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मंगलवार, 8 मार्च 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--80)

अध्‍याय—अस्‍सीवां

ज 11 दिसंबर है और बुडलैंड्स अपार्टमेंट में उनके जन्मदिन का उत्सव आयोजित किया गया है। पूरा कमरा भरा हुआ है और कछ लोग सीढियों पर भी खड़े हुए हैं। अपार्टमेंट का मुरव्य प्रवेश द्वार खुला छोड़ दिया गया है।
ओशो अपने कमरे से बाहर आते हैं और सबको नमस्कार कर कर्सी पर अपनी चिर—परिचित मुद्रा में बाई टांग पर दाई टांग रखकर बैठ जाते। आज बहुत चमक। कुछ क्षण जाता हैं वे रहे हैं के लिए बिलकुल मौन छा जाता है और फिर ओशो कोई एक घंटे तक जन्मदिन मनाने के रिवाज पर प्रवचन देते हैं।
मैं उन्हें यह कहते हुए सुनती हूं, जिस दिन तुम पैदा होते हो, मरने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। हर रोज तुम जी भी रहे हो और मर भी रहे हो। जब तक तुम अपने भीतर जीवन के स्रोत को न जान लो, जो न कभी पैदा होता है और न कभी मरता है, तब तक तुम जन्म और मृत्यु की पीड़ा झेलते रहोगे।वे मृत्यु के बारे में बहुत विस्तार से बोलते हैं। उनको सुनते—सुनते मेरी उदासी मेरे भीतर के अनंत आकाश में विलीन होने लगती है।
प्रवचन के बाद कीर्तन शुरू हो जाता है और मित्र एक—एक करके आगे आते हैं, उनके चरण छूते हैं और प्रसाद लेकर बाहर आ जाते हैं ताकि दूसरे मित्रों के लिए जगह बन सके।
बहुत से मित्र ओशो के लिए उपहार लाए हैं और यहां मैं हूं कि अपने सदगुरू से उपहार लेने के लिए खाली हाथ और खाली हृदय लिए बैठी हूं। जब उत्सव समाप्त हो जाता है तो ओशो कुर्सी से उठकर सबको नमस्कार करते हैं और प्रसादपूर्वक चलते हुए अपने कमरे में चले जाते हैं। मैंने कभी भी उन्हें जल्दबाजी में नहीं देखा। वे जहां भी होते हैं, बड़े विश्राम में नजर आते हैं। धीरे—धीरे लोग वापस लौटने लगते हैं लेकिन मैं उन्हें उनके कमरे में जाकर फिर से देखने की आकांक्षा लिए वही बैठी रहती हूं। कछ समय बाद? मुझे उनके कमरे में जाने दिया जाता है। जब मैं उनके कमरे में प्रवेश करती हूं तो देखती हूं कि वे कुर्सी पर बैठे कोई किताब पढ़ रहे है। मुझे भीतर आता देख वे किताब एक ओर रख देते है और धीमे से हंसते है। मैं उनके चरण छूकर उनके पास ही फर्श पर बैठ जाती हूं। वे कहते हैं 'आज तू अच्छी लग रही है।मैं कहती हूं हां ओशो आज मैं बहुत खुश हूं। जन्म और मृत्यु पर आपके प्रवचन को सुनकर मेरी सारी उदासी दूर हो गई है।ने अपना हाथ मेरे सिर पर रखते हैं और मेरे मन की हलचल कुछ देर को रुक जाती है जब वे अपना हाथ हटाते है तो मैं उनकी आंखों में झांकती हूं।मुस्कराकर पूछते हैं यदि मुझे कुछ कहना है। अचानक मेरी अचेतन इच्छा उभर आती है और मैं उनसे कहती हूं 'ओशो, आज आपका जन्मदिन है, मुझे आपसे कोई उपहार चाहिए।
वे हंसते हैं और क्रांति को अपनी अलमारी से मेरे लिए एक शॉल निकाल लाने को कहते हैं। मुझे अपनी शॉल देते हुए वे कहते हैं, इसे भगवा रंग में रंगवा ले और ध्यान करते समय इसे पहना कर।मैं इस अमूल्य उपहार को दोनों हाथों में संभालती हूं और नाचता हृदय लिए कमरे से बाहर आ जाती हूं।