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गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--32)

(अध्‍याय—बत्‍तीसवां)

 भारत—भर में भ्रमण करते हुए, ओशो जब भी पूना में होते हैं तो वे सोहन के घर रुकना पसंद करते हैं। मैं उनके साथ सोहन के घर पर रहने के सुअवसर को कभी खोना नहीं चाहती। सोहन, ओशो व उनके लोगों के प्रेम में दीवानी है। —जब ओशो. उसके घर में रुके होते हैं तो उसका घर तीर्थ बन जाता है। सैकड़ों लोग. रोज वहां आते हैं और वह सबका इतने प्रेम और स्नेह से स्वागत सत्कार करती है कि लोग अपने आनंद के आंसुओ को रोक नहीं पाते।
दोपहर का समय तो किसी बड़ी दावत जैसा लगता है। हर आने वाले को नमकीन—मिठाई और चाय दी जाती है। ओशो भी अपने कमरे से निकलकर लिविंग रूम में सोफे पर बहुत से मित्रों से घिरे?र्मं'हुए बैठ जाते हैं। उनकी उपस्थिति और अदृश्य सुगंध पूरे वातावरण में बहुत सघन होती है।
उनके इर्द—गिर्द हमेशा ही बड़ी हंसी—खुशी होती है। उन्हें बच्चों को छेड़ना अच्छा लगता है। उनसे कोई भी प्रश्न क्यों न पूछा जाए, प्रश्न छोटे बीज सा ही क्यों न हो, उनके मौन से उसका उत्तर एक विशाल वृक्ष के जैसा आता है। उनकी आवाज इतनी सुरीली और शान्तिप्रद है कि मैं उनके शब्दों को तो सुनने की खास परवाह ही नहीं करती। उनके शब्द मुझे उनके भीतर की नितांत शून्यता से जोड्ने वाले सेतु का काम करते हैं। कई बार मैं उनको ऐसे महसूस करती हूं जैसे किन्हीं अदृश्य हाथों से कोई बांसुरी बजाई जा रही हो। उनकी गहराई और उनकी ऊंचाई हमारी पहुंच के बाहर है। वे खुले आकाश में अकेले एक चील की तरह उड़ रहे हैं और हम जमीन पर कीड़े—मकोड़ों की तरह रेंगते हुए उनकी ओर देखकर सहायता के लिए चिल्ला रहे हैं। वे अद्मुत हैं, बिना कोई शब्द कहे ही वे उन दिलों की दास्तां सुन लेते हैं जो उनके लिए अभीप्सा से भरे हैं, और इन दिलों को जीवन के अपने शाश्वत झरनों से प्यास बुझाने देते हैं।
धन्यवाद प्यारे सदगुरू! मेरे लिए तो आप सम्पूर्ण खिले सहस्त्रदल कमल के फूल हैं। मैं तो आपकी उपस्थिति में आनंदित होने, नाचने व गाने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकती।