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सोमवार, 14 मार्च 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--95)

अध्‍याय—(पीच्‍चानवां)

सुमिला के ये दिन मेरे लिए अमूल्य उपहार जैसे हैं। बहुत दिन तक मैं ओशो का कमरा व बाथरूम साफ करती रहती हूं। बाथरूम का स्लाइडिंग दरवाजा है जो कि मैं सफाई के समय बंद कर देती हूं। एक दोपहर दरवाजे की ओर पीठ किए हुए मैं साबुन के पानी से बाथरूम साफ कर रही हूं। मुझे किसी के द्वारा धीमे से दरवाजा ठेलने की आवाज आती हे।
मैं पीछे मुड़कर देखती हूं और हैरान रह जाती हूं कि ओशो वहां खड़े हुए हैं। वे स्कूल के बच्चे की तरह अपनी उंगली उठाकर कहते हैं, ज्‍योति, एक मिनट।उन्हें भीतर आकर टॉयलेट का उपयोग करना है। मेरा दिमाग काम करना बंद कर देता है। मैं चारों ओर देखती हूं पूरा फर्श साबुन आंखें बंद करके बैठे हुए हैं, जैसे कुछ भी न हुआ हो। मैं बाथरूम में वापस जाकर देखती हूं। फर्श पर और बाथटब में कांच के टुकड़े फैले देखकर मैं सकते में आ जाती हूं। छत से एक बल्व गिरकर कांच के शेल्फ से टकरा गया था। ओशो के दोपहर को नहाने का समय होने को है, इसलिए मैं एक मित्र की मदद से जल्दी—जल्दी सारा बाथरूम फिर से साफ करती हूं।
फर्श से कांच के टुकड़े समेटती हुई मैं सोचती हूं कि यह कैसा चमत्कार है। यदि बल्व दो या तीन सैकंड पहले गिरा होता तो मेरे सिर पर गिरा होता।