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बुधवार, 16 दिसंबर 2015

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--14)

(अध्‍याय—चौहदवां)

शाम सात बजे तक हम उदयपुर पहुंच जाते हैं। वहां हम यह देखकर हैरान रह जाते हैं कि ओशो और हम सबके लिए एक ही कमरे का प्रबंध किया गया है, वह भी ऐसी बिल्डिंग में जिसके निर्माण का काम अभी चल ही रहा है। कमरे में एक चारपाई पड़ी है उस पर सफेद चादर से ढका पतला सा गद्दा पड़ा हुआ है। यह ओशो का बिस्तर है और बाकी हम सबके सोने के लिए उसी कमरे में दरियां बिछी हुई हैं।
यह देखकर तो मैं और भी हक्की—बक्की रह जाती हूं कि कमरे में बिजली का परवा तक नहीं है। कमरे के एक कोने में कछ हाथ से झलने वाले पंखे
रखे हुए हैं। कहीं से एक बल्व जलाने के लिए बिजली का कनेक्शन लिया गया है। पास ही एक बाथरूम है जो हम सब के उपयोग के लिए तैयार किया गया है।
इतने थकान भरे सफर के बाद हम अपनी दरियों पर बैठकर सुस्ताने लगे और ओशो अपनी चारपाई पर ऐसे लेट जाते हैं जैसे कोई बच्चा पालने में सो रहा हो। सभी चुप हैं। मुझे इस सारी व्यवस्था पर बहुत ही क्रोध आ रहा है, पर उसे अभिव्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं मिल पा रहे हैं। ऊपर—ऊपर से मैं भी शांत रहती हूं।
मैं ओशो को देखती हूं। ऐसे लगता है जैसे उन्होंने इस सब कुछ को आनंद से स्वीकार कर लिया है। उनके चेहरे पर शिकायत का लेशमात्र भी भाव नहीं है। कछ मिनट आराम करने के बाद तौलिया अपने
कंधे पर लटकाए वे बाथरूम की ओर चले जाते हैं। जैसे ही वे जाते हैं, हम लोग आपस में इस अजीबो—गरीब स्थिति के बारे में बातें करने लगते हैं।
आयोजक ओशो की कठिनाई को नहीं समझ सकता। वह सोचता है कि उसने सबसे बेहतर इंतजाम किया है, और आस—पास कोई दूसरा कमरा भी उपलब्ध नहीं है। ओशो को बाथरूम से बाहर आता देख हम सब चुप हो जाते हैं। वे ताजगी से भरे सद्यस्‍नात और कान्तिमय लग रहे हैं। मैं उन्हें अपलक निहारने से स्वयं को नहीं रोक पाती। वे हमारी ओर देखकर मुस्कुराते हैं और अपनी चारपाई पर ऐसे बैठ जाते हैं जैसे कोई महाराजा अपने खूबसूरत सिंहासन पर बैठा हो। मैं सोचती हूं उनके पास कोई अद्भुत गुप्त कुंजी है, और मैं उसे चुराना चाहती हूं।