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शुक्रवार, 4 मार्च 2016

किताबे-ए-मीरदाद--(अध्‍याय--01)

अध्‍याय—एक

यह है
किताब— ए मीरदाद
उस रूप में जिसमें इसे
उसके साथियों में से
सबसे छोटे और
सबसे तुच्छ
नरौंदा
ने लेखनीबद्ध किया।
जिनमें
आत्म—विजय के लिये
तड़प है
उनके लिये यह
आलोक—स्तम्भ और
आश्रय है।
बाकी सब
इससे सावधान रहें।

मीरदाद अपना परदा हटाता है
और
परदों और मुहरों के विषय में बात करता है

रौंदा : उस शाम आठों साथी खाने की मेज के चारों ओर जमा थे और मीरदाद एक ओर खड़ा चुपचाप उनके आदेशों की प्रतीक्षा कर रहा था।
साथियों पर लागू पुरातन नियमों में से एक यह था कि जहाँ तक सम्भव हो वार्तालाप में 'मैं' शब्द का प्रयोग न किया जाये। साथी शमदाम मुखिया के रूप में अर्जित अपनी उपलखियों के बारे में डींग मार रहा था। यह दिखाते हुए कि उसने नौका की सम्पत्ति और प्रतिष्ठा में कितनी वृद्धि की है, उसने बहुत—से आंकड़े प्रस्तुत किये। ऐसा करते हुए उसने वर्जित शब्द का बहुत अधिक प्रयोग किया। साथी मिकेयन ने इसके लिये उसे एक हलकी—सी झिड्की दी। इस पर एक उत्तेजनापूर्ण विवाद छिड़ गया कि इस नियम का क्या उद्देश्य था और इसे किसने बनाया था— पिता हज़रत नूह ने या मुख्य साथी अर्थात् सैम ने। उत्तेजना से एक दूसरे पर दोष लगाने की नौबत आ गई और इसके फलस्वरूप बात इतनी बढ़ गई कि कहा तो बहुत—कुछ गया पर समझ में किसी की कुछ नहीं आया।
विवाद को हँसी के वातावरण में बदलने की इच्छा से शमदाम मीरदाद की ओर मुडा और स्पष्ट उपहास के स्वर में बोला
''इधर देखो, कुलपिता से भी बड़ी हस्ती यहाँ मौजूद है। मीरदाद शब्दों की इस भूलभुलैआं से निकलने की हमें राह बता।’’
सबकी दृष्टि मुड़ कर मीरदाद पर टिक गई, और हमें बड़ा आश्चर्य तथा प्रसन्नता हुई जब. सात वर्ष की लम्बी अवधि में पहली बार, मीरदाद ने अपना मुँह खोला, और हमें सम्बोधित करते हुए कहा नौका के मेरे साथियो, शमदाम की इच्छा चाहे उपहास में प्रकट की गई है, किन्तु अनजाने ही मीरदाद के गम्भीर निर्णय की पूर्व—सूचना देती है। क्योंकि जिस दिन मीरदाद ने इस नौका में प्रवेश किया था उसी दिन उसने अपनी मुहरें तोड्ने, अपने परदे हटाने और तुम्हारे तथा संसार के सम्मुख अपने वास्तविक रूप में प्रकट होने के लिये इसी समय और स्थान को— इसी परिस्थिति को— चुना था।
सात मुहरों से मीरदाद ने अपना मुँह बन्द किया हुआ है। सात परदों से उसने अपना चेहरा ढक रखा है, ताकि जब तुम शिक्षा ग्रहण करने के योग्य हो जाओ तो वह तुम्हें और संसार को सिखा दे कि कैसे अपने होंठों पर लगी मुहरें तोड़ी जायें, अपनी आँखों पर पड़े परदे हटाये जायें, और इस तरह अपने आप को अपने सामने अपने ही सम्पूर्ण तेज में प्रकट किया जाये।
तुम्हारी आँखें बहुत—से परदों से ढकी हुई हैं। हर वस्तु, जिस पर तुम दृष्टि डालते हो, मात्र एक परदा है।
तुम्हारे होंठों पर बहुत—सी मुहरें लगी हुई हैं। हर शब्द, जिसका तुम उच्चारण करते हो, मात्र एक मुहर है।
क्योंकि पदार्थ, चाहे उनका कोई भी रूप या प्रकार क्यों न हो, केवल परदे और पोतड़े हैं जिनमें जीवन ढका और लिपटा हुआ है। तुम्हारी आंख, जो स्वय एक परदा और पोतड़ा है, परदों और पोतडों के सिवाय तुम्हें कहीं और कैसे ले जा सकती है?
और शब्द— वे क्या अक्षरों और मात्राओं में बन्द किये हुए पदार्थ नहीं हैं? तुम्हारा होंठ, जो स्वयं एक मुहर है, मुहरों के सिवाय और क्या बोल सकता है?
आंखें परदा डाल सकती हैं, परदों को बेध नहीं सकतीं।
होंठ मुहर लगा सकते हैं, मुहरों को तोड़ नहीं सकते।
इससे अधिक इनसे कुछ न माँगो। शरीर के कार्यों में से इनके हिस्से का कार्य इतना ही है, और इसे ये भली—भाँति निभा रहे हैं। परदे डाल कर, और मुहरें लगा कर ये तुमसे पुकार—पुकार कर कह रहे हैं कि आओ, और उसकी खोज करो जो परदों के पीछे छिपा है ' और उसका भेद प्राप्त करो जो मुहरों के नीचे बन्द है।
परदों को बेधने के लिये तुम्हें पलकों, भौंहों और बरौनियों से ढकी इन आंखों की नहीं, बल्कि एक और ही आंख की आवश्यकता है।
मुहरों को तोड्ने के लिये तुम्हें अपनी नाक के नीचे के जाने— पहचाने मास—पिण्ड की नहीं, बल्कि एक और ही होंठ की आवश्यकता
अगर तुम अन्य वस्तुओं को सही रूप से देखना चाहते हो तो पहले स्वयं आंख को ठीक से देखो। तुम्हें आंख के द्वारा नहीं, आंख में से देखना होगा ताकि इससे परे की सब वस्तुओं को तुम देख सकी।
यदि तुम दूसरे शब्द ठीक से बोलना चाहते हो तो पहले होंठ और जबान ठीक से बोलो। तुम्हें होंठ और जुबान के द्वारा नहीं, बल्कि होंठ और जबान में से बोलना होगा ताकि उनसे परे के सब शब्द तुम बोल सकी।
यदि तुम केवल ठीक से देखोगे और बोलोगे. तो तुम्हें अपने सिवाय और कुछ नजर नहीं आयेगा, और न तुम अपने सिवाय और कुछ बोलोगे। क्योंकि प्रत्येक वस्तु के अन्दर और प्रत्येक वस्तु से परे, सब शब्दों में और सब शब्दों से परे, केवल तुम ही हो— देखने वाले और बोलने वाले।
यदि फिर तुम्हारा संसार एक चकरा देने वाली पहेली है, तो वह इसलिये कि तुम स्वयं ही वह चकरा देने वाली पहेली हो। और यदि तुम्हारी वाणी एक विकट भूलभुलैआं है, तो वह इसलिये कि तुम स्वय ही वह विकट भूलभुलैआं हो। चीजें जैसी हैं वैसी ही रहने दो, उन्हें बदलने का प्रयास मत करो। क्योंकि वे जो प्रतीत होती हैं, इसलिये प्रतीत होती हैं कि तुम वह प्रतीत होते हो जो प्रतीत होते हो। जब तक तुम उन्हें दृष्टि और वाणी प्रदान नहीं करते, वे न देख सकती हैं, न बोल सकती हैं। यदि उनकी वाणी कर्कश है तो अपनी ही जिह्वा की ओर देखो। यदि वे कुरूप दिखाई देती हैं तो शुरू में भी और आखिर में भी अपनी ही आंख को परखो।
पदार्थों से उनके परदे उतार फेंकने के लिये मत कहो। अपने प रदे उतार फेंको, पदार्थों के परदे स्वय उतर जायेंगे। न ही पदार्थों से उनकी मुहरें तोड्ने के लिये कहो। अपनी मुहरें तोड़ दो, अन्य सबकी मुहरें स्वय टूट जायेंगी।

अपने परदे उतारने और अपनी मुहरें तोड़ने की कुंजी एक शब्‍द है जिसे तुम सदैव अपने होंठों में पकड़े रहते हो। शब्दों में यह सबसे तुच्छ और सबसे महान है। मीरदाद ने इसे सिरजनहार शब्द कहा है।
नरौंदा : मुर्शिद रुक गये; और हम सब पर एक गहरा किन्तु उत्कण्ठा—पूर्ण मौन छा गया। अन्त में मिकेयन तीव्र अधीरता के साथ बोल उठा:
मिकेयन : हमारे कान उस शब्द को सुनने के लिये बेचैन हैं। हमारे ह्रदय उस कुंजी को पाने के लिए तरस रहे है। अपनी बात कहते जाओ, मीरदाद; हम विनती करते है। अपनी बात कहते जाओ।