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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--03)

(अध्‍याय—तीसरा)

सुबह आठ बजे उनके प्रवचन के लिए हम सब फिर से उसी स्थान पर इकट्ठे होते हैं—आज वे प्रश्नों का उत्तर देंगे तथा लोग कागज पर अपने प्रश्न लिख—लिखकर उनके सचिव को पकड़ा रहें हैं। मैं भी साहस बटोरकर अपना अनुभव लिखकर उनसे पूछती हूँ कि यह मुझे क्या हो रहा है। अपना प्रश्न दे कर मैं थोड़ी दूरी पर सबके बीच में स्वयं को छिपाती हुई बैठ जाती हूँ।

वही दिव्य सौंदर्य और गरिमा लिए, सबको नमस्कार करते हुए वे पुन : यहां चले आ रहे हैं। पद्मासन में बैठकर वे प्रश्न पढ़ना शुरू कर देते हैं। जब अपना गुलाबी कागज मैं उनके हाथ में देखती हूं तो मेरा हृदय तेजी से धड़कने लगता है। पता नहीं क्यों, मुझे शर्म आने लगती है कि मेरा प्रश्न पढ़ने के बाद वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। मुझे आश्चर्य होता है कि मेरा प्रश्न पढ़ने कै बाद—जो कि वास्तव में कोई प्रश्न नहीं बल्कि पहली दफा उनको सुनने के बाद जो अनुभव द्वे हुआ उसका यथावत बयान भर है.....जैसे मैं किसी चुंबक से खिंची जा रहीं हूं मर रहीं हूं—वे अपनी बांयी तरफ बैठे श्रोताओं की ओर देखने लगते हैं और जब उनकी नजरें मुझ तक पहुंचती हैं तो वहीं ठहर जाती हैं। मैं अपना सिर झुका लेती हूं ऐसा लगता है जैसे मैं जम गई हूं तथा मैं जान जाती हूं कि उन्हें पता चल गया है कि यह प्रश्न मेरा ही है। वे यह प्रश्न सिर्फ पढ़ते भर हैं और फिर दूसरे प्रश्नों के जवाब देने लगते हैं।
प्रवचन समाप्त होने के बाद लोग उनके समीप जाकर उनके पांव छू रहे हैं, और वे सबके सिर पर हाथ रख रहे हैं। दूर से ही मैं यह सब देख रही हूं उनके नजदीक जाने का साहस नहीं हो रहा है। अंतत:, जब वे जाने के लिए उठ खड़े होते हैं तो मैं उनकी ओर दौड़ती हूं, और जैसे ही उनके पास पहुंचती हूं वे मुस्कुराकर पूछते हैं, तो वह तुमने लिखा था?' मैं सहमति में अपना सिर झुका देती हूँ और उनके चरण छूने के लिए झुक जाती हूं। वे अपना हाथ मेरेसिर पर रख देतेहै और जब में उठती हूं तो वे कहते है, दोपहर को आकर मुझसे मिलना।