवहार कर रहे हैं। रुके। उसने गाली दी, ठीक। लेकिन आप अपने मालिक हैं। गाली लेने में जल्दी मत करें। किसी ने सम्मान किया, वह उसकी बात है। किसी ने आपकी खुशामद की, चापलूसी की, वह उसकी बात है। लेकिन आप जल्दी मत करें, और एकदम पिघल न जाएं। रुके, थोड़ा समय दें। थोड़े फासले पर खड़े होकर देखें कि क्या हो रहा है।
और आप पाएंगे कि जितना आप फासला बढ़ाते जाएंगे, सुख—दुख समान होते जाएंगे। जितने करीब होंगे, सुख—दुख में बड़ा फासला है। जितने फासले पर होंगे, सुख—दुख का फासला कम होने लगता है। जब कोई व्यक्ति दूर से खड़े होकर देख सकता है, सुख और दुख एक ही हो जाते हैं। क्योंकि दूरी से दिखाई पड़ता है, सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उस दिन समता उपलब्ध हो जाती है।
कृष्ण कहते हैं, समता ज्ञानी का लक्षण है। और मुझ परमेश्वर में एकीभाव से स्थितिरूप ध्यान—योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकांत और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में अरति, प्रेम का न होना।
और मुझ परमेश्वर में एकीभाव। बड़े दंभ की बात है, मुझ परमेश्वर में एकीभाव! कृष्ण कहे ही चले जाते हैं कि मुझ परमेश्वर के साथ तू ऐसा संबंध बना।
अहंकारी पड़ेगा, तो बड़ी अड़चन में पड़ेगा। वह तो अर्जुन का बड़ा निकट संबंध था, बड़ी आत्मीयता थी, इसलिए अर्जुन ने एक भी बार नहीं पूछा कि क्या बार—बार रट लगा रखी है, मुझ परमात्मा में। उसने एक भी बार यह सवाल नहीं उठाया कि क्यों अपने को परमात्मा कह रहे हो? और क्यों अपने ही मुंह से कहे चले जा रहे हो कि मैं परमात्मा हूं?
वह इतना आत्मीय था, इतना निकट था, कि कृष्ण को जानता था कि यह घोषणा किसी अहंकार की घोषणा नहीं है। यह कहना सिर्फ अर्जुन को समर्पण के लिए राजी करने का उपाय है।
मुझ परमेश्वर में एकीभाव से स्थितिरूप ध्यान—योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति...।
भक्ति अव्यभिचारिणी, इसे थोड़ा समझ लेना चाहिए। व्यभिचार का अर्थ होता है, अनेक के साथ लगाव। व्यभिचारिणी कहते हैं हम उस स्त्री को, जो पति को भी दिखा रही है कि प्रेम करती, और उसके प्रेमी भी है, उनसे भी प्रेम कर रही है। और प्रेम एक खिलवाड है। क्षणभर भी कोई उसे एकांत में मिल जाए तो उससे भी प्रेम शुरू हो जाएगा। मन में किसी एक की कोई जगह नहीं है।
व्यभिचार का अर्थ है, मन में एक की जगह नहीं है। मन खंडित है। बहुत प्रेमी हैं, बहुत पति हैं; उसका अर्थ है व्यभिचार। एक! तो मन अव्यभिचारी हो जाता है।
और बड़े मजे की बात है, समझने जैसी है, कि यह इतना जो जोर है एक प्रेमी पर, यह प्रेमी के हित में नहीं है। असल में प्रेम करने वाला अगर एक व्यक्ति को प्रेम करने में समर्थ हो जाए, तो

 उसके सारे खंड मन के इकट्ठे हो जाते हैं और वह एकीभाव को उपलब्ध हो जाता है।
जितने आपके प्रेम होंगे, उतने आपके खंड होंगे, उतने आपके हृदय के टुकड़े होंगे। अगर आपके दस—पांच प्रेमी हैं, तो आपके हृदय के दस—पांच स्वर होंगे, दस—पांच टुकड़े होंगे। आप एक आदमी नहीं हो सकते, दस प्रेम अगर आपके हैं; आप दस आदमी होंगे। आपके भीतर एक भीड़ होगी।
यह जो इतना जोर है अव्यभिचारिणी भक्ति पर, कि एक का भाव है तो एक का ही भाव रह जाए इसका अर्थ यह है कि जितना ही एक का भाव रहने लगेगा, उतना ही भीतर भी एकत्व घनीभूत होने लगेगा; इंटीग्रेशन भीतर फलित हो जाएगा। इसलिए प्रेमी भी योग को उपलब्ध हो जाता है, और योगी प्रेमी हो जाता है।
अगर कोई पूरे मन से किसी एक व्यक्ति को प्रेम कर सके, तो उस प्रेम में भी एकत्व घटित हो जाता है। भीतर इंटीग्रेशन हो जाता है; भीतर सारे खंड जुड़ जाते हैं। अनेक स्वर समाप्त हो जाते हैं। एक ही स्वर और एक ही भाव रह जाता है। उस एक भाव के माध्यम से प्रवेश हो सकता है अनंत में। अनेक को छोड्कर एक; और तब एक भी छूट जाता है और अनंत उपलब्ध होता है।
कृष्ण कहते हैं, अव्यभिचारिणी भक्ति!
अनन्य रूप से मुझ एक में ही तू समर्पित हो जा। तेरे मन में यह खयाल भी न रहे कि कोई और भी हो सकता है, जिसके प्रति समर्पण होना है। अगर उतना—सा खयाल भी रहा, तो समर्पण पूरा नहीं हो सकता।
इधर मेरे पास अनेक लोग आते हैं। वे कहते हैं, हम इस गुरु के पास गए, फिर उस गुरु के पास गए फिर उस गुरु के पास गए। वे गुरुओं के पास घूमते रहते हैं। उनकी यह व्यभिचारिणी मन की दशा उन्हें कहीं भी पहुंचने नहीं देती। उनसे मैं कहता हूं तुम एक गुरु के पास रुक जाओ। वे कहते हैं, हमें पक्का कैसे पता लगे कि वही गुरु ठीक है, जब तक हम बहुतों के पास न जाएं! मैं उनसे कहता हूं कि वह गलत हो तो भी तुम एक के पास रुक जाओ। क्योंकि उसके गलत और सही होने का उतना बड़ा सवाल नहीं है, तुम्हारा एक के प्रति रुक जाना तुम्हारे लिए क्रांतिकारी घटना बनेगी। वह गलत होगा, वह वह जाने। उससे तुम चिंता मत लो। तुम उसकी फिक्र मत करो।
कई बार ऐसा भी होता है कि गलत गुरु के पास भी ठीक शिष्य ' सत्य को उपलब्ध हो जाता है। यह बात उलटी मालूम पड़ेगी।
लेकिन हम जानते हैं, हमने एकलव्य की कथा पढ़ी है। गलत गुरु का सवाल ही नहीं है; गुरु था ही नहीं वहां। वहां तो सिर्फ मूर्ति बना रखी थी उसने द्रोणाचार्य की। उस भूतइr के सहारे भी वह उस कुशलता को उपलब्ध हो गया जो एकाग्रता है।
कैसे यह हुआ? क्योंकि मूर्ति तो कुछ सिखा नहीं सकती। द्रोणाचार्य खुद भी इतना नहीं सिखा पाए अर्जुन को, जितना उनकी पत्थर की मूर्ति ने एकलव्य को सिखा दिया।
तो द्रोणाचार्य का कोई हाथ नहीं है उसमें। अगर कुछ भी है हाथ, तो एकलव्य के भाव का ही है। वह उस पत्थर की मूर्ति के पास इतना एकीभाव होकर रुक गया, इतनी अव्यभिचारिणी भक्ति थी उसकी कि पत्थर की मूर्ति के निकट भी उसे जीवंत गुरु उपलब्ध हो गया। और गुरु द्रोणाचार्य इस योग्यता के गुरु नहीं थे, जितना एकलव्य ने उनको माना और फल पाया। क्योंकि गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धोखा दिया। और अपने संपत्तिशाली शिष्य के लिए एकलव्य का अनूठा कटवा लिया।
द्रोणाचार्य की उतनी योग्यता नहीं थी, जितनी एकलव्य ने मानी। लेकिन यह बात गौण है। द्रोणाचार्य की योग्यता थी या नहीं, यह सवाल ही नहीं है। एकलव्य की यह अनन्य भाव—दशा, और एकलव्य की यह महानता, कि इस गुरु ने जब अंगूठा मांगा, तब उसकी भी समझ में तो आ ही सकता था। आ ही गया होगा। साफ ही बात है। अंगूठा कट जाने पर वह धनुर्विद नहीं रह जाएगा। और द्रोणाचार्य ने अंगूठा इसीलिए मांगा कि जब उसके निशाने देखे, और उसकी तन्मयता और एकाग्रता और उसकी कला देखी, तो द्रोणाचार्य के पैर कैप गए। उन्हें लगा कि अर्जुन फीका पड़ जाएगा। अर्जुन की अब कोई हैसियत इस एकलव्य के सामने नहीं हो सकती। थी भी नहीं। क्योंकि अर्जुन का इतना भाव द्रोणाचार्य के प्रति कभी भी नहीं था, जितना भाव एकलव्य का द्रोणाचार्य के प्रति था। और द्रोणाचार्य अर्जुन को तो उपलब्ध थे, एकलव्य को उपलब्ध भी नहीं थे।
यह कथा बड़ी मीठी और बड़ी अर्थपूर्ण है। एकलव्य ने अंगूठा भी काटकर दे दिया। मैं मानता हूं कि उसकी धनुर्विद्या तो खो गई अंगूठा कटने से, लेकिन उसने भीतर जो योग उपलब्ध कर लिया अंगूठा काटकर।
उस एकलव्य के लिए कृष्ण को गीता कहने की जरूरत नहीं पड़ी। वह अंगूठा काटने के क्षण में ही उस परम एकत्व को उपलब्ध हो गया होगा। क्योंकि जरा भी संदेह न उठा! ऐसी असंदिग्ध
अवस्था में अगर परमात्मा उपलब्ध न हो, तो फिर कभी भी उपलब्ध नहीं हो सकता है। तो बाहर की कला तो खो गई, लेकिन वह भीतर की कला को उपलब्ध हो गया।
इसकी फिक्र छोड़ना; मैं लोगों को कहता हूं इसकी फिक्र छोड़ो कि गुरु ठीक है या नहीं। तुम कैसे पता लगाओगे? तुम हजार के पास घूमकर और कनफ्यूज्‍ड हो जाओगे, तुम और उलझ जाओगे। तुम्हें कुछ पता होने वाला नहीं है। तुम जितनों के पास जाओगे, उतने खंडित हो जाओगे। तुम बेहतर है, कहीं रुकना सीखो। रुकने में खूबी है। बेहतर है, एक के प्रति समर्पित होना सीखो। समर्पण में राज है। वह किसके प्रति, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है।
और कई दफा तो ऐसा होता है कि गलत के प्रति समर्पण ज्यादा कीमती परिणाम लाता है। इसे थोड़ा समझ लें। क्योंकि ठीक के प्रति समर्पण तो स्वाभाविक है। आपकी कोई खूबी नहीं है उसमें। वह आदमी ठीक है, इसलिए समर्पण आपको करना पड़ रहा है। आपकी कोई खूबी नहीं है। लेकिन आदमी गलत हो और आप समर्पण कर सकें, तो खूबी निश्चित ही आपकी है।
तो कभी—कभी बहुत—से गुरु अपने आस—पास गलत वातावरण स्थापित कर लेते हैं। वह भी समर्पण का एक हिस्सा है। क्योंकि अगर उनके बाबत सभी अच्छा हो, तो समर्पण करने में कोई खूबी नहीं, कोई चुनौती नहीं है। वे अपने आस—पास बहुत—सा जाल खड़ा कर लेते हैं, जो कि गलत खबर देता है। और उस क्षण में अगर कोई समर्पित हो जाता है, तो समर्पण की उस दशा में अव्यभिचारिणी भक्ति का जन्म होता है।
कृष्ण कहते हैं, स्वात और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में अरति, प्रेम का न होना..। आप भीड़ खोजते हैं हमेशा। और अक्सर भीड़ खोजने वाला गलत भीड़ खोजता है। क्योंकि भीड़ खोजना ही गलत मन का लक्षण है।
दूसरे से कुछ भी मिल सकता नहीं। आप जरा सोचें, आप क्या करते हैं दूसरे से मिलकर? कुछ थोड़ी निंदा, पास—पड़ोस की कुछ अफवाहें। किसकी पत्नी भाग गई! किसके बेटे ने धोखा दिया! कौन चोरी कर ले गया! कौन बेईमान है! ये सारी आप बातें करते हैं। यह रस अकेले में नहीं आता, इसके लिए दो—चार लोग चाहिए, इसके लिए आप भीड़ खोजते हैं।
एक दिन चौबीस घंटे अपनी चर्चा का खयाल करें। आप कहां बैठते हैं? क्यों बैठते हैं? क्यों बातें करते हैं ये? क्या रस है इसमें? और अगर यह रस आपका कायम है, तो ज्ञान कभी उपलब्ध न होगा, क्योंकि यह सारा अज्ञान को बचाने की व्यवस्था कर रहे हैं आप।
कृष्ण कहते हैं, ज्ञानी का लक्षण है, एकांत का रस। ज्ञानी ज्यादा से ज्यादा अकेले रहना चाहेगा।
क्यों? क्योंकि अकेले में ही स्वयं का साक्षात्कार हो सकता है; और अकेले में ही भीड़ के प्रभाव और संस्कारों से बचा जा सकता है। और अकेले में ही आदमी शांत और मौन हो सकता है। और अकेले में ही धीरे— धीरे भीतर सरककर उस द्वार को खोल सकता है, जो परमात्मा का द्वार है।
दूसरे के साथ रहकर कोई कभी परमात्मा तक नहीं पहुंचता है। चाहे बुद्ध, चाहे महावीर, चाहे मोहम्मद, परमात्मा के पास पहुंचने के पहले एकांत में सरक गए थे। महावीर बारह वर्ष तक मौन हो गए थे। बुद्ध छ: वर्ष तक जंगल में चले गए थे। मोहम्मद तीस दिन तक बिलकुल एकांत पर्वत पर रह गए थे। जीसस को तैंतीस वर्ष की उम्र में उनको फांसी हुई। ईसाइयों के पास केवल तीन साल की कहानी है, आखिरी तीन साल की। बाकी तीस साल चुप मौन साधना में गुजरे।
यह जो मौन में सरक जाना है, एकांत का रस है, यह ज्ञानी का लक्षण है। भीड़ का रस, समूह का रस, क्लब, मित्र की तलाश खतरनाक है।
लेकिन आप यह मत सोचना कि क्लब ही सिर्फ क्लब है। लोग तो धर्म—कथाओं में भी इसीलिए चले जाते हैं। विशेषकर स्त्रियां तो इसीलिए पहुंच जाती हैं धर्म—कथाओं में कि वहा जाकर वे सब चर्चा कर लेती हैं, जिसका कि उन्हें मौका कहीं नहीं मिलता। सब जमाने भर की स्त्रियां वहा मिल जाती हैं। जमाने भर के रोग और कहानियां उन्हें वहा मिल जाते हैं। वहां वे सब चर्चा कर लेती हैं। कथा तो बहाना है।
मंदिर में भी आप जा सकते हैं; हो सकता है, परमात्मा से मिलने न जा रहे हों। वहा भी आप गपशप करने जा रहे हों, जो लोग मंदिर आते हैं उनसे। यह भी हो सकता है, आप किसी गुरु के पास भी इसीलिए जाते हों कि थोड़ा आस—पास के उपद्रव की खबरें सुन आएं। लेकिन कुछ स्वात की तलाश न हो।
ध्यान रखना जरूरी है कि आप अकेले ही सत्य से— मिल सकते हैं, भीड़ को साथ लेकर जाने का कोई उपाय नहीं है। आपका निकटतम मित्र भी आपके साथ समाधि में नहीं जाएगा। आपकी पत्नी भी आपके साथ ध्यान में प्रवेश नहीं कर सकती। आपका बेटा भी आपके साथ भक्ति के जगत में नहीं प्रवेश करेगा। वहा आप अकेले होंगे। इसलिए अकेले होने का थोड़ा रस! और जब भी मौका मिल जाए, तो अकेले होने में मजा!
लेकिन हम तो घबड़ाते हैं। जरा अकेले हुए कि लगता है कि मरे। जरा अकेले हुए कि डर लगता है। जरा अकेले हुए कि लगता है, ऊब जाएंगे, क्या करेंगे!
एक बहुत मजे की बात है। आप अपने से इतने ऊबे हुए हैं कि आप अपने साथ थोड़ी देर भी नहीं रह सकते। और जब कोई आपके साथ ऊब जाता है, तो आप सोचते हैं, वह आदमी बुरा है। जब आप खुद ही अपने साथ ऊब जाते हैं, तो दूसरे तो ऊबेंगे ही। अकेले में थोड़ी देर खुद ही से बातें करिए। एक दिन ऐसा प्रयोग करिए। जापान में एक विधि है ध्यान की। वे साधक को कहते हैं कि जो भी तेरे भीतर चलता हो, उसको जोर—जोर से बोल। भीतर मत बोल, जोर—जोर से बोल। बैठ जा एकांत में और जो भी भीतर चलता हो, उसको जोर से बोल।
आप घबडा जाएंगे, अगर भीतर जो जैसा है, उसको जोर से बोलेंगे। घंटेभर में आप कहेंगे कि मैं भी कहां का बोरियत पैदा करने वाला आदमी हूं!
लेकिन यही आप दूसरों से बोल रहे हैं। और जब दूसरे आपसे बोर होते हैं, तो आप समझते हैं, इनकी समझ नहीं है। जरा समझ का.. मैं तो बड़ी ऊंची बातें कर रहा हूं और ये ऊब रहे हैं! लेकिन जब हर आदमी अपने से ऊबा है, तो ध्यान रहे, वह दूसरे को भी उबाएगा।
और दूसरे आपकी कुछ देर तक बात सुनते हैं, उसका कारण आप जानते हैं? इसलिए नहीं कि आपकी बात में कोई रस है। बल्कि इसलिए कि जब आप बंद हो जाएं, तब वे बोलें। और कोई कारण नहीं होता। कि अब आप उबा लिए काफी, अब हमको भी उबाने दो।
इसलिए सब से ज्यादा बोर करने वाला आदमी वह मालूम पड़ता है, जो कि आपको मौका ही नहीं देता। और कोई कारण नहीं है। वह बोले ही चला जाता है। वह आपको अवसर ही नहीं देता। इसलिए आप कहते हैं, बहुत बोर करने वाला आदमी है। उसका केवल मतलब इतना है कि आप ही बोर किए जा रहे हैं! मुझको भी बोर करने का मौका दें। एक अवसर मुझे भी दें, तो मैं भी आपको ठीक करूं। लेकिन जो असली बोर करने की कला में कुशल हैं, वे मौका नहीं देते।
आदमी अपने साथ इतनी ज्यादा पीड़ा अनुभव करता है, और सोचता है, दूसरों को सुख देगा। पति पत्नी को सुख देना चाहता है, पत्नी पति को सुख देना चाहती है। पत्नी सोचती है कि पति के लिए स्वर्ग बना दे, लेकिन अकेली घडीभर नहीं रह सकती, नरक मालूम होने लगता है। तो जब अकेले रहकर पत्नी को खुद नरक मालूम होने लगता है, तो यह पति के लिए नरक ही बना सकती है, स्वर्ग बनाएगी कैसे!
कोई किसी दूसरे के लिए स्वर्ग नहीं बना पाता, क्योंकि हम अकेले अपने साथ रहने को राजी नहीं हैं।
इस जमीन पर उन लोगों के निकट कभी—कभी स्वर्ग की थोड़ी—सी हवा बहती है, जो अपने साथ रहने की कला जानते हैं। इसे थोड़ा समझ लेना। जो आदमी एकांत में रहने की कला जानता है, उसके पास आपको कभी थोड़े—से रस की बूंदें मिल सकती हैं, कोई अमृत की थोड़ी झलक मिल सकती है। लेकिन जो अपने साथ रहना जानता ही नहीं, उसका तो जीवन से कोई संस्पर्श नहीं हुआ है। कृष्ण कहते हैं, शुद्ध देश में, एकांत में, अपने भीतर की शुद्धता में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में अरति..।
अगर कभी जाना भी हो किसी के पास, तो ऐसे व्यक्ति के पास जाना चाहिए, जो आपको संसार की तरफ न ले जाता हो। जो आपको संन्यास की तरफ ले जाता हो। जो आपको उठाता हो वस्तुओं के पार। जो आपको जीवन के परम मंदिर की तरफ इशारा करता हो। अगर जाना ही हो किसी के पास, तो ऐसे व्यक्ति के पास जाना चाहिए। अन्यथा भीड़ से, समूह से बचना चाहिए।
तथा अध्यात्म—ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को सर्वत्र देखना, यह सब तो ज्ञान है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है, ऐसा कहा है। परमात्मा को सर्वत्र देखना, यह तो ज्ञान है। और इससे जो है, वह अज्ञान है।
बड़ा कठिन है परमात्मा को सर्वत्र देखना। अपने ही भीतर नहीं देख सकते, तो बाहर कैसे देख सकेंगे! पहले तो अपने ही भीतर देखना जरूरी है कि परमात्मा मौजूद है। चाहे कितना ही विकृत हो, कितना ही उलझा हो, बंधन में हो, कारागृह में हो, है तो परमात्मा ही। चाहे कितनी ही बेचैनी में, परेशानी में हो, है तो परमात्मा ही। अपने भीतर भी परमात्मा देखना शुरू करना चाहिए, और अपने आस—पास भी देखना शुरू करना चाहिए। धीरे— धीरे यह परमात्म— भाव ऐसा हो जाना चाहिए कि परमात्मा ही दिखाई पड़े, बाकी लोग उसके रूप दिखाई पड़े। यह भाव—दशा बन जाती है। लेकिन अपने से ही शुरू करना पड़े।
और जैसे कोई पत्थर फेंके पानी में, तो पहले छोटा—सा वर्तुल उठता है पत्थर के चारों तरफ। फिर वर्तुल फैलता जाता है, और दूर अनंत किनारों तक चला जाता है। ऐसा पहली दफा परमात्मा का पत्थर अपने भीतर ही फेंकना जरूरी है। फिर वर्तुल उठता है, लहरें फैलने लगती हैं, और चारों तरफ पहुंच जाती हैं।
जब तक आप अपने में देखते हैं पाप, नरक, और आपको कोई परमात्मा नहीं दिखाई पड़ता, तब तक आपको किसी में भी दिखाई नहीं पड़ सकता। आप कितना ही मंदिर की मूर्ति पर जाकर सिर पटकें और आपको चाहे कृष्ण और राम भी मिल जाएं, तो भी आपको परमात्मा दिखाई नहीं पड़ सकता।
जिस धोबी ने राम के खिलाफ वक्तव्य दिया, और जिसकी वजह से राम को सीता को निकाल देना पड़ा, वह राम के गाव का निवासी था, उसको राम में राम दिखाई नहीं पड़ा। उसको सीता में सीता दिखाई नहीं पड़ी। उसको तो सीता में भी दिखाई पड़ी व्यभिचारिणी स्त्री। वह खुद व्यभिचारी रहा होगा। जौ हमारे भीतर होता है, वह हमें दिखाई पड़ता है।
तो राम भी पास खड़े हों, तो आपको गड़बड़ ही दिखाई पड़ेंगे। आपको तो कुछ अड़चन ही मालूम होगी। आपको लगेगा, कुछ न कुछ बात है।
एक मित्र ने थीसिस लिखी है, राम के ऊपर एक शोध—ग्रंथ लिखा है। और शोध—ग्रंथ में उन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि शबरी की स्त्री नहीं थी, जवान स्त्री थी। और राम का संबंध प्रेम का था शबरी से, भक्ति का नहीं था।
इन मित्र को मैं जानता हूं। वे कभी—कभी मुझसे मिलने आते थे। मैंने उनसे पूछा कि यह ठीक हो या गलत हो, मुझे कुछ पता नहीं। और इसमें मुझे कोई रस भी नहीं कि राम का शबरी से प्रेम था या नहीं। लेकिन तुम्हें शोध करने का यह खयाल कैसे पैदा हुआ? सच हो भी सकता है। मुझे कुछ पता नहीं कि राम का क्या संबंध था और न मेरी कोई उत्सुकता है कि किसी के संबंधों की जानकारी करूं। न मेरा कोई अधिकार है, न मैं कोई इंसपेक्टर हूं जो तय किया गया है कि पता लगाएं कि किसका किससे प्रेम है। यह शबरी और राम के बीच की बात है। लेकिन तुम्हें यह खयाल कैसे आया? तुम्हें खयाल तो अपने ही किसी अनुभव से आया होगा। और तुम्हारे देखने की दृष्टि से ही तो शोध पैदा हुई है; राम की घटना से पैदा नहीं हुई। क्योंकि राम पर तो बहुत लोग शोध करते हैं, लेकिन यह शोध किसी ने भी नहीं की है।
इन सज्जन ने खोजबीन की है कि सीता का निकालना, धोबी का तो बहाना था, राम सीता को निकालना ही चाहते थे।
राम के मन में क्या था, यह तो पता लगाने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन जो आदमी यह खोज कर रहा है, इसके मन की स्थिति तो सोचने जैसी हो जाती है।
आप जब तक अपने भीतर परमात्मा को न देख पाएं, तब तक राम में भी दिखाई नहीं पड़ेगा। और जिस दिन आप अपने भीतर देख पाएं उस दिन रावण में भी दिखाई पड़ेगा। क्योंकि अपनी सारी पीड़ाओं, दुखों, चिंताओं, वासनाओं के बीच भी जब आपको भीतर की ज्योति दिखाई पड़ने लगती है, तो आप जानते हैं कि चाहे कितना ही पाप हो चारों तरफ, भीतर ज्योति तो परमात्मा की ही है। चाहे काच पर कितनी ही धूल जम गई हो, और चाहे काच कितना ही गंदा हो गया हो, लेकिन भीतर की ज्योति तो निष्कलुष जल रही है। ज्योति पर कोई धूल नहीं जमती, और ज्योति कभी गंदी नहीं होती।
ही, ज्योति के चारों तरफ जो काच का घेरा है, वह गंदा हो सकता है। जब आप अपने गंदे से गंदे घेरे में भी उस ज्योति का अनुभव कर लेते हैं, तत्‍क्षण सारा जगत उसी ज्योति से भर जाता है।
ज्ञानी का लक्षण है, परमात्मा का सर्वत्र अनुभव करना।
पांच मिनट रुकेंगे। बीच से कोई उठे न। कीर्तन पूरा हो जाए, तब जाएं।