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शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

सफेद बादलों का मार्ग-(प्रवचन-10)

प्रवचन-दसवां 

न कोई लक्ष्य, न कोई प्रयास
( अंग्रेजी प्रवचनमाला ‘माई वे : दि वे ऑफ व्हाइट क्लाउड्स’ का हिंदी रूपांतर)
पहला प्रश्नः
ओशो! झेन परम्परा है कि जब कोई भिक्षु अपनी शिक्षाएं देने बाहर जाता था तो उसके पूर्व उसे अपने सदगुरु के साथ दस वर्षों तक मठ में ठहरना होता था। एक बार एक भिक्षु ने मठ में दस वर्षों का समय पूरा कर लिया था। वह एक दिन भारी बरसात के दौरान अपने सदगुरु ‘नानइन’ से भेंट करने के लिए गया। उसका स्वागत करने के बाद नानइन ने उस से पूछा : ‘निसंदेह रूप से तुमने अपने जूते दालान में उतारे होंगे। तुमने अपने छाते के किस ओर जूते उतारे हैं’ एक क्षण के लिए भिक्षु हिचकिचाया और उसने महसूस किया कि वह प्रतिपल ध्यानपूर्ण नहीं था।
आपने हमें बतलाया है कि जीवन एक स्फुरण है, स्पंदन है : अंदर और बाहर, यिन और यांग, तो क्या हमें प्रत्येक क्षण सचेतन बने रहने का प्रयास करना होगा? अथवा क्या हम भी जीवन के साथ स्पंदित हो सकते हैं और क्या उस समय हमें प्रयास छोड़ देना चाहिए?


पहली बात तो यह समझ लेनी है कि सचेतनता क्षण प्रति क्षण बनी रहना चाहिए, लेकिन वह केवल तभी बनी रह सकती है जब वह प्रयास रहित हो गई हो। प्रयास के द्वारा तुम बार-बार सम्पर्क खो दोगे, प्रयास के साथ तुम्हें विश्राम भी करना है। प्रयास निरंतर नहीं हो सकता, यह असंभव है। तुम निरंतर प्रयास कैसे कर सकते हो? तुम थक जाओगे और तब तुम्हें विश्राम करना होगा। प्रत्येक प्रयास को विश्राम की ज़रूरत होती है। इसलिए यदि सचेतनता प्रयास के द्वारा साधी गई है तो वह सतत् नहीं बनी रह सकती, वह निरंतर प्रवाहित नहीं हो सकती। वहां ऐसे क्षण भी होंगे, जब तुम सचेतनता से चूक जाओगे। वे क्षण ही प्रयास से हटकर, विश्राम के क्षण होंगे।
जीवन स्पंदित होता है। जीवन हमेशा विरोधाभास की ओर गतिशील होता है। प्रयास करो, तब तुम्हें विश्राम करना होगा, तुम पुनः प्रयास करो, तब तुम्हें पुनः विश्राम करना होगा। लेकिन सचेतनता जीवन के भी पार है, वह अज्ञात में ले जाती है। तब वहां धड़कन नहीं होती, यह प्रयास रहित होता है, यह सहज और स्वयं प्रवर्तित होता है।
नान-इन के इस शिष्य को, इस भिक्षु को क्या हुआ? सदगुरु ने पूछा ‘तुमने अपने जूतों को कहां छोड़ा, छाते के दाइंर् ओर अथवा बाइंर् ओर’ वह हिचकिचाया और उसने अनुभव किया कि जूतों को छोड़ने के क्षण में वह सचेत नहीं था, अन्यथा उसे पता होना चाहिए था कि उसने जूतों को कहां छोड़ा था, छाते की दाइंर् ओर अथवा बाईं ओर। उस भिक्षु की सचेतनता में अभी निरंतरता नहीं है। इस घटना से पता चलता है कि उसकी चेतना अभी भी प्रयासरहित नहीं है। उसे अभी भी स्मरण करना पड़ता है, सचेत बने रहकर प्रयास करना पड़ता है। उसका सजग बने रहना अभी भी तनाव के साथ होता है और वह अभी तक होशपूर्ण नहीं हुआ है। इसलिए कभी वह सफल होता है और कभी असफल हो जाता है।
नान-इन केवल यही पूछ रहा है कि क्या उस भिक्षु की सचेतनता अब सहज स्वाभाविक हो गई है। क्या तुम्हें उसे नियंत्रित करने की ज़रूरत नहीं होती है? क्या तुम्हें इस बारे में कुछ भी नहीं करना होता है? क्या यह सजगता सदैव ही बनी रहती है? तुम चाहे जो भी कार्य कर रहे हो, क्या सजगता हमेशा रहती है, अथवा सजग बने रहने के लिए तुम्हें प्रयास करना होता है? यदि प्रयास करना पड़ता है तो वह एक तनावपूर्ण स्थिति है और एक तनावपूर्ण स्थिति में अस्वाभाविक होना सुनिश्चित है। एक अस्वाभाविक सचेतनता वास्तव में सचेतनता नहीं है, वह केवल परिधि पर मौजूद है, तुम्हारे भीतर केंद्र पर नहीं है। यदि वह तुम्हारे अंदर मौजूद है तो प्रयास करने की कोई जरूरत ही नहीं है।
जो मैं कह रहा हूं वह यह है कि प्रयास हमेशा परिधि पर होता है। प्रयास के द्वारा तुम केन्द्र का स्पर्श नहीं कर सकते। तुम परिधि पर अवश्य ही कुछ कर सकते हो, तुम अपना आचरण बदल सकते हो, तुम अपने तथाकथित चरित्र को बदल सकते हो और एक पापी की अपेक्षा एक सदाचारी बन सकते हो और यहां तक कि तुम एक संत भी बन सकते हो, लेकिन प्रयास के साथ यह केवल परिधि पर ही होगा।
प्रयास के द्वारा तुम कभी भी अंदर प्रवेश करके स्वयं के केन्द्र का स्पर्श नहीं कर सकते हो, क्योंकि कोई भी कार्य इस दिशा में तुम्हारा पथ प्रदर्शन नहीं कर सकता, तुम पहले ही से वहां मौजूद हो। इस बाबत कोई भी कार्य करने की ज़रूरत नहीं है। तुम्हें केवल पूरी तरह से मौन और स्वयं प्रवर्तित होना है और तब केन्द्र का उदय होता है। वह बादलों से बाहर आता है। वहां एक अवकाश है, एक अंतराल होता है। तुम अचानक अपनी सहज स्वाभाविक सचेतनता को अनुभव करते हो। तुम एक सचेतनता ही हो। तुम जो करते हो, वह सब बेकार है, तुम्हें तो कुछ करना ही नहीं होगा, तुम्हारा वास्तविक स्वभाव ही सचेतनता है।
हिन्दुओं ने इसे सत्-चित्-आनंद के नाम से पुकारा है। उन्होंने तीन शब्दों का प्रयोग किया है : सत, चित और आनंद। सत का अर्थ है अस्तित्वगत, वह जो कभी भी अनस्तित्व में नहीं जा सकता। सत का अर्थ है सत्य, जो कभी भी असत्य नहीं हो सकता। सत् का अर्थ है शाश्वत- जो था, जो है और जो रहेगा। चित का अर्थ है : सजगता अथवा चेतना। तुम सदा चेतन रहे हो, तुम चेतन हो और तुम चेतन ही बने रहोगे, यह तुम्हारा स्वभाव है। यह सचेतनता तुम से छीनी नहीं जा सकती, यह तुम्हारी परिधि पर नहीं, तुम्हारे अस्तित्व के प्रामाणिक केन्द्र पर मौजूद है। वही तुम हो, लेकिन तुम स्वयं अपने ही साथ संपर्क में नहीं हो। आनंद का अर्थ है : प्रसन्नता अथवा पूर्णानंद अथवा अद्वैत की स्थिति अथवा परमानंद। ऐसा नहीं है कि तुम्हें उस परमानंद को प्राप्त करना है : वह तुम हो ही। तुम सदा परमानंद ही रहे हो, तुम उससे अन्यथा कुछ और हो ही नहीं सकते। इसकी कोई संभावना ही नहीं है, तुम उसे बदल नहीं सकते।
तुम कहोगे कि यह बात पूर्ण रूप से व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण प्रतीत होती है क्योंकि हम दुख और वेदना में हैं। तुम दुख में इसलिए हो, क्योंकि तुम अपनी परिधि के प्रति इतने मोहग्रस्त हो गए हो कि तुम अपने केन्द्र को पूरी तरह से भूल गए हो। तुम दूसरों के साथ इतने अधिक व्यस्त हो गए हो, दूसरे लोगों ने तुम्हें इतना अधिक अपने अधिकार में ले लिया है कि तुम स्वयं को भूलकर, अंधकार के साये में गिर गए हो।
तुम सत-चित-आनंद हो।
झेन सदगुरु नान-इन अपने शिष्य से पूछ रहा है : ‘क्या अब तुम सजग हुए हो कि तुम कौन हो? क्या अब तुमने अपने स्वभाव में स्थित हो’
यदि शिष्य वास्तव में अपने स्वभाव में जड़ें जमाए होता तो क्या स्थिति हुई होती?
इस कथा को समझना बहुत कठिन है। यह प्रश्न जूतों को बाईं अथवा दाईं ओर छोड़ने का नहीं है। यह इस कथा का मुख्य प्रयोजन नहीं है। यह प्रयोजन जैसा प्रतीत होता है, लेकिन है नहीं। वास्तविक कथा का उद्देश्य है कि जब नान-इन ने इस शिष्य से प्रश्न पूछा तो वह उत्तर देने में हिचका, यही वास्तविक उद्देश्य है। अपने हिचकने के उस क्षण में ही वह सजग नहीं था कि वह हिचक रहा था। यदि वह सजग रहा होता तो वहां कोई भी हिचकिचाहट नहीं होती और उसने उसे स्वीकार कर लिया होता। उस क्षण उसने अपनी सचेतनता खो दी थी।
तुम नान-इन को धोखा नहीं दे सकते। यदि तुम नान-इन से भेंट करने जाते हो, तो तुम भलीभांति स्मरण रख सकते थे कि तुमने अपने जूते कहां छोड़े थे। यह कठिन नहीं है। यदि नान-इन तुमसे पूछता है कि तुमने अपने जूते कहां छोड़े, बाईं ओर अथवा दाईं ओर? तुम तुरंत उत्तर दे सकते थे कि दाईं ओर, परंतु इस स्थिति में भी तुम असफल हो जाओगे। उद्देश्य यह नहीं है, यह केवल एक छलावा है अथवा वंचना है। नान-इन केवल यह देखने के लिए कि ठीक अभी क्या घटित हो रहा है, उसके मन को वहां से हटा रहा है।
ठीक उसी क्षण में जब नान-इन ने पूछा : ‘तुम्हारे जूते कहां हैं, दाईं ओर अथवा बाईं ओर’ शिष्य चूक गया, उस प्रामाणिक क्षण में वह हिचकिचाया और वह उस हिचक के प्रति सजग नहीं था। उसने सोचना शुरू कर दिया। उस प्रामाणिक क्षण में वह सचेत न बना रहा सका। नान-इन ने उसके अंदर झांककर देख लिया। वह प्रश्न केवल उसके मन को हटाने के लिए था, वह केवल एक धोखा था।
शिष्य असफल हो गया, इसलिए उसे दूसरों को शिक्षा देने नहीं भेजा गया। वह अभी भी तैयार नहीं है, वह अभी भी सजग नहीं है। एक व्यक्ति, जो स्वयं सजग और सचेत नहीं है, वह दूसरों को कैसे शिक्षा दे सकता है? वह जो कुछ भी सिखाने जा रहा है, वह नकली और असत्य होगा। इस स्थान पर अनेक शिक्षक हैं, जो शिक्षा दे सकते हैं और अभी भी वे स्वयं अपने प्रति ही सजग नहीं हैं। वे सज्जन, कुशल और कलात्मक हो सकते हैं, लेकिन प्रयोजन वह नहीं है। वे दूसरों की कोई भी सहायता नहीं कर सकते।
एक बार मैं रेलगाड़ी में यात्रा कर रहा था। एक छोटा-सा बच्चा बहुत अधिक उपद्रव कर रहा था। उस डिब्बे के सभी यात्री उससे परेशान हो रहे थे। वह इस कोने से उस कोने तक दौड़ रहा था। वह खिड़कियों के शीशों को ऊपर-नीचे कर रहा था और लुढ़ककर लोगों पर गिर रहा था। उसका पिता बहुत अधिक शर्मिंदगी का अनुभव कर रहा था। उसने बच्चे को रोकने के अनेक प्रयास किए, लेकिन वह उसकी एक न सुनता था। तब अंतिम रूप से पिता ने उससे कहा : ‘विली! यदि तुम मेरी बात नहीं सुनते हो और शरारतें करना बंद नहीं करते हो तो मैं तुम्हें थप्पड़ मारने जा रहा हूं।’ उस बच्चे का तब भी निरंतर दौड़ना जारी रहा। वह डिब्बे के दूसरे छोर तक पहुंचा और उसने चिल्लाते हुए कहा : ‘ठीक है, आप मुझे थप्पड़ मारिए, लेकिन तब मैं टिकट कलेक्टर को यह बता दूंगा कि वास्तव में मेरी उम्र कितनी है।’
यह पिता एक शिक्षक नहीं हो सकता है। एक बच्चा भी उसकी बात नहीं सुन रहा है। एक शिक्षक, जो स्वयं अपने प्रति ही सजग नहीं है, एक शिक्षक नहीं हो सकता। जो अनुभव उसने स्वयं प्राप्त नहीं किया है, उसे वह दूसरों को नहीं सिखा सकता है।
सचेतनता एक संक्रामक रोग की तरह है। जब एक गुरु सजग और सचेत होता है, तो उस सजगता से तुम भी संक्रमित हो जाते हो। कभी-कभी केवल गुरु के निकट बैठे हुए ही अचानक तुम सजग हो जाते हो, जैसे मानो बादल छंट गए हों और तुम खुला हुआ आकाश देख सकते हो। ऐसा भले ही एक क्षण के लिए हो लेकिन वह तुम्हारे अस्तित्व की प्रामाणिक गुणवत्ता में एक गहन परिवर्तन कर जाता है।
अपनी ओर से भले ही तुम कोई भी प्रयास न करो, लेकिन एक सदगुरु के निकट बने रहने से ही तुम मौन हो जाते हो, क्योंकि सदगुरु मौन सचेतनता का एक सरोवर है। वह अंदर तक तुम्हें स्पर्श करता है। तब तुम्हारे बंद द्वार खुल जाते हैं या मानो एक अंधेरी रात में अचानक बिजली कौंध जाती है और तुम उस अखंड को देख पाते हो। वह शीघ्र ही विलुप्त हो जाता है, क्योंकि उसे तुम बलपूर्वक रोक नहीं सकते, वह तुम्हारे कारण नहीं हुआ है। यदि वह तुम्हारे कारण नहीं हुआ है तो तुम उसे खो दोगे लेकिन उसके बाद तुम पहले जैसे नहीं रहोगे, तुममें कुछ बदल गया है, तुमने कुछ ऐसा जान लिया है जिससे तुम अनजान थे। अब यह जानना तुम्हारा अपना अनुभव है, यह तुम्हारा हिस्सा बनकर रहेगा। तब एक कामना उत्पन्न होगी, एक आकांक्षा पैदा होगी... इस अनुभव को दुबारा प्राप्त करने की और इसे स्थाई बनाने की, क्योंकि एक क्षण के लिए ही सही, वह अत्यंत आनंददायी था, उसने तुम्हारे ऊपर इतनी अपार प्रसन्नता और आनंद की वर्षा कर दी।
लेकिन यदि सदगुरु अथवा शिक्षक स्वयं ही सचेत नहीं है, तो वह सचेतनता के बारे में तो सिखा सकता है, लेकिन सचेतनता नहीं सिखा सकता है। सचेतनता के बारे में सीखना व्यर्थ है, वह मौखिक है, वह केवल एक सिद्धांत है। तुम उससे सिद्धांत तो सीख सकते हो, लेकिन तुम उससे सत्य नहीं सीख सकते। इसलिए यह शिष्य मठ के बाहर जाकर अपनी शिक्षा देने लगे, इससे पहले ही नान-इन को उसके भीतरी अनुभव को अनिवार्य रूप से देखना है, परखना है, और यह एक बहुत अद्भुत तथ्य है।
शिक्षा के जगत में एक छात्र की परीक्षा ली जाती है, लेकिन केवल उसकी स्मरण शक्ति की ही परीक्षा ली जाती है, कभी भी स्वयं उसका परीक्षण नहीं किया जाता। हमेशा ही केवल स्मृति का परीक्षण है, छात्र का कभी भी नहीं। नान-इन अपने शिष्य की स्मरण शक्ति की परीक्षा नहीं ले रहा है। वह यह नहीं पूछ रहा है : ‘तुमने अपने जूते कहां छोड़े, दाईं ओर अथवा बाईं ओर’ वह शिष्य की कुशल स्मरण-शक्ति की जांच नहीं कर रहा है, क्योंकि उसने जूते कहां छोड़े, यह बात अब अतीत हो गई है। परंतु अभी, गुरु अपने शिष्य के अस्तित्व के भीतर तक झांकने का प्रयास कर रहा है। वह उसकी स्मरण-शक्ति की परीक्षा नहीं ले रहा है, बल्कि इस प्रामाणिक क्षण में वह उसकी चेतना में झांकने का प्रयास कर रहा है। प्रश्न अतीत का नहीं है, प्रश्न है वर्तमान का और उस वर्तमान क्षण में उपस्थित बने रहने का।
केवल कल्पना करें कि शिष्य नान-इन के सामने बैठा हुआ है। नान-इन पूछता है और शिष्य अतीत में खो जाता है। वह सोचने लगता है, याद करने का प्रयास करता है कि उसने अपने जूतों को कहां उतारा? वह प्रयास करता है कि याद आ सकता है कि नहीं। वह यह सोचने का प्रयास करता है कि क्या वह उस समय सजगता से चूक गया था? ठीक अभी वह एक भ्रम अथवा उलझन में पड़ गया है। उसकी पूरी चेतना बादलों से घिर गई है। वह उस क्षण में वहां नहीं है। वह नान-इन के साथ उस समय उपस्थित ही नहीं है वह तो अतीत में चला गया है, वह सोच-विचार में पड़ गया है, वह ध्यानपूर्ण नहीं है। उसका सोचना, उसका प्रयास करना, उसकी हिचकिचाहट... वह नान-इन की नज़रों से बच नहीं सकता। गुरु तुम्हें भीतर तक देखेगा, वह आर-पार देखेगा, वह तुम्हारे भीतर के सभी बादलों को देखेगा और जानेगा कि तुम अभी और यहां नहीं हो।
इस स्थिति में तुम्हें सिखाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। तुम्हें बाहर नहीं भेजा जा सकता, क्योंकि तुम सिखाओगे क्या? तुम वह नहीं सिखा सकते, जो तुमने अभी स्वयं नहीं जाना है। तुम दिखावा कर सकते हो, लेकिन वह दिखावा खतरनाक होगा, क्योंकि यदि तुम यह बहाना बनाते हो कि तुम सजग हो और तुम सजग नहीं हो, तो यह एक संक्रामक रोग बन जाएगा। तब एक झूठा सदगुरु अपने आसपास केवल कपटी शिष्यों को ही तैयार करता है और तब तरंगों के समान वह छल, कपट और झूठ फैलता चला जाता है।
सबसे अधिक खतरनाक अपराध, जो एक मनुष्य कर सकता है, वह है सजग होने का दिखावा करना। यदि तुम एक व्यक्ति की हत्या भी कर देते हो तो वह इतना बड़ा अपराध नहीं है, क्योंकि तुम वास्तव में हत्या कर ही नहीं सकते। तुम केवल शरीर को नष्ट कर सकते हो, आत्मा अन्य दूसरे रूपों में गतिशील हो जाती है। तुम केवल एक खेल को बर्बाद कर सकते हो और तुरंत दूसरा खेल शुरू हो जाता है। एक हत्यारा इतना बड़ा अपराधी अथवा पापी नहीं है। यदि तुम यह दिखावा करते हो कि तुम सजग और सचेत हो और वास्तव में हो नहीं, यदि तुम यह दिखावा करते हो कि तुम एक सदगुरु हो और तुम हो नहीं, तो तुम एक गहरी क्षति पहुंचा रहे हो, जो एक ऐसी अनंत क्षति है कि उसकी तुलना में कोई दूसरा पाप अथवा अपराध है ही नहीं। क्योंकि इस दिखावे से दूसरे भी आडम्बर को ओढ़ लेंगे। वे आडम्बरी और बहानेबाज बन जाएंगे और यह निरंतर चलता रहेगा, ठीक ऐसे ही जैसे तुम एक शांत झील में पत्थर फेंकते हो तो लहरें उत्पन्न हो जाती हैं और वे दूर तक फैलती चली जाती हैं। एक लहर दूसरे को सृजित करती है तथा दूसरी लहर अगली लहर को धक्का देती है और इस प्रकार दूर दूर तक झील के किनारों की सीमाओं तक फैलती चली जाती हैं।
चेतना की झील की सीमाएं नहीं होतीं, एक बार एक लहर सृजित होती है तो वह हमेशा के लिए गतिशील बनी रहेगी और वह निरंतर चलती रहेगी। तुम यहां नहीं होओगे, लेकिन तुम्हारे आडम्बर, तुम्हारा छल और कपट जारी रहेगा और अनेक लोग उसके द्वारा धोखा खाते रहेंगे।
एक मिथ्या सदगुरु संसार में सबसे बड़ा अपराधी है। इसी कारण नान-इन किसी भी ऐसे व्यक्ति को मठ से बाहर जाकर शिक्षा देने की अनुमति नहीं देगा, जब तक कि वह स्वयं बोध को उपलब्ध न हो गया हो। तुम्हारे भीतर का प्रामाणिक प्रकाश, जो तुम्हारे ही अंदर प्रज्ज्वलित होता है, वह दूसरों को भी प्रकाशित होने में सहायता करता है। वह प्रामाणिक अग्नि, जो तुम्हारे अंदर प्रज्ज्वलित होती है, दूसरों को ऊष्मा देती है। वह प्रामाणिक जीवन, जो तुम्हें घटित हुआ है, दूसरों को उनकी निर्जीवता से बाहर आने में सहायता करता है।
लेकिन स्मरण रहे, सजगता, सचेतनता और चेतना केवल तभी सतत बनी रहती हैं, जब वे प्रयास रहित बन जाती है। प्रारंभ में प्रयास का होना सुनिश्चित है, अन्यथा तुम प्रारंभ कैसे कर पाओगे? तुम प्रयास करोगे, तुम होशपूर्ण बने रहने का प्रयास करोगे, तुम सजग बने रहने का हर संभव प्रयत्न करोगे, परंतु यही प्रयास एक तनाव उत्पन्न करेगा और तुम जितना अधिक प्रयास करोगे, तुम उतने ही अधिक तनावग्रस्त होते जाओगे। छोटी-छोटी झलकें मिलेंगी, लेकिन तनावग्रस्त होने के कारण तुम उस परमानंद से चूक जाओगे। तुम्हें प्रयास करने की इस स्थिति से भी गुज़रना होगा।
कभी न कभी तुम यह अनुभव करोगे कि जब भी तुम प्रयास करते हो, तब सजगता आती है, लेकिन वह बहुत कष्टदायी होती है, डरावने स्वप्न की तरह होती है। वह बहुत बोझिल सी होती है और एक चट्टान के समान तुम्हारे सिर पर सवार हो जाती है। वह प्रसन्नतापूर्ण, भारहीन और नृत्य करती हुई नहीं होती है। लेकिन यह सब प्रयास करते हुए, कभी-कभी अचानक, जब तुम प्रयासरत नहीं हो, तुम पाओगे कि तुम सजग हो। वह सजगता भारहीन, प्रसन्नतापूर्ण, नृत्यपूर्ण और आनंदपूर्ण होगी।
यह सजगता उन लोगों को घटित होगी जो प्रयास कर रहे हैं, जिस समय तुम प्रयास कर रहे हो तब कभी-कभी ‘अ-प्रयास’ के क्षणों में तुम्हें यह झलक घटित होगी। तब तुम जानोगे कि प्रयास के द्वारा तुम उस सर्वोच्च सत्य को उपलब्ध नहीं हो सकते और वह केवल ‘अ-प्रयास’ के द्वारा ही यह घटित होता है।
मेरे आसपास जो ध्यान करने वाले लोग हैं उन्हें यह घटना घटी है। वे मुझे बताते हैं कि सुबह और शाम के समय ध्यान करते हुए कुछ ज्यादा अनुभव नहीं होता है, लेकिन अचानक रात में या दोपहर में, जब वे बैठे होते हैं, तो कुछ घटित होना शुरू हो जाता है और उस क्षण में वे कोई भी प्रयास नहीं कर रहे थे। ऐसा होगा ही। ठीक जैसे कई बार तुम किसी का नाम भूल जाते हो और तुम यह अनुभव करते हो कि वह ठीक जिह्वा की नोंक पर ही रखा हुआ है, तुम बहुत अधिक तनावग्रस्त हो जाते हो और तुम उसे चेतना में लाने का प्रत्येक प्रयास करते हो। पर वह याद नहीं आ रहा है और तुम जितना अधिक प्रयास करते हो, उतने ही अधिक तुम असफल हो जाते हो। तुम यह भी जानते हो कि तुम उसे भूले नहीं हो, निरंतर तुम्हें यह बोध बना रहता है कि तुम उसे याद कर सकते हो। वह ठीक तुम्हारे आसपास ही है, लेकिन कुछ बाधा या कोई अटकाव वहां है जिसके कारण वह नाम तुम्हें याद नहीं आ रहा है। वह नाम किसी प्रिय मित्र का हो सकता है। तुम्हारा पूरा प्रयास बिल्कुल व्यर्थ हो जाता है, तब तुम उसका ख्याल ही छोड़ देते हो। तुम समाचार पत्र पढ़ना शुरू कर देते हो अथवा धूम्रपान करने लगते हो अथवा तुम उद्यान में टहलने के लिए चले जाते हो अथवा तुम बगीचे में खुदाई करना शुरू कर देते हो और अचानक वह नाम तुम्हें याद आ जाता है, अचानक वह नाम तुम्हारे मन में होता है, मित्र का चेहरा भी तुम्हारे सामने होता है।
ऐसा क्या हुआ? जब तुम प्रयास कर रहे थे तो तुम अधिक तनावग्रस्त थे और वह तनाव ही एक अवरोध बन गया था और उस तनाव ने स्मृति का मार्ग संकरा और तंग कर दिया था। नाम बाहर आना चाहता था, स्मृति द्वार खटखटा रही थी, लेकिन तनाव ग्रस्तता से मार्ग अवरुद्ध हो गया। इसी कारण तुम यह अनुभव कर रहे थे कि वह ठीक जीभ की नोंक पर रखा हुआ है। वह वहां था, लेकिन चूंकि तुम इतने अधिक तनाव में थे, उसके बारे में इतने अधिक परेशान थे, उसे बाहर लाने के लिए इतने अधिक व्यग्र थे कि तुम्हारी व्यग्रता ही एक अवरोध बन गई। जब मन बहुत व्यग्र होता है, तो वह कार्य करना बंद कर देता है।
वह सभी कुछ, जो सुंदर है और सत्य है, वह केवल तभी घटित होता है जब तुम उसके बारे में व्यग्र नहीं होते हो। वह सभी कुछ जो प्रेमपूर्ण और प्यारा है, केवल तभी घटित होता है जब तुम उसके लिए प्रतीक्षा नहीं करते हो, उसकी पूछताछ नहीं करते हो और मांग नहीं करते हो। तब मन के सामने कोई अवरोध नहीं होते हैं। इसी कारण ऐसा तब होता है जब तुम उसे भूल जाते हो।
प्रयास करना आवश्यक है, प्रारंभ में प्रयास करना अनिवार्य है, हालांकि वह व्यर्थ है, लेकिन तब भी प्रारंभ में वह अनिवार्य है। धीमे धीमे ही उसकी व्यर्थता का अनुभव होगा। जब तुम्हें अकस्मात् झलकें मिलने लगेंगी, तब तुम अनुभव करोगे कि वहां कोई प्रयास नहीं था, यह झलकें परमात्मा की ओर से उपहार हैं, यह तुम पर स्वतः ही बरस रही हैं। तभी तुम प्रयास को छोड़ सकते हो और प्रयास छोड़ते ही अधिक से अधिक उपहार तुम्हारी ओर आएंगे।
पूरब में हमारा सदा यह विश्वास रहा है और यह विश्वास ठीक भी है कि बुद्धत्व एक उपलब्धि नहीं है, प्राप्ति नहीं है। बुद्धत्व एक अनुकम्पा के समान है, वह एक उपहार है, एक प्रसाद है, जो परमात्मा तुम्हें स्वयं देता है। तुम इस उपहार को परमात्मा के हाथों से छीन नहीं सकते हो।
एक पश्चिम के खोजी के लिए यह अनुभव करना बहुत कठिन है, क्योंकि पश्चिम में पिछली कुछ सदियों से मनुष्य का पूरा मन प्रयासरत हो गया है, वह प्रयास द्वारा सबकुछ छीन लेना चाहता है। तुमने प्रकृति से हर चीज़ को छीन लिया है। विज्ञान जो भी रहस्य जानता है, वे प्रकृति द्वारा दिए नहीं गए हैं, उन्हें झपटकर छीना गया है। तुमने हिंसक तरीके से प्रकृति को अपने रहस्यमय द्वार खोलने के लिए बाध्य किया है। क्योंकि तुम पदार्थ के साथ सफल हो गए हो, इसलिए तुम सोचते हो कि ऐसा ही उस आलौकिक परमात्मा या दिव्य ऊर्जा के साथ भी किया जा सकता है। वह नहीं हो सकता, वह असंभव है। तुम स्वर्ग पर आक्रमण नहीं कर सकते, तुम धारदार तकनीकी हथियारों के साथ वहां नहीं जा सकते। तुम परमात्मा को उसके हृदय के द्वार खोलने के लिए विवश नहीं कर सकते, क्योंकि जब भी तुम बाध्य करते हो, तुम समाप्त हो जाते हो, तुम बंद हो जाते हो। यही समस्या है कि यदि तुम बंद हो जाते हो तो परमात्मा तुम्हारे लिए रहस्य प्रकट नहीं कर सकता है।
जब तुम विवश नहीं हो, बाध्य नहीं हो, बल का प्रयोग नहीं कर रहे हो, बल्कि एक श्वेत बादल की तरह केवल मस्त होकर घूम रहे हो, तुम कहीं भी पहुंचने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हो, जब तुम्हारे पास कोई लक्ष्य नहीं है, कोई प्रयास नहीं है, जब तुम किसी चीज़ को प्राप्त नहीं करना चाहते हो और तुम्हें किसी भी प्रकार का कोई भी तनाव नहीं है। तुम जैसे भी हो बस उसी में प्रसन्न हो, संसार में जो भी घट रहा है तुम उस में प्रसन्न हो, जब तुम हर चीज़ को पूर्णता से स्वीकार कर रहे हो और कहीं कोई परिवर्तन नहीं चाहते हो तो अचानक तुम अस्तित्व के एक भिन्न आयाम में प्रवेश कर जाते हो। तब तुम यह अनुभव करते हो कि द्वार तो हमेशा से खुले ही हुए हैं, वे कभी भी बंद नहीं थे और न वे बंद हो सकते हैं, तो दिव्य रहस्य हमेशा तुम्हारे निकट ही हैं, वह कभी भी दूर नहीं थे। वह हो भी नहीं सकते, क्योंकि तुम उस दिव्य अस्तित्व के ही एक भाग हो। जहां कहीं भी तुम जाते हो, वह रहस्य तुम्हारे साथ ही गतिशील होता है।
यह ढूंढने अथवा खोजने का प्रश्न नहीं है, यह प्रश्न है मौन होकर सब कुछ स्वीकार करने का। जब तुम खोजते हो तो असफल हो जाते हो, क्योंकि खोजी सदा हिंसक होता है। जब तुम खोजोगे तो वह तुम्हारे पास नहीं आएगा, क्योंकि जो मन खोजने का प्रयास कर रहा है वह स्वयं भी तो व्यस्त है और इसी व्यस्तता के कारण कुछ अनुभव प्राप्त नहीं होता। यह प्रयासरत मन यहीं और अभी में नहीं है, यह तो कहीं भविष्य में है। जब खोज की जाएगी और जब खोज पूरी हो जाएगी, जब अन्वेषण का अंत हो जाएगा, तब भी यह मन हमेशा कहीं भविष्य में होगा। वह यहां है ही नहीं है, वह हमेशा किसी लक्ष्य की तलाश में होता है। परंतु परमात्मा यहीं है, इसलिए तुम उससे कभी नहीं मिल पाते। एक खोजी कभी नहीं पंहुच पाता है। पर इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें खोजी नहीं बनना चाहिए। तुम्हें प्रारंभ में तो खोजने का प्रयास करना ही होगा। कोई अन्य उपाय नहीं है। प्रारंभ में तुम्हें एक खोजी बनना ही होगा, तुम्हें खोज करनी ही होगी और सारे प्रयास भी करने होंगे। केवल सभी प्रयासों के करने के बाद और एक पागल खोजी बनने पर ही तुम्हें यह अनुभव होगा कि परमात्मा केवल तभी घटित होता है, जब तुम्हारा मन खोजी नहीं होता है।
कभी-कभी विश्राम करते हुए वह तुम तक आ जाएगा और कभी-कभी सोते हुए भी वह तुम पर उतरेगा। कभी सड़क पर टहलते हुए वह वहां होगा। कभी सुबह सूर्योदय के समय कोई भी कार्य न करते हुए, केवल निष्क्रिय सजगता से उदय होते सूर्य को देखते हुए अथवा एक ठंडी रात में झील की सतह पर जगमगाते हुए चांद की ओर देखते हुए या पंखुड़ियां खोलते हुए एक फूल को देखते हुए... और तुम केवल एक निष्क्रिय जागरूकता में हो, तुम्हारी तरफ से लेशमात्र क्रिया की भी आवश्यकता नहीं है। जब एक फूल खिल रहा है तो तुम्हारी ओर से किसी भी सहायता की आवश्यकता नहीं है।
वे लोग मूर्ख हैं, जो सहायता करने का प्रयास करेंगे। वे उस पुष्प के पूरे सौंदर्य को नष्ट कर देंगे और तब फूल वास्तव में कभी नहीं खिलेगा। यदि तुम उसे बलपूर्वक विकसित करते हो तो वह समाप्त हो जाएगा, वह उसका विकास नहीं होगा, उसकी खिलावट नहीं होगी वरन यह उसकी मृत्यु होगी। खिलावट इस तरह बल का प्रयोग करने से नहीं होती है। सूरज को उदित होने के लिए तुम्हारी सहायता की आवश्यकता नहीं है। इस संसार में ऐसे लोग हैं, जो सोचते हैं कि उनकी तरफ से सहायता की आवश्यकता है। ऐसे लोग भी हैं, जो बहुत अधिक उपद्रव करते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि प्रत्येक जगह उनकी ही सहायता की आवश्यकता है।
वास्तविक जीवन में जहां कभी भी सत्य घटित हो रहा है, वहां किसी भी व्यक्ति की सहायता की आवश्यकता नहीं है, लेकिन किसी को प्रलोभन से रोकना बहुत कठिन है, क्योंकि जब तुम सहायता करते हो तो तुम्हें लगता है कि तुम कुछ कर रहे हो। जब तुम कुछ कर रहे हो तो तुम अहंकार सृजित करते हो। जब तुम कुछ भी नहीं कर रहे हो तो अहंकार अस्तित्व में नहीं रह सकता। अक्रिया के क्षण में अहंकार विलुप्त हो जाता है। उदित होते हुए सूर्य की ओर देखते हुए, एक खिलते हुए पुष्प की ओर देखते हुए, सर्द झील में चांद के जगमगाते हुए प्रतिबिंब की ओर देखते हुए, अचानक उसका तुम पर अवतरण होगा। तुम पाओगे कि पूरा अस्तित्व एक दिव्यता से भर गया है और तुम्हारी प्रत्येक श्वास दिव्य है।
प्रयास के द्वारा प्रयासहीनता तक पहुंचो।
खोज के द्वारा निष्क्रियता तक पहुंचो।
मन के द्वारा अ-मन की स्थिति तक पहुंचो।
दो तरह के लोग हैं। एक वे लोग हैं जिनसे यदि मैं प्रयास करने के लिए कहता हूं, तो वे प्रयास करते हैं लेकिन वे प्रयासहीनता को घटित होने की अनुमति नहीं देते। दूसरी तरह के लोगों से यदि मैं कहता हूं कि वह केवल प्रयासहीनता में ही घटित होगा, तो वे सभी प्रयास छोड़ देते हैं। दोनों ही गलत दिशा में चले गए हैं। दोनों ही रास्ता भटक गए हैं।
यही जीवन का सुर-ताल है कि प्रयास करो, ताकि तुम प्रयासहीन भी बन सको। तनाव को उसके अंतिम छोर तक ले जाओ, जिससे तुम्हें तनावरहित चेतना के क्षण प्राप्त हो सकें। जितनी अधिक तेज़ी से दौड़ सकते हो, दौड़ो, ताकि जब तुम बैठो तो वास्तव में स्थिर होकर बैठ सको। प्रयास में इतने अधिक संलग्न हो जाओ ताकि जब तुम विश्राम करो, तो वह एक सच्चा विश्राम हो।
तुम अपने अंदर बेचैन रहते हुए, झूठा विश्राम भी कर सकते हो। तुम भूमि पर नीचे लेट सकते हो, लेकिन अंदर बेचैनी बनी हुई है। तुम पूरी तरह से लेट जाते हो, लेकिन यह विश्राम नहीं है। तुम एक बुद्ध के समान स्थिर बैठ सकते हो परंतु तुम्हारे अंदर शायद एक चंचल बच्चा दौड़ रहा है, मन निरंतर कार्य किए जा रहा है। अंदर तुम पागल होते जा रहे हो और बाहर तुम एक बुद्ध की मुद्रा में बैठे हो। तुम बाहर तो पूरी तरह से स्थिर हो सकते हो, कोई गतिशीलता नहीं, कोई क्रिया नहीं, परंतु भीतर एक कोलाहल से भरा हंगामा चलता जा रहा है। इससे सहायता नहीं मिलेगी। प्रयास करते हुए उस कोलाहल को समाप्त करो। जितनी अधिक तेज़ी से हो सके, दौड़ो और थककर निढाल हो जाओ। इसलिए मेरा जोर सक्रिय ध्यान करने पर है। इसमें प्रयास और प्रयासहीनता दोनों ही हैं। इसमें क्रिया और अक्रिया दोनों हैं और अंत में है झाझेन... केवल शांत बैठे रहना।
नान-इन शिष्य के अंदर झांक रहा है। वह देख रहा है कि क्या उसका शिष्य प्रयास के पार चला गया है? क्या वह प्रयासहीनता तक आ गया है? क्या उसके लिए चेतनता या सजगता सहज और स्वाभाविक हो गई है? क्या वह भ्रमों और उलझनों से मुक्त हो गया है? क्या वह शुभ्र नीले आकाश के समान स्पष्ट है? यदि हां, तभी वह एक सदगुरु बन सकता है, तभी उसे दूसरों को सिखाने के लिए जाने की अनुमति दी जा सकती है। जब कभी भी तुम्हारे भीतर किसी को कुछ सिखाने का प्रलोभन जागता है, तो तुम भी इस बात को सदैव याद रखना। यदि तुम किसी भी व्यक्ति से कुछ कहना चाहते हो तो केवल इतना ही कहो कि वह ‘उसके’ बारे में है : परमात्मा के बारे में अथवा सचेतनता के बारे में है। दूसरे को सजग कर दो कि तुमने अभी तक ‘उसे’ प्राप्त नहीं किया है, तुमने केवल उसके बारे में सुना है। तुमने इतनी अधिक सुंंदर और आकर्षक बातें अथवा विचार सुने हैं कि तुम उन्हें बांटना चाहते हो, लेकिन तुम अभी तक उपलब्ध नहीं हुए हो। तब तुम बिना किसी विषाक्त या दूषित विचारधारा के, दूसरे व्यक्ति के लिए एक सहायता का माध्यम बन सकते हो।
सदा स्मरण रहे- यदि तुम नहीं जानते हो, तो नहीं जानते हो। नकारात्मक ढंग से जानने का दिखावा मत करो, क्योंकि तुम केवल मौन भी रह सकते हो। यह भी कहने की आवश्यकता नहीं है कि तुम अभी उपलब्ध नहीं हुए हो, बस पूरी तरह से मौन भी रह सकते हो। पर यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि मौन बने रहने से दूसरा व्यक्ति यह अनुमान लगा सकता है कि तुम जानते हो। इसलिए यह स्पष्ट कर दो कि तुमने जाना नहीं है, लेकिन तुम ऐसे व्यक्तियों को जानते हो, जिन्होंने जाना है, ऐसा तुमने सुना है।
भारत में दो तरह के धर्मग्रंथ उपलब्ध हैं : ‘श्रुति’ और ‘स्मृति’। ‘स्मृति’ का अर्थ है स्मरण और ‘श्रुति’ का अर्थ है जिसे सुना गया है। जिस साहित्य को ‘स्मृति’ कहा जाता है वह उन लोगों से संबंधित है, जिन्होंने स्वयं जाना है। यह उनका अपना है। उन्होंने अपनी स्मृति से संबंध जोड़कर रखा है, उन्होंने स्वयं अनुभव करते हुए उससे संबंध जोड़ा है। ‘श्रुति’ दूसरी तरह का साहित्य है। यह उन लोगों के द्वारा आया है, जिन्होंने उन ‘जानने वाले’ लोगों के निकट रहकर सुना है, यह वे लोग हैं जिन्हें सुनने का सौभाग्य मिला है।
यह बात सदा स्मरण रहे- यदि तुमने सुना है, तब बताओ कि यह बात तुमने सुनी है और वह इतनी अधिक सुंदर है कि केवल सुनने मात्र से ही वह तुम्हारे लिए एक खज़ाना बन गई। इस बात को सुनते हुए ही, उसने तुम्हारे हृदय को भीतर तक स्पर्श किया कि अब तुम उसे सबके साथ बांटना चाहते हो। लेकिन यह बांटना केवल मित्रवत है। बांटने से तुम सदगुरु नहीं बन गए हो। यह केवल एक प्रेमपूर्ण भाव है, तुम अपनी प्रसन्नता में दूसरों को भी सहभागी बनाना चाहते हो। तुम सजगता को नहीं बांट रहे हो, जब तक तुम उसे उपलब्ध न हो जाओ, जब तक तुम अनुभव न कर लो, जब तक वह तुम्हारा निजी अनुभव न बना हो, किसी भी व्यक्ति को मार्गदर्शन देने का प्रयास मत करो। यह हिंसा है और जब तुम उपलब्ध हो जाओगे, तब तुम्हारी प्रामाणिक आत्मा स्वयं ही एक मार्गदर्शक बन जाएगी।
यह शिष्य, जो सदगुरु नान-इन के पास आया था, उसने बिल्कुल प्रारंभ से ही गलत कदम उठाया, क्योंकि यदि वह तैयार हो गया था तो नान-इन ने उसे स्वयं बुला लिया होता। यह निर्णय करने का कार्य शिष्य का नहीं था कि अब दस वर्ष पूरे हो चुके हैं और मुझे अब शिक्षा देने बाहर जाना चाहिए। यह पूरा विचार ही गलत था। यदि वह तैयार हो गया था तो शिष्य से पूर्व सदगुरु को ही इस बात का ज्ञान हो जाता, क्योंकि निश्चित रूप से शिक्षक तुम्हारी अपेक्षा कहीं अधिक कुशलता से निरीक्षण कर सकता है।
सदगुरु तुम्हारी रातों में, तुम्हारे सपनों में भी तुम्हारा अनुसरण करता है। जो कुछ भी हो रहा है, जो भी तुम्हारे साथ घट रहा है, सदगुरु एक छाया की भांति निरंतर तुम्हारा अनुसरण कर रहा है, चाहे तुम उसके निरीक्षण के प्रति सचेत हो या न हो। तुम सचेत नहीं हो सकते, क्योंकि यह बहुत अधिक सूक्ष्म विषय है।
जब कभी भी एक शिष्य तैयार होता है, सदगुरु उसे बुलाएगा और उससे कहेगा- ‘अब तुम जाओ।’ शिष्य को यह घोषणा करने की आवश्यकता नहीं है और यदि शिष्य यह घोषणा करने का निर्णय लेता है, तो इसका अर्थ है कि वह अभी तैयार नहीं हुआ है और अहंकार अभी भी मौजूद है।
शिष्य एक सदगुरु होना चाहता था, प्रत्येक शिष्य यह चाहता है और यह गहरी चाह ही एक अवरोध बन जाती है। दस वर्ष पूरे हो गए थे, अनिवार्य रूप से वह उनकी गणना करता रहा होगा। वह निश्चित रूप से एक बहुत चालाक व्यक्ति रहा होगा अन्यथा कौन स्मरण रखेगा? यदि तुम समय को नहीं भूल पाए तो एक सदगुरु के साथ रहने का उपयोग ही क्या है? फिर अन्य ऐसा क्या है जिसे तुम भूल पाओगे? तुम्हें जल्दी किस बात की है?
यह शिष्य समर्पित नहीं है। वह केवल समय की गणना कर रहा है, प्रतीक्षा कर रहा है। वहां एक गणित है, वहां एक तर्क-वितर्क है और विषयों के प्रति एक स्थिर दृष्टिकोण है। वह मठ का इतिहास जानता है कि दस वर्षों के समय में एक शिष्य तैयार हो जाता है और वह बाहर दूसरों को ज्ञान बांटने के लिए जाता है।
लेकिन यह कई बातों पर निर्भर करता है, दस वर्षों में प्रत्येक शिष्य तैयार नहीं होगा। हो सकता है कि कुछ शिष्य तो दस जन्मों में भी तैयार न हों। और कुछ शिष्य केवल दस क्षणों में तैयार हो जाएंगे। यह कोई यांत्रिक उपकरण नहीं है। यह शिष्य के गुणों, लक्षणों और उसकी चेतना की सघनता पर निर्भर करता है। कभी-कभी ऐसा भी हुआ है कि सदगुरु के केवल एक दृष्टिपात से ही शिष्य तैयार हो गया। यदि शिष्य के हृदय के द्वार खुले हुए हैं या वहां कोई अवरोध नहीं है और यदि वह समर्पित है, तब एक क्षण ही पर्याप्त है। हालांकि वह भी आवश्यक नहीं है, सब कुछ समयहीनता में घटित हो जाता है।
लेकिन यदि तुम सोच-विचार कर रहे हो, समय की गणना कर रहे हो कि मुझे कब घटित होगा? मैंने पर्याप्त प्रतीक्षा कर ली। एक वर्ष समाप्त हुआ, दो वर्ष समाप्त हुए, दस वर्ष भी बीत गए, मैं प्रतीक्षा ही कर रहा हूं और कुछ भी घटित नहीं हो रहा है। यदि तुम अपने अंदर गणना कर रहे हो तो तुम समय व्यर्थ ही नष्ट कर रहे हो। एक शिष्य को समय संबंधी चिंता छोड़ देनी चाहिए। समय, अहंकार से संबंध रखता है। समय मन से संबंध रखता है। ध्यान है समय हीनता में बने रहना।
यह शिष्य सदगुरु के पास केवल यह घोषणा करने के लिए आता है कि अब दस वर्ष बीत चुके हैं। आप मुझे कहां भेजने का विचार कर रहे हैं और अब मुझे कहां शिक्षा देने के लिए जाना है? मैं तैयार हो गया हूं, क्योंकि दस वर्षों का समय बीत चुका है। इस तरह से कोई भी कभी तैयार नहीं होता। इसी कारण सदगुरु को उससे प्रश्न पूछना पड़ा, केवल इसलिए जिससे शिष्य को स्वयं अपनी मूर्खता की प्रतीति हो जाए।
झेन सदगुरु कठोर और कठिन होते हैं, उनकी सीधी और पैनी दृष्टि के कारण शिष्य को स्वयं शर्मिंदगी का अनुभव होता है। एक महान खोजी से, जो दस वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा है, उससे किस तरह का प्रश्न पूछा गया- ‘तुमने अपने जूते कहां उतारे? छाते के दाईं ओर अथवा बाईं ओर’ यह किस तरह का प्रश्न है और यह व्यक्ति किस तरह का है, जो एक महान खोजी से इस तरह का प्रश्न पूछता है?
यह किसी भी प्रकार से आत्मज्ञान से संबंधित तत्त्व-मीमांसा का प्रश्न नहीं है। तुम इससे अधिक तुच्छ, व्यर्थ और इससे अधिक अधार्मिक प्रश्न पूछ ही नहीं सकते, जूते उतारने के बारे में पूछा जा रहा है।
उसे परमात्मा के बारे में पूछना चाहिए था और शिष्य उसके लिए तैयार होता। उसे स्वर्ग और नर्क के बारे में पूछना चाहिए था और शिष्य उत्तर देने को पहले से तैयार होता। शिष्य ने अनिवार्य रूप से प्रत्येक उत्तर और प्रत्येक विषय को रट लिया होगा। इसी रटने में और पठन-पाठन में उसने दस वर्षों का समय व्यर्थ नष्ट किया था। उसके पास सभी धर्मशास्त्रों का ज्ञान था और वह पहले से तैयार था कि सदगुरु कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं।
स्मरण रहे, यदि तुम एक बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति के निकट हो तो वह एक ऐसा प्रश्न नहीं पूछेगा, जिसका तुम उत्तर दे सको। उसका प्रश्न उत्तर देने लायक नहीं होता है, वह तो तुम्हारे पूरे अस्तित्व के साथ प्रत्युत्तर देने वाला प्रश्न होता है।
सदगुरु ऐसा व्यर्थ का प्रश्न पूछता है, जैसे- ‘तुमने अपने जूते कहां उतारे’? शिष्य का पूरा आध्यात्मिक उधार ज्ञान अनिवार्य रूप से खंड-खंड हो गया होगा। उसने निश्चित रूप से सोचा होगा, ‘यह किस तरह का व्यक्ति है... ? यहां मैं तैयार हूं और सभी उत्तर बुलबुलों की तरह मेरे भीतर उबल रहे हैं। आप किसी भी तरह का प्रश्न उठाओ और मैं उत्तर दूंगा। जिन प्रश्नों का बुद्ध ने भी कभी उत्तर नहीं दिया, मैं उनका भी उत्तर दूंगा। मैं सभी धर्मग्रंथों का ज्ञान जानता हूं। मैंने प्रत्येक पुस्तक का अध्ययन किया है और मैंने सभी धर्मसूत्रों को याद किया है।’
वह पूरी तैयारी से आया था और सदगुरु जूतों के बारे में पूछता है। लेकिन यह व्यक्ति वास्तव में एक ऐसा प्रश्न पूछता है जिसका उत्तर नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहले से उसके लिए तैयार नहीं हुआ जा सकता है। वह पूर्ण रूप से पूर्व अनुमानित नहीं था। शिष्य तब हिचकिचाहट का अनुभव करता है और यह हिचकिचाहट ही प्रत्युत्तर है। हिचकिचाहट, उस शिष्य के बारे में सबकुछ बतलाती है कि वह अभी तक सचेत नहीं हुआ है, अन्यथा वहां कोई भी हिचक नहीं हो सकती थी। वहां स्पष्ट उत्तर होता। यदि वह सचेत हुआ होता तो इस तरह की प्रतिक्रिया उसने नहीं की होती। उसने पूर्ण रूप से, समग्रता से, जागरूकता से प्रत्युत्तर दिया होता। लेकिन वह उस समय उलझनों से भरा हुआ, एक भ्रमित और संकोची मन के रूप में ही सीमित रह गया।
यह कथा बहुत सुंदर है। जब पहली बार पश्चिम में झेन को जाना गया तो वे लोग यह विश्वास ही न कर सके कि ये झेन सदगुरु क्या करते हैं? वे व्यर्थ के प्रश्न क्यों पूछते हैं? तुम एक सदगुरु से एक प्रश्न पूछते हो और वह प्रत्युत्तर देता है। कोई भी झेन सदगुरु तुम्हें उत्तर नहीं देगा, वह प्रत्युत्तर देगा।
एक खोजी, निश्चित रूप से तत्त्वज्ञान का खोजी, झेन सदगुरु बोकोजू के पास आया और उसने बोकोजू से पूछा : ‘मार्ग क्या है’
बोकोजू ने निकटवर्ती पहाड़ियों की ओर देखा और कहा : ‘ये पहाड़ियां बहुत सुंदर हैं।’
उत्तर निरर्थक प्रतीत होता है। वह पूछता है : ‘मार्ग क्या है’ और बोकोजू कहता है : ‘ये पहाड़ियां बहुत सुंदर हैं।’ निराश होकर उस खोजी ने तुरंत ही वह स्थान छोड़ दिया। तब बोकोजू खिलखिलाकर हंस पड़ा। एक शिष्य ने कहा : ‘प्यारे सदगुरु! उस व्यक्ति ने निश्चित रूप से यह सोचा होगा कि आप पागल हैं।’
बोकोजू ने कहा : ‘हम में से एक तो निश्चित रूप से पागल है। वह ही पागल है क्योंकि तुम मार्ग के बारे में नहीं पूछ सकते, तुम्हें तो उस पर यात्रा करनी है। यात्रा करने के द्वारा ही मार्ग खोजा जा सकता है। पहले से बना-बनाया मार्ग तैयार नहीं होता है, इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि वह कहां है’
तत्व ज्ञान को खोजने का मार्ग किसी राजमार्ग के समान पहले से तैयार नहीं है, जो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हो- ‘आओ और यात्रा करो।’ वहां इस तरह का कोई भी मार्ग नहीं है, अन्यथा बहुत समय पूर्व ही सभी वहां पहुंच गए होते। यदि मार्ग तैयार मिल गया होता तो प्रत्येक व्यक्ति ने यात्रा कर ली होती। मार्ग तो तुम्हारे यात्रा करने के द्वारा सृजित होता है, वह पहले से तुम्हारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है। जिस क्षण तुम यात्रा करना प्रारंभ करते हो, उसी क्षण वह सृजित हो जाता है। वह तुम्हारे द्वारा ही बनता है। ठीक एक मकड़ी के जाले के समान वह तुम्हारे द्वारा और तुम्हारे भीतर से ही बन कर आता है। वह तुम्हारे द्वारा ही आता है। तुम ही उसे सृजित करते हो और तब तुम ही उस पर यात्रा करते हो। जैसे-जैसे तुम स्वयं द्वारा निर्मित इस मार्ग पर यात्रा करते जाते हो, तुम उसे और अधिक सृजित करते जाते हो। स्मरण रहे, यह मार्ग तुम्हारे साथ ही विलुप्त होता जाता है। अन्य कोई दूसरा व्यक्ति उस पर यात्रा नहीं कर सकता है। भीतर का यह मार्ग उधार नहीं लिया जा सकता।
इसलिए सदगुरु कहता है : ‘वह पूछा नहीं जा सकता और केवल मूर्ख लोग ही ऐसे प्रश्न पूछते हैं कि मार्ग क्या है? तुम्हीं मार्ग हो।’
तब शिष्य ने कहा : ‘मैं इसे समझता हूं, लेकिन आपने पहाड़ियों के बारे में क्यों कहा’
सदगुरु ने कहा : ‘एक सदगुरु को पहाड़ियों के बारे में बात करनी ही होती है, क्योंकि यदि तुम पहाड़ियों को पार नहीं करते हो तो मार्ग खोजने का कोई उपाय नहीं है। मार्ग, पहाड़ियों के पार है और पहाड़ियां इतनी अधिक सुंदर हैं कि कोई व्यक्ति उनको पार करना ही नहीं चाहता। वे इतनी अधिक आकर्षक और सम्मोहित करने वाली हैं कि प्रत्येक व्यक्ति पहाड़ियों में ही खो जाता है और मार्ग तो उसके पार है।’
एक सदगुरु से प्रत्युत्तर आता है। वह तुम्हारी वास्तविक आवश्यकता पर चोट करता है। वह तुम्हारे प्रश्न के बारे में फिक्र नहीं करता है। तुम्हारा प्रश्न संगत अथवा असंगत हो सकता है, पर सदगुरु के लिए तुम हमेशा संगत बने रहते हो। वह तुम्हारे अंदर झांककर देखता है। वह तुम पर चोट करता है, लेकिन बुद्धिवादी लोग हमेशा इस तरह के उत्तरों से चूक जाएंगे।

आज इतना ही।

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