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बुधवार, 16 दिसंबर 2015

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--13)

(अध्‍याय—तैरहवां)

शो जबलपुर से आ पहुंचे हैं। उन्हें प्लेन से उदयपुर जाना है। इंडियन एयरलाइंस की कई दिनों से हड़ताल चल रही है और हम आशा कर रहे हैं कि हड़ताल कभी भी समाप्त हो सकती है, लेकिन हड़ताल जारी है। उदयपुर पहुंचने का कोई और उपाय हम नहीं सोच पाते और ओशो को सुझाव देते हैं कि वहां का ध्यान शिविर कुछ समय कै लिए स्थगित —कर दिया जाए। लेकिन ओशो समय पर वहां पहुंचने के अपने निश्चय पर अटल हैं। हम सोच में पड़े हुए हैं कि यह कैसे संभव हो सकता है—गाड़ियों की रिजवेशन्स भरी हुई हैं, और लंबी—लंबी वेटिंग लिस्ट्स चल रही हैं।
वे सुझाव देते हैं कि हम जाकर रेल रिजर्वेशन अधिकारी से कहैं कि अहमदाबाद जाने वाली गुजरात मेल ट्रेन 'में वह एक एयरकंडीशंड कंपार्टमेंट और जोड़ दें और उसमें आठ स्लीपर हमारे लिए बुक कर लिए जाएं। हम हैरान होते हैं जब रिजर्वेशन अधिकारी को यह सुझाव बहुत पसंद आता है और वह अपनी वेटिंग लिस्टों को देखता हुआ तुरंत सहमत हो जाता है। हम अपने आठ स्लीपर बुक करवाकर जल्दी से ओशो और दूसरे मित्रों को सूचित करते हैं और सबको तैयार होकर 8 बजे तक बंबई सेंट्रल स्टेशन पर पहुंचने को कहते हैं।
हम सभी फूले नहीं समा रहे हैं कि हमें उनके साथ एक ही कंपार्टमेंट में यात्रा करने को मिलेगा। सभी लोग समय पर पहुंच चुके है। ओशो बहुत प्रसन्न दिखाई दे रहें हैं। वे अपने स्लीपर पर आलथी—पालथी लगाकर बैठे हैं, और सबने उन्हें घेरा है वे हमें चुटकले सुनाते हैं, और पूरा कंपार्टमेंट ठहाकों से गूंजने लगता है। लोग झांक—झांककर देख रहे हैं कि यहां क्या हो रहा है। कुछ देर बाद हम उन्हें अकेला छोड़ देते हैं और अपने—अपने स्लीपर पर चले जाते हैं।
गाड़ी अहमदाबाद समय से पहुंच जाती है। एक मित्र के घर नाश्ता करने के बाद हम उदयपुर पहुंचने के लिए दो टैक्सियां कर लेते हैं। बहुत गर्मी है। अपनी गहरी बेहोशी में हम उनके लिए एयरकंडीशंड कार का इंतजाम करने का भी नहीं सोच पाते। यह 68 घंटे का सफर है। ओशो एक मित्र के साथ टैक्सी की पिछली सीट पर बैठे हुए हैं और मैं आगे ड्राइवर के साथ बैठी हुई हूं। मैं पसीने से लथपथ हूं और आगे रास्ते की कभी न खतम होने वाली धूलभरी सड़क को देख—देखकर मेरा सिर दुखने लगा है।
मैं पीछे मुड़कर देखती हूं। ओशो आंखें बंद करके निर्लिप्त से बैठे हुए हैं, जैसे कि बाह्य जगत से उन्होंने सारे संबंध तोड़ लिए हों। मैं सोचती हूं कि मैं भला कब यह सीख पाऊंगी। यह बड़ा असंभव सा काम लगता है। तब मुझे लगता है कि मैंने किसी तरह उन्हें परेशान कर दिया है, और वे अपनी आंखें खोलते हैं व सोडा मांगते हैं। भारत के भिन्न—भिन्न इलाकों में लगातार यात्रा करते रहने के कारण उन्होंने पानी पीना छोड़ दिया है। हम टैक्सी रुकवाते हैं। मैं पीछे रखे बड़े थर्मस में से एक सोडा निकालती हूं और एक नेपकिन को ठंडे पानी में भिगो लाती हूं।
जब वे सोडा खतम कर लेते हैं तो मैं गीला नेपकिन उन्हें सिर पर रखने के लिए देती हूं। नेपकिन लेकर वे छोटे बच्चों की तरह वैसा ही करते हैं जैसा मैं उन्हें करने को कहती हूं। जब उन्हें भीगे नेपकिन की ठंडक महसूस होती है तो वे मुझसे पूछते है। ये तरकीबें' मैंने कहां से सीखी हैं?' गर्मी इतनी अधिक है कि नेपकिन आधे घंटे में ही सूख जाता है और मैं उसकी जगह गीला कर—करके दूसरा नेपकिन तब तक देती रहती हूं जब तक कि हम उदयपुर नहीं पहुंच जाते।