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रविवार, 13 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--14)

अध्याय—चौदह

मनुष्‍य के काल—मुक्‍त जन्‍म पर
दो प्रमुख देवदूतों का संवाद और
दो प्रमुख यमदूतों का संवाद
 मीरदाद—मनुष्य के काल— मुक्त जन्म पर ब्रह्माण्ड के ऊपरी छोर पर दो प्रमुख देवदूतों के बीच निम्नलिखित बातचीत हुई :
पहले देवदूत ने कहा:
एक विलक्षण बालक को जन्म दिया है धरती ने; और धरती प्रकाश से जगमगा रही है।
दूसरा देवदूत बोला:
एक गौरवशाली राजा को जन्म दिया है स्वर्ग ने, और स्वर्ग हर्ष—विभोर है।


पहला : बालक स्वर्ग और धरती के मिलन का फल है।
दूसरा : यह शाश्वत मिलन है— पिता. माता तथा बालक।
पहला : इस बालक से धरती की महिमा बढ़ी है।
दूसरा : इससे स्वर्ग सार्थक हुआ है।
पहला : दिन इसकी आंखों में सो रहा है।
दूसरा : रात इसके हृदय में जाग रही है।
पहला : इसका वक्ष तूफानों का नीड़ है।
दूसरा : इसका कण्ठ गीत का सरगम है।
पहला : इसकी भुजाएँ पर्वतों का आलिंगन करती हैं।
दूसरा : इसकी उँगलियाँ सितारे चुनती हैं।
पहला : सागर गरज रहे हैं इसकी हड्डियों में।
दूसरा : सूर्य दौड़ रहे हैं इसकी रगों में।
पहला : भट्ठी और सांचा है इसका मुख।
दूसरा : हथौड़ा और अहरन है इसकी जिह्वा।
पहला : इसके पैरों में आने वाले कल की बेड़ियाँ हैं।
दूसरा : इसके हृदय में उन बेड़ियों की कुंजी है।
पहला : फिर भी मिट्टी के पालने में पड़ा है यह शिशु।
दूसरा : किन्तु कल्पों के पोतडों में लिपटा है यह।
पहला : प्रभु की तरह ज्ञाता है यह अंकों के हर रहस्य का। प्रभु की तरह जानता है यह शब्दों के मर्म को।
दूसरा : सब अंकों को जानता है यह, सिवाय पवित्र एक के, जो प्रथम और अन्तिम है। सब शब्दों को जानता है यह, सिवाय उस 'सिरजनहार शब्द' के, जो प्रथम और अन्तिम है।
पहला : फिर भी जान लेगा यह उस अंक को और उस शब्द को। दूसरा : तब तक नहीं जब तक स्थान के पथ—विहीन वीरानों में चलते—चलते इसके पाँव घिस न जायें; तब तक नहीं जब तक समय के भयानक भूमिगृहों को देखते—देखते इसकी आंखें पथरा न जायें।
पहला : ओह, विलक्षण, अति विलक्षण है धरती का यह बालक।
दूसरा : ओह, गौरवशाली, अत्यन्त गौरवशाली है स्वर्ग का यह राजा।
पहला : अनामी ने इसका नाम मनुष्य रखा है।
दूसरा : और इसने अनामी को प्रभु नाम दिया है।
पहला : मनुष्य प्रभु का शब्द है।
दूसरा : प्रभु मनुष्य का शब्द है।
पहला : धन्य है वह जिसका शब्द मनुष्य है।
दूसरा : धन्य है वह जिसका शब्द प्रभु है।
पहला : अब और सदा के लिये।
दूसरा : यहाँ और हर स्थान पर।
यों बातचीत हुई मनुष्य के काल—मुक्त जन्म पर ब्रह्माण्ड के ऊपरी छोर पर दो प्रमुख देवदूतों के बीच।
उसी समय ब्रह्माण्ड के निचले छोर पर प्रमुख यमदूतों के बीच निम्नलिखित बातचीत चल रही थी
पहले यमदूत ने कहा:
एक वीर योद्धा हमारे वर्ग में आ मिला है। इसकी सहायता से हम विजय प्राप्त कर लेंगे।
दूसरा यमदूत बोला :
बल्कि चिड़चिड़ा और पाखण्डी कायर कहो इसे। और विश्वासघात ने इसके माथे पर डेरा डाल रखा है। लेकिन भयंकर है यह अपनी कायरता और विश्वासघात में।
पहला : निडर और निरंकुश है इसकी दृष्टि।
दूसरा : अश्रुपूर्ण और दुर्बल है इसका हृदय। किन्तु भयानक है यह अपनी दुर्बलता और आसुँओं में।
पहला : पैनी और प्रयत्नशील है इसकी बुद्धि।
दूसरा : आलसी और मन्द है इसका कान। किन्तु खतरनाक है यह अपने आलस्य और मन्दता में।
पहला : फुर्तीला और निश्चित है इसका हाथ।
दूसरा : हिचकिचाता और सुस्त है इसका पैर। परन्तु भयानक है इसकी सुस्ती और डरावनी है इसकी हिचकिचाहट।
पहला : हमारा भोजन इसकी नाड़ियों के लिये फौलाद होगा। हमारी शराब इसके लहू के लिये आग होगी।
दूसरा : हमारे भोजन के डिबों से यह हमें मारेगा। हमारे शराब के मटके यह हमारे सिर पर तोड़ेगा।
पहला : हमारे भोजन के लिये इसकी भूख और हमारी शराब के लिये इसकी प्यास लड़ाई में इसका रथ बनेंगे।
दूसरा : अन्तहीन भूख और अमिट प्यास इसे अजेय बना देंगी और हमारे शिविर में यह विद्रोह पैदा कर देगा।
पहला : परन्तु मृत्यु इसका सारथी होगी।
दूसरा : मृत्यु इसका सारथी होगी तो यह अमर हो जायेगा।
पहला : मृत्यु क्या इसे मृत्यु के सिवाय कहीं और ले जायेगी?
दूसरा : हां, इतनी तंग आ जायेगी मृत्यु इसकी निरन्तर शिकायतों से कि वह आखिर इसे जीवन के शिविर में ले जायेगी।
पहला : मृत्यु क्या मृत्यु के साथ विश्वासघात करेगी?
दूसरा : नहीं, जीवन जीवन के साथ वफादारी करेगा।
पहला : इसकी जिह्वा को हम दुर्लभ और स्वादिष्ट फलों से परेशान करेंगे।
दूसरा : फिर भी यह तरसेगा उन फलों के लिये जो इस छोर पर नहीं उगते।
पहला : इसकी आंखों और नाक को हम सुन्दर और सुगन्धमय फूलों से लुभायेंगे।
दूसरा : फिर भी ढूँढेगी इसकी आंख अन्य फूल और इसकी नाक अन्य सुगन्ध।
पहला : और हम इसको निरन्तर मधुर किन्तु दूर संगीत सुनायेंगे।
दूसरा : फिर भी इसका कान किसी अन्य संगीत की ओर रहेगा।
पहला : भय इसे हमारा दास बना देगा।
दूसरा : आशा भय से इसकी रक्षा करेगी।
पहला : पीड़ा इसे हमारे अधीन कर देगी।
दूसरा : विश्वास इसको पीड़ा से मुक्त कर देगा।
पहला : हम इसकी निद्रा पर उलझनों से भरे सपनों की चादर डाल देंगे, और इसके जागरण में पहेलियों से भरी परछाइयाँ बिखेर देगे।
दूसरा : इसकी कल्पना उलझनों को सुलझा लेगी और परछाइयों को मिटा देगी।
पहला : यह सब होते हुए भी हम इसे अपने में से एक मान सकते है।
दूसरा : मान लो इसे हमारे साथ यदि तुम चाहो तो; किन्तु इसे हमारे विरुद्ध भी मानो।
पहला : क्या यह एक ही समय में हमारे साथ और हमारे विरुद्ध हो सकता है 7,
दूसरा : रणभूमि में यह एकाकी योद्धा है। इसका एकमात्र शत्रु इसकी परछाईं है। जैसे परछाईं का स्थान बदलता है, वैसे ही युद्ध का स्थान भी बदल जाता है। यह हमारे साथ है जब इसकी परछाईं इसके आगे है। यह हमारे विरुद्ध है जब इसकी परछाईं इसके पीछे है।
पहला : तो क्या हम इसको इस तरह से न रखें कि इसकी पीठ हमेशा सूर्य की ओर रहे 7
दूसरा : परन्तु सूर्य को हमेशा इसकी पीठ के पीछे कौन रखेगा?
पहला : एक पहेली है यह योद्धा।
दूसरा : एक पहेली है यह परछाईं।
पहला : स्वागत है इस एकाकी शूरवीर का।
दूसरा : स्वागत है इस एकाकी परछाईं का।
पहला : स्वागत है इसका जब यह हमारे साथ है।
दूसरा : स्वागत है इसका जब यह हमारे विरुद्ध है।
पहला : आज और हमेशा।
दूसरा : यहाँ और हर जगह।
यों बातचीत हुई ब्रह्माण्ड के निचले सिरे पर दो प्रमुख यमदूतों के बीच मनुष्य के काल—मुक्त जन्म पर।