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शुक्रवार, 4 मार्च 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--70)

अध्‍याय—(सत्‍तरहवां)

रात के समय सोने से पहले मैं एक दूसरी विधि का प्रयोग करती हूं, जिसमें मुझे अपने बिस्तर पर लेटकर शरीर को ढीला छोड़ देना है और आंखे बंद करके तथाकथित जागरण से नींद की ओर मुड़ती हुई चेतना का जो अनुभव है, भीतर उसके प्रति जागे रहना है। मुझे इसका साक्षी होना है कि नींद कैसे घेर लेती है।

मैं कई महीनों तक इसे करती हूं पर असफल ही रहती हूं। हर सुबह मैं पाती हूं कि उस बिंदु को मैं फिर से चूक गई। लेकिन एक बड़ी अजीब घटना घट रही है।
जब मुझे सपना आने लगता है तो एकदम मैं इस बोध के साथ जाग जाती हूं कि विचार की प्रक्रिया शुरू हो गई है। मैं ओशो से इस बारे में बात करती हूं। वे कहते हैं, यह भी एक बड़ी उपलब्धि है। नींद में यदि तुम उस समय जाग सको जब सपना शुरू होता है तो फिर वही तुम तथाकथित
जागरण की अवस्था में भी कर सकते हो।वे मुझे यह विधि जारी रखने को कहते हैं और समझाते हैं कि कैसे साधक को अपने ऊपर उसी तरह काम करना होता है जैसे कोई वैज्ञानिक किसी प्रयोगशाला में काम करता है। साधक की प्रयोगशाला भीतर है, जहां उसे अकेले ही काम करना है और अपने साथ धैर्य रखना है। यह कपड़े उतारने जैसा सरल काम नहीं है। यह स्वयं अपनी ही चमड़ी उतारने जैसा काम है।
फिर, एक क्षण के मौन के बाद, वे कहते हैं, मैं तेरे जितना भाग्यशाली नहीं था। मेरा कोई गुरु नहीं था, मुझे अकेले ही काम करना पड़ा। लेकिन तू सौभाग्यशाली है कि तेरा कोई गुरु है जो तेरा मार्गदर्शन का सकता है।
मुझे गंभीर देखकर, वे हंसते हुए कहते हैं, 'ध्यान के बारे में कभी भी गंभीर मत हो, बस उसे लगन से और हंसते—खेलते कर। ध्यान कुछ पाने के लिए मत कर, बस उसे करने का मजा ले।मैं उनके शब्दों को सुनती हूं जो कि उनके शांत व प्रेम से भरे हृदय से आ रहे हैं—उनका हृदय, जो करुणा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता।