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बुधवार, 30 दिसंबर 2015

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्याय--29)

(अध्‍याय—उन्‍नतीसवां)  

जिन मित्रों ने बड़ौदा में विभिन्न स्थानों पर उनकी मीटिंगों का आयोजन किया है, वे बड़े विचित्र लोग हैं। अन्न शाम ओशो कहीं बोलने वाले हैं लेकिन ये लोग हमें उस जगह का नाम बताने को तैयार नहीं हैं। वे लोग ओशो को अकेले ही एक कार में अपने साथ ले जाना चाहते हैं। मैं बहुत नाराज हूं। किसी भी कीमत पर मैं उनके प्रवचन से चूकना नहीं चाहती।
दोपहर को मैं ओशो से मिलती हूं और पूछती हुं कि क्या करूं। वे कहते हैं, यह तो बहुत ही आसान काम है। बस एक रिक्‍शा कर ले और उसे मेरी कार के पीछे—पीछे चलने को बोल दे।
मैं उनको कहती हूं, ये लोग हमसे बहुत नाराज लगते हैं, वे हमसे पूछेंगे कि हम उनका पीछा क्यों कर रहे हैं।ओशो हंसकर कहते हैं, तुम उन्हें कह सकती हो कि हम अपने रास्ते जा रहे हैं, आप हमारे आगे—आगे चल रहे हैं। हम क्या कर सकते हैं?'
मुझे यह तरकीब अच्छी लगती है, और यह उपयोगी भी रही। जैसे ही उनकी कार रुकती है, हमारी रिक्शा भी उसके पीछे रुकती है। मैं उतरकर कदम से ओशो के साथ—साथ चलने लगली हूं और इन मित्रों को कुछ भी कहने का मौका ही नहीं देती। यहां एक छोटे से हॉल में लॉयन्स क्लब के मेंबर्स की ओर से मीटिंग आयोजित की गई है। आयोजक जो मेरे बाजू में ही बैठे हैं, उनकी उपेक्षा करते हुए मैं अपना रिकार्डर जमाने लगती हूं।
प्रवचन के बाद, यह व्यक्ति उठकर मेरे पास आते हैं और प्रवचन को रिकॉर्ड करने के लिए मुझे धन्यवाद देते हैं। वह मुझसे कार में ओशो के साथ आने को कहते हैं। मैं राहत की सांस लेती हूं और ओशो के पीछे—पीछे उस बच्चे की तरह चलने लगती हूं जिसने कोई लॉटरी जीत ली हो।