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मंगलवार, 1 मार्च 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--67)

अध्‍याय—(सड़ष्‍ठवां)

शो अहमदाबाद में भगवद्गीता पर प्रवचन कर रहे हैं। हर रात, शाम के प्रवचन के बाद दो घंटे में वे पांच—छ: किताबें पढ़ते हैं। मैं सोच भी नहीं सकती कि इतनी किताबें वे कैसे पढ़ लेते हैं। जब मैं उन किताबों को खोलकर देखती हूं जो वे पढ़ चुके हैं तो पाती हूं कि अलग—अलग पन्नों पर कुछ पंक्तियां अंडरलाइन की गई हैं। हर किताब पर पढ़ने की तारीख डालकर वे हस्ताक्षर कर देते हैं।

आज, और किताबें खरीदने के लिए मैं उनके साथ बुकस्टोर जाती हूं। अनुमान लगाती हूं यह अहमदाबाद का सबसे बड़ा बुकस्टोर है। शेल्फों पर हजारों किताबें लगी हैं। काउंटर पर खड़ा व्यक्ति हाथ जोड़कर ओशो का स्वागत करता है और उनके चरण छूता है। ओशो अपना हाथ उसके सिर पर रखते हैं और नवीनतम प्रकाशनों के बारे में उससे पूछते हैं। वह व्यक्ति ओशो को दुकान के अन्दर आमंत्रित करता है और कुछ ही मिनटों में ओशो ने बत्तीस किताबें चुन ली हैं। मैं उनकी स्मृति से आश्चर्यचकित रह जाती हूं उन्हें किताबों के नाम उनके लेखकों के नामों के साथ—साथ याद हैं।
वापस लौटते समय कार की पिछली सीट पर उनके साथ बैठे हुए, केवल उत्सुकतावश ही मैं उनसे पूछती हूं, 'ओशो, बुद्धत्व के बाद भी तरह—तरह के विषयों पर आप इतनी किताबें क्यों पढ़ रहे हैं?' वे कहते हैं, यह मेरे लिए सबसे कठिन कार्य है। महावीर जो कई—कई दिनों का उपवास करते थे, वह यह सारा कचरा पढ़ने की तुलना में कुछ भी नहीं है। महावीर के समय से लेकर अब तक आदमी बहुत बदल गया है। आज के बुद्धिजीवी तक बात पहुंचाने के लिए मुझे उनके तल से बोलना है। जब वे बौद्धिक रूप से संतुष्ट हो जाते हैं, तभी वे उसको समझ पाएंगे जो कि बुद्धि के पार है।
फिर वे मुझे चेताते हैं, कभी भी इन सब किताबों को पढ़ने में मत खो जाना। मेरी किताबें सार हैं। वे सत्य के किसी भी खोजी को मार्गदर्शन देने के लिए पर्याप्त हैं।आगे वे कहते हैं, 'धर्म के नाम पर चल रही सभी पुरानी पुस्तकों का कोई भविष्य नहीं है। उन सबकी जगह मेरी पुस्तकें आ जानी चाहिएं, जो भविष्य में युवावर्ग को आकर्षित कर सकती हैं।
मैं अंधेरे में भटकती हुई मनुष्यता के लिए ओशो की करुणा को महसूस कर सकती हूं। यहां सत्य को उपलब्ध एक व्यक्ति है जो हमें मार्ग दिखाने के लिए अपने हाथों में एक जलती हुई मशाल लिए घूम रहा है।