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गुरुवार, 15 नवंबर 2018

और फूलों की बरसात हुई-(प्रवचन-04)

और फूलों की बरसात हुई-चौथा 

मार्ग क्या है?

एक सद्गुरु जो एक पर्वत पर
अकेला ही रहता था
उससे एक भिक्षु ने पूछा :
(सत्य को पाने का) मार्ग क्या है?
उत्तर देते हुए सद्गुरु ने कहा :
‘यह पहाड़ कितना अधिक सुंदर है?’

भिक्षु ने कहा : मैं पहाड़ के बारे में
न पूछकर, मार्ग के बारे में पूछ रहा हूं।
सद्गुरु ने उत्तर दिया : ‘मेरे पुत्र!
जिस समय तक तुम उस पहाड़
के पार न जा सको-
तुम मार्ग तक नहीं पहुंच सकते।


मार्ग सरल है लेकिन तुम ही पहाड़ हो और तुम्हारे पार ही मार्ग दृष्टिगोचर होता है। तुम्हारा स्वयं के पार जाना ही बहुत कठिन है। एक बार तुम मार्ग पर होते हो तो वहां कोई समस्या नहीं होती लेकिन तुमसे मार्ग बहुत अधिक दूर है।

और तुम विरोधाभासों की एक ऐसी भीड़ हो कि तुम्हारा एक खंड पूरब की ओर जाता है और दूसरा पश्चिम की ओर- तुम एक ही दिशा में गतिशील नहीं हो। तुम जैसे हो वैसे ही गतिशील नहीं हो सकते, क्योंकि एक दिशा में गतिशील होने के लिए तुम्हें एक आंतरिक एकता और बिखरी और तरल चेतना को एकीवृफत कर रखे जैसे ठोस अस्तित्व की आवश्यक है। तुम जैसे हो एक भीड़ हो और अनेक व्यक्तियों के साथ बिना किसी एकता के हो।


अधिक-से-अधिक तुम कुछ व्यवस्था कर सके हो जैसी कि प्रत्येक व्यक्ति को करनी होती है और यदि तुम स्वयं अपने को नियंत्रित कर सकते हो और एक भीड़ न होकर अधिक-से-अधिक तुम एक लोकसभा जैसे बन सकते हो और तब भी तुम एक ब्रिटिश लोकसभा का सदस्य न बनकर एक भारतीय लोकसभा का ही सदस्य बनोगे : अधिक-से-अधिक तुम्हारे खंड अधिकतम संख्या में एक ही दिशा में गतिशील हो सकते हैं लेकिन कुछ खंड अल्प संख्या में वहां हमेशा बने रहेंगे जो किसी अन्य दिशा में जा रहे हैं।
इसलिए एक बहुत नियंत्रित, अनुशासित, चरित्रवान और एक विचारमान व्यक्ति भी कभी मार्ग तक नहीं पहुंचता है। वह समाज को समायोजित करने में समर्थ हो सकता है लेकिन वह भी उस मार्ग तक पहुंचने में असमर्थ है, जहां से परमात्मा की ओर द्वार खुलता है।
तुम वास्तव में एक पहाड़ हो।
पहली बात जो समझ लेने जैसी है कि भीड़ को विदा हो जाना चाहिए। बहुदेववाद के अस्तित्व से एक ही परमात्मा का अस्तित्व रह जाना चाहिए और तुम्हें अनिवार्य रूप से एक होना होगा। इसका अर्थ है तुम्हें निर्विचार हो जाना चाहिए क्योंकि विचार एक भीड़ जैसे हैं। वे तुम्हें विभाजित कर देते हैं और प्रत्येक विचार तुम्हें अलग-अलग खींचता है। वे तुम्हारे अंदर एक उपद्रव सृजित करते हैं और वे हमेशा विरोधाभासी होते हैं। जब भी तुम निर्णय लेते हो, तो वह निर्णय हमेशा तुम्हारे अंदर के किसी भाग के विरुद्ध होता है और वह कभी भी पूर्ण नहीं होता।
मैंने सुना है कि ऐसा हुआ कि मुल्ला नसरुद्दीन बहुत बीमार पड़ गया, वह तनावग्रस्त होने के साथ मानसिक रूप से रुग्ण था और बीमारी ऐसी थी कि धीमे-धीमे वह कोई भी निर्णय लेने में पूर्ण रूप से असमर्थ हो गया। बड़े-बड़े निर्णय ही नहीं बल्कि वह छोटे-छोटे निर्णय भी : जैसे स्नान करना चाहिए अथवा नहीं, इस टाई को पहनना चाहिए अथवा उसे क्या ऑफिस टैक्सी से जाना चाहिए अथवा कार ड्राइव करते हुए आदि लेने में असमर्थ हो गया, इसलिए उसे मानसिक रोगों के अस्पताल में रखा गया।
छह महीनों के उपचार के बाद जब प्रत्येक चीज़ व्यवस्थित हो गई और डॉक्टरों ने अनुभव किया कि अब वह बिल्कुल ठीक हो गया है तो एक दिन उन लोगों ने मुल्ला से कहा-‘‘मि. नसरुद्दीन! अब आप पूरी तरह से ठीक हैं। आप अपने संसार में वापस लौटकर अपना व्यवसाय और कार्य करना शुरू कर सकते हैं। हम लोग पूर्ण रूप से संतुष्ट हैं कि अब वहां कुछ भी गलत नहीं है।’’ लेकिन नसरुद्दीन की ओर थोड़ी-सी झिझक तथा अनिणर्य की स्थिति को देखते हुए डॉक्टर ने पूछा-‘‘क्या आप यह अनुभव नहीं करते कि अब आप संसार में जाकर अपने कार्य को करने के लिए तैयार हैं?’’
नसरुद्दीन ने कहा-‘‘हां और नहीं।’’
लेकिन स्थिति यही है। प्रश्न यह नहीं है कि तुम रुग्ण हो अथवा स्वस्थ हो, अंतर केवल डिग्री का है लेकिन हां और नहीं दोनों की ही समस्या अंदर गहरे में बनी ही रहती है।
क्या तुम एक व्यक्ति से प्रेम करते हो? ‘ हां, और नीचे गहराई में नहीं भी दिया हुआ है। देर अथवा सबेर जब तुम हां के साथ थककर उब जाओगे। नहीं ऊपर आएगा और तुम उसी व्यक्ति से घृणा करने लगोगे जिससे कि तुम प्रेम करते हो। तुम किसी वस्तु अथवा व्यक्ति को पसंद करते हो लेकिन नापसंदगी भी अंदर छिपी रहती है और देर अथवा सवेर तुम उसी वस्तु अथवा व्यक्ति को पसंद नहीं करोगे।
जब तुम प्रेम करते थे और किसी को चाहते थे तो तुम पागल थे और जब तुम किसी को न चाहकर उससे घृणा करोगे तब भी तुम पागल होगे। जैसे तुम हो- तुम हां और नहीं दोनों ही हो- फिर तुम कैसे परमात्मा अथवा दिव्यता की ओर गतिशील हो सकते हो? परमात्मा को पूर्ण प्रतिबद्धता की आवश्यकता है, इससे कुछ भी कम में काम नहीं चलेगा। लेकिन पूर्ण प्रतिबद्धता कैसे हो? तुम एक पूर्ण अस्तित्व नहीं हो। यही पहाड़ है।
मार्ग सरल है लेकिन तुम मार्ग पर नहीं हो और संसार में सभी विधियां उनकी कलापटुता और सभी सद्गुरु तुम्हें ठीक से वह मार्ग नहीं देते हैं और मार्ग पहले से मौजूद है। उनकी विधियां और कलापटुता तुम्हें सामान्य रूप से मार्ग की ओर ले जाती है, पर वे मार्ग नहीं हैं। वे पर्वत पर छोटी पगडंडियां बनाते हैं जिससे तुम उसके पार जा सको क्योंकि वही मार्ग है। इस बारे में मार्ग बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है, वह पहले ही से मौजूद है। लेकिन तुम एक जंगल में भटक गए हो। तुम्हें मार्ग पर ले आना होगा।
इसलिए पहली बात तो यह है कि तुम जितने अधिक विभाजित हो, तुम मार्ग से उतनी ही अधिक दूर होगे और जितने अधिक अविभाजित होगे उतने ही मार्ग के निकट होगे।
विचार विभाजत कर देते हैं क्योंकि वे हमेशा अपने अंदर विरोध को साथ लिए हुए चलते हैं, प्रेम घृणा को लिए हुए चलता है, मित्रता शत्रुता को साथ लिए हुए और पसंदगी नापसंदगी को साथ-साथ लिए हुए चलती है। सोसान ठीक है, जब वह कहता है : ‘चाह और अचाह के मध्य थोड़ा-सा भी अंतर, तुम्हारे अस्तित्व में चाह और अचाह की छोटी-सी भी गतिविधि होती है कि जमीन और आसमान जैसा फर्क हो जाता है, कोई भी भेद नहीं है और तुम पहुचं गए हो क्योंकि बिना किसी भेद के साथ तुम एक हो।
इसलिए पहली बात तो यह स्मरण रखनी है कि कैसे विचारो को छोड़कर निर्विचार बना जाए, निर्विचार लेकिन सजग, क्योंकि गहरी नींद में भी तुम निर्विकार हो जाते हो और वह कार्य नहीं करेगा। यह शरीर के लिए अच्छा है क्योंकि इसी कारण गहरी नींद के बाद तुम्हारा शरीर फिर से युवा हो जाता है। लेकिन मन सुबह भी थका बना रहता है क्योंकि मन निरंतर अपनी गतिविधि जारी रखता है। शरीर विश्राम करता है, यद्यपि मन के कारण वह पूर्ण रूप से विश्राम भी नहीं कर सकता लेकिन तब भी वह विश्राम करता है। इसलिए सुबह शरीर तो ठीक होता है, कम-से-कम कार्य करने के लिए तो ठीक होता है लेकिन मन सुबह भी थकावट का अनुभव करता है। तुम बिस्तर पर थके हुए सोने जाते हो और सुबह भी तुम अधिक थके हुए उठते हो क्योंकि मन निरंतर सपनों, सोचने, योजना बनाने और कामनाओं पर कार्य कर रहा था।
गहन निद्रा में कुछ क्षणों के लिए जब तुम पूर्ण रूप से अचेतन होते हो तुम एक हो जाते हों यही एकता एक सजग और सचेत मन के साथ भी आवश्यक है। जैसे कि तुम गहन निद्रा अथवा सुषुप्ति में होते हो, तो कोई विचार नहीं होते, अच्छे और बुरे में, स्वर्ग और नर्क में, परमात्मा और शैतान में किसी भी तरह का कोई भेद नहीं होता है और तुम पूरी तरह से होते हो- लेकिन अचेतन, जब तुम सजग और सचेत हो तो इसी स्थिति को उपलब्ध होना है। समाधि, सर्वोच्च ध्यान अंतिम रूप से और कुछ भी न होकर सचेतनता से भरी गहन निद्रा ही है।
गहन निद्रा में तुम उसे प्राप्त करते हो इसलिए केवल एक ही चीज़ को उपलब्ध होना है और वह है अधिक-से-अधिक सचेतनता। यदि तुम अपनी गहन निद्रा में और अधिक सचेतनता सम्मलित कर सकते हो तो तुम बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाओगे। पर्वत के तुम पार चले जाते हो और मार्ग खुल जाता है- यह दोनों एक ही चीज़ हैं।
दूसरी बात : तुम अपने अंदर साथ में अतीत लिए हुए चलते हो और वह एक बहुलता सृजित करता है। तुम एक बच्चे थे, वह बच्चा अभी भी तुम्हारे अंदर छिपा हुआ है और कभी-कभी तुम अभी भी उस बच्चे किक मारते हुए उस बच्चे का अनुभव करते हो; कुछ विशिष्ट क्षणों में तुम पीछे लौटते हो और फिर से एक बच्चे बन जाते हो। एक बार तुम युवा थे, अब तुम एक वृद्ध हो, वह युवा व्यक्ति वहां छिपा हुआ है और कभी-कभी एक बूढ़ा व्यक्ति एक युवा व्यक्ति जैसा ही बेवकूफ बनना शुरू हो जाता है।
तुम अपना पूरा अतीत उसके प्रत्येक क्षण साथ लिए हुए चलते हो और तुम अनेक व्यक्ति बनकर रहते रहे हो। गर्भ से अभी तक तुम लाखों व्यक्ति बनकर रहते रहे हो और वे सभी परत-दर-परत तुम अपने अंदर साथ लिए हुए चल रहे हो। तुम अब बड़े हो गए हो लेकिन अतीत अभी विलुप्त नहीं हुआ है, वह छिपा हुआ हो सकता है लेकिन वह वहां है और वह न केवल मन में है, वह शरीर में भी है। जब तुम एक छोटे बच्चे थे और यदि तुम क्रोधित हुए थे और किसी व्यक्ति ने कहा था-‘‘रुक जाओ, क्रोध मत करो’’ और तुम रुक गए थे, वह क्रोध में अभी तक तुम्हारा उस समय उठा हाथ उसे ढोए चला जा रहा है। ऐसा होना ही है क्योंकि ऊर्जा अविनाशी है और यदि तुम हाथ को शिथिल नहीं करते तो वह वहां बनी रहेगी।
पचास अथवा साठ वर्ष पूर्व एक विशिष्ट क्षण में वह ऊर्जा जो तब क्रोध बन गई थी, जब तक कि सचेतन रूप से तुम कुछ कार्य ऐसा नहीं करते कि उस ऊर्जा का वह वर्तुल पूरा हो जाए, तब तक तुम्हारा हाथ शिथिल न होगा। तुम उसे अपने अंदर साथ लिए हुए चलोगे और वह तुम्हारे सभी कार्यों को एक आवृफति देती रहेगा।
तुम किसी व्यक्ति को स्पर्श कर सकते हो लेकिन उस स्पर्श में शुचिता नहीं होगी क्योंकि वह हाथ पूरे अतीत को साथ लिए हुए चल रहा है और सभी दबाया हुआ क्रोध और दमित घृणा वहां मौजूद है। यदि प्रेम में भी तुम एक व्यक्ति का स्पर्श करते हो तो तुम्हारा स्पर्श शुद्ध और पावन न होगा और उसमें प्रेम भी नहीं हो सकता क्योंकि वह क्रोध कहां जाएगा जिसे वह हाथ के द्वारा ढोए चला जा रहा है।
विलियम रैक ने इस शारीरिक दमन पर बहुत अधिक कार्य किया है। शरीर अतीत के साथ लिए हुए चल रहा है, मन अतीत को साथ लिए हुए चल रहा है और इस बोझ भरी स्थिति में तुम यहीं और अभी में नहीं हो सकते हो। तुम्हें अपने अतीत के साथ उसकी सीमाओं में आना होगा।
इसलिए ध्यान केवल कुछ कार्य यहीं और अभी करने का प्रश्न नहीं है, इससे पूर्व वह संभव हो तुम्हें अपने अतीत के साथ उसकी सीमाओं तक आना होगा और तुम्हें अतीत के उन सभी अनुभवों और विचारों को जो व्यवहारिक नहीं रह गए हैं विलुप्त करना होगा और उनमें वहां लाखों हैं।
जब कोई व्यक्ति वृद्ध होता है, वह एक बच्चा और एक युवा भी होता है और वह सभी कुछ जो उसके पास कभी भी रहा है, वहां बना रहता है क्योंकि तुम नहीं जानते हो कि प्रत्येक क्षण कैसे मरा जाए।
क्षण-प्रति-क्षण मर जाना, यही जीवन की पूरी कला है, जिससे वहां उस क्षण के अनुभव और विचार जो व्यवहारिक नहीं है विलुप्त हो जाएं।
एक जोड़ा गया संबंध समाप्त हो गया है, तुम उसे साथ लिए हुए नहीं चल रहे हो, तुम उसके प्रति पूरी तरह से मर जाते हों तुम क्या कर सकते हो? कुछ चीज़ जो घटित हो रही थी और अब वह नहीं हो रही है। तुम उसे स्वीकार करो और उसके प्रति मर जाओ- तुम पूरी सचेतनता के साथ उसे सामान्य रूप से छोड़ दो और तब एक नए क्षण में तुम्हारा नवीनीकरण हो जाता है। अब तुम अतीत को साथ लिए हुए नहीं चल रहे हो।
तुम अब और एक बच्चे नहीं रह गए हो लेकिन स्वयं अपना निरीक्षण करो और तुम अनुभव करोगे कि वहां एक बच्चा है और वह बच्चा ही कठिनाई उत्पन्न करता है। यदि तुम वास्तव में एक बच्चे थे तो वहां कोई भी कठिनाई नहीं होती लेकिन तुम युवा अथवा बूढ़े थे...
मैंने सुना है : मुल्ला नसरुद्दीन को अस्पताल में भर्ती किया गया। वह अस्सी वर्ष का था और तब उसका जन्मदिन आया और वह अपने तीनों पुत्रों की प्रतीक्षा कर रहा था कि वे उसके लिए कुछ उपहार लेकर आएंगे। वे लोग निश्चित रूप से आए लेकिन वे कोई भी वस्तु लेकर नहीं आए क्योंकि वह अस्सी वर्ष का बूढ़ा था। एक बच्चा एक उपहार के साथ प्रसन्नता का अनुभव करता है लेकिन एक बूढ़ा व्यक्ति? वह भी अस्सी वर्ष का बूढ़ा। उसका सबसे बड़ा बेटा साठ वर्ष का था इसलिए उन लोगों ने इस बारे में बिल्कुल सोचा ही नहीं लेकिन जब वे लोग आए और मुल्ला ने देखा कि वे खाली हाथ आए हैं तो उसने निराशा के साथ क्रोध का अनुभव किया और उसने कहा-‘‘क्या तुम लोग अपने बूढ़े बाप को भूल गए, तुम बेचारे बूढ़े बाप के जन्मदिन को भूल गए? यह मेरा जन्म दिवस है।’’
उस क्षण यदि तुम उसकी आंखों में देख सकते तो वहां एक बच्चा छिपा था और वहां अस्सी वर्ष का एक बूढ़ा व्यक्ति नहीं था तथा केवल एक बच्चा कुछ खिलौनों की प्रतीक्षा कर रहा था।
एक पुत्र ने कहा-‘‘क्षमा कीजिए, हम लोग यह बात पूरी तरह भूल ही गए।’’
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा-‘‘मैं मानता हूं कि यह भूल जाने की बीमारी लगता है कि हमारे पूरे परिवार में चली आ रही हैं वास्तव में मैं तुम लोगों की मां से विवाह करना ही भूल गया था।’’ वह वास्तव में नाराज था।
इसलिए उन तीनों ने एक स्वर में चीखते हुए कहा-‘‘क्या? क्या आपके कहने का यह अर्थ है कि हम लोग... ?
उसने कहा-‘‘हां!’’ प्रत्येक का यह वही घटिया कमीनापन है।
तुम्हारे अंदर कहीं वह बच्चा अभी तक मौजूद है। जब तुम रोते हो तुम उसे खोज सकते हो, जब तुम हंसते हो तब तुम उसे पा सकते हो, जब कोई व्यक्ति तुम्हें उपहार देता है तुम उसे पा सकते हो, जब कोई व्यक्ति तुम्हें भुला देता है तुम उसे पा सकते हो और जब कोई व्यक्ति तुम्हारी निंदा अथवा तिरस्कार करता है, तुम उसे पा सकते हो। वास्तव में परिपक्व बनना बहुत कठिन है। कोई भी व्यक्ति कभी भी तब तक परिपक्व नहीं बन सकता जब तक कि तुम्हारे अंदर का बच्चा पूरी तरह नहीं मरता है और वह तुम्हारा एक भाग नहीं रहता है अन्यथा वह तुम्हारे कार्यों और संबंधों को प्रभावित किए चले जाएगा।
और यह केवल बच्चे के लिए ही सत्य नहीं है, अतीत का प्रत्येक क्षण वहां है और तुम्हारे वर्तमान को प्रभावित कर रहा है और तुम्हारा वर्तमान बहुत अधिक बोझिल है। शरीर तथा मन से लाखों आवाजें तुम्हें नियंत्रित किए चली जाती हैं, तुम कैसे मार्ग पर पहुंच सकते हो?
तुम ही एक पहाड़ हो। इस पहाड़ को पिघलना होगा। करना क्या है? वह सचेत रहते हुए ही पिघल सकता है- एक ही कार्य करना है तुम्हें फिर से अतीत को सचेतनता से जीना है।
चेतना की यही कला कुशलता है, तुम जब भी किसी विषय को सचेतनता और सजगता से जीते हो तो वह कभी भी तुम पर एक भार नहीं बनती है। इसे समझने का प्रयास करो। यदि तुम उसे होशपूर्ण होकर जीते हो तो वह कभी भी तुम पर एक बोझ नहीं बनती है।
यदि तुम किसी वस्तु को खरीदने बाजार जाते हो, तुम होशपूर्वक गतिशील होकर वहां होशपूर्वक घूमते हो, होशपूर्ण होकर ही पूरी याददाश्त के साथ चीज़ें खरीदते हो और सावधान बने रहते हुए घर लौटते हो तो यह कभी भी तुम्हारी स्मृति का एक भाग नहीं बनेगा। मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है कि तुम उसे भूल जाओगे- वह एक बोझ नहीं बनेगा। यदि तुम उसे याद करना चाहते हो तो तुम उसे याद कर सकते हो लेकिन वह निरंतर तुम्हारे ध्यान को अपनी ओर खींचने में बाध्य नहीं करेगा और वह एक बोझिल चीज़ नहीं बनेगा।
तुम जोकुछ भी होशपूर्ण करते हुए उसके द्वारा जीते हो वह फिर और अतीत के अव्यवहारिक अनुभव तथा विचार नहीं बने रहते हैं। जोकुछ भी तुम अचेतन रूप से जीते हो वे अनुभव और अव्यवहारिक विचार अंदर बने ही रहते हैं क्योंकि तुम कभी भी उसे पूर्णता से नहीं जीते हो और कुछ चीज़ अधूरी बनी रहती है। जब कुछ चीज़ अधूरी रह जाती है तो उसे साथ ढोना होता है और वह पूरा होने की प्रतीक्षा करती है।
तुम एक बच्चे थे और किसी व्यक्ति ने तुम्हारा खिलौना तोड़ दिया था और तुम रो रहे थे तथा तुम्हारी मां ने तुम्हारा ध्यान कहीं और मोड़ने के लिए तुम्हें सांत्वना दी थी, तुम्हें कुछ मिठाइयां दी थीं, किसी अन्य विषय के बारे में बातें की थीं, तुम्हारा ध्यान उस ओर से हटाने के लिए एक कहानी सुनाई थी, जिससे तुम उस बात को भूल जाओ और तुम रोते तथा चीखते चले जा रहे थे। वह बात वहां अधूरी रह गई। वह वहां है और जब भी कोई व्यक्ति तुमसे कुछ चीज़ छीनता है, वह एक खिलौना हो सकता है, वह एक प्रेमिका भी हो सकती है और कोई व्यक्ति उसे तुमसे अलग कर देता है- तो तुम रोना और चीखना शुरू कर देते हो। तुम उसी बच्चे को वहां आधा-अधूरा पा सकते हो। वह एक पद भी हो सकता है : तुम नगर के मेयर हो और कोई व्यक्ति तुमसे तुम्हारा पद जो खिलौने की भांति है, छीनता है और तुम फिर से रोना-चीखना शुरू कर देते हो।
अपने अतीत में लौटकर जाओ, उसे खोजो, उससे फिर से होकर गुजरो, क्योंकि इस बारे में अब कोई दूसरा उपाय नहीं है; अतीत अब वहां और अधिक नहीं है, इसलिए यदि कोई भी बात स्मृति में अटकी हुई है तो मन में से उसे मुक्त करने का केवल यही उपाय है कि लौटकर पीछे की ओर गतिशील हो जाओ।
प्रत्येक रात यह लक्ष्य बना लो कि पूर्ण सजग होकर एक घंटे के लिए पीछे लौटकर यों जाना है, जैसे मानो तुम उस पूरे विषय को फिर से जी रहे हो। बहुत-सी चीज़ें बुलबुलों की भांति ऊपर आएंगी, बहुत-सी चीज़ें तुम्हारे ध्यान को आवाजें देंगी इसलिए जल्दी मत करना और किसी भी चीज़ पर आधा-अधूरा ध्यान मत देना और तब फिर गतिशील होना क्योंकि वह फिर अधूरापन उत्पन्न करेगा। जोकुछ भी आता है उसकी ओर पूर्ण ध्यान देना। उसे फिर से जीना और जब मैं कहता हूं उसे फिर से जीना तो मेरा अर्थ केवल उसे याद करने से न होकर उसे फिर से जीने पर है क्योंकि जब तुम एक बात का स्मरण करते हो तो तुम एक अनासक्त निरीक्षणकर्ता होते हो, उससे सहायता नहीं मिलेगी। उसे फिर से जियो।
तुम फिर से एक बच्चे हो। यों मत देखो जैसे मानो तुम पृथक खड़े हुए हो और एक बच्चे की ओर देख रहे हो जैसे उससे उसका खिलौना छीना जा रहा है। नहीं, एक बच्चा ही बन जाओ। बाहर से नहीं, अंदर से भी फिर से एक बच्चा बन जाओ। उस क्षण को फिर से जियो : कोई व्यक्ति तुमसे खिलौना छीनता है, कोई व्यक्ति उसे तोड़ता है और तुम रोना शुरू कर देते हो और रोने लगो। तुम्हारी मां तुम्हें सांत्वना देने का प्रयास कर रही है- पूरी चीज़ से फिर से होकर गुजर जाओ, लेकिन अब किसी भी चीज़ की ओर ध्यान मत मोड़ो। पूरी प्रक्रिया को पूरी होने दो। जब वह पूरी हो जाती है तो अचानक तुम अनुभव करोगे कि तुम्हारे हृदय पर भार कम हो गया है और कुछ चीज़ नीचे गिर गई है।
तुम अपने पिता से कुछ बात कहना चाहते थे, पर अब वह मर गए हैं और अब उनसे कहने का कोई भी उपाय नहीं है। अथवा तुम एक विशिष्ट कार्य के लिए जो तुमने किया था जिसे वह नहीं चाहते थे तुम क्षमा मांगना चाहते हो लेकिन तब तुम्हारे अंदर अहंकार आ गया था और तुम क्षमा नहीं मांग सके थे और अब चूंकि वह मर चुके हैं इसलिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है। क्या किया जाए और वह अपराध भाव वहां है। वह चलता चला जाएगा और वह तुम्हारे सभी संबंधों को नष्ट कर देता है।
मैं उसके बारे में बहुत अधिक सचेत हूं क्योंकि एक सद्गुरु होना एक विशिष्ट अर्थ में एक पिता होने जैसा है- वह अनेक व्यक्तियों के होने जैसा है लेकिन एक विशिष्ट अर्थ में एक पिता होने जैसा बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। जब लोग मेरे पास आते हैं और यदि वे अपने पिता के साथ संबंध को लेकर बहुत बोझिल हैं तब मुझसे संबंध जोड़ना बहुत कठिन हो जाता है क्योंकि मैं हमेशा अनुभव करता हूं कि उनके पिता अंदर आ जाते हैं। यदि उन्होंने अपने पिता से घृणा की है तो वे मुझसे भी घृणा करेंगे, यदि वे अपने पिता के साथ लड़ना चाहते थे तो वे मुझसे भी लड़ेंगे और यदि वे अपने पिता से प्रेम करते हैं तो वे मुझसे प्रेम करेंगे, यदि उन्होंने अपने पिता का सम्मान किया है तो वे मेरा सम्मान करेंगे और यदि उन्होंने केवल उथले ढंग से सम्मान करने का दिखावा किया है और अपने अंदर गहराई में उनके पास असम्मान का भाव है तो वे मेरे साथ भी वैसा ही करेंगे और पूरी चीज़ व्यर्थ करना शुरू कर देती है।
यदि तुम सचेत हो तो तुम निरीक्षण कर सकते हो। वापस पीछे लौटो। तुम्हारे पिता अब और नहीं हैं लेकिन स्मृति की आंखों के लिए वह अभी भी वहां हैं। अपनी आंखें बंद करो, फिर से एक बच्चे बन जाओ, जिसने कुछ कार्य गलत किया है, पिता की आज्ञा के विरुद्ध किया है, वह क्षमा मांगना चाहता है, लेकिन वह साहस नहीं जुटा सकता-अब तुम साहस कर सकते हो। जोकुछ उस समय तुम कहना चाहते थे, अब तुम कह सकते हो, तुम फिर उनके चरण स्पर्श कर सकते हो, अथवा तुम क्रोधित होकर उनको चोट कर सकते हो लेकिन उसे समाप्त हो जाने दो। पूरी प्रक्रिया को पूर्ण हो जाने दो।
एक मौलिक नियम का स्मरण रखो : कोई भी चीज़ जो पूरी हो जाती है, छूट जाती है क्योंकि तब वहां उसे साथ ले जाने का कोई भी अर्थ नहीं होते हैं और जो चीज़ अधूरी रह जाती है वह बंधी रहती है और अपने पूरे हो जाने की प्रतीक्षा करती है।
और यह अस्तित्व वास्तव में हमेशा पूरे होने के बाद ही होता है। पूरे अस्तित्व की एक मूल प्रवृत्ति प्रत्येक कार्य को पूरा करने की होती है। वह अधूरे कार्य पसंद नहीं करता- वे लटके रहते हैं, वे प्रतीक्षा करते हैं और इस बारे में अस्तित्व को कोई भी शीघ्रता नहीं होती है, वे लाखों वर्षों तक प्रतीक्षा कर सकते हैं।
प्रत्येक रात्रि जब तुम सोने के लिए जाते हो तो एक घंटे के लिए पीछे की ओर गतिशील हो जाओ, अपने अतीत में जाकर उसे फिर से जियो। धीमे-धीमे अनेक स्मृतियां भूमि से बाहर निकलेंगी। तुम्हें आश्चर्य होगा कि अनेक स्मृतियों के साथ तुम सचेत नहीं थे कि वे चीज़ें भी वहां हैं और वे इतनी अधिक जीवन स्फूर्ति और ताजगी के साथ हैं, जैसे मानो वे ठीक अभी घटित हुई थीं। तुम फिर से एक बच्चे, फिर से एक युवा प्रेमी बन जाओगे और अनेक व्यक्ति, विषय और वस्तुएं आएंगी। धीमे-धीमे गतिशील होते जाओ जिससे प्रत्येक चीज़ पूर्ण हो जाए। तुम्हारा पर्वत छोटे से छोटा होता जाएगा, तुम्हारे ऊपर भार ही एक पर्वत है। और वह जितना अधिक छोटा हो जाता है, उतना ही तुम स्वतंत्र होने का अनुभव करोगे। तुम्हारे पास एक विशिष्ट गुण की स्वतंत्रता और ताजगी आएगी और अपने अंदर तुम अनुभव करोगे कि तुमने जैसे जीवन के स्रोत का स्पर्श कर लिया है।
तुम हमेशा एक स्फूर्ति से भरे रहोगे, दूसरे लोग भी यह अनुभव करेंगे कि जब तुम चलते हो तुम्हारे कदमों की चाल बदल गई है, उसके पास नृत्य करने जैसे लक्षण हैं। जब तुम स्पर्श करते हो तो तुम्हारा स्पर्श बदल गया है- वह अब एक मृत हाथ नहीं है और वह फिर से जीवंत हो गया है। अब उनमें जीवन प्रवाहित हो रहा है क्योंकि अवरोध हट गए हैं, अब हाथ में वहां कोई भी क्रोध नहीं है, वह विषैला न होकर शुद्ध है और उसमें प्रेम सरलता से प्रवाहित हो सकता है। तुम और अधिक संवेदनशील, खुले हुए और सहनशील बन जाओगे।
यदि तुम अतीत के साथ सीमाओं में बंध गए हो तो अचानक तुम यहीं और अभी वर्तमान में होगे, क्योंकि तब वहां बार-बार गतिशील होने की आवश्यकता नहीं है।
प्रत्येक रात्रि अतीत में गतिशील होते रहो। धीमे-धीमे स्मृतियां तुम्हारी आंखों के सामने आएंगी और वे पूरी हो जाएंगी। उनको फिर से जियो, अधूरेपन को पूरा करो तो अचानक तुम अनुभव करोगे कि वे छूट जाती हैं। अब वहां कुछ और अधिक करने को नहीं है, बात ही समाप्त हो गई है। जैसे समय गुजरता है कम-से-कम स्मृतियां आएंगी। वहां अंतराल होंगे, अब कुछ भी नहीं आ रहा है। तुम जीना पसंद करोगे और वे अंतराल सुंदर हैं। तब एक दिन आएगा जब तुम पीछे की ओर अतीत में गतिशील होने में समर्थ न होगे क्योंकि प्रत्येक चीज़ पूरी है। जब तुम पीछे की ओर गतिशील नहीं हो सकते, केवल तभी तुम आगे की ओर गतिशील होते हो।
इस बारे में कोई दूसरा उपाय नहीं है और आगे की ओर बढ़ना मार्ग पर पहुंचना है : प्रत्येक क्षण पूरी चेतना आगे की ओर अज्ञात में गतिशील हो रही है।
लेकिन अतीत के द्वारा तुम्हारे पैरों को निरंतर पीछे खींचा जा रहा है, अतीत तुम पर भारी है, फिर तुम भविष्य में कैसे गतिशील हो सकते हो और कैसे तुम वर्तमान में बने रह सकते हो? पर्वत वास्तव में बहुत बड़ा है, वह अज्ञात है और बिना कोई नक्शे का है, कोई भी नहीं जानता कि उससे होकर कैसे गुजरा जाए और प्रत्येक व्यक्ति ऐसा ही एक भिन्न हिमालय है कि तुम कभी भी उसका नक्शा बना ही नहीं सकते क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति व्यक्ति के साथ वह भिन्न है। तुम्हें अपना हिमालय ढोना है और दूसरों को अपने हिमालय ढोने हैं तथा इन पर्वतों के साथ जब तुम लोगों से मिलते हो तो वहां केवल झगड़े और संघर्ष होते हैं।
पूरा जीवन केवल एक संघर्ष बन जाता है, एक हिंसक संघर्ष और प्रत्येक स्थान पर तुम उस झगड़े तथा टकराव को देख और सुन सकते हो तथा उसका अनुभव कर सकत हो। जब कभी भी कोई व्यक्ति निकट आता है तुम तनावग्रस्त हो जाते हो तथा दूसरा भी तनाव से भर जाता है क्योंकि दोनों अपने तनावों के हिमालय को साथ लिए हुए चल रहे हैं और देर अथवा सवेर टकराएंगे ही। तुम इसे प्रेम कह सकते हो : लेकिन वे लोग जो जानते हैं वे उसे एक टकराव अथवा मुठभेड़ कहते हैं। अब वहां दुःख होने जा रहा है।
अतीत के साथ समाप्त हो जाओ। जैसे ही तुम अतीत से कहीं अधिक मुक्त होते हो वह पर्वत विलुप्त होने लगता है। तब तुम एक समस्वरता को उपलब्ध होगे और तुम धीमे-धीमे एक हो जाओगे।
अब इस नीति कथा को समझने का प्रयास करो। मार्ग क्या है?
एक सद्गुरु जो एक पर्वत पर अकेला ही रहता था
उससे एक भिक्षु ने पूछा-‘‘(सत्य को पाने का) मार्ग क्या है?
प्रत्येक शब्द को समझ बनाना होगा क्योंकि प्रत्येक शब्द अपने साथ अर्थ लिए हुए है।
एक सद्गुरु जो एक पर्वत पर अकेला ही रहता है...
ऐसा हमेशा से होता रहा है कि एक बुद्ध पर्वतों पर जाता है, एक जीसस भी पर्वतों पर जाते हैं, एक महावीर भी पर्वतों में जाते हैं। वे लोग पहाड़ों पर क्यों जाते हैं? क्या अकेलेपन के लिए जाते हैं? क्यों वे एकांतवासी बनते हैं? केवल अपने अंदर स्थित पर्वतों का तुरंत और सीधे आमना-सामना करने के लिए। समाज में रहते हुए यह कठिन है, क्योंकि पूरी ऊर्जा दिन-प्रतिदिन के कार्यों, दिनचर्या और संबंधों में व्यर्थ नष्ट हो जाती है तथा तुम्हारे पास स्वयं से आमना-सामना करने के लिए न तो पर्याप्त समय होता है और न पर्याप्त ऊर्जा ही बचती है, तुम दूसरों का ही आमना-सामना करने में चूक जाते हो। तुम बहुत अधिक व्यस्त रहते हो और स्वयं का साक्षात्कार करने के लिए एक ऐसा जीवन जरूरी है जो जरा भी व्यस्त न हो क्योंकि स्वयं का साक्षात्कार करना एक महान भयंकर घटना है। तुम्हें अपनी सभी ऊर्जाओं की आवश्यकता होगी। यह एक ऐसा तल्लीनता का कार्य है कि यह आधे-अधूरे हृदय से नहीं हो सकता।
खोजी हमेशा से ही केवल अपना आमना-सामना करने के लिए ही प्रवृफति में एकांतवास के लिए जाते रहे हैं। केवल स्वयं का साक्षात्कार करने के लिए और स्वयं अपने को सहज-सरल बनाने के लिए क्योंकि संबंध जोड़ने में वह जटिल हो जाता है क्योंकि दूसरे लोग अपने दुखों और पर्वतों को साथ लाते हैं। जब कभी वे प्रवृफति में एकांतवास के लिए जाते हैं। तुम पहले ही से बोझिल हो और तब दूसरा भी आता है। तब तुम्हारा टकराव होता है, तब चीज़ें अधिक जटिल हो जाती हैं। तब वहां दो बीमारियों का मिलना होता है और उससे एक बहुत जटिल बीमारी उत्पन्न होती है। प्रत्येक चीज़ लिपट जाती है और वह एक पहेली बन जाती है। तुम पहले ही से एक पहेली हो, उसको पहले ही सुलझा लेना अच्छा है और तब संबंधों में जाओ, क्योंकि यदि तुम एक पर्वत नहीं हो तभी तुम किसी अन्य व्यक्ति की सहायता कर सकते हो।
स्मरण रहे, एक ध्वनि उत्पन्न करने के लिए दो हाथों की आवश्यकता होती है और एक टकराव के लिए दो पहाड़ आवश्यक होते हैं। यदि तुम अब और एक पर्वत नहीं हो तो अब तुम किसी से संबंध बनाने में समर्थ हो। अब दूसरा एक टकराव उत्पन्न करने का प्रयास कर सकता है लेकिन वह उत्पन्न नहीं हो सकता है क्योंकि एक हाथ के साथ ध्वनि सृजित करने की वहां कोई भी संभावना नहीं है। दूसरा व्यक्ति मूर्ख होने का अनुभव करने लगेगा और वही प्रज्ञा का प्रभात होता है।
यदि तुम बिना किसी भार के हो तो तुम सहायता कर सकते हो और यदि तुम भारमुक्त नहीं हो तो तुम सहायता नहीं कर सकते हो। तुम एक पति हो सकते हो, तुम एक पिता अथवा माता हो सकत हो और तुम अपने बोझ के साथ दूसरों को भी बोझिल बनाओगे। छोटे-छोटे बच्चे भी तुम्हारे पर्वतों कोढो रहे हैं और वे तुम्हारे नीचे कुचले जा रहे हैं- ऐसा होना ही है क्योंकि तुम कभी भी संबंध बनाने से पूर्व अपने अस्तित्व को साफ-सुथरा रखने के बारे में कभी भी फिक्र करते ही नहीं।
प्रत्येक सजग प्राणी का यह मौलिक उत्तरदायित्व होना चाहिए कि किसी से भी संबंध जोड़ने के लिए गतिशील होने से पूर्व मुझे भारमुक्त होना चाहिए। मुझे अतीत के अव्यवहारिक अनुभवों और विचारों को साथ लेकर नहीं चलना चाहिए, केवल तभी मैं दूसरों को विकसित होने में सहायता कर सकता हूं अन्यथा मैं उसका शोषण करूंगा और दूसरा मेरा शोषण करेगा, अन्यथा मैं दूसरे को प्रभुत्व में रखने का प्रयास करूंगा और दूसरा मुझ पर हावी होने का प्रयास करेगा। वह एक रिश्तेदारी नहीं होगी, वह प्रेम नहीं हो सकता, वह एक सूक्ष्म राजनीति बन जाएगी।
तुम्हारा विवाह संबंध प्रभुत्व करने की एक सूक्ष्म राजनीति है। तुम्हारा पितृत्व अथवा मातृत्व एक सूक्ष्म राजनीति है। माताओं की ओर देखो केवल सामान्य रूप से उनका निरीक्षण करो- और तुम अनुभव करोगे कि वे अपने छोटे बच्चों पर प्रभुत्व करने का प्रयास कर रही हैं। अपनी आक्रामकता और अपना क्रोध वे उन पर पेंफक रही हैं, वे जैसे रेचन की वस्तुएु बन गए हैं और इसके द्वारा वे पहले ही से बोझिल हैं। वे लोग बिल्कुल प्रारंभ ही से इन पर्वतों को लेकर जीवन में गतिशील होंगे और यह कभी नहीं जानेंगे कि बिना इतने अधिक बोझिल सिरों को साथ ले जाने के बिना भी जीवन जीना संभव है और वे कभी उस स्वतंत्रता को भी नहीं जानेंगे जो एक भारमुक्त अस्तित्व के साथ आती है। वे कभी नहीं जानेंगे कि जब तुम बोझिल नहीं होते हो तो तुम्हारे पास अज्ञात आकाश में उड़ने के लिए पंख हो सकते हैं।
परमात्मा केवल तभी उपलब्ध है जब तुम बिना बोझ के हो, लेकिन वे उसे कभी नहीं जानेंगे। वे मंदिर के द्वारों को खटखटाएंगे, लेकिन वे कभी नहीं जानेंगे कि वास्तविक मंदिर कहां मौजूद है। वास्तविक मंदिर तो स्वतंत्रता है : क्षण-प्रति-क्षण अतीत के प्रति मरना और वर्तमान में जीना है। गतिशील होने की स्वतंत्रता, अंधकार में और अज्ञात में गतिशील होना वही परमात्मा तक जाने का द्वार है।
एक सद्गुरु जो एक पर्वत पर अकेला ही रहता था- निपट अकेला।
तुम्हें अनिवार्य रूप से इन दो शब्दों : एकाकी और अकेलेपन के मध्य एक अंतर बना लेना है। शब्दकोश में दोनों के समान अर्थ हैं लेकिन वे लोग जो ध्यान करते रहे हैं, वे इस अंतर को जानते हैं। वे समान नहीं हैं जितना संभव हैं वे उतने ही भिन्न हैं। एकाकीपन एक गंदी चीज़ है, एकाकीपन एक निराशाजनक वस्तु है, वह दूसरे व्यक्ति की अनुपस्थिति और एक उदासी है। एकाकीपन दूसरे की अनुपस्थिति है, तुम चाहते थे कि दूसरा भी वहां हुआ होता लेकिन दूसरा वहां नहीं है और तुम उसे अनुभव करते हो और तुम उनसे नहीं मिल पाते हो। एकाकीपन में तुम वहां नहीं हो तथा वहां दूसरे व्यक्ति की अनुपस्थिति है। अकेलापन- यह पूर्ण रूप से भिन्न है। तुम वहां हो, वहां तुम्हारी उपस्थिति एक विधायक चीज़ है। तुम दूसरे की अनुपस्थिति को महसूस नहीं करते, तुम स्वयं से ही मिलते हो। तब तुम अकेले हो, एक शिखर के समान अकेले हो, आश्चर्यजनक रूप से सुंदर हो। कभी-कभी तुम एक भय का भी अनुभव करते हो लेकिन उसमें भी एक सौंदर्य है। पर मूल चीज़ है उपस्थिति, तुम स्वयं के लिए उपस्थित हो। तुम एकाकी नहीं हो, तुम स्वयं अपने ही साथ हो। अकेले होकर भी तुम एकाकी नहीं हो, तुम स्वयं के साथ हो। एकाकी होकर तुम पूरी तरह एकाकी हो, वहां कोई भी व्यक्ति नहीं है। तुम स्वयं अपने भी साथ नहीं हो और तुम दूसरे व्यक्ति से चूक रहे हो। एकाकीपन नकारात्मक है, वह एक अनुपस्थिति है और अकेलापन विधायक है, वह एक उपस्थिति है।
यदि तुम अकेले हो तो तुम विकसित होते हो क्योंकि वहां विकसित होने के लिए अंतराल है, तुम्हें बाधा डालने को अन्य कोई भी नहीं है, कोई भी अन्य व्यक्ति तुम्हें रोकने वाला नहीं है तथा न कोई भी व्यक्ति और अधिक जटिल समस्याएं उत्पन्न करने के लिए है। अकेलेपन में तुम विकसित होते हो, तुम जितना अधिक विकसित होना चाहते हो, तुम विकसित हो सकते हो क्योंकि इस बारे में कोई सीमा नहीं है और तुम स्वयं अपने साथ बने रहते हुए प्रसन्न हो, एक परमानंद उत्पन्न होता है। वहां कोई भी मुकाबला नहीं है क्योंकि दूसरा वहां नहीं है, इसलिए न तुम सुंदर हो और न कुरूप, न तुम धनी हो और न तुम निर्धन हो, न तुम सफेद हो ओर न काले हो, न तो तुम पुरुष हो और न तुम स्त्री हो, न तुम ‘यह’ हो और न तुम ‘वह’ हो। अकेले तुम कैसे एक स्त्री अथवा एक पुरुष हो सकते हो एकाकीपन में तुम एक स्त्री हो अथवा पुरुष हो क्योंकि दूसरा अनुपस्थिति है। अकेलेपन में तुम कोई भी नहीं हो, दूसरे से पूरी तरह खाली हो, शून्य हो।
स्मरण रहे, जब दूसरा नहीं होता है तो अहंकार भी नहीं रहता है। वह दूसरे के साथ ही मौजूद होता है। अहंकार के लिए दूसरा व्यक्ति आवश्यक है या तो वह उपस्थित हो अथवा अनुपस्थित हो। ‘मैं’ का अनुभव करने के लिए दूसरा आवश्यक है, दूसरे की एक चहारदीवारी आवश्यक है। पड़ोसियों से घिरे हुए मैं; ‘मैं’ का अनुभव करता हूं। जब वहां कोई भी पड़ोसी नहीं है, वहां चारों ओर कोई भी नहीं है, फिर तुम कैसे ‘मैं’ का अनुभव कर सकते हो? तुम वहां होगे लेकिन बिना किसी अहंकार के, अहंकार एक रिश्ता है और वह केवल संबंधों में ही मौजूद होता है।
वह सद्गुरु अकेला ही रहता था- एक बैरागी अथवा तपस्वी का अर्थ है ‘ अकेला, वह एक पर्वत पर स्वयं का ही आमना-सामना करते हुए प्रत्येक ओर से स्वयं अपने से ही मिलता था। वह जहां कहीं भी जाता है, स्वयं अपने से ही साक्षात्कार करता है, इसलिए भलीभांति यह जानते हुए कि वह क्या है और वह कौन है, वह दूसरों के साथ बोझिल नहीं है।
यदि तुम अकेले बने रह सकते हो तो सभी विषय और वस्तुएं, यहां तक कि पागलपन जैसी वस्तु भी स्वयं अपने से सुलझना शुरू हो जाती है। ठीक कल रात ही मैं कुछ मित्रों के साथ बात कर रहा था। पश्चिम में यदि एक व्यक्ति सनकी, पागल, नासमझ और मानसिक रोगी हो जाता है तो उसे बहुत अधिक उपचार दिया जाता है, वास्तव में वह बहुत अधिक और वर्षों तक दिया जाता है तथा परिणाम लगभग कुछ भी नहीं होता है। वह व्यक्ति वैसा ही बना रहता है।
मैंने सुना है कि एक बार ऐसा हुआ कि एक मनोचिकित्सक एक स्त्री का उपचार कर रहा था, जिसके पास एक ही आवेश था, उस आवेश को ‘क्लेप्टोपीनिया’ कहते हैं, वह वस्तुओं को चुरा लेने का था। वह बहुत धनी स्त्री थी और उसे किसी भी चीज़ की कमी नहीं थी, वह केवल मनोवैज्ञानिक रूप से आवेशित हो जाती थी। वह कोई भी चीज़ न चुराए, यह उसके लिए असंभव था और जहां कहीं भी उसे अवसर मिलता, वह चीज़ें चुरा लेती, यहां तक कि सुई और बटन जैसी मूल्यहीन वस्तुएं भी। उसका वर्षों तक उपचार किया गया।
पांच वर्षों के लंबे उपचार के बाद, जिसके लिए हजारों डॉलर्स जैसे नीचे नाली में बहा दिए गए, उन फ्रॉयड्रियन मनोचिकित्सकों ने जो उसका उपचार कर रहे थे, पांच वर्षों बाद उससे कहा-‘‘अब आप सामान्य प्रतीत होती हैं और अब उपचार को जारी रखने की कोई भी आवश्यकता नहीं है तथा आप इसे छोड़ सकती हैं। अब आप कैसा अनुभव कर रही हैं?’’
उसने कहा-‘‘मैं पूर्ण रूप से ठीक होने का अनुभव कर रही हूं। प्रत्येक चीज़ बढ़िया और अच्छी है। जबसे आपने मेरा उपचार करना शुरू किया उससे पूर्व में हमेशा वस्तुएं चुराने के बाद अपराध बोध का अनुभव करती थी- अब मैं चीज़ें चुराती हूं लेकिन कभी भी मैं अपराध बोध का अनुभव नहीं करती हूं। बहुत उम्दा है यह। प्रत्येक चीज़ अच्छी है। इसे वास्तव में आपने ही किया है। आप लोगों ने मेरी बहुत सहायता की है।’’
यही वह सभी कुछ है जो होता है। तुम पूरी तरह से अभ्यस्त बन जाते हो और सभी कुछ इतना ही होता है कि तुम अपनी बीमारी के साथ लयबद्ध हो जाते हो।
पूरब में, विशेष रूप से जापान में क्योंकि वहां ज़ेन है, वहां कम-से-कम एक हजार वर्षों से एक पूर्ण रूप से भिन्न प्रकार का उपचार विद्यमान है। ज़ेन मठों में और वे किसी भी तरह से चिकित्सालय नहीं है और न रुग्ण लोगों से उनका कोई भी मतलब है, लेकिन यदि उस गांव में एक ज़ेन मठ विद्यमान है और यदि कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से रुग्ण अथवा पागल हो जाता है तो केवल वही एक ऐसा स्थान है जहां उसे ले जाया जाता है अन्यथा उसे वे लोग और कहां ले जाएं? पूरब में वे लोग हमेशा से मानसिक रोगियों को एक सद्गुरु के पास ले जाते हैं क्योंकि यदि वह सामान्य लोगों का उपचार कर सकता है तो मानसिक रोगियों का क्यों नहीं कर सकता? अंतर केवल डिग्रिस का है।
इसलिए वे लोग मानसिक रोगियों को एक ज़ेन मठ में सद्गुरु के पास ले जाएंगे और कहेंगे-‘‘अब क्या किया जाए? आप इसे अपनी शरण में ले लीजिए।’’ और वह उसे अपने मठ में रख लेगा।
उपचार वास्तव में अविश्वसनीय है। उपचार यही है कि किसी भी प्रकार से उसका कोई भी उपचार किया ही नहीं जाता। उस व्यक्ति को मठ में पीछे की ओर एक कोने में एकांत कोठरी दे दी जाती है और उस मानसिक रोगी को वहीं रहना होता है। उसे भोजन के साथ अन्य प्रत्येक सुविधा दी जाएगी और उसे अकेले में स्वयं अपने ही साथ रहना होगा। तीन सप्ताह में, केवल तीन हफ्तों में बिना किसी उपचार के मानसिक रोग विलुप्त हो जाता है।
अब पश्चिम के अनेक मनोचिकित्सक इसे एक चमत्कार की भांति लेते हुए इसका अध्ययन कर रहे हैं, पर यह कोई चमत्कार नहीं है। सामान्य रूप से उस व्यक्ति को थोड़ा-सा अंतराल स्वयं के साथ व्यवहार करने के लिए दिया जा रहा है क्योंकि कुछ दिनों पूर्व वह सामान्य था। वह फिर से सामान्य हो सकता है : कोई व्यक्ति अथवा कोई बात उस पर एक बोझ बन गई है और केवल कुल इतनी-सी ही बात है कि वह एक अंतराल चाहता है। और वे लोग उसकी ओर अधिक ध्यान नहीं देंगे क्योंकि यदि तुम एक मानसिक रोगी की ओर बहुत अधिक ध्यान देते हो जैसा कि पश्चिम में दिया जा रहा है तो वह फिर वापस लौटकर सामान्य होने नहीं जा रहा है क्योंकि इससे पूर्व किसी भी व्यक्ति ने उसकी ओर इतना अधिक ध्यान नहीं दिया था। वह कभी भी वापस लौटकर वैसा ही समान बनने नहीं जा रहा है क्योंकि तब किसी भी व्यक्ति ने उसके बारे में फिक्र नहीं की और अब महान मनोचिकित्सक, विश्व प्रसिद्ध नामी महान डॉक्टर उसकी फिक्र कर रहे हैं, वे उससे बातचीत कर रहे हैं, वह रोगी बना काउच पर शरीर को शिथिल कर लेटा हुआ है, नामी-गिरामी मनोचिकित्सक ठीक उसके पीछे बैठे हुए, वह जोकुछ भी कर रहा है, उसके प्रत्येक शब्द को बहुत ध्यान और सावधानी से सुन रहे हैं। इतना अधिक ध्यान देना। मानसिक रोग एक पूंजी बन जाता है क्योंकि लोगों को दूसरों का ध्यान पाने की बहुत आवश्यकता है।
कुछ लोग बेवकूफी से भरा हुआ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं क्योंकि तब समाज उनकी ओर ध्यान देता है। प्रत्येक पुराने कस्बे अथवा प्रत्येक गांव में तुम एक गांव का शेख चिल्ली अथवा एक बेवकूफ व्यक्ति पाओगे और वह एक सामान्य व्यक्ति न होकर बहुत बुद्धिमान व्यक्ति होता है। मूर्ख लोग प्रायः ही बुद्धिमान होते हैं। उन लोगों ने यह चाल सीख ली है कि मूर्ख बनने पर लोग उनकी ओर ध्यान देते हैं, वे उन्हें भोजन देते हैं, प्रत्येक व्यक्ति उन्हें जानता है और बिना कोई पद प्राप्त किए हुए भी वे पहले ही से प्रसिद्ध हो जाते हैं- पूरा गांव उनकी देखभाल करता है, जब कभी वे रास्ते से गुजरते हैं, वे महान नेताओं जैसे होते हैं एक भीड़ उनका अनुसरण करती है, बच्चे कूदते और उछलते हुए उनकी ओर छोटी-मोटी चीज़ें पेंफकते हैं और वे लोग उसका आनंद लेते हैं। वे शहर के लिए एक अजूबे होते हैं और वे जानते हैं कि मूर्ख बने रहना एक अच्छी-खासी पूंजी है और गांव उनकी देखभाल करता है, उन्हें भली भांति भोजन तथा वस्त्र देता है और उन लोगों ने यह बाजीगरी अच्छी तरह सीख ली है। कोई भी कार्य करने की कुछ आवश्यकता ही नहीं है- केवल एक मूर्ख बने रहना ही पर्याप्त है।
यदि एक मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति और स्मरण रहे कि अहंकार ही वह मानसिक रोग है और अहंकार को लोगों का ध्यान पाने की आवश्यकता होती है तथा अहंकार को यह अच्छा लगता है। अनेक लोगों की हत्या समाचार-पत्रों का ध्यान पाने के लिए ही सामान्य रूप से कर दी गई क्योंकि जब वे हत्या करते हैं तभी वे समाचार-पत्रों की सुर्खियों में आ सकते हैं। अचानक वे लोग बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं, उनके चित्र और उनके नाम जीवनवृत्त के साथ प्रकाशित किए जाते हैं और अचानक वे लोग कोई नहीं, कुछ नहीं से कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति बन जाते हैं।
मानसिक रोग, ध्यान पाने की एक गहन लालसा है और यदि तुम उसकी ओर ध्यान देते हो तो तुम उसे भोजन देते हो और इसी कारण मनोविश्लेषण पूर्ण रूप से असफल होकर रह गया है।
ज़ेन मठों में वे लोग एक मानसिक रोगी का तीन सप्ताहों में उपचार कर देते हैं और फ्रॉयडियन मनोविश्लेषण द्वारा वे लोग तीस वर्षों मे भी उपचार नहीं कर सकते क्योंकि वे वास्तविक अभिप्राय से चूक जाते हैं, लेकिन ज़ेन मठों में मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति की ओर कोई भी ध्यान नहीं दिया जाता, कोई भी व्यक्ति यह नहीं सोचता है कि वह कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है- वे लोग उसे पूरी तरह से अकेला छोड़ देते हैं और केवल यही उसका उपचार है। उसे अपने विषय-वस्तु क्रमबद्ध लगाकर स्वयं अपनी समस्याओं को हल करना होता है और कोई भी व्यक्ति उसकी फिक्र नहीं करता है। तीन सप्ताह में पूर्ण रूप से सामान्य होकर वह बाहर आ जाता है।
अकेलेपन के पास एक उपचारक शक्ति और प्रभाव होता है। जब कभी भी तुम यह अनुभव करते हो कि झंझट में पड़कर अव्यवस्थित हो रहे तो वहीं उसे हल करने का प्रयास मत करो। कुछ दिनों को समाज से हटकर कम-से-कम तीन सप्ताह के लिए कहीं दूर अकेलेपन में चले जाओ और केवल शांत बने रहकर स्वयं अपना ही निरीक्षण करो, केवल स्वयं के साथ बने रहकर स्वयं को अनुभव करो और तुम्हारे पास एक अद्भुत शक्ति उपलब्ध होगी जो तुम्हारा उपचार करती हैं इसीलिए पूरब में ऐसे लोग पहाड़ों अथवा जंगलों में कहीं अकेलेपन मे चले जाते हैं, जहां उन्हें चिंता में डालने के लिए अन्य कोई भी व्यक्ति न हो। केवल स्वयं के साथ जिससे वह व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से स्वयं का अनुभव कर सके और तुम देख सकते हो कि उसके अंदर क्या परिवर्तन हो रहा है।
तुम्हारे स्वयं के सिवाय कोई अन्य व्यक्ति तुम्हारे लिए जिम्मेदार नहीं है ओर तुम्हें ही यह छांटना है कि तुम्हारा ही किया गया कर्म है। यही है वह जिसे हिंदू कहते हैं- तुम्हारा कर्म। इसका अर्थ बहुत गहरा है। यह एक सिद्धांत नहीं है। वे कहते हैं कि तुम जोकुछ भी हो वे तुम्हारे अपने ही कर्म है इसलिए उन्हें छांटकर क्रमबद्ध कर लो। तुम्हारे लिए कोई अन्य व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है और केवल तुम ही जिम्मेदार हो।
इसलिए अपने विषय-वस्तुओं को छांटकर क्रमबद्ध करते हुए अपने अकेले को बंदीघर में बंद कर अपनी समस्याओं और अपनी आत्मा पर ध्यान करो। यही इसका सौंदर्य है कि यदि तुम केवल शांत और मौन होकर कुछ दिनों तक स्वयं अपने साथ ही जीते हो तो सभी विषय और वस्तुएं स्वयं अपने आप व्यवस्थित हो जाती हैं क्योंकि अव्यवस्थित और अशांत स्थिति स्वाभाविक नहीं है और तुम लंबी अवधि तक उसे नहीं बढ़ा सकते हो। सामान्य रूप से विश्राममय हो जाओ और सभी विषय वस्तुओं को होने दो और निरीक्षण करो। स्मरण रहे कि किसी भी चीज़ को बदलने का कोई भी प्रयास मत करो, यदि तुम कोई परिवर्तन करने का प्रयास करते हो तो तुम उसी स्थिति को वैसा ही रखना जारी रखोगे क्योंकि कोई वास्तविक प्रयास विषय वस्तुओं को अव्यवस्थित करना जारी रखेगा।
यह ठीक एक नदी के किनारे बैठने के समान है, नदी बहे चलती जाती है। मिट्टी और कीचड़ तली में बैठ जाता है, सूखे पत्ते सागर की ओर बह जाते हैं और धीमे-धीमे पूर्ण रूप से शुद्ध और निर्मल हो जाती है। तुम्हें जाकर उसे साफ करने की आवश्यकता नहीं है- यदि तुम जाते हो तो तुम उसे और अधिक अस्त-व्यस्त कर दोगे। पूरी तरह से निरीक्षण करो और चीज़ों को होने दो। यही है वह जिसे कर्म का सिद्धांत कहते हैं कि तुमने स्वयं अपने को अव्यवस्थित कर रखा है, अब अकेले ही चलो। इसलिए तुम्हें अपनी समस्याओं को दूसरों पर पेंफकने की आवश्यकता नहीं है, तुम्हें अपनी बीमारियां दूसरों पर फैलाने की आवश्यकता नहीं है- तुम पूरी तरह से अकेले ही गतिशील होते जाओ, उन्हें मौन और शांति से प्रभावित होने दो तथा उनका निरीक्षण करते रहो। ठीक मन की नदी के किनारे बैठे रहो। चीज़ों को व्यवस्थित और स्थिर होने दो। जब चीज़ें स्थिर और व्यवस्थित हो जाती हैं तो तुम्हारे पास एक स्पष्टता और समझ होती है। यदि तुम वैसा अनुभव करते हो तो संसार में वापस लौट जाओ। वह भी अनिवार्य नहीं है, उसे भी एक बाधा नहीं बनना चाहिए। कुछ भी बाधा नहीं बनना चाहिए, न तो संसार और न पर्वत।
जोकुछ भी तुम अनुभव करते हो, वह स्वाभाविक है और जोकुछ तुम अनुभव करते हो वही अच्छा है और वह तुम्हारा उपचार करता है जोकुछ भी तुम अनुभव करते हो। तुम उसमें विभाजित न होकर पूर्ण रूप से हो ‘- और वही मार्ग है पर्वत को तुमने पार कर लिया है और तुम मार्ग पर पहुंच गए हो अब उसमें बहो और उसका अनुसरण करो।
पर्वत का होना ही समस्या है। जब तुमने पर्वत को पार कर लिया है तो मार्ग उपलब्ध है और तुमने इस पर्वत को अनेक जन्मों में इकट्ठा कर बनाया है जोकुछ भी तुमने किया है, तुम्हारे कर्मों से ही यह पर्वत बना है और अब यह तुम पर एक बोझ है।
एक सद्गुरु जो एक पर्वत पर अकेला रहता था।
उससे एक भिक्षु ने पूछा-‘‘(सत्य को पाने का) मार्ग क्या है?’’
उत्तर देते हुए सद्गुरु ने कहा-‘‘यह पहाड़ कितना अधिक सुंदर है?’’
यह असंगत प्रतीत होता है क्योंकि वह व्यक्ति मार्ग के बारे में पूछ रहा है और सद्गुरु किसी पर्वत जैसी चीज़ के बारे में कह रहा है। यह पूर्ण रूप से बुद्धिहीन और अशिष्ट उत्तर प्रतीत होता है क्योंकि उस व्यक्ति ने पहाड़ के बारे में कोई भी बात नहीं पूछी है।
स्मरण रहे, यह एक स्थिति है। तुम ‘अ’ के बारे में पूछते हो, मैं ‘ब’ के बारे में बताता हूं, तुम मार्ग के बारे में पूछते हो और मैं पर्वत के बारे में बात करता हूं। यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो, केवल तभी तुम्हें अनुभूति हो सकती है और यदि तुम मुझे सामान्य रूप से सुनते हो तो मैं असंगत और मूर्ख हूं तो मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता हूं। मैं मूर्ख हूं क्योंकि मैं प्रासंगिक बात नहीं कर रहा हूं। यदि मैं संगत बात करता हूं तो मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता हूं और यही समस्या है। यदि मैं कुछ बात कहता हूं जो तुम्हें संगत प्रतीत होती है तो वह अधिक सहायता नहीं करेगी क्योंकि समस्या तुम ही हो और यदि मैं संगत बात करता हूं तो इसका अर्थ है कि मैं तुम्हें समायोजित करता हूं। फिर भी यदि मैं तुम्हें संगत दिखता हूं तो इसका अर्थ कि कुछ चीज़ गलत हो गई हैं स्वयं उस घटना की प्रवृफति के द्वारा मुझे असंगत होना होगा।
मैं मूर्ख और बुद्धिहीन दिखाई दूंगा और प्रश्न तथा उत्तर के मध्य इस अंतराल पर केवल तभी सेतु बन सकता है, यदि तुम्हारे पास आस्था है अन्यथा सेतु नहीं बन सकता। उस पर कैसे सेतु बने? खोजी और सद्गुरु के मध्य शिष्य और सद्गुरु के मध्य तथा प्रश्न और उत्तर के मध्य कैसे उस सेतु को बनाया जाए क्योंकि तुम मार्ग के बारे में प्रश्न करते हो और उत्तर पर्वत के बारे में दिया जाता है।
इसीलिए श्रद्धा बहुत महत्वपूर्ण बन जाती है। ज्ञान नहीं, तर्क नहीं, तर्क-वितर्क की क्षमता नहीं, बल्कि वह एक गहन श्रद्धा ही है जो असंगत उत्तर का सेतु बन सकती है जो अप्रासंगितता के द्वारा गहराई से देख सकती है और अनुरूपता की एक झलक को पकड़ सकती है।
उत्तर देते हुए सद्गुरु ने कहा-
‘‘यह पहाड़ कितना अधिक सुंदर है?’’
भिक्षु ने कहा-
‘‘मैं पहाड़ के बारे में न पूछकर मार्ग के बारे में पूछ रहा हूं।’’
वह अपने प्रश्न से चिपका रहता है। यदि तुम उससे चिपके रहते हो तो तुम चूक जाओगे क्योंकि तुम गलत हो और तुम्हारा प्रश्न भी ठीक नहीं हो सकता, ऐसा होना असंभव है। तुम एक ठीक प्रश्न कैसे पूछ सकते हो? यदि तुम एक ठीक प्रश्न पूछ सकते हो तो उत्तर भी बहुत अधिक दूर नहीं है, वह वहीं छिपा हुआ है। यदि तुम एक ठीक प्रश्न पूछ सकते हो तो पहले ही से ठीक हो। एक मन के साथ जो पहले ही से ठीक हो, उत्तर कैसे छिपा हुआ रह सकता है? नहीं, तुम जोकुछ भी पूछते हो, तुम जोकुछ भी कहते हो वह तुम्हें भी साथ लिए हुए चलता है।
ऐसा हुआ : मुल्ला नसरुद्दीन मोटा-से-मोटा और स्थूल-से-स्थूल शरीर का होता जा रहा था। डॉक्टर ने उसे पथ्य के रूप में बहुत संतुलित भोजन लेने का परामर्श दिया।
दो माह बाद मुल्ला डॉक्टर से मिलने गया। डॉक्टर ने कहा-‘‘माई गॉड! यह एक चमत्कार है। तुम पहले की अपेक्षा और अधिक मोटे हो गए हो- मैं अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं कर सकता। पथ्य के रूप में मैंने तुम्हें जो संतुलित भोजन लेने को कहा था क्या तुम निष्ठापूर्वक उसका अनुसरण कर रहे हो?’’ क्या तुम मेरे तज्बीज़ किए गए भोजन के अलावा अन्य कुछ और तो नहीं खा रहे हो?’’
नसरुद्दीन ने कहा-‘‘मैं पहले जितना लेता था उसके अलावा कुछ भी नहीं ले रहा हूं, पर साथ ही मैं उस पथ्य का भी अनुसरण कर रहा हूं।’’
डॉक्टर विश्वास ही न कर सका। उसने पूछा-‘‘नसरुद्दीन मुझे ठीक-ठीक बताओ। ‘जितना लेता था, उसके अलावा कुछ भी नहीं’ का क्या मतलब है?’’
नसरुद्दीन ने कहा-‘‘वास्तव में अपने नियमित भोजन के अलावा नियमित भोजन लेने के बाद मैं आपके द्वारा निर्धारित किया गया पथ्य भी लेता रहा हूं।’
लेकिन इसे ऐसा होना ही है। जोकुछ तुम करते हो, मन उसी में गतिशील होता है- वह प्रत्येक चीज़ को एक आवृफति दे देता है। तुम एक ठीक प्रश्न पूछ ही नहीं सकते। यदि तुम एक ठीक प्रश्न पूछ सकते हो तो इस बारे में पूछने की कोई आवश्यकता है ही नहीं, क्योंकि ठीक तो वह व्यक्ति होता है, न प्रश्न होता है और न उत्तर। यदि तुम ठीक हो तो तुम ठीक प्रश्न पूछते हो और अचानक वहां ठीक उत्तर होता है। यदि तुम एक ठीक प्रश्न पूछ सकते हो तो तुम्हें सामान्य रूप से कहीं भी और जाने की आवश्यकता नहीं है; केवल अपनी आंखें बंद करो तथा ठीक प्रश्न पूछो और तुम पाओगे कि ठीक उत्तर वहां मौजूद है।
समस्या ठीक उत्तर के साथ नहीं है, समस्या मार्ग के साथ भी नहीं है, समस्या है वह पर्वत, समस्या है मन और समस्या हो तुम।
उत्तर देते हुए सद्गुरु ने कहा-‘‘यह पहाड़ कितना अधिक सुंदर है?’’
भिक्षु ने कहा-‘‘मैं पहाड़ के बारे में न पूछकर, मार्ग के बारे में पूछ रहा हूं।’’
सद्गुरु ने उत्तर दिया-‘‘मेरे पुत्र! जब तक तुम पहाड़ के पार न जा सको, तुम मार्ग तक नहीं पहुंच सकते।’’
अचानक यह ‘मेरे पुत्र’ का संबोधन क्यों? अभी तक सद्गुरु ने एक भी प्रेमपूर्ण शब्द का प्रयोग नहीं किया है, अचानक यह ‘मेरे पुत्र’ का संबेधन क्यों? क्योंकि अब श्रद्धा की आवश्यकता होगी और तुम केवल कोई भी बात कहते हुए एक व्यक्ति में श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर सकते हो, चाहे वह पूर्ण सत्य ही क्यों न हो। श्रद्धा केवल तभी उत्पन्न की जा सकती है यदि सद्गुरु प्रेमपूर्ण हो क्योंकि केवल प्रेम ही श्रद्धा उत्पन्न करता है। शिष्य की ओर से एक श्रद्धा आवश्यक होती है, एक गहन आस्था की आवश्यकता होती है लेकिन आस्था केवल तभी उगमी है जब सद्गुरु कहता है- ‘मेरे पुत्र’।
अब विषय भिन्न दिशा में घूम रहा है। यह एक बुद्धिगत संबंध नहीं है, यह एक हृदय का संबंध बन रहा है। अब सद्गुरु, एक सद्गुरु की अपेक्षा एक पिता अधिक बन रहा है, अब सद्गुरु हृदय की ओर जा रहा है। अब वह एक हृदय का संबंध बना रहा है।
यदि तुम बुद्धिगत प्रश्नों को पूछते हो और सद्गुरु उनका उत्तर दिए चला जाता है तो वह उसके सामने बाह्य रूप से एक संवाद हो सकता है लेकिन वह एक सच्चा संवाद नहीं हो सकता है। तुम उस मार्ग पर आड़े-तिरछे होकर तो निकल सकते हो लेकिन कभी भी मिल नहीं सकते। यह एक संवाद नहीं है। वे दोनों स्वयं में जड़ें जमाए स्थिर बने रहते हैं, वे दूसरे तक पहुंचने का कभी कोई प्रयास ही नहीं करते। ‘मेरे पुत्र’ कहना, सद्गुरु की ओर से उस भिक्षु तक पहुंचने का एक प्रयास है। वह शिष्य के श्रद्धा करने के लिए मार्ग तैयार कर रहा है।
लेकिन तब फिर एक समस्या उत्पन्न होती है क्योंकि शिष्य यह सोच सकता है-‘‘यह बहुत अधिक है, मैं यहां प्रेम की खोज में नहीं आया हूं, मैं तो यहां ज्ञान की खोज में आया हूं।’’ लेकिन एक सद्गुरु तुम्हें ज्ञान नहीं दे सकता है। वह तुम्हें प्रज्ञा दे सकता है और प्रज्ञा केवल प्रेम के वाहन द्वारा ही आती है। इसलिए अचानक ही सद्गुरु कहता है-
‘‘मेरे पुत्र! जब तक तुम पहाड़ के पार न जा सको
तुम मार्ग तक नहीं पहुंच सकते।’’
एक बात वह और कहता है-‘‘यह पहाड़ कितना अधिक सुंदर है?’’
एक बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति का पागलपन भी सुंदर और आकर्षक होता है। जो व्यक्ति बोध को उपलब्ध नहीं है उसके लिए बुद्धत्व भी आकर्षक नहीं होता। पूरी स्थिति बदल जाती है। वह कहता है-‘‘कितना सुंदर पर्वत है यह?’’ बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति के लिए तुम्हारी मानसिक रुग्णता भी सुंदर चीज़ है, वह उसे भी स्वीकार करता है, उसे नष्ट नहीं करना है बल्कि उसके भी पार जाना है। किसी एक को उसके पार जाना है लेकिन जब तक उसका अंत नहीं आ जाता, वह सुंदर है। किसी एक को कहीं अन्य स्थान पर भी पहुंचना होता है लेकिन विषय लक्ष्य नहीं है, विषय है, प्रत्येक क्षण लक्ष्य को यहीं और अभी जीना।
बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति के लिए प्रत्येक वस्तु अथवा व्यक्ति सुंदर है और जो व्यक्ति बोध को उपलब्ध नहीं है उसके लिए प्रत्येक वस्तु कुरूप और भद्दी है। अनुपलब्ध व्यक्ति के लिए वहां श्रेणियों हैं- कलम कुरूप और अधिक कुरूप। उसके लिए सौंदर्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है। जब कभी भी तुम एक व्यक्ति से कहते हो-‘‘तुम सुंदर हो’’ तो वास्तव में तुम कह रहे हो कि तुम कम कुरूप हो। जब तुम इसे पुनः कहो तो निरीक्षण करना और तब खोजना कि वास्तव में तुम्हारे कहने का क्या अर्थ है? क्या वास्तव में तुम्हारा अर्थ सुंदर होने से है? क्योंकि तुम्हारे मन के लिए यह असंभव है। तुम्हारा मन सुंदरता को देख ही नहीं सकता क्योंकि तुम उतने अधिक संवेदनशील नहीं हो। अधिक-से-अधिक तुम यह कहने की व्यवस्था कर सकते हो कि यह व्यक्ति दूसरों की अपेक्षा कम कुरूप है और कम कुरूप व्यक्ति किसी भी क्षण अधिक कुरूप बन सकता है और केवल चित्त वृत्ति बदलने के साथ ही ऐसा हो जाता है।
तुम्हारा मित्र और कुछ भी नहीं है, बल्कि वह व्यक्ति तुम्हारी ओर कम शत्रुतापूर्ण है। तुम्हें उसी ढंग का होना है क्योंकि तुम्हारा मन बहुत अधिक अव्यवस्थित है, वह इतना अधिक उलझन और भ्रम में है कि प्रत्येक चीज़ एक गड़बड़झाला और धुंधली दिखाई देती है और तुम प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी नहीं देख सकते हो। तुम्हारी आंखों पर लाखों परतें चढ़ी हुई हैं और वास्तव में यह एक चमत्कार है कि तुम कैसे देखने की व्यवस्था कर लेते हो क्योंकि तुम पूरी तरह से अंधे हो।
तुम सुन नहीं सकते, तुम देख नहीं सकते, तुम स्पर्श नहीं कर सकते, तुम सूंघ नहीं सकते। तुम जोकुछ भी करते हो, वह अशुद्ध है और उसके अंदर अनेक चीज़ें आ जाती है। तुम प्रेम करते हो और वहां उसके साथ ही लाखों चीज़ें होती हैं, तुम तुरंत ही सभी कुछ अपने अधिकार में करना शुरू कर देते हो और तुम यह कभी नहीं जानते कि स्वामित्व, घृणा का एक भाग है, वह प्रेम का भाग नहीं है। प्रेम कभी भी अधिकार नहीं जमाता। प्रेम है दूसरे को स्वतंत्रता देना। प्रेम एक बेशर्त उपहार है और वह एक सौदा नहीं है लेकिन तुम्हारे मन के लिए प्रेम और कुछ भी न होकर कम घृणा है। अधिक-से-अधिक तुम यह सोच सकते हो- ‘‘मैं इस व्यक्ति को बर्दाश्त कर सकता हूं और मैं उस व्यक्ति को बर्दाश्त नहीं कर सकता इसीलिए मैं उससे प्रेम भी नहीं कर सकता। इस व्यक्ति को मैं बर्दाश्त कर सकता’’ लेकिन मूल्यांकन नकारात्मक बना रहता है।
जब तुम बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाते हो तो मूल्यांकन विधायक बन जाता है। तब प्रत्येक चीज़ सुंदर होती है, तुम्हारे अंदर का पर्वत और तुम्हारी मानसिक रुग्णता भी सुंदर होती है- यहां तक कि एक पागल व्यक्ति में भी कुछ बात सुंदर होती है। हो सकता है कि परमात्मा थोड़ा-सा भटककर पाप में चला गया हो लेकिन वह फिर भी परमात्मा है।
इसलिए एक बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति के लिए कोई भी चीज़ गलत नहीं हो सकती है। प्रत्येक चीज़ ठीक है, कम ठीक अथवा अधिक ठीक। परमात्मा और शैतान के मध्य कोई भी अंतर नहीं है, अंतर केवल कम और अधिक का है। परमात्मा और शैतान दो विपरीत धु्रव और शत्रु नहीं हैं।
हिंदुओं के पास सुंदर शब्द है। शब्दों के बारे में किसी भी अन्य देश के पास इतनी अधिक समझ नहीं है। संस्वृफत में वास्तव में कुछ ऐसी चीज़ है जो अन्य कहीं भी मौजूद नहीं है। वे बहुत समझदार लोग हैं। अंग्रेजी शब्द कमअपस उसी मूल शब्द ‘देव’ से आता है, देव का अर्थ है- परमात्मा। कमअपस (शैतान) और देव (परमात्मा) समान मूल ‘देव’ से आते हैं। देव का अर्थ है- प्रकाश। इसी देव शब्द से कमअपदम आता है और इसी ‘देव’ शब्द से दैवा देवता और दिव्य आते हैं। कमअपस (दिव्य) और कमअपस (शैतान) संस्वृफत का मूल शब्द ‘देव’ से ही आते हैं; यह है एक ही चीज़। तुम्हारे देखने में अंतर हो सकता है, तुम्हारा दृष्टिकोण भिन्न हो सकता है। लेकिन यह वही एक चीज़ है। एक बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति शैतान के लिए भी कहेगा : यह कितना सुंदर है? कितना दिव्य है, कितना अद्भुत है?
ऐसा हुआ : एक मुसलमान सूफी रहस्यदर्शनी स्त्री राबिया-मन-अदालिया ने अपने कुरान में कई पंक्तियां बदल दीं। जहां कहीं भी यह लिखा था-‘‘शैतान से घृणा करो’’, उसने उसे काट दिया। तब एक बार एक दूसरा रहस्यदर्शी हसन जो यात्रा करते हुए राबिया के यहां ठहरा हुआ था, वह अपनी कुरान की प्रति कहीं भूल आया था और सुबह की नमाज के लिए उसे उसकी आवश्यकता पड़ी इसलिए उसने राबिया से उसकी प्रति मांगी। राबिया ने उसे वह दे दी। प्रारंभ में ही उसे देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि कुरान के प्रति के ऊपर बहुत अधिक धूल जमी हुई थी- जिसका अर्थ था कि प्रतिदिन उसका उपयोग नहीं किया जाता था। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे कई महीनों से उसका उपयोग ही नहीं किया गया था- लेकिन उसने सोचा इस बारे में कोई भी बात कहना अशिष्टता होगी इसलिए उसने कुरान खोली और अपनी सुबह की नमाज पढ़ना प्रारंभ कर दी।
तब उसे और अधिक आश्चर्य हुआ, यहां तक कि एक आघात-सा लगा क्योंकि कोई भी व्यक्ति कुरान में कोई भी सुधार नहीं कर सकता था और वहां अनेक स्थानों पर सुधार किया गया था। जहां कहीं भी यह कहा गया था-‘‘शैतान से घृणा करो’’ राबिया ने उस कथन को अस्वीकार करते हुए उसे काट दिया था।
वह इतना अधिक अव्यवस्थित हो गया कि वह ठीक से प्रार्थना ही न कर सका और सोचने लगा कि क्या यह राबिया काफिर हो गई है अथवा वह नास्तिक बन गई है अथवा हुआ क्या है? ...  क्योंकि एक मुसलमान के लिए यह सोचना भी असंभव है कि तुम कुरान में सुधार कर सकते हो। वह परमात्मा के शब्द हैं, उन्हें कोई भी व्यक्ति सुधार नहीं सकता। इसी कारण वे कहते हैं कि अब और अधिक पैगंबर नहीं आएंगे क्योंकि यदि एक पैगम्बर पुनः आता है और वह कुछ ऐसी बात कहता है जोकुरान में नहीं है तो उससे कठिनाई उत्पन्न होगी। इसीलिए मुहम्मद के बाद द्वार बंद कर दिए गए हैं- वह अंतिम पैगंबर है।
और वे लोग बहुत चतुर हैं। वे कहते हैं कि वहां अतीत में अन्य दूसरे पैगंबर भी हुए हैं और वह प्रथम नहीं हैं, बल्कि वह अंतिम हैं। और अब परमात्मा से और अधिक संदेश नहीं आएंगे और उसने मुहम्मद को अंतिम संदेश दे दिया है इसलिए इस स्त्री राबिया ने कैसे यह साहस किया। वह कुरान में सुधार कर रही है। वह इतना अधिक परेशान हो गया कि वह ठीक से प्रार्थना भी न कर सका। किसी तरह से उसने उसे पूरा किया और राबिया के पास गया।
राबिया एक बुद्धत्व को उपलब्ध स्त्री थी। पूरे संसार-भर में बहुत थोड़ी-सी स्त्रियां ही बुद्धत्व को उपलब्ध हुई हैं और राबिया उनमें से एक है। हसन की ओर देखते हुए उसने कहा-‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अपनी प्रार्थना ठीक से न कर सके। ऐसा लगता है कि कुरान पर जमी धूल ने तुम्हें परेशान कर दिया। इसीलिए तुम अभी भी धूल जैसी चीज़ों से बंधे हुए हो? और ऐसा प्रतीत होता है कि कुरान में मेरे द्वारा किए गए सुधारों से तुम्हें अनिवार्य रूप से बहुत अधिक आघात लगा है।’’
हसन ने कहा-‘‘कैसे? आप इस बात को कैसे जान सकीं?’’
राबिया ने कहा-‘‘लेकिन पहले मेरी इस कठिनाई की ओर देखिए- जिस क्षण मुझे ‘वह’ अनुभव हुआ जिस क्षण मेरा परमात्मा से साक्षात्कार हुआ, उसके बाद प्रत्येक चहेरे में उसी चेहरे को देख सकी। कोई अन्य दूसरा चेहरा देखना संभव ही नहीं है। चाहे शैतान भी मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है मैं वैसा ही समान चेहरा देखती हूं। इसलिए अब मैं शैतान से घृणा कैसे कर सकती हूं क्योंकि मैंने परमात्मा के सर्वव्यापी रूप का अनुभव कर लिया है और यह मेरी समझ में आ गया है कि अब प्रत्येक चेहरा उसका ही चेहरा है। मुझे कुरान में सुधार करना पड़ा और यदि मैं कभी मुहम्मद से मिली तो मुझे स्पष्ट रूप से उनसे यह कहना होगा कि ये शब्द ठीक नहीं हैं। वे अज्ञानी लोगों के लिए ठीक हो सकते हैं क्योंकि वे लोग विभाजित होते हैं लेकिन वे उन लोगों के लिए ठीक नहीं हैं जो जानते हैं क्योंकि वे विभाजित नहीं हो सकते।’’
इसीलिए सद्गुरु कहता है :
यह पर्वत कितना अधिक सुंदर है?
उस व्यक्ति के लिए प्रत्येक चीज़ सुंदर और दिव्य है, जो जानता है।
भिक्षु ने कहा : मैं पहाड़ के बारे में न पूछकर
मार्ग के बारे में पूछ रहा हूं।
क्या तुमने कभी यह निरीक्षण किया है कि तुम स्वयं अपने बारे में, अपने पर्वत के बारे में कभी भी कोई प्रश्न नहीं पूछते और तुम हमेशा मार्ग के बारे में पूछते हो? लोग मेरे पास आते हैं और वे पूछते हैं-‘‘हमें क्या करना होगा?’’ कैसे परमात्मा तक पहुंचा जाए? कैसे बुद्धत्व को उपलब्ध हुआ जाए? वे यह कभी नहीं पूछते कि कैसे हुआ जाए? वे स्वयं अपने बारे में कभी भी कोई भी बात नहीं पूछते, जैसे मानो वे लोग पूर्ण रूप से ठीक हैं और केवल मार्ग से चूक रहे हैं, जिससे कोई व्यक्ति यह बता सके-‘ठीक सीधे चले जाओ और तब बाईं ओर मुड़ जाना और तुम मार्ग पर होगे।’
यह इतना अधिक सरल नहीं है। मार्ग ठीक तुम्हारे सामने ही है। तुम मार्ग से जरा भी नहीं चूक रहे हो। तुमने कभी उसे खोया नहीं है, कोई भी उसे खो नहीं सकता है लेकिन तुम उसकी ओर देख नहीं सकते क्योंकि तुम एक पर्वत हो।
यह प्रश्न मार्ग खोजने का नहीं है, यह प्रश्न है स्वयं को ही खोजने का कि तुम कौन हो। जब तुम स्वयं को जानते हो तो मार्ग वही है और जब तुम स्वयं को नहीं जानते हो तो मार्ग वहां नहीं है।
लोग मार्ग के बारे में पूछे चले जाते हैं और इस बारे में लाखों मार्ग सुझाए गए लेकिन इस बारे में वह नहीं हो सकता है। इस बारे में केवल एक ही मार्ग है। वही समान मार्ग बुद्ध की आंखों के सामने से भी गुजरता है और वही समान मार्ग लाओत्स के सामने से भी होकर गुजरता है और वही मार्ग जीसस के सामने से भी होकर गुजरता है। यात्री लाखों हैं लेकिन मार्ग एक ही है और वह समान है। वह ताओ है, धम्म है, वह हेराकृईटस का भी प्रतीक चिह्न है और वह एक ही है।
यात्री लाखों हैं पर मार्ग केवल एक है। इस बारे में लाखों मार्ग नहीं हैं और तुम उससे विफल नहीं हो रहे हो लेकिन तुम हमेशा मार्ग के बारे में ही पूछते हो और तुम हमेशा मार्गों के जाल में में फंस जाते हो क्योंकि जब तुम और तुम जैसे मूर्ख लोग पूछते हैं तो वहां उत्तर देने के लिए और अधिक मूर्ख लोग होते हैं। यदि तुम पूछते हो और उत्तर पाने के लिए आग्रह करते हो तो, किसी व्यक्ति को तो उसकी आपूर्ति करनी ही होती है क्योंकि अर्थशास्त्र का यही नियम है। तुम मांग करते हो और वहां उसकी आपूर्ति होगी। तुम एक मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछते हो और एक मूर्खतापूर्ण उत्तर ही दिया जाएगा क्योंकि यह मत सोचो कि तुम ही सबसे बड़े मूर्ख हो- वहां उससे भी बड़े और बेहतर मूर्ख हैं। उनमें जो लोग छोटे होते हैं वे शिष्य बन जाते हैं और जो उनसे अधिक बेहतर होते हैं वे सद्गुरु बन जाते हैं। तुम पूछते हो और वे उत्तर देकर उसकी मांग पूरी करते हैं।
और तब इस बारे में लाखों मार्ग हैं और वे हमेशा एक संघर्ष में हैं। एक मुसलमान कह रहा है : तुम उस मार्ग के द्वारा नहीं पहुंच सकते क्योंकि वह कहीं भी नहीं ले जाता है और एक अंधी और बंद गली तक ही जाता है। तुम हमारे ही मार्ग पर आओ और यदि तुम हमारी बात नहीं सुनते हो तो हम तुम्हारी हत्या कर देंगे। ईसाई लोग भी फुसला रहे हैं : तुम हमारे मार्ग पर आओ। वे लोग मुसलमानों की अपेक्षा कहीं अधिक चतुर और चालाक हैं। वे वास्तव में किसी की हत्या नहीं करते, वे लोग फुसलाते हैं, वे लोग तुम्हें भोजन देने की, दवा और अस्पताल उपलब्ध कराने की रिश्वत देते हैं और वे कहते हैं : तुम कहां जा रहे हो? तुम हमारे मार्ग पर आओ। वे लोग व्यापारी हैं और वे जानते हैं कि कैसे रिश्वत देकर लोगों को लुभाया जाता है और उन्होंने केवल उनको वस्तुएं देने के द्वारा ही लाखों लोगों का धर्मांतरण कर लिया। वहां हिंदू हैं, वे कहे चले जाते हैं : पूर्ण सत्य तो हमारे ही अधिकार में है और स्मरण रहे कि वे इतने अधिक अहंकारी हैं कि वे किसी भी व्यक्ति का धर्मांतरण तक कराने की फिक्र नहीं करते और कहते हैं-‘तुम लोग मूर्ख हो, तुम्हारा धर्मांतरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है।’ वे लोग इतने अधिक अहंकारी हैं कि वे सोचते हैं : हम लोग मार्ग को जानते हैं। यदि तुम चाहते हो तो तुम आ सकते हो। हम लोग तुम्हें रिश्वत देने अथवा तुम्हें मारने नहीं जा रहे हैं- तुम इतने अधिक महत्वपूर्ण नहीं हों यदि तुम चाहते हो तो तुम आ सकते हो लेकिन हम लोग कोई भी प्रयास करने नहीं जा रहे हैं।
तब संसार में वहां तीन सौ धर्म हैं और प्रत्येक धर्म का सोचना है : केवल यही वह मार्ग है, अकेला मार्ग और अन्य दूसरे मार्ग झूठे हैं।
लेकिन प्रश्न यह नहीं है, प्रश्न मार्ग का है ही नहीं कि कौन-सा मार्ग सत्य है? प्रश्न तो यह है कि क्या तुमने पर्वत को पार कर लिया है? प्रश्न है : क्या तुम स्वयं को पार चले गए हो? प्रश्न है : क्या तुम एक निरीक्षणकर्ता की भांति दूरी से स्वयं को देख सकते हो? तब ही एक मार्ग है।
मुहम्मद और महावीर, वृफष्ण और क्राइस्ट- वे सभी समान मार्ग पर चले। मुहम्मद, महावीर से भिन्न हैं; वृफष्ण, क्राइस्ट से भिन्न हैं लेकिन वे एक ही मार्ग पर गतिशील हुए क्योंकि मार्ग अनेक नहीं हो सकते : अनेक मार्ग कैसे एक लक्ष्य का दर्शन करा सकते हैं? केवल एक मार्ग ही तुम्हें एक मंजिल तक ले जा सकता है।
इसलिए मार्ग के बारे में मत पूछो और न कार्यविधि अथवा पद्धति के बारे में पूछो। दवा के बारे में मत पूछो। पहले बीमारी के बारे में पूछो, जो तुम हो। पहले एक गहन निदान की आवश्यकता है और तुम्हारे लिए कोई भी व्यक्ति उसका निदान नहीं कर सकता है। तुमने ही उसे सृजित किया है और केवल सृष्टा ही उसके कोने-कोने को जानता है। तुमने ही उसे उत्पन्न किया है इसलिए केवल तुम ही जानते हो कि यह जटिलताएं कैसे उत्पन्न हुईं और केवल तुम ही उन्हें हल कर सकते हो।
एक प्रामाणिक सद्गुरु सामान्य रूप से तुम्हें स्वयं तक आने में तुम्हारी सहायता करता है। एक बार तुम वहां होते हो तो मार्ग खुल जाता है। मार्ग दिया नहीं जा सकता लेकिन तुम्हें स्वयं पर पेंफका जा सकता है और तब वास्तविक परिवर्तन घटित होता है : न तो एक हिंदू एक ईसाई बन रहा है और न एक ईसाई एक हिंदू बन रहा है बल्कि एक बाहर की ओर गतिशील होती हुई ऊर्जा, अंतरस्थ की ओर गतिशील होती हुई ऊर्जा बनती है- और यही धर्मांतरण है। तुम्हारी दृष्टि अंतरस्थ की ओर हो जाती हैं पूरा ध्यान अंतरस्थ की ओर गतिशील हो जाता है और तुम पूरी जटिलता को और पर्वत को देख सकते हो। यदि तुम पूरी तरह से उसका निरीक्षण करते हो तो वह पिघलने और मिटने लगता है।
प्रारंभ में तो वह एक पर्वत जैसा दिखाई देता है पर अंत में तुम अनुभव करोगे कि वह केवल एक तिल का पहाड़ बनाना था लेकिन तुमने कभी उसकी ओर देखा ही नहीं था क्योंकि वह तुम्हारे पीछे था और वह इतना अधिक बड़ा हो गया था। जब तुम उसका सामना करते हो वह तुरंत ही कम होने लगता है, तुम जानते हो कि तुमने एक तिल का पहाड़ बना लिया था और तुम उस बारे में हंस सकते हो। तब यह और अधिक एक भार नहीं रह जाता। तुम आनंद भी मना सकते हो और कभी-कभी तुम उसके अंदर प्रातःकाल घूमने के लिए जा सकते हो।

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