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बुधवार, 9 मार्च 2016

भावना के भोज पत्र--(पत्र पाथय--35)

पत्र पाथय35

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
 प्रिय मां,
कल दोपहर एक पहाड़ी के अंचल में थे। धूप—छाया के विस्तार में बड़ी सुखद घड़ियां बीती। निकट ही था एक तालाब और हवा के तेज थपेड़ों ने उसे बेचैन कर रखा था। लहरें उठतीं, गिरतीं और ढूंढती। उसका सब कुछ विक्षुब्ध था।
फिर हवायें सो गईं और तालाब भी सो गया।

मैंने कहा, ''देखो' जो बेचैन होता है वह शांत भी हो सकता है। बेचैनी अपने में शांति को छिपाये हुए है। तालाब अब शांत है। तब भी शांत था। लहरें ऊपर ही थीं भीतर पहले भी शांति थी।''
मनुष्य भी ऊपर ही अशांत है। लहरें ऊपर ही हैं। भीतर गहराई में जाना मौन है। विचारों की हवाओं से दूर चलें और शांत सरोवर के दर्शन शुरु हो जाते हैं। यह सरोवर अभी और यहीं पाया जा सकता है। समय का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि समय वहीं तक हैं जहां तक विचार हैं। ध्यान समय के बाहर है। ईसा ने कहा है, ''और वहां समय नहीं है।'' समय में दुःख है। समय दुःख है। समयातीत होना आनंद में होना है। समयातीत होना आनंद होना है।
चलो मित्र' समय के बाहर चले—वहीं हम हैं। समय के भीतर जो दोखता है वह समय के बाहर ही है। इतना जानना ही चलना है। जाना कि हवायें रुक जाती हैं और सरोवर शांत हो जाता है।

7 फर. 1962
रजनीश के प्रणाम