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रविवार, 13 दिसंबर 2015

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--06)

(अध्‍याय—छट्ठवां)

 शाम के 8 बजकर 55 मिनट हो चुके हैं। मैं उस बिल्डिंग के प्रवेशद्वार से भीतर जा रही हूं उसी वक्त वहां से बाहर आती हुई एक कार मेरे पास आकर रुक जाती है। मैं अपने विचारों में इतनी लीन हूं कि उसक़ी ओर कोई ध्यान ही नहीं देती। अचानक कार में से मुझे ओशो की आवाज सुनाई पड़ती है। वे मुझे बुला रहे हैं। वे पिछली सीट पर खिड़की के समीप बैठे हुए हैं।
मैं दौड़कर उनकी ओर जाती हूं।

वे कहते हैं, मैं आधे घंटे में वापस आऊंगा, तू तब तक रुकना ', और मुझसे पूछते हैं कि जहां वे ठहरे हैं उस अपार्टमेंट का पता मुझे है या नहीं। मैं कह देती हूँ हां, मुझे पता है। 'कार चल पड़ती है और कुछ देर मैं वहीं खड़ी उसकी ओर देखती रहती हूं जब तक कि वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हो जाती। मैं एक गहरी सांस लेती हूं और बिल्डिंग में प्रवेश करती हूँ—उसमें कई खंड हैं और मुझे यह नहीं मालूम कि मुझे किस खंड में जाना है। अब मुझे साफ समझ में आता है कि वे यह क्यों पूछ रहे थे कि मुझे उस अपार्टमेंट का पता है या नहीं। यहां से वहा पागलों की तरह भटकते हुए मुझे अपने ही ऊपर गुस्सा आने लगता है कि अपनी बेहोशी के कारण मैंने अपने सदगुरू से सच क्यों नहीं बोला। ठीक जगह पहुंचने में मुझे बीस मिनट लग जाते हैं।
मेरे कॉल बटन दबाने पर वही स्त्री दरवाजा खोलती है जिससे फोन पर मेरी बात हुई थी। मुझे पहचानने के बाद वह खेद व्यक्त करती है कि फोन पर उसने मुझे पूरा पता नहीं बताया था। वह मुझसे गले मिलती है और मेरा हाथ पकड़कर मुझे बड़े से लिविंग रूम में ले जाती है जहां आठ—दस लोग पहले से ही सोफों पर बैठे बात—चीत कर रहे हैं। वातावरण काफी हल्का—फुल्का है; मुझे छोड्कर और कोई भी गंभीर नजर नहीं आ रहा है। इस समूह में मैं स्वयं को अजनबी सा महसूस करती हूं और एक कोने में चुपचाप बैठकर अपने सदगुरू का इत पार करने लगती हूं।
ठीक दस मिनट बाद ओशो वहां आते हैं और हम सब खड़े हो जाते हैं। ओशो मुस्कुरा कर सबको नमस्ते करते हुए दूसरे कमरे में चले जाते हैं। अविलम्ब मुझे उनके कमरे में बुला लिया जाता है। मैं जब कमरे में प्रवेश करने लगती हूं तो फिर वही अज्ञात भय मुझे घेर लेता है, मुझे डर लगता है, जैसे कोई नन्हा सा पतंगा आग के पास जा रहा हो जो उसे जला डालेगी। लेकिन आग का यह चुम्बकीय आकर्षण इस भय से कहीं ज्यादा बड़ा है।
मैं देखती हूं कि वे पलंग पर बैठे कोई जूस पी रहे हैं, और मैं उनके सामने थोड़ी दूरी रार बैठ जाती हूं। अपना जूस खत्म करने के बाद वे गिलास को पलंग के पास रखी छोटी सी मेज पर रखते हैं, नेपकिन से अपना मुंह पोंछते हैं और मुस्कुराकर मुझे अपने करीब आने —को कहते हैं। अपना दायां हाथ वे मेरी छाती पर और बायां हाथ मेरे सिर पर रख देते हैं। मेरे मन की बकबक रुक जाती है और मैं ऐसी अवस्था में पहुंच जाती हूं जो मेरे लिए बिल्कुल अनजान है। मेरी आंखों से आंसू ढुलक पड़ते हैं और मेरा शरीर उनकी तरफ झुकने लगता है। उनकी गोद में सिर ररवकर मैं छोटे बच्चे की तरह —रोने लगती हूं।
कुछ ही क्षणों में वे अपने हाथ हटा लेते हैं और मुझसे कहते हैं, 'धीरे—धीरे वापस आ जाओ। 'मैं शांत हो जाती हूं अपना सिर ऊपर उठाकर उनकी आंखों में झांकती हूं। वे अनंत आकाश में छोटे—छोटे तारों जैसी चमक रही हैं। मैं उस अज्ञात भय और विरह की पीड़ा से मुक्ति अनुभव करती हूं।
वे धीरे से हंसते हैं और कहते हैं कि मैं रोज सुबह एक घंटे के लिए विपश्यना ध्यान किया करू और जब भी वे बंबई में हो तब मैं उनसे मिल सकती हूं। मैं उनके चरण—स्पर्श करती —हूं और इस भाव के साथ कमरे सेह बाहर आती —हूं कि आज उन्होंने मुझे अपने शिष्य के रूप में दीक्षित किया है।