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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--16)

(अध्‍याय—सौहलवां)

 पती हुई दोपहर है और ओशो भोजन के बाद अपनी चारपाई पर आराम कर रहे हैं, बाकी सब लोग बाहर गए हुए हैं। मैं दरवाजे की सिटकनी लगाकर चारपाइ के पास ही फर्श पर बैठ जाती हूं और उन्हें पंखा करने लगती हूं। कुछ देर बाद वे आंखें खोलते हैं और कहते हैं, पंखा बंद कर और सो जा।

मुझे लगता है शायद वे समझ रहे हैं कि मैं थक गई हूं लेकिन वास्तव में मैं तो इसका रस ले रही हूं कि उनको कुछ आराम पहुंचा पा रही हूं। मैं उनसे कहती हूं, गर्मी बहुत है, इसलिए मैं आपको पंखा कर रही हूं।
वे कहते हैं, परिस्थिति को स्‍वीकार कर लो तो फिर कोई समस्या नहीं होती।वे धुन: आंखें बंद कर लते हैं। मैं परवा करना बंद कर देती हूं.
और आहिस्ता से वहां से हट जाती हूं। कौतुहल से भरे लोग उछल—उछलकर बिना पर्दे की खिड़कियों में से भीतर झांकने की कोशिश कर रहे हैं। मैं ओशो की ओर देखती हूं। वे ऐसे लेटे हैं जैसे कोई सम्राट अपने स्वर्ण—सिंहासन पर लेटा हो।
रात को मैं उनका गद्दा छत पर ले जाकर वहां जमीन पर उनके लिए बिस्तर लगा देती हूं। वहां 'काफी ठंडक है और उनको खुले आकाश के नीचे सोना अच्छा लगता है, वे हमें भी वहां आकाश के नीचे सोकर चांद और सितारों का आनंद लेने को कहते हैं।