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सोमवार, 14 मार्च 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--97)

अध्‍याय—(सत्‍तानवां)

 मेरी वह माला जो गई है जो ओशो ने मुझे दी थी और एक नई माला मैंने बनवाई है। जिस दिन मुझे नई माला मिलती है, इसे पर्स में डालकर मैं 'सुमिला ले आती हूं। मेरी आकांक्षा है कि यह माला मैं ओशो को दूं और वे इसे मेरे गले में पहना दें। मैं किसी से भी इस विषय में बात नहीं करती लेकिन किसी तरह मेरे सदगुरू सुन लेते हैं।
दोपहर भोजन के बाद नीलम ओशो के कमरे से बाहर आती है और कहती है, 'ओशो पूछ रहे हैं अगर किसी को उनसे मिलना है तो।मैं खुशी में उछल पड़ती हूं और अपने दोनों हाथ ऊपर उठा देती हूं। कुछ और मित्र .भी हैं जो ओशो से मिलने की इच्छा व्यक्त करते हैं।
3—00 बजे हम सब नीलम के साथ ओशो के कमरे में जाते हैं। वे कुर्सी पर बैठे हुए हैं और हम सबको देखकर मुस्कुराते हैं। हम सब फर्श
पर उनके चारों ओर बैठ जाते हैं। वे सबके साथ व्यक्तिगत रूप से बात करते हैं। जब वे सबसे बात कर चुकते हैं तो मैं अपनी नई माला निकालकर उन्हें देती हूं। वे पूछते हैं, तेरी पुरानी माला को क्या हुआ?' मैं कहती हूं वह मेरे कमरे से चोरी हो गई थी।वे कुछ देर सोचते हैं और फिर मुझे करीब आने को कहते हैं। मैं उनकी कुर्सी की ओर खिसककर अपनी आंखें बंद कर लेती हूं। जब वे माला मेरे गले में डालते हैं तो मेरा सिर झुक जाता है और वे अपना बायां हाथ मेरे सिर पर रख देते हैं। उनके चमत्कारिक स्पर्श से मेरे सभी विचार ठहर जाते हैं। और मौन में मैं उनके स्पर्श की ऊष्मा और उनके बरसते हुए आशीष को महसूस करती हूं।